आज 16 दिसम्बर को विजय दिवस देश भर में मनाया जाता है. इसको मनाये जाने का कारण 1971 में हुए युद्ध में भारत की पाकिस्तान पर जीत है. पाकिस्तान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी ने भारत के पूर्वी सैन्य कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था. इस युद्ध के अंत के बाद 93000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया था. इस युद्ध में पाकिस्तान की पराजय के बाद पूर्वी पाकिस्तान स्वतंत्र हो गया था. यही स्वतंत्र भाग आज बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है. इस युद्ध में लगभग चार हजार भारतीय सैनिकों को वीरगति प्राप्त हुई थी और दस हजार के आसपास सैनिक घायल हुए थे.
16 दिसंबर 2025
13 मई 2025
समाज के दुश्मन से लड़ने को तैयार रहें
पहलगाम में
आतंकियों की अप्रत्याशित रूप से धार्मिक पहचान कर हिन्दुओं की हत्याएँ करने के बाद
समूचे देश ने केन्द्र सरकार से कठोर कार्यवाही की अपेक्षा की थी. निर्दोषों को मौत
की नींद सुलाने के साथ-साथ ‘मोदी को बता देना’ जैसी चुनौती के बीच जनसामान्य को दृढ़ विश्वास था कि केन्द्र
सरकार की तरफ से जबरदस्त जवाबी कदम उठाया जायेगा. प्रत्येक दिन जितनी आशा के साथ
आता, उतनी निराशा के साथ चला जाता. उरी और पुलवामा के आतंकी
हमलों के बाद सरकार की तरफ से की जा चुकी सैन्य स्ट्राइक के बाद भी इस बार की
चुप्पी जनसामान्य के भीतर एक तरह के रोष को जन्म दे रही थी. बहुसंख्यक भारतीय
नागरिक पाकिस्तान को, पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों को
सिर्फ सबक सिखाने की मंशा नहीं बल्कि उनका सम्पूर्ण विध्वंस करने की चाह रख रहे
थे.
दरअसल जनता का
मनोविज्ञान तुरंत बदला लेने का होता है. उसके लिए रणनीति, कूटनीति आदि का कोई सन्दर्भ नहीं
होता है. इसके उलट सरकार के लिए युद्ध का तात्पर्य किसी दूसरे देश पर केवल हमला
करना भर नहीं होता है बल्कि अपने देश, सेना, नागरिकों की अत्यल्प क्षति के साथ युद्ध को अपने पक्ष में ले जाना होता
है. सरकार की मंशा कुछ इसी तरह की रही होगी कि बिना युद्ध जैसे ट्रैप में फँसे
पाकिस्तान को सबक सिखाया जाये. देखा जाये तो दक्षिण एशिया की वर्तमान भू-राजनैतिक
स्थितियाँ भारत के पक्ष में नहीं हैं. सभी पड़ोसी देशों में राजनैतिक हलचल मची हुई
है. ऐसे में अनिश्चितकालीन अथवा दीर्घकालिक युद्ध वाला माहौल न केवल देश को क्षति
पहुँचा सकता है बल्कि चीन को हस्तक्षेप करने का अवसर प्रदान कर सकता है.
सरकार ने अपनी
नीति, अपनी योजना के
अनुसार कार्य करते हुए ऑपरेशन सिन्दूर के द्वारा पाकिस्तान स्थित आतंकी शिविरों, प्रशिक्षण शिविरों पर आधी रात में मिसाइल स्ट्राइक करके उनको ध्वस्त कर
दिया. जानकारी होते ही आक्रोशित जनमानस उत्साह, जोश से भर
गया. बहुसंख्यक नागरिक वर्ग खुद को इस ऑपरेशन से जुड़ा हुआ महसूस करते हुए
पाकिस्तान से निर्णायक मोर्चा खोलने की मंशा बनाने लगा. पाकिस्तान समर्थित
आतंकियों के खिलाफ भारत सरकार की सैन्य कार्यवाई से भारतीय जनमानस का जोश अचानक से
उस समय शांत कर दिया गया जबकि खबर आई कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के
हस्तक्षेप से भारत और पाकिस्तान में युद्ध विराम होने जा रहा है. युद्ध विराम की
घोषणा होते ही वो जनमानस जो पाकिस्तान पर कब्ज़ा किये जाने के, उसके कई हिस्सों में टूट जाने के, पाकिस्तान अधिकृत
कश्मीर के मुक्त हो जाने की बात करते हुए सरकार की शान में कशीदे पढ़ रहा था, वही एकदम से सरकार के विरुद्ध हो गया.
बहरहाल, मुद्दा यह नहीं कि सरकार ने आतंक के
खिलाफ कार्यवाही देर से क्यों शुरू की? मुद्दा यह भी नहीं कि
सम्पूर्ण ध्वंस किये बिना आखिर सरकार ने युद्ध विराम पर सहमति क्यों दी? यहाँ विचार करना होगा कि बहुतायत लोग पाकिस्तान के खिलाफ आर-पार की लड़ाई
चाह रहे थे, आतंकियों का सर्वनाश चाह रहे थे उन बहुतायत
लोगों के परिवारों से सेना में भर्ती होने वालों की संख्या कितनी है? इस बिन्दु पर आकर माना जा सकता है कि चलिए सभी को सेना में भर्ती नहीं
किया जा सकता है; सभी को सैनिक नहीं बनाया जा सकता है; सभी को युद्ध के मैदान में
नहीं भेजा जा सकता है. इन्हीं स्थितियों के बीच से एक स्थिति यह निकलती है कि देश
के दुश्मन को मिट्टी में मिला देने की हुँकार भरने वाले,
आतंकियों का नामोनिशान मिटाने की बात करने वाले लोग समाज के दुश्मन से, समाज के आतातायियों से लड़ने सामने क्यों नहीं आते हैं? महिलाओं-बेटियों के साथ छेड़खानी करने वाले, खुलेआम हत्या करने वाले, चेहरे पर तेजाब फेंक देने वाले, चलती गाड़ी में
गैंग-रेप जैसा जघन्य कृत्य करने वाले, सरेआम लूटमार करने
वाले भी किसी रूप में आतंकवादियों से कम नहीं हैं. जैसे देश के दुश्मन बड़े रूप में
देश को नुकसान पहुँचाते हैं, वैसे ही ये लोग समाज को नुकसान पहुँचाते हैं.
ऐसे अपराधियों के
मनोबल बढ़ने का कारण कहीं से इनका विरोध नहीं होना है. शांति मार्च निकाल देने, मोमबत्तियाँ जला देने, भाषणबाजी कर लेने से अपराधियों के हौसले पस्त नहीं होते. जनसामान्य की एक
आम सोच है कि समाज में क्रांतिकारी तो पैदा हो मगर पड़ोसी के घर में. ऐसी सोच के
चलते एक सामान्य नागरिक खुलेआम होते अपराध का सीधा विरोध नहीं करता है. किसी
अपराधी का सीधा विरोध न होने से ही वह निरंतर अपराध को अंजाम देता रहता है. सोचिए,
जिस तरह से हम किसी भी विरोध से पहले अपने परिजनों का, अपने
परिवार का स्मरण करने लगते हैं, उनके भविष्य के प्रति चिंतातुर होने लगते हैं ठीक वैसे ही सीमा पर तैनात
सैनिक का परिवार है, परिजन हैं; वे भी किसी का परिवार हैं, परिजन हैं. उनके दुश्मन देश में सीमा पार घुसकर हमला करने को हम सभी अपना
जोश, अपना उत्साह, अपनी वीरता मान लेते
हैं मगर असल में यह हमारी वही मानसिकता होती है जिसमें क्रांतिकारी पड़ोस में जन्मा
होता है.
देश के वीर सैनिक
तो सीमा पर दुश्मन के खिलाफ डटे खड़े रहते हैं, अपनी जान की बाजी लगाये रहते हैं. हमें भी समाज के दुश्मनों
के खिलाफ, अपने सभ्य नागरिकों के अपराधियों के विरुद्ध सीना
तानकर खड़े होने की आवश्यकता है. स्मरण रखना होगा कि युद्ध सिर्फ और सिर्फ युद्ध
होता है, वह चाहे देश के दुश्मन के साथ हो या समाज के दुश्मन के साथ. इसमें जानें
ही जाती हैं, क्षति होती है, दुश्मन की और अपनी भी. सोचियेगा, क्या आप समाज के दुश्मन से लड़ने को तैयार हैं?
13 फ़रवरी 2024
बदलते भारत की कूटनीतिक विजय
भारतीय नौसेना के सात
पूर्व अधिकारियों ने दिल्ली हवाई अड्डे को जब भारत माता की जय के नारों से
गुंजायमान कर दिया, तब
वह क्षण भारत के लिए वैश्विक कूटनीति और विदेश नीति में विजय का क्षण था. ये वही पूर्व
सैनिक थे जिनको क़तर की अदालत द्वारा मौत की सजा सुनाई गई थी. इन पूर्व नौसैनिक
अधिकारियों की मौत की सजा को भारत के कूटनीतिक हस्तक्षेप के बाद कतर ने माफ कर
दिया था. मौत की सजा माफ़ होने के बाद भी भारत ने प्रयासों में कमी न रखी. आखिरकार इन
पूर्व नौसैनिकों को कतर ने रिहा कर दिया. इस मामले में भारत सरकार की कूटनीति की
सराहना करनी होगी क्योंकि कुछ दिन पहले लोकसभा में एक सदस्य ने सरकार को कतर में बंद
सैनिकों को वापस लाने की चुनौती दी थी. भारत सरकार द्वारा बिना किसी शोर-शराबे और
प्रतिक्रिया के सकारात्मक रणनीति पर कार्य करते हुए अपने नागरिकों को रिहा करवा
लिया गया.
जेल से रिहा हुए ये
पूर्व नौसैनिक दहरा ग्लोबल टेक्नोलॉजीज एंड कंसल्टिंग सर्विसेज में काम करते थे. दोहा
स्थित यह निजी फर्म कतर के सशस्त्र बलों और सुरक्षा एजेंसियों को प्रशिक्षण और अन्य सेवाएँ प्रदान
करती है. यद्यपि क़तर सरकार द्वारा आरोपों का स्पष्ट रूप से खुलासा नहीं किया गया तथापि
ऐसा समझा जा रहा कि इनको कतर के पनडुब्बी प्रोग्राम के सम्बन्ध में इजरायल के लिए जासूसी
करने के संदेह में गिरफ्तार किया गया था. भारत सरकार ने आरोपों को लेकर तो कुछ नहीं
कहा, लेकिन उसने अपने नागरिकों
के साथ उचित व्यवहार की करने पर जोर दिया था. इस रिहाई को मोदी सरकार की बदलती और प्रभावी
विदेश-नीति का प्रतीक भी कहा जा रहा है. इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि
नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से पश्चिम एशिया और खाड़ी देशों के साथ
सम्बन्ध सुधारने पर विशेष बल दिया गया. पहले की सरकारों में इस तरफ कम ध्यान दिया जाता
रहा. प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने अपना स्पष्ट रुख रखा था कि पश्चिम
एशिया और अरब देशों से संबंधों के मामले में नया अध्याय जोड़ा जा रहा है. भारत
सरकार के द्वारा नए भारत सम्बोधन को लगातार सच भी किया जा रहा है. इसके लिए बिना
किसी पूर्वाग्रह के केन्द्र सरकार द्वारा अपनाई जा रही कूटनीति और विदेशनीति को
देखना होगा. इन क्षेत्रों में भारत को लगातार सफलता मिल रही है. अफगानिस्तान, यूक्रेन
से भारतीय नागरिकों को भारत ने निकाला. यूक्रेन-संकट के दौरान पुतिन ने भारतीय विद्यार्थियों
को सेफ पैसेज देते हुए उनको निकलने में मदद की.
पूर्व नौसैनिकों
की सजा का मामला सिर्फ विदेश नीति तक ही सीमित नहीं रहा. दिसम्बर में दुबई में हुए
पर्यावरण सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और कतर के राष्ट्रप्रमुख शेख तमीम
बिन हमाद की मुलाकात को सकारात्मक संदेश के रूप में देखा गया. इस मुलाकात के बाद
भारतीय नागरिकों की रिहाई का समाचार आना अपने आपमें एक सुखद सन्देश है. यह एक
प्रकार से क़तर के स्वभाव का भी परिचायक है. विदेशी मामलों के जानकार मानते हैं कि कतर
एक ऐसा देश है जो हमेशा मध्यस्थता करके दो देशों के विवादों को सुलझाने में सहायक
की भूमिका हेतु जाना जाता है. अभी हाल में इजराइल और हमास के बीच भी कतर ने
सकारात्मक भूमिका का निर्वहन करते हुए मध्यस्थता निभाई. भारत की बढती वैश्विक छवि
से क़तर अनजान नहीं है. ऐसे में भारतीय कूटनीति, विदेश नीति और दोनों देशों के मध्य
के राजनयिक, व्यापारिक
सम्बन्धों के चलते कतर को भारतीय कैदियों को राहत देनी पड़ी.
इस पूरे घटनाक्रम में
वर्ष 2014 की संधि और अभी हाल
ही में भारत और क़तर के मध्य हुए गैस सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण समझौते को भी नजरंदाज नहीं
किया जा सकता है. 2014 की संधि में दोनों देशों के मध्य यह स्वीकार किया गया था कि
अगर किसी कारण से दोनों देशों के नागरिकों को सजा मिलती है तो वे अपने देश में सजा
काट सकते हैं. ऐसे में एक सम्भावना इन पूर्व सैनिकों के भारत में सजा काटने की भी
बन रही थी मगर भारत सरकार ने इस मामले को कूटनीतिक नजरिए से उठाते हुए अमेरिका और तुर्किए
से भी चर्चा की थी. इन दोनों देशों के रिश्ते कतर और उसके राष्ट्राध्यक्ष से बेहतर
हैं. जिसके चलते इन नागरिकों की रिहाई सम्बन्धी निर्णय आना सहज हुआ. भारतीय
कूटनीति के साथ-साथ क़तर के साथ हुए गैस सम्बन्धी समझौते को भी इस मामले में
प्रभावकारी माना जा रहा है. इसी फरवरी में हुए इस समझौते के अनुसार भारत अगले बीस
वर्षों तक क़तर से लिक्विफाइड नैचुरल गैस (एलएनजी)
खरीदेगा. एलएनजी
आयात करने वाली भारत की सबसे बड़ी
कंपनी पेट्रोनेट एलएनजी लिमिटेड ने कतर की सरकारी कंपनी कतर एनर्जी के साथ ये समझौता
किया है. इसके अनुसार कतर प्रतिवर्ष 7.5 मिलियन टन गैस भारत को निर्यात करेगा.
कूटनीति हो, विदेश नीति हो या फिर क़तर के साथ
हमारे दोस्ताना सम्बन्ध कुल मिलाकर भारतीय नागरिक रिहा होकर स्वदेश लौट आये हैं. विश्व
राजनीति बहुत ही जटिल और संवेदनशील हो चुकी है. भारत ने दक्षिण एशिया से ऊपर उठकर वैश्विक
राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है. विदेश के संकटग्रस्त देशों से भारतीय
नागरिकों की वापसी रही हो, कोरोनाकल में भारत द्वारा मदद
देना रहा हो, तालिबान और पश्चिमी देशों के मध्य बातचीत होना
रहा हो, सभी में भारतीय कूटनीति, विदेश
नीति महत्त्वपूर्ण भूमिका में नजर आई है. विगत वर्षों में भारतीय विदेश नीति नित नए
आयाम गढ़ती नजर आ रही है. यह वैश्विक परिदृश्य में भारतीय छवि की बढ़ती स्वीकार्यता
का सूचक है.
27 अप्रैल 2023
नक्सली हमले में जवान शहीद
नक्सलियों ने एक
बार फिर देश को जबरदस्त क्षति पहुँचाई है. अबकी उनके हमले में 11 जवान शहीद हुए
हैं. छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में 26 अप्रैल नक्सलियों ने डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी) के
जवानों को ले जा रहे एक वाहन पर हमला कर दिया. आईईडी से किये गए इस हमले में 11
जवान शहीद हो गए. डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड यानि डीआरजी छत्तीसगढ़
पुलिस के वे स्पेशल जवान हैं, जिनको केवल नक्सलियों से लड़ने के लिये भर्ती किया
जाता है. इसमें सरेंडर करने वाले नक्सली और वहीं के वातावरण में पले-बढ़े लोग
शामिल होते हैं. नक्सलियों के खिलाफ सबसे बड़ी सफलता अब तक इन्हीं जवानों को मिली
है. इनका शहीद होना बहुत बड़ी क्षति है.
उच्चाधिकारियों
द्वारा हमेशा की तरह रटा-रटाया बयान दिया गया है. नक्सलियों पर क्या कार्यवाही
होगी, ये समय बताएगा.
14 फ़रवरी 2022
वीर सैनिक हमेशा दिल में रहेंगे
आज का दिन कोई भारतीय नहीं भूल सकता. एक दर्दनाक दिन, एक अत्यंत दुखद पल था वो. ये और बात है कि महज बारह दिन बाद हमारी सेना ने, हमारे वीर सैनिकों ने इस घटना का बदला उनके घर में घुसकर लिया.
हमारी सेना ने, सैनिकों ने अपनी ताकत को दुश्मन देश पाकिस्तान को दिखा दी. हम सभी भारतीयों का सीना गर्व से चौड़ा हुआ मगर जिन वीर सैनिकों को हमने खो दिया था, वे वापस तो नहीं आ सकते थे. उनके जाने का हम भले ही दुःख अपने भीतर महसूस करें मगर अपने जाँबाज सैनिकों के लिए आँसू बहाते हुए उनको कमजोर नहीं कर सकते.
हर साल ये दिन हमें कष्टकारी घटना को याद कराएगा मगर हम उन्हीं वीर सैनिकों की तरह खुद को मजबूत बनाते हुए उनको सम्मान प्रकट करेंगे.
जय हिन्द, जय हिन्द की सेना, जय हिन्द के सैनिक
08 दिसंबर 2021
दुर्घटना या साजिश : देश ने खोया बहुत कुछ है
8 दिसम्बर 2021 को जनरल
रावत, उनकी पत्नी और उनके निजी स्टाफ़ के अन्य सदस्यों समेत
कुल 10 यात्री और चालक दल के 4 सदस्य भारतीय वायुसेना के मिल
एमआई-17 हैलिकॉप्टर पर सवार थे. यह हैलीकॉप्टर इन सभी
को लेकर सुलुरु वायुसेना हवाई अड्डे से वेलिंगटन स्थित रक्षा सेवा स्टाफ़ कॉलेज जा रहा था, जहाँ जनरल रावत को
व्याख्यान देना था. स्थानीय समय अनुसार अपराह्न 12:10
बजे के आसपास, नीलगिरि जिले के कुन्नूर तालुके
के बांदीशोला ग्राम पंचायत में स्थित एक निजी चाय बागान की आवासीय कॉलोनी के समीप
यह हैलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया. दुर्घटना का
स्थान उस जगह से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर था जहाँ
हेलिकॉप्टर को उतरना था. जनरल रावत और उनकी पत्नी समेत अन्य 11 के निधन की पुष्टि बाद में भारतीय वायुसेना द्वारा की गयी. भारतीय
वायुसेना के ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह इस दुर्घटना में एकमात्र जीवित बचने वाले
व्यक्ति हैं. हैलीकॉप्टर एक सामान्य दुर्घटना का शिकार हुआ अथवा यह एक साजिश थी, इस बारे में तो बाद में ही पता चल सकेगा किन्तु इस दुर्घटना से देश को
अवश्य ही अपूरणीय क्षति हुई है.
सभी दिवंगत सदस्यों को नमन.
07 अगस्त 2020
नौजवानों को डिप्रेशन से बचाने को आइडल्स बदलने की ज़रुरत
पोस्ट अवनींद्र जादौन की फेसबुक वाल से साभार
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