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28 अगस्त 2023

सोशल मीडिया की भेड़चाल से बचने की आवश्यकता

वर्ष 2021 का समय था जबकि खबर आई थी कि दुनियाभर में सबसे ज्यादा प्रसिद्द सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक को Meta (मेटा) के नाम से जाना जाएगा. इस नाम परिवर्तन पर कम्पनी के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने बताया कि हम इसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक ही सीमित नहीं रखना चाहते हैं. अब जो हम करने जा रहे हैं, उसके लिए नए नाम के साथ आगे जाने की आवश्यकता है. मेटा का अर्थ ग्रीक भाषा में होता है हद से पार, कम्पनी के द्वारा नाम बदलने को लेकर एक कारण यह भी रहा कि वे इसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से कहीं आगे एक वर्चुअल दुनिया में ले जाना चाहते हैं. इसमें कम्पनी एक ऐसी वर्चुअल दुनिया बना रही है जहाँ लोग अपने कमरे में बैठकर एक समय में कई जगहों पर वर्चुअली रूप से अलग-अलग काम कर सकते हैं. इंटरनेट की इस नई दुनिया को मेटावर्स का नाम दिया गया है.

 



कम्पनी के सीईओ ने खुद इसका नाम बदलकर इसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म से कहीं और आगे ले जाने का सपना देखा जबकि इसी प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लोग भेड़चाल में फँसे हुए हैं. सोशल मीडिया पर आये दिन एक तरह की भेड़चाल शुरू होती है, जहाँ पर बिना सोचे-समझे इसके उपयोगकर्ता उसके अंधानुकरण में लग जाते हैं. आप सभी ने गौर किया होगा कि आये दिन सोशल मीडिया पर कुछ इस तरह की पोस्ट तेजी से वायरल होती हैं जिसमें किसी विशेष तारीख को रात के कॉस्मिक किरणों के पृथ्वी के करीब से गुजरने से इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को नुकसान होने, पृथ्वी को खतरा होने की बात कही जाती है. किसी पोस्ट में किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित बच्चे के इलाज के लिए धन का एकत्रण लाइक, शेयर आदि के द्वारा किया जाता है. कभी किसी लापता बच्चे को खोजने का निवेदन होता है, कभी किसी के गुम हुए कागजात के बारे में पोस्ट वायरल होती है. सोशल मीडिया पर एकदम से फ्री बैठा उपयोगकर्ता बिना कुछ आगा-पीछा सोचे ऐसी पोस्ट को शेयर करने में लग जाता है. आजकल इसी तरह की भेड़चाल सोशल मीडिया पर दिखाई दे रही है जहाँ पर मुफ्त में इस्तेमाल किये जा रहे प्लेटफ़ॉर्म को ही नोटिस देने वाली पोस्ट बुरी तरह से छाई हुई हैं.  

 

तेजी से और बुरी तरह से वायरल होती इस पोस्ट में फेसबुक को अपनी निजता का उल्लंघन न करने, अपनी फोटो, वीडियो आदि के सार्वजनिक न किये जाने के सम्बन्ध में चेतावनी, नोटिस दिए जा रहे हैं. आईपीसी की विशेष धारा का उल्लेख करते हुए फेसबुक पर कार्यवाही करने की बात इस पोस्ट में है. निजता के उल्लंघन न करने की, फोटो, वीडियो आदि को सार्वजनिक न करने की बात को लिखने वालों ने कभी विचार किया है कि इंटरनेट पर किसी भी प्लेटफ़ॉर्म का जब भी उपयोग किया जाता है तो उसकी बहुत सारी शर्तों, नियमों पर अपनी अनुमति दी जाती हैं. क्या कभी इन नियमों या शर्तों को पढ़ने की फुर्सत निकाली गई? क्या किसी भी प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग करने के पूर्व उसकी चरणबद्ध प्रक्रिया को पूरा करने की जल्दबाजी में हम सबने अपनी सहमति देने के पहले उनको पढ़ने की, समझने की कोशिश की?

 

आखिर हम सभी मुफ्त के ऐसे तमाम सारे एप्लीकेशन का उपयोग करने, उस प्लेटफ़ॉर्म पर अपने आपको सर्वाधिक सक्रिय दिखाने की अतिशय जल्दबाजी में भुला बैठते हैं कि अपने उपकरण में, चाहे वह कम्प्यूटर हो या फिर मोबाइल, हम ही उस सॉफ्टवेयर को भीतर तक झाँकने की अनुमति देते हैं. उसको अपने कॉन्टेक्ट्स, अपनी गैलरी, अपनी लोकेशन, अपना कैमरा, अपना माइक आदि का उपयोग करने की अनुमति देते हैं. ऐसा करने के बाद ही सम्बंधित एप्लीकेशन हमारे उपकरण में इंस्टॉल होती है और उसके बाद ही हम उसका उपयोग कर पाते हैं. ऐसा करने के बाद हमारे हाथ में निजता जैसी, गोपनीय जैसी कोई बात रह नहीं जाती है. सोशल मीडिया के मुफ्त में मिलते प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग करने की चाहत में हम स्वयं ही अपनी गोपनीयता, अपनी निजता किसी दूसरे सॉफ्टवेयर के हाथों में थमा देते हैं. अब पूर्व में दी गई हमारी अनुमति के आधार पर वह हमारे उपकरण में सेंधमारी करता रहता है; हमारी सक्रियता पर निगाह रखता है; हमारे क्रियाकलापों को देखता रखता है. क्या आपने कभी इस पर गौर नहीं किया कि सोशल मीडिया के किसी मंच पर आपकी उपस्थिति का स्वागत उन्हीं वस्तुओं, सेवाओं, उत्पादों के विज्ञापन से होती है जिनको आपने सर्च इंजन में खोजा होता है? क्या आपने कभी विचार किया है कि आपके विभिन्न एप्लीकेशन, विभिन्न वेबसाइट, विभिन्न प्लेटफ़ॉर्म के पासवर्ड भूल जाने की स्थिति में यही इंटरनेट आपको दूसरा पासवर्ड उपलब्ध करवा देता है?

 

ध्यान रखिये, इंटरनेट के उपयोग की स्थिति में अब हमारा-आपका कुछ भी गोपनीय नहीं है, कुछ भी व्यक्तिगत नहीं है. हमारी सारी की सारी जानकारी, क्रियाकलाप, घूमना-फिरना, खाना-पीना आदि किसी न किसी सर्वर के माध्यम से दूसरे हाथों में है. वायरल होती ऐसी अनावश्यक चेतावनी वाली पोस्ट से एकबारगी आप भले अपने आपको संतुष्ट कर लें मगर इंटरनेट की दुनिया में अपनी खुराफात के लिए सक्रिय तत्त्वों ने तो अपना काम कर ही लिया. देखा जाये तो अब हम सब इंटरनेट के गुलाम हैं. हमारे सभी कंप्यूटर, मोबाइल, तमाम संस्थान, अनेकानेक जानकारियाँ आदि किसी न किसी सर्वर के कब्जे में हैं. वर्तमान दौर में इंटरनेट से दूर रह पाना संभव नहीं ऐसे में यहाँ के आपराधिक तत्त्वों से बचने का उपाय सिर्फ सावधानी है, ऐसी बेवकूफी भरी पोस्ट का शेयर करना नहीं. इंटरनेट का उपयोग करके ज्ञानवान, प्रतिभावान बनिए न कि दूसरे के हाथों में खेलते हुए बेवकूफ बनिए.  

 






 

30 जून 2022

वर्ल्ड सोशल मीडिया डे : 30 जून

कुछ साल पहले तक सोशल मीडिया जैसे किसी शब्द की अवधारणा भी नहीं थी. आज स्थिति यह है कि व्यक्ति के अधिकतम काम सोशल मीडिया पर ही होते हैं, उसका अधिकतम समय सोशल मीडिया पर ही बीतने लगा है. ऐसा शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि किसी दिन एक ऐसा मंच उपलब्ध होगा जिसके माध्यम से अपने मित्रों से बातचीत की जा सकेगी, जहाँ से अपने मन की खरीददारी भी हो सकेगी. पढ़ने-लिखने का माध्यम भी यह मंच बनेगा. भले ही ऐसा सोचा न गया हो मगर किसी न किसी ने तो इसके बारे में कल्पना की होगी और उसी की काल्पनिक अवधारणा आज वास्तविक रूप में हमारे सामने है. आज सोशल मीडिया दुनिया भर के लोगों से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण मंच बना हुआ है. 




यह आज के समय में आश्चर्य ही होगा यदि कोई सोशल मीडिया से नहीं जुड़ा है. व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, इंस्टाग्राम आदि अनेक सोशल मीडिया मंच आज इंसान की ज़िन्दगी का महत्त्वपूर्ण भाग बने हुए हैं. सोशल मीडिया के बढ़ते महत्त्व को देखते हुए सन 2010 से प्रतिवर्ष 30 जून को वर्ल्ड सोशल मीडिया डे के रूप में मनाया जाना शुरू किया गया.


आज सोशल मीडिया पर फेसबुक बहुत बड़े और प्रसिद्ध प्लेटफ़ॉर्म के रूप में उपस्थित है. ऐसा लोगों का विचार है कि सोशल मीडिया पर यही पहला प्लेटफ़ॉर्म बनकर सामने आया. यहाँ आपको जानकर आश्चर्य होगा कि आज फेसबुक भले ही बहुत अधिक उपभोक्ता वाला मंच हो मगर यह पहला सोशल मीडिया मंच नहीं है. वैश्विक स्तर पर पहला सोशल मीडिया मंच सिक्स डिग्रीज था. जिसके फाउंडर एंड्रयू वेनरिच थे. इस सोशल मीडिया मंच को सन 1997 में न्यूयॉर्क में शुरू किया गया था. इसे सन 2001 में जब बंद किया गया तक इसके 35 लाख यूजर्स और लगभग सौ से अधिक कर्मचारी हुआ करते थे. फ्रेंडस्टर और लिंक्डइन इसके बंद होने के बाद शुरू हुए.


सन 2004 में फेसबुक के आने के बाद पूरा परिदृश्य ही बदल गया. फेसबुक ने इंटरनेट की दुनिया में हालचाल सी मचा दी. आज इस सोशल मीडिया मंच के लगभग तीन अरब यूजर्स हैं. फेसबुक के अलावा व्हाट्सएप, यूट्यूब, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि भी सबसे बड़े सोशल मीडिया मंच के रूप में जाने जाते हैं.


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15 जून 2020

क्या ब्लॉगर भी चोरी, सीनाजोरी जैसी हरकतें करने लगे हैं?

कल रात नियमित भ्रमण पर हमारीवाणी पर टहलना हो रहा था. अभी ज्यादा दूर जाना नहीं हो सका था कि एक पोस्ट का शीर्षक हमें अपनी कविता जैसा दिखा. ब्लॉगर का नाम भी पहचाना हुआ था. इसलिए लगा नहीं कि हमारी कविता वहाँ पोस्ट की गई होगी. इसके बजाय लगा कि कहीं हमारी कविता के बारे में तो कुछ लिखा तो नहीं गया है. ऐसा विचार आते ही पोस्ट लिंक पर क्लिक कर दिया. पोस्ट खुली तो हमारी आँखें खुलीं. पूरी की पूरी कविता उस पोस्ट में थी मगर हमारे नाम के बिना. पेज दो-तीन पर रिफ्रेश करके भी देखा, कहीं नेटवर्क कोई होशियारी न कर रहा हो मगर ऐसा नहीं था. हमारा नाम लेखक ने लिखा नहीं था सो वहाँ था ही नहीं. कहीं और भी किसी रूप में ये प्रदर्शित नहीं हो रहा था कि वो पोस्ट हमारी है.


बहरहाल, इस तरह की घटनाओं से आये दिन दो-चार होते हैं. सोशल मीडिया के विशाल जंगल में, इस भूलभुलैया में कब कौन चोर बनकर आपकी रचनाओं के सहारे प्रसिद्धि पाता रहे, कहा नहीं जा सकता. अक्सर घूम-फिर कर हमारी ही रचनाएँ हमें टैग करके भेजी जातीं हैं, किसी और के नाम पर. ऐसे में इस ब्लॉग पोस्ट पर अपनी कविता देखना आश्चर्य का विषय नहीं लगा. उन्हीं की तरह का कदम फेसबुक पर एक महाशय और उठाए हैं, उनको भी संकेत कर दिया है. इन्हीं महाशय के नक्शेकदम पर चलते हुए वे भी हमारी उसी कविता को अपनी पोस्ट में जिंदा किये बैठे हैं. दिमाग में आया कि हो सकता है कि ब्लॉगर गलती से नाम न लिख सके हों. चूँकि ब्लॉगर का नाम खासा जाना-पहचाना हुआ है ब्लॉगिंग में, सो यह सोचा ही नहीं कि किसी तरह की चोरी के उद्देश्य से ऐसा किया गया होगा. ऐसा इसलिए भी नहीं लगा क्योंकि हम इतना बड़ा नाम नहीं कि वे ब्लॉगर हमारी रचना चुराएं.

किसी और ब्लॉग पर लगाई गई हमारी कविता 

दिमाग में ऐसी बातें चलते-चलते उनकी उसी पोस्ट में हमने टिप्पणी के द्वारा उनको कविता के मूल के बारे में बताया. साथ ही अपने ब्लॉग पोस्ट की, जिसमें वो कविता लिखी थी, उनको भेज दी. ब्लॉगर द्वारा टिप्पणी को मॉडरेशन में लगाया गया है इस कारण टिप्पणी उस समय प्रकाशित न हुई. आज भी कई बार देखा तो न टिप्पणी प्रकाशित हुई, न ही कविता में हमारा कोई जिक्र हुआ और न ही वह पोस्ट हटाई गई. पहले लगा कि शायद उन्होंने टिप्पणी देखी न हों मगर जब उनके ब्लॉग पर नजर मारी तो महाशय ने आज ही तीन पोस्ट लगाई हैं. इसका सीधा सा अर्थ यही है कि उन्होंने जानबूझ कर टिप्पणियों को नजरअंदाज किया है. हम स्वयं भी कई बार अपनी ब्लॉग पोस्ट में किसी अन्य की पोस्ट को प्रकाशित करते हैं मगर उसके नाम के साथ, उसकी अनुमति के साथ. ब्लॉग पोस्ट को न हटाया जाना या फिर उसमें हमारी कविता का चर्चा न करना कहीं यह सिद्ध तो नहीं कर रहा है कि अब ब्लॉगर भी चोरी, सीनाजोरी जैसी हरकतें करने लगे हैं?

ये हमारी पोस्ट 

फ़िलहाल तो आज फिर उनको टिप्पणी के द्वारा संकेत कर दिया है, देखना है वो करते क्या हैं. यहाँ कविता के चोरी किये जाने से समस्या नहीं क्योंकि यह घटना तो दिख गई, पकड़ में आ गई. जो चोर परदे के पीछे हैं, हम सबकी निगाह से छिपे हैं उनका कोई क्या कर ले रहा है. यद्यपि इस बारे में एक हम ही नहीं बहुत से लोग परेशान हैं तथापि इसके खिलाफ कदम बढ़ाने का प्रयास कोई कर नहीं रहा है. शायद आरम्भ हमें ही करना होगा. आगे क्या करना है ये तो आगे देखेंगे मगर दुःख हो रहा है कि नामचीन ब्लॉगर भी इस जमात में शामिल होते दिखने लगे.

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हमारे मित्र द्वारा फेसबुक पर लिखी पोस्ट 

आप सभी को अवगत कराएँ कि वह कविता हमने सन 2018 में लिखी थी. उस कविता के बारे में हमारे मित्र ने फेसबुक पर एक पोस्ट भी लिखी थी, उसी सन 2018 में.

ये हमारी कविता की पोस्ट लिंक
https://kumarendra.blogspot.com/2018/11/blog-post_16.html
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ये उस पोस्ट की लिंक जहाँ ब्लॉगर महाशय ने हमारी कविता लगा रखी है

https://akhtarkhanakela.blogspot.com/2020/06/blog-post_60.html 
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ये वो लिंक जो फेसबुक पर हमारी कविता की है, किसी और की पोस्ट पर 

हमारी एक कविता, दो जगह, बिना हमारी जानकारी 

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

19 मार्च 2020

ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद का ऑनलाइन प्रकाशन आरम्भ

जैसा कि आप सबसे आज, 19 मार्च के लिए कहा था, ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद का ऑनलाइन प्रकाशन आज से आरम्भ कर दिया है. 

ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद से जुड़ने के लिए आपको इसके ब्लॉग पर जाना होगा या फिर इसके पेज पर. इसका प्रकाशन वहीं पर किया जायेगा. 

ब्लॉग और फेसबुक पेज की लिंक नीचे हैं. आप सभी के सहयोग की अपेक्षा है. आगे जैसी आपकी इच्छा.
आभार 

ब्लॉग लिंक 
https://zindagi-zindabad.blogspot.com/ 
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फेसबुक पेज लिंक 

https://www.facebook.com/zindagiizindabad
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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

17 जुलाई 2018

इमोजी के साथ दिल की बातें


सोशल मीडिया के इस दौर में उसके सभी मंचों पर इमोजी (Emoji) का प्रयोग बातचीत में खूब हो रहा है. कोई बातचीत बिना इमोजी के पूरी नहीं होती है. इमोजी इलेक्ट्रॉनिक चित्रों का समूह है जो चेहरे के हाव-भाव को प्रदर्शित करता है. इसके साथ-साथ यह भावनाओं, वस्तुओं, प्रतीकों के रूप में भी उपयोग में लाया जाने लगा है. इमोजी का आरम्भ जापान से हुआ था. सन 1999 में जापान के डिजायनर शिगेताका कुरिया ने इमोजी का निर्माण किया. वे एक सेलफोन कंपनी में काम किया करते थे. इसी कंपनी के मोबाइल में इस्तेमाल के लिए उन्होंने इमोजी का अविष्कार किया. इमोजी को वैश्विक बाजार में ले जाने का श्रेय एप्पल कंपनी को जाता है. एप्पल ने सन 2007 में अपने i-phone में दो तरह के कीबोर्ड बनाये, जिसमें एक को इमोजी कीबोर्ड के नाम से जाना गया. इसके बाद धीरे-धीरे समूची दुनिया में इमोजी प्रसिद्द होने लगा. सन 2013 में एंड्राइड मोबाइल ने भी इमोजी को अपना लिया.


समय गुजरता रहा, इमोजी लोगों की बातचीत में शामिल होता रहा. उसको मिलती लगातार प्रसिद्धि के चलते इमोजिपेडिया नामक वेबसाइट का उदय हुआ. इसमें सभी तरह की इमोजी मिल जाती हैं. कालांतर में सन 2014 में इमोजिपेडिया के संस्थापक जेरेमी बर्ज ने विश्व इमोजी दिवस की शुरुआत की. तभी से प्रतिवर्ष 17 जुलाई को विश्व इमोजी दिवस का आरम्भ हो गया. इस दिन को विश्व इमोजी दिवस के रूप में मनाये जाने का कारण यह है कि इसी दिन एप्पल कंपनी ने अपने i-phone में इमोजी कैलेण्डर लांच किया था. सन 2013 में इमोजी (Emoji) शब्द को ऑक्सफ़ोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी में शामिल किया गया. यहाँ एक जानकारी और देते चलें कि इमोजी (Emoji) का अर्थ किसी भी रूप में Emotion से नहीं है. असल में यह एक जापानी शब्द है जो e और moji से मिलकर बनाया गया है. जापानी में e का अर्थ Picture से और moji का अर्थ Character से लगाया जाता है. इमोजी के इस्तेमाल को लेकर माना जाता है कि दुनिया भर में प्रतिदिन 600 करोड़ इमोजी का उपयोग सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर किया जाता है.


दो हजार से अधिक इमोजी में से सर्वाधिक उपयोग में लाया जाने वाला इमोजी हँसते चेहरे वाली आँखों में आँसू वाला है. इस इमोजी को ख़ुशी में निकलने वाले आँसुओं के रूप में लिया गया है जबकि बहुत से लोग इसे दुःख में निकलने वाले आँसुओं के रूप में लेते हैं. यह सर्वाधिक लोकप्रिय इमोजी में से एक है. इसके बाद जो इमोजी सर्वाधिक प्रयोग में लाया जाता है वह है दिल वाली आँखों के साथ मुस्कुराता हुआ चेहरा. इस इमोजी का प्रयोग प्रेम की अभिव्यक्ति के रूप में किया जाता है. इन दो के अलावा मुस्कुराता चेहरे और गुलाबी गाल, गहरे विचारों वाला, चुम्बन को उड़ाता हुआ चेहरे वाले इमोजी भी खूब पसंद किये गए. 

सबसे ज्यादा उपयोग होने वाला इमोजी - Face with Tears of Joy

उपयोग के मामले में दूसरे नंबर वाला इमोजी - Smiling Face with Heart-Eyes

इमोजी अब एक नई भाषा के रूप में जन्म ले चुकी है और लगातार वृद्धि भी कर रही है. बातचीत को सहज और आसान बना रही है किन्तु इसी इमोजी का गलत उपयोग नुकसानदेह भी साबित हो सकता है. एक खबर के अनुसार फ़्रांस में एक युवा को तीन माह की कैद की सजा सुनाई गई थी. उसने अपनी गर्लफ्रेंड को पिस्तौल वाली इमोजी भेज दी. जिसके चलते अदालत ने माना कि उस लड़के ने अपनी गर्लफ्रेंड को जान से मारने की धमकी दी है. ऐसी कोई खबर अभी अपने देश में नहीं आई है फिर भी इमोजी का सहज, सरल, सुरक्षित, अर्थपरक इस्तेमाल करते हुए सोशल मीडिया का आनंद लीजिये.

22 मार्च 2018

सोशल मीडिया पर डाटा चोरों को हम ही तो प्रेरित करते हैं


विगत कुछ समय से फेसबुक पर डाटा चोरी करने के आरोप लगाये जा रहे थे. आज, २२ मार्च को लगभग सभी मुख्य समाचार पत्रों ने इसे प्रमुखता से छापा है. जुकरबर्ग को नोटिस देने तक की बात मंत्री जी ने कही है. समझ नहीं आता कि कोई चोरी करने वाला बिना हमारी लापरवाही के चोरी कैसे कर सकता है. यह केवल फेसबुक के सन्दर्भ में ही नहीं वरन हमारे घरों के सन्दर्भ में भी लागू होता है. आखिर हम ही लापरवाह बनते हैं और फिर चोरों के लिए वे स्थितियाँ उत्प्रेरक का कार्य करती हैं. कुछ इसी तरह की उत्प्रेरण स्थितियाँ हम सब फेसबुक पर या कहें कि सोशल मीडिया पर डाटा-चोरों के लिए बराबर बना रहे हैं. हम ही हैं जो लगातार अपने बारे में, अपनी अंतरंगता के बारे में, अपने समाज के बारे में, अपनी जाति, अपने धर्म, अपने लोगों के बारे में जानकारियाँ, सूचनाएं अतिशय जल्दबाजी के चलते सोशल मीडिया पर साझा करते रहते हैं. हम सब मुफ्त के मिले मंच का दुरुपयोग करने में माहिर हैं और बिना ये जाने कि हमारे द्वारा लगाई जा रही सूचना का, जानकारी का दूसरा व्यक्ति क्या उपयोग-दुरुपयोग कर सकता है.

आज ऐसा इसलिए नहीं लिख रहे कि आज ऐसा कुछ समाचार-पत्रों ने प्रकाशित किया है. आज ऐसा फिर इसलिए भी लिख रहे हैं क्योंकि इससे पहले भी दो बार अपने ही ब्लॉग के माध्यम से यही लिख चुके हैं. दोनों पोस्ट को नीचे दी गई लिंक के माध्यम से पढ़ा जा सकता है.

25 मई 2015 को लगाई गई पोस्ट.

05 जनवरी 2018 को लगाई गई पोस्ट

असल में हम सभी लोगों के अपने-अपने वैचारिक खाँचे हैं और हम चाहते हैं कि सभी उसी के अनुसार चलें. यदि ऐसा नहीं होता है तो हम उसके खिलाफ हो जाते हैं. ये वैचारिक खाँचे कहीं जाति-आधारित हैं, कहीं धर्म-आधारित, कहीं राजनीति-आधारित, कहीं क्षेत्र-आधारित. ऐसे में जैसे ही हम किसी के खिलाफ हुए या कोई हमारे खिलाफ हुआ, बस उसके खिलाफ हर तरह का जहर उगलना शुरू हो जाता है. आँकड़ों की तोड़-फोड़, चित्रों का फोटोशॉप किया जाना, मनगड़ंत सूचनाओं का प्रसार किया जाना आम बात हो जाती है. हम एक बहुत छोटी सी ईकाई होने के बाद भी लोगों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं तब सोचने वाली बात है कि कोई एक बड़ी एजेंसी कितनी आसानी से हमारी ही दो गई जानकारियों से कैसे हम सबको प्रभावित कर सकती है. यह प्रभाव कभी सकारात्मक भी हो सकता है, कभी नकारात्मक भी.

बहरहाल, सबकी स्वतंत्रता सबकी अपनी ही है मगर इतना ध्यान रखा जाये कि उससे किसी तरह की हानि न होने पाए. हानि व्यक्तिगत हो या फिर सामूहिक, हानि तो हानि है, चोरी तो चोरी है, नुकसान तो नुकसान है. व्यक्तिगत नुकसान की तो किसी न किसी रूप से भरपाई की जा सकती है किन्तु सामूहिक नुकसान की, समाज के नुकसान की, राष्ट्र के नुकसान की भरपाई करना संभव नहीं है. काश! कि इस मुफ्त में मिलती आज़ादी का हम सदुपयोग करते हुए लाभ-हानि को समझ सकें, अच्छे-बुरे का आकलन कर सकें. 

कुछ प्रमुख समाचार-पत्रों की कतरनें... 22-03-2018 









12 मार्च 2018

लिखेंगे, पहले अपनी गिरी हुई इज्जत-साख उठा लायें

लिख रहे थे तो समस्या थी लोगों को, अब नहीं लिख रहे हैं तब भी समस्या हो रही है लोगों को. समस्या हमें न तो लिखने से हो रही थी और न ही अब न लिखने से हो रही है. लिखने का ही नहीं बल्कि कोई भी काम किया है तो ये सोचकर कभी नहीं किया कि लोग क्या कहेंगे क्योंकि लोग सिवाय कहने के कुछ और कर ही नहीं पाते. इसे यदि ये कहा जाये कि बहुतेरे लोगों के पास कुछ कहने के अलावा और कुछ करने की औकात ही नहीं होती तो अतिश्योक्ति न होगी. अरे, बताते चलें ये लिखा-लिखाई, न लिखा-लिखाई की बात हो रही फेसबुक पर. इसी चौदह जनवरी से फेसबुक पर बनी अपनी प्रोफाइल पर किसी तरह की कोई सामग्री पोस्ट नहीं की, न ही विचार, न फोटो, न वीडियो. हाँ, अपने पेज पर यथासंभव बहुत आवश्यक होने पर ही कुछ लिखा है अन्यथा वहां भी अपने इसी ब्लॉग पोस्ट की लिंक शेयर करते रहे हैं. हाँ तो जैसा आपको बताया कि कभी इसकी चिंता नहीं की कि लोग क्या कहेंगे, सो जो मन आया वो लिखा, जो मन किया वो किया. इसी लिखा-पढ़ी में बहुत सी बातें ऐसी हुईं जो लोगों के आगे से लेकर पीछे तक, ऊपर से लेकर नीचे तक आग ही आग लगा गईं. इस आगलगी की तपन हम तक इधर-उधर से आती और हम निश्चिन्त से अपने काम में लगे रहते.


ये समस्या तब बढ़ी जबकि साथ के लोगों को हमारे लिखे से समस्या होने लगी. एक महाशय जिन्हें हम अपने साथ का समझते रहे वे भी गुलाट खाकर दूसरी तरफ चले गए. उनकी इस गुलाट ने हमें बताया कि हमारे लिखे ने या फिर हमने अपने लिखने से समाज में खाई बना दी है. ऐसी कुछ और बातें छन-छन कर हमारे पास आती रहती मगर हम किसी पर कान दिए बिना अपना लेखन करते रहते. हद तब हो गई जब हमारे अभिन्न लोगों ने हमें एहसास कराया कि हम बुद्धिजीवी टाइप व्यक्ति हैं. समाज में हमारा भी महत्त्व है. हमारे ऐसे लेखन से हमारी इज्जत गिर रही है. हमारी साख गिर रही है. जब आपके अभिन्न बताएं कि आपकी इज्जत गिर रही है, साख गिर गई है तब लगता है कि वाकई कुछ गिर गया है. उन महाशय की कही बात का कोई फर्क नहीं पड़ा था मगर इसका फर्क पड़ा. शहर भर घूमते फिर अगले कई दिन. कहीं इज्जत गिरी न दिखी. कहीं साख गिरी न दिखाई दी. वो खाई भी न दिखाई दी जो हमारे लिखने से बनी थी. उसी क्षण सोचा कि बस, अब और नहीं. पहले जहाँ-जहाँ हम अपनी इज्जत गिरा आये हैं, जहाँ-जहाँ अपनी साख गिरा आये हैं उसे वहां से उठा लायें. समाज में जहाँ-जहाँ खाई बना दी है उसे भर दें. उस खाई में जो-जो गिर चुके हैं उन्हें जीवित निकाल लें फिर कुछ लिखा जायेगा.

अब पिछले लगभग दो माह से कुछ नहीं लिखा जा रहा है तो भी लोग परेशान हैं. रोज ही स्थानीय दो-चार लोग टोक देते हैं. फेसबुक के बाहरी लोगों को तो कोई मतलब नहीं कि क्यों नहीं लिख रहे, कहाँ गायब हैं. स्थानीय लोगों ने लगातार हमसे न लिखने का कारण पूछा तो उनसे यही कहा कि हमारा लेखन खाई पैदा कर रहा था, लोगों को भटका रहा था. हमारी अपनी इज्जत को गिरा रहा था, हमारी साख को गिरा रहा था, सो पहले ये सब दुरुस्त हो जाये तब कोशिश की जाएगी लिखने की. इधर आज की घटना से लगा जैसे हमारा न लिखना सही कर रहा है किसी न किसी के लिए. सदन में दैव-चौपाई के द्वारा शराब की तुलना देवियों-देवताओं से करने वाले को उसी दल में जगह मिल गई जो इन्हीं देवी-देव के नाम की रोटी खा रहा है. सब हतप्रभ से खड़े देख रहे हैं, बस देख ही रहे हैं. कल को इन अग्रवाल साहब की जय-जय करनी पड़ेगी. आखिर स्वामी प्रसाद की भी तो कर रहे हैं. समाज में हमारे लेखन से बनी खाई में गिरने वाले तमाम बुद्धिभोगी बताएँगे कि ऐसे नेताओं की बनी खाई में कौन-कौन गिर रहा है? बताएं कहीं ऐसे लोगों की कलम, ऐसे लोगों की इज्जत, ऐसे लोगों की वैचारिकी तो उसमें नहीं गिर रही? हम तो हम ही हैं, हम ही हम हैं... अपनी गिरी इज्जत, गिरी साख खोजकर उठा ही लायेंगे, आखिर दिन-रात सड़क पर ही टहलते हैं, लोगों के बीच मगर वे सोचें कि वे जहाँ गिर चुके हैं वहां से उठकर कैसे ऊपर आयेंगे?  

हाँ, चलते-चलते बताते चलें कि हमारे अभिन्न लोगों ने बताया था कि हमारी साख गिर रही है, हमारी इज्जत गिर गई है (हालाँकि इसका हमें पता न चला कि कब गिरी?) बस उसी इज्जत, उसी साख को उठा लायें वापस, जहाँ-जहाँ गिरी, वहां से... उसके बाद लिखने लगेंगे. हाँ, हमारा लिखा पढ़ने का जिन्हें शौक ही है वे हमारे इस ब्लॉग पर आयें, हमारे फेसबुक पर पेज पर जाएँ, ट्विटर एकाउंट पर आयें. वहां तो हम ज्यों के त्यों हैं क्योंकि वहां हमारी इज्जत, हमारी साख नहीं गिरी है.