सैनिक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सैनिक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

16 दिसंबर 2025

विजय दिवस 16 दिसम्बर

आज 16 दिसम्बर को विजय दिवस देश भर में मनाया जाता है. इसको मनाये जाने का कारण 1971 में हुए युद्ध में भारत की पाकिस्तान पर जीत है. पाकिस्तान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी ने भारत के पूर्वी सैन्य कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था. इस युद्ध के अंत के बाद 93000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया था. इस युद्ध में पाकिस्तान की पराजय के बाद पूर्वी पाकिस्तान स्वतंत्र हो गया था. यही स्वतंत्र भाग आज बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है. इस युद्ध में लगभग चार हजार भारतीय सैनिकों को वीरगति प्राप्त हुई थी और दस हजार के आसपास सैनिक घायल हुए थे. 




13 मई 2025

समाज के दुश्मन से लड़ने को तैयार रहें

पहलगाम में आतंकियों की अप्रत्याशित रूप से धार्मिक पहचान कर हिन्दुओं की हत्याएँ करने के बाद समूचे देश ने केन्द्र सरकार से कठोर कार्यवाही की अपेक्षा की थी. निर्दोषों को मौत की नींद सुलाने के साथ-साथ ‘मोदी को बता देना जैसी चुनौती के बीच जनसामान्य को दृढ़ विश्वास था कि केन्द्र सरकार की तरफ से जबरदस्त जवाबी कदम उठाया जायेगा. प्रत्येक दिन जितनी आशा के साथ आता, उतनी निराशा के साथ चला जाता. उरी और पुलवामा के आतंकी हमलों के बाद सरकार की तरफ से की जा चुकी सैन्य स्ट्राइक के बाद भी इस बार की चुप्पी जनसामान्य के भीतर एक तरह के रोष को जन्म दे रही थी. बहुसंख्यक भारतीय नागरिक पाकिस्तान को, पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों को सिर्फ सबक सिखाने की मंशा नहीं बल्कि उनका सम्पूर्ण विध्वंस करने की चाह रख रहे थे.

 

दरअसल जनता का मनोविज्ञान तुरंत बदला लेने का होता है. उसके लिए रणनीति, कूटनीति आदि का कोई सन्दर्भ नहीं होता है. इसके उलट सरकार के लिए युद्ध का तात्पर्य किसी दूसरे देश पर केवल हमला करना भर नहीं होता है बल्कि अपने देश, सेना, नागरिकों की अत्यल्प क्षति के साथ युद्ध को अपने पक्ष में ले जाना होता है. सरकार की मंशा कुछ इसी तरह की रही होगी कि बिना युद्ध जैसे ट्रैप में फँसे पाकिस्तान को सबक सिखाया जाये. देखा जाये तो दक्षिण एशिया की वर्तमान भू-राजनैतिक स्थितियाँ भारत के पक्ष में नहीं हैं. सभी पड़ोसी देशों में राजनैतिक हलचल मची हुई है. ऐसे में अनिश्चितकालीन अथवा दीर्घकालिक युद्ध वाला माहौल न केवल देश को क्षति पहुँचा सकता है बल्कि चीन को हस्तक्षेप करने का अवसर प्रदान कर सकता है.

 



सरकार ने अपनी नीति, अपनी योजना के अनुसार कार्य करते हुए ऑपरेशन सिन्दूर के द्वारा पाकिस्तान स्थित आतंकी शिविरों, प्रशिक्षण शिविरों पर आधी रात में मिसाइल स्ट्राइक करके उनको ध्वस्त कर दिया. जानकारी होते ही आक्रोशित जनमानस उत्साह, जोश से भर गया. बहुसंख्यक नागरिक वर्ग खुद को इस ऑपरेशन से जुड़ा हुआ महसूस करते हुए पाकिस्तान से निर्णायक मोर्चा खोलने की मंशा बनाने लगा. पाकिस्तान समर्थित आतंकियों के खिलाफ भारत सरकार की सैन्य कार्यवाई से भारतीय जनमानस का जोश अचानक से उस समय शांत कर दिया गया जबकि खबर आई कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के हस्तक्षेप से भारत और पाकिस्तान में युद्ध विराम होने जा रहा है. युद्ध विराम की घोषणा होते ही वो जनमानस जो पाकिस्तान पर कब्ज़ा किये जाने के, उसके कई हिस्सों में टूट जाने के, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के मुक्त हो जाने की बात करते हुए सरकार की शान में कशीदे पढ़ रहा था, वही एकदम से सरकार के विरुद्ध हो गया.

 

बहरहाल, मुद्दा यह नहीं कि सरकार ने आतंक के खिलाफ कार्यवाही देर से क्यों शुरू की? मुद्दा यह भी नहीं कि सम्पूर्ण ध्वंस किये बिना आखिर सरकार ने युद्ध विराम पर सहमति क्यों दी? यहाँ विचार करना होगा कि बहुतायत लोग पाकिस्तान के खिलाफ आर-पार की लड़ाई चाह रहे थे, आतंकियों का सर्वनाश चाह रहे थे उन बहुतायत लोगों के परिवारों से सेना में भर्ती होने वालों की संख्या कितनी है? इस बिन्दु पर आकर माना जा सकता है कि चलिए सभी को सेना में भर्ती नहीं किया जा सकता है; सभी को सैनिक नहीं बनाया जा सकता है; सभी को युद्ध के मैदान में नहीं भेजा जा सकता है. इन्हीं स्थितियों के बीच से एक स्थिति यह निकलती है कि देश के दुश्मन को मिट्टी में मिला देने की हुँकार भरने वाले, आतंकियों का नामोनिशान मिटाने की बात करने वाले लोग समाज के दुश्मन से, समाज के आतातायियों से लड़ने सामने क्यों नहीं आते हैं? महिलाओं-बेटियों के साथ छेड़खानी करने वाले, खुलेआम हत्या करने वाले, चेहरे पर तेजाब फेंक देने वाले, चलती गाड़ी में गैंग-रेप जैसा जघन्य कृत्य करने वाले, सरेआम लूटमार करने वाले भी किसी रूप में आतंकवादियों से कम नहीं हैं. जैसे देश के दुश्मन बड़े रूप में देश को नुकसान पहुँचाते हैं, वैसे ही ये लोग समाज को नुकसान पहुँचाते हैं.

 

ऐसे अपराधियों के मनोबल बढ़ने का कारण कहीं से इनका विरोध नहीं होना है. शांति मार्च निकाल देने, मोमबत्तियाँ जला देने, भाषणबाजी कर लेने से अपराधियों के हौसले पस्त नहीं होते. जनसामान्य की एक आम सोच है कि समाज में क्रांतिकारी तो पैदा हो मगर पड़ोसी के घर में. ऐसी सोच के चलते एक सामान्य नागरिक खुलेआम होते अपराध का सीधा विरोध नहीं करता है. किसी अपराधी का सीधा विरोध न होने से ही वह निरंतर अपराध को अंजाम देता रहता है. सोचिए, जिस तरह से हम किसी भी विरोध से पहले अपने परिजनों का, अपने परिवार का  स्मरण करने लगते हैं, उनके भविष्य के प्रति चिंतातुर होने लगते हैं ठीक वैसे ही सीमा पर तैनात सैनिक का परिवार है, परिजन हैं; वे भी किसी का परिवार हैं, परिजन हैं. उनके दुश्मन देश में सीमा पार घुसकर हमला करने को हम सभी अपना जोश, अपना उत्साह, अपनी वीरता मान लेते हैं मगर असल में यह हमारी वही मानसिकता होती है जिसमें क्रांतिकारी पड़ोस में जन्मा होता है.

 

देश के वीर सैनिक तो सीमा पर दुश्मन के खिलाफ डटे खड़े रहते हैं, अपनी जान की बाजी लगाये रहते हैं. हमें भी समाज के दुश्मनों के खिलाफ, अपने सभ्य नागरिकों के अपराधियों के विरुद्ध सीना तानकर खड़े होने की आवश्यकता है. स्मरण रखना होगा कि युद्ध सिर्फ और सिर्फ युद्ध होता है, वह चाहे देश के दुश्मन के साथ हो या समाज के दुश्मन के साथ. इसमें जानें ही जाती हैं, क्षति होती है, दुश्मन की और अपनी भी. सोचियेगा, क्या आप समाज के दुश्मन से लड़ने को तैयार हैं?


13 फ़रवरी 2024

बदलते भारत की कूटनीतिक विजय

भारतीय नौसेना के सात पूर्व अधिकारियों ने दिल्ली हवाई अड्डे को जब भारत माता की जय के नारों से गुंजायमान कर दिया, तब वह क्षण भारत के लिए वैश्विक कूटनीति और विदेश नीति में विजय का क्षण था. ये वही पूर्व सैनिक थे जिनको क़तर की अदालत द्वारा मौत की सजा सुनाई गई थी. इन पूर्व नौसैनिक अधिकारियों की मौत की सजा को भारत के कूटनीतिक हस्तक्षेप के बाद कतर ने माफ कर दिया था. मौत की सजा माफ़ होने के बाद भी भारत ने प्रयासों में कमी न रखी. आखिरकार इन पूर्व नौसैनिकों को कतर ने रिहा कर दिया. इस मामले में भारत सरकार की कूटनीति की सराहना करनी होगी क्योंकि कुछ दिन पहले लोकसभा में एक सदस्य ने सरकार को कतर में बंद सैनिकों को वापस लाने की चुनौती दी थी. भारत सरकार द्वारा बिना किसी शोर-शराबे और प्रतिक्रिया के सकारात्मक रणनीति पर कार्य करते हुए अपने नागरिकों को रिहा करवा लिया गया.

 



जेल से रिहा हुए ये पूर्व नौसैनिक दहरा ग्लोबल टेक्नोलॉजीज एंड कंसल्टिंग सर्विसेज में काम करते थे. दोहा स्थित यह निजी फर्म कतर के सशस्त्र बलों और सुरक्षा एजेंसियों को प्रशिक्षण और अन्य सेवाएँ प्रदान करती है. यद्यपि क़तर सरकार द्वारा आरोपों का स्पष्ट रूप से खुलासा नहीं किया गया तथापि ऐसा समझा जा रहा कि इनको कतर के पनडुब्बी प्रोग्राम के सम्बन्ध में इजरायल के लिए जासूसी करने के संदेह में गिरफ्तार किया गया था. भारत सरकार ने आरोपों को लेकर तो कुछ नहीं कहा, लेकिन उसने अपने नागरिकों के साथ उचित व्यवहार की करने पर जोर दिया था. इस रिहाई को मोदी सरकार की बदलती और प्रभावी विदेश-नीति का प्रतीक भी कहा जा रहा है. इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से पश्चिम एशिया और खाड़ी देशों के साथ सम्बन्ध सुधारने पर विशेष बल दिया गया. पहले की सरकारों में इस तरफ कम ध्यान दिया जाता रहा. प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने अपना स्पष्ट रुख रखा था कि पश्चिम एशिया और अरब देशों से संबंधों के मामले में नया अध्याय जोड़ा जा रहा है. भारत सरकार के द्वारा नए भारत सम्बोधन को लगातार सच भी किया जा रहा है. इसके लिए बिना किसी पूर्वाग्रह के केन्द्र सरकार द्वारा अपनाई जा रही कूटनीति और विदेशनीति को देखना होगा. इन क्षेत्रों में भारत को लगातार सफलता मिल रही है. अफगानिस्तान, यूक्रेन से भारतीय नागरिकों को भारत ने निकाला. यूक्रेन-संकट के दौरान पुतिन ने भारतीय विद्यार्थियों को सेफ पैसेज देते हुए उनको निकलने में मदद की.

 

पूर्व नौसैनिकों की सजा का मामला सिर्फ विदेश नीति तक ही सीमित नहीं रहा. दिसम्बर में दुबई में हुए पर्यावरण सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और कतर के राष्ट्रप्रमुख शेख तमीम बिन हमाद की मुलाकात को सकारात्मक संदेश के रूप में देखा गया. इस मुलाकात के बाद भारतीय नागरिकों की रिहाई का समाचार आना अपने आपमें एक सुखद सन्देश है. यह एक प्रकार से क़तर के स्वभाव का भी परिचायक है. विदेशी मामलों के जानकार मानते हैं कि कतर एक ऐसा देश है जो हमेशा मध्यस्थता करके दो देशों के विवादों को सुलझाने में सहायक की भूमिका हेतु जाना जाता है. अभी हाल में इजराइल और हमास के बीच भी कतर ने सकारात्मक भूमिका का निर्वहन करते हुए मध्यस्थता निभाई. भारत की बढती वैश्विक छवि से क़तर अनजान नहीं है. ऐसे में भारतीय कूटनीति, विदेश नीति और दोनों देशों के मध्य के राजनयिक, व्यापारिक सम्बन्धों के चलते कतर को भारतीय कैदियों को राहत देनी पड़ी.

 

इस पूरे घटनाक्रम में वर्ष 2014 की संधि और अभी हाल ही में भारत और क़तर के मध्य हुए गैस सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण समझौते को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता है. 2014 की संधि में दोनों देशों के मध्य यह स्वीकार किया गया था कि अगर किसी कारण से दोनों देशों के नागरिकों को सजा मिलती है तो वे अपने देश में सजा काट सकते हैं. ऐसे में एक सम्भावना इन पूर्व सैनिकों के भारत में सजा काटने की भी बन रही थी मगर भारत सरकार ने इस मामले को कूटनीतिक नजरिए से उठाते हुए अमेरिका और तुर्किए से भी चर्चा की थी. इन दोनों देशों के रिश्ते कतर और उसके राष्ट्राध्यक्ष से बेहतर हैं. जिसके चलते इन नागरिकों की रिहाई सम्बन्धी निर्णय आना सहज हुआ. भारतीय कूटनीति के साथ-साथ क़तर के साथ हुए गैस सम्बन्धी समझौते को भी इस मामले में प्रभावकारी माना जा रहा है. इसी फरवरी में हुए इस समझौते के अनुसार भारत अगले बीस वर्षों  तक क़तर से लिक्विफाइड नैचुरल गैस (एलएनजी) खरीदेगा. एलएनजी आयात करने वाली भारत की सबसे बड़ी कंपनी पेट्रोनेट एलएनजी लिमिटेड ने कतर की सरकारी कंपनी कतर एनर्जी के साथ ये समझौता किया है. इसके अनुसार कतर प्रतिवर्ष 7.5 मिलियन टन गैस भारत को निर्यात करेगा.

 

कूटनीति हो, विदेश नीति हो या फिर क़तर के साथ हमारे दोस्ताना सम्बन्ध कुल मिलाकर भारतीय नागरिक रिहा होकर स्वदेश लौट आये हैं. विश्व राजनीति बहुत ही जटिल और संवेदनशील हो चुकी है. भारत ने दक्षिण एशिया से ऊपर उठकर वैश्विक राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है. विदेश के संकटग्रस्त देशों से भारतीय नागरिकों की वापसी रही हो, कोरोनाकल में भारत द्वारा मदद देना रहा हो, तालिबान और पश्चिमी देशों के मध्य बातचीत होना रहा हो, सभी में भारतीय कूटनीति, विदेश नीति महत्त्वपूर्ण भूमिका में नजर आई है. विगत वर्षों में भारतीय विदेश नीति नित नए आयाम गढ़ती नजर आ रही है. यह वैश्विक परिदृश्य में भारतीय छवि की बढ़ती स्वीकार्यता का सूचक है. 






 

27 अप्रैल 2023

नक्सली हमले में जवान शहीद

नक्सलियों ने एक बार फिर देश को जबरदस्त क्षति पहुँचाई है. अबकी उनके हमले में 11 जवान शहीद हुए हैं. छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में 26 अप्रैल नक्सलियों ने डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी) के जवानों को ले जा रहे एक वाहन पर हमला कर दिया. आईईडी से किये गए इस हमले में 11 जवान शहीद हो गए. डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड यानि डीआरजी छत्तीसगढ़ पुलिस के वे स्पेशल जवान हैं, जिनको केवल नक्सलियों से लड़ने के लिये भर्ती किया जाता है. इसमें सरेंडर करने वाले नक्सली और वहीं के वातावरण में पले-बढ़े लोग शामिल होते हैं. नक्सलियों के खिलाफ सबसे बड़ी सफलता अब तक इन्हीं जवानों को मिली है. इनका शहीद होना बहुत बड़ी क्षति है.  


उच्चाधिकारियों द्वारा हमेशा की तरह रटा-रटाया बयान दिया गया है. नक्सलियों पर क्या कार्यवाही होगी, ये समय बताएगा. 








 

14 फ़रवरी 2022

वीर सैनिक हमेशा दिल में रहेंगे

 



आज का दिन कोई भारतीय नहीं भूल सकता. एक दर्दनाक दिन, एक अत्यंत दुखद पल था वो. ये और बात है कि महज बारह दिन बाद हमारी सेना ने, हमारे वीर सैनिकों ने इस घटना का बदला उनके घर में घुसकर लिया. 


हमारी सेना ने, सैनिकों ने अपनी ताकत को दुश्मन देश पाकिस्तान को दिखा दी. हम सभी भारतीयों का सीना गर्व से चौड़ा हुआ मगर जिन वीर सैनिकों को हमने खो दिया था, वे वापस तो नहीं आ सकते थे. उनके जाने का हम भले ही दुःख अपने भीतर महसूस करें मगर अपने जाँबाज सैनिकों के लिए आँसू बहाते हुए उनको कमजोर नहीं कर सकते. 


हर साल ये दिन हमें कष्टकारी घटना को याद कराएगा मगर हम उन्हीं वीर सैनिकों की तरह खुद को मजबूत बनाते हुए उनको सम्मान प्रकट करेंगे. 


जय हिन्द, जय हिन्द की सेना, जय हिन्द के सैनिक 

08 दिसंबर 2021

दुर्घटना या साजिश : देश ने खोया बहुत कुछ है


ये चित्र अपने आपमें बहुत कुछ कहता है. भारत के पहले रक्षा प्रमुख या चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) बिपिन रावत जी का एक हैलीकॉप्टर दुर्घटना में निधन हो गया. उनके साथ उनकी धर्मपत्नी सहित कुल तेरह लोगों का इस दुर्घटना में निधन हुआ. यह चित्र रावत जी सहित उन सभी लोगों के प्रति श्रद्धा-सुमन है जो उस दुर्घटना में शहीद हो गए.


8 दिसम्बर 2021 को जनरल रावत, उनकी पत्नी और उनके निजी स्टाफ़ के अन्य सदस्यों समेत कुल 10 यात्री और चालक दल के 4 सदस्य भारतीय वायुसेना के मिल एमआई-17 हैलिकॉप्टर पर सवार थे. यह हैलीकॉप्टर इन सभी को लेकर सुलुरु वायुसेना हवाई अड्डे से वेलिंगटन स्थित रक्षा सेवा स्टाफ़ कॉलेज जा रहा था, जहाँ जनरल रावत को व्याख्यान देना था. स्थानीय समय अनुसार अपराह्न 12:10 बजे के आसपासनीलगिरि जिले के कुन्नूर तालुके के बांदीशोला ग्राम पंचायत में स्थित एक निजी चाय बागान की आवासीय कॉलोनी के समीप यह हैलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया. दुर्घटना का स्थान उस जगह से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर था जहाँ हेलिकॉप्टर को उतरना था. जनरल रावत  और उनकी पत्नी समेत अन्य 11 के निधन की पुष्टि बाद में भारतीय वायुसेना द्वारा की गयी. भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह इस दुर्घटना में एकमात्र जीवित बचने वाले व्यक्ति हैं. हैलीकॉप्टर एक सामान्य दुर्घटना का शिकार हुआ अथवा यह एक साजिश थी, इस बारे में तो बाद में ही पता चल सकेगा किन्तु इस दुर्घटना से देश को अवश्य ही अपूरणीय क्षति हुई है.


सभी दिवंगत सदस्यों को नमन. 

 

07 अगस्त 2020

नौजवानों को डिप्रेशन से बचाने को आइडल्स बदलने की ज़रुरत

क्रिस काइल की SEAL ट्रेनिंग कुछ ऐसी थी कि सुबह से शाम तक ठन्डे पानी में बिठा दिया जाता था। घंटो पानी के पाइप से तीखी धार मारी जाती थी। इस बीच इतनी झंड की जाती थी कि ट्रेनिंग लेते कई साथी बीच में छोड़ के भाग जाते थे। कीचड़ में कोहनियों के बल कई-कई किलोमीटर चलने के लिए कहा जाता था। इन सब ट्रेनिंग, जिसे आप यातना भी कह सकते हो, के बाद क्रिस को इराक में पोस्टिंग मिली। क्रिस क्योंकि स्नाइपर थे तो दूर बैठे ही अलगाववादियों के मत्थे भेद दिया करते थे। साठ से ज़्यादा सटीक निशाने लगाने के कारण पहले ही टूर में क्रिस को The Legend का ख़िताब मिल गया था।


काइल जब रमादी शहर में भेजे गए थे तब वो एक खंडहर में लेटे मरीन ऑफिसर्स के कॉनवॉय को प्रोटेक्ट कर रहे थे, तभी उनकी नज़र एक बुर्खा पहने औरत पर पड़ी जिसके हाथ में दो फिट लम्बा ग्रेनेड था। उस औरत ने वो ग्रेनेड अपने बच्चे को थमा दिया जो बामुश्किल 10 साल का होगा, वो बच्चा अमेरिकी कॉनवॉय की तरफ दौड़ने लगा, क्रिस अपने स्कोप से सब देख रहे थे, क्या करना है ये निर्णय सिर्फ क्रिस को लेना था जो उन्होंने अगले ही पल लिया। उस बच्चे की छाती में गोली मार दी। उसकी माँ रोती बिलखती आई और फिर उसने वो ग्रेनेड उठा लिया, क्रिस को मजबूरन उसे भी गोली मारनी पड़ी।

अपनी बायोग्राफी में क्रिस ने लिखा कि वो औरत शायद पहले ही मर चुकी थी, मैं बस उसकी मौत के साथ अपने मरीन साथियों को मरने से बचा रहा था।

इस घटना की वजह से क्रिस महीनों चैन से नहीं सो पाए। ये था डिप्रेशन। इसे कहते हैं अवसाद पर क्रिस ने ये अवसाद अपने किसी साथी या अपने परिवार के सामने ज़ाहिर नहीं किया। क्रिस को ड्यूटी के दौरान दो बार गोली लगी और छः बम धमाके वो झेल गए पर जब भी किसी से मिले, मुस्कुराते हुए मिले।

++

एक मेजर माइक टैंगो हैं जो बचपन में विजेता फिल्म दस-दस बार देखा करते थे, तभी से उनका मन आर्मी में शामिल होने का बन चुका था। वो दो बार NDA एग्जाम में फेल हो गया पर उसने हार न मानी। जब पास हुआ तो ट्रेनिंग के वक़्त उसके सीनियर उसे कश्मीर में होते ऑपरेशन्स के किस्से सुनाया करते थे। माइक ने तभी तय कर लिया मैं और कुछ नहीं सिर्फ स्पेशल फ़ोर्स ऑफिसर बनूंगा। इसके बाद उसने IMA ज्वाइन की और 2004 में उसे स्पेशल फ़ोर्स की ट्रेनिंग के लिए चुना गया। स्पेशल फ़ोर्स में जो भी जाता है वो शरीर से लोहा तो बन ही चुका होता है पर पैरा ऑफिसर स्पेशल इसलिए होते हैं कि वो दिमाग से भी मजबूत बनाये जाते हैं।

छः महीने के प्रोबेशन ट्रेनिग पीरियड के दौरान माइक को रात-रात भर गटर में बैठा दिया जाता था। सड़ते हुए जानवर कटवाए जाते थे। एक दफा तो रात दो बजे उठा दिया गया, कहा बेनज़ीर भुट्टो पर 1000 शब्दों का निबंध लिखो कि कैसे उसकी माहवारी के कारण पश्चिम बंगाल में में मानसून आ गया, ये सिर्फ लिखना ही नहीं था, सारे ऑफिसर्स को इस निबंध से सहमत भी करवाना था। फिर हर ऑफिसर निकलते-बढ़ते बेइज्ज़ती करता रहता था। ज़लील करता चलता था। इसके बावजूद माइक ने 6 महीने की ट्रेनिंग 4 महीनों में पूरी कर ली। 

माइक को एक ऐसे मिशन पर कश्मीर भेजा गया जो पहले से तय था कि फेल होना है। मिशन से लौटने के बाद माइक के कमांडर ने बहुत बुरी तरह लताड़ा और उसे SF के लिए मिसफिट करार दे दिया। उसे निकाल बाहर कर नॉर्मल इन्फेंट्री में भर्ती करने का ऑर्डर आया, वो सामान पैक करने लगा तो आँखें भर आई। इतनी मेहनत की और सब ज़ाया। उसी वक़्त एक वेटर आया और बताया कि CO साहब ने बुलाया है। माइक पहुँचा तो CO ने उसे 50 पुशप्स मारने के लिए कहा। माइक भला कैसे इनकार करता, माइक ने जब पुशअप पूरी की तो देखा उसके CO के हाथ में मेहरून कैप थी जो ख़ास स्पेशल फ़ोर्स ऑफिसर्स के लिए होती है। माइक की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। असल में माइक उन सारे ऑफिसर्स में बेस्ट था पर CO उसकी बर्दाश्त करने की शक्ति को तौलना चाह रहा था।

मेजर माइक टैंगो! ये वही ऑफिसर है जिसकी लीडिंग में सर्जिकल स्ट्राइक अंजाम दी गयी थी और 80 कमांडोज़ में से एक भी कमांडो हताहत नहीं हुआ।

अब सोचिए क्या डिप्रेशन लेवल रहा होगा उस शख्स का जिसे हर कोई लताड़ रहा है, जिसे गटर में रखा जाता है और उससे सड़ा माँस कटवाया जाता है। अब आप दिल पे हाथ रखकर बताइए कि हीरो कौन हैं? हृतिक रौशन या शाहरुख़ खान? जिन्हें देखकर हमारे बच्चे वैसा बनना चाहते हैं और न बन पाने की सूरत में नस काट लेते हैं या मेजर माइक टैंगो और क्रिस काइल जिनके नाम तक आम लोगों तक नहीं पहुँच पाते पर उनकी वजह से आज हम चैन से बैठे हैं?

मुझे लगता है, इस देश के नौजवानों को डिप्रेशन से निकलना है तो उन्हें अपने आइडल्स बदलने की ज़रुरत है पर आपको ये पोस्ट शेयर करने से पहले मुझसे पूछना ज़रूरी नहीं है।

+

(माइक टैंगो की कोई फोटो या असली नाम सुरक्षा कारणों से सर्वजनिक नहीं किये गए हैं।)

पोस्ट अवनींद्र जादौन की फेसबुक वाल से साभार 
.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

03 मार्च 2019

क्षुद्र मानसिकता से संचालित विरोधी


विरोध और विरोधी विचारधारा का होना किसी भी प्रतियोगिता, प्रतिस्पर्द्धा के लिए आवश्यक होता है. बिना इसके कोई प्रतियोगिता अथवा प्रतिस्पर्द्धा सफलता से संचालित नहीं हो सकती है. कुछ इसी तरह की स्थिति लोकतान्त्रिक व्यवस्था में, राजनीति में भी होती है. लोकतंत्र की सफलता के लिए, व्यवस्थित और सशक्त लोकतंत्र के लिए विरोधियों का होना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है. यदि ऐसा नहीं होता है तो इसका अर्थ है कि या तो लोकतंत्र बीमार हो गया है अथवा जनता में, लोकतंत्र के सञ्चालन करने वालों में वैचारिकी का अभाव हो गया है. किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के सञ्चालन के लिए राजनीति उसका प्रमुख अंग है. बिना राजनीति के किसी भी संस्था का, किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था का एक कदम आगे बढ़ना संभव नहीं हो सकता है. आज के दौर में जबकि सम्पूर्ण विश्व एक क्लिक पर सबके साथ जुड़ा हुआ है तब बिना राजनीति के न तो व्यक्तियों का विकास संभव है, न समाज का और न ही देश का. विकास की इस प्रक्रिया के लिए आवश्यक है कि लोकतंत्र के सभी घटकों में वैचारिक विभेद बना रहे. इस विभेद के चलते ही नए विचारों की उत्पत्ति होती है, नए-नए सूत्रों का उदय होता है, विकास की नवीन प्रक्रिया का रास्ता सुलभ होता है. 


इधर कुछ समय से देखने में आ रहा है कि देश में राजनैतिक रूप से विरोध की स्थिति नकारात्मक होती चली जा रही है. सत्ता पक्ष और विपक्ष का विरोध तो सदैव से रहा है. यहाँ किसी एक दल को संदर्भित किया जाना उद्देश्य नहीं है. आज जो दल सत्ता में है जब वह विपक्ष में था तो उसके द्वारा तमाम सारे बिन्दुओं का विरोध किया गया था, किया जाता था मगर सत्ता में आने के बाद उन्हीं सारी प्रक्रियाओं का सञ्चालन उसे भी करना पड़ा. सत्ता में आने के बाद उसे भी उन्हीं समस्याओं से जूझना पड़ा जिनसे कि तत्कालीन सत्ता पक्ष जूझ रहा था. बहरहाल, राजनीति में यह संघर्ष सदैव से चलता रहा है, चलता रहेगा किन्तु अब देखने में आ रहा है कि इस वैचारिक विरोध के बीच से स्वस्थ मानसिकता समाप्त होती जा रही है. वर्तमान में देश के लगभग सभी सत्ता-विरोधी दलों का एकमात्र उद्देश्य किसी भी तरह से सत्ता पक्ष को बदनाम करना है. इसके लिए विरोधी किसी भी स्तर तक जाने को तैयार हैं. विद्रूपता तो तब हो गई जबकि राजनैतिक रूप से विरोधी माने जाने वाले दल केंद्र की भाजपा सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विरोध करते-करते देश का, सेना का, सैनिकों का विरोध करने लगे. यह स्थिति तब भी सहन करने वाली होती यदि इसे महज राजनैतिक विरोध के रूप में देखा-समझा जाता मगर ऐसा नहीं हुआ. राजनीति में सबकुछ अपने पक्ष में करने की मंशा से, सिर्फ और सिर्फ सत्ता पाने की लालसा में इन लोगों ने सेना पर, सैनिकों पर ही सवाल खड़ा कर दिया. 

बहुत पुरानी बातें न करके अभी हाल की घटनाओं पर नजर डालें तो लगता है कि यदि देश का सञ्चालन वाकई इनके हाथों में चला गया तो ये क्या-क्या न कर गुजरेंगे. पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी सीमा में घुसकर उसके आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया. इस कार्यवाही से बौखलाए पाकिस्तान ने दूसरे दिन भारत की तरफ अपने विमान दौड़ाए मगर हमारी चौकन्नी सेना के चलते वह किसी तरह की वारदात को, हमले को अंजाम नहीं दे सका. पाकिस्तान का एक विमान मार गिराया गया वहीं हमारा एक जांबाज़ विंग कमांडर उनकी गिरफ्त में आ गया. इधर सम्पूर्ण देश उस वीर की सुरक्षित वापसी के लिए मनोकामना कर रहा था वहीं विरोधी दल एक महिला को उसी वीर विंग कमांडर की पत्नी बताते हुए वीडियो ज़ारी करवा रहे थे. इसके साथ-साथ ऐसी ही विकृत सोच वालों  की तरफ से एक वीडियो और वायरल किया गया जिसमें दिखाया गया कि कैसे भारत वापसी के ठीक पहले विंग कमांडर अभिनंदन पाकिस्तानी सैनिकों के साथ डांस कर रहे हैं, खुश हैं. इन दो वीडियो को न केवल विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं, समर्थकों द्वारा शेयर किया गया बल्कि कई दलों के बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों द्वारा भी शेयर किया गया. बिना इस शर्म-लिहाज के कि एकदम झूठे वीडियो भारतीय जनता के बीच शेयर किये गए. यह दिखाया गया कि कैसे सरकार गलत बातें कर रही है, दिखाने की कोशिश की गई कि कैसे दुश्मन देश में बंद हमारा सैनिक प्रसन्न है, नाच रहा है.


ये समझने वाली बात है कि पड़ोसी देशों से मित्रता अच्छी बात है. यह भी सभी लोग मानते हैं कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं मगर जब देश में इस तरह का संकट बना हो तब विरोधी दलों द्वारा बजाय सरकार का साथ देने के इस तरह की घिनौनी हरकत की जा रही है. सेना द्वारा की गई एयरस्ट्राइक के सबूत मांगे जा रहे हैं. आतंकियों के मारे जाने पर भी सन्देश व्यक्त किया जा रहा है. पुलवामा हमले को आतंकी घटना समझने के बजाय इसे चुनावी लाभ के लिए सत्ता पक्ष द्वारा करवाया गया हमला साबित करने के प्रयास किये जा रहे हैं. देखा जाये तो देश बहुत ही गहरे संकट से गुजर रहा है, जहाँ एक तरफ सीमा पार दुश्मन हैं वहीं देश की सीमा के अन्दर ही ऐसे न जाने कितने दुश्मन हैं जो आपातकाल में दुश्मन से भी ज्यादा घातक सिद्ध हो सकते हैं. विरोध की इतनी निकृष्ट मानसिकता के द्वारा, इतनी क्षुद्र सोच के द्वारा सबकुछ किया जा सकता है, मगर न तो राजनीति की जा सकती है, न देश का भला किया जा सकता है, न सेना का, सैनिकों का, नागरिकों का सम्मान किया जा सकता है.  

27 फ़रवरी 2019

युद्ध या पूर्ण बहिष्कार ही पाकिस्तान को सुधारने का उपाय है

पाकिस्तान के रवैये के खिलाफ कूटनीति भरे कदम लगातार बढ़ाये जा रहे हैं. सरकार के द्वारा वैश्विक समुदाय को स्पष्ट सन्देश देते हुए बताया गया कि किस तरह पाकिस्तान की तरफ से कश्मीर के साथ-साथ देश के बाकी हिस्सों में आतंकी गतिविधियाँ अंजाम दी जारी हैं. इससे वैश्विक समर्थन का मिलना एक बड़ी कूटनीतिज्ञ विजय कही जाएगी. इसके अलावा पाकिस्तान से व्यापारिक गतिविधियों का बंद किया जाना, आयात शुल्क का बढ़ाया जाना भी पाकिस्तान को हालिया सबक सिखाने के लिए पर्याप्त है. इसके साथ-साथ जल समझौते पर विचार करने की, पाकिस्तान को जाने वाले पानी को रोकने सम्बन्धी बयानों ने भी पाकिस्तान को कई कदम पीछे धकेला होगा. जिस तरह की स्थितियाँ अभी देश के भीतर हैंउन्हें देखते हुए सीधा युद्ध देश के हित में नहीं होगा किन्तु जवानों पर धोखे से किया गया हमला देश भर में पाकिस्तान के खिलाफ आक्रोश पैदा किये हुए है.  ऐसे में ये कदम हाल-फ़िलहाल इसलिए भी सही माने जा सकते हैं क्योंकि उसकी तरफ से प्रायोजित आतंकवाद का खुला खेल सीमा पार से तो चल ही रहा है, देश के भीतर उसके पक्ष में बैठे लोग भी किसी आतंकी से कम नहीं. कुछ विशुद्ध आतंकी ही हैं और कुछ अपने बयानों, हरकतों से आतंकी काण्ड जैसे कदम उठा लेते हैं. इन तमाम सारे राजनैतिक, कूटनीतिज्ञ कदमों के साथ सांस्कृतिक जगत से, खेल जगत से भी पाकिस्तान का बहिष्कार सा किया जाना देश के मनोबल को बढ़ाएगा.


जैसी की खबरें आई हैं कि कलाकारों का आना-जाना नहीं होगा, क्रिकेट में पाकिस्तान के साथ विश्व कप का मैच नहीं होगा. इन दो खबरों के आने पर प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं जो कम से कम वर्तमान परिस्थितियों में सुखद नहीं कही जा सकती हैं. कलाकारों के आने-जाने पर भी फिल्म संसार के कुछ लोगों ने आपत्ति जताई है. उनके विचार से ऐसा किया जाना अलोकतांत्रिक है, कला का अपमान है. यहाँ उन कलाकरों को समझना चाहिए कि यदि पाकिस्तान सरकार वाकई कला को, संस्कृति को महत्त्व देती है तो वह इन्हीं कलाकारों के सम्मान के लिए अपनी तरफ से चलने वाले आतंकी कदमों को रोकें. कुछ विरोधी विचार क्रिकेट को लेकर भी सामने आये हैं. क्रिकेट के वरिष्ठ सदस्य सुनील गावस्कर सहित भगवान का दर्ज़ा पाए सचिन तेंदुलकर के मुख से देश के निर्णय का विरोध समझ से परे है. ये सच है कि विश्व कप में भारत का प्रदर्शन हमेशा पाकिस्तान से बेहतर ही रहा है. अतीत के बेहतर प्रदर्शन के हिसाब से आने वाले किसी भी मैच का परिणाम तय नहीं किया जा सकता है. खेल में कब किसकी स्थिति सही हो, कब कौन कमजोर हो जाये कहा नहीं जा सकता है. यदि ऐसी किसी स्थिति के बाद भारतीय टीम पाकिस्तानी टीम से हार जाती है तो खिलाड़ियों, नागरिकों के मनोबल को समझा जा सकता है. यहाँ समझना चाहिए कि खेल भावना में सम्मान तब तक है जब तक कि सामने की तरफ से भी सम्मान मिल रहा हो. समझ से परे है कि एक तरफ उस देश से आतंक को समर्थन मिल रहा है और उसी देश के साथ खेल खेला जाये. 

क्रिकेट के द्वारा सम्बन्ध सुधारने की कवायद वर्षों से होती आ रही है. इसी के चलते दोनों देशों के बीच टूर्नामेंट दोनों देशों से बाहर किसी तीसरे देश में भी आयोजित किये जाते रहे हैं. लगातार कई सालों तक ये प्रक्रिया चलती रही है, इसके बाद भी दोनों देशों के मध्य संबंधों में मधुरता नहीं आ सकी है. अब जबकि हालिया आतंकी हमला बहुत बड़ा हमला है और इसे लेकर देश में जबरदस्त आक्रोश है, गुस्सा है तब पाकिस्तान से किसी भी तरह के मैत्री सम्बन्ध शहीद जवानों का अपमान करने जैसा ही होगा. एकबारगी भले इसे स्वीकार कर लिया जाये कि वर्तमान स्थितियाँ पाकिस्तान से सीधे युद्ध या बदला लेने लायक नहीं हैं किन्तु ऐसे किसी भी कदम को अवश्य ही रोका जा सकता है जिनसे वैश्विक समुदाय को, पाकिस्तान को एक स्पष्ट सन्देश दिया जा सके. स्पष्ट रूप से बताया जा सके कि देश उसकी नापाक हरकतों के कारण उसका बहिष्कार कर रहा है. ऐसे में न केवल राजनयिक संबंधों को समाप्त किया जाना चाहिए बल्कि तमाम सारे उन कदमों को भी रोक लेना चाहिए जो दोनों देशों के मध्य सीधे-सीधे संचालित होते हों. अभी भले ही सीधे युद्ध के द्वारा न सही मगर ऐसे कदमों के द्वारा पाकिस्तान को सबक सिखाया जा सकता है.

अब जबकि पुलवामा हमले का बदला पाकिस्तानी आतंकियों से ले लिया गया है, तब जनाक्रोश में कमी आई होगी मगर पाकिस्तान की हरकतें उसका बहिष्कार किये बिना सही नहीं होनी हैं. आतंकी कैम्पों के ध्वस्त होने से बौखलाया पाकिस्तान आतंकियों की मौत का बदला लेने के लिए आज सुबह भारतीय सीमा में वायुमार्ग से घुसा. उसका मकसद किसी न किसी रूप में भारतीय सैन्य क्षेत्र में या फिर नागरिक क्षेत्र में बमबारी करना ही रहा होगा. भारतीय सेना पहले से ही मुस्तैद थी और उसने पाकिस्तान के एक विमान को मार गिराया. हालाँकि इस प्रयास में भारतीय सेना का भी एक मिग दुर्घटनाग्रस्त हो गया. आधिकारिक सूत्रों द्वारा एक पायलट लापता बताया गया है. उधर पाकिस्तान ने दावा किया है कि उसके कब्जे में एक भारतीय पायलट है. यदि उसकी बात को सही माना जाये तो अबकी गेंद उसके पाले में है कि वह पायलट को सुरक्षित लौटाते हुए वैश्विक समुदाय के सामने अपनी साख को कुछ हद तक सही कर सकता है. अन्यथा की स्थिति में वह एक दिन पूर्व ही देख चुका है कि भारतीय प्रधानमंत्री और भारतीय सेना किस कदर ठोस मगर सटीक निर्णय, कदम उठाने में पारंगत हैं. यदि अबकी भी पाकिस्तान सुधरने का प्रयास नहीं करता तो या तो उसे युद्ध के द्वारा समझाया जाये या फिर उसका सम्पूर्ण बहिष्कार किया जाये. इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है. 

26 फ़रवरी 2019

उत्साह बना रहे, जोश बना रहे, दुश्मन जिन्दा न रहे, आतंकी जिंदा न रहे


सुबह आँख खुले और खबर ऐसी मिले तो निश्चय ही सीना 56 इंच से कहीं अधिक बड़ा समझ आने लगता है. समाचार-पत्रों की अपनी बाध्यताएं होने के कारण यह खुशखबरी उनके द्वारा तो नहीं मिली मगर नियमित रूप से सुबह-सुबह ताजा खबरों के लिए जैसे ही नेट की खिड़की को खोला तो गौरवपूर्ण एक झोंका अन्दर उतरता चला गया. अपनी तसल्ली के लिए कई-कई जगहों पर घूम-फिर कर देखा तो सभी जगह उसी तरह की आनंदित, गौरवशाली बयार चल रही थी. सभी उसकी शीतलता में, उसके जोश में उत्साहित नजर आ रहे थे. सब भारत माता की जय, जय हिन्द, जय हिन्द की सेना के जयघोष के साथ उल्लासित दिखाई दे रहे थे. आखिर खबर ही ऐसी थी. इंटरनेट पर सबसे तेजी से प्रसारित होने वाली खबर में आज कि यही सबसे बड़ी और जोश भरने वाली खबर रही. पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर बड़ी कार्रवाई की खबर. भारत के 12 मिराज 2000 जेट ने पाकिस्तान में 1000 किलो के बम गिराए. भारतीय वायुसेना के इस एयरस्ट्राइक में 200-300 आतंकवादी मारे जाने की खबर.


ऐसी खबरें सुनकर किसी भी उस भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो ही जायेगा जो पुलवामा में आतंकी हमले में  जवानों की मौत का बदला लेना चाहता होगा. यद्यपि पुलवामा हमले के कुछ घंटों के भीतर ही उस हमले के मास्टरमाइंड को सेना ने मार गिराया था किन्तु कुछ बड़ा होने वाला है की सोच के साथ भारतीय नागरिक उससे संतुष्ट नहीं थे. ऐसे में भारतीय वायुसेना के 12 मिराज 2000 एयरक्राफ्ट ने बालाकोट, चकोटी और मुजफ्फराबाद में बम गिराए जाने, कई आतंकी लॉन्च पैड ध्वस्त होने की खबर ने कुछ राहत दी है. खबर यह भी है कि इस हमले में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का कंट्रोल रूम अल्फा-3 भी पूरी तरह ध्वस्त हो गया है. पुलवामा हमले के बाद ऐसी एक प्रतिक्रिया की आवश्यकता भी महसूस हो रही थी. इससे न केवल पाकिस्तान को सबक मिलेगा वरन भारतीय सेना का, सैनिकों का हौसला भी बढ़ेगा.

इस कार्यवाही का तिथिवार भी अपना महत्त्व है. पुलवामा में हमारे सैनिकों पर हमला हुआ था 14 फरवरी को. 26 फरवरी उन शहीदों की त्रयोदशी संस्कार पर भारतीय वायुसेना ने सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की है जवानों को.


भारतीय सेना, सैनिकों के हौसले के साथ-साथ आज इस खबर के आने के बाद सोशल मीडिया में भी जोश हाई बना हुआ दिख रहा है. उत्साहित नागरिकों के विचार उनकी पोस्ट, कमेन्ट में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं. एक नजर उन पर भी डाल ली जाये.
=> भारतीय वायुसेना - हम जब आएंगे, गर्मी थोड़ा बढ़ जाएगी.
=> सूत्रों के मुताबिक भारतीय वायुसेना ने पहले करीब 5 किलो टमाटर फेंके और जैसे ही कंगले बाहर टमाटर लूटने निकले, बम मार दिए.
=> इस बार हमला पीओके में नही बल्कि पाकिस्तान में हुआ है.
=> साथियो! How Is The Josh?
=> 1971 के बाद पहली बार भारतीय वायुसेना ने सीमा पार किया है। इस नाते यह ऐतिहासिक घटना है.
=> 26 फरवरी के दिन 26 जनवरी जैसा माहौल बनाने वाले मोदी जी देश के पहले प्रधानमंत्री बने.  
=> वो शांति पुरस्कार भी लेगा.. और पाकिस्तान की ओखली में धनिया भी कूट देगा...
=> वीर सावरकर की पुण्य तिथि के दिन आप सर्जिकल स्ट्राइक करते हैं और फिर गाँधी शांति पुरस्कार का वितरण करने राष्ट्रपति भवन पहुँच जाते हैं... अपने मोदीजी भी ग़ज़ब हैं!
=> आज दिल से पीएम @narendramodi को सलाम करता हूँ.आतंकियों को उनके घर में घुसकर यूँ मारने का फैसला बड़े जिगर वाला ही ले सकता है.
=> अभी तो फाइटर प्लेन्स के इंजिन की कार्बन ही चेक की गई है.  
=> ये तो Try boll था। #वन्देमातरम्.
=> उरी के बाद अगली सुपरहिट मूवी होगी पुलवामा, और अगर फिर भी न सुधरे, तो फ़ाइनल फ़िल्म होगी "एक था पाकिस्तान"
=> पाकिस्तान के खिलाफ अभी तो शुरुआत है, हमको तो जमीन पूरा समतल चाहिए... अपने यहाँ के लड़के उधर जाकर क्रिकेट प्रैक्टिस करेंगे!
=> पाकिस्तान के तशरीफ पर भारतीय वायु सेना ने 1000किलो के पैलेट के निशान बनाए.
=> हम हिंदुस्तानी है 12 दिनों तक शोक रखते है.13 वे दिन काम पर लग जाते हैं.
=> अभी तो ये अंगड़ाई है, आगे बहुत ठुकाई है. मोदी जी दिल खोल कर हमला करो, देश आपके साथ है.
=> जैसे राम इधर शबरी के जूठे बेर खा रहे थे -उधर रावण की लंका ढहा रहे थे, तैसे मोदी इधर चरण धो रहे थे, उधर पाकिस्तान की धुनाई.
=> आज तो बस #जय_छप्पन_इन्चेश्वर.
=> नया हिंदुस्तान है, घर में घुस के मारेगा, जय हिंद जय भारत.
=> उधर 72 हूरों के मैनेजर ने भारत को कड़ी आपत्ति जताई है।। उसका कहना है कि भारत ने बिना ऑर्डर दिए ज्यादा माल डिलीवर कर दिया गया अब इत्ती जल्दी इत्ती हूरों का इंतजाम हम कैसे करें।।
=> जय हिंद की सेना हमें तुम पर नाज़ है...देश को इसी का इंतज़ार था...भारतीय वायुसेना ने पहला कदम उठाया.  
=> भारत सरकार ने अपने रुख में बदलाव करते हुए डोजियर देने की जगह डोज देने की परंपरा शुरू कर दी है. 

पोस्ट लगातार आ रही हैं लोगों की. उत्साह बना रहे, जोश बना रहे, बस दुश्मन जिन्दा न रहे. आतंकी जिंदा न रहे. जय हिन्द. जय हिन्द की सेना.


18 फ़रवरी 2019

वीर सैनिकों के परिवार का हिस्सा बनें हम भी


पुलवामा में आतंकी हमले के बाद से पूरे देश में सेना के प्रति, सैनिकों के प्रति संवेदनात्मक माहौल बना हुआ है. युद्ध की बात भी हो रही है मगर उसके साथ-साथ सैनिकों के हितार्थ बात भी हो रही है. शहीद सैनिकों के सम्मान में नागरिकों में जागरूकता दिख रही है. देश में भले ही लोगों में आपस में कितने भी विभेद क्यों न रहे हों, लोगों में आपस में कितने भी राजनैतिक विरोधाभास भले ही दिखाई देते हों किन्तु सेना के नाम पर, सैनिकों के नाम पर एकजुटता देखने को मिलती है. इसी एकजुटता, सम्मान की भावना का ही परिणाम है कि सैनिकों की मदद के लिए सरकार द्वारा संचालित एक वेबसाइट लगातार हैंग कर जा रही है.


ये संवेदना, ये एकजुटता, सैनिकों के प्रति सम्मान भाव ऐसे समय और तेजी से उभर कर सामने आता है जबकि उनके साथ कोई न कोई हादसा हो जाता है. इस हादसे में हमारे वीर सैनिकों के शहीद होने के बाद उनके परिजनों की तरफ मीडिया का, राजनीतिज्ञों का, समाज सेवा करने वालों का, आम नागरिकों का ध्यान भी जाता है. ऐसा होना अच्छा है मगर यह अच्छा काम लगातार बना नहीं रह पाता है. इन वीर शहीदों के परिजनों के प्रति चंद दिनों तक तो लोगों की संवेदना बनी रहती है और कुछ दिनों, महीनों बाद उस शहीद के परिजन अकेले से पड़ जाते हैं. चंद दिनों के बाद वे जीवन की वास्तविक कठिनाइयों से जूझने लगते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि बहुतायत सैनिकों के परिवार मध्यम अथवा निम्न मध्यम आय वर्ग से आते हैं. किसी-किसी परिवार में वही सैनिक एकमात्र कमाऊ पूत होता है. कहीं-कहीं वही एक सैनिक समूचे परिवार का आधार होता है. किसी-किसी घर में वही एक सैनिक अपने छोटे भाई-बहिन के भविष्य का ख्याल रखने वाला होता है. किसी-किसी परिवार में कोई शहीद सैनिक नव-विवाहित होते हैं, कहीं-कहीं वे नवजात शिशु के पिता बने होते हैं. ऐसे में स्पष्ट है कि शहीद हुए उस जवान के घर पर चंद दिनों के बाद वास्तविक कठिनाइयाँ सिर उठाना शुरू कर देती हैं. वर्ष भर के पर्व-त्यौहार, आस-पड़ोस के आयोजन आदि के समय भी उन परिवारों को अपने खोये हुए सदस्य की याद बहुत गहराई से आती होगी. 

यही वह बिंदु होता है, यही वो स्थिति होती है जहाँ शहीद जवानों के परिजनों को वास्तविक रूप से हमारे साथ की आवश्यकता होती है. हम नागरिक जो किसी जवान की शहादत के समय संवेदित होकर एकजुट होना शुरू कर देते हैं उनको सतत एकजुट और संवेदित बने रहने की आवश्यकता है. हमें याद रखना चाहिए कि कोई सैनिक जो सेना में भर्ती होकर देश-सेवा कर रहा है, कोई सैनिक शहीद हो जाता है वे सभी किसी न किसी रूप में हमारे लिए ही सुखद माहौल बना रहे होते हैं. ऐसे में हमें उनका भी ख्याल रखने की आवश्यकता है. उनके परिजनों के अकेले होने की स्थिति में, जबकि सैनिक सेना में अपनी ड्यूटी निभा रहा है, या फिर कोई जवान शहीद हो गया होता है, हमें उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए उनका साथ देने की आवश्यकता होती है. इसके लिए हम पूरे देश भर में ऐसा करने के बजाय अपने-अपने जिले में, अपने-अपने क्षेत्र के सैनिकों की जानकारी कर सकते हैं और उनके परिजनों से समय-समय पर मिल सकते हैं. उनके साथ पर्व-त्यौहार को मना सकते हैं. उनकी किसी भी तरह की समस्या का समाधान बन सकते हैं. शहीद सैनिकों के बच्चों की शिक्षा से सम्बंधित, उनके माता-पिता के स्वास्थ्य, चिकित्सा से सम्बंधित समस्याओं का निराकरण कर सकते हैं. उनके अन्य परिजनों की परेशानियों का समाधान भी कर सकते हैं. हमारे एक कदम इस तरह से उठाने पर उन परिजनों को भी गर्व की अनुभूति होगी और वे अपने आपको कभी भी अकेला महसूस नहीं करेंगे. ये आवश्यक नहीं कि हर मदद आर्थिक रूप से हो, यह भी जरूरी नहीं कि हर शहादत के बाद ही संवेदित हुआ जाये, हम सभी ऐसा कभी भी, कहीं भी कर सकते हैं और अपने वीर सैनिकों के परिजनों का हिस्सा बन सकते हैं.

15 फ़रवरी 2019

सेना की कार्यवाही आपकी सोच से अधिक कठोर होगी, विश्वास रखिये

पुलवामा आतंकी हमले के बाद देशवासियों में आक्रोश उफान पर है. ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि एकसाथ चालीस से अधिक जवान शहीद हो गए हैं. यह बहुत बड़ा हमला है. सोशल मीडिया पर देशवासियों के द्वारा सिर्फ और सिर्फ युद्ध के द्वारा अंतिम समाधान चाहा जा रहा है. पाकिस्तान को नक़्शे से मिटाने की बात की जा रही है. एक पल को अपनी संवेदनात्मक व्यग्रता को एक किनारे रखकर विचार किया जाये तो क्या ऐसा संभव है? क्या इस हमले के तुरंत बाद बिना किसी रणनीति के ऐसा करना उचित कदम कहलायेगा? क्या किसी भी देश को नक़्शे से मिटा देना संभव है? ये सब इसलिए नहीं लिखा जा रहा कि युद्ध से समाधान नहीं निकल सकता. संभव है बातचीत की लम्बी और निरर्थक यात्रा के बाद एकमात्र विकल्प युद्ध ही बचा हो मगर इस आतंकी हमले के तुरंत बाद सिर्फ भावनात्मक उफान के चलते युद्ध खतरे को आमंत्रित करना ही होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि देश के दुश्मन सिर्फ देश से बाहर ही नहीं बैठे हैं, वे देश के अन्दर भी पूरी सक्रियता से छिपे हुए हैं. इसी हमले के तुरंत बाद वे किसी न किसी रूप में सक्रिय दिखाई देने लगे हैं. किसी ने चेतावनी सी दे दी है कि इस हमले के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक नहीं होनी चाहिए. किसी गले मिलने वाले का कहना है कि आतंकवाद का कोई देश नहीं होता है. किसी को यह राष्ट्रभक्ति का परिणाम समझ आ रहा है. कोई इस हमले के मूल में सर्जिकल स्ट्राइक का होना बता रहा है. स्पष्ट है कि ऐसे लोग ही इस समय में किसी भी तरह की कार्यवाही के समय देश के लिए ही घातक सिद्ध होंगे.



इसके अलावा याद कीजिये वह दौर जबकि मुंबई में आतंकियों ने होटल पर कब्ज़ा करके लगातार हमारे सुरक्षा बलों से मोर्चा लिया हुआ था. वे आतंकी बिना सोये, बिना खाए-पिए लगातार लगभग सत्तर घंटे तक सुरक्षा जवानों से लड़ते रहे. इसे याद दिलाने के पीछे महज इतना कहना है कि जब आतंकियों ने हमला किया है, जैश-ए-मोहम्मद नामक आतंकी संगठन ने इस हमले की जिम्मेवारी ली है तो वे संभव है कि हमारी सेना की जवाबी कार्यवाही के लिए तैयार बैठे हों. ये भी संभव है कि देश के भीतर उनके स्लीपर सेल के रूप में काम कर रहे उनके लोग भी इसी ताक में बैठे हों कि कब सेना आक्रोशित होकर जवाबी कार्यवाही करे और वे देश के भीतर उत्पात करना शुरू कर दें. सोचिये कि आज, अभी बिना किसी रणनीति के भावना में बहकर सेना जवाबी कार्यवाही कर दे और देश के अन्दर आतंकियों के स्लीपर सेल मुंबई हमले जैसी कार्यवाही देश के कई हिस्सों में कर दें तो सेना किस मोर्चे को संभालेगी? हमारे वीर सैनिक देश के बाहर के दुश्मनों से निपटेंगे या फिर देश के भीतर के दुश्मनों से? 

इसके साथ-साथ वह दिन भी याद करिए जबकि हमारे देश का विमान अपहरण करके कंधार ले जाया गया था. सैकड़ों सवारियों के बदले में एक आतंकी माँगा गया था. तब क्या किसी एक सवारी के परिजन ने सरकार से कहा था कि हमारे परिजन शहीद हो जाने दो मगर आतंकी रिहा नहीं होना चाहिए? इसके उलट परिजनों ने हंगामा काटना शुरू कर दिया था. सरकार पर दवाब बनाना शुरू कर दिया था. वे जल्द से जल्द आतंकी को रिहा करके अपने परिजनों की रिहाई चाह रहे थे. सोचिये, ऐसे ही नागरिक आज तुरंत युद्ध करने की, पाकिस्तान समाप्त करने की बात कर रहे हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि सेना में उनके घर का कोई नहीं है. सीमा पर उनको लड़ने नहीं जाना है. दुश्मन की गोलियाँ खाकर उनको शहीद नहीं होना है. यहाँ धैर्य की नहीं बल्कि रणनीति की आवश्यकता है. यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि जो सैनिक इस हमले में शहीद हुए हैं, उनके साथी भी उनके साथ सेना का हिस्सा हैं. उनके मन में हमसे कहीं अधिक आक्रोश, कहीं अधिक गुस्सा आतंकियों के लिए होगा. इसके बाद भी वे संयत हैं, धैर्य धारण किये हुए हैं क्योंकि वे स्थिति की वास्तविकता को समझते हैं. वे हम सामान्य नागरिकों से ज्यादा अनुशासित हैं. हम सामान्य नागरिकों से ज्यादा संयमित हैं. उनको एहसास है कि कब, किस स्थिति में, किस रणनीति के साथ दुश्मन पर हमला करना है. याद कीजिये उरी आतंकी हमले के बाद की सर्जिकल स्ट्राइक. 



अंत में उनके लिए कुछ पंक्तियाँ जो नोटबंदी को आतंकी हमले से जोड़कर बार-बार एक आरोप सा अपनी ही सरकार पर लगा रहे हैं. वे ध्यान रखें कि नोटबंदी हुए दो साल से अधिक हो चुके हैं. इस समयावधि में आतंकी संगठनों ने हमारे देश के भीतर पनप चुके उनके एजेंटों द्वारा, स्लीपर सेल द्वारा, विभिन्न सफेदपोशों द्वारा इतना धन तो जमा कर ही लिया होगा कि दो साल में एक हमला कर सके. नोटबंदी के बाद से अभी तक कितने आतंकी हमले हुए, इसका आकलन खुद करना चाहिए ऐसे लोगों को. याद रखना होगा कि जिस देश में सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगे जाते हों, जहाँ पड़ोसी दुश्मन देश से अपने देश की सरकार गिराने की मदद माँगी जाती हो वे कब आतंकियों के पक्ष में झुक जाएँ कहा नहीं जा सकता. देशवासी जितने आक्रोश में हैं, उससे कहीं अधिक आक्रोश में हमारी सेना है, हमारे वीर सैनिक हैं. हमें बस उनकी रणनीति का, उनके कदम का, उनकी कार्यवाही का इंतजार करना होगा ऐसे समय में. वह हमारी सोच से कहीं अधिक होगा, भले ही वह युद्ध के रूप में न हो मगर किसी युद्ध से कम न होगा.

14 फ़रवरी 2019

दुखद क्षण में संयम और सरकारी कार्यवाही की प्रतीक्षा


फिर एक आतंकी आत्मघाती हमला. इसे भले ही आतंकियों की कायराना हरकत कहा जाये, घटना की निंदा की जाए मगर सत्य यही है कि सरकार को आतंकियों के ठिकानों पर ताबड़तोड़ हमले करने ही होंगे. ये ठिकाने देश के बाहर के हो सकते हैं, देश के भीतर के भी हो सकते हैं. यदि ऐसे आतंकी हमलों का विश्लेषण किया जाये तो साफ़-साफ़ दिखाई देता है कि कहीं न कहीं इन आतंकियों को देश के भीतर से भी मदद मिलती है. ये जरूरी नहीं कि देश के भीतर से मिलने वाली मदद इन आतंकियों को किसी आर्थिक रूप में हो, किसी तरह से अस्त्र-शस्त्र के रूप में हो, किसी तरह के संरक्षण के रूप में हो. इनकी मदद के कई और रूप भी हो सकते हैं. आतंकवाद विरोधी गतिविधियों पर, सेना, सैनिकों के खिलाफ कदम उठाने वालों पर कार्यवाही करने सम्बन्धी कदमों पर देश में जिस तरह से राजनैतिक बयानबाजी होने लगती है, उसे देखकर भी इन आतंकियों के हौसले बढ़ जाते होंगे. इस तरह के राजनैतिक बयानबाजी से देश में जनसाधारण के बीच भी एक तरह से कई-कई गुट बन जाया करते हैं. इन्हीं गुटों का फायदा उठाकर ये आतंकी तत्त्व समाज के बीच ही आम नागरिक बनकर रहने लगते हैं. कहीं न कहीं ये नागरिक गुट ही अनजाने ही इन आतंकियों के मददगार साबित होने लगते हैं.


पुलवामा में हुए आज के आतंकी हमले के बाद ही राजनैतिक बयानबाजी आरम्भ हो गई है. ऐसे मौके पर जबकि सम्पूर्ण देश सैनिकों की शहादत पर दुःख व्यक्त कर रहा है तब राजनैतिक बयानबाजी आपसी कटुता दर्शाने के लिए नहीं होनी चाहिए. इस तरह से शोक के, दुःख के संवेदनशील अवसर पर न केवल राजनैतिक दलों को वरन मीडिया, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक चैनल्स को भी संयम बरतने की आवश्यकता होनी चाहिए. जहाँ एक तरफ राजनैतिक बयानबाजी से देश-विरोधी ताकतें अंदाज लगा लेती हैं कि कौन देश के साथ है और कौन देश के विरोध में. ऐसे बयानों से उनको आकलन करने में आसानी होती है कि सरकार किस स्तर तक की कार्यवाही कर सकती है. ऐसे ही बयानों के कारण आतंकियों के सरगना अपने कदमों के सम्बन्ध में अति-आत्मविश्वास से भर उठते हैं. और ये सब बयानबाजियाँ आतंकियों के पास तक पहुँचाने का काम बड़ी आसानी से इलेक्ट्रॉनिक चैनल्स द्वारा हो जाता है.

ऐसा नहीं है कि सरकार की नाकामी की चर्चा नहीं होनी चाहिए. ऐसा भी नहीं कि देश के ख़ुफ़िया तंत्र की असफलता की चर्चा न होनी चाहिए मगर इनका समय कम से कम वह तो नहीं होता है जबकि समूचा देश सैनिकों की शहादत पर स्तब्ध है. यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि क्या वाकई सरकार या ख़ुफ़िया तंत्र पूरी तरह से असफल ही हुआ है? यहाँ जिस तरह से नोटबंदी को आतंकी हमले से जोड़कर इस बार अनावश्यक बयान दिए जाने का काम होने लगा है क्या वे बताएँगे कि नोटबंदी के बाद किस तरह की आतंकी घटनाएँ सामने आई हैं? कितनी आतंकी घटनाएँ सामने आई हैं? असल में देश के अन्दर इस तरह का माहौल बन चुका है जहाँ सिर्फ दो धड़े ही दिखाई देते हैं. एक धड़े में सरकार या कहें कि भाजपा के समर्थक हैं दूसरे धड़े में वे लोग हैं जो किसी न किसी रूप में भाजपा सरकार को गिराना चाहते हैं, किसी भी घटना का दोष वर्तमान केंद्र सरकार पर थोपना चाहते हैं.

इस आतंकी हमले के बाद जोर-शोर से आतंकी ठिकानों को नष्ट करने की बात होने लगी है. यहाँ ध्यान रखने की आवश्यकता है कि इस देश में वही लोग भी हैं जो सरकार की सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत माँगते हैं. इसी देश में वे लोग भी हैं जो सेना को गाली देते हैं. इस देश में वे लोग भी हैं जो किसी सैनिक की शहादत पर भी अनर्गल बोल बोलने से नहीं चूकते हैं. इस देश में वे लोग भी साँस ले रहे हैं जो भारत के टुकड़े होने के नारे लगाते हैं. इसी देश में वे लोग भी हैं जो घर-घर से अफज़ल निकलने की बात करते हैं. वे भी इसी देश के नागरिक हैं जो हमारे दुश्मन पड़ोसी देश में जाकर देश की सरकार गिराए जाने की बात करते हैं. इसी देश में ऐसे लोग भी हैं जिन्हें हमारे सैनिकों के हत्यारे प्रमुख से गले मिलने में शर्म महसूस नहीं होती है. ऐसे में सोचने की आवश्यकता है कि ये लोग सरकार की आतंकी विरोधी कार्यवाही का किस स्तर तक समर्थन कर सकेंगे? ये भी सोचा-विचार जाना चाहिए कि सरकार की आतंकी कार्यवाही के शुरू होने पर ये लोग देश के भीतर किसी तरह की अशांति नहीं फैलायेंगे? इस पर भी विचार करने की जरूरत है कि देश की सेना बाहरी ताकतों से लड़ने का, उन्हें मिटाने का काम करने लगेगी ऐसे में देश की अंदरूनी ताकतों को हवा देने वाले देश-विरोधी कदम नहीं उठाएंगे? 

सैनिकों की शहादत पर किसी भी सच्चे देशभक्त का नाराज होना, आक्रोशित होना स्वाभाविक है. ऐसे मौके पर वह सरकार से कठोर से कठोर कार्यवाही किये जाने की माँग करता है, करनी भी चाहिए. यही वह क्षण होता है जहाँ शांत भाव से सरकार के कदम की प्रतीक्षा करनी चाहिए. यह शांति इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि वर्तमान में वह केंद्र सरकार है जिसके शासनकाल में आतंकी हमलों में जबरदस्त गिरावट आई है. यह भी एक तरह की खीझ है जो देश की बाहरी और अंदरूनी ताकतों में उत्पन्न हो चुकी है. देशवासियों को, राजनैतिक दलों को, मीडिया को ऐसे समय में संयम से काम लेते हुए सरकार के कदम की प्रतीक्षा करनी चाहिए. बाकी सरकार पर चिल्लाने के लिए आने वाला समय है ही फिर.


31 जनवरी 2019

प्रथम परमवीर चक्र से सम्मानित वीर को सादर नमन


आज, 31 जनवरी पहले परमवीर चक्र से सम्मानित होने वाले मेजर सोमनाथ शर्मा का जन्मदिन है. वे भारतीय सेना की कुमाऊँ रेजिमेंट की चौथी बटालियन की डेल्टा कंपनी के कमांडर थे. सन 1947 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उन्होंने अपनी वीरता से शत्रु के छक्के छुड़ा दिये थे. इसके लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरान्त परमवीर चक्र से सम्मानित किया था. उनका जन्म 31 जनवरी 1923 को जम्मू में हुआ था. इनके पिता मेजर अमरनाथ शर्मा भी सेना में डॉक्टर थे. इसके साथ-साथ उनके मामा लैफ्टिनेंट किशनदत्त वासुदेव 4/19 हैदराबादी बटालियन में थे तथा 1942 में मलाया में जापानियों से लड़ते शहीद हुए थे. अपने पिता और मामा के प्रभाववश वे भी सेना में भरती हुए. 


मेजर सोमनाथ ने अपना सैनिक जीवन 22 फरवरी 1942 से शुरू किया. तब उन्हें चौथी कुमायूं रेजिमेंट में बतौर कमीशंड ऑफिसर प्रवेश मिला. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्हें मलाया के पास के रण में भेजा गया जहाँ इन्होंने अपने पराक्रम के तेवर दिखाए. इसके चलते वे एक विशिष्ट सैनिक के रूप में पहचाने जाने लगे. सन 1947 के भारत पाकिस्तान युद्ध के समय मेजर सोमनाथ शर्मा की टुकड़ी को कश्मीर घाटी के बदगाम मोर्चे पर जाने का हुकुम मिला. 3 नवम्बर को मेजर सोमनाथ बदगाम जा पहुँचे और उत्तरी दिशा में उन्होंने अपनी टुकड़ी तैनात कर दी. तभी दुश्मन की सेना ने उनकी टुकड़ी को तीन तरफ से घेरकर हमला किया. भारी गोलाबारी में उनके सैनिक हताहत होने लगे. अपनी दक्षता का परिचय देते हुए मेजर सोमनाथ ने अपने सैनिकों के साथ गोलियां बरसाते हुए दुश्मन को बढ़ने से रोके रखा.

इस दौरान बहुत से भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हो चुके थे. सैनिकों की कमी को मेजर महसूस कर रहे थे. ऐसे समय में एक मोर्टार का निशाना ठीक वहीं पर लगा जहाँ वे खुद मौजूद थे. दुश्मन सेना की तरफ से किये गए इस विस्फोट में मेजर सोमनाथ शहीद हो गये. उन्होंने प्राण त्यागने से ठीक पहले अपने वीर सैनिकों को प्रोत्साहित करते हुए कहा था कि, दुश्मन हमसे केवल पचास गज की दूरी पर है. हमारी गिनती बहुत कम रह गई है. हम भयंकर गोली बारी का सामना कर रहे हैं फिर भी मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा और अपनी आखिरी गोली और आखिरी सैनिक तक डटा रहूँगा.

उनकी वीरता और भारतीय सैनिकों के जोश के चलते श्रीनगर विमानक्षेत्र से पाकिस्तानी घुसपैठियों को बेदख़ल करते हुए मेजर 3 नवम्बर 1947 को वीरगति को प्राप्त हुए. इसके लिए उन्हें पहले परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. इसे संयोग ही कहा जायेगा कि परमवीर चक्र का डिजाइन मेजर शर्मा के भाई की पत्नी सावित्री बाई खानोलकर ने तैयार किया था.

आज उनकी जन्मतिथि पर उन्हें श्रद्धा-सुमन अर्पित हैं. 


15 जनवरी 2019

गर्व से कहो हम सब भारतीय सेना के साथ हैं


भारतीय थल सेना आज यानि कि 15 जनवरी को प्रतिवर्ष सेना दिवस मनाती है. इसी दिन सन 1949 में फील्ड मार्शल के०एम० करियप्पा ने ब्रिटिश राज के समय की भारतीय सेना के अंतिम अंग्रेज शीर्ष कमांडर जनरल फ्रांसिस बुचर से भारतीय सेना की कमान ली थी. उन्होंने भारतीय सेना के पहले कमांडर इन चीफ़ के रूप मे कार्यभार संभाला था. तब से ले कर आज तक हर साल इस दिन भारतीय सेना का हर एक जवान राष्ट्र के प्रति अपने समर्पण की कसम को दोहराता है. इसके साथ ही वह एक बार फिर और मुस्तैदी से देश सेवा के लिए, राष्ट्र की रक्षा के लिए तैनात हो जाता है. सेना दिवस का आरम्भ दिल्ली के अमर जवान ज्योति पर शहीदों को सलामी के साथ किया जाता है.


वर्तमान दौर में सेना का कार्य, दायित्व सिर्फ सीमा पर तैनात रहकर दुश्मन से निपटना भर नहीं है. अब उसे न केवल देश के बाहरी दुश्मनों से सामना करना पड़ता है बल्कि देश के अंदरूनी दुश्मनों से भी निपटना पड़ता है. इसके अलावा अनेक तरह के सामाजिक कार्यों में भी सेना की मदद ली जाती है. सेना निस्वार्थ भाव से सभी तरह के कार्यों में अपना अमूल्य योगदान देती है. बाढ़ हो, भूकंप हो या फिर कोई भी प्राकृतिक आपदा, इसके साथ-साथ किसी भी तरह की मानवजनित आपदा हो, किसी भी व्यक्ति को बचाने का कार्य हो, किसी अति-विशिष्ट की सुरक्षा का दायित्व हो, देश के किसी भाग में होने वाली हिंसक गतिविधि से निपटना हो या अन्य किसी तरह का जनहित सम्बन्धी सहायतार्थ कार्य सभी में सेना को, सेना के जवानों को तत्परता से जुटे देखा जा सकता है.

इसके बाद भी देश में अब एक वर्ग ऐसा उत्पन्न हो गया है जो कथित राजनैतिक चालबंदी के चलते, गुटबंदी के चलते, तुष्टिकरण के चलते सेना का विरोध करने में लगा है. भारतीय सेना के वीर जवान की हिम्मत, उसके कार्यों, समर्पण पर उँगली उठा रहा है. वो प्रत्येक भारतीय नागरिक जो सेना के प्रति, वीर सैनिक के प्रति सम्मान का भाव रखता है, ऐसी मानसिकता वालों को मुंहतोड़ जवाब देने का जज्बा रखता है.

गर्व से कहो कि हम सब भारतीय सेना के साथ हैं, वीर सैनिकों के साथ हैं. जय हिन्द...



17 दिसंबर 2018

पाकिस्तान पर विजय का दिवस

भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों की जब भी चर्चा होती है तो प्रत्येक देशवासी के मन में यही भावना रहती है कि देश पाकिस्तान से सदैव आगे ही आगे रहे. खेल के मैदान से लेकर राजनीति के अखाड़े तक कहीं भी पाकिस्तान को आगे बढ़ते देख पाना देशवासियों के लिए संभव नहीं होता है. एकाधिक अवसरों पर देखा गया है जबकि पाकिस्तान पर विजय का उल्लास कई-कई दिनों तक बना रहा. जीत की ख़ुशी में जश्न लम्बे समय तक चलते रहे. जब खेल के मैदान की यह स्थिति होती है तो सोचा जा सकता है हमारे सैनिकों, हमारी सेना द्वारा उसको युद्ध में हराये जाने का जश्न कितना-कितना लम्बा और गौरवान्वित करने वाला रहा होगा. सन 1971 के युद्ध में भारत की पाकिस्तान पर जीत का जश्न आज भी पूरा देश विजय दिवस के रूप में मनाता है. विजय दिवस प्रति वर्ष 16 दिसम्बर को मनाया जाता है. इस युद्ध का अंत पाकिस्तानी सेना के 93,000 सैनिकों के आत्मसमर्पण के द्वारा हुआ था. इसके बाद पूर्वी पाकिस्तान आजाद हुआ जो आज बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है. इस युद्ध में लगभग 3900 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे. 


इस युद्ध की पृष्ठजभूमि वर्ष 1971 के शुरू होते ही बनने लगी थी. पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह याहिया ख़ां ने 25 मार्च 1971 को पूर्वी पाकिस्तान को सैनिक ताकत कब्जे में कर लिया. शेख़ मुजीब को गिरफ़्तार कर लिया गया. वहाँ पर सैनिकों के अत्याचारों के चलते वहां से शरणार्थी लगातार भारत आने लगे. ऐसा होने पर वैश्विक समुदाय की तरफ से भारत पर यह दबाव पड़ने लगा कि वह वहां पर सेना के जरिए हस्तक्षेप करे. इस सम्बन्ध में तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी ने थलसेनाध्यक्ष जनरल मानेक शॉ से विचार-विमर्श किया. तब की प्राकृतिक स्थिति के चलते भारतीय सेना लगातार युद्ध करने में सक्षम नहीं समझ आ रही थी. ऐसे में मानेक शॉ ने इंदिरा गांधी से स्पष्ट कहा कि वे पूरी तैयारी के साथ ही युद्ध के मैदान में उतरना चाहते हैं. असल में इंदिरा गाँधी उसी समय अप्रैल में ही हमला करना चाहती थीं.

दिसंबर 1971 में एक शाम पाकिस्तानी वायुसेना के विमानों ने भारतीय वायुसीमा को पार करके पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर, जोधपुर, आगरा आदि सैनिक हवाई अड्डों पर बम गिराने शुरू कर दिए. इंदिरा गांधी ने मंत्रिमंडल की आपात बैठक की और भारतीय सेना हमले के लिए तैयार हो गई. युद्ध शुरू होने के बाद 14 दिसंबर को भारतीय सेना ने एक गुप्त संदेश को पकड़ा कि दोपहर ग्यारह बजे ढाका के गवर्नमेंट हाउस में एक महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है, जिसमें पाकिस्तानी प्रशासन बड़े अधिकारी भाग लेने वाले हैं. उसी दौरान ही भारतीय सेना के मिग 21 विमानों ने भवन पर बम गिरा कर मुख्य हॉल की छत उड़ा दी. भारतीय सेना लगातार आगे बढ़ती जा रही थी. पाकिस्तानी जनरल जैकब की हालत बिगड़ रही थी. भारतीय सेना ने युद्ध पर पूरी तरह से अपनी पकड़ बना ली थी. 16 दिसंबर की सुबह मानेकशॉ का संदेश जनरल जैकब को मिला कि आत्मसमर्पण की तैयारी के लिए तुरंत ढाका पहुंचें. शाम के साढ़े चार बजे जनरल अरोड़ा हेलिकॉप्टर से ढाका हवाई अड्डे पर उतरे. पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी बलों के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल ए०ए०के० नियाजी ने भारत के पूर्वी सैन्य कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था. दोनों ने आत्मसमर्पण के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए. नियाज़ी ने अपनी वर्दी से अपने बिल्ले उतारे और अपना रिवॉल्वर जनरल अरोड़ा के हवाले कर दिया. उस समय नियाज़ी की आंखों में आंसू आ गए थे. सम्पूर्ण घटनाक्रम वहाँ के स्थानीय नागरिकों के संज्ञान में भी था. वे लोग नियाजी की हत्या़ पर उतारू थे. भारतीय सेना के वरिष्ठ अफ़सरों ने नियाज़ी को सुरक्षित रूप से बाहर निकाला. जिसके बाद 17 दिसम्बर को 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को युद्धबंदी बनाया गया.

जब पाकिस्तान पर विजय की खबर जनरल मानेक शॉ ने प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को दी तो उनकी घोषणा के बाद पूरा देश जश्नज में डूब गया. इस ऐतिहासिक जीत को खुशी आज भी हर देशवासी के मन को उमंग से भर देती है.

06 दिसंबर 2018

कश्मीर तो होगा मगर अबकी न पाकिस्तान होगा


अपनी 72 हूरों को हमारा सलाम बोलना, कहना दावत पर इंतजार करें, आज बहुत सारे मेहमान भेजने वाले हैं.
ये हिंदुस्तान अब चुप नहीं बैठेगा, ये नया हिंदुस्तान है, ये घर में घुसेगा भी और मारेगा भी.
उन्हें कश्मीर चाहिए और हमें उनका सिर.
ये महज शब्द नहीं है वरन देशवासियों का आक्रोश है. आक्रोश भी उन देशवासियों का जिन्होंने सेना को, सैनिकों को किसी राजनैतिक दल के सापेक्ष नहीं आँका है. उन्हीं देशवासियों के लिए ये शब्द लहू में उबाल ला सकते हैं जिन्होंने सेना की किसी भी गतिविधि को संशय की निगाह से नहीं देखा है. ये शब्द उनके लिए देशभक्ति का प्रमाण हैं जिन्होंने कभी किसी सैनिक को तन्हा नहीं माना है. ये शब्द भले ही आज किसी कलम से निकले हैं मगर ये शब्द हमारे वीर सैनिकों द्वारा बराबर उच्चारित किये जाते हैं. ये महज एक झलक हैं बहुत जल्द हम सभी के सामने आने वाली फिल्म उरी के संवादों की. जैसा कि शब्द से स्पष्ट है, ये फिल्म उरई हमले और उसके पश्चात् हुए सर्जिकल स्ट्राइक के सम्बन्ध में बनाई गई है. कहना न होगा कि जब-जब सेना से, सैनिकों से सम्बंधित फ़िल्में, कार्यक्रम समाज के बीच आये हैं, उनका स्वागत किया गया है. इसका भी होगा.


हम बहुत कुछ तो नहीं कर पाए अपने सैनिकों के लिए, सेना के लिए. बस इस कविता के माध्यम से अपने विचार आप सबके बीच....
+
मौत बाँटती जिंदगियों का अब यहाँ अवसान होगा,
धैर्य का और कितना, कब तलक इम्तिहान होगा,
गूँजा वन्देमातरम का फिर वही जोशीला गान तो,
कश्मीर तो होगा मगर अबकी न पाकिस्तान होगा.

किस घमंड में चूर हो इतिहास पर डालो नज़र,
याद रखो तुम हमेशा अपनी पराजय का सफ़र,
हो बड़े बदजात तुमको क्यों नहीं आता नज़र,
गूँजा वन्देमातरम का फिर वही जोशीला गान तो,
कश्मीर तो होगा मगर अबकी न पाकिस्तान होगा.

है मचलना, खूब मचलो, अपनी सीमा में रहो,
खेलना है, होली खेलो, खून से खुद को ही रँगो,
हमसे टकराने के पहले याद बस इतना रखो,
गूँजा वन्देमातरम का फिर वही जोशीला गान तो,
कश्मीर तो होगा मगर अबकी न पाकिस्तान होगा.

करुण क्रंदन कर रही हैं वादियाँ कश्मीर की,
हिमगिरि की धवलता फिर मलिन होने लगी,
वर्तमान-इतिहास छोड़ो बदलेगा अब भूगोल भी,
गूँजा वन्देमातरम का फिर वही जोशीला गान तो,
कश्मीर तो होगा मगर अबकी न पाकिस्तान होगा.
@ कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र