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29 मार्च 2026

समावेशी राष्ट्र हेतु समान नागरिक संहिता

गत माह गुजरात समान नागरिक संहिता को लागू करने वाला दूसरा राज्य बन गया. इससे पूर्व फरवरी 2024 में उत्तराखण्ड ने इसे लागू किया था. यह संहिता मुख्य रूप से विवाह, तलाक और विरासत जैसे व्यक्तिगत मामलों को सभी नागरिकों के लिए एकसमान रूप से प्रभावी करती है. यह किसी राजनैतिक दल विशेष की मानसिकता की उपज नहीं बल्कि देश की आज़ादी के तुरंत बाद ही व्यापक दृष्टिकोण से जन्मी अवधारणा है. नवम्बर 1948 में संविधान सभा की बैठक में समान नागरिक संहिता को लागू किये जाने पर लम्बी बहस चली. बहस में इस्लामिक चिन्तक मोहम्मद इस्माईल, जेड.एच. लारी, हुसैन इमाम, नजीरुद्दीन अहमद सहित अनेक मुस्लिम नेताओं ने अम्बेडकर का विरोध किया था. तब अम्बेडकर ने समान नागरिक संहिता का समर्थन करते हुए कहा था कि देश में एक आपराधिक विधि संहिता है, दंड विधान में एक विधि है, सम्पत्ति हस्तांतरण का एक विधान है. बहस के दौरान जबरदस्त विरोध के बीच मतदान करवाया गया, जिसमें अम्बेडकर के प्रस्ताव को स्वीकार किया गया. समान नागरिक संहिता का विरोध करने वाले मुस्लिम सदस्यों के पराजित होने के पश्चात् संविधान के अनुच्छेद 44 में बहुमत से समान नागरिक संहिता को लागू किये जाने सम्बन्धी विधान लाया गया. इस प्रस्ताव के लाये जाने के बाद भी समान नागरिक संहिता को लागू करने का विचार कुछ वर्षों के लिए इसलिए टाल दिया गया ताकि बँटवारे की त्रासदी झेल रहे मुसलमानों के प्रति सौहार्द्र दर्शाया जा सके. संविधान सभा द्वारा सौहार्द्र दर्शाने के बावजूद मुस्लिम कट्टरता बढ़ती गई, मुस्लिम तुष्टिकरण बढ़ता गया और समान नागरिक संहिता की राह संकीर्ण होती गई. इसी विरोध और कट्टरता के चलते 1972 में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का जन्म हुआ. तबसे यह समान नागरिक संहिता का विरोध करते हुए शरीयत को संविधान और कानून से ऊपर बताता-मानता है.

 



चूँकि समान नागरिक संहिता लागू किये जाने का बिन्दु भाजपा द्वारा उठाया जाता रहा है ऐसे में गैर-भाजपाई राजनैतिक दलों द्वारा इसे राजनैतिक रंग देकर विवादित बना दिया गया है. इन राजनैतिक दलों का आरोप है कि भाजपा द्वारा ध्रुवीकरण के लिए इस विषय को उठाया जाता है. ऐसे आरोपों के बीच यह समझना होगा कि आज़ादी के तुरंत बाद तो भाजपा नहीं थीउस समय हिंदुत्व साम्प्रदायिकता जैसी कोई स्थिति भी नहीं थी तब उस समय संविधान सभा द्वारा समान नागरिक संहिता को लागू करने का विधान क्यों बनाया गया? तब भी मुस्लिम सदस्यों द्वारा इस संहिता का विरोध क्यों किया गयाआखिर सभी नागरिकों के एकसमान अधिकार होने का विरोध क्योंशरीयत की बात करने वाला कट्टरपंथी मुसलमान क्या सभी कार्य शरीयत के अनुसार ही करता हैकिसी मुसलमान द्वारा अपराध किये जाने पर शरीयत के अनुसार उसको कोड़े मारनाहाथ काटनापत्थर मारनाफाँसी पर लटकाना आदि जैसी सजाएँ दी जाती हैंकुरान में बाल विवाह प्रतिबंधित है. उसके अनुसार विवाह केवल बालिग स्त्री-पुरुष के बीच हो सकता है जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार ख्याल-उल-बलूग अर्थात बाल विवाह का प्रावधान है. कुरान के अनुसार तलाक बिना अदालती हस्तक्षेप के सम्भव नहीं जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार मुस्लिम मर्द को अपनी मर्जी से तलाक लेने का अधिकार है. ऐसे एक-दो नहीं अनेक उदाहरण हैं जिनके आधार पर न ही शरीयत का सम्पूर्ण पालन होता दिखता है न ही कुरान और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में समन्वय दिखता है. ऐसे में आखिर शरीयत की दुहाई देते हुए समान नागरिक संहिता का विरोध क्यों किया जाता है

 

देखा जाये तो भारतीय लोकतंत्र के विकसित और सशक्त राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में समान नागरिक संहिता केवल राजनैतिक मुद्दा नहीं बल्कि सामाजिक न्याय की अनिवार्यता है. भारतीय संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 44 के माध्यम से जिस स्वप्न को नीति निदेशक तत्वों में संजोया था, उसे वर्तमान की कसौटी पर परखने का समय आ गया है. एक देश में नागरिक कानूनों की विविधता न केवल प्रशासनिक जटिलताएँ पैदा करती है, बल्कि यह उस संवैधानिक संकल्प के भी आड़े आती है जो हर नागरिक को कानून के समक्ष बराबरी का अधिकार देता है.

यहाँ समझना होगा की कानूनी समानता के लिए अस्तित्व में आने वाली समान नागरिक संहिता किसी धार्मिक आस्था पर चोट नहीं है, किसी भी व्यक्ति को उसके मजहबी आचरण से विलग करने की नीति नहीं है बल्कि इसके द्वारा मानवाधिकारों की सुरक्षा का, व्यक्तिगत पहचान को पुख्ता करने का कदम है. एक ऐसे देश में जहाँ धार्मिक स्वतंत्रता है, वैचारिक स्वतंत्रता है वहाँ एक संहिता के द्वारा किसी को कैसे प्रतिबंधित किया जा सकता है? समान नागरिक संहिता एक नागरिक के प्रति उसके अधिकार और उसे मिलने वाले न्याय की प्रक्रिया को सार्वभौमिक स्वरूप प्रदान करती है.

 

राष्ट्रीय एकता और अखंडता के दृष्टिकोण से भी कानूनों का यह सरलीकरण आवश्यक है. इससे न केवल नागरिकों के बीच एकसमान अवधारणा कार्य करेगी बल्कि न्यायपालिका के लिए भी वर्षों से लंबित पड़े पारिवारिक विवादों का निपटारा करने में सहजता होगी. बेशक, भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में सर्वसम्मति बनाना एक चुनौती है किन्तु यह समझना भी होगा कि सुधार कभी भी यथास्थितिवाद से नहीं आते. समान नागरिक संहिता वास्तव में आधुनिक और समतामूलक समाज की अवधारणा पुष्ट करती है. इसके लिए हमें संकीर्णता से ऊपर उठकर एक विधान के विचार को धरातल पर उतारना होगा ताकि आने वाली पीढ़ियाँ संगठित और न्यायप्रिय भारत का निर्माण कर सकें.

 

25 जून 2024

आपातकाल का सच और वर्तमान दौर

भाइयो और बहनो, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है. इससे आतंकित होने का कोई कारण नहीं है. रेडियो पर लगभग आधी सदी पूर्व गूँजी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की इस आवाज़ ने देश में हलचल मचा दी थी. तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने सरकार की सिफारिश पर संविधान के अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत देश में आपातकाल घोषणा किया था. 25 और 26 जून की मध्य रात्रि में तत्कालीन राष्ट्रपति के हस्ताक्षर करने के साथ ही यह लागू हो गया था. 25 जून 1975 से लेकर 21 मार्च 1977 तक देश में 21 महीने तक आपातकाल लागू रहा. इस कदम को आज भी लोकतंत्र का काला अध्याय कहा जाता है.

 

आपातकाल की व्यवस्था किसी तरह की असंवैधानिक व्यवस्था नहीं है. देश के संविधान में ही आपातकाल लागू किये जाने की व्यवस्था है. संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा करने का अधिकार है. आपातकाल में नागरिकों के सभी मौलिक अधिकार निलंबित हो जाते हैं. ऐसी स्थिति उस समय व्यवहार में लाई जाती है जबकि सम्पूर्ण देश अथवा किसी राज्य पर अकाल, बाहरी देशों के आक्रमण, आंतरिक प्रशासनिक अव्यवस्था अथवा अस्थिरता आदि जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाए. इस तरह की विषम स्थिति में समस्त राजनैतिक और प्रशासनिक  शक्तियाँ राष्ट्रपति के हाथों में चली जाती हैं. 1975 के पूर्व वर्ष 1962 तथा वर्ष 1971 में राष्ट्रीय आपातकाल लगाया गया था.

 



देश में पहली बार आपातकाल 26 अक्टूबर 1962 से 10 जनवरी 1968 के बीच लगा जबकि उस समय भारत और चीन के बीच युद्ध चल रहा था. दूसरी बार 3 से 17 दिसंबर 1971 के बीच आपातकाल लगाये जाने का कारण भारत-पाकिस्तान युद्ध था. दोनों स्थितियों में देश की सुरक्षा को खतरा देखते हुए ऐसी घोषणा की गई थी. इन दो वास्तविक विषम परिस्थितियों के सापेक्ष वर्ष 1975 की स्थितियों को देखा जाये तो आपातकाल लागू किये जाने का तार्किक आधार नजर नहीं आता है. बावजूद इसके आपातकाल लागू किया गया. अभिव्यक्ति के अधिकार के साथ-साथ नागरिकों के जीवन का अधिकार भी छीन लिया गया था. 25 जून की रात से ही देश में विपक्ष के नेताओं की गिरफ्तारियों का दौर शुरू हुआ. प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई. प्रत्येक मीडिया सेंटर पर सेंसर अधिकारी नियुक्त कर दिया गया. उसकी अनुमति के बाद ही समाचार का प्रकाशन हो रहा था. सरकार विरोधी समाचार छापने पर गिरफ्तारी हो रही थी.

 

दरअसल आपातकाल लगाये जाने के पीछे किसी बाहरी शक्ति से खतरा होने से ज्यादा इंदिरा गांधी को अपनी सत्ता जाने का खतरा दिखाई देने लगा था. 1971 में तत्कालीन भारत-पाकिस्तान युद्ध में जबरदस्त विजय और बांग्लादेश निर्माण के बाद से इंदिरा गांधी की लोकप्रियता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई. इसी के चलते उन्होंने 1971 का लोकसभा चुनाव भी प्रचंड बहुमत से जीतकर विपक्ष का लगभग सफाया कर दिया था. दरअसल 1971 में बांग्लादेश बन जाने से भले ही इंदिरा गांधी को लोकप्रियता मिली मगर उसके साथ बांगलादेशी शरणार्थियों के आने से देश की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ा. गुजरात और बिहार में इस नकारात्मकता ने आन्दोलन का रूप ले लिया. इन दोनों राज्यों से विद्यार्थियों की जबरदस्त एकजुटता को आन्दोलन की शक्ल में बदलने का काम किया बिहार के जयप्रकाश नारायण ने. उनके नेतृत्व में सम्पूर्ण क्रांति का नारा देते हुए आन्दोलन तेज होने लगा. इसके साथ ही इंदिरा गांधी की जीत पर सवाल उठाते हुए उनके चुनावी प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने 1971 में अदालत में अपनी याचिका में आरोप लगाया कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया है. उच्च न्यायालय ने इस याचिका पर 12 जून 1975 को फैसला सुनाते हुए इंदिरा गांधी के निर्वाचन को रद्द करते हुए अगले छह साल तक चुनाव लड़ने पर भी प्रतिबंध लगा दिया. जगह-जगह उनके इस्तीफे की माँग उठने लगी. इसी से आक्रोशित होकर आपातकाल जैसा कदम उठाया गया.  

 

विगत कुछ वर्षों से विपक्ष द्वारा लगातार प्रचार किया जा रहा है कि वर्तमान केन्द्र सरकार द्वारा आपातकाल जैसी स्थितियाँ पैदा कर दी गई हैं. अभी हाल में सम्पन्न हुए लोकसभा चुनावों में संविधान बदल देने, आरक्षण समाप्त कर देने, भविष्य में चुनाव न होने देने जैसा दुष्प्रचार किया गया. यहाँ विशेष बात यह है कि 1975 में आपातकाल की नींव रखने वाला दल आज विपक्ष में है और आपातकाल के ज़ुल्मों को सहने वाले सरकार में हैं. ऐसे में मीडिया और सोशल मीडिया के पर्याप्त स्वतंत्र होने की स्थिति में किसी भी प्रचार-दुष्प्रचार का आकलन राष्ट्रीय हितों को देखते हुए किया जाना चाहिए. वर्तमान पीढ़ी के बहुसंख्यक नागरिकों ने आपातकाल में प्रशासन, पुलिस की ज्यादतियों को पढ़ ही रखा है, इसके उलट बड़ी संख्या में ऐसे नागरिक भी हैं जिन्होंने आपातकाल की क्रूरता को न केवल देखा है बल्कि सहा भी है. ऐसे में उन लोगों, भले ही वे राजनीति में नहीं हैं, का भी दायित्व बनता है कि वर्तमान पीढ़ी को सत्य से परिचित करवाते रहें. आपातकाल के दौर में भुक्तभोगी रही मीडिया को भी यथोचित स्थितियों के सच के साथ सामने आने की आवश्यकता है. यदि लगता है कि वर्तमान केन्द्र सरकार के कार्य, नीतियाँ इस तरह की हैं जो घोषित अथवा अघोषित आपातकाल की पीठिका निर्मित करती हैं, तो उनका मुखर विरोध किया जाना चाहिए. जिस तरह से विगत वर्षों में संसद में पक्ष और विपक्ष की भूमिकाएँ देखने को मिली हैं वे प्रशंसनीय नहीं कही जा सकती हैं. देश के धन और समय के अपव्यय के बीच समाप्त होते निष्फल संसद सत्रों के बीच घोषित अथवा अघोषित आपातकाल देश को नुकसान ही पहुँचायेगा.   


15 जून 2023

समान नागरिक संहिता का अतार्किक विरोध

समान नागरिक संहिता का मसला उस समय चर्चा में आया जबकि इसी 14 जून को 22वें विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता पर जनता और मान्यता प्राप्त धार्मिक संगठनों के विचार माँगे हैं. एक सामान्य नागरिक भी इस पर अपने विचार विधि आयोग को तीस दिन के भीतर भेज सकता है. आयोग ने यह भी कहा है कि यदि आवश्यकता महसूस हुई तो वह चर्चा के लिए व्यक्ति अथवा संगठन को बुला भी सकता है. जैसे ही समान नागरिक संहिता की चर्चा शुरू हुई वैसे ही इसका विरोध भी शुरू कर दिया गया. समान नागरिक संहिता का मुद्दा कोई राजनैतिक नहीं वरन संविधान में ही इसके तत्त्व समाहित हैं. संविधान की प्रस्तावना और नीति निर्देशक सिद्धांतों के अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि सरकार सभी के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने की कोशिश करे. 


आज़ादी के बाद नवम्बर 1948 में संविधान सभा की बैठक में समान नागरिक संहिता को लागू किये जाने पर लम्बी बहस चली. बहस में इस्लामिक चिन्तक मोहम्मद इस्माईल, जेड एच लारी, बिहार के मुस्लिम सदस्य हुसैन इमाम, नजीरुद्दीन अहमद सहित अनेक मुस्लिम नेताओं ने भीमराव अम्बेडकर का विरोध किया था. तब डॉ० अम्बेडकर ने समान नागरिक संहिता का समर्थन करते हुए कहा था कि देश में एक आपराधिक विधि संहिता है, दंड विधान में एक विधि है, संपत्ति हस्तांतरण का एक विधान है. जबरदस्त विरोध के बीच हुए मतदान में डॉ० अम्बेडकर का प्रस्ताव विजयी हुआ. मुस्लिम सदस्य बुरी तरह पराजित हुए और संविधान के अनुच्छेद 44 में बहुमत की राय से समान नागरिक संहिता को लागू किये जाने सम्बन्धी विधान लाया गया. इसके बाद भी बँटवारे की त्रासदी झेल रहे मुसलमानों के प्रति सौहार्द्र दर्शाते हुए समान नागरिक संहिता को लागू करने का विचार कुछ वर्षों के लिए टाल दिया गया. समय गुजरने के साथ-साथ मुस्लिम कट्टरता बढ़ती गई, मुस्लिम तुष्टिकरण बढ़ता गया और समान नागरिक संहिता की राह संकीर्ण होती गई. इसी विरोध और कट्टरता के चलते सन 1972 में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का जन्म हुआ. तबसे यह समान नागरिक संहिता का विरोध करते हुए शरीयत को संविधान और कानून से ऊपर बताती-मानती है.




इसके विरोध में खड़े लोगों का यह तर्क तो अत्यंत हास्यास्पद है कि समान नागरिक संहिता की बात हिन्दुओं द्वारा महज इस कारण की जाती है क्योंकि वे मुसलमानों की चार शादी और तलाक देने की सुविधा को आबादी बढ़ाने वाला मानते हैं. यहाँ सवाल उठता है कि क्या ये प्रासंगिक है कि एक महिला को मात्र तीन बार तलाक बोलकर हमेशा के लिए बेघर कर दिया जाये, जैसा कि शाहबानो प्रकरण में हुआ? 1985 में शाहबानो की उम्र 62 वर्ष थी और उसके पति ने तीन बार तलाक कहकर उससे सम्बन्ध विच्छेद कर लिया था. पाँच बच्चों की माँ शाहबानो को तब सिर्फ मैहर की रकम वापस की गई थी. इसी वर्ष उच्चतम न्यायालय ने कहा भी था कि संसद को समान नागरिक संहिता पर आगे बढ़ना चाहिए. वर्ष 2015 में भी पुनः उच्चतम न्यायालय ने इसकी आवश्यकता पर बल दिया. सर्वोच्च न्यायालय ने इससे पूर्व वर्ष 2003 में भी भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 की धारा 118 को असंवैधानिक करार देते हुए संसद को समान नागरिक संहिता के निर्माण के सम्बन्ध में अपनी टिप्पणी प्रेषित की थी.


गैर-भाजपा राजनैतिक दलों का आरोप है कि भाजपा ध्रुवीकरण के लिए इस विषय को उठाती रहती है. सत्तारूढ़ केंद्र सरकार द्वारा राम मंदिर और अनुच्छेद 370 के वायदे को पूरा करने के बाद ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि वह हिंदुत्व, हिन्दू वोट के लिए समान नागरिक संहिता को देश में लागू करना चाहती है. ये समझने का विषय है कि आज़ादी के तुरंत बाद तो भाजपा नहीं थी, तब हिंदुत्व साम्प्रदायिकता जैसी कोई स्थिति भी नहीं थी तब उस समय क्यों इसका विरोध किया गया? सभी नागरिकों के एक अधिकार हो जाने का विरोध क्यों? शरीयत की बात करने वाला कट्टरपंथी मुसलमान क्या सभी कार्य शरीयत के अनुसार ही करता है? किसी मुसलमान द्वारा अपराध किये जाने पर शरीयत के अनुसार उसको कोड़े मारना, हाथ काटना, पत्थर मारना, फांसी पर लटकाना आदि जैसी सजाएँ दी जाती हैं? कुरान में बाल विवाह प्रतिबंधित है. उसके अनुसार विवाह केवल बालिग स्त्री-पुरुष के बीच हो सकता है. जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार ख्याल-उल-बलूग अर्थात बाल विवाह का प्रावधान है. कुरान के अनुसार तलाक बिना अदालती हस्तक्षेप के संभव नहीं जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार मुस्लिम मर्द को अपनी मर्जी से तलाक लेने का अधिकार है. कुरान विधवा विवाह और पुनर्विवाह को मान्य करती है जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ऐसा प्रतिबंधित करता है. ऐसे एक-दो नहीं अनेक उदाहरण हैं जिनके आधार पर न ही शरीयत का सम्पूर्ण पालन होता दिखता है न ही कुरान और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में समन्वय दिखता है. ऐसे में ये लोग किस शरीयत की दुहाई देते हुए समान नागरिक संहिता का विरोध करने में लगे हैं? क्यों इस विषय पर मुस्लिमों के एकमत होने का इंतजार किया जाता है? क्यों उनको अंतरात्मा की आवाज़ सुनने के लिए कहा जाता है? सवाल उठता है कि क्या सन 1955-56 में हिन्दू कोड बिल लागू करते समय हिन्दुओं की भावनाओं का ख्याल रखा गया था? क्या उत्तराधिकार, बाल विवाह आदि पर नियम बनाते समय हिन्दुओं की अंतरात्मा की आवाज़ को सुनने का प्रयास किया गया था?


आखिर चन्द गैरजिम्मेवार लोगों के विरोध के चलते कब तक अपरिहार्य विधान को लागू होने से रोका जाता रहेगा? समान नागरिक संहिता किसी एक समुदाय विशेष के विवाह अथवा तलाक की बात नहीं करती वरन एक महिला को भी नागरिक के रूप में अधिकार प्रदान किये जाने की बात करती है. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आवश्यकता इसकी है कि सभी लोग हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई आदि धार्मिक मानसिकता से ऊपर उठकर विशुद्ध भारतीय नागरिक की मानसिकता से विचार करें. देश में एक ऐसी संहिता का निर्माण करने में योगदान दें जो सभी समुदायों पर समान रूप से लागू हो, सभी को भारतीयता की पहचान कराती हो.






 

03 अगस्त 2018

सवर्ण राजनीति की मुख्यधारा की माँग नहीं

उच्चतम न्यायालय द्वारा एससी-एसटी एक्ट के सम्बन्ध में दिए गए निर्णय के खिलाफ जाते हुए सरकार संशोधन विधेयक वर्तमान सत्र में ला रही है. इसकी तैयारी के बीच पिछड़ा वर्ग आयोग को भी संवैधानिक दर्जा दे दिया गया है. दलितों-पिछड़ों के लिए उठाये जाते इन कदमों के बीच आरक्षण सम्बन्धी तमाम सारे और भी कदम इस दौरान उठाये जाते रहे हैं. शिक्षा, नौकरी के साथ-साथ पदोन्नति में भी आरक्षण यथावत रखा गया है. केंद्र सरकार के दलितों-पिछड़ों को लेकर किये जा रहे तमाम सारे कार्यों में से शायद ही किसी का इतना विरोध हुआ जो जितना कि एससी-एसटी एक्ट में संशोधन को लेकर हो रहा है. यह स्थिति तब है जबकि इस एक्ट में कोई आमूल-चूल परिवर्तन करने के बजाय उच्चतम न्यायालय द्वारा महज इतनी व्यवस्था की गई थी कि आरोपी सवर्ण की गिरफ़्तारी बिना जाँच के नहीं होगी. इस आदेश को मोदी सरकार की मंशा बताते हुए विपक्षियों ने उपद्रवी माहौल बना डाला. इसका नकारात्मक असर यह हुआ कि केंद्र सरकार संशोधन बिल लाने को तैयार हो गई.


न्यायालय के आदेश के खिलाफ जाकर केंद्र सरकार का इस तरह से संशोधन विधेयक लाने के मूल में विशुद्ध राजनीति है. यह कोई छिपा हुआ एजेंडा नहीं है वरन केंद्र सरकार के कदमों से बराबर सिद्ध होता रहा है कि वह किसी भी रूप में सवर्णों को मददकारी हो या न हो मगर दलितों-पिछड़ों के लिए मददगार अवश्य रहेगी. देश के सवर्णों को सरकार के इस कदम से आपत्ति या निराशा जैसा कुछ नहीं लगना चाहिए क्योंकि सिर्फ यही सरकार नहीं वरन देश की सभी सरकारों का एकमात्र उद्देश्य ऐसे कदमों से दलितों-पिछड़ों का वोट प्राप्त करना है. यदि गंभीरता से देखा जाये तो दलित-पिछड़े किसी भी राजनैतिक दल के लिए आज मुख्यधारा के लोग हैं. सवर्ण अपने आपको किसी भी रूप में मुख्यधारा में न माने, राजनीति के लिए खुद को अहम् न माने. आज न सरकारों को और न ही विपक्ष को सवर्णों की, उनके वोट की आवश्यकता है. यदि सामाजिक प्रस्थिति के रूप में इस बिंदु पर निगाह डाली जाये तो नब्बे के दशक से राजनीति की मुख्यधारा से सवर्णों का पतन किया जाना आरम्भ हो गया था. हिन्दू धर्म की छुआछूत की भावना को, विभेद की भावना को समस्त राजनैतिक दलों द्वारा बुरी तरह से अपने पक्ष में दोहन किया गया. यही कारण है कि जाति का विरोध करने वाले इन राजनैतिक दलों द्वारा जाति-विहीन समाज की बात भले ही की जाती हो मगर समाज से जाति दूर करने की बात नहीं की जाती है. इसी का दुष्परिणाम यह हुआ कि राजनीति में जातिगत आधार पर न केवल राजनैतिक दलों का गठन हुआ वरन वे सत्ता में भी काबिज होने लगे.

यहाँ आकर सवर्णों को समझना होगा कि वे अब राजनीति की मुख्यधारा की माँग नहीं हैं. अर्थशास्त्र का माँग और आपूर्ति का नियम सिर्फ अर्थशास्त्र में ही लागू नहीं होता बल्कि समाज के प्रत्येक हिस्से में लागू होता है. आज देश की राजनीति की माँग दलित हैं, पिछड़े हैं तो सत्ता पक्ष द्वारा, विपक्ष द्वारा, राजनैतिक दलों द्वारा उनकी माँग को स्वीकार किया जा रहा है. सवर्णों को यह समझने की भूल नहीं करनी चाहिए कि वे किसी भी रूप में प्रभावकारी मतदाता हैं. कायदे से देखा जाये तो सवर्ण आज भी निपट कबीलों में बंटा हुआ है. अतीत की छोटी-छोटी रियासतों की तरह वह आज भी छोटे-छोटे से वर्गों में विभक्त है. यही कारण है कि उसके पक्ष में एक आदेश के साथ किसी भी राजनैतिक दल के सवर्ण जनप्रतिनिधि भी आकर नहीं खड़े हुए. देश में वर्तमान में हो रही राजनीति की चाल को समझने की आवश्यकता है. यहाँ सभी राजनैतिक दलों का एकमात्र उद्देश्य सत्ता की प्राप्ति होता है, वह कैसे हो यह उसका विचार-बिंदु होता है. उन्हें न सवर्णों के हितार्थ कोई कदम उठाना है और न ही दलितों-पिछड़ों के हितार्थ. सत्ता की खातिर उन्हें कब कौन सा कदम उठाना पड़ सकता है, ये उन्हें खुद नहीं मालूम होता है.  

17 मई 2018

कर्नाटक में भाजपा की अग्नि-परीक्षा


अंततः कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में येदियुरप्पा ने शपथ ग्रहण कर ली है. उनके शपथ लेने के बाद भी ये अनिश्चितता बनी हुई है कि क्या वे सदन में बहुमत सिद्ध कर सकेंगे? चुनाव परिणामों के बाद की अंतिम स्थिति में भाजपा के पास बहुमत के आँकड़े से कम सीटें रहीं. भाजपा जहाँ खुद को सबसे बड़े दल के रूप में देखने के बाद पहले सरकार बनाने के रूप में स्वीकारोक्ति चाह रही थी वहीं दोनों विपक्षी दलों ने अपनी संयुक्त सीटों की संख्या के आधार पर सरकार पहले बनाने का दावा पेश किया. ऐसी विषम स्थिति में गेंद राज्यपाल के पाले में आ गई थी. तमाम ऊहापोह के बाद कर्नाटक के राज्यपाल ने भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया. कांग्रेस जैसे पहले से ही तैयार बैठी थी, राज्यपाल का फैसला भाजपा के पक्ष में आते ही उसने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया. देर रात तक चली तीन सदस्यीय पीठ ने येदियुरप्पा के शपथ ग्रहण पर रोक लगाने से इंकार करते हुए शपथ ग्रहण का रास्ता खोल दिया.


बड़े दल के रूप में उभर कर आने के कारण राज्यपाल द्वारा भाजपा को पहले सरकार बनाने का आमंत्रण देना क्या वाकई संवैधानिक त्रुटि है? क्या वाकई ये लोकतान्त्रिक मूल्यों की हत्या है? क्या वास्तव में राज्यपाल के इस कदम को नैतिकता की हार कहा जायेगा? ऐसे और भी प्रश्न हैं जो अब भारतीय राजनैतिक पटल पर उभरने लगे हैं. यहाँ संविधान विशेषज्ञों की अपनी-अपनी राय है और लगभग सभी की राय में किसी भी राज्य में राज्यपाल द्वारा सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का आमंत्रण देना गलत नहीं है. ऐसा उस स्थिति में गलत कहा जा सकता है जबकि चुनाव पूर्व गठबंधन वाले दलों की संयुक्त सीटों की अधिक संख्या होने के बाद भी उन्हें सरकार बनाने के लिए न्यौता नहीं दिया जाता है. येदियुरप्पा को आमंत्रित करने के साथ ही चिर-परिचित भाजपा-विरोधी माहौल बनता दिखाई देने लगा.

इस विरोध के बीच कई घटनाओं, स्थितियों पर ध्यान देने की आवश्यकता है. कर्नाटक विधानसभा चुनाव की घोषणा होने के पहले से ही बहुत से विश्लेषकों ने लगभग साबित कर दिया था कि वहां भाजपा को लाभ मिलने वाला नहीं है. असल में 2014 से लेकर अभी तक प्रत्येक छोटे-बड़े चुनाव में राजनैतिक विश्लेषकों द्वारा, चुनाव सर्वेक्षणों द्वारा मोदी छवि को ही आधार बनाया गया है. उनके इस तरह के विश्लेषण के पीछे पेट्रोल, डीजल की कीमतों की वृद्धि को, रुपये की कीमत में आती गिरावट को आधार बनाया जा रहा था. केंद्र सरकार को असफल दिखाने वाले विश्लेषकों ने रोजगार देने के मामले में भी केंद्र सरकार को पिछड़े पायदान पर दिखाया था. कोशिश ये रही कि कैसे न कैसे करके इन स्थितियों को कर्नाटक चुनाव से जोड़ते हुए ये साबित किया जाये कि वहां भाजपा की पराजय सुनिश्चित है.

ऐसे विश्लेषक जिनका विश्लेषण सिर्फ और सिर्फ पूर्वाग्रह पर आधारित रहता है वे किसी न किसी तरह भाजपा को कर्नाटक में हराते दिख रहे थे. इस तरह के विश्लेषणों के बाद कर्नाटक की सत्ताधारी कांग्रेस इसके लिए आश्वस्त हो गई थी कि कर्नाटक में वहां के मतदाता उसे ही चुनेंगे. कांग्रेस राज्य में अपनी पुनर्वापसी को लेकर पूर्णतः आश्वस्त हो गई थी. कर्नाटक में इन विश्लेषणों के उलट असलियत ये रही कि राज्य में विगत पांच वर्ष के शासन में ऐसी तमाम विसंगतियाँ उभर कर सामने आईं जिनसे जनता का मोह कांग्रेस से भंग हो गया था. मोदी छवि के सहारे भाजपा कर्नाटक में भले ही बहुमत का जादुई आँकड़ा न छू सकी हो किन्तु अपने पिछले प्रदर्शन से कहीं अधिक अच्छा प्रदर्शन कर सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर सामने आई है.

राज्यपाल ने सबसे बड़े दल के रूप में भाजपा को आमंत्रित किया. येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ भी ले ली. इसके बाद भी सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर 104 की संख्या को बढ़ाकर कैसे बहुमत के जादुई अंक तक ले जाया जायेगा? फ़िलहाल तो अभी सदन में बहुमत सिद्ध करने का कार्य बाकी है और जेडीएस की तरफ से भाजपा पर प्रति विधायक सौ करोड़ रुपये की पेशकश का आरोप भी लगाया जा चुका है. संवैधानिक विशेषज्ञों की राय के अनुसार कर्नाटक के राज्यपाल ने भले ही सबसे बड़े दल के रूप में भाजपा को बुलाकर संवैधानिक कदम ही उठाया है किन्तु कहीं न कहीं बहुमत के आँकड़े को छूने के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त का अवसर भी तो उपलब्ध करवाया है. ये कहकर कि पूर्व में कांग्रेस की ओर से भी इसी तरह की स्थितियाँ उत्पन्न करके सरकारें बनाई जाती रही हैं, विपक्षियों को रोका जाता रहा है कहीं से भी न्यायसंगत नहीं है. सदन में भाजपा, येदियुरप्पा क्या सिद्ध करते हैं, ये समय के गर्भ में है पर कुल मिलाकर उनकी अग्नि-परीक्षा शुरू हो चुकी है.  

17 अक्टूबर 2016

शरीयत की आड़ में संविधान का विरोध

समान नागरिक संहिता के संबंध में विधि आयोग ने एक प्रश्नावली तैयार की है. सोलह बिन्दुओं की इस प्रश्नावली के माध्यम से विवाह, सम्बन्ध विच्छेद, महिलाओं के संपत्ति पर अधिकार, अंतरजातीय, अंतरधार्मिक विवाह करने वाले दम्पत्तियों की सुरक्षा, विवाह पंजीकरण, धार्मिक स्वतंत्रता आदि बिन्दुओं पर भारतीय जनता से रायशुमारी करवाई जा रही है. किसी भी रूप में इस प्रश्नावली को अंतिम नहीं माना जा रहा है, इसके बाद भी विधि आयोग की इस पहल का तमाम मुस्लिम संगठनों ने विरोध करना शुरू कर दिया है. इसमें सबसे आगे मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड है. सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी के बाद केंद्र सरकार ने विधि आयोग से समान नागरिक संहिता लागू करने की समीक्षा करने को कहा है. ऐसा किसी धार्मिक तुष्टिकरण अथवा किसी राजनीति के अंतर्गत नहीं किया जा रहा वरन इसके पीछे गत वर्ष अक्टूबर माह में एक ईसाई युवक द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका है, जिसमें ईसाइयों के तलाक अधिनियम को चुनौती दी गई थी. सर्वोच्च न्यायालय ने इसका संज्ञान लेते हुए सरकार से अपना रुख स्पष्ट करने को कहा था. ईसाई युवक द्वारा दायर याचिका और सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पश्चात् केंद्र की पहल से मुसलमानों में प्रचलित तलाक सम्बन्धी और शादी सम्बन्धी प्रक्रिया का मुद्दा भी अदालत में आ गया. 


समान नागरिक संहिता का सर्वाधिक विरोध मुस्लिमों द्वारा किया जा रहा है. वे इसे अपने मजहबी कृत्यों में हस्तक्षेप बताते हैं. देखा जाये तो कहीं न कहीं इस संहिता से मुस्लिम महिलाओं को आज़ादी मिल सकेगी. शायद यदि मुस्लिम पुरुष नहीं चाहते हैं. जिस तीन तलाक का मामला आजकल चर्चा में है उसके पीछे की कहानी कुछ ऐसी है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत कोई पति दो मासिक धर्मों के बीच की अवधि, जिसे तुहर के नाम से जाना जाता है, के दौरान अथवा सहवास के दौरान तुहर में या फिर एक साथ तीन बार तलाक कहकर पत्नी से सम्बन्ध विच्छेद कर सकता है. तलाक के बाद जहाँ एक तरफ मुस्लिम पुरुष फौरन शादी कर सकता है वहीं मुस्लिम महिला को चार महीने दस दिन यानि इद्दत (एक प्रकार की निर्धारित अवधि) तक इंतजार करना होता है. इस दौरान यह भी देखा जाता है कि महिला गर्भवती तो नहीं है. यदि वह गर्भवती नहीं है तो इद्दत पीरियड के बाद वह दोबारा शादी कर सकती है. इसके उलट यदि वह मुस्लिम स्त्री गर्भवती पाई जाती है तो गर्भस्थ शिशु को जन्म देने के बाद ही दोबारा शादी कर सकती है. हिन्दू मैरिज ऐक्ट के अंतर्गत हिन्दू दम्पत्ति शादी के बारह महीने बाद आपसी सहमति से तलाक की अर्जी दाखिल कर सकते हैं. अगर पति को लाइलाज बीमारी हो, वह शारीरिक संबंध बनाने में अक्षम हो तो शादी के फौरन बाद भी तलाक की अर्जी दी जा सकती है. ईसाई समुदाय में शादी के दो साल बाद ही तलाक की अर्जी दाखिल की जा सकती है, उससे पहले नहीं. ईसाई दम्पत्ति को तलाक़ के पूर्व दो वर्ष की अवधि न्यायिक रूप से अलग रहकर गुज़ारनी होती है, जबकि हिन्दुओं तथा अन्य ग़ैर-ईसाइयों के लिए यह अवधि साल भर की ही है. स्पष्ट है कि हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ हैं. इसी विभिन्नता के चलते गत वर्ष एक ईसाई युवक द्वारा दायर याचिका के बाद समान नागरिक संहिता का मामला पुनः चर्चा में आया.

ये पहली बार नहीं है बल्कि वर्ष 2003 में भी सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 की धारा 118 को असंवैधानिक करार देते हुए संसद को समान नागरिक संहिता के निर्माण के सम्बन्ध में अपनी राय प्रेषित की थी. संविधान की प्रस्तावना और नीति निर्देशक सिद्धांतों के अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि सरकार सभी के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने की कोशिश करे. आज़ादी के तुरंत बाद नवम्बर 1948 में संविधान सभा की बैठक में समान नागरिक संहिता पर जमकर बहस हुई थी. तत्कालीन बहस में इस्लामिक चिन्तक मोहम्मद इस्माईल, जेड एच लारी, बिहार के मुस्लिम सदस्य हुसैन इमाम, नजीरुद्दीन अहमद सहित अनेक मुस्लिम नेताओं ने इस विषय पर भीमराव अम्बेडकर का विरोध किया था. तब डॉ० अम्बेडकर ने समान नागरिक संहिता का समर्थन करते हुए कहा था कि देश में एक आपराधिक विधि संहिता है, दंड विधान में एक विधि है, संपत्ति हस्तांतरण का एक विधान है. जबरदस्त विरोध के बीच हुए मतदान में डॉ० अम्बेडकर का प्रस्ताव विजयी हुआ. मुस्लिम सदस्य बुरी तरह पराजित हुए और संविधान के अनुच्छेद 44 में बहुमत की राय से समान नागरिक संहिता को लागू किये जाने सम्बन्धी विधान लाया गया. इसके बाद भी बँटवारे की त्रासदी झेल रहे मुसलमानों के प्रति सौहार्द्र भाव दर्शाते हुए समान नागरिक संहिता को लागू करने का विचार कुछ वर्षों के लिए टाल दिया गया. समय गुजरने के साथ-साथ मुस्लिम कट्टरता बढ़ती गई, मुस्लिम तुष्टिकरण बढ़ता गया और समान नागरिक संहिता की राह संकीर्ण होती गई. इसी विरोध और कट्टरता के चलते 1972 में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का जन्म हुआ. तबसे यह संस्था समान नागरिक संहिता का विरोध करते हुए शरीयत को संविधान और कानून से ऊपर बताती-मानती है. यही विरोध आज और भी तीव्रतम रूप में दिखता हुआ राजनैतिक रंग पकड़ने लगा है.

इसके विरोध में दिया जाता यह तर्क तो अत्यंत हास्यास्पद है कि समान नागरिक संहिता की बात भाजपा अथवा हिन्दुओं द्वारा महज इस कारण की जाती है क्योंकि वे मुसलमानों की चार शादी और तलाक देने की सुविधा को आबादी बढ़ाने वाला मानते हैं. यहाँ सवाल उठता है कि क्या ये प्रासंगिक है कि एक महिला को मात्र तीन बार तलाक बोलकर हमेशा के लिए बेघर कर दिया जाये, जैसा कि शाहबानो केस में हुआ? ये समझने का विषय है कि आज़ादी के तुरंत बाद तो भाजपा नहीं थी, तब हिंदुत्व साम्प्रदायिकता जैसी कोई अवधारणा भी नहीं थी तब उस समय क्यों इसका विरोध किया गया? एक देश, एक प्रधान, एक राष्ट्रपति, एक संविधान, एक ध्वज के बाद भी एक संहिता का विरोध क्यों किया गया? सभी नागरिकों के एक अधिकार हो जाने का विरोध क्यों? समझने वाली बात है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड स्वयं कुरान की बहुत सी बातों का पालन नहीं करता है. कुरान में बाल विवाह प्रतिबंधित है जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार ‘ख्याल-उल-बलूग’ अर्थात बाल विवाह का प्रावधान है. कुरान के अनुसार तलाक बिना अदालती हस्तक्षेप के संभव नहीं जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार मुस्लिम मर्द को अपनी मर्जी से तलाक लेने का अधिकार है. कुरान विधवा विवाह और पुनर्विवाह को मान्य करती है जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ऐसा प्रतिबंधित करता है. ऐसे एक-दो नहीं अनेक उदाहरण हैं जिनके आधार पर न ही शरीयत का सम्पूर्ण पालन होता दिखता है न ही कुरान और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में समन्वय दिखता है. ऐसे में ये लोग किस शरीयत की दुहाई देते हुए समान नागरिक संहिता का विरोध करने में लगे हैं?

आखिर कुछ कठमुल्लों की आवाज़ पर, चन्द गैरजिम्मेवार राजनैतिक दलों के विरोध के चलते कब तक देश के अपरिहार्य विधान को लागू होने से रोका जाता रहेगा? समान नागरिक संहिता किसी एक समुदाय विशेष के विवाह अथवा तलाक की बात नहीं करती वरन एक महिला को भी नागरिक के रूप में अधिकार प्रदान किये जाने की बात करती है. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आवश्यकता इसकी है कि सभी लोग हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई आदि धार्मिक मानसिकता से ऊपर उठकर विशुद्ध भारतीय नागरिक की मानसिकता से विचार करें. देश के, नागरिकों के विकास के लिए एक ऐसी संहिता का निर्माण करने में योगदान दें जो सभी समुदायों पर समान रूप से लागू हो, सभी को भारतीयता की पहचान कराती हो.