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13 अक्टूबर 2008

राम की वास्तविकता और काल्पनिकता

अभी एक सिस्टर को संत का दर्जा मिला तो मन में एक ख्याल आया कि इसी बीच हिन्दू धर्म के आराध्य (चुनावी राजनीती में भाजपा के) श्री राम के बारे में भी थोड़ा सा कुछ लिख दिया जाए. स्थिति तो ये है कि आपने हिन्दू या राम पर कुछ कहा नहीं तो तमाम सारे लोग जो सोचने की शक्ति भी खो चुके हैं वे भी चिंतन करके आपके ऊपर शब्द-भेदी वाण चलाने लग जाते हैं. इसी कारण को ध्यान में रख कर लगा कि कुछ कहा जाए. राम की वास्तविकता, उनके अस्तित्व पर हमेशा से प्रश्न चिन्ह लगाये जाते रहे हैं. कभी कहा गया कि ये कोई एतिहासिक पात्र नहीं हैं, कभी कहा गया कि राम जैसा कोई भी भारत में नहीं हुआ, कभी कहा गया कि गोस्वामी तुलसी दास ने अपने महाकाव्य की सफलता के लिए एक पात्र का निर्माण किया आदि-आदि................

देखा जाए तो भगवान् राम का नाम ही ऐसा है कि जिसको देखो वही जुगाली करना शुरू कर देता है. हमारे बुंदेलखंड में कहा जाता है कि मिचकरियन (मेंढकों) को खांसी उठ रही है. आपने देखा होगा कि इस खांसी में काफ तो बहुत आता है और ये छूत का रोग तेजी से बाकियों को भी अपनी गिरफ्त में ले लेता है। भगवान् राम को लेकर अच्छी बातें इस समय कम होतीं हैं उनकी चर्चा बुराई के रूप में अधिक होती है. बुराई करने के लिए भी दो-तीन प्रकरण हैं और घूम-फ़िर कर इनकी सत्यता को जाने बिना ही राम को विवाद का केन्द्र-बिन्दु बना दिया जाता है.

इन प्रकरणों में एक है राम के द्बारा किया गया शम्बूक वध, शम्बूक वध को लेकर दलित समाज में बहुत ही आक्रोश है. वे तो अब दलित-साहित्य के सहारे ये तक साबित करने में लगे हैं कि राम से बड़ा पापी और शम्बूक से ज्यादा पुण्यात्मा कोई था ही नहीं. यहाँ विवाद इस बात का नहीं है कि दलित समाज आज राम को पापी और ग़लत साबित कर रहा है. समस्या तो ये है कि एक तरफ़ तो यही दलित समाज राम के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता. दलित-साहित्य के पुरोधा राम को काल्पनिक पात्र बताते-बताते अपना साहित्य रचे दाल रहे हैं वहीँ दूसरी तरफ़ शम्बूक वध पर राम की छीछालेदर किए जा रहे हैं. ये क्या बात हुई, पात्र काल्पनिक और उसकी घटना को सत्य माना जा रहा है.

अब यदि राम काल्पनिक हैं तो उनके किसी भी कार्य को उसी कल्पना की तरह देखना चाहिए और यदि शम्बूक का वध सही है तो ध्यान रखना होगा कि राम का अस्तित्व था, है, रहेगा. इसी तरह की घटना समाज में विखंडन की स्थिति पैदा करती है.

वैसे आपको याद हो तो भगवान् राम के अस्तित्व पर सवाल तो कांग्रेस पार्टी ने भी उठाये थे और हलफनामा भी अदालत में दिया था। रामसेतु को लेकर. अब यदि राम थे ही नहीं तो किस बात का राम सेतु और किस बात का विवाद पर यदि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी विजयादशमी को राम-लक्ष्मण की आरती उतारतीं हैं तो इसका मतलब कि राम का अस्तित्व आपको स्वीकार है.

अब कहा जायेगा कि ये आस्था का सवाल है, अपनी पसंद का सवाल है तो क्या आपने किसी को मिकी-माउस की, सुपरमैन की, स्पाईडरमैन की किसी हरकत पर विवाद करते देखा है? उसके आसमान में उड़ने पर, इमारतों में चढ़ने पर क्या विवाद करते देखा है? नहीं न......क्योंकि ये काल्पनिक हैं। अब जब राम काल्पनिक हैं तो शम्बूक वध पर विवाद कैसा, उनका नाम लेते लोगों पर साम्प्रदायिकता का शक कैसा, उनकी किसी भी घटना को दलित-विरोधी या समाज विरोधी क्यों मानना?

क्या कुछ और है वास्तविकता या काल्पनिकता का अर्थ?