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09 जनवरी 2021

कर लीजिये प्रेम-उपवन की सैर हमारे साथ - दो हजारवीं पोस्ट

यह इस ब्लॉग की दो हजारवीं पोस्ट है. मई 2008 में ब्लॉग बनाने के बाद से लगातार लिखना हो रहा है. कभी रोज लिखा गया, एक दिन में दो-तीन पोस्ट लिखी गईं तो कभी दो-तीन दिन का अन्तराल होता रहा मगर ब्लॉग पर लिखना बंद नहीं हुआ. पिछले दो-तीन दिनों से इस दो हजारवीं पोस्ट के विषय के बारे में विचार चल रहा था. कुछ अलग सा लिखना चाह रहे थे मगर समझ नहीं पा रहे थे कि क्या लिखा जाए. इस बारे में मित्रों से भी चर्चा हुई, सोशल मीडिया पर भी शुभेच्छुओं के बीच बात रखी. बहुत से सुझाव मिले और आश्चर्य की बात देखिए कि बहुतायत में लोगों ने प्रेम सम्बन्धी विषय पर लिखने की राय दी.


वैसे हमने सोचा तो ये था कि इस पोस्ट में अपनी जीवन-यात्रा को संक्षिप्त रूप में लिखा जाये मगर इस बारे में खुद में ही निश्चितता नहीं बन पा रही थी. जैसे-जैसे मित्रों के सुझाव मिलते रहे वैसे-वैसे लगा कि प्रेम ही एक ऐसा विषय है जो कभी भी पुराना नहीं होता, कभी भी किसी को बोर नहीं करता, तो इसी पर लिखा जाये. वैसे भी हम सभी की आदत होती है दूसरों की प्रेमकथा के बारे में जानने की, दूसरों की प्रेम-कहानियाँ सुनने-सुनाने की, प्रेमी-प्रेमिकाओं के बारे में चर्चा करने की. इस बारे में हमने आत्मकथा कुछ सच्ची कुछ झूठी में लिखा भी है. आज की इस दो हजारवीं पोस्ट के विषय से सम्बंधित मित्रों की राय के बाद प्रेम सम्बन्धी विषय पर लिखने का मन बना लिया. इसमें भी आधार हमने खुद को बनाया है. ऐसा करने के पीछे कारण हमारी कुछ सच्ची कुछ झूठी ही है. बहुत से मित्र, पाठक उसमें हमारी प्रेम-कहानी न पाकर उदास हो गए थे.  उन्होंने इस पर अपना दुःख व्यक्त किया था, हमसे अपनी नाराजी प्रकट की थी, इस दो हजारवीं पोस्ट में अपनी ही प्रेमकथा लिख देने या कहें कि उसका आरम्भ कर देने से उन सभी मित्रों, पाठकों की नाराजगी भी दूर होगी और हमें भी किसी न किसी रूप में कुछ सच्ची कुछ झूठी में रह गई कमी को कुछ हद तक पूरा करने का अवसर मिलेगा.



चलिए फिर, आपको सैर करवाते हैं अपनी प्रेम-कहानियों के उपवन में. आश्चर्य न करिए. प्रकृति ने, इंसान की रचना करने वाले सृष्टि निर्माता ने हमारी प्रकृति ही ऐसी बनाई कि मन-दिल हमेशा युवा बना रहा, उसमें प्रेम की लहरें हमेशा उमड़ती-घुमड़ती रहीं. ईश्वर की इस कृति की प्रेमपरक प्रकृति को माता-पिता द्वारा दिए गए नाम ने भी चिरयुवा बनाये रखा. कुमारेन्द्र का सामान्य सा अर्थ भी इसी सन्दर्भ में लगाया जा सकता है. 


हमारे इस प्रेम-उपवन में सैर करते समय प्रेम की ये बगिया आप सभी को हमारी नजर से देखनी होगी. ऐसा इसलिए क्योंकि प्रेम इतना व्यापक फलक वाला गुलशन है जिसे प्रत्येक व्यक्ति अपनी निगाह से देखता है. व्यापक परिदृश्य को अनेकानेक निगाहों से देखने के कारण प्रेम के सन्दर्भ बदल सकते हैं, उसके मानक परिवर्तित हो सकते हैं. ऐसे में हमारे प्रेम-उपवन के भी अनेकानेक निहितार्थ निकाले जा सकते हैं, अनेकानेक सन्दर्भ स्थापित किये जा सकते हैं. ऐसा होने से आप हमारी प्रेम-कहानियों की उस भावबोध को महसूस नहीं कर सकेंगे जिस भावभूमि पर खड़े होकर हमने अपने प्रेम को जिया है, उसको ज़िन्दगी भर के लिए अंतस की गहराइयों में आत्मसात किया है.


आप सभी लोग प्रेम शब्द की पावनता से खुद को जोड़कर धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहिए. प्रेम की भावनाओं के नामकरण से बचिए क्योंकि प्रेम बहुत संवेदनशील विषय होता है और यहाँ किसी भी तरह का नामकरण करने पर वह अति-संवेदनशील की श्रेणी में शामिल हो जाता है. इसके बाद स्थिति तनावपूर्ण किन्तु नियंत्रण में है के परम वाक्य से बाहर की हो जाती है.


इसे पढ़कर शायद उन सभी लोगों को बुरा लगे जो प्रेम को अत्यंत संकुचित रूप में देखते-समझते हैं. ऐसे लोगों के लिए प्रेम का मतलब सिर्फ और सिर्फ एक से प्रेम करने से होता है. ऐसा लगता है जैसे प्रेम कोई कोटा सिस्टम हो, एक व्यक्ति से प्रेम हो गया, उसके बाद कोटा ख़तम. प्रेम दिल की पवित्र भावना है जो पल-पल पल्लवित, पुष्पित होती है, सुरभित होती है. हमें तो आज तक प्रेम होता है. आज भी प्रेम होता है. बचपन में भी हुआ, किशोरावस्था में भी हुआ, युवावस्था में भी हुआ. क्या आपको नहीं हुआ? क्या आपको आज प्रेम नहीं होता?


खैर जाने दीजिये, आइये प्रेम-उपवन के उस हिस्से में चलते हैं जो हमारे बचपन से जुड़ा हुआ है. उम्र का वो पड़ाव जब प्रेम के सन्दर्भ, प्रसंग भी ज्ञात नहीं थे मगर उससे प्यार हुआ था. तमाम सारे दोस्तों के बीच वही एक लड़की सबसे ख़ास लगती. उसका ख़ास लगना ही प्रेम है, यह तो तब पता चला जबकि प्रेम का एहसास कर पाने की समझ विकसित हुई. आज जब पीछे पलट कर उस प्रेम की अनुभूति करते हैं तो आज भी वह वैसा ही मासूम दिखाई देता है, तितलियों सा रंगीन, पंछियों सा चंचल. उन दिनों में अख़बारों, पत्रिकाओं से काटे गए चित्रों के आदान-प्रदान करने की स्मृतियाँ आज भी दिल को गुदगुदा देती हैं. बचपन का दौर जिस तरह से मासूमियत के साथ कभी लौटकर न आने को विदा हो जाता है, वह ख़ास लगने वाली शख्सियत भी कभी न मिलने को दूर हो गई. बचपन की वो मासूम कहानी बिना कुछ कहे चलती रही थी, बिना कुछ कहे ही समाप्त हो गई.




समय भागता रहता है, उम्र बढ़ती रहती है, ज़िन्दगी के अनुभव परिपक्वता बढ़ाते रहते हैं. जीवन वास्तविकता के धरातल पर आ चुका था. प्रेम-कहानी को या कहानियों को रचने, गढ़ने से ज्यादा ध्यान खुद को गढ़ने पर, कैरियर बनाने पर दिया जाने का भाव आ गया था. यह भाव हम तो समझ रहे थे मगर दिल नहीं समझ रहा था. वह तो बस प्रेम करते रहना चाह रहा था, सो दिल ने प्रेम किया. पूरी गरिमा के साथ, पूरी पावनता के साथ, पूरी ईमानदारी के साथ किया.


इस अवधि में कहने-बताने लायक बहुत कुछ है. उन दिनों बहुत कुछ घटित हुआ, अच्छा भी, बुरा भी. हँसी भी साथ रही तो आँसुओं ने भी साथ न छोड़ा. बहुत कुछ ऐसा रहा जो साथ-साथ चलता रहा, साथी जैसा लगा इसके बाद भी किसी को अपना न कह सके. दिल, दिमाग, मन आदि सब किसी न किसी द्वंद्व में फँसे समझ आते. आगे बढ़ते कदम बढ़ते-बढ़ते रुक जाते. हाथों को थामने की कोशिश में खुद अपनी ही हथेलियों को बाँध लिया जाता. जो अपना न था, वो अपना न बना. बात जहाँ थी, वहाँ से आगे का सफ़र पूरा करते हुए वापस उसी जगह आकर रुक गई, जहाँ से शुरू हुई थी.  


भावनाओं के धरातल पर खड़े होकर अपने प्रेम का एहसास करते हैं तो सफल-असफल की संकुचित सोच से बहुत आगे का महसूस करते हैं. प्रेम को उथलेपन से ऊपर उठकर महसूस करने का भाव जागृत करके ही प्रेम को चिरस्थायी बनाया जा सकता है. यह कोई ओस की बूँद नहीं जो पल भर बाद मिट जाये. इस भाव को समझने के बाद ही प्रेम का वास्तविक अनुभव प्राप्त किया जा सकता है. इस भाव ने उन दिनों के प्रेम की छवि को धूमिल न होने दिया, उस प्रेम को तन्हा न होने दिया.


उम्र के इस दौर में जबकि जीवन का अर्धशतक अगले किसी मोड़ पर आपका इंतजार कर रहा हो तब प्रेम गंभीरता के भावबोध से भरा होता है. उसमें लड़कपन जैसी उड़ान नहीं होती, लहरों की तरह उछलना-कूदना नहीं होता वरन धीर-गंभीर रूप में वह पावनता का स्वरूप निर्मित करता है. आज इस पड़ाव पर यह कहना कि हमें किसी से प्रेम नहीं है या किसी से प्रेम नहीं होता और किसी से नहीं बल्कि खुद से झूठ बोलना होगा. ऐसा हर वो व्यक्ति कर रहा है जो ऐसे दौर से गुजरता है. उम्र के किसी भी पड़ाव पर प्रेम समाप्त नहीं होता. यदि ऐसा किसी के भी साथ होता है तो वह पाषण हृदय व्यक्ति ही होगा.


फिलहाल, आप लोग प्रेम-उपवन की इतनी सी संक्षिप्त सैर से संतुष्टि प्राप्त करिए क्योंकि विस्तार से सैर करवाने पर वह मात्र एक पोस्ट में समाहित न होने वाली. जैसा कि कुछ सच्ची कुछ झूठी में कहा था, यहाँ भी कह रहे हैं कि अपने प्रेम पर विस्तार से लिखा जायेगा, बहुत कुछ लिखा जायेगा, जो एहसास आज तक दिल के किसी कोने में कैद हैं उन सबको खुले आकाश में उन्मुक्त उड़ान के लिए स्वतंत्र किया जायेगा.


प्रेम की चर्चा होने पर हमारे मित्र विमल किसी विद्वान के वक्तव्य का जिक्र करना कभी नहीं भूलते कि प्रेम अग्नि के समान है उसका सदुपयोग हो तो वह पावक अग्नि के समान शुद्ध करता है, नहीं तो वह सामान्य अग्नि के समान जलाता है.


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वंदेमातरम्

22 अक्टूबर 2020

समोसे के स्वाद के लिए होती शैतानियाँ

शैतानियाँ, शरारतें कहीं से भी सीखनी नहीं पड़ती हैं. कोई सिखाता भी नहीं है. यह तो बालपन की स्वाभाविक प्रकृति होती है जो किसी भी बच्चे की नैसर्गिक सक्रियता के बीच उभरती रहती है. स्कूल में हम कुछ मित्रों की बड़ी पक्की, जिसे दांतकाटी रोटी कह सकते हैं, दोस्ती थी. कक्षा में एकसाथ बैठना. भोजनावकाश के समय एकसाथ बैठकर भोजन करना. आपस में मिल-बाँटकर भोजन करना. इस मंडली में एक मित्र मनोज के पिताजी घरेलू सामानों की एक दुकान थी. लगभग रोज शाम को मनोज का दुकान पर जाना होता था. जैसा कि बालसुलभ स्थितियों में होता है, उसके पिता लाड़-प्यार में यह कहते हुए कि शाम को दुकान के मालिक तुम हो, कुछ पैसे उसे दे दिया करते थे. हम मित्र भी दस-पाँच पैसे लेकर आया करते थे. आज की पीढ़ी को ये आश्चर्य लगेगा जिसको हजारों रुपये में जेबखर्च मिलता हो कि उस समय हम लोगों को पांच-दस पैसे कभी-कभी मिलते थे. ये आज आश्चर्य भले हो मगर उस समय किसी अमीर से कम स्थिति नहीं होती थी हम दोस्तों की. ऐसा रोज तो नहीं होता था पर जिस दिन ऐसा संयोग बनता था कि ठीक-ठाक मुद्रा जेब में आ गई तो सुबह की प्रार्थना के समय ही योजना बनाकर कक्षा में सबसे पीछे बैठा जाता था.

 

कक्षा में पीछे बैठने के अपने ही विशेष कारण हुआ करते थे. असल में स्कूल परिसर में या उसके आसपास किसी बाहरी व्यक्ति को किसी तरह का खाने-पीने का सामान बेचे जाने की अनुमति नहीं थी. स्कूल समय में किसी बच्चे को बाहर जाने की अनुमति नहीं थी ताकि स्कूल का कोई विद्यार्थी बाहर का कोई सामान न खा लें. इसको सख्ती से पालन करवाने के लिए भोजनावकाश के समय किसी न किसी शिक्षक की मुस्तैदी स्कूल के मुख्य गेट पर दिखाई देने लगती थी. ऐसे में हम दोस्त अपने खुरापाती दिमाग की मदद से कक्षा के पीछे वाले दरवाजे का उपयोग भागने के लिए किया करते थे. यह खुराफात भी स्कूल चलने के समय हुआ करती थी. उस समय कक्षाएँ चलने के कारण मुख्य गेट पर शिक्षकों की चौकस निगाहों में कुछ न कुछ ढील सी बनी रहती थी. इसके पीछे उनकी सोच ये हुआ करती थी कि बच्चे कक्षाएँ चलने के दौरान बाहर नहीं निकलेंगे और हम लोग किसी दिन इसी ढील का लाभ उठा लिया करते थे.

 

स्कूल के एकदम पास में एक छोटा सा होटल हुआ करता था, जिसे सभी अन्नू का होटल के नाम से जानते थे. उसके समोसे बहुत ही स्वादिष्ट होते थे. चूँकि भोजनावकाश में अध्यापकों की मुस्तैदी के कारण उन समोसों का स्वाद लिया जा संभव नहीं हो सकता था. ऐसे में कक्षा में सबसे पीछे बैठना समोसों तक पहुँच बनाने में सहायक हो जाता था. हम दोस्त आपस में पैसे इकट्ठे करके एक दोस्त को जिम्मेवारी देते समोसे लाने की. ज्यादातर इसके लिए रॉबिन्स को ही चुना जाता. वह कभी पानी पीने की, कभी बाथरूम जाने की अनुमति लेकर अन्नू के होटल तक अपनी पहुँच बनाता. और कभी-कभी बिना अनुमति के कक्षा के पीछे वाले दरवाजे का उपयोग किया जाता था. स्कूल का मुख्य द्वार लोहे की अनेक रॉड से मिलकर बना हुआ था, जिसमें से थोड़े से प्रयास के बाद हम बच्चे लोग आसानी से निकल जाया करते थे.

 

अन्नू के होटल तक झटपट जाने और फटाफट वापस आने की कला में माहिर रॉबिन्स अपनी नेकर की दोनों जेबों में कुछ समोसे भर कर कक्षा में दिखाई देने लगता. कक्षा में सबसे पीछे बैठी पूरी मित्र-मंडली अगले ही पल स्वादिष्ट समोसों का स्वाद ले रही होती थी. कक्षा में सबसे पीछे बैठने का मूल कारण स्कूल के मुख्य द्वार पर नजर रखना और फिर अपनी रणनीति में कामयाब होने के तत्काल बाद कक्षा में ही समोसे का स्वाद लेना रहता था. आज जब कभी रॉबिन्स के मिलने पर स्कूल की घटनाएँ, स्कूल के दोस्तों की चर्चा होती है तो वह बिना कहे नहीं चूकता है कि तुम लोगों ने हमें खूब दौड़ाया, हमारी जेबों में खूब तेल लगवाया. रॉबिन्स को इस कारण भी ये घटना और भी अच्छे से याद है क्योंकि आये दिन घर में उसकी इसी बात पर कुटाई हो जाया करती थी कि नेकर की जेबें तेल से गन्दी कैसे हो जाती हैं.


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25 मई 2020

प्रेम कहानियों पर इतना कौतूहल क्यों

लोगों की रुचि दूसरों की ज़िन्दगी में झाँकने की क्यों होती है? दूसरे की ज़िन्दगी में सुख है या दुःख इससे झाँकने वालों का कोई लेना-देना नहीं होता है, बस वे उसमें झाँकना चाहते हैं. इस ताका-झाँकी में यदि विषय प्रेम का, इश्क का हो तो फिर कहना ही क्या. इस विषय के आगे सभी विषयों को गौड़ कर दिया जाता है. किसी दूसरे के जीवन का कोई प्रेम-प्रसंग हाथ लग भर जाए फिर उसके आगे सारे प्रसंग बौने हो जाते हैं. किसी और के प्रेम-प्रसंगों के लिए, दूसरे की प्रेम-कहानियों को सुनने के लिए लोगों में बेताबी दिखाई देने लगती है. ऐसा किस मानसिकता के कारण होता है? ऐसा किस प्रवृत्ति के चलते लोग करते हैं? कई बार इस विषय पर अपने मित्रों से बातचीत करने की कोशिश की मगर कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया.


अपने जीवन की कुछ घटनाओं को कुछ सच्ची कुछ झूठी के द्वारा सबके बीच लाने का एक प्रयास विगत वर्ष किया था. उसके लेखन का जब आरम्भ किया था तब बहुत से दोस्तों, परिचितों के कई सवालों का सामना करना पड़ा था जो प्रेम-कहानियों से संदर्भित थे. इसके पहले भी बहुत बार लोगों के सवालों, निगाहों का शिकार हुए ऐसे सवालों को लेकर. कई बार हमारे कहीं आने-जाने को लेकर, किसी से दोस्ती को लेकर, किसी से बातचीत को लेकर ऐसे सवालों से सामना करना पड़ा. ऐसे प्रसंगों पर कई बार बात बदलने की कोशिश भी की मगर दूसरी तरफ से घूम-फिर कर बात को प्रेम-प्रसंगों पर लाकर टिका दिया जाता. ऐसा लगता जैसे उस समय किसी भी अन्य विषय से अधिक महत्त्वपूर्ण विषय लोगों के लिए हमारी प्रेम-कहानी को जानना रहता है. आजतक यह हमारी समझ से बाहर है कि ऐसा आखिर क्यों होता है? क्या उसके पीछे अगले के मन में, अचेतन में छिपी प्रेम करने की भावना रहती है? क्या उसके मन में उसके प्रेम की स्थिति इस बहाने संतुष्टि का एहसास करती है? क्या इसी तरह से वह अपने प्रेम सम्बन्धी समय को पुनः जीना चाहता है?


अब एकबार फिर इसी तरह के सवालों से सामना करना पड़ रहा है. अपनी कुछ सच्छी कुछ झूठी के प्रकाशन पश्चात् एक नई पुस्तक के लेखन में जुट गए थे. पुस्तक प्रेम कहानियों को लेकर है. इसमें कहानियों को शामिल किया गया है. ज्यादातर कहानियाँ हमसे जुड़ी हुई हैं और सत्य हैं. हाँ, इसमें कल्पना का कुछ तड़का लगाते हुए इनको पठनीय बनाने का प्रयास किया है. इसके साथ-साथ प्रयास किया है कि दूसरे व्यक्ति की छवि, उसकी सामाजिकता, पारिवारिकता पर किसी तरह का प्रभाव न पड़े, न सकारात्मक और न ही नकारात्मक. इनमें से कुछ कहानियों को ब्लॉग पर प्रकाशित भी किया जा रहा है. इसके साथ-साथ उनको सोशल मीडिया पर भी शेयर किया जा रहा है. ऐसा किये जाने से इन कहानियों की पहुँच अधिकाधिक लोगों तक हो रही है. इसके चलते बहुत से परिचित लोगों के सवालों की बौछार होने लगी है. अभी तो बस इतना ही कहना है कि इनको बस कहानियाँ मानकर पढ़िए और यदि लगता है कि ये सच हैं तो उनको अपने दिल में बसाये रखिये.

प्रेम ही ऐसा विषय है जो कभी पुराना नहीं होता. कभी बासी नहीं होता. कभी विध्वंसक नहीं होता. प्रेम ही ऐसा विषय है जो व्यक्ति को व्यक्ति होना सिखाता है. इन्सान को इंसानियत सिखाता है. दुनिया को एक अलग दुनिया में ले जाता है. यदि अनुभव करना हो तो पहले-दूसरे प्रेम की बंधी-बँधाई सीमारेखा से बाहर निकल कर देखो. प्रेम की तरह उन्मुक्त हो उड़ कर देखो. निश्चित ही एक नई दुनिया का, सतरंगी दुनिया का अपने आसपास एहसास करोगे.

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08 मई 2020

भावनात्मक रूप से ख़ुशी के साथ निराशा भी हाथ आई

भावनात्मकता के कम, ज्यादा करने का कोई बटन होना चाहिए इस शरीर में. ये पोस्ट विशुद्ध रूप से हमसे ही सम्बद्ध है और वो भी हमारी संवेदना, हमारी भावना के कारण. जैसा कि आपमें से बहुत से लोगों को जानकारी होगी, हमारी पुस्तक कुछ सच्ची कुछ झूठी के प्रकाशित होने की. हमने वर्षों पहले एक सपना देखा था, आत्मकथा लिखने का. उसे साकार करने के बारे में पहले सोचा जब हम तीस साल के हुए फिर लगा कि नहीं, अभी जल्दी हो जायेगा, ऐसा कदम उठाना. इसके बाद चालीस वर्ष की उम्र में अपने ऊपर नियंत्रण नहीं कर सके और लिखने बैठ ही गए. लिखे और फिर उसे प्रकाशित करने का भी प्रयास किया. चूँकि यह हमारा ड्रीम प्रोजेक्ट था, ऐसे में इसे किसी भी कीमत पर छपवाना भी था. सो कीमत अदा करने के साथ छपवाया भी.


इस पुस्तक के द्वारा किसी भी तरह की प्रसिद्धि का, किसी भी तरह के व्यापार का, किसी भी तरह की प्रतिष्ठा का लोभ दिल-दिमाग में नहीं था, आज भी नहीं है. ऐसा इसलिए हो सका क्योंकि ये विशुद्ध हमारी ही कहानी है. अपने लोगों के पास तक हम अपने इस रूप में पहुँचना चाहते थे. बहुत से अपने लोगों तक हम पहुँचे भी. बहुत से लोगों को नाराजगी भी रही कि उनके पास तक हमारा ये रूप स्वयं हमारे द्वारा नहीं पहुँचाया गया. इसकी हमारी कुछ सीमायें थीं. प्रकाशन सम्बन्धी सीमाओं की समाप्ति के बाद इस पर आगे विचार किया जायेगा. उक्त कई बिन्दुओं की लालसा, तृष्णा न होने के बाद भी एक अभिलाषा रही कि अपने लोग हमें बताएँ कि हम उन्हें अपने इस रूप में कितने अपने से लगे. इस लालसा को, लालच को कोई कुछ भी कह सकता है, यह उसका अधिकार, उसकी स्वतंत्रता है.



कुछ सच्ची कुछ झूठी के प्रकाशन ने एक तरफ ख़ुशी प्रदान की तो दूसरी तरफ निराशा भी. आखिर हमारे अपने उन लोगों से भी इसके बारे में दो शब्द भी नहीं निकले जिनसे अपेक्षा थी. आज भी है मगर अब शायद अपेक्षा का पौधा उतना हरा, महकता हुआ नहीं है जो इसके प्रकाशन के समय था. बहरहाल, सबकी अपनी-अपनी व्यस्तताएँ, अपनी-अपनी वरीयताएँ हैं. आज यह बात अपने एक मित्र से कुछ सच्ची कुछ झूठी की चर्चा के बाद उठी तो सोचा इसे व्यक्त ही कर दें. पीड़ा दिल-दिमाग में रखनी नहीं चाहिए. हम रखते भी नहीं.

सभी के आभार सहित क्षमा, यदि किसी को अन्यथा लगे.

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23 अप्रैल 2020

लोकल फोन से करते रहे एसटीडी कॉल

आज के बच्चे पैदा होते ही फोन, मोबाइल का इस्तेमाल करना शुरू कर देते हैं. हमें अच्छी तरह याद है कि उस समय हम कक्षा आठ में पढ़ा करते थे. हमारे मन्ना चाचा तब कानपुर में भारतीय स्टेट बैंक में सेवारत थे. एक बार घर आने पर उन्होंने अपने बैंक का फोन नम्बर पिताजी को यह कहते हुए दिया कि यह फोन हमारी टेबिल पर ही है अब सीधे बात हो जाया करेगी. हमने और हमारे छोटे भाई ने भी चाचा से उनका फोन नम्बर ले लिया.


हमने कक्षा छह से इंटरमीडिएट तक की शिक्षा राजकीय इंटर कालेज से प्राप्त की है. इसके पास ही जिला चिकित्सालय है, जहाँ हमारी मामी श्रीमती पुष्पा राजे उन दिनों नौकरी किया करतीं थीं. मामा-मामी चिकित्सालय के कैम्पस में ही रहा करते थे. हम अपने दोस्तों सहित लगभग रोज ही मामा-मामी के घर जाया करते थे. इसी आवागमन के दौरान हमने एक दिन देखा कि चिकित्सालय में इंमरजेंसी वार्ड में एक फोन लगाया जा रहा है. हम लोगों के लिए बड़ी ही आश्चर्य की चीज थी वह फोन. अब मौका लगते ही हम लोग फोन को छूकर देख आते थे. अभी तक तो फोन अपने प्रधानाचार्य के कमरे में ही लगा देखा था या फिर मामी के आफिस में पर यहाँ कभी छूने को तो मिला नहीं था.

एक दिन मन में आया कि चाचा से बात की जाये. मामा डॉ० जुगराज सिंह क्षत्रिय, जिन्हें हम बच्चे आज तक डॉक्टर मामा के नाम से बुलाते हैं, से पूछा कि जो फोन यहाँ लगा है उससे बात कैसे होती है? मामा ने बताया कि उसमें नम्बर लिखे हैं, जिस फोन नम्बर पर बात करनी हो उनको घुमाओ और जब एक ट्रिन-ट्रिन जैसी आवाज सुनाई दे तो उसमें एक रुपये का सिक्का डाल दो. उन्होंने हमसे पूछा कि कहाँ बात करनी है तो हमने कहा बस ऐसे ही जानकारी कर रहे थे.


अब समझ में आ गया था कि फोन कैसे करना है. वहाँ जाकर एक-दो नम्बर को घुमा कर ट्रिन-ट्रिन की आवाज भी सुन आये थे और अपनी छोटी सी जेबखर्च की राशि में से एक रुपया गँवा कर आवाज भी सुन आये थे. लगा कि अब चाचा से बात करनी आसान हो जायेगी. एक रुपये में जब चाहो चाचा से बात कर लो. खुशी तो बहुत थी पर ये मालूम नहीं था कि ये पब्लिक टेलीफोन है जो मात्र लोकल ही काम करेगा.

एक दिन चुपचाप फोन के पास पहुँचे, एक हथेली में चाचा की बैंक का नम्बर और दूसरी में एक का सिक्का दबाये. नम्बर घुमाये और इन्तजार कि अब ट्रिन-ट्रिन की आवाज सुनाई दे, नहीं सुनाई दी. एक बार, दो बार, तीन बार.... फिर न जाने कितनी बार नम्बर घुमाया पर आवाज सुनाई नहीं दी. पहले लगा कि शायद फोन खराब है. तभी एक आदमी ने आकर बात की तो लगा कि हम लोग ही गड़बड़ कर रहे हैं. अब हताश, हारे हुए खिलाड़ी की तरह से वापस लौटे. दुख था चाचा से बात न हो पाने का फिर लगा कि कहीं गलत नम्बर तो नहीं लिख लिया? दिमाग दौड़ाते हुए घर आये, नम्बर देखा, एकदम सही.
घर में पिताजी से पूछने की हिम्मत नहीं हुई. अगले दिन कालेज से मामा के पास गये और अपनी समस्या बताई. मामा ने समझाया कि इस फोन से बस लोकल ही बात हो सकती है, एस०टी०डी० नहीं. तब अपनी मूर्खता पर बहुत हँसी आई जो गाहेबगाहे आज भी फोन करने की बात सोच-सोच का आ ही जाती है. नादानी भले ही रही हो पर फोन करने का एहसास, फोन छूने का एहसास आज भी है.  

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03 जनवरी 2020

ज़िन्दगी जिन्दाबाद - अपनी कहानी का एक और घोष

अपनी उम्र के चार दशक गुजारने के बाद आत्मकथा लिखना हुआ. इसमें अपने जीवन के चालीस वर्षों की वह कहानी प्रस्तुत की गई जिसे हमने अपनी दृष्टि से देखा और महसूस किया. कुछ सच्ची कुछ झूठी के रूप में आत्मकथा कम अपनी जीवन-दृष्टि ही सामने आई. व्यावसायिक रूप से, प्रकाशन की आर्थिक दृष्टि के रूप से यह कहाँ ठहरती है, कह नहीं सकते मगर हमारे तमाम चाहने वालों ने इसे हाथों-हाथ लिया है. जैसा कि इस पुस्तक में उल्लेख भी किया है, वही यहाँ भी करना अपेक्षित महसूस होता है कि तीस साल गुजारने के बाद अचानक ही लगा था कि अपनी कहानी लोगों के सामने लाना चाहिए. उस सोच के साथ खुद से ही एक प्रश्न किया कि आखिर लोग क्यों हमारे जीवन को समझना-जानना-पढ़ना चाहेंगे? इसी प्रश्न के बाद एक दशक और गुजार दिए. चालीस वर्ष की उम्र होने के बाद इस प्रश्न का उत्तर खुद ही दिया कि अपनी कहानी लोगों को आदर्श के लिए नहीं, लोगों को प्रवचन देने के लिए नहीं, लोगों के कुछ बताने के लिए नहीं वरन हमने अपने इन चालीस वर्षों को किस तरह से देखा है, उस रूप में पेश करने का माध्यम मात्र है.



जब अपने आपको ही प्रश्न का उत्तर मिल गया तो लगा कि अब कुछ सच्ची कुछ झूठी लिखा जाना ही चाहिए. लिखने के दौरान खुद से ही लड़ना-जूझना होता रहा. क्या लिखना है, क्या छोड़ना है समझ न आता. एक घटना को लिखते तो उससे सम्बंधित दूसरी घटना याद आ जाती. बहरहाल, अपने आपसे लड़ते-जूझते कुछ सच्ची कुछ झूठी का प्रकाशन हुआ. परिजनों का, गुरुजनों का आशीर्वाद-प्यार मिला. दोस्तों का, सहयोगियों का स्नेह मिला. पाठकों का आशीर्वाद मिला. बहुत सारी प्रतिक्रियाओं का आना हुआ. ज्यादातर प्रतिक्रियाओं में प्रोत्साहन ही दिया गया. इसे अपने आपमें हिम्मत का काम बताया गया कि महज चालीस वर्ष में आत्मकथा लिखने का जोखिम उठा लिया. इसी क्रम में हमारे गुरुजी डॉ० दुर्गा प्रसाद श्रीवास्तव जी का फोन भी आया. उनका आशीर्वाद हमारे शोध-कार्य से लेकर आज तक बना हुआ है. उनके द्वारा भी पुस्तक को पढ़ा गया. इसी क्रम में उन्होंने आशीर्वाद देते हुए अपेक्षा व्यक्त की कि इसके आगे की कहानी का उनको इंतजार है. उन्होंने हमारी ट्रेन दुर्घटना और उसके बाद की हमारी दिनचर्या, क्रियाकलाप, कार्यों आदि को लेकर एक और पुस्तक का स्नेहिल निर्देश जैसा दिया. 

ये भी हमारे जीवन में लिखा था. वर्ष 2005 तमाम सारी दिक्कतों, दुखों के साथ हमारे लिए शारीरिक कष्ट लेकर आया था. एक ट्रेन दुर्घटना में अपना बायाँ पैर गँवा दिया था तथा दाहिना पैर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था. दुर्घटना के बाद से आज तक के डेढ़ दशक बाद भी दाहिने पैर में दर्द को एक सेकेण्ड को भी राहत नहीं है. अपनी दुर्घटना के बाद के चार-पाँच वर्ष के दौरान जिस तरह का व्यवहार समाज से, अपनों से, गैरों से देखने को मिला उसने मन में उसकी अभिव्यक्ति का रास्ता बना दिया था. सोचते थे कि अपनी कहानी लिखने के पहले दुर्घटना के बारे में, उसके बाद जिस तरह का वातावरण अपने आसपास देखा, उसे लिखा जाये. ऐसी सोच के साथ लगता था कि आखिर समाज हमारे दर्द को क्यों पढ़ना चाहेगा? उसे आखिर हमारे दर्द से क्या मिलेगा? अब जबकि हमारी दुर्घटना को डेढ़ दशक होने को आये हैं, उसके बाद तमाम सारे काम ज्यों के त्यों चल रहे हैं तब लग रहा है कि अपने जीवन को उन लोगों के लिए अवश्य एक प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए जो अपने जीवन से निराश हैं. इसमें भी हमारे शुभेच्छुजनों का स्नेह शामिल है.


नया वर्ष 2020 आरम्भ हो चुका है. कुछ सच्ची कुछ झूठी हमारा ड्रीम प्रोजेक्ट था, जो विगत वर्ष आप सबके सामने आया. अब इस वर्ष अपनी दुर्घटना के बाद के एक दशक को, उस दौर में बीती अच्छी-बुरी घटनाओं को, अपने गिरने-उठने को, लोगों के पास आने-दूर जाने की घटनाओं को प्रस्तुत किये जाने का विचार है. इसमें भी कोशिश यही रहेगी कि अपने दुःख का, अपनी समस्या का रोना न रोया जाये बल्कि कुछ दुखी लोगों को हंसाने की कोशिश की जाये. आखिर ज़िन्दगी हँसने के लिए ही है. ज़िन्दगी जिन्दाबाद के रूप में जल्द ही हमारी ज़िन्दगी का एक और पक्ष आपके सामने होगा. संभव है कि पुस्तकाकार रूप में आने के पहले आपके सामने उसका नेट संस्करण उपस्थित रहे. शेष तो समय के गर्भ में है, हाँ, ये निश्चित है कि इस वर्ष के अंत तक ज़िन्दगी जिन्दाबाद का घोष आप भी हमारे साथ कर रहे होंगे.

17 नवंबर 2019

यादों के सहारे बीते दिनों की सैर


बीते दिनों से छुटकारा पाना आसान नहीं होता है. उन दिनों की बातें, उनकी यादें किसी न किसी रूप में सामने आ ही जाती हैं. ये यादें कभी हँसाती हैं तो कभी रुलाती हैं. दिल-दिमाग खूब कोशिश करें कि पुरानी बातों को याद न किया जाये मगर कोई न कोई घटना ऐसी हो ही जाती है कि इन यादों से छुटकारा मिलना मुश्किल दिखाई देता है. जब अपनी विगत चालीस वर्ष की ज़िन्दगी के कुछ पलों को कुछ सच्ची कुछ झूठी में माध्यम से आप सबके सामने रखने बैठे थे तो उसके लेखन में सबसे बड़ी समस्या यही आ रही थी कि बीते दिनों में से क्या छोड़ दिया जाये, क्या लिख दिया जाये. किसी एक घटना के सन्दर्भ में लिखना शुरू करते तो उससे संदर्भित न जाने कितनी घटनाएँ सामने आ जातीं. कई बार इन यादों की आती-जाती लहरों में डूबते-उतराते हुए भी मुस्कुराते रहते और कई बार आंसुओं के सागर में डूब जाते. मुश्किल से किसी एक याद से पीछा छुड़ाकर आगे बढ़ने की कोशिश करते तो आगे किसी मोड़ पर कोई दूसरी याद रास्ता रोके खड़ी होती दिखती. बहरहाल, तमाम यादों को दरकिनार करते हुए, कई यादों के साथ हँसते-रोते अंततः कुछ सच्ची कुछ झूठी को अंतिम रूप प्रदान करवा दिया. 

यादें यहीं तक सीमित नहीं रहीं. दिन यहीं तक आकर नहीं समाप्त हुए. इनको आगे बढ़ना था, आगे बढ़कर आज भी हैरान-परेशान करने चले आते हैं. कभी अपने मित्रों से मुलाकात के दौरान, कभी घर-परिवार में सबके साथ गपशप के दौरान, कभी किसी सामान के खोजने के दौरान किसी पुरानी चीज के हाथ लग जाने पर, कभी पुराने खतों के हाथ में आ जाने के दौरान ऐसी स्थिति सामने आ ही जाती है. यादों का ये सिलसिला न कभी थमता है और कभी थमेगा भी नहीं. यादें ही वे क्षण हैं जो बिना किसी सूचना के जब चाहें चले आते हैं. इन यादों के साये में व्यक्ति भटकने का काम भी करता है, आगे बढ़ने का भी काम करता है. एकबार फिर इन्हीं यादों के साथ आगे बढ़ते हुए पुराने दिनों की सैर करने का मन है.

28 जुलाई 2019

जुड़िये हमारी 'कुछ सच्ची कुछ झूठी' से


आखिरकार लम्बे इंतजार के बाद कुछ सच्ची कुछ झूठी का प्रकाशन हो ही गया. विगत दो-तीन वर्षों से लगातार प्रकाशन की, लेखन की, संपादन की स्थिति में होने के कारण हमारा यह ड्रीम प्रोजेक्ट थमा हुआ था. रुका हुआ नहीं कह सकते क्योंकि इस पर लगातार काम चल रहा था. जब स्थिति खुद पर लिखने की हो, अपने जीवन को कागज़ पर उतार कर सार्वजनिक करने की हो तब अनेक तरह की ऊहापोह जैसी स्थितियां भी सामने आने लगती हैं. इस पुस्तक के लिए एक लम्बे समय से दिमाग काम कर रहा था और दिल भी इसके लिए समान रूप से दिमाग का साथ दे रहा था. ऐसे में विभिन्न घटनाओं को लिखना, तमाम घटनाओं को जानबूझ कर छोड़ना, बहुत सी घटनाओं पर काल्पनिकता का आवरण ओढ़ाना, बहुत सी बातों को एक आवरण के सहारे नए रंग में पेश करना आदि ऐसे कदम थे जो अपनाने थे. इस बारे में हमारा मानना यह रहा है कि अपने जीवन को सार्वजनिक करने का यह मंतव्य कतई नहीं होना चाहिए कि दूसरे के जीवन में उथल-पुथल मच जाये. इसी कारण से सब कुछ सच्ची-सच्ची होने के बाद भी उसमें ऐसा झूठ चढ़ाया गया जो सच होने के बाद भी सच न लगे.


बहरहाल, अब जबकि अंजुमन प्रकाशन, प्रयागराज से इसका प्रकाशन हो चुका है. यह पुस्तक अमेज़न पर भी बिक्री के लिए उपलब्ध है तो आप सभी से अपेक्षा है कि इसे पढ़ेंगे और हमारे बारे में हमें ही बताने का कष्ट करेंगे.

अंजुमन प्रकाशन के बारे में जानकारी नीचे की लिंक पर दी गई है. वीनस केसरी जी ने पूरी तन्मयता से हमारे ड्रीम प्रोजेक्ट को सफल बनाने का प्रयास किया है, उनका आभार.

अमेज़न की लिंक भी नीचे दी जा रही है. आप यहाँ से कुछ सच्ची कुछ झूठी को मंगवा सकते हैं.

आप सभी का स्नेह अपेक्षित है.

08 फ़रवरी 2019

कुछ सच्ची कुछ झूठी के कुछ कवर पेज









आत्मकथा कुछ सच्ची कुछ झूठी के लिए कुछ कवर तैयार किये हैं. अभी ये अंतिम नहीं हैं, बस दिमाग दौड़ाया जा रहा है कि क्या कैसे बनाया जाए. फोटो अपनी ही लगानी है क्योंकि आत्मकथा है. बाकी इसका अंतिम रूप अभी बनना बाकी है.
सुझाव आमंत्रित हैं. 

08 जनवरी 2019

कुछ सच्ची कुछ झूठी


हर व्यक्ति का कोई न कोई ड्रीम प्रोजेक्ट होता है. हमारा भी एक ड्रीम प्रोजेक्ट रहा है. वह है हमारी आत्मकथा कुछ सच्ची कुछ झूठी. विगत कुछ वर्षों से इसका लेखन चल रहा था. कभी कुछ जोड़ा जाता, कभी कुछ हटाया जाता. पिछले लगभग एक वर्ष से यह पूर्णता की स्थिति में लैपटॉप में सुरक्षित थी. कुछ परिचितों के भरोसे उसके प्रकाशन के लिए हाथ-पैर मारे मगर सभी जगह से निराशा ही हाथ लगी. इसके बाद दिमाग से नमी-गिरामी प्रकाशकों का ख्याल निकाल दिया. सबके अपने नखरे तो हम कौन से कम नखरेबाज. एक पल में निर्णय लिया कि अब इसे किसी नामी प्रकाशक से नहीं छपवायेंगे भले ही वो घर आ जाये. इसके बाद विगत कुछ माह से इधर-उधर हाथ-पैर चलाये.


इस हाथ-पैर चलाने के बाद एक बात लागू हुई, हमारे साथ. वो ये कि बगल में छोरा, शहर में ढिंढोरा. हुआ ऐसा कि एक दिन हमारे प्रिय लखन लाल मिलने घर आये. बातचीत के दौरान उन्होंने कुछ सच्ची कुछ झूठी की चर्चा छेड़ दी. जब उनको पता चला कि अभी भी वो पाण्डुलिपि के रूप में लैपटॉप में सुरक्षित है तो वे तुरंत उसके प्रकाशन करवाने के लिए बोले. उनकी बातों से लगा कि एक वे ही नहीं बहुत से लोग इंतजार में हैं. लोगों की क्या कहें, हम खुद अपने ड्रीम प्रोजेक्ट के धरालत पर उतर आने के इंतजार में हैं. बस, बात की बात में उन्होंने तुरंत एक प्रकाशक के नाम पर अपनी सहमति देते हुए अंतिम मुहर लगाई.
लखन की विश्वासपरक सहमति के बाद तुरत-फुरत प्रकाशक से बात करके सारी बात अंतिम रूप से तय की. इसके बाद कुछ सच्ची कुछ झूठी को प्रकाशन हेतु प्रेषित कर दिया. सब कुछ ठीक रहा तो फरवरी अंतिम सप्ताह में या कि मार्च पहले सप्ताह में हमारी कथा आपके हाथ होगी.

05 जनवरी 2019

बहती आँखें उसे जाते हुए देखती रहीं


मुलाकात जब पहली बार हुई तो न फिल्मों की तरह पहली नजर वाला आकर्षण उभरा, न पहली नजर के प्रेम जैसा कुछ एहसास हुआ. कुछ दिनों की कुछ मुलाकातें जो हँसी-मजाक के साथ ख़तम हो गईं. हम दोनों की अपनी-अपनी राहें थीं, अध्ययन वालीं, सो आगे चल दिए. पढ़ने को, एक ठो डिग्री लेने को. पर वो कहते हैं न कि दुनिया गोल है, किसी न किसी दिन फिर मिलते हैं. हम दोनों फिर मिले, अबकी कुछ साल बाद मिले.


पहली बार की मुलाकात के समय के मुकाबले अबकी मुलाकात में हम दोनों कुछ परिपक्व भी थे. इस परिपक्वता में भी पहली नजर के आकर्षण जैसा कुछ न हुआ, न इधर, न उधर. इसके बाद मुलाकातें हुई, कई बार हुईं, नियमित न सही मगर जल्दी-जल्दी हुईं. वैचारिकता के अपने-अपने धरातल निर्मित हो चुके थे. सोचने-समझने की मानसिकता भी विकसित हो चुकी थी. क्या सही है, क्या गलत है की दृष्टि विकसित हो चुकी थी. ऐसे में महज आकर्षण जैसा कुछ नहीं होना था. यदि होना होता तो पहली बार की मुलाकात में हुआ होता. पहली बार मिलने पर न हुआ तो कई साल जब दोबारा मिले, तब ऐसा होना था मगर नहीं हुआ. 

ऐसा भी नहीं कि सौन्दर्य बोध का अभाव रहा हो. आँखों में चुम्बकीय आकर्षण, चेहरे पर प्राकृतिक मुस्कान, सादगी का प्रतिरूप होने के बाद भी पहली नजर के आकर्षण से बचने का कारण शायद ये रहा हो कि उसे कभी भी देह के मापदंडों पर नहीं आँका. बहरहाल, समय गुजरता रहा, मुलाकातें चलती रहीं मगर ख़ामोशी उसी तरह बनी रही.

उस ख़ामोशी के साए में कुछ स्वर गूँजे... कुछ कहने का प्रयास हुआ...

उस दिन उससे पहली बार मिलना तो हो नहीं रहा था. पहले भी कई-कई बार मुलाकात हो चुकी थी, ये बात और है कि पहली मुलाकात में एक आकर्षण सा महसूस हुआ था. उस पहली मुलाकात के कई वर्षों बाद जब उससे मिलना हुआ तो ठीक वही एहसास हुआ जो पहली मुलाकात के समय हुआ था. मिलना-जुलना नियमित तो नहीं किन्तु होता रहा. आपस में बातचीत, हँसी-मजाक, छेड़छाड़, गपशप किन्तु उस शाम का मिलने ने दिल को झंकृत कर दिया. समझ नहीं आ रहा था कि ये प्यार है या फिर जब पहली बार मुलाकात हुई थी, वो प्यार था?

बेधड़क किसी से भी कुछ भी कह देने की सामर्थ्य कहीं चुकती सी लगने लगी. बहती नदी के धारे संग-संग भावनाएं बन रही थीं, दोस्त की बाँह थामे हिम्मत बटोरने की कोशिश की जा रही थी. अंततः बहती आँखें उसे जाते हुए देखती रहीं और कभी उसका कहा सत्य साबित हुआ कि आँसू सँभाल कर रखिये, किसी दिन हमारे लिए भी बहाने पड़ेंगे.



14 नवंबर 2018

आधी रात और वो खिड़की का भूत

रात गहरा चुकी थी और हम मित्रों द्वारा बातों के बताशे बनाने भी बन्द किये जा चुके थे, सो नींद के आगोश में मजबूरीवश जाना ही था. सभी ने विदा ली और अपने-अपने कमरों की ओर चल दिये. ठण्ड के दिन होने के कारण रजाई में घुसते ही नींद ने अपना असर दिखाना शुरू किया. लेटते ही नींद का आना तो होना नहीं था, दोस्त-यारों के साथ हुई बातों को सोच-सोच मन ही मन हँसते-मुस्कराते सोने का उपक्रम करने लगे. सोचते-विचारते, हँसते-मुस्कराते कब नींद लग गई पता ही नहीं चला.


एकाएक खर्र-खर्र की आवाज ने चौंक कर उठा दिया. हाथ बढ़ा कर मेज पर रखे टेबिल लैम्प को रोशन किया. आवाज बन्द. इधर-उधर, कमरे में निगाह मारी कि कहीं बिल्ली या फिर कोई चूहा आदि न घुस आया हो पर कहीं कुछ नहीं. सपना समझ कर सिर को झटका और टेबिल लैम्प की लाइट को बुझा कर रजाई में फिर से घुस गये. खर्र-खर्र की आवाज आनी फिर शुरू. जैसे ही हाथ बढ़ा कर लाइट जलाई आवाज आनी बन्द. एक-दो मिनट लाइट को जलने दिया तो आवाज नहीं हुई. अबकी पलंग पर बैठे ही रहे और लाइट बन्द कर दी. जैसे ही रोशनी गई आवाज आनी शुरू हुई. वहीं डरावनी सी खर्र-खर्र. बिना टेबिल लैम्प को जलाये आवाज को सुनने का प्रयास किया कि आ कहाँ से रही है? अगले ही पल समझ में आ गया कि आवाज खिड़की की तरफ से आ रही है.

टेबिल लैम्प जलाया तो आवाज आनी बन्द हो गई. लगा कि दोस्त लोग डराना चाह रहे हैं क्योंकि आज हमारे रूम-पार्टनर, राजीव त्रिपाठी भी नहीं थे. हॉस्टल में किसी न किसी रूप में भूत-प्रेत-चुड़ैल आदि के किस्से सुनाये जाते थे. किसी कमरे को भुतहा बनाया जाता, किसी पेड़ पर भूत का निवास बताया जाता. इससे डर का माहौल बना ही रहता. यह सब लगभग रोज का नियम होता था. आज भी महफिल जमी थी बातों-बातों में डरावने किस्से भी तैर चुके थे. एक-दो आवाजें दीं पर कोई आहट भी नहीं मिली. लाइट जलता छोड़कर रजाई ओढ़ कर लेटे पर आवाज नहीं आई. लाइट बन्द की और आवाज आनी शुरू. हम चुपचाप बिना आहट के यह समझने और देखने की कोशिश करने लगे कि कहीं खिड़की पर कोई है तो नहीं? लगभग चार-पाँच मिनट की कोशिश के बाद भी कोई समझ न आया और कोई आहट भी नहीं समझ आई, हाँ, खर्र-खर्र की आवाज लगातार होती रही.

अब थोड़ा सा डर लगा. एक तो अकेले होने का डर और ऊपर से हॉस्टल के चर्चित भूतों का डर. हालांकि हमें कभी भी भूत-प्रेत जैसी बातों से डर नहीं लगा किन्तु माहौल का नया-नया होना और फिर रोज-रोज के वहीं किस्सों ने आज मन में डर पैदा कर दिया. बहुत हिम्मत करके लाइट जलाई और एकदम से कूद कर खिड़की पर आ गये. यह सोचा कि यदि भूतों के हाथों मरना लिखा होगा तो यही सही और यदि दोस्त लोग हैं तो उनको सीधे-सीधे पकड़ा जा सकता है. खिड़की से जो देखा उसने डर तो दूर कर दिया पर चौकीदार बाबा के ऊपर गुस्सा ला दिया. चिल्ला कर बाबा को बुलाया. खर्र-खर्र की आवाज को पैदा करने वाला कोई भूत नहीं और न ही हमारे कोई मित्र वगैरह थे. एक आवारा गाय हमारे कमरे के ठीक नीचे खड़े होकर वहाँ लगे पेड़ के तने से अपना सींग रगड़ती थी तो खर्र-खर्र की डरावनी सी आवाज होने लगती थी. जैसे ही लाइट जलती वह सींग रगड़ना रोक देती और जैसे ही लाइट बन्द होती वैसे ही उसका सींग पेड़ के तने पर रगड़ना शुरू हो जाता.

चौकीदार बाबा ने आकर उस गाय को वहाँ से दूर भगाया और हम भी अपने मन में एक पल को बिठा चुके भूत को भगा कर फिर से रजाई में दुबक गये.


05 अगस्त 2018

दोस्ती और दोस्त का अंदाज


उस दिन रविवार था, अगस्त का पहला रविवार. उन दिनों मोबाइल सपने में भी सोचा नहीं गया था. बेसिक फोन की घंटी घनघनाई. रविवार होने के कारण सभी लोग घर में ही थे. कोई विशेष दिन मनाये जाने का न चलन था और अपनी आदत के अनुसार हम भी ऐसे किसी दिन के प्रति सजग-सचेत नहीं थे. सचेत-सजग तो आज भी नहीं हैं. बहरहाल, घनघनाती फोन की घंटी रुकी और उधर से हमको पुकारते हुए अम्मा बोली, किसी लड़की का फोन है. दिमाग की सारी घंटियाँ घनघना गईं.


हैलो के साथ हैप्पी फ्रेंडशिप डे की खनकती आवाज़ कानों में घुल गई. सेम टू यू कहने के बाद कुछ और आगे कहते उससे पहले ही दूसरी तरफ से कमेन्ट मारता हुआ उलाहना आकर कानों में गिरा, 'आप पहले फोन करके विश नहीं कर सकते थे? उलाहना देने का अंदाज़ भी इतना गज़ब कि अपनी आदत के अनुसार ठहाका मारते हुए हमने इतना कहा, दोस्ती में ऐसी औपचारिकता हम नहीं करते.

दो-तीन मिनट के बाद जब फोन रखा तो समझ नहीं आया कि इस तरह की हलकी-फुलकी मधुर नोंक-झोंक के बाद समाप्त हुई या फिर बात शुरू हुई? समय गुजरता रहा. वक्त बदलता रहा. स्थितियाँ-परिस्थितियाँ बदलती रहीं मगर बात ख़तम होकर जहाँ शुरू हुई थी वो न बदली. अगस्त आता रहा. अगस्त का पहला रविवार आता रहा. हर बार की तरह फोन उधर से ही आता रहा. हर बार विश करने के बाद वही मधुर उलाहना दिया जाता रहा, आप पहले फोन करके विश नहीं कर सकते थे? हमारा वो ठहाकेदार जवाब वैसे ही निकलता रहा.

सबकुछ बदलने के बाद भी लगता है जैसे कुछ न बदला. दोस्ती की नोंक-झोंक न बदली. दोस्ती का वो बेलौस अंदाज़ न बदला. दोस्ती आज भी वहीं उसी रूप में बनी हुई है जहाँ उस समय थी. समय बदला मगर अंदाज नहीं बदला. बहरहाल, अबकी फिर अगस्त आया है. अबकी फिर अगस्त का पहला रविवार आया है. अबकी फिर वही फ्रेंडशिप डे हर बार की तरह इस बार भी आया मगर यदि नहीं आया तो उसका फोन. सोशल मीडिया के ज़माने में भी सन्देश का इंतजार, फोन का इंतजार बना ही रहा. हाँ, चिर-परिचित अंदाज में, जैसा कि हमें विश्वास था उसका उलाहना ही आया क्या बात है फ्रेंडशिप डे पर कोई मैसेज ही नहीं. अब उससे क्या कहें, दिल और हम आज भी इंतजार करते हैं उसके फोन का, उसके मैसेज का. समय भले बदल गया हो मगर न वो बदली, न हम बदले. शिकायत ज्यों की त्यों हैं, अंदाज ज्यों का त्यों है, नाराजगी ज्यों की त्यों है, दोस्ती ज्यों की त्यों है. इस ज्यों के त्यों में हमें भली-भांति मालूम है कि अगले साल अगस्त के पहले रविवार को भी यही होना है. इसके बाद भी दोस्ती बदस्तूर जारी है. आखिर इसी का नाम दोस्ती है, इसी का नाम दोस्त है.  


24 अप्रैल 2018

विश्व पुस्तक दिवस पर नई पुस्तक-लेखन आरम्भ - 'रात का शहर'


कल पुस्तक दिवस मनाया गया. जिनको पुस्तकों से प्रेम है उन्होंने तो जोश के साथ मनाया और जिनको पुस्तकों के प्रति प्रेम दर्शाना था उन्होंने सेल्फी के साथ मनाया. किताबों के प्रति हमारे लगाव का एक बहुत बड़ा कारण आनुवांशिक कहा जा सकता है. पिताजी को और बाबाजी को जबरदस्त शौक था पढ़ने का. बाबाजी को हमने पूरे दिन कुछ न कुछ पढ़ते बराबर देखा है. समाचार-पत्र को वे इस तरह पढ़ते कि कोई एक समाचार भी उनसे बचकर नहीं निकल पाता. इसी तरह पिताजी को हमने एक दिन में उपन्यास समाप्त करते देखा है. उरई में हमारे परिचित की एक दुकान हुआ करती थी. मंगलवार साप्ताहिक बंदी के चलते दुकान बंद रहती. पिताजी को उस एक दिन में किताब समाप्त करते देखा है. इसके अलावा तमाम सारी पत्रिकाएँ हमारे घर में आती. हम बच्चों के लिए भी अनेक पत्रिकाएँ पिताजी लाया करते थे. चंपक, लोटपोट, चंदामामा, गुड़िया, नंदन, सुमन सौरभ, चाचा चौधरी, बिल्लू, पिंकी आदि से परिचय बराबर होता रहता था. आगे चलकर राजन-इक़बाल सीरीज ने खूब आकर्षित किया. न जाने कितनी कॉमिक्स हम दोस्तों के बीच इधर से उधर होती रहतीं. पढ़ने के इस शौक में उस समय चार चाँद लग गए जबकि कक्षा छह में एडमीशन लेने पर जीआईसी कैम्पस में राजकीय पुस्तकालय के दर्शन हो गए. आज भी राजकीय पुस्तकालय नियमित रूप से जाना होता है. आज भी पुस्तकों के साथ दोस्ती बहुत गहरी है. सफ़र में आज भी कई-कई किताबें हमारी सहयात्री बनती हैं.


पढ़ने के अपने शौक के बीच याद नहीं कि कब बचपन में लिखने का भी शौक लग गया था, जो आज तक बना हुआ है. उस समय हमारी उम्र शायद नौ-दस वर्ष की रही होगी जबकि हमने अपनी पहली कविता लिखी थी. पिताजी की तरफ से हमेशा ऐसे कामों के लिए प्रोत्साहन मिलता रहा. उन्होंने उस कविता को उस समय दैनिक भास्कर, स्वतंत्र भारत और आज में प्रकाशित करवाया था. बहरहाल, समय के साथ पढ़ना-लिखना दोनों बढ़ता ही रहा. किताबों की संख्या अलमारी में बराबर बढ़ती रही. लिखने वाली सामग्री भी बढ़ती रही. इस लिखने के शौक का जब छपास रोग से संपर्क हुआ तो लिखना और तेज हो गया. अब चूँकि छपने के लिए भी लिखना था सो पढ़ना और भी ज्यादा जरूरी हो गया, सो पढ़ना उससे भी अधिक तेज हो गया. कालांतर में तकनीकी विकास ने लेखन को ब्लॉग, वेबसाइट ने विकास के आयाम दिए. बहुत कुछ लिख-पढ़ लेने के बाद कुछ अपने बारे में लिखने-बताने की इच्छा हुई तो आत्मकथा कुछ सच्ची, कुछ झूठी का लेखन शुरू किया. अपने चालीस वर्ष के जीवन को जैसे देखा-समझा, इतने वर्षों में बहुत से खट्टे-मीठे अनुभव हुए, बहुत से अपने-पराये साथ आये उन सभी अनुभवों को इकठ्ठा करने का काम किया.


आत्मकथा लेखन पूर्ण हुआ और उसके प्रकाशन की प्रक्रिया आरम्भ करनी है, बस किसी प्रकाशक की सहमति के इंतजार में हैं. इस बीच कुछ अन्य विषयों पर पुस्तक लिखने का विचार बन रहा था. जिसमें से एक पुस्तक काव्य-रूप में है. इसमें एक शहर को जिंदगी से, व्यक्तियों से, किसी स्थान से, किसी सजीव-निर्जीव से, समय-काल-परिस्थिति आदि से सम्बंधित करके दिखाया गया है कि वह शहर रात में किस तरह की अनुभूति करता है. आत्मकथा लेखन के पश्चात् इसी पुस्तक रात का शहर को लिखने का विचार था. कल पुस्तक दिवस के अवसर इसे आरम्भ किया है. दस-बारह पंक्तियों की काव्य-रचना के द्वारा इसी अनुभूति को रात के शहर के सम्बन्ध में दर्शाने का प्रयास किया गया है. अभी बने खाँचे के अनुसार विचार ये किया है कि महज इक्यावन काव्य-रचनाओं का संकलन किया जायेगा.
एक काव्य-रचना को उदाहरण स्वरूप देखिएगा-

यादों में बस गया था वो रात का शहर,
इक अफसाना बन गया वो रात का शहर.

सूनी गली के घर से झांकती आँखें,
फैक्ट्री से लौटते पिता को ताकती राहें.

झींगुरों के गीतों से सन्नाटों का बिखरना,
पहरेदारों की तरह था कुत्तों का विचरना.

खांसना-खखारना किसी बुजुर्ग पड़ोसी का,
गूंजता स्वर ले लो मूंगफली, लईया, पट्टी का.

झिर-झिर कर आती रौशनी हलकी सी,
अंधकार को जीतने की कोशिश ज़ारी थी,

खम्बे के उस बल्ब को किसी की नजर लग गई,
घुप्प अन्धकार में घिर गया वो रात का शहर.

09 अप्रैल 2018

स्कूल का पहला दिन, वो पहला-पहला स्कूल - बारह सौवीं पोस्ट


किसी भी व्यक्ति के जीवन में जन्मने के बाद महत्त्वपूर्ण दिन होता है उसका पहले दिन स्कूल जाना. लगभग सभी के लिए पहला स्कूली दिन बहुत ही ख़ास होता है. एक जैसी होते हुए भी सबकी अलग-अलग सी कहानी रहती है. वैसे देखा जाये तो स्कूल भी अपने आपमें एक अजब सा स्थान होता है, बच्चों के लिए. किसी के लिए दहशत भरा, किसी के लिए कौतुहल भरा, किसी के लिए खेल का स्थान, किसी के लिए बोझिल सा. प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक शैक्षिक संस्थान को बहुत सहजता से आत्मसात करते रहे. बहरहाल, हम भी स्कूल गए, गए क्या, भेजे गए. समय से ही स्कूल भेजे गए.


हमारा पहला स्कूली दिन बहुत ही रोचक स्थिति में गुजरा. स्कूल का नाम याद नहीं पर शायद राधाकृष्ण जूनियर हाई स्कूल या फिर कुछ इसी तरह का नाम था. पहले दिन स्कूल जाना हुआ एक आया माँ के साथ. स्कूल पहुँचने के बाद कितना समय स्कूल में बिताया, ये भी सही से याद नहीं पर इतना याद है कि कुछ समय बाद हमें स्कूल में अच्छा नहीं लगा. बंद-बंद सा माहौल, छोटे-छोटे से कमरे. आज के भव्य स्कूलों, सजावटी इमारतों से इतर साधारण सा, किसी पुराने मकान में चलता स्कूल. जब तक वे आया माँ दिखती रहीं, तब तक तो हम स्कूल में जमे रहने की कोशिश करते रहे. उनके कुछ देर बाद न दिखने की स्थिति में स्कूल हमें अच्छा सा न लगा. हमने घर जाने की जिद मचाई तो बताया गया कि आया माँ किसी काम से स्कूल से चली गईं हैं, उनके आते ही घर भिजवा दिया जायेगा.

जिद से ज्यादा जिद्दी होने का स्वभाव बचपन से ही रहा है, आज भी है. शायद उसी जिद के साथ-साथ रोना, चिल्लाना बहुत ज्यादा ही रहा होगा तभी स्कूल प्रबंधन ने एक शिक्षक के साथ हमें घर वापसी की राह दिखाई. घर का पता किसी को मालूम नहीं था. आया माँ स्कूल में नहीं. हमने पूरे विश्वास के साथ कहा कि हमें घर का रास्ता पता है. बस फिर क्या था, अपने विश्वास के बलबूते शिक्षक के साथ घर को चल दिए. हम अपने पहले ही दिन अपनी याददाश्त, अपने विश्वास के सहारे वापस घर तक लौट आये. उस स्कूल में हमारा पहला दिन, उस स्कूल का आखिरी दिन भी साबित हुआ.

आज भी अम्मा जी उस दिन को याद कर बताती हैं कि वे शिक्षक और हमारे घर वाले हैरान थे कि उस अत्यंत छोटी सी उम्र में हमें स्कूल से घर तक की रास्ता कैसे याद रही? हैरानी आपको भी हो रही होगी मगर सच ये है कि आज भी ये प्राकृतिक शक्ति हममें विद्यमान है कि किसी रास्ते से एक बार गुजर जाएँ, किसी भी व्यक्ति से एक बार मिल लें फिर वह हमारे दिमाग में बस जाता है.

पहले स्कूल का पहला दिन तो जाने और आने के साथ ही समाप्त हो गया था. उसके बाद तो ये भी याद नहीं कि दूसरे स्कूल में जाना कितने दिन बाद हुआ था. उम्र का एक लम्बा समय गुजरने के कारण उपजी याददाश्त-दोष वाली इस स्थिति के बाद भी पहले स्कूल का पहला दिन अभी तक याद है तो दूसरे नए स्कूल का पहला दिन भी अभी तक बहुत अच्छे से याद है. तैयार होकर, तेल-फुलेल के साथ अपने बच्चा चाचा के साथ स्कूल पहुँचे. चाचाओं में दूसरे नंबर के बच्चा चाचा, हम सभी बच्चों के अत्यंत प्रिय चाचा हैं. हाँ तो, अपने नए स्कूल के पहले दिन हम अपने इन्हीं बच्चा चाचा के साथ स्कूल के लिए चल पड़े. स्कूल पहुँचे तो हम सारे जरूरी साजो-सामान से सुसज्जित थे, बस कमी थी तो हमारे टिफिन बॉक्स की. इसी को ध्यान में रखते हुए ही हमारे लिए टिफिन सजाया जाना था. सो चाचा जी हमें स्कूल में छोड़कर खुद बाजार को निकल गए.

स्कूल में हमारा समय सही से बीत रहा था. पहले वाले स्कूल के मुकाबले खूब खुला-खुला. प्यार-दुलार देती दीदियाँ. कक्षा के गिने-चुने विद्यार्थियों के बीच पहले ही दिन छा जाना, आज भी याद है. कुछ देर बाद कक्षा में आकर हमारा नाम पुकारा गया. उस तरफ देखा तो आया माँ अपने हाथ में एक नया टिफिन बॉक्स लिए खड़ी हैं और स्कूल के बाहर चाचा जी हमारी कक्षा की तरफ निहारते खड़े हुए थे. लाल-सफ़ेद रंग का गोल टिफिन, जो कई वर्षों तक हमारे लिए अपनी सेवाएँ देने के बाद घर के अन्य कामों में प्रयोग होने लगा. भोजनावकाश के समय अपने टिफिन बॉक्स को खोला तो जैसा कि आपको बताया था उसमें बिस्किट, टॉफी हमारे स्वागत में तत्पर थे. घर के सभी लोगों से, अम्मा से सुना है कि हमने भोजन बहुत देर से, लगभग छह-सात वर्ष की उम्र से करना शुरू किया था. तब तक दूध, बिस्किट, दालमोंठ और बाकी चट्ठा-मिट्ठा से काम चलाया जाता था, अपनी भूख मिटाने को. टिफिन बॉक्स में अपना मनपसंद भोजन देख मन और अधिक प्रसन्न हो गया और हम स्कूल का पहला दिन पूरा समय बिताकर ख़ुशी-ख़ुशी घर लौट आये.

पं० उमादत्त मिश्र बालिका विद्यालय के नाम से आरम्भ वह स्कूल वर्तमान में भी पं० उमादत्त मिश्र जूनियर हाई स्कूल के नाम से संचालित है. उस समय छोटा सा वह स्कूल अपने आसपास खेलने का मैदान भी समेटे हुआ था, जो अब कुछ हद तक सिकुड़ सा गया है. शिक्षिकाएँ, जिन्हें हम दीदी कहकर पुकारते थे और प्रधानाचार्या को बड़ी दीदी. सभी का स्नेह, प्यार, दुलार, आशीर्वाद तब भी मिला, आज भी मिल रहा है. बड़ी दीदी के रूप में मधु दीदी के साथ शीला दीदी, सुमन दीदी, सरोजनी दीदी, रेखा दीदी, स्नेहलता दीदी और इनके साथ-साथ शुक्ला आचार्य जी और प्रह्लाद आचार्य जी आदि ने हमारी नींव को भली-भांति तैयार किया. इस नींव की सुरक्षा का दायित्व बहुत दिनों तक शीला आया माँ ने उठाया. बाद में हमारे दोनों छोटे भाइयों का प्रवेश भी उसी स्कूल में करवाया गया. जिनकी सुरक्षा का दायित्व हीरा आया माँ के जिम्मे किया गया.

आज भी उस स्कूल के प्रति आकर्षण बना हुआ है. उस स्कूल के शिक्षक, आया माँ, साथी बराबर याद आते हैं, स्मृति में बसे हुए हैं. उस समय के कुछ लोग आज भी साथ हैं. आये दिन उनसे मुलाकात होती रहती है. उस समय को याद करते हैं तो घर-परिवार जैसी अनुभूति होती है, जो आज के स्कूलों में देखने को नहीं मिल रही है.


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यह हमारे इस ब्लॉग की 1200वीं पोस्ट है. अपने स्कूल का पहला दिन और फिर पहले-पहले स्कूल की यादों को आप सबसे बाँटने से बेहतर कुछ और नहीं समझ आया, इस पोस्ट के लिए.  

02 मार्च 2018

उस होली की मस्ती का अपना मजा था


हम लोगों के लिए होली का मतलब हमेशा से हुल्लड़ से ही रहा है. उस समय भी जबकि हम छोटे से थे, उस समय भी जब हम किशोरावस्था में कहे जा सकते थे और तब भी जबकि हमें भी बड़ा माना जाने लगा था. हमारे लिए ही नहीं, हमारे पूरे परिवार के लिए होली का मतलब खूब मस्ती, खूब हुल्लड़, खूब हंगामा करना होता था. किसी भी त्यौहार का, पर्व का मजा उस समय और भी बढ़ जाता है जबकि पूरा परिवार एकसाथ हो. आज भले ही हम सभी लोग अपनी-अपनी व्यस्तताओं, अपने-अपने कार्यों में व्यस्त होने के कारण भले ही किसी त्यौहार पर एकसाथ न जुट पा रहे हों मगर उस समय होली और दीपावली, ये दो त्यौहार ऐसे होते थे कि सभी चाचा लोग सपरिवार उरई इकठ्ठा हुआ करते थे. आज भले ही त्योहारों पर इकठ्ठा होने में अन्तराल आया हो मगर परिवार में किसी भी वैवाहिक आयोजन पर अथवा किसी मांगलिक कार्य पर एकजुट हो जाते हैं. बहरहाल, आज की चर्चा फिर कभी, उस समय हम लोग अपने बचपन में थे और पिताजी-अम्मा, चाचा-चाची लोग अपनी युवावस्था में थे. हम सभी भाई-बहिन एकसाथ जुटते तो बस हंगामा ही हंगामा होता. हम बच्चों के हंगामे में चाचा लोग भी शामिल हो जाया करते थे. तीनों चाचियाँ एकसाथ न केवल अपने कामों को हँसते-बोलते निपटाती बल्कि हम बच्चों की तमाम फरमाइशें भी पलक झपकते ही पूरी करतीं.


होली, दीपावली के त्योहारों में मिलने पर लगता जैसे सारे संसार की खुशियाँ उन्हीं कुछ दिनों में सिमट आई हों. इसमें भी होली कुछ ज्यादा पसंद आता हम बच्चों को क्योंकि इसमें हुल्लड़ करने की खुली छूट मिली होती. तीनों चाचा लोगों का ज्यादातर होलिका दहन वाले दिन ही आना हुआ करता था. उनके आने के बाद होली के हंगामेदार तरीके से मनाये जाने के तरीके विचार किये जाते. हम सभी भाई-बहिनों की फ़ौज को किसी न किसी चाचा का आशीर्वाद मिल जाता बस उसी रात से हंगामा शुरू हो जाता. वहाँ घर के सभी बड़े लोग होलिका दहन कार्यक्रम में गए होते यहाँ हम बच्चे चाचा के साथ मिलकर कोयला पीस रहे होते, काजल की डिब्बियाँ खोजी जा रही होतीं, कड़ाही, तवे के पीछे की कालिख खुरच रहे होते, फाउंटेन पेन की काली स्याही को कहीं एक जगह इकठ्ठा करने में लगे होते. रात को खाना खाने के बाद की गप्पबाजी दो-दो, तीन-तीन बजे तक समाप्त नहीं होती. हम बच्चे जागते, सोते सी दशा में सबके सोने का इंतजार करते रहते. सबके चेहरे पर मूँछें बनाये जाने का काम, चेहरे पर कलाकारी दिखाने के काम भी चाचा के साथ मिलकर करना होता था. सुबह जागने पर सभी अपने-अपने चेहरों की कारीगरी देखकर हँसता, खीझता. हम बच्चे भी इससे न बच पाते. सबके चेहरे पर दाढ़ी-मूँछ बनाने वाले हम बच्चों के चेहरे भी रँगे-पुते होते थे.


होली का दिन. रंग खेलने का दिन. पिचकारी की धार मारने का दिन. सबको रंगीन बनाने का दिन. उस दिन तो हम बच्चे तो बच्चे पिताजी-अम्मा, चाचा-चाची भी बच्चे नजर आते. उन दिनों घर पर मिलने वाले भी बहुत लोग आते. उनकी खूब खातिरदारी की जाती. खूब बड़ी छत पर उनको ससम्मान ले जाया जाता. पिताजी और तीनों चाचा लोग मिलकर सबको अपनी गिरफ्त में लेकर वो हाल करते कि पूछिए मत. कभी-कभी कोई बहुत बुरी तरह से रँगा हुआ चेहरा लेकर आता तो पहले उसका चेहरा धुलवाया जाता और फिर बाकायदा कुर्सी पर बैठा कर चेहरे पर पुनः होली खेली जाती. कोई ड्राइंग करने वाले ब्रश से कलाकारी दिखा रहा है. कोई उंगली से कानों में रंग भरने में लगा है. कोई पैरों में महावर लगाकर उसका श्रृंगार कर रहा है तो कोई आँखों में काजल लगाकर उसे संवार रहा है. पूरी प्रक्रिया में कोई जोर-जबरदस्ती नहीं, कोई हंगामा नहीं, कोई खींचा-तानी नहीं इससे हँसते-खेलते माहौल में होली का उत्सव अपने चरम पर पहुँचता जाता. दिन के एक निश्चित समय तक घर में मिलने आये लोगों संग, आपस में होली खेलने के बाद, मोहल्ले में ऊधम मचा लेने के बाद नगर भ्रमण पर निकला जाता. चूँकि गुझिया, पपड़िया, मठरी, शकरपारे आदि इतनी बार और इतने अधिक खाए जा चुके होते कि भोजन करने की आवश्यकता समझ ही नहीं आती.


चाचा लोग हम बच्चों की गैंग के सरगना होते और फिर हम सबका धमाल शुरू होता सडकों पर. परिचित हो या फिर अपरिचित, सभी को एक निगाह से देखा जाता. सबको रंग लगाया जाता, गुलाल लगाया जाता. कोई परिचित का मिला तो हम बच्चों ने उसके पैर छूकर आशीर्वाद लिया. रंग लगाने का, गुलाल लगाने का क्रम संपन्न हुआ. कोई अपरिचित मिला तो उससे अभिवादन हो गया. सड़क चलते बड़ों, बच्चों के अलावा दुकानदारों तक से होली खेल ली जाती. उस समय संपत की पान की बड़ी प्रसिद्द दुकान हुआ करती थी. वहाँ की दूध की बोतल आज भी अपने उसी स्वाद में मिलती है. उसके बाद लालजी चाट का स्वाद लिया जाता. किसी हाथठेले वाले की दुकान से पिचकारी, मुखौटे आदि खरीदने का काम भी कर लिया जाता. किसी कन्फेक्शनरी की दुकान से टॉफी, कम्पट आदि का आनंद लिया जाता. ये दुकानदार भी हम बच्चों के रंगों का शिकार हो जाया करते. तब आज की तरह किसी तरह का मनमुटाव देखने को नहीं मिलता था. आज के जैसी आपसी कटुता भी देखने को नहीं मिलती थी. न तो बड़े किसी बात का बुरा मानते थे और न ही छोटे किसी तरह का अभद्रता करते नजर आते.

आज होली पर उस समय की होली के हंगामे बराबर याद आते हैं. भाग-भाग कर लोगों को पकड़ना. उनको कुर्सी पर बैठाकर लाल-नीला-हरा करना. कभी-कभी कपड़ाफाड़ होली मनाया जाना. किसी-किसी को गाने की धुन पर खूब नचाया जाना. चेहरे, कान, दांत, हाथ, पैर, पेट, पीठ आदि को बिना रंगीन किये न जाने देना. कभी-कभी रंगों के साथ खूब पानी का मजा लेना. अब सब यादें बनी हुई हैं. चाचा-चाची लोग अपने-अपने परिवार में सिमट गए हैं. हम बच्चों के अपने-अपने परिवार हो गए हैं. मिलना अब नियमित भले न हो पाता हो मगर होली, दीपावली सब एकदूसरे को याद अवश्य कर लेते हैं. होली के हुड़दंग को एक-दूसरे से साझा कर लेते हैं.