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09 अक्टूबर 2024

चुनाव परिणाम भाजपा के लिए संजीवनी

अबकी बार चार सौ पार जैसा जबरदस्त नारा उछलने के बाद भी लोकसभा चुनावों में आशातीत सफलता न मिल पाने के बाद गैर-भाजपाई दलों द्वारा नए तरह के दुष्प्रचार राजनैतिक गलियारों में उछालने शुरू कर दिए थे. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली, भाजपा की डबल इंजन सरकार की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान उठाते हुए विपक्षी दलों के उभरते गठबंधन और मुहब्बत की दुकान ने आने वाला समय अपना बताया. इस तरह की वैचारिकी को, विपक्षी दलों द्वारा फैलाये जा रहे दुष्प्रचार को उस समय और बल मिला जबकि चुनाव सर्वेक्षणों ने हरियाणा में गठबंधन को जबरदस्त सफल होते दिखाया. इसके उलट चुनाव परिणामों ने अलग कहानी लिख दी. 

 

हरियाणा विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने लगभग 40 प्रतिशत मतों के साथ 48 सीटों को भाजपा के पक्ष में देकर विपक्षी दलों द्वारा चलाये जा रहे अनेकानेक दावों, बयानों को गलत साबित कर दिया. पिछले विधानसभा चुनावों में मतदाताओं ने लगभग 37 प्रतिशत मतदान भाजपा के पक्ष में करते हुए 40 सीटों पर विजय दिलवाई थी. अबकी सीटों की संख्या और मतदान प्रतिशत दोनों में वृद्धि करते हुए हरियाणा के मतदाताओं ने भाजपा के विरुद्ध चलाये जा रहे तमाम दुष्प्रचार खारिज कर दिए. भाजपा की इस विजय से निश्चित ही विपक्षी दलों, विशेष रूप से कांग्रेस को जबरदस्त निराशा हुई होगी क्योंकि जिस तरह से हरियाणा में भाजपा विरोधी माहौल बनाया गया था, चुनाव सर्वेक्षणों में उसे एक पायदान नीचे दिखाया गया था उसके बाद कांग्रेस खुद को सत्तासीन समझ चुकी थी. यहाँ की जनता ने किसान विरोधी, पहलवान विरोधी, सेना विरोधी, सरकार विरोधी तमाम स्थितियों को आइना दिखा दिया. भाजपा की जीत ने अग्निवीर योजना पर मतदाताओं की मुहर लगाई, साथ ही यह भी साबित कर दिया कि महिला पहलवानों और किसानों का मुद्दा विशुद्ध राजनैतिक हथकंडा था.

 



भाजपा ने हरियाणा में आरम्भ से ही अपना ध्यान राज्य के ओबीसी मतदाताओं पर लगाया जो हरियाणा की कुल आबादी का लगभग 40 प्रतिशत हैं. यहाँ की राजनीति में मुख्य रूप से जाट समुदाय का प्रभुत्व बना हुआ है जो राज्य की कुल जनसंख्या का 25 प्रतिशत हैं. कांग्रेस सहित अन्य दलों का ध्यान जहाँ जाट मतदाताओं पर रहा वहीं भाजपा ने गैर-जाट मतदाताओं को आकर्षित कर अपनी जीत सुनिश्चित की. इसके अलावा भाजपा ने गाँवों में महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से दलित परिवारों तक पहुँच बनाई, जिसमें लखपति ड्रोन दीदी अभियान ने मुख्य भूमिका निभाई.

 

हरियाणा का चुनाव वहाँ की राजनैतिक स्थितियों के कारण चर्चा में रहा तो जम्मू-कश्मीर का चुनाव इसलिए राष्ट्रव्यापी विमर्श का हिस्सा बना क्योंकि धारा 370 हटाये जाने, केन्द्रशासित राज्य बनाये जाने के बाद वहाँ यह पहला चुनाव था. इस चुनाव को लोकतान्त्रिक प्रणाली की परीक्षा भी माना जा रहा था. राज्य का इतिहास रहा है कि जहाँ पर आतंकवादियों और अलगाववादियों के भय के साए में चुनाव सपन्न हुआ करते थे, वहाँ भाजपानीत केन्द्र सरकार द्वारा लोकतंत्र की बहाली का रास्ता बनाते हुए 2019, 2020 एवं 2021 में क्रमशः ब्लॉक विकास परिषद् (बीडीसी), जिला विकास परिषद्  (डीडीसी) एवं पंचों-सरपंचों के चुनाव सहजता, शांतिपूर्वक करवा दिए. केन्द्रशासित राज्य बनाये जाने के बाद हुए परिसीमन में जम्मू संभाग में 43 और कश्मीर संभाग में 47 सीटों का आवंटन किया गया. जम्मू-कश्मीर के चुनावों में देखा जाये तो यहाँ राष्ट्रीयता के स्थान पर क्षेत्रीयता और जनजातीय अस्मिता को महत्त्व दिया गया. राज्य में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन का पूरा जोर धारा 370 की वापसी, राज्य का दर्ज़ा बहाल करने, भू-स्वामित्व को सीमित करना आदि पर रहा. इसके माध्यम से गठबंधन राज्य के नागरिकों को लुभाने में सफल भी रहा. परिणामस्वरूप नेशनल कांफ्रेंस को 45 सीटों पर विजय प्राप्त हुई जबकि कांग्रेस को मात्र 06 सीटों से संतोष करना पड़ा.

 

भाजपा की दृष्टि से यह चुनाव कुछ लाभकारी कहा जा सकता है. पिछले चुनाव की 25 सीटों के मुकाबले इस बार उसे 29 सीटों पर विजय प्राप्त हुई. राज्य में कश्मीर मुस्लिम बहुल है जहाँ भाजपा की पैठ न के बराबर है. जम्मू में जहाँ हिन्दू जनसंख्या अपना प्रभाव रखती है वहाँ भाजपा के प्रदर्शन को संतोषजनक कहा जा सकता है. मतदाताओं के बीच भाजपा ने लोकतंत्र की स्थापना, क्षेत्रीय विकास, आतंकवाद-अलगाववाद को समाप्त करने आदि मुद्दों को पहुँचाने की कोशिश की लेकिन राज्य में उसके लिए बहुत अधिक राजनैतिक संभावनाओं के न होने के बाद भी 2014 की अपेक्षा बेहतर प्रदर्शन निश्चित ही भाजपा और उसके कार्यकर्ताओं के लिए संजीवनी का काम करेगा. राज्य के चुनाव परिणामों से स्पष्ट है कि यहाँ नेशनल कांफ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनेगी किन्तु अबकी शासन, सरकार का स्वरूप पहले वाले जम्मू-कश्मीर जैसा नहीं होगा. केन्द्रशासित राज्य होने के कारण वर्तमान में उपराज्यपाल की शक्तियाँ अपना कार्य करेंगी, इस कारण अनेक महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए मुख्यमंत्री को उपराज्यपाल की अनुमति, सहमति की आवश्यकता होगी.

 

बहरहाल हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के चुनाव परिणामों को उस क्षेत्र विशेष के सन्दर्भ में, वहाँ की राजनैतिक, नागरिक स्थितियों के सन्दर्भ में देखने की आवश्यकता है. केन्द्र की भाजपानीत सरकार ने जम्मू-कश्मीर में हिंसा-मुक्त, शांतिपूर्वक चुनाव करवाकर लोकतान्त्रिक मूल्यों की स्थापना का आधार निर्मित किया है वहीं हरियाणा में भाजपा द्वारा लगातार तीसरी जीत ने बहुत सारे दुष्प्रचारों को खारिज किया है. इस जीत से निश्चित ही चार राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा, उसके सहयोगी दलों और कार्यकर्ताओं में उत्साह, ऊर्जा का संचार होगा.

12 अगस्त 2019

तीन तलाक और धारा 370 : जिम्मेवारी के साथ सतर्कता आवश्यक


अगस्त का आरम्भ भारतीय राजनीति के लिए, समाज के लिए यादगार माना जायेगा. ऐसा इसलिए क्योंकि सदन की तरफ से दो निर्णय ऐसे हुए जिनकी लम्बे समय से अपेक्षा ही नहीं थी वरन वे निर्णय देश के लिए, समाज के लिए अपरिहार्य भी थे. इन दो निर्णयों में तीन तलाक का मामला और धारा 370 का मामला रहे. दोनों निर्णयों को सदन में सत्ता पक्ष द्वारा बिना किसी हीलाहवाली के पारित करवाया गया. दोनों ही निर्णयों में सत्ता पक्ष का रवैया ठोस कार्यवाही करने जैसा रहा. उसके द्वारा जिस तरह से अपना पक्ष रखा गया, जिस तरह से इन दोनों मसलों के प्रति उसकी संवेदना साफ़ तौर पर दिखी वह प्रशंसनीय है. ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि ये दोनों ही मामले सामाजिक रूप से और राजनैतिक रूप से बहुत ही संवेदनशील और ज्वलंत मुद्दे थे. दोनों ही निर्णयों के प्रति पूर्ववर्ती सरकारों का रवैया सदैव से ढुलमुल भरा रहा है. ऐसा नहीं है कि इससे पहले भाजपानीत सरकार केंद्र में नहीं थी मगर उसके द्वारा भी इस सम्बन्ध में ठोस कदम नहीं उठाया गया था. अबकी बार ऐसा साफ़-साफ़ देखने को मिला जबकि सरकार ने न केवल कठोर कदम उठाया बल्कि किसी भी तरह से विपक्ष को हावी न होने दिया.


सरकार की प्रशंसा इस रूप में भी की जानी चाहिए कि इन दोनों निर्णयों को सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल के आरम्भ में ही लागू किया. ऐसा करने के पीछे उसकी मंशा साफ़ तौर पर ऐसे निर्णय लागू करने की दिखी. किसी भी तरह से उसके द्वारा इन निर्णयों का राजनैतिक लाभ लेने का प्रयास नहीं दिखा. किसी भी सरकार द्वारा जब भी इस तरह के संवेदनशील मुद्दों पर कोई निर्णय लिया जाता है तो विपक्ष से, सरकार विरोधियों की तरफ से आरोप लगाया जाता है ऐसे मामलों के द्वारा चुनावी लाभ लेने का. यहाँ ऐसा कुछ नहीं है. इसके साथ-साथ सरकार के इन निर्णयों की प्रशंसा इस रूप में भी की जा सकती है कि इन दोनों मामलों में उसके द्वारा पर्याप्त सुरक्षात्मक कदम उठाये गए थे, जिसके चलते किसी भी तरह से उपद्रव नहीं हो सका. दोनों ही मुद्दे किसी न किसी रूप में मुस्लिम समुदाय से जुड़े हुए थे जिसमें तीन तलाक से ज्यादा संवेदित मामला जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को हटाये जाने का था. इसमें जहाँ कश्मीर के अलगाववादियों का जुड़ा होना तो था ही साथ ही इस मामले में पाकिस्तान भी पर्याप्त रुचि दिखा रहा था. रुचि तो वह आज भी दिखा रहा है किन्तु उसके द्वारा कोई भी कदम सफल सिद्ध नहीं हो रहा है. 


जम्मू-कश्मीर मामले में सरकार की तारीफ इसके लिए भी करनी होगी कि उसके द्वारा इतने पुख्ता इंतजाम कर लिए गए थे कि न तो उस राज्य के अलगाववादी किसी तरह का उपद्रव कर सके, न पत्थरबाज़ अपने हाथ फैला सके और न ही पाकिस्तान कोई हिंसात्मक कदम उठा सका. इसके साथ-साथ सबसे बड़ी बात रही वैश्विक समुदाय का इस समूचे मुद्दे पर ख़ामोशी बनाये रखना. इससे स्पष्ट है कि विगत कार्यकाल में प्रधानमंत्री का वैश्विक नेताओं के साथ संबंधों का लाभ अब मिला है. ऐसे में पाकिस्तान बिलकुल अलग-थलग दिखाई देने लगा है. सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को उसके भौगौलिक हिसाब से दो राज्यों में बाँट देने का निर्णय भी सराहनीय कहा जायेगा. केंद्र शासित राज्यों की श्रेणी में आने से इन दोनों के केंद्र सरकार का नियंत्रण रहेगा और लद्दाख भी अपना पर्याप्त विकास कर सकेगा.

अब सरकार की जिम्मेवारी बनती है कि उसने जिस तीव्रता के साथ, जिस कठोरता के साथ दोनों निर्णयों को लागू किया है उनको उसी जिम्मेवारी से सफलता की तरफ ले जाये. स्पष्ट है कि मुस्लिम समुदाय में जिस तरह से महिलाओं को लेकर, तीन तलाक को लेकर सोच बनी हुई है उसमें एकदम से उनके लिए स्वीकारना सहज नहीं होगा कि ये मामला अब गैर-कानूनी हो गया है. ऐसे में कानूनी रूप से प्रशासनिक रूप से सशक्त रहने की आवश्यकता है. मुस्लिम समुदाय की कमजोर तबके की महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा प्रदान किये जाने की जिम्मेवारी भी अब सरकार की हो गई है. कुछ इसी तरह के एहतियात भरे कदम जम्मू-कश्मीर राज्य में उठाये जाने की आवश्यकता है. वहाँ के अलगाववादियों को, पाकिस्तान को ये कतई मंजूर नहीं होगा कि वहाँ किसी भी तरह से शांति बनी रहे. ऐसे में न केवल सेना को वरन वहाँ के नागरिकों को भी सतर्क रहने की आवश्यकता है. यदि शुरूआती कुछ महीनों में इन दोनों निर्णयों पर सरकार, प्रशासन गंभीरता दिखाए रहा तो निश्चित ही दोनों निर्णय भारतीय समाज, राजनीति के लिए मील का पत्थर साबित होंगे.