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06 नवंबर 2024

भारतीय सन्दर्भ में डोनाल्ड ट्रंप की जीत

अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप ने जीत हासिल की. उन्होंने अपनी प्रतिद्वन्द्वी कमला हैरिस को पराजित किया. राष्ट्रपति पद की जीत के लिए आवश्यक 270 इलेक्टोरल वोट के आँकड़े को पार करते हुए इस जीत को हासिल किया. इस जीत से उन्होंने अमेरिका में 132 वर्ष पूर्व हुए राष्ट्रपति चुनाव परिणाम की बराबरी कर ली है. दरअसल ट्रंप 2016 में अमेरिका के राष्ट्रपति थे जो 2020 में हुए अगले राष्ट्रपति चुनाव में हार गए थे. इस हार के बाद वे अब 2024 में पुनः विजयी हुए हैं. अमेरिका में ऐसा 132 साल बाद हुआ है जब कोई व्यक्ति दूसरी बार राष्ट्रपति बना हो मगर उसने चुनाव लगातार न जीता हो. डोनाल्ड ट्रंप के पहले ग्रोवर क्लीवलैंड 1884 में और फिर 1892 में राष्ट्रपति बने थे.

 

डोनाल्ड ट्रंप की जीत को लेकर भारत में अलग-अलग कयास लगाए जा रहे थे. उनकी जीत से भारतीय शेयर बाजार पर भी प्रभाव पड़ता दिखा है. इसका एक कारण है कि अमेरिकी चुनाव भारतीय अर्थव्यवस्था के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं. भारत का व्यापार अमेरिका के साथ वैश्विक स्तर पर अपना महत्त्व रखता है. भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंधों की दृष्टि से देखा जाये तो दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2021-2022 में 119.42 बिलियन अमेरिकी डॉलर का हुआ था, जबकि इसके पूर्व 2020-21 में यह 80.51 बिलियन अमेरिकी डॉलर का था. इस व्यापारिक संबंधों का प्रभाव निश्चित रूप से सकारात्मक ही होगा. ट्रंप के आने का सबसे ज्यादा फायदा उन उद्योगों को होने वाला है जो निर्यात से जुड़े हैं. इसमें चाहे मैन्युफैक्चरिंग कम्पनियाँ हों या इन कम्पनियों के उत्पादों को बाहर भेजने वाली कोई तीसरी कम्पनी. आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार ऑटोमोबाइल, मशीनरी, टेक्सटाइल और कैमिकल आदि कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जिसमें निर्यातकों को बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है. ऐसा हमेशा से माना जाता रहा है कि ट्रंप की नीतियाँ अमेरिकी कम्पनियों को भारत में निवेश के लिए भी प्रोत्साहित करती हैं. इस कारण से भी भारत-अमेरिका के बीच पारस्परिक सह-संबंधों में जबरदस्त सुधार देखने को मिल सकते हैं.

 



भारतीय निर्यात को महत्वपूर्ण लाभ मिलने की उम्मीद के साथ-साथ ट्रंप द्वारा पूर्व में चीनी उत्पादों पर हाई टैरिफ लगाए जाने का सकारात्मक असर भारतीय व्यापारिक नीति में दिखाई पड़ सकता है. ट्रंप ने चीन से आने वाले सोलर पैनल, वॉशिंग मशीन, स्टील और एल्युमीनियम समेत अनेक उत्पादों पर टैरिफ्स लगाए थे. इससे अमेरिका में उनका निर्यात बहुत मुश्किल हो गया था. वहाँ की कम्पनियाँ इन उत्पादों की माँग की आपूर्ति के लिए दूसरे विकल्पों की ओर देखने लगी थीं. इन विकल्पों में एक नाम भारत का भी शामिल था. ऐसा माना जा रहा है कि वर्तमान जीत के बाद भी ट्रंप का रवैया या नजरिया चीन के प्रति कोई खास बदलने वाला नहीं है. यदि ऐसा रहा तो निश्चित ही माल की आपूर्ति के लिए वहाँ की कम्पनियों को दूसरे देशों को विकल्प के रूप में स्वीकारना होगा. ऐसी स्थिति में भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और अमेरिका के साथ इसके संबंध देश को चीन का विकल्प बनने के लिए प्रबल दावेदार बनाते हैं. इससे अमेरिकी बाजार में ऑटो पार्ट, सौर उपकरण और रासायनिक उत्पाद आदि भारतीय निर्माताओं को स्थान मिल सकता है.

 

निर्यातक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सफलता मिलने की एक उम्मीद के साथ-साथ मैन्युफैक्चरिंग और रक्षा क्षेत्र में ट्रंप की नीतियों का लाभ भारतीय विनिर्माण क्षेत्र में तेजी ला सकता है. अमेरिकी इन क्षेत्रों को मजबूत बनाने के लिए भारतीय रक्षा कम्पनियों के साथ बेहतर सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं. भारत-अमेरिका के बीच रक्षा और सैन्य सहयोग पिछले कुछ वर्षों में मजबूत हुआ है. क्वाड समूह के द्वारा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के प्रभाव को कम करने सम्बन्धी कदम उठाया था. ट्रंप के पिछले कार्यकाल में हिन्द महासागर और प्रशांत महासागर क्षेत्र में अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच क्वाड समूह के द्वारा सुरक्षा साझेदारी को मजबूत किया गया था.  ऐसी स्थिति में वर्तमान में ट्रंप प्रशासन के नेतृत्व में भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को बेहतर तथा मजबूत बनाये जाने की प्रबल सम्भावना है.

 

इन व्यापारिक, रक्षा सम्बन्धी मामलों के साथ-साथ ऐसा माना जा रहा है कि ट्रंप की जीत से रूस-यूक्रेन युद्ध में शांति आने की सम्भावना है. अपने चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप लगातार यह कहते नजर आये हैं उनके जीतने का सुखद परिणाम रूस-यूक्रेन युद्ध रुकने के रूप में सामने आएगा. यद्यपि अमेरिका और भारत की नीति एवं वैचारिक रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर अलग-अलग रही है किन्तु जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी कई मंचों पर कहते नजर आये हैं कि ये युद्ध का समय नहीं है, ऐसे में संभव है कि ट्रंप की पहल से यह युद्ध रुक जाये. युद्ध का रुकना भारतीय सन्दर्भों में भी लाभकारी है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रूस-यूक्रेन युद्ध के साथ-साथ ट्रंप बांग्लादेश मामले में भी वहाँ हिन्दुओं पर हो रही हिंसा का विरोध करते रहे हैं. ऐसे में जबकि माना जा रहा है कि बांग्लादेश की वर्तमान अंतरिम सरकार में अमेरिका का हस्तक्षेप बना हुआ है. ऐसे में ट्रंप के आने से एक उम्मीद यह भी है कि बांग्लादेश के हालात और वहाँ हिन्दुओं की हालत में सुधार होगा. यदि ऐसा होता है तो यह भी निश्चित रूप से भारत के लिए लाभकारी होगा.

25 जून 2024

आपातकाल का सच और वर्तमान दौर

भाइयो और बहनो, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है. इससे आतंकित होने का कोई कारण नहीं है. रेडियो पर लगभग आधी सदी पूर्व गूँजी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की इस आवाज़ ने देश में हलचल मचा दी थी. तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने सरकार की सिफारिश पर संविधान के अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत देश में आपातकाल घोषणा किया था. 25 और 26 जून की मध्य रात्रि में तत्कालीन राष्ट्रपति के हस्ताक्षर करने के साथ ही यह लागू हो गया था. 25 जून 1975 से लेकर 21 मार्च 1977 तक देश में 21 महीने तक आपातकाल लागू रहा. इस कदम को आज भी लोकतंत्र का काला अध्याय कहा जाता है.

 

आपातकाल की व्यवस्था किसी तरह की असंवैधानिक व्यवस्था नहीं है. देश के संविधान में ही आपातकाल लागू किये जाने की व्यवस्था है. संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा करने का अधिकार है. आपातकाल में नागरिकों के सभी मौलिक अधिकार निलंबित हो जाते हैं. ऐसी स्थिति उस समय व्यवहार में लाई जाती है जबकि सम्पूर्ण देश अथवा किसी राज्य पर अकाल, बाहरी देशों के आक्रमण, आंतरिक प्रशासनिक अव्यवस्था अथवा अस्थिरता आदि जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाए. इस तरह की विषम स्थिति में समस्त राजनैतिक और प्रशासनिक  शक्तियाँ राष्ट्रपति के हाथों में चली जाती हैं. 1975 के पूर्व वर्ष 1962 तथा वर्ष 1971 में राष्ट्रीय आपातकाल लगाया गया था.

 



देश में पहली बार आपातकाल 26 अक्टूबर 1962 से 10 जनवरी 1968 के बीच लगा जबकि उस समय भारत और चीन के बीच युद्ध चल रहा था. दूसरी बार 3 से 17 दिसंबर 1971 के बीच आपातकाल लगाये जाने का कारण भारत-पाकिस्तान युद्ध था. दोनों स्थितियों में देश की सुरक्षा को खतरा देखते हुए ऐसी घोषणा की गई थी. इन दो वास्तविक विषम परिस्थितियों के सापेक्ष वर्ष 1975 की स्थितियों को देखा जाये तो आपातकाल लागू किये जाने का तार्किक आधार नजर नहीं आता है. बावजूद इसके आपातकाल लागू किया गया. अभिव्यक्ति के अधिकार के साथ-साथ नागरिकों के जीवन का अधिकार भी छीन लिया गया था. 25 जून की रात से ही देश में विपक्ष के नेताओं की गिरफ्तारियों का दौर शुरू हुआ. प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई. प्रत्येक मीडिया सेंटर पर सेंसर अधिकारी नियुक्त कर दिया गया. उसकी अनुमति के बाद ही समाचार का प्रकाशन हो रहा था. सरकार विरोधी समाचार छापने पर गिरफ्तारी हो रही थी.

 

दरअसल आपातकाल लगाये जाने के पीछे किसी बाहरी शक्ति से खतरा होने से ज्यादा इंदिरा गांधी को अपनी सत्ता जाने का खतरा दिखाई देने लगा था. 1971 में तत्कालीन भारत-पाकिस्तान युद्ध में जबरदस्त विजय और बांग्लादेश निर्माण के बाद से इंदिरा गांधी की लोकप्रियता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई. इसी के चलते उन्होंने 1971 का लोकसभा चुनाव भी प्रचंड बहुमत से जीतकर विपक्ष का लगभग सफाया कर दिया था. दरअसल 1971 में बांग्लादेश बन जाने से भले ही इंदिरा गांधी को लोकप्रियता मिली मगर उसके साथ बांगलादेशी शरणार्थियों के आने से देश की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ा. गुजरात और बिहार में इस नकारात्मकता ने आन्दोलन का रूप ले लिया. इन दोनों राज्यों से विद्यार्थियों की जबरदस्त एकजुटता को आन्दोलन की शक्ल में बदलने का काम किया बिहार के जयप्रकाश नारायण ने. उनके नेतृत्व में सम्पूर्ण क्रांति का नारा देते हुए आन्दोलन तेज होने लगा. इसके साथ ही इंदिरा गांधी की जीत पर सवाल उठाते हुए उनके चुनावी प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने 1971 में अदालत में अपनी याचिका में आरोप लगाया कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया है. उच्च न्यायालय ने इस याचिका पर 12 जून 1975 को फैसला सुनाते हुए इंदिरा गांधी के निर्वाचन को रद्द करते हुए अगले छह साल तक चुनाव लड़ने पर भी प्रतिबंध लगा दिया. जगह-जगह उनके इस्तीफे की माँग उठने लगी. इसी से आक्रोशित होकर आपातकाल जैसा कदम उठाया गया.  

 

विगत कुछ वर्षों से विपक्ष द्वारा लगातार प्रचार किया जा रहा है कि वर्तमान केन्द्र सरकार द्वारा आपातकाल जैसी स्थितियाँ पैदा कर दी गई हैं. अभी हाल में सम्पन्न हुए लोकसभा चुनावों में संविधान बदल देने, आरक्षण समाप्त कर देने, भविष्य में चुनाव न होने देने जैसा दुष्प्रचार किया गया. यहाँ विशेष बात यह है कि 1975 में आपातकाल की नींव रखने वाला दल आज विपक्ष में है और आपातकाल के ज़ुल्मों को सहने वाले सरकार में हैं. ऐसे में मीडिया और सोशल मीडिया के पर्याप्त स्वतंत्र होने की स्थिति में किसी भी प्रचार-दुष्प्रचार का आकलन राष्ट्रीय हितों को देखते हुए किया जाना चाहिए. वर्तमान पीढ़ी के बहुसंख्यक नागरिकों ने आपातकाल में प्रशासन, पुलिस की ज्यादतियों को पढ़ ही रखा है, इसके उलट बड़ी संख्या में ऐसे नागरिक भी हैं जिन्होंने आपातकाल की क्रूरता को न केवल देखा है बल्कि सहा भी है. ऐसे में उन लोगों, भले ही वे राजनीति में नहीं हैं, का भी दायित्व बनता है कि वर्तमान पीढ़ी को सत्य से परिचित करवाते रहें. आपातकाल के दौर में भुक्तभोगी रही मीडिया को भी यथोचित स्थितियों के सच के साथ सामने आने की आवश्यकता है. यदि लगता है कि वर्तमान केन्द्र सरकार के कार्य, नीतियाँ इस तरह की हैं जो घोषित अथवा अघोषित आपातकाल की पीठिका निर्मित करती हैं, तो उनका मुखर विरोध किया जाना चाहिए. जिस तरह से विगत वर्षों में संसद में पक्ष और विपक्ष की भूमिकाएँ देखने को मिली हैं वे प्रशंसनीय नहीं कही जा सकती हैं. देश के धन और समय के अपव्यय के बीच समाप्त होते निष्फल संसद सत्रों के बीच घोषित अथवा अघोषित आपातकाल देश को नुकसान ही पहुँचायेगा.   


19 मार्च 2024

पुतिन की विजय और विश्वयुद्ध की चेतावनी

रूस के राष्‍ट्रपति व्‍लादिमीर पुतिन ने तीसरे व‍िश्‍वयुद्ध को लेकर एक बार फिर बड़ी चेतावनी दी है. उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान यदि नाटो की सेना और रूसी सेना में संघर्ष हुआ तो दुनिया तीसरे विश्‍वयुद्ध से एक कदम दूर होगी. इस तरह का बयान उस समय आया है जबकि पुतिन राष्ट्रपति चुनाव को ऐतिहासिक बहुमत से जीत कर अगले छह वर्षों के लिए रूस के राष्ट्रपति बन गए हैं. उनको राष्ट्रपति के चुनाव में 87.29 प्रतिशत मत मिले हैं, जो रूस के सोवियत इतिहास के बाद का सबसे बड़ा परिणाम है. इन चुनावों में पुतिन को मिली जीत ने उनके पाँचवें कार्यकाल का मार्ग प्रशस्त किया. गौरतलब है कि पुतिन 1999 से राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के रूप में रूस का नेतृत्व करते आ रहे हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान मिली विजय वहाँ के नागरिकों का उनके प्रति विश्वास और उम्मीद का सूचक है. ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि पिछले तीन चुनावों में उनको प्राप्त मतों का प्रतिशत लगातार बढ़ता ही रहा है. 2012 में उनको 63.6 प्रतिशत, 2018 में 76.7 प्रतिशत और 2024 में हुए चुनावों में 87.29 प्रतिशत मत प्राप्त हुए हैं.

 



पुतिन की इस विजय को कई अर्थों में महत्त्वपूर्ण इस कारण से माना जा रहा है क्योंकि उनके द्वारा अपने नागरिकों से लगातार वादा किया गया कि वे पश्चिमी देशों द्वारा रूस के वैभव को बर्बाद करने की, रूसी अर्थव्यवस्था को नकारात्मक दिशा में पहुँचाने की साजिश को सफल नहीं होने देंगे. उन्होंने ऐसा करके भी दिखाया है. यूरोपियन देशों सहित अमेरिका द्वारा किये जाने वाले विरोध और प्रतिबंधों के बाद भी रूसी अर्थव्यवस्था पर पुतिन ने संकट नहीं आने दिया. विगत लम्बे समय से यूक्रेन के साथ चल रहे युद्ध से उत्पन्न माहौल को भी पुतिन के खिलाफ ले जाने के सारे प्रयास असफल ही रहे हैं. इसके उलट इन दिनों में पुतिन की रेटिंग में उछाल भी आया है. यूक्रेन पर हमला किये जाने के समय पुतिन की रेटिंग 71 मानी जा रही थी जो अब बढ़कर 86 हो गई है. रूसी राष्ट्रपति भी इस तथ्य से भली-भांति परिचित हैं कि पश्चिमी देश लगातार रूस के खिलाफ साजिश करते रहे हैं. इसी कारण से उन्होंने अपनी विराट विजय के पश्चात् सबसे पहले पश्चिमी देशों को आगाह करते हुए विश्वयुद्ध जैसी स्थिति की चेतावनी दे डाली.

 

देखा जाये तो रूस-यूक्रेन युद्ध ने 1962 के क्यूबा मिसाइल संकट के बाद पश्चिम के साथ रूस के सम्बन्धों में सबसे गहरा संकट पैदा कर दिया है. उस समय अमेरिका के नजदीक क्यूबा में मिसाइल तैनाती के एक मुद्दे पर तत्कालीन सोवियत संघ और अमेरिका खुलकर आमने-सामने आ गए थे. यद्यपि पुतिन ने विश्वयुद्ध के प्रति पश्चिमी देशों को चेताया तो है तथापि उन्होंने यूक्रेन के साथ चल रहे युद्ध में परमाणु बम की जरूरत को नकारा.

तमाम रक्षा व‍िश्‍लेषकों का कहना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण पश्चिमी देशों और रूस के बीच तनाव अपने चरम पर पहुँच गया है. इस तनाव का एक कारण यूक्रेन में नाटो सेनाओं की उपस्थिति की आशंका है. रूसी राष्ट्रपति पुतिन पूरे विश्वास के साथ इस बात को मानते हैं कि नाटो के सैनिक और विशेषज्ञ यूक्रेन में उपस्थित हैं, जो रूस के साथ युद्ध में उनको सहायता, सलाह दे रहे हैं. ऐसी स्थिति को मानने के साथ-साथ विगत दिनों फ्रांस के राष्‍ट्रपति मैक्रां ने एक बयान में संकेत दिया कि वे भव‍िष्‍य में यूक्रेन में नाटो की जमीनी सेना की तैनाती की सम्भावना से इंकार नहीं कर सकते हैं. इस बयान से यूक्रेन में नाटो सैनिकों के होने के पुतिन के दावे को बल मिलता है. यद्यपि मैक्रां के बयान के बाद कई पश्चिमी देशों ने अपने को इससे दूर बताया है तथापि फ्रांसीसी राष्‍ट्रपति को पूर्वी यूरोप के कई देशों का साथ भी मिला. पुतिन का विश्वयुद्ध की आशंका वाला बयान फ्रांसीसी राष्ट्रपति के बयान की प्रतिक्रिया माना जा रहा है.

 

पुतिन के विश्वयुद्ध सम्बन्धी बयान को भले ही फ्रांसीसी राष्ट्रपति के बयान की प्रतिक्रिया माना जाये किन्तु वर्तमान विजय के पश्चात् यह तो स्पष्ट है कि रूस और पुतिन पहले से ज्यादा सशक्त, मजबूत बनकर उभरे हैं. उनका यह उभार पश्चिमी देशों की नींद उड़ाने के लिए पर्याप्त है. विगत लगभग तीन वर्षों से चले आ रहे रूस-यूक्रेन युद्ध में अमेरिका खुलकर यूक्रेन का साथ देता दिख रहा है. रूस एक तरह से यूक्रेन के साथ-साथ अमेरिका, नाटो सेनाओं के साथ युद्ध करता आ रहा है. इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि रूस विश्व के सर्वाधिक परमाणु हथियारों और सुपरसोनिक मिसाइलों वाला देश है और पुतिन उसी देश के सर्वशक्तिमान नेता हैं. ऐसे में इस विजय के पश्चात् यह युद्ध रुकने अथवा शंतिपरक पहल के रास्ते पर जाने बजाय और तीव्र हो सकता है. अब पुतिन खुद को कमजोर सिद्ध करने के स्थान पर वैश्विक रूप से और अधिक ताकतवर महाशक्ति के रूप में उभरने का रास्ता अपना सकते हैं. ऐसे में सम्भव है कि विश्वयुद्ध की ये चेतवानी पश्चिमी देशों तक अपनी विजय की हनक को पहुँचाने का कदम हो. फिलहाल दुनिया भले ही तीसरे विश्वयुद्ध का सामना न करे किन्तु यदि जल्द ही शांति का माहौल नहीं बनता है तो दुनिया निश्चित ही विश्वयुद्ध जैसे हालातों का सामना तो कर ही सकती है. 





 

17 दिसंबर 2023

अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन के खिलाफ महाभियोग

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है. अमेरिकी सदन के अध्यक्ष केविन मैक्कार्थी ने राष्ट्रपति पर औपचारिक महाभियोग जाँच किये जाने की घोषणा की. सदन के अध्यक्ष ने राष्ट्रपति और उनके बेटे हंटर बाइडेन के खिलाफ आरोपों पर कहा कि राष्ट्रपति ने अपने बेटे के व्यापारिक लेनदेन की जानकारी के बारे में झूठ बोला है. उनके अनुसार बाइडेन परिवार के सदस्यों को कंपनियों से लाखों डॉलर का भुगतान प्राप्त हुआ था और उस लेनदेन को अमेरिकी ट्रेजरी विभाग द्वारा संदिग्ध बताया गया. बाइडेन पर यह भी आरोप है कि उन्होंने अपने सरकारी कार्यालय का उपयोग अपने बेटे के व्यावसायिक भागीदारों के साथ समन्वय बनाने के लिए किया था. बाइडेन और उनके बेटे पर यूक्रेन, चीन में अपने व्यापारिक सौदों में अपने परिवार के नाम पर प्रभावी ढंग से उपयोग करने का आरोप है. इसके अलावा हंटर पर अवैध रूप से हथियार रखने, 1.4 मिलियन डॉलर टैक्स चोरी करने का आरोप भी है. यह पहला मौका है जब अमेरिका में वहाँ के कार्यरत राष्ट्रपति के बेटे के विरुद्ध आपराधिक आरोप तय हुए हैं. अमेरिका के न्याय विभाग ने हंटर को टैक्स और हथियारों से जुड़े मामलों में दोषी बताया है.

 

राष्ट्रपति बाइडेन पर उनके बेटे के विवादास्पद अंतर्राष्ट्रीय लेनदेन के मामले को आधार बनाकर उन पर औपचारिक महाभियोग जाँच शुरू किए जाने का प्रस्ताव दिया गया. अमेरिकी संसद में इस प्रस्ताव के समर्थन में 221 वोट पड़े वहीं इसके विरुद्ध 212 वोट पड़े. अमेरिकी प्रतिनिधि सभा द्वारा किसी राष्ट्रपति, किसी वरिष्ठ कार्यकारी अथवा न्यायिक अधिकारी को उसके पद से हटाने की औपचारिक प्रक्रिया का पहला कदम महाभियोग होता है. अमेरिकी संविधान के अनुसार राष्ट्रपति के देशद्रोह, रिश्वत, दुराचार अथवा अन्य किसी बड़े अपराध में शामिल होने की आशंका होने की स्थिति में उस पर महाभियोग लगाया जाता है. यद्यपि अमेरिकी संविधान में दुराचार तथा बड़े अपराध को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है तथापि ऐसा माना गया है कि इसका स्वीकार्य उस स्थिति में होगा जबकि उच्चस्तरीय सार्वजनिक अधिकारी द्वारा सत्ता का दुरुपयोग किया जाये. इस तरह की स्थिति में यह भी अनिवार्य रूप से माना गया है कि आवश्यक नहीं कि इसमें सामान्य आपराधिक क़ानून का उल्लंघन हो. स्पष्ट है कि यदि उच्चस्तरीय सार्वजनिक अधिकारी द्वारा सत्ता के दुरुपयोग की बात सामने आती हो, भले ही कानूनी उल्लंघन न होता हो तो भी उस पर महाभियोग लगाया जा सकता है.

 

महाभियोग जाँच शुरू करने के लिए सदन में साधारण बहुमत की आवश्यकता होती है. मुक़दमे के पश्चात् दोष सिद्ध होने की स्थिति और निष्कासन के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में राष्ट्रपति पर मुक़दमे सम्बन्धी कार्यवाही की जाती है. ऐसी स्थिति में अमेरिका विधायिका की सीनेट न्यायालय की तरह से कार्य करती है. अमेरिका में वहाँ की विधायिका में कुल दो सदन हैं. एक सदन को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स कहा जाता है. जिसमें चुने जाने वाले सदस्यों की संख्या उस राज्य की जनसँख्या के आधार पर निर्धारित होती है. हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव्स के अलावा दूसरे सदन को सीनेट कहा जाता है. इसमें अमेरिका के प्रत्येक राज्य से दो प्रतिनिधि चुने जाते हैं. प्रतिनिधियों की यह संख्या निश्चित होती है भले ही उस राज्य की जनसँख्या कितनी भी हो. इन चुने हुए प्रतिनिधियों को सीनेटर कहा जाता है. राष्ट्रपति के दोषी पाए जाने पर उसे पद से हटाने की शक्ति सीनेट को प्राप्त है.

 

महाभियोग की मंजूरी मिलने के बाद मुक़दमे की सुनवाई के लिये इन्हीं सीनेटर्स के बीच से कुछ सांसदों को चुन लिया जाता है. ये चुने हुए सीनेटर्स प्रबंधक के रूप में जाने जाते हैं जो एक तरह से अभियोजकों की भूमिका निभाते हैं. इस मुक़दमे में जिस तरह सीनेट से चुने सीनेटर्स अभियोजक के रूप में होते हैं, उसी तरह से राष्ट्रपति का भी अपना वकील होता है और वह राष्ट्रपति की ओर से अपना पक्ष रखता है. मुक़दमे की पूरी सुनवाई होने के पश्चात् सीनेट दोषसिद्धि का परीक्षण करती है, जिसके उपरांत वोट देने का प्रावधान है. यदि इस वोटिंग के द्वारा सीनेट में उपस्थित कम से कम दो तिहाई सदस्य राष्ट्रपति को दोषी पाते हैं तो उसको अपने पद से हटा दिया जाता है.

 

अमेरिका के अभी तक के इतिहास में इससे पूर्व तीन राष्ट्रपतियों डोनाल्ड ट्रंप (2019, 2021), बिल क्लिंटन (1998) और एंड्रयू जॉनसन (1868) पर हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स द्वारा महाभियोग लगाया गया है.  इनमें डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी इतिहास के ऐसे पहले राष्ट्रपति बन गए हैं जिन्हें एक ही कार्यकाल में दो बार महाभियोग का सामना करना पड़ा. अभी तक किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति को महाभियोग द्वारा पद से हटाया नहीं गया है. महाभियोग का सामना करने वाले उक्त तीनों राष्ट्रपतियों को सीनेट में विमुक्त कर दिया गया.

 

अमेरिका के महाभियोग सम्बन्धी इतिहास को और बाइडेन के खिलाफ तथ्यों के आधार पर डेमोक्रेटिक पार्टी ने महाभियोग को मंजूरी देने को बेबुनियाद बताया है. भले ही आने वाले समय में मुक़दमे की कार्यवाही के पश्चात् बाइडेन को इससे विमुक्त कर दिया जाये मगर अगले वर्ष होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के महत्त्वाकांक्षी बाइडेन के समक्ष मुश्किल तो खड़ी हुई ही है.

24 मई 2022

राष्ट्रपति चुनाव 2022 के संभावित समीकरण

देश के प्रथम नागरिक के रूप में परिभाषित राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का कार्यकाल जुलाई 2022 को खत्म हो रहा है. जल्द ही देश में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव प्रक्रिया शुरू होगी. चूँकि राष्ट्रपति के चुनाव में आम जनमानस की सहभागिता सीधे-सीधे नहीं होती है, इस कारण भले ही इस तरफ बहुत ज्यादा रुचि न रहती हो मगर जनता का एक बहुत बड़ा वर्ग राष्ट्रपति चुनावों पर अपनी नजर अवश्य ही लगाये रखता है. भारतीय संसद के दोनों सदनों में जिस तरह की स्थिति भाजपा और उनके सहयोगी दलों की, उसे देखते हुए यह स्थिति तो एकदम साफ़ है कि राष्ट्रपति पद के लिए जो भी निर्वाचित होगा वह भाजपा आर उसके सहयोगी दलों से ही होगा. यह स्थिति उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद और भी स्पष्ट हुई है.

 

अब जबकि राष्ट्रपति चुनाव के लिए बहुत लम्बा समय नहीं है, तब राजनीतिक विश्लेषक, राजनीति विषय में रुचि रखने वाले, देश की राजनैतिक दशा-दिशा का आकलन करने वाले आदि लोग इस बार के राष्ट्रपति चुनाव को विशेष दृष्टिकोण से देख रहे हैं. इसके पीछे का कारण यह नहीं कि भाजपा या उसके सहयोगी दलों के व्यक्ति को राष्ट्रपति बनना है, ऐसा तो वर्तमान राष्ट्रपति पद हेतु सदस्य का नाम घोषित होने के समय भी था. देखा जाये तो इस बार विशेष दृष्टि रखने के पीछे का कारण भी वर्तमान राष्ट्रपति ही हैं. वर्ष 2017 में भाजपा ने या कहें कि नरेन्द्र मोदी ने सबको चौंकाते हुए देश के शीर्ष पद हेतु रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा की थी. ऐसा उस समय हुआ था जबकि रामनाथ कोविंद किसी भी रूप में राष्ट्रपति पद की दौड़ में नहीं थे. उनके नाम की घोषणा होने पर सबको आश्चर्य इसलिए भी और हुआ था कि उनको वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए उनके मनचाहे लोकसभा क्षेत्र जालौन-गरौठा-भोगनीपुर से टिकट नहीं दिया गया था.

 

राजनीति की गणित पढ़ने-समझने वालों ने उस समय रामनाथ कोविंद के राजनैतिक जीवन की समाप्ति की घोषणा सी कर दी थी. इस कारण लोगों को आश्चर्य होना स्वाभाविक था. ये और बात है कि अपने सरल स्वभाव के चलते लोकसभा चुनावों के कुछ महीने बाद रामनाथ कोविंद को बिहार का राज्यपाल बनाया गया. नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2017 में बिहार के उन्हीं तत्कालीन राज्यपाल को चुना, जो तब एक लो-प्रोफाइल दलित नेता माने-समझे जाते थे. उन्होंने 1998-2002 के बीच भाजपा के दलित मोर्चे का नेतृत्व किया था. नरेन्द्र मोदी ने दलित नेता के रूप में उनको राष्ट्रपति पद का सदस्य बनाकर तत्कालीन राजनैतिक समीकरण को अपने पक्ष में किया था.

 



अब राष्ट्रपति पद हेतु सभी की निगाहें भाजपा की तरफ ही लगी हैं. राजनैतिक समीकरण उनके पक्ष में होने के कारण भाजपा और उनके सहयोगी दलों के सदस्य का राष्ट्रपति बनना निश्चित है. अब लोगों में यह जानने की उत्कंठा है कि इस बार किसका नाम सदस्य के रूप में सामने आएगा? क्या रामनाथ कोविंद को दोबारा राष्ट्रपति पद के लिए सदस्य बनाया जायेगा? क्या उपराष्ट्रपति पद पर आसीन वैंकया नायडू को भाजपा सदस्य घोषित कर सकती है? यदि राष्ट्रपति पद का इतिहास देखा जाये तो अभी तक देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद अकेले व्यक्ति रहे हैं जिनको दो बार कार्यकाल मिला. ऐसे में इसकी सम्भावना कम ही समझ आती है कि भाजपा वर्तमान राष्ट्रपति को ही अपना सदस्य घोषित करे. इसके साथ-साथ रामनाथ कोविंद के दोबारा सदस्य न बनने के पीछे उनकी उम्र भी एक कारक हो सकता है. रामनाथ कोविंद वर्तमान में 76 वर्ष पूर्ण कर चुके हैं. भाजपा में नरेन्द्र मोदी के अघोषित निर्देशों के बाद से 75 वर्ष से अधिक उम्र वाले व्यक्ति को पद से दूर रखा जा रहा है. ऐसे में बहुत कम सम्भावना है कि वर्तमान राष्ट्रपति को दोबारा कार्यकाल मिले.

 

राजनैतिक शतरंज की बिसात पर वैसे तो सभी के अपने-अपने आकलन हैं. उत्तर प्रदेश के वर्तमान विधानसभा चुनावों में जिस तरह से बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा घोषित-अघोषित एकतरफा समर्थन भाजपा प्रत्याशियों को दिया था, उसके बाद से मायावती के राष्ट्रपति पद हेतु सदस्य के रूप में नाम सामने आने की चर्चाएँ विभिन्न मंचों से सुनाई देने लगी थीं. हालाँकि इस बारे में मायावती ने मीडिया के द्वारा अपने नाम को लेकर अपनी स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट कर दी है. बहरहाल, यह राजनीति की डगर है, यहाँ आज क्या है, कल क्या होगा कोई नहीं कह सकता है, इसके बावजूद राजनैतिक विश्लेषकों द्वारा उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू, आनंदी बेन पटेल, आरिफ मोहम्मद खान, थावरचंद गहलोत, बी.एस. येदुरप्पा, डॉ. तमिलिसाई सुंदरराजन आदि नामों पर सम्भावना जताई जा रही है. नाम भले ही राजनैतिक शतरंज पर कितने भी देखने को मिलें मगर यदि गहनता से देखा जाये तो उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू और केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को शीर्ष वरीयता में रखा जा सकता है.

 

उपराष्ट्रपति वेकैंया नायडू के नाम पर सहज सहमति भी बन सकती है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि पिछली बार जब उपराष्ट्रपति पद हेतु उनका नाम सामने आया तो बहुत से लोगों का विचार था कि उनके राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जाना चाहिए था. इस विचार को तब न सही, अब बल मिल सकता है, समर्थन भी मिल सकता है. उपराष्ट्रपति के रूप में उन्होंने कर्तव्यों का निर्वहन भली-भांति किया है. उनकी निष्पक्ष छवि सभी दलों के बीच मान्य है. इसके साथ-साथ उनका आंध्र प्रदेश से होना भी भाजपा को लाभान्वित कर सकता है. उनको राष्ट्रपति बनाकर भाजपा दक्षिण भारत में अपनी स्थिति को मजबूत कर सकती है. उपराष्ट्रपति नायडू वर्ष 2002 से वर्ष 2004 तक भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहने के साथ-साथ वे अटल बिहारी सरकार में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रहे हैं. नरेन्द्र मोदी सरकार में उनके पास शहरी विकास, आवास, शहरी गरीबी उन्मूलन, सूचना प्रसारण तथा संसदीय कार्य जैसे महत्वपूर्ण विभागों का अनुभव रहा है.

 

उपराष्ट्रपति वेकैंया नायडू के नाम के साथ-साथ केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान का नाम भी संभावी फलक पर दिखाई देता है. उत्तर प्रदेश के निवासी आरिफ मोहम्मद खान शाहबानो केस के विरोध में राजीव गांधी सरकार में केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद सुर्खियों में आए थे. वर्तमान में वे तीन तलाक, सीएए जैसे बिन्दुओं पर भाजपा के लिए तारणहार बनते रहे हैं. भाजपा भी उनको प्रगतिशील विचारधारा का मानती है. वैसे तो भाजपा द्वारा अब्दुल कलाम के रूप में मुस्लिम चेहरा राष्ट्रपति पद पर पहुँचा चुकी है मगर वर्तमान सन्दर्भों में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा पुनः एक मुस्लिम चेहरे को राष्ट्रपति बनाकर सम्पूर्ण विश्व को अपने मुस्लिम विरोधी न होने का सन्देश दिया जा सकता है.

 

उक्त दो नामों के साथ-साथ एक अन्य नाम उत्तर प्रदेश की राजपाल आनंदी बेन पटेल का भी चर्चा में है. वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बेहद करीबी मानी जाती हैं. नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनको ही गुजरात मुख्यमंत्री पद सौंपा गया था. यद्यपि आनंदी बेन पटेल के साथ उनकी उम्र उनके नाम की घोषणा में बाधक बन सकती है. 80 वर्षीय आनंदी बेन पटेल की उम्र को एक पल को नजरंदाज कर दिया जाये तो भाजपा द्वारा मुस्लिम और दलित के बाद अब एक महिला को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाकर वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों से पूर्व महिलाओं को एक सकारात्मक राजनैतिक संदेश दिया जा सकता है.

 

हालाँकि ये संभावित नाम अभी सियासी फलकों पर तमाम राजनैतिक विश्लेषकों की, मीडिया से जुड़े अनेक बुद्धिजीवियों के आकलन का परिणाम है. राजनीति के पटल पर अंतिम-अंतिम क्षण तक किसी भी सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है. इस बारे में कतई इंकार नहीं किया जा सकता है कि राष्ट्रपति पद के लिए जो नाम भी घोषित होगा उस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और नरेन्द्र मोदी की सहमति होगी. रामनाथ कोविंद भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अपने करीबी रिश्तों के कारण और नरेन्द्र मोदी की चौंकाने वाली कार्यशैली के चलते देश के प्रथम नागरिक के रूप में हम सबके बीच उपस्थित हैं. ऐसा ही कुछ अप्रत्याशित जुलाई 2022 में होने वाले राष्ट्रपति पद के चुनाव हेतु देखने को मिले तो कोई बड़ी बात नहीं.