प्रधानमंत्री लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
प्रधानमंत्री लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

14 फ़रवरी 2026

देश का ये दुर्भाग्य कब समाप्त होगा?

देश के लोकतंत्र का एक दुर्भाग्य ये रहा कि इसे लोकतंत्र अचानक ही मिल गया, जिसके लिए वह कभी तैयार ही नहीं था. गौर करिए, देश अपनी आज़ादी के ठीक पहले अंग्रेजों का गुलाम था, उसके पहले मुगलों सहित अनेक आक्रमणकारियों, विदेशी आक्रान्ताओं की गुलामी को सहा है. इस स्थिति से पहले भी देश में रियासत, कबीलाई संस्कृति देखने को मिलती थी. लोकतान्त्रिक स्वरूप की अवधारणा आज़ादी से पहले देखने को नहीं मिलती है. (विभिन्न साम्राज्यों की जो भी स्थिति थी वो लोकतान्त्रिक नहीं थी) ऐसे में आज़ादी के बाद भी हम लोग दो मानसिकताओं में जीते रहे, एक मालिक वाली और दूसरी नौकर-दास वाली. ये स्थिति संसद से लेकर निम्न स्तर तक देखने को मिलती है.




संसद की तरफ देखें तो यहाँ भी यही स्थिति दिखाई देती है. किसी और की चर्चा न करते हुए नेता पक्ष नरेन्द्र मोदी और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को ही देखें तो सब साफ़ हो जाता है. राहुल गांधी की पारिवारिक पृष्ठभूमि जिस तरह की रही है वे उसका दृश्य लगभग रोज ही संसद में प्रस्तुत कर देते हैं. सदन को वे अपने घर का आँगन ही समझते हैं. सदन की कार्यवाही के बीच में खड़े होकर चाय पीने लगना, प्रधानमंत्री के गले लग जाना, आन मारना, नॉनसेन्स जैसा शब्द बोलने के बाद भी मुकर जाना, तथ्यात्मक रूप से गलती करना, सदन के नियमों की अवहेलना करना इसका उदाहरण है. पीठासीन अधिकारी को वे अपने घर-परिवार का कोई कर्मी ही समझते हैं तभी आसन को अपने दल का पूर्व सदस्य बताने लगना, बार-बार टोकने के बाद भी विषय पर न बोलना दर्शाता है कि राहुल गांधी सदन को, पीठ को आज भी खुद से नीचे समझते हैं. इसके पीछे वही कबीलाई सोच कि वे किसी रियासत जैसे परिवार से आते हैं, उनके परिवार ने देश को प्रधानमंत्री दिए हैं.


यहाँ देश के प्रधानमंत्री, पक्ष के नेता नरेन्द्र मोदी को भी कटघरे में खड़े करने से मुक्त नहीं किया जा सकता है. जैसा कि पहले बताया कि मलिक और नौकर वाली मानसिकता ही आज भी काम करती है. यदि नेता प्रतिपक्ष मालिक वाली मानसिकता से अपने कृत्य करते हैं तो नेता पक्ष खुद को नौकर वाली स्थिति में दर्शाने से नहीं चूकते हैं. गाहे-बगाहे वे खुद को चाय बेचने वाला, गरीब माँ का बेटा, पिछड़े वर्ग का घोषित कर ही देते हैं. यहाँ सिर्फ एक बड़ा अंतर उनको राहुल गांधी से अलग करता है कि वे सदन का, लोकतंत्र का सम्मान करते हैं; सदन की गरिमा का ध्यान रखते हैं; अपने कृत्य से सदन का-पीठ का अपमान नहीं करते हैं.


बावजूद इसके, कहा जा सकता है कि देश संक्रमणकाल से गुजरने के साथ-साथ दुर्भाग्य के दौर से भी गुजर रहा है जहाँ इसके नागरिकों में समझ विकसित नहीं हो सकी है. आज भी वे सही और गलत का अंतर कर पाने समर्थ नहीं हो सके हैं. आज भी वे एक फोटो, एक वीडियो, एक फाइल के सहारे किसी और के हाथ की कठपुतली बन जाते हैं.


पता नहीं देश का ये दुर्भाग्य कब समाप्त होगा?


05 अगस्त 2025

फटकार के बाद भी नहीं रुकेंगे विवादित बोल

सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को उनकी टिप्पणी के लिए फटकार लगाई है. राहुल गांधी द्वारा भारत-चीन सेनाओं के बीच हुई झड़प को लेकर टिप्पणी की गई थी कि चीनी सैनिक भारतीय सैनिकों को पीट रहे हैं. इस बयान पर बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन के पूर्व निदेशक उदय शंकर श्रीवास्तव ने राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक मानहानि का केस दर्ज करवाया था. इस मामले में हो रही सुनवाई पर न्यायालय ने कहा कि एक भारतीय विश्व में सबसे वीर भारतीय सेना के विषय में ऐसा कैसे कह सकता है कि वो चीन से पिट रही है. राहुल गांधी के साथ इस तरह की घटना तीसरी बार हुई है जबकि उनको न्यायालय से फटकार मिली है. चीनी सैनिक भारतीय सैनिकों को पीट रहे हैं के बयान के साथ-साथ उनको इस बात के लिए भी फटकारा गया है कि चीन ने भारत की दो हजार वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर रखा है. इस बयान पर अदालत ने उनसे सवाल किया कि आखिर उन्हें यह कैसे पता चला कि चीन ने भारत की जमीन पर कब्जा कर लिया है?

 

राहुल गांधी के द्वारा इस तरह का विवादित बयान पहली बार नहीं दिया गया है. पिछली लम्बी समयावधि में उनके द्वारा दिए गए अनेकानेक बयानों को देखकर लगता है कि इस तरह की बयानबाज़ी करना जैसे उनकी आदत बन चुका है. स्मरण रहे कि इससे पहले एक मामले में उनको सजा भी सुनाई गई थी जिसके चलते राहुल गांधी को लोकसभा की सदस्यता भी गँवानी पड़ी थी. राहुल गांधी ने अप्रैल 2019 कर्नाटक में एक चुनावी रैली में कहा था कि ललित मोदी, नीरव मोदी, नरेन्द्र मोदी का सरनेम कॉमन क्यों है? सारे चोरों का सरनेम मोदी क्यों होता है? इस बयान पर समूचे मोदी समुदाय को बदनाम करने का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ भाजपा नेता पूर्णेश मोदी ने आपराधिक मानहानि का केस दर्ज कराया था. इसी मामले में राहुल गांधी को दो साल की सजा सुनाई गई थी, जिसके चलते उनको लोकसभा की सदस्यता छोड़नी पड़ी थी. इसी तरह नवम्बर 2022 में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान इस बयान पर कि सावरकर ने अंग्रेजों को माफीनामा लिखकर महात्‍मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को धोखा दिया था, राहुल गांधी को वीर सावरकर के खिलाफ आपत्तिजनक बयानबाजी करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की फटकार सुननी पड़ी थी.

 



अपनी बयानबाज़ी के कारण, विवादित बोलों के कारण राहुल गांधी को लगातार न्यायालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, सर्वोच्च न्यायालय से डाँट भी खानी पड़ रही है, इसके बाद भी उनके विवादित बयान देने सम्बन्धी आदत में किसी तरह की कमी नहीं आई है. राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद में कथित दलाली को लेकर की गई गलतबयानी के कारण उनको सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा देकर माफी माँगनी पड़ी थी. राहुल गांधी को समझना चाहिए कि वे वर्तमान में लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं और ऐसे में उनका दायित्व बनता है कि वे जनहित मामलों पर, सरकार की गलत नीतियों पर अपनी बात को संसद में खुलकर रखें. बजाय ऐसा करने के उनके द्वारा कभी संसद के भीतर, कभी संसद के बाहर तो कभी सोशल मीडिया पर अनावश्यक टिप्पणी की जाती है. उनके ऐसा करने में वे दलगत विचारधारा का विरोध करते-करते देश का विरोध करने लगते हैं. अपनी इस बयानबाज़ी में वे सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ खुलकर बोलने की बजाय प्रधानमंत्री के लिए भद्दी, अपमानजनक भाषा-शैली का प्रयोग करने लगते हैं.

 

भारत जोड़ो यात्रा के बाद कांग्रेस और उसके वरिष्ठ नेताओं द्वारा राहुल गांधी को एक परिपक्व नेता के रूप में, जिम्मेदार पदाधिकारी के रूप में प्रतिष्ठित किया जाने लगा था. इसके पीछे की रणनीति उनको प्रधानमंत्री पद के लिए स्वीकार्य बनाना, नरेन्द्र मोदी के सापेक्ष स्थापित करना रहा है. उनके विवादित बयानों के बाद दर्ज मामलों, न्यायालयों के रुख, सर्वोच्च न्यायालय की फटकारों के शुरूआती मामलों के बाद ऐसा समझा गया था कि राहुल गांधी अब सँभलकर बयानबाज़ी करेंगे मगर उनके विवादित बोलों को देखकर लगता है कि उन पर अदालतों के बर्ताव का कोई असर नहीं हुआ है. ऐसी स्थिति में अब यह सम्भावना कम ही है कि सर्वोच्च न्यायालय की वर्तमान फटकार के बाद राहुल गांधी भविष्य में राष्ट्रीय हितों पर बात करना पसंद करेंगे, विवादित बोलों से बचने की कोशिश करेंगे. ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि विगत कई वर्षों के उनके व्यवहार, बर्ताव, भाषा-शैली को देखकर लगता है कि वे अभी भी राजशाही मानसिकता से ग्रसित हैं. उनके द्वारा भले ही अपने भाषण में कहा गया हो कि वे राजा नहीं बनना चाहते, इस तरह की शब्दावली को पसंद नहीं करते मगर उनकी भाषा-शैली, हाव-भाव, बयानबाज़ी किसी भी रूप में राजशाही अंदाज से कम नहीं.

 

पाकिस्तान और चीन को पसंद आने वाले बयान देना, ऑपरेशन सिन्दूर पर सवाल उठाना, डोकलाम विवाद के समय चीनी राजदूत से मिलना, ब्रिटेन और अमेरिका में भारतीय लोकतंत्र का अनादर करना, लोकसभा में चुनाव आयोग पर आरोप लगाते हुए उसे धमकी देना, अमेरिकी राष्ट्रपति के बयानों का समर्थन करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था को मृत बताना आदि ऐसे मामले हैं जो राहुल गांधी के बयानों की दशा-दिशा निर्धारित करते हैं. अब जबकि सर्वोच्च न्यायालय की फटकार के बाद प्रियंका गांधी सहित उनके अनेक समर्थकों द्वारा न्यायालय की टिप्पणी को निशाना बनाया जा रहा है तब लगता नहीं कि राहुल गांधी के बर्ताव, विशेष रूप से उनकी भाषा-शैली में किसी तरह का बदलाव होगा. संभवतः उन्होंने अपना मन बना रखा है कि वे राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध, प्रधानमंत्री के विरुद्ध विवादित बयानबाज़ी करते ही रहेंगे, इसके लिए भले ही उन पर कानूनी कार्यवाही होती रहे, भले ही न्यायालय से फटकार लगती रहे.

 


27 दिसंबर 2024

काश! जीवित रहते तारीफ कर देते

मनमोहन सिंह की जितनी तारीफें, उपलब्धियाँ अब उनके निधन के बाद सुनाई जा रहीं हैं, काश! उनको जीवित रहते सुना दी गईं होतीं.

 

=>> कम से कम उनको एहसास होता कि वे ही परमाणु सम्बन्धी मामले के अगुआ थे.

=>> कम से कम उनको एहसास तो होता कि उनके कारण ही भारत आर्थिक रूप से सक्षम हुआ है.

=>> कम से कम उनको एहसास होता कि मौन रहने के बाद भी वही भारतीय राजनीति की रीढ़ थे.

=>> कम से कम उनको एहसास तो होता कि वे ही एकमात्र विद्वान थे जिन्होंने आर्थिक नीतियों को सही से देश में लागू करवाया.




02 जुलाई 2024

अब तो परिपक्वता दिखाएँ राहुल गांधी

दस साल के बाद वर्तमान लोकसभा को नेता प्रतिपक्ष के रूप में राहुल गांधी का मिलना हुआ. नेता प्रतिपक्ष बनाये जाने के एक नियम के कारण विगत दस वर्षों से लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष नहीं था. इस नियम के चलते किसी भी विपक्षी दल के पास लोकसभा के कुल सदस्यों की संख्या का कम से कम दस प्रतिशत सदस्य होने चाहिए. 2014 और 2019 की लोकसभा में किसी भी विपक्षी दल के पास आवश्यक दस प्रतिशत सदस्य नहीं थे अर्थात लोकसभा के कुल 543 सांसदों में से किसी के पास 55 सांसद नहीं थे. 2014 में सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में कांग्रेस के पास सिर्फ 44 सांसद थे. इसी तरह 2019 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस मात्र 52 सांसदों के साथ सबसे बड़ा विपक्षी दल था. अब 2024 लोकसभा में कांग्रेस 99 सीटों के साथ सबसे बड़ा विपक्षी दल है. इसीलिए राहुल गांधी संसद में नेता प्रतिपक्ष के रूप में हैं.   

 



राहुल गांधी अपने राजनैतिक जीवन में पहली बार कोई संवैधानिक पद सँभालेंगे. संसद में विपक्षी नेता अधिनियम 1977 के अन्तर्गत नेता प्रतिपक्ष केन्द्रीय मंत्री के समान होता है. नेता प्रतिपक्ष के रूप में राहुल को कई शक्तियाँ और अधिकार भी मिलेंगे. वे भारत सरकार की लोक लेखा समिति के अध्यक्ष होने के अलावा प्रधानमंत्री के साथ मुख्य निर्वाचन आयुक्त सहित चुनाव आयोग के दो अन्य सदस्यों का चयन करने वाले पैनल का हिस्सा होंगे. इसके अलावा वे प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में लोकपाल, ईडी-सीबीआई निदेशक, केंद्रीय सतर्कता आयोग, केन्द्रीय सूचना आयुक्त, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग प्रमुख को चुनने वाली समितियों के सदस्य होंगे. गांधी परिवार की दृष्टि से देखें तो वे इस परिवार के तीसरे सदस्य हैं, जिनको नेता प्रतिपक्ष का संवैधानिक पद प्राप्त हुआ है. इससे पहले उनके पिता और माँ क्रमशः राजीव गांधी और सोनिया गांधी इस पद पर रह चुके हैं.

 

पिछले कुछ वर्षों में राजनैतिक हलकों में राहुल गांधी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में लगातार प्रोजेक्ट किया जा रहा है. कांग्रेस सहित उनके अन्य सहयोगियों द्वारा इस तरह से प्रचार भी किया जाता रहा है. भारत जोड़ो यात्रा को उनके परिपक्व होने के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है. ऐसी स्थिति में जबकि किसी नेता को देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित किया जाता हो तब भी और अब जबकि वही नेता सदन में संवैधानिक पद का प्रतिनिधित्व कर रहा हो, तब उससे परिपक्वता की अपेक्षा की जाती है. यह अपेक्षा तब विवादों के, हंगामे के घेरे में फँस गई जबकि 18वीं लोकसभा के पहले सत्र में नेता प्रतिपक्ष के रूप में अपने पहले भाषण में ही राहुल गांधी हिन्दुओं को चौबीस घंटे हिंसा, नफरत, असत्य फ़ैलाने वाला कह गए. ये और बात है कि खुद राहुल गांधी और उनके बचाव में उतरे नेताओं द्वारा बार-बार कहा जा रहा है कि हिन्दुओं से उनका अर्थ सम्पूर्ण हिन्दू समाज से नहीं वरन भाजपा से था.

 

नेता प्रतिपक्ष के रूप में उनके लगभग नब्बे मिनट तक चले भाषण से ऐसा लगा कि वे अभी भी चुनावी मोड में हैं. एकबारगी भी नहीं लगा कि सदन के अन्दर किसी संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति भाषण दे रहा है. विगत वर्षों में जिस तरह से उनका लहजा रहा है, उसमें किसी तरह का बदलाव नहीं आया. लम्बे राजनैतिक सफ़र के बाद भी उनके हाव-भाव, भाषा-शैली, बर्ताव, आचरण आदि में परिपक्वता की कमी दिखी, भले ही स्थिति सदन में हो, सदन के बाहर हो, मंच पर हो या फिर पदयात्रा में हो. संसद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गले लगने के बाद आँख मारना, निलंबित किए विपक्षी सांसदों के विरोध प्रदर्शन के समय राज्यसभा के सभापति की मिमिक्री करने का वीडियो खुद राहुल गांधी बनाते दिखे. इसी तरह भाजपा के केन्द्र में आने के बाद राहुल गांधी ने जब भी अपने भाषणों में, प्रेस कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जिक्र किया तो उनके लिए अशालीन, अमर्यादित शब्दावली का ही प्रयोग किया. प्रधानमंत्री के लिए पनौती, जेबकतरा, हत्यारा, भाग जायेगा, नरेंद्र मोदी कांपने लगा, वो झूठ बोलना शुरू कर देता है आदि शब्दावली का प्रयोग करना राहुल गांधी के लिए आम बात है.

 

एक मिनट को मान लिया जाये कि अभी तक की शब्दावली, राहुल की गतिविधि महज एक सांसद के तौर पर थी. तब किसी संवैधानिक पद पर न होने के कारण संभवतः वे उसकी गरिमा, महत्ता को न समझ पाते हों. हालाँकि ऐसा समझना भी अपने आपमें एक भूल होगी क्योंकि उनके परिवार ने मात्र सांसद ही नहीं दिए हैं बल्कि प्रधानमंत्री दिए हैं. अब जबकि वे खुद एक संवैधानिक पद पर हैं, संवैधानिक पद की गरिमा को, उसके आचरण को उन्होंने अपने परिवार में ही देखा है तब कम से कम ये अपेक्षा बनती ही है कि वे मर्यादित आचरण का परिचय देंगे. कहीं ऐसा न हो कि उनसे मर्यादित आचरण की अपेक्षा रखने वाले देशवासी उनके पिता की तरह कहें कि हमें देखना है, हम देख रहे हैं, हम देखेंगे. देश की संसद को भी एक मजबूत नेता प्रतिपक्ष की आवश्यक्ता है. आखिर वो उनकी आवाज और प्रतिनिधि है जो सत्ता और सरकार से मतभेद रखते हैं; जो सत्तारूढ़ दल की नीतियों, कार्यशैली में विश्वास नहीं करते. लोकतंत्र में विरोध भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि समर्थन. आशा है राहुल गांधी उस परिपक्वता को प्रदर्शित करेंगे जिससे असहमति और विरोध का स्वर भी सदन में सम्मान और उचित स्थान पा सके.

09 जून 2024

नरेन्द्र मोदी से पहले भाजपा से तीन बार प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी

नरेन्द्र मोदी से पहले भाजपा से तीन बार प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी.


आज नरेन्द्र मोदी ने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली है. हम सभी हर्षित, उत्साहित हैं. यहाँ अति-उत्साह, हर्ष में अपनी-अपनी पोस्ट में उनके तीसरी बार प्रधानमंत्री की शपथ लेने की बात लिख रहे हैं, वे थोड़ा सा संशोधन करते हुए उसे 'लगातार तीसरी बार' लिखें.

 

तीन बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वालों में जवाहर लाल नेहरू के बाद अटल बिहारी वाजपेयी भी रहे हैं. ये बात और है कि अटल जी लगातार तीन बार शपथ लेने वालों में नहीं थे, जैसे कि नेहरू जी रहे और अब मोदी जी हैं.

 



अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री के रूप में तीन बार निम्न समयावधि में रहे.

पहली बार 1996 में 13 दिनों के लिए

दूसरी बार 1998 में 13 महीने की अवधि के लिए

तीसरी बार 1999 में पूर्ण कार्यकाल पाँच वर्ष के लिए...

14 मार्च 2024

आर्थिक सम्पन्नता से होगी वैतरणी पार

लोकसभा चुनावों की सुगंध चारों तरफ फैलने लगी है. इस बार का लोकसभा चुनाव जहाँ एक तरफ विपक्षी गठबंधन के लिए अग्निपरीक्षा जैसा है वहीं भाजपा के लिए खुद को निखारने जैसा है. विगत दस वर्षों के कार्यों को देखने के बाद शायद ही किसी राजनैतिक विश्लेषक को केन्द्र में भाजपानीत सरकार के प्रति संशय हो. इस लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए प्रतिद्वंद्विता स्वयं से ही है, निखारना भी स्वयं को है, साबित भी स्वयं को करना है. विगत दस वर्षों के कार्यकाल में नरेन्द्र मोदी द्वारा किये गए कार्यों, उनके द्वारा लिए गए अनेक साहसिक निर्णयों के द्वारा यह निर्धारित हो चुका है कि वे देशहित में किसी भी तरह का साहसिक निर्णय लेने से पीछे नहीं हटते हैं.

 

उनके इन्हीं कार्यों, निर्णयों के आधार पर सहज स्वीकार्यता बनी हुई है कि इस लोकसभा चुनाव में जनादेश प्राप्त करने के बाद वे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी कर लेंगे. देश में अभी तक हुए सत्रह लोकसभा चुनावों में जवाहर लाल नेहरू के अतिरिक्त किसी को भी लगातार तीन बार जनादेश नहीं मिला है. नेहरू जी के नेतृत्व में 1952, 1957 और 1962 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस विजयी हुई थी. भाजपा द्वारा ‘अबकी बार, चार सौ पार’ का नारा ऐसे ही नहीं दिया जा रहा है. ऐसा अनुमान है कि नरेन्द्र मोदी अपने तमाम कार्यों, निर्णयों के आधार पर कांग्रेस के एक और कीर्तिमान पर अपनी नजर बनाये हुए हैं. अभी तक के लोकसभा चुनावों में वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उसी वर्ष संपन्न हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने कीर्तिमान रचते हुए ऐतिहासिक 415 सीटों के साथ केन्द्र में सरकार बनायी थी. नरेन्द्र मोदी और भाजपा का पूरा प्रयास रहेगा कि अपने कार्यों के चलते वे इस ऐतिहासिक संख्या को छू सकें.

 



जिस तरह की राजनैतिक हलचल मची हुई है, जिस तरह से विपक्ष के क्रियाकलाप हैं, जिस तरह से उनके द्वारा बयानबाजी की जा रही है, जिस तरह से मतदाताओं का रुख है उसे देखकर इस लोकसभा में भाजपा को जनादेश मिलना मुश्किल नहीं लग रहा है. इसके पीछे नरेन्द्र मोदी के वे तमाम कार्य और निर्णय हैं जो उन्होंने पूरे साहस के साथ पूरे किये हैं. इन कार्यों में चाहे नोटबंदी हो, 370 की समाप्ति हो, तीन तलाक का मामला हो, राममंदिर निर्माण हो, नारी शक्ति वंदन अधिनियम हो, नागरिकता संशोधन अधिनियम हो या फिर समान नागरिक संहिता जैसा मुद्दा हो. असल में इन कार्यों को भाजपा के थिंक टैंक द्वारा, उनके सहयोगियों द्वारा तो खूब प्रचारित-प्रसारित किया गया मगर उन अनेकानेक कार्यों पर विषद चर्चा कभी नहीं की गई जो जनहित से जुड़े रहे, जो आर्थिक नीतियों से जुड़े रहे. उक्त तमाम विषयों को विरोधियों द्वारा बार-बार आलोचनात्मक रूप में उठाते हुए सरकार की आलोचना की गई कि उसके द्वारा गरीबी, स्वास्थ्य, मंहगाई, रोजगार आदि के लिए किसी भी तरह का कार्य नहीं किया गया. इन बिदुओं पर भाजपा के रणनीतिकारों द्वारा भी जनमानस के बीच जाने का प्रयास नहीं किया गया. आम जनता को यह समझाने का प्रयास ही नहीं किया गया कि मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार द्वारा महज जम्मू-कश्मीर, अयोध्या, वाराणसी आदि पर ही कार्य नहीं किया गया बल्कि आयुष्मान योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, बालिका समृद्धि योजना, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया आदि के द्वारा देश की अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर खड़ा करने का कार्य किया है.

 

2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से अद्यतन भारतीय राजनीति को दो-दो दशकों के तुलनात्मक रूप में देखा जाने लगा है. इसमें पहला मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाला 2004-2014 का संप्रग कार्यकाल और दूसरा नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाला 2014-2024 का राजग कार्यकाल है. यहाँ इन दो-दो दशकों के एक-एक पक्ष को विश्लेषित कर पाना संभव नहीं है मगर कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं को अवश्य ही दर्शाया जा सकता है. जब भी किसी सरकार के कार्यों का आकलन किया जाता है तो मंहगाई, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत संरचना आदि पर विशेष नजर रखी जाती है. तुलनात्मक रूप में देखें तो नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार ने प्रति व्यक्ति वार्षिक आय, रसोई गैस कनेक्शन, आवास, शौचालय, शिक्षा, विदेशी मुद्रा भंडार, आधारभूत संरचना, मातृत्व सेवाओं आदि में जबरदस्त उपलब्धि प्राप्त की है. उज्ज्वला योजना, सस्ते आवास योजना, शौचालय निर्माण के द्वारा मोदी सरकार ने जन-जन में, गरीब तबके में अपनी पैठ बनाई है. 2004 में रसोई गैस कनेक्शन की संख्या 14.5 करोड़ थी जो 2023 में 31.4 करोड़ हो गई. स्वच्छता के प्रति गम्भीर मोदी सरकार ने शौचालय के निर्माण में सकारात्मकता दिखाई. अपने दोनों कार्यकाल में 11.5 करोड़ शौचालयों का निर्माण करके मोदी सरकार ने महिलाओं, बहू-बेटियों को खुले में शौच जाने की शर्मिंदगी, मुसीबत से छुटकारा दिलवाया. आश्चर्य की बात है कि संप्रग सरकार के दो दशकों में महज 1.8 करोड़ शौचालयों का ही निर्माण करवाया जा सका था. महिलाओं के प्रति संवेदनशील मोदी सरकार ने मातृत्व लाभार्थियों के प्रति विशेष जागरूकता दिखाई है. उनके कार्यकाल में ऐसे लाभार्थियों की संख्या 9.9 लाख के मुकाबले 559 लाख तक पहुँची.

 

भाजपा, मोदी विरोधियों द्वारा आये दिन मँहगाई, आर्थिक स्तर आदि को लेकर हमलावर रुख अपनाया जाता है. बयानबाजियों के लिए किसी भी स्तर तक जाकर जनमानस को बरगलाया जा सकता है किन्तु यदि तथ्यों की, आँकड़ों की बात की जाये तो कुछ अलग ही परिदृश्य नजर आता है. संप्रग सरकार के अंतिम दिनों में विदेशी मुद्रा कोष की स्थिति अत्यंत ही दयनीय बनी हुई थी. मँहगाई की औसत दर भी अपने चरम पर थी. मोदी सरकार द्वारा इन क्षेत्रों में विशेष प्रयास किये गए. दूसरे देशों से लगातार संपर्क, खाड़ी देशों से दोस्ताना सम्बन्ध आदि के चलते समय के साथ आर्थिक स्थिति में सुधार आया. विदेशी मुद्रा इस जनवरी में 617 अरब डॉलर था और मंहगाई की औसत दर वर्ष 2023 में 5.1 प्रतिशत रही. इस तरह के आर्थिक माहौल के चलते ही अनेक विदेशी कम्पनियों ने भारत का रुख किया. निवेश की जबरदस्त स्थिति के चलते ही देश ने पहली बार भारतीय वस्तुओं के निर्यात को 400 अरब डॉलर के पार किया. इस तरह की आर्थिक स्थिति के कारण ही आज भारत दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. 2023 में देश की जीडीपी 3.7 लाख करोड़ हो गई है और इसके 2024 में 4.1 लाख करोड़ रहने का अनुमान है.

 

वर्तमान में नरेन्द्र मोदी के कार्यों-निर्णयों ने उनके कद को अत्यंत विराट स्वरूप दे दिया है. मुद्दा चाहे राष्ट्रीय महत्त्व का हो या फिर क्षेत्रीय महत्त्व का प्रत्येक स्तर पर मोदी सरकार की सहभागिता दिखाई देती है. जहाँ उनके द्वारा सामाजिक क्षेत्र में सक्रियता दिखाते हुए राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, पोषण, आवास आदि की समस्या को दूर करते हुए 24.8 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का कार्य किया गया वहीं विदेशी मुद्रा भंडार, टैक्स संरचना, नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता, बिजनेस रैंकिंग आदि में बहुआयामी परिवर्तन  करके देश की अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलवाई है. आज जिस तरह से देश का आर्थिक, सामाजिक ढाँचा सुधारात्मक मोड में है, लोगों की क्रय-क्षमता बढ़ी है, ग्रामीण अंचलों तक बिजली ने अपनी पहुँच बनाई है, मूलभूत सुविधाओं ने महिलाओं की जीवन-शैली को सहज बनाया है उससे जनमानस में नरेन्द्र मोदी के प्रति, सरकार के प्रति विश्वास बढ़ा है. निश्चित ही यही विश्वास भाजपा को, नरेन्द्र मोदी को इस लोकसभा चुनावी वैतरणी सफलतापूर्वक, सहजतापूर्वक पार करवा देगा. 





 

03 फ़रवरी 2024

सैन्य हाथों में पाकिस्तानी लोकतंत्र

भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान में इसी आठ फरवरी को आम चुनाव होने हैं. इमरान खान जेल में बंद होने के कारण भले ही चुनाव मैदान से बाहर हैं मगर चुनावी लड़ाई उनके और नवाज़ शरीफ़ के बीच ही है. वैश्विक स्तर पर अनेक देशों की नजरें इस चुनाव पर लगी हैं. अमेरिका के विदेश विभाग ने बयान जारी करते हुए कहा है कि वे पाकिस्तान में अभिव्यक्ति की आजादी, विधायी अधिकारों के उल्लंघन को लेकर चिंतित हैं. पाकिस्तानी जनता को अपने मौलिक अधिकारों का इस्तेमाल कर भविष्य के नेता को चुनने का अधिकार होना चाहिए. यह बयान ऐसे समय में आया है जबकि पाकिस्तानी सेना पर आरोप लगाया जा रहा है कि वह पाकिस्तानी लोकतंत्र को निरंकुश तरीके से प्रभावित कर रही है. पाकिस्तान की एक वरिष्ठ पत्रकार मलीहा लोधी, जो राजनयिक भी रह चुकी हैं, ने एक रिपोर्ट में लिखा है कि पाकिस्तान के वर्तमान सैन्य प्रतिष्ठान का मुख्य ध्येय यह सुनिश्चित करना है कि इमरान खान प्रधानमंत्री न बनने पाएँ. इसी तरह की बात अमेरिकी समाचार-पत्र द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में है. उसका कहना है कि पाकिस्तान में राजनेताओं पर हो रही कार्रवाई साफ दिखाई दे रही है और इन्हीं वजहों से पाकिस्तान के चुनाव की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में है. पाकिस्तानी सेना का चुनाव में दखल है और पीटीआई के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है.

 



किसी न किसी रूप में सेना के नियंत्रण में चलता 2024 का चुनाव वैसा ही नजर आ रहा है जैसा कि 2018 का आम चुनाव था, बस राजनीतिज्ञों की स्थिति बदल गई है. 2018 का चुनाव नवाज़ शरीफ़ के बगैर हुआ था और 2024 का चुनाव इमरान खान के बिना हो रहा है. उस चुनाव में नवाज़ शरीफ़ भ्रष्टाचार के मामले में सजा मिलने के कारण जेल में थे और चुनाव नहीं लड़ सके थे. इस बार ऐसी स्थिति में इमरान खान हैं. उनको और उनकी पत्नी भ्रष्टाचार के एक मामले में चौदह साल की सजा मिलने पर जेल में हैं. इसी तरह सरकारी गुप्त भेद जाहिर करने के एक अन्य मामले में इमरान खान को पहले ही दस वर्ष की कैद सुनाई जा चुकी है. ऐसा आरोप लगातार लगता रहा है कि 2018 में नवाज़ शरीफ़ के और अब 2024 में इमरान खान के जेल जाने में पाकिस्तानी सेना का हाथ रहा है. 1999 में नवाज़ शरीफ़ के कार्यकाल में सैन्य तख़्तापलट हुआ था. उनके तीसरे कार्यकाल, वर्ष 2013 में भी उनके और सेना के बीच मतभेद खुलकर सामने आये थे, जिसके परिणामस्वरूप नवाज़ शरीफ़ सत्ता से बाहर हो गए थे. अभी कुछ महीने पहले ही उनको सभी आरोपों से बरी कर दिया गया और उनके चुनाव लड़ने पर लगी आजीवन रोक को भी असंवैधानिक बताया गया.

 

कुछ इसी तरह की कहानी इमरान खान की भी है. 2018 में उनकी छवि पाकिस्तान का भविष्य बदलने वाले नेता के रूप में बन रही थी. इमरान खान अपने भाषणों में वंशवाद की राजनीति को ख़त्म करने, भ्रष्ट नेताओं को जेल में डालने, न्यायपालिका में बदलाव करने और युवाओं को नौकरी देने की बात कर रहे थे. उस समय उनके विरोधियों द्वारा आरोप लगाया जा रहा था कि वे सेना के हाथों की कठपुतली बने हुए है. ऐसा माना भी जाता है कि सेना के प्रभाव और हस्तक्षेप के चलते इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन सके थे. कालांतर में इमरान के कार्यकाल में पाकिस्तान में आर्थिक हालात ख़राब हुए, मँहगाई बढ़ी, दैनिक उपभोग की वस्तुओं की कमी होने लगी, मीडिया पर पाबंदी लगाई गई, कई विपक्षी नेता जेल भेजे गए. इन घटनाओं ने जहाँ इमरान खान की लोकप्रियता में कमी की वहीं सेना के साथ भी उनके सम्बन्धों में कड़वाहट पैदा की.

 

नवम्बर 2022 में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा द्वारा अपने चहेते लेफ्टिनेंट जनरल असीम मुनीर को नया सेनाध्यक्ष बनवाया गया. नए सेनाध्यक्ष का पद सँभालने के बाद जनरल मुनीर ने लगातार यही प्रयास किया कि सबसे पहले उन व्यक्तियों पर कार्यवाही का चाबुक चलाया जाए जो किसी भी रूप में इमरान खान का नज़दीकी रहा हो अथवा उनकी सरकार का सक्रिय मददगार रहा हो. इसके पीछे इमरान खान और जनरल मुनीर के बीच की व्यक्तिगत दुश्मनी मानी जा रही है. ऐसा इसलिए क्योंकि प्रधानमंत्री रहते हुए इमरान खान ने ही अड़ंगा लगाते हुए मुनीर की नियुक्ति आईएसआई महानिदेशक के रूप में नहीं होने दी थी. इसका बदला मुनीर ने इस रूप में लिया कि इमरान खान को हटाये जाने के बाद वे पहले आईएसआई मुखिया बने उसके बाद सेनाध्यक्ष भी बने. व्यक्तिगत खुन्नस के चलते ही इमरान खान अनेक मुक़दमे झेलते हुए जेल में बंद हैं.

 

यह पाकिस्तानी लोकतंत्र की विडम्बना है कि वहाँ की राजनीति, सत्ता कभी भी सेना से मुक्त होकर अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं बना सकी है. इन चुनावों में वहाँ की आंतरिक समस्याओं, राजनीतिक पार्टियों के अपने विरोधाभासों के कारण भले ही भारत विरोधी बयान सामने न आये हों; भले ही इमरान खान ने प्रधानमंत्री के रूप में कई बार भारत के साथ बातचीत से मुद्दे सुलझाने पर जोर दिया; भले ही नवाज़ शरीफ़ भारत के साथ अच्छे सम्बन्ध बनाने का वादा करते आये हैं मगर अंतिम कदम वहाँ की सेना के मंशानुरूप ही उठाना पड़ता है. ऐसे में पाकिस्तान के इन चुनावों में परिणाम कुछ भी रहें, सत्ता में कोई भी पार्टी आये, प्रधानमंत्री कोई भी बने मगर भारत के साथ सम्बन्ध वही चिर-परिचित रूप में ही रहेंगे क्योंकि जनरल मुनीर की मानसिकता भारत से इत्तेफाक रखने वाली नहीं है. 





 

28 मई 2023

नया संसद भवन देश को समर्पित

देश आज़ादी का अमृतकाल मना रहा है और इसी काल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को स्वदेशी, नया संसद भवन समर्पित किया. पारंपरिक पूजा-पाठ के द्वारा नए संसद भवन का उद्घाटन समारोह आरम्भ हुआ. इसमें प्रधानमंत्री द्वारा ऐतिहासिक और धार्मिक सेंगोल को भी स्थापित किया गया. इस नए संसद भवन की आधारशिला 10 दिसंबर 2020 को रखी गई थी. इस भवन को आर्किटेक्ट बिमल पटेल ने डिजाइन किया और निर्धारित समयसीमा के भीतर यह बनकर तैयार भी हो गया. 




देश को मिला नया संसद भवन चार मंजिला है. 64 हजार 500 वर्ग मीटर में बने इस नए संसद भवन में तीन द्वार हैं, इन्हें ज्ञान द्वार, शक्ति द्वार और कर्म द्वार नाम दिया गया है. लोकतंत्र का प्रतीक संसद भवन 862 करोड़ रुपये की लागत में बनकर तैयार हुआ है. इस नए संसद भवन में संविधान हॉल है. इसी हॉल में संविधान की प्रति रखी जाएगी. संविधान हॉल के एक तरफ लोकसभा और दूसरी तरफ राज्यसभा है. नए संसद भवन में लोकसभा को 3015 वर्ग मीटर के क्षेत्र में तैयार किया गया है. इसे राष्ट्रीय पक्षी मयूर थीम पर बनाया गया है. राज्यसभा कुल 3,220 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में राष्ट्रीय फूल कमल थीम पर बनाया गया है.




भारत की प्रगति और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले नए संसद भवन के लिए एक विश्व स्तरीय बुनियादी ढाँचा निर्मित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाले कारीगरों को स्किल इंडिया ने प्रमाणित किया है. इनके द्वारा नए संसद भवन का फर्नीचर ऐसे तैयार किया है कि लोकसभा में 888 और राज्यसभा में 384 सदस्यों के बैठने की व्यवस्था है. संयुक्त सत्र के दौरान लोकसभा भवन में 1272 सदस्यों के बैठने की व्यवस्था है. नए संसद भवन के लोकसभा में सेंगोल की स्थापना की गई है. इसे लोकसभा स्पीकर के आसन के पास लगाया गया है. सेंगोल राजदंड सिर्फ सत्ता का प्रतीक नहीं बल्कि राजा के सामने हमेशा न्यायशील बने रहने और जनता के प्रति समर्पित रहने का भी प्रतीक रहा है. 






 

11 जनवरी 2022

आखिर शास्त्री जी के साथ क्या हुआ था?

11 जनवरी, देश के दुर्भाग्य की तारीख. इस दिन देश के लाल ने विदेशी धरती पर अंतिम साँस ली थी. जी हाँ, आप सही समझ रहे हैं. देश के दूसरे और अत्यंत लोकप्रिय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी के बारे में ही ये बात कही गई. वर्ष 1966 को ताशकंद किस कारण से शास्त्री जी का जाना हुआ, वहाँ समझौते के बाद की उनकी गतिविधियाँ क्या रहीं, रात को कैसे भगदड़ मची इस बारे में बहुत बार वही सामान्य सी बात लिखी जा चुकी है, हम सभी के द्वारा बराबर पढ़ी भी जाती रही है. किसी भी सरकार की तरफ से शास्त्री जी की सामान्य और असामान्य मृत्यु के बीच की बारीक सी रेखा न मिटाई जा सकी, झीना सा पर्दा गिराया न जा सका. ऐसा क्यों होता रहा, क्यों हुआ ये बस सवाल बने हुए हैं मगर इनके जवाब मिलते न तब दिखे थे और न अब दिख रहे हैं.


शास्त्री जी की मृत्यु से जुड़े तमाम सारे मुद्दों, पहलुओं को अत्यंत नजदीक से अध्ययन करने वाले अनुज धर कुछ समय पूर्व आई विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘द ताशकंद फाइल्स से बहुत आशान्वित दिखाई दे रहे इसके पीछे वे अमेरिका की एक फिल्म का हवाला देते हैं, जिसके आने के बाद से अमेरिका में खलबली मच गई थी. यह फिल्म जॉन एफ. कैनेडी की हत्या से सम्बंधित तमाम दावों पर आधारित थी. बताया जाता है कि इस फिल्म के आने के बाद अमेरिका में कैनेडी की हत्या की सच्चाई जानने के लिए लोगों का दबा आक्रोश बाहर निकल आया था. ‘द ताशकंद फाइल्स फिल्म के आने के बाद ऐसा कुछ भारत देश में तो दिखाई नहीं दिया. क्या इसलिए कि यहाँ कि जनता वास्तविक जीवन पर बनी ऐसी फिल्मों को भी मनोरंजन की दृष्टि से देखती है? कहीं ऐसा तो नहीं कि यहाँ फिल्मों का सम्बन्ध नाचने-गाने से जोड़ दिया गया है? कहीं ऐसा भी तो नहीं कि फिल्मों का तात्पर्य कमाई करना, करोड़ों रुपयों के क्लब में शामिल होना बना हुआ है? या फिर देशवासी शास्त्री जी की मृत्यु का सच जानने के इच्छुक नहीं?




इस फिल्म की बात को एक तरफ कर भी दिया जाये तो ऐसा सच जान पड़ता है कि आम भारतीय नागरिक अब किसी भी रूप में देश की दो संदिग्ध मौतों के खुलासे के लिए लालायित नहीं है. उसे इसकी फ़िक्र नहीं कि देश के दो अत्यंत लोकप्रिय व्यक्तित्वों की मृत्यु का सच सामने आये. शास्त्री जी की तरह ही नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु का सच अभी भी परदे के पीछे छिपा हुआ है. बहरहाल, आज चर्चा शास्त्री जी की. एक पल को सोचिये कि देश का प्रधानमंत्री देश से बाहर किसी समझौते के लिए जाए और वहाँ से उसका जीवित आना न हो. मृत्यु भी सामान्य सी स्थिति में न हुई हो. उस व्यक्ति का पार्थिव शव जब विदेश से अपनी धरती पर लाया जाये तो उसका पोस्टमोर्टेम न करवाया जाये. शव भी देखने में सामान्य न समझ आ रहा हो. ऐसी तमाम स्थितियों के बाद सबकुछ सामान्य तरीके से गुजर गया. इतने वर्षों के बाद भी शास्त्री जी के परिजन कैसे अपने दिल को समझाते होंगे? कैसे उस समय में देश की सरकार ने चुप्पी साध ली होगी? कैसे अभी तक तमाम सरकारें ख़ामोशी बनाये बैठी हैं?


और भी बहुत सारे सवाल हैं जो मन को व्यथित कर जाते हैं. दिल-दिमाग में उथल-पुथल उस समय और बढ़ जाती है जबकि अनुज धर की पुस्तक ‘शास्त्री के साथ क्या हुआ था? में दिए गए तथ्यों, विचारों, रिपोर्टों, बयानों आदि को गंभीरता से पढ़ा जाता है. पृष्ठ दर पृष्ठ बहुत कुछ सामने आता रहता है. चूँकि किसी भी पुस्तक के साथ वैधानिकता का सवाल जुड़ा होता है, ऐसे में उस पुस्तक के अंश यहाँ दे पाना हमारे लिए सहज नहीं. इसके बाद भी कह सकते हैं कि अनुज धर ने बहुत से तथ्यों के आलोक में बहुत सी स्थितियों को स्पष्ट किया है. बहुत से उपायों, कदमों की भी सम्भावना व्यक्त की है.


फिलहाल तो हम सभी शास्त्री जी को बस श्रद्धांजलि ही दे सकते हैं. सच कितना क्रूर हो सकता है, ये तो उसी समय पता चलेगा जबकि झीना सा पर्दा गिरे या फिर वो बारीक सी रेखा मिटे.

25 दिसंबर 2020

सादगी की प्रतिमूर्ति अटल जी

उत्तर प्रदेश में आगरा जनपद के प्राचीन स्थान बटेश्वर के मूल निवासी पण्डित कृष्ण बिहारी वाजपेयी मध्य प्रदेश की ग्वालियर रियासत में अध्यापक थे. वहीं शिन्दे की छावनी में 25 दिसंबर 1924 को ब्रह्ममुहूर्त में उनकी सहधर्मिणी कृष्णा वाजपेयी की कोख से अटल जी का जन्म हुआ था. पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर में अध्यापन कार्य तो करते ही थे इसके अतिरिक्त वे हिन्दी और ब्रज भाषा के सिद्धहस्त कवि भी थे. पुत्र में काव्य के गुण वंशानुगत परिपाटी से प्राप्त हुए. महात्मा रामचन्द्र वीर द्वारा रचित अमर कृति विजय पताका पढ़कर अटल जी के जीवन की दिशा ही बदल गयी. अटल जी की बी०ए० की शिक्षा ग्वालियर के विक्टोरिया कालेज (वर्तमान में महारानी लक्ष्मीबाई कालेज) में हुई. छात्र जीवन से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने.

 

कानपुर के डी०ए०वी० कॉलेज से राजनीति शास्त्र में एम०ए० की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की. उसके बाद उन्होंने अपने पिताजी के साथ-साथ कानपुर में ही एल-एल०बी० की पढ़ाई भी प्रारम्भ की. पिता-पुत्र की जोड़ी के एकसाथ पढ़ाई करने, परीक्षा देने का यह अनुकरणीय उदाहरण खूब चर्चा में रहा. बाद में अपनी यह पढ़ाई बीच में ही छोड़कर वे पूरी निष्ठा से संघ के कार्य में जुट गये. डॉ० श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के निर्देशन में राजनीति का पाठ तो पढ़ा ही साथ-साथ पाञ्चजन्य, राष्ट्रधर्म, दैनिक स्वदेश और वीर अर्जुन जैसे पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादन का कार्य भी कुशलता पूर्वक करते रहे.

 



अटल जी भारतीय जनसंघ की स्थापना करने वालों में से एक थे. सन् 1968 से 1973 तक वह उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे. सन् 1952 में उन्होंने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा परन्तु सफलता नहीं मिली. बाद में सन् 1957 में बलरामपुर से जनसंघ के प्रत्याशी के रूप में विजयी होकर लोकसभा में पहुँचे. सन् 1957 से 1977 तक जनता पार्टी की स्थापना तक वे बीस वर्ष तक लगातार जनसंघ के संसदीय दल के नेता रहे. मोरारजी देसाई की सरकार में सन् 1977 से 1979 तक विदेश मन्त्री रहे और विदेशों में भारत की छवि बनायी. सन 1980 में जनता पार्टी से असन्तुष्ट होकर इन्होंने जनता पार्टी छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी की स्थापना में मदद की. 1980 में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद का दायित्व अटल जी को सौंपा गया. वे लोकसभा के अतिरिक्त दो बार राज्यसभा के लिये भी निर्वाचित हुए. लोकतन्त्र के सजग प्रहरी अटल बिहारी वाजपेयी ने सन् 1996 में प्रधानमन्त्री के रूप में देश की बागडोर संभाली. पहली बार उनकी सरकार महज 13 दिन तक रह सकी. कालांतर में तेरह महीने और फिर पूरे पाँच वर्ष के लिए दो बार वे फिर प्रधानमंत्री बने. गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री के रूप में अटल जी पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने पाँच वर्ष तक सरकार चलाई. सर्वोन्मुखी विकास के लिये किये गये योगदान तथा असाधारण कार्यों के लिये 2015 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया.

 

आज अटल जी के जन्मदिन पर उनको सादर श्रद्धांजलि.


.
वंदेमातरम्

10 दिसंबर 2020

आत्मनिर्भर भारत निर्माण का गवाह बनेगा नया संसद भवन

आज, 10 दिसम्बर 2020 को भारतीय इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण तिथि के रूप में स्वीकारा जायेगा. आज का दिन संसदीय लोकतंत्र के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. इस दिन वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के कर-कमलों से नवीन संसद भवन का भूमि पूजन संपन्न हुआ. नौ दशक से अधिक समय से जिस भवन में देश की संसद अपना कार्य करती आ रही है यदि सब सही रहा तो सन 2022 में ये सारी गतिविधियाँ नवीन संसद भवन में संपन्न हुआ करेंगीं. वर्ष 2022 में स्वतंत्रता की 75 वीं वर्षगाँठ मनाये जाने के सुअवसर पर राष्ट्र को मिलने वाली यह अनूठी धरोहर निश्चित ही हमारे लोकतंत्र की जड़ों को मज़बूत करने का कार्य करेगी.




नवीन संसद भवन के साथ-साथ अनेक इमारतों का निर्माण भी किया जाना प्रस्तावित है. नए संसद भवन का भूमि पूजन करने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि नए भवन का निर्माण समय और जरूरतों के हिसाब से बदलाव लाने का प्रयास है और आने वाली पीढ़ियाँ इसे देखकर गर्व करेंगी कि यह स्वतंत्र भारत में बना है. उन्होंने कहा कि पुराने संसद भवन ने स्वतंत्रता के बाद के भारत को दिशा दी है तो नया भवन आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का गवाह बनेगा. पुराने संसद भवन में देश की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए काम हुआ है तो नए भवन में 21वीं सदी के भारत की आकांक्षाएँ पूरी की जाएँगी. चार मंजिला नए संसद भवन का निर्माण 971 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत से 64500 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में किए जाने का प्रस्ताव है.




प्रस्तावित भवन में लोकसभा के सदन में कुल 888 सदस्यों के बैठने की क्षमता होगी, वहीं संयुक्त सत्र में इसे 1224 सदस्यों तक बढ़ाने का विकल्प भी रखा जाएगा. राज्यसभा के सदन में कुल 384 सदस्य बैठ सकेंगे और भविष्य को ध्यान में रखते हुए इसमें भी जगह बढ़ाने का विकल्प रखा जाएगा. वर्तमान में लोकसभा सदन में कुल 543 सदस्य बैठ सकते हैं, वहीं राज्यसभा में कुल 245 सदस्य. इस नए भवन का निर्माण वर्तमान संसद के भवन की सीमित क्षमताओं के चलते किया जा रहा है. वर्तमान संसद भवन ब्रिटिश कालीन है. इसका शिलान्यास 1921 में हुआ था. वर्तमान में बहुत से सांसदों ने मॉडर्न और हाईटेक फैसिलिटी की माँग की है. वर्तमान संसद भवन को मॉडर्न कम्युनिकेशन और भूकंपरोधी सुरक्षा व्यवस्था के साथ अपग्रेड नहीं किया जा सकता क्योंकि इससे इस 93 साल पुराने भवन को नुकसान पहुँच सकता है. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने कहा था कि इस पुराने संसद भवन को पुरातात्विक संपत्ति के तौर पर संरक्षित किया जाएगा.



.
वंदेमातरम्

29 दिसंबर 2015

शब्द नहीं मानसिकता बदली जाये


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मन की बात कि ‘शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों के लिए विकलांग की जगह दिव्यांग शब्द का उपयोग किया जाये’ उनकी व्यापक सोच का परिचायक है. उनकी इस सोच को परिलक्षित करती है कि वे समाज में विकलांगों के साथ होते आ रहे भेदभाव से भली-भांति परिचित हैं. इसी भेदभाव को दूर करने की दृष्टि से उन्होंने शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों के लिए ‘दिव्यांग’ शब्द का प्रयोग करने की बात कही. यहाँ एक बात गौर करने लायक है कि समाज के भीतर जिस तरह की मानसिकता विकलांगजनों को लेकर बनी हुई है अथवा उनके साथ जिस तरह का व्यवहार देखने को मिलता है क्या वो समस्या महज एक शब्द को बदल देने भर से दूर हो जाएगी? इससे पहले भी सरकारी स्तर पर शारीरिक अक्षम लोगों के लिए शब्दों में परिवर्तन किये जाते रहे हैं, कभी निःशक्तजन के रूप में तो कभी विकलांगजन के रूप में मगर सामाजिक रूप से, सरकारी रूप से विकलांगों के प्रति सोच में परिवर्तन देखने को नहीं मिला है. भेदभाव की एक अलग सी स्थिति उनके साथ हमेशा रही है. कहीं उनके साथ दया का भाव होता है तो कहीं उनके साथ तिरस्कार जैसी स्थिति देखने को मिलती है. इन स्थितियों में किंचित मात्र परिवर्तन शारीरिक अक्षम लोगों की खुद की सामाजिक, आर्थिक, पद-प्रतिष्ठा वाली स्थिति के चलते अवश्य हो जाता है किन्तु समग्र रूप में वे समाज के लिए विकलांग ही होते हैं, दया-दृष्टि के, हेय-दृष्टि के पात्र होते हैं.
.
प्रधानमंत्री का ‘दिव्यांग’ के साथ उनको दिव्यता का भाव प्रदान किये जाने का निहितार्थ भले ही विकलांगजनों के साथ हो रहे भेदभाव को दूर करना हो, भले ही उनको महज कृपा-पात्र न समझने का भाव रहा हो किन्तु सत्यता यही है कि मात्र शब्द परिवर्तन से कुछ नहीं होने वाला है. शाब्दिक रूप से दिव्यता का बोध कराने का ये कोई पहला उदाहरण नहीं है. इससे पहले भी हमारे समाज में अनादिकाल से स्त्रियों के लिए ‘देवी’ शब्द चलन में है, इसके बाद भी बहुतायत में महिलाओं की स्थिति को दैवीय रूप में स्वीकार ही नहीं किया गया है. बहुसंख्यक महिलाएँ आज भी तिरस्कृत सी हैं, शारीरिक अत्याचार सह रही हैं, शोषण का शिकार हो रही हैं. शाब्दिक रूप से दिव्य-भाव का बोध कराने के लिए, भेदभाव, तिरस्कार से बचाने के लिए शूद्रों के लिए ‘हरिजन’ शब्द चलन में लाया गया. इसके बाद भी उनके साथ भेदभाव में कमी नहीं आई, उनकी सामाजिक स्थिति में जो भी परिवर्तन आया वो ‘हरिजन’ शब्द के कारण नहीं वरन संवैधानिक रूप से मिले आरक्षण के कारण आया. ऐसे में विकलांगजनों को शाब्दिक दिव्यता बोध करवाने के बजाय आवश्यक है कि सामाजिक रूप से लोगों के भावों में परिवर्तन किया जाये. लोगों की मानसिकता में परिवर्तन किया जाये ताकि वे किसी भी विकलांगजन को दया की दृष्टि से, तिरस्कार की नजर से, कृपा करने के भाव से न देखें.
.
जहाँ तक सवाल दिव्य-भाव के बनाये जाने से लोगों की मानसिकता में परिवर्तन आने का है तो ये नितांत भ्रामक संकल्पना है. महज शाब्दिक रूप से दिव्य भाव जागृत हो रहे होते तो समाज में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार न होता. ये अपने आपमें सत्य है कि जब कोई भी व्यक्ति अपने कार्यों से, अपनी सेवाओं से, अपने विचारों से अनूठा कार्य करता है तो उसकी उपलब्धियाँ स्वतः ही उसको देवत्व का भाव प्रदान कर देती हैं, स्वयं ही उसको विशिष्ट बना देती हैं. ऐसा न केवल शारीरिक रूप से सामान्य व्यक्तियों के साथ वरन शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों के साथ भी हुआ है, जबकि उनकी उपलब्धियों के आधार पर समाज ने उनको देवत्व का बोध कराया है. वैसे व्यक्तिगत रूप से हमारा मानना है कि समाज में अकारण ही किसी व्यक्ति में, वर्ग में विशिष्ट का, देवत्व का भाव स्थापित कर देना भी समस्या को जन्म देता है. बेहतर हो कि व्यक्ति को व्यक्ति के भाव से देखा-समझा जाये. विकलांग को महज इस कारण से कृपा का पात्र न माना जाये कि वो अपने किसी शारीरिक अंग के कारण सामान्य रूप से परिचालन नहीं कर पा रहा है. किसी भी शारीरिक अक्षम व्यक्ति को महज इस कारण तिरस्कृत नहीं किया जाना चाहिए कि वो विकलांग होने के साथ-साथ आर्थिक रूप से अक्षम है. किसी भी विकलांग व्यक्ति को मिल रही सुविधाओं पर ये भान नहीं करवाया जाना चाहिए कि ऐसा करके समाज अथवा सरकार उसके ऊपर कोई एहसान कर रही है. ये हम सभी समझते हैं कि शारीरिक रूप से किसी भी अंग से अक्षम व्यक्ति को सामान्य जीवन व्यतीत करने में कुछ न कुछ कष्ट अवश्य ही होता होगा ऐसे में किसी भी तरह की सहायता उसके ऊपर एहसान नहीं वरन समाज की मुख्यधारा में उसको शामिल किये जाने का प्रयास मात्र होता है. ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘दिव्यांग’ शब्द की दिव्यता, उसके भावार्थ को समझते हुए विकलांगजनों को समाज की मुख्यधारा में शामिल करने हेतु, उनके साथ भेदभाव ख़तम करने हेतु निर्विकार भाव से कार्य करें और स्वयं में दिव्यता बोध जागृत करें, स्वयं को दिव्य महसूस करें.

.