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28 जून 2024

हम चिंता अपनी बेटियों की करें, फिल्म अभिनेत्रियों की नहीं

पिछले कई दिनों से देख रहे कि लोग सोनाक्षी सिन्हा की शादी को लेकर इस कदर चिंतित से होकर पोस्ट लगा रहे, मानो वे ही उसके अभिभावक हैं. 


ऐसे सभी लोगों से एक निवेदन है कि इस तरह की चिंतातुर अभिव्यक्ति वहाँ करें जहाँ आपकी राय को महत्त्व दिया जाये. सोनाक्षी के विवाह की ज्यादा चिंता हो रही हो तो एक बार उसके घर जाकर उससे या फिर शत्रुघ्न सिन्हा से चर्चा कर आओ, अपनी-अपनी औकात का पता चल जायेगा.


हाँ, सभी की ऐसी चिंता का स्वागत भी होना चाहिए क्योंकि कम से कम ऐसे लोग समाज के एक स्व-वर्ग के प्रति चिंतित हैं. तो फिर आप चिंतातुर लोग अपने घर-परिवार-पड़ोस-मित्रों-सहयोगियों की बेटियों की चिंता करें. उन परिजनों की बेटियों की चिंता करें जो आपकी राय, आपकी चिंता को महत्त्व देते हों.


ध्यान रखें, ये सब मसाला फिल्मों वाले लोग हैं. इनके पारिवारिक कार्यक्रम भी बाजार के हस्तक्षेप से चलते हैं, उसमें भी कमाई करते हैं. इनकी बेटियाँ न फ्रिज में मिलती हैं, न सूटकेस में, न किसी आपत्तिजनक स्थितियों का शिकार बनती हैं. ऐसा सिर्फ हम लोगों की बेटियों के साथ होता है. इसलिए अपनी-अपनी बेटियों को समझाएँ, उनको बताएँ कि उनका आदर्श सोनाक्षी जैसी लड़कियाँ न हों.


11 अक्टूबर 2021

बेटियों को सक्षम और सबल बनायें

अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस पर सभी तरफ से बेटियों के सम्बन्ध में पोस्ट दिखाई दे रही हैं. इधर नवदुर्गा का आयोजन भी किया जा रहा है, इसमें भी बेटियों को देवी स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जा रही है. इस एक बालिका दिवस के बीत जाने के बाद और नवदुर्गा का आयोजन समाप्त हो जाने के बाद बहुत से लोग बेटियों को सशक्त बनाने के प्रति संवेदित नहीं दिखते. बेटियों के साथ होने वाली किसी भी दुर्घटना के बाद कहा जाता है कि बेटियों के बजाय बेटों को शिक्षा दें कि वे स्त्री को एक इन्सान समझें. सही है मगर क्या कभी इस दृष्टि से विचार किया गया कि हमने बेटियों का उस तरह से लालन-पालन किया है कि वे बिना घबराये, बिना डरे, पूरे विश्वास के साथ सामने वाले दुराचारी का, आपराधिक प्रवृत्ति के इंसान का मुकाबला कर सकें?

 

हम बराबर और बार-बार कहते हैं कि समाज में स्त्री-पुरुष का, लड़के-लड़की का, बेटे-बेटी का भेद करने से कभी कोई सुधार नहीं आने वाला. बेटों को किसी तरह की शिक्षा दें या न दें मगर सभी माता-पिता अपनी बेटियों को ये शिक्षा अवश्य दें कि

=>> वे जीरो फिगर की फालतू अवधारणा से बाहर निकलें.

=>> वे खुद को सभी काम करने में सक्षम समझें न कि अपने भाई, पिता आदि के भरोसे रहें.

=>> शारीरिक सौष्ठव किसी भी रूप में अपमानजनक नहीं है. खुद की देह को क्रीम, पाउडर, लिपस्टिक, परफ्यूम आदि की जकड़न से बाहर निकाल कसरती बनायें.

=>> घर की चाहरदीवारी में घुसे रहने की प्रवृत्ति त्याग कर खुद को मैदानी इन्सान बनाने के लिए आगे आयें. दौड़ने, भागने, कूदने आदि क्रियाओं में दक्षता हासिल करें.

=>> दिन भर मोबाइल के ऊटपटांग एप्प पर अपनी ऊर्जा को खर्च करने के बजाय अपनी ताकत को, दिमागी ऊर्जा को किसी न किसी आत्मरक्षा वाले गुण के विकास में खर्च करें.

=>> अपने घर की अन्य बुढ़िया टाइप औरतों के साथ बैठकर सास-बहू जैसे सीरियल्स में अपने दिमाग को खपाने के बजाय समाज में आसपास छिपे कुत्सित विचारों वाले जानवरों को समझने की क्षमता का विकास करें.

 

ध्यान रखें, बेटों को शिक्षा देने के विचार के बहाने आप अपनी बेटियों को घरों में कैद रखने की मानसिकता का त्याग करें. जानवर किसी के बेटे नहीं होते मगर इन्हीं जानवरों का शिकार होने वाली लड़कियाँ, स्त्रियाँ आपकी नहीं तो किसी न किसी की बेटी अवश्य ही होती है.




31 मई 2021

फाउंटेन पेन और बेटियों का लेखन

कहते हैं कि हरेक चित्र के पीछे कोई न कोई कहानी छिपी रहती है. ऐसा सच भी लगता है क्योंकि फोटो खींचते समय कोई न कोई विचार, कोई न कोई विषय, कोई न कोई मामला उस चित्र के साथ जुड़ा हुआ होता है. अक्सर लोग चित्र खींचने के बाद उससे जुड़ी हुई कहानी को विस्मृत कर देते हैं. ऐसा बहुत बार हमारे साथ भी होता है. यह कोई अनोखी अथवा अचंभित करने वाली प्रक्रिया नहीं है. इसके पीछे ऐसा होने के कारण फोटो का बहुत ज्यादा खींचा जाना है.


आज हर हाथ में स्मार्ट फोन होने के कारण और उनमें एक से एक बढ़कर, बहुत ज्यादा मेगापिक्सल वाले कैमरा होने के कारण भी फोटो का खींचा जाना आम बात हो गई है. ऐसे में बहुत बार सबको फोटो खींचते देखकर भी फोटो खींचने का मन होने लगता है. ऐसी स्थिति में ध्यान ही नहीं रहता है कि सम्बंधित फोटो के साथ कौन सी विशेष बात अथवा घटना जुड़ी हुई थी.


बहरहाल, इधर लॉकडाउन की फुर्सत के कारण दोनों बेटियों ने हमारे पेन, फाउंटेन पेन के खजाने को खूब निहारा, खंगाला. उसी में उनको फाउंटेन पेन दिखाए भी और उनके लिखने के लाभ भी बताये. फाउंटेन पेन से जुड़े अपने अनुभव भी उनको सुनाये. ऐसे में वे दोनों भी फाउंटेन पेन से लिखने का मन बना कर हैण्डराइटिंग में जुट गईं. दोनों ने फाउंटेन पेन से हिन्दी और अंग्रेजी में एक-एक पेज लिख कर दिखाया. दोनों की राइटिंग अच्छी लगी तो सोचा कि इससे जुड़ी यह बात लिखते हुए उसे आप सबके बीच भी लगा दिया जाये.


देखिये और आकलन कीजियेगा.


तीनों बेटियाँ 


छोटी बेटी का हिन्दी लेखन 

छोटी बेटी का अंग्रेजी लेखन 

बड़ी बेटी का हिन्दी लेखन 

बड़ी बेटी का अंग्रेजी लेखन 


01 अक्टूबर 2020

बेटियों को हथियार चलाना सिखाइए

देश में कहीं भी महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की घटना सामने आने के बाद पहले तो ख़ामोशी रहती है, यदि कहीं से कोई आवाज़ आनी शुरू हुई तो फिर सोशल मीडिया ऐसे चिल्लाने लगता है जैसे वो आवाज़ उसी की हो. उस आवाज़ में क्या स्त्री, क्या पुरुष सभी ऐसे चिल्लाते हैं जैसे वे ही पूरी धरती उलट कर मानेंगे. उसी में कुछ ज्यादा सक्रिय स्त्री-पुरुष आवाज़ उठाते हैं महिलाओं को शस्त्र लाइसेंस दिए जाने के, महिलाओं को शस्त्र दिए जाने के. ऐसा समझ आता है कि या तो ये लोग बेवकूफ हैं या फिर महज मौज लेने आते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि किसी भी लाइसेंसी हथियार की सुरक्षा किसी भी व्यक्ति से ज्यादा करनी पड़ती है. लाइसेंसी हथियार की सुरक्षा करना, उसका उपयोग, उसका गायब हो जाना बहुत अलग मायने रखता है. जो लोग शस्त्र की बात करते हैं वे ही अभी नहीं समझते कि किसी लाइसेंसी हथियार की कीमत क्या होती है. महज शस्त्र रख लेने से किसी में हिम्मत नहीं आती, महज शस्त्र देख लेने भर से सामने वाले अपराधी में डर पैदा नहीं होता. 

ऐसे विचारों का समर्थन करने वाले/वालियाँ खुद से विचार करते हुए बताएँ कि उन्होंने कितनी बार किसी हथियार को चलाया, उसे लोड किया है? बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके सामने हथियार को रख दिया जाये तो उसमें कारतूस कैसे लगाते हैं यही न बता पाएँ. ऐसे में हथियार के रखने की बात करना महज शेखचिल्लीपना ही है. ये लोग नहीं जानते-समझते हैं कि हथियार दिलवाने के बाद महिला से ज्यादा हथियार की सुरक्षा करनी पड़ेगी. लाइसेंसी हथियार मिलने के बाद महिला के साथ किसी भी तरह की वारदात उस हथियार को छीनने के लिए भी हो सकती है. 

यह संभवतः बहुत से लोगों को ख़राब लगेगा मगर सच यही है कि आज भी बहुसंख्यक महिलाएँ ऐसी हैं जिनकी कलाई हथियार का वजन नहीं उठा सकती. किसी हथियार को लोड करने की क्षमता उनमें नहीं है. किसी भी शस्त्र को चलाने की सामर्थ्य उनमें नहीं है. अपने सामने खड़े अपराधी को गोली मारने की शक्ति उनके भीतर नहीं है. असल में हम लोगों ने अपने परिवार में अपनी महिलाओं को इस तरफ सशक्त बनाया ही नहीं. उन महिलाओं ने, बेटियों ने भी हथियारों का अर्थ महज हत्या से लगाया, उन हथियारों को कभी आत्मरक्षा का स्त्रोत माना ही नहीं. उन बहुसंख्यक महिलाओं-बेटियों में मन में उस हथियार के प्रति सम्मान नहीं वरन घृणा का भाव है. ऐसे में वे कैसे उस हथियार का सञ्चालन कर सकती हैं? 

महिलाओं को शस्त्र प्रदान किये जाने की बकलोली के स्थान पर उनको शस्त्र सञ्चालन का अभ्यास करवाया जाए. खुस महिलाओं को अपने मन से हथियारों के प्रति बना घृणा का भाव त्याग कर उनके प्रति सम्मान का भाव जगाना होगा. कोई भी हथियार महज बकबक करने से नहीं चलाया जा सकता. सामने खड़े अपराधी पर गोली चलाने के लिए, किसी आपात स्थिति में हथियार को सामने लाने के लिए हथियार की नहीं वरन जिगर की आवश्यकता होती है. आप विचार करिए कि आपने अपने घर की महिलाओं में इस शक्ति को, इस जिगर को पैदा किया? 

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

30 सितंबर 2020

बेटियों को सबल, सक्षम बनने को प्रेरित किया जाए

समाज की बेटियों के साथ किसी भी वारदात पर हम सभी शासन-प्रशासन को दोष देना शुरू कर देते हैं. अपने गिरेबान में झाँकिये और बताइये कि हम में से कितने लोग अपनी बेटियों को जूडो-कराटे की, मुक्केबाजी की, एथलेटिक्स की, बॉडी बिल्डिंग की ट्रेनिंग दिलवाते हैं? कितने हैं जिनकी बेटियाँ एकबार में दो-चार किलोमीटर दौड़ लें, बिना हाँफे, बिना पेट पकड़े? कितनी बेटियाँ हैं जो एक-दो पुरुष अपराधियों को देखकर आत्मविश्वास नहीं खोएँगी? कितनी बेटियाँ हैं जो चिल्लाएँ तो उनकी आवाज़ सौ-दो सौ मीटर तक जा सके?


अपनी बेटियों को सौन्दर्य प्रसाधन, जीरो फिगर, स्लिम फीचर, नाजुक मनोस्थिति से मुक्त करवाइए. उनमें प्रतिकार की शक्ति भरिये, विरोध की आवाज़ सशक्त करिए, आताताइयों पर हमला करने की ट्रेनिंग दीजिए. खुद को सशक्त भी बनाना जरूरी है क्योंकि बेटियाँ हमारी हैं. उन्हीं बेटियों की शादी के लिए आप सरकार के भरोसे नहीं बैठते तो उनकी सुरक्षा के लिए सरकार के भरोसे क्यों बैठते हैं?


जब भी बेटियों को सक्षम, सशक्त बनाने की बात करते हैं तो उसके पीछे यही विचार क्यों किया जाता है कि वे गैंगरेप जैसी वारदात का शिकार होंगी? क्यों मन में आता है चार-छह मनचले उसे घेरे हैं और बिटिया को सबसे लड़ना, मार पीट करना है? सामान्य रूप से देखिए और विचार करिए, आप ऐसे अनुभव से गुजरे होंगे---


बाजार में स्कूटी सेल्फ स्टार्ट न होने की दशा में बेटी दस-बारह किक मारकर हाँफ जाती है और फिर स्कूटी स्टार्ट करवाने के लिए किसी अंकल, किसी भैया को पुकारती है।


यात्रा करते समय दो भारी बैग लिए चल रही बिटिया चढ़ते, उतरते समय किसी मददगार हाथ की चाह रखती है।


किसी दुकान पर सामान लेने को खड़ी बेटी देर तक पीछे खड़ी रहती है क्योंकि वह अपने सामने खड़े लोगों को धकिया कर आगे निकलने की शक्ति नहीं रखती।


ऐसे बहुत से सामान्य उदाहरण रोज ही आपके सामने, हमारी बेटियों के सामने आते होंगे। क्या इनसे निपटने के लिए भी फाँसी जैसा कानून चाहिए? क्या इनके समाधान के लिए भी संस्कार पाठशाला चाहिए? क्यों बेटी का अर्थ छुईमुई से लगाया जाए? क्यों उसे कोमलांगी बनाए रखा जाए? क्रीम, पाउडर, काजल के साथ-साथ उसे दौड़ने, कूदने, शारीरिक अभ्यास करने की क्यों न दी जाए?


बेटियों की समस्या हर बार मनचलों से निपटने की नहीं, बहुत बार इन छोटी-छोटी बातों से निपटने की भी होती है। जिस दिन हमारी बेटियाँ अपनी सामान्य दिक्कतों से निपटना सीख जाएँगीं, उस दिन किसी लम्पट की हिम्मत नहीं उनकी तरफ आँख उठाकर देखने की। हमारी सजग, सशक्त, सक्षम बेटियाँ उन अपराधियों को धूल चटा देंगीं।


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

10 जनवरी 2020

जीवट आत्मविश्वास के आगे बौनी बनी शारीरिक अक्षमता


उरई के इंदिरा स्टेडियम में बुन्देलखण्ड ओपन बैडमिंटन टूर्नामेंट का आयोजन का आज शुभारम्भ हुआ. पहले दी ही अनेक मैच हुए. उन मैचों सहित पूरे टूर्नामेंट की रिपोर्टिंग की जिम्मेवारी हमारे ऊपर थी. ऐसे में एक-एक मैच को देखा जा रहा था, उनके परिणामों पर, खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर नजर भी रखी जा रही थी. इसी निगरानी के बीच एक मैच सामने से गुजरा जो कहीं न कहीं हमारी दो-तीन साल पुरानी मांग को पूरा करता दिखा साथ ही आश्चर्य में भी डाल गया. जिला बैडमिंटन क्लब विगत कई वर्षों से टूर्नामेंट का आयोजन करता आ रहा है. अपने शौक और अपनी शारीरिक स्थिति के चलते हर बार आयोजकों से निवेदन किया जाता रहा है कि कम से कम एक मैच पैरा खिलाड़ियों के लिए करवा दिया करें. भले ही ये मैच प्रदर्शनी हो मगर ऐसा होना चाहिए. इससे एक तरफ पूरे समाज में सन्देश जाएगा कि जनपद जालौन का जिला बैडमिंटन क्लब पैरा स्पोर्ट्स के लिए सजग है, साथ ही जनपद में तथा जनपद के आसपास के पैरा खिलाड़ियों में भी उत्साह का संचार करेगा.


बहरहाल विगत कई वर्षों की मांग सिर्फ मांग बनकर ही रह गई. इसके पीछे यहाँ के लोगों का, खिलाड़ियों का आगे न आना भी रहा. आज जब बालिका जूनियर वर्ग में एक मैच चल रहा था. उस मैच को हम महज मीडिया की दृष्टि से देख रहे थे. तभी हमारी नजर में वो खिलाड़ी आई जिसकी चर्चा हमसे क्लब के पदाधिकारियों द्वारा पैरा मैच करवाने के सन्दर्भ में हो चुकी थी. वो खिलाड़ी बहुत ही आत्मविश्वास से अपने मैच का जैसे आनंद ले रही हो. जैसा कि उसके खेलने के ढंग से, उसके शॉट लगाने के हावभाव से लग रहा था कि वह पूरी तरह से अपनी जीत के प्रति आशान्वित है. मैच जैसा कि अपेषित था, उसी ने जीता. मैच के समाप्त होने के बाद तमाम तरह की औपचारिकताओं के करने के बाद, कतिपय मीडियाकर्मियों से बातचीत करने के बाद लगा कि वह फ्री है तो उससे बात करने का समय लिया. ऐसा इसलिए नहीं कि उससे महज बात करनी थी बल्कि इसलिए कि एक खिलाड़ी के रूप में उसका सम्मान बना रहे.


उससे अनुमति लेकर ही उसका वीडियो बनाया, जो फेसबुक पर लाइव भी किया, उसकी अनुमति लेकर. ऐसा इसलिए किया कि महज उसकी शारीरिक अवस्था के चलते उसे किसी तरह का विभेद न महसूस हो. आज के दिन वह एक खिलाड़ी थी और वह भी विजेता. ऐसे में उसके साथ व्यवहार भी एक विजेता की तरह किया जाना था. उसकी अनुमति के साथ ही औपचारिक, अनौपचारिक बातचीत के द्वारा उसके बारे में, उसके खेल के बारे में, उसकी इस खेल में आने की स्थिति के बारे में, उसके परिवार के बारे में जानने का प्रयास किया. स्वाति सिंह, जी हाँ, यही नाम है उस जीवट खिलाड़ी का, जिसका दायाँ हाथ जन्म से पूर्ण नहीं है. कोहनी के आगे का हाथ विकसित ही नहीं हो सका. बहरहाल, उसे किसी भी क्षण ये महसूस नहीं हुआ कि उसका एक हाथ पूर्ण नहीं है. अपनी आँखों से उसे मैच में जहाँ सर्विस लेते देखा वहीं अपने सामने बैठकर उसे जूतों के फीते बांधते देखा. 


स्वाति में जितना आत्मविश्वास अपने खेल के प्रति लगा उतना ही भोलापन उसके स्वभाव में नजर आया. कृषक पिता की सबसे बड़ी संतान के रूप में कबड्डी को तिलांजलि देकर वह पी०वी० सिंधु को अपना आदर्श मानकर बैडमिंटन में उतर आई. दसवीं की परीक्षा एक साल पहले उत्तीर्ण करने के बाद स्वाति वर्तमान में प्राविधिक शिक्षा ग्रहण कर रही है. दो छोटे भाई-बहिन गाँव में रहकर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं और स्वाति उरई में स्वावलंबी और खिलाड़ी बनने के लिए प्रयासरत है. सबसे बड़ी बात यह कि महज तीन महीने के अभ्यास के बाद उसमें बैडमिंटन के प्रति असीम प्रेम, स्नेह, समर्पण दिखाई देता है. अपने सभी वरिष्ठ साथियों के सहयोग के प्रति वह अभिभूत है. उसका कहना है कि स्टेडियम के सभी साथियों का इतना सहयोग ही है तभी वह आज इस टूर्नामेंट में भाग ले पा रही है. इन्हीं साथियों की बदौलत वह पूरे विश्वास के साथ अपनी तैयारी कर पाई है. ऐसा लगा भी क्योंकि अपने जीवन का पहला मैच, पहला टूर्नामेंट खेलने वाली स्वाति जबरदस्त आत्मविश्वास से भरी दिखाई दी. वर्तमान में पैरा से इतर खुद को सामान्य वर्ग में सबके सामने उतार कर स्वाति ने खुद को ही साबित किया है. कामना है कि जल्द ही वह अपनी प्रतिभा को समूचे देश के सामने प्रदर्शित करे.

01 दिसंबर 2019

मन की, देह की जकड़न तोड़नी होगी


हैदराबाद में चिकित्सक महिला के साथ हुई वीभत्स वारदात के बाद पूरे देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है. इस बहस के केन्द्र में जहाँ महिलाओं की सुरक्षा है, शासन-प्रशासन की कानून व्यवस्था है वहीं इसके साथ-साथ मजहब विशेष के पुरुषों द्वारा ऐसे जघन्य घटनाक्रम को अंजाम दिए जाने पर भी चर्चाएँ आम हैं. इस्लामिक आतंकवाद की तरह से लव जिहाद समाज में पर्याप्त रूप से चलन में आ चुका है, लगभग उसी तरह से अब देखने में आ रहा है कि सामूहिक बलात्कार और उसके बाद बर्बरता के साथ महिलाओं, बच्चियों की हत्या के पीछे इस्लामिक व्यक्तियों के नाम सामने आ रहे हैं. इसे समझना होगा कि आखिर ये है क्या? क्यों इस तरह की बर्बर घटनाओं के पीछे मजहब विशेष के लोगों के नाम ही दिखाई देते हैं? आतंकवादी घटनाओं के सन्दर्भ में सदैव कहा जाता रहा है कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता है. यह सत्य है कि आतंक का कोई धर्म नहीं होना चाहिए. कुछ लोगों के कारण सम्पूर्ण मजहब को कलंकित नहीं किया जाना चाहिए. इसके बाद भी एक बात सामने निकल कर आती है कि सभी इस्लामिक व्यक्ति आतंकवादी नहीं हैं मगर पकड़े-मारे जाने वाले सभी आतंकी इस्लामिक निकलते हैं. ये क्या है? इसे क्या कहा जाये? कुछ इसी तरह से अब बलात्कार सम्बन्धी मामलों में हो रहा है. इसमें भी बहुतायत में इस्लाम से जुड़े लोग ही अपराधी के रूप में सामने आ रहे हैं. 


बहरहाल, वर्तमान में चर्चा का विषय मजहबी आधार पर ऐसे अपराध को परिभाषित करने से ज्यादा इस पर होना चाहिए कि ऐसे अपराधों को कैसे रोका जाये. जब भी समाज में बलात्कार की चर्चा होती है तो उसके साथ ही महिलाओं के पहनावे की चर्चा की जाने लगती है. उनके समय-असमय बाहर निकलने को लेकर चर्चा की जाने लगती है. उनकी स्वतंत्रता, उनके क्रिया-कलाप पर बहस छिड़ जाती है. ऐसे में चर्चा बलात्कार के कारणों, उसके निवारणों से अलग हट कर पक्ष-विपक्ष में बंट जाती है. एक पक्ष महिलाओं के पहनावे, उसके क्रियाकलापों पर बहस करता है तो दूसरा पक्ष उम्र का सन्दर्भ देते हुए बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाओं को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करने लगता है. यह सही है कि विगत कुछ समय से बलात्कार के, सामूहिक बलात्कार के मामलों में उम्र का सन्दर्भ रह ही नहीं गया है. चंद महीनों की बच्चियाँ भी दुराचार का शिकार हुईं हैं तो वयोवृद्ध महिलायें भी ऐसे व्यक्तियों का शिकार बनी हैं.

यदि समाज वाकई बलात्कार के कारण-निवारण पर चर्चा करने के मूड में हो तो उसे पहनावे, क्रिया-कलाप आदि से बाहर निकल कर उन घटनाओं की तरफ जाना होगा जो किसी भी व्यक्ति के भीतर यौनेच्छा को बढ़ावा देती हैं. क्या कभी इस बात पर गौर किया गया है कि आज किसी उत्पाद की बात हो, किसी गाने की चर्चा हो, किसी म्यूजिक एल्बम का चित्रण हो, किसी कहानी का आना हो, किसी सीरियल का दृश्य हो, किसी फिल्म का सीन हो, कोई विज्ञापन हो सभी में महिलाओं की ऐसी छवि का चित्रण किया जा रहा है जो अश्लील के समकक्ष है. ऐसा महसूस होता है जैसे किसी व्यक्ति के किसी विपरीतलिंगी के साथ यौन सम्बन्ध नहीं हैं तो उसका जीवन अधूरा है. इन दृश्यों को देखकर ऐसा लगता है जैसे जीवन का एकमात्र ध्येय महिला की नग्न देह और उसके साथ यौन खिलवाड़ करना रह गया है. ऐसे में विचार कीजिये कि यौनेच्छा के जागने के बाद उस व्यक्ति का क्या हाल होता होगा जिसके पास अपनी यौनेच्छा को शांत करने का कोई साधन नहीं? क्या कभी इस पर विचार किया गया है कि विगत कुछ समय से सामूहिक बलात्कार के मामले बढ़े हैं, बच्चियों के साथ दुराचार के मामले बढ़े हैं, बलात्कार के बाद हत्या के केस बढ़े हैं. आखिर ऐसा क्यों हुआ? सेक्स सम्बन्धी चित्रण के कारण अपने दिमाग में यौनेच्छा को जन्म देने के बाद व्यक्ति किसी सहज शिकार की तलाश में निकलता है. ऐसे में वे या तो एक समूह के रूप में अपनी वासना को शांत करने का काम करते हैं अथवा वह किसी कमजोर महिला, बच्ची को अपना शिकार बनाता है.

सामान्य रूप से देखने में आता है कि ऐसी किसी भी घटना के बाद उत्तेजना, आक्रोश, गुस्सा अपने चरम पर होता है. सरकार की तरफ से, शासन-प्रशासन की तरफ से अपनी खानापूरी कर ली जाती है और फिर जनाक्रोश शांत हो जाता है. सोशल मीडिया के कारण लोगों को अपनी अभिव्यक्ति का सहज मौका मिल जाता है. बस ऐसे में तमाम सुझाव, तमाम तरीके, तमाम कदम पेश किये जाने लगते हैं. बेटियों को सशक्त बनाये जाने, उनको आत्मरक्षा के गुण सुखाये जाने के, बेटों को संस्कारी बनाये जाने के बड़े-बड़े भाषण दिए जाने लगते हैं. ऐसे विचारों के आने के पीछे सामाजिक ढांचे को एकदम से विस्मृत कर दिया जाता है. जिस समाज में, परिवार में बेटियों को जरा-जरा सी बात पर लगभग भयभीत सा करके रखा गया होता है वहां अपेक्षा की जाती है कि वे चाकू चलायें, अपराधियों के शरीर पर घातक वार करें. जिस समय में लड़कियों में अपनी देह के प्रति एक असुरक्षा भाव होने के साथ-साथ उसका सौन्दर्य-बोध भी छिपा होता है वहां माना जाता है कि वे कोई कठोर निर्णय लेने में सक्षम हैं. जहाँ लड़कियों में जीरो फिगर के प्रति, अपनी त्वचा, देह के सौन्दर्य के प्रति आसक्ति भाव है वहां उनसे दैहिक कठोरता की अपेक्षा की जा रही है. जहाँ लड़कियाँ घर में छिपकलियों, कोक्रोचों, चूहों, अँधेरों से घनघोर तरीके से घबराती हैं वहां विचार किया जा रहा है कि वे दुर्दांत अपराधियों के छक्के छुड़ा देंगी.

असल में ये सब महज काल्पनिकता से भरी बातें हैं. जिस समाज में बेटियों के साथ घर की महिलायें ही उनकी देह से सम्बंधित बातें करने में हिचकती हैं वहां उन बच्चियों को सही-गलत कौन समझाएगा? जहाँ माना जाता है कि बेटियां दैहिक रूप से कोमल, कमजोर हैं वहां उनको दौड़ने, भागने, कूदने, चिल्लाने, वार करने, लड़ने आदि की शिक्षा कौन देगा? समाज से पहले हम सभी को अपने-अपने परिवार में ऐसा माहौल तैयार करना होगा जहाँ बेटे-बेटियों में सिर्फ खान-पान, शिक्षा, पहनावे को लेकर ही विभेद समाप्त न किया जाये बल्कि उनके कार्यों, उनकी जमीनी भागदौड़, उनकी शारीरिक कसावट को लेकर भी विभेद समाप्त किया जाये. बेटों को संस्कारी बनाया जाये या न बनाया जाये मगर अपनी बेटी को इतना सशक्त अवश्य बनाया जाये कि वह लात, घूंसे, हाथों का भरपूर वार सामने वाले अपराधी पर कर सकने में सक्षम हो. बेटियों को सिलाई, संगीत, पाककला की जानकारी हो या न हो मगर उनको आत्मरक्षा के गुण आने चाहिए, उनमें आत्मविश्वास की सशक्तता हो, आत्मबल की तीव्रता हो. यह ध्यान रखना होगा कि समाज में सभी व्यक्ति न ही भले हैं और न ही सभी व्यक्ति बुरे हैं. हर भला व्यक्ति सड़क चलते सबका भला नहीं कर रहा है, उसी तरह अपराधी व्यक्ति सड़क चलते हर व्यक्ति के साथ अपराध नहीं कर रहा है. यहाँ भी अपनी तरह की मनोवैज्ञानिकता है, एक तरह की कुंठा है. इसके सन्दर्भ में समझना होगा कि ऐसे आपराधिक व्यक्तियों की कुंठा का, उसके मौके का शिकार हमारी-आपकी बेटी न बने.


29 नवंबर 2019

बेटियों को सशक्त बनाएँ

बेटियों के साथ होने वाली किसी भी घटना के बाद एक आम पोस्ट आती है कि बेटियों के बजाय बेटों को शिक्षा दें कि वे स्त्री को एक इन्सान समझें.

हम बराबर और बार-बार कहते हैं कि समाज में स्त्री-पुरुष का, लड़के-लड़की का, बेटे-बेटी का भेद करने से कभी कोई सुधार नहीं आने वाला. बेटों को किसी तरह की शिक्षा दें या न दें मगर सभी माता-पिता अपनी बेटियों को ये शिक्षा अवश्य दें कि

=>> वे जीरो फिगर की फालतू अवधारणा से बाहर निकलें.

=>> वे खुद को सभी काम करने में सक्षम समझें न कि अपने भाई, पिता आदि के भरोसे रहें.

=>> शारीरिक सौष्ठव किसी भी रूप में अपमानजनक नहीं है. खुद की देह को क्रीम, पाउडर, लिपस्टिक, परफ्यूम आदि की जकड़न से बाहर निकाल कसरती बनायें.

=>> घर की चाहरदीवारी में घुसे रहने की प्रवृत्ति त्याग कर खुद को मैदानी इन्सान बनाने के लिए आगे आयें. दौड़ने, भागने, कूदने आदि क्रियाओं में दक्षता हासिल करें.

=>> दिन भर मोबाइल के ऊटपटांग एप्प पर अपनी ऊर्जा को खर्च करने के बजाय अपनी ताकत को, दिमागी ऊर्जा को किसी न किसी आत्मरक्षा वाले गुण के विकास में खर्च करें.

=>> अपने घर की अन्य बुढ़िया टाइप औरतों के साथ बैठकर सास-बहू जैसे सीरियल्स में अपने दिमाग को खपाने के बजाय समाज में आसपास छिपे कुत्सित विचारों वाले जानवरों को समझने की क्षमता का विकास करें.

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ध्यान रखें, बेटों को शिक्षा देने के विचार के बहाने आप अपनी बेटियों को घरों में कैद रखने की मानसिकता का त्याग करें. जानवर किसी के बेटे नहीं होते मगर इन्हीं जानवरों का शिकार होने वाली लड़कियाँ, स्त्रियाँ आपकी नहीं तो किसी न किसी की बेटी अवश्य ही होती है.

01 अक्टूबर 2019

हम भी भीगना चाहते हैं


आज दोपहर फिर खूब बारिश हुई, खूब जोरों की बारिश हुई. सभी की तरह हमारा भी मन किया भीगने का, झमाझम बरसती बारिश में दिल तक भिगो डालने का. ठीक उसी तरह भीगने का जैसे कि और लोग भी भीगा करते हैं. कभी सड़क पर झूमते हुए, कभी खाली गीली सड़क पर अपनी बाइक लहराते हुए, कभी तेज बरसती बूंदों के साथ अटखेलियाँ करते. बारिश के साथ इस तरह से भीगना हमारे हिस्से क्यों नहीं आता है? क्यों हमें बाइक को बारिश की रफ़्तार के साथ होड़ लगाने की अनुमति नहीं मिलती है? क्यों हमारा भीगना घर की छत से बाहर नहीं निकल पाता है? हमने भी देखा है शहर के बाहर से गुजरते हुए हरे-भरे हाईवे को. हमने भी महसूस किया है उस हाईवे पर बरसती बारिश की बूंदों को. ठीक है, हमने उस बारिश का भी आनंद लिया है मगर कब तक एक बंधन में बंधी हुई आज़ादी का आनंद हम लेटे रहेंगे? कब तक हम आज़ादी का आभासी एहसास करते रहेंगे? आखिर हम भी एक व्यक्तित्व हैं. हमें भी अपने आपको साबित करना आता है. ऐसे में आखिर कब तक हम महज एक बोझ की तरह सबके सामने लाये जाते रहेंगे? 


कोई और न समझे, दुनिया के वे चार लोग न समझें जो कुछ न कुछ कहने लगते हैं, समाज के लोग न समझें मगर आप तो समझिये. आप तो हमारे अपने हैं, आप महज वे चार लोग नहीं जिनका नाम लिया जाता है, आप सवालिया निशान उठाने वाले समाज नहीं. आप हमारा समाज हैं. हम आपसे हैं और आप भी हमसे ही हैं फिर हम पर सवालिया निशान क्यों? आपकी शिक्षायें ही हमारा आधार हैं फिर आप हम पर शंका कर रहे हैं या फिर अपनी शिक्षाओं पर? आपको बताएं, हम भी आनंद लेना चाहते हैं बारिश का. हम भी सुखद अनुभूति लेना चाहते हैं बारिश की आज़ादी का. हम भी दौड़ाना चाहते हैं तेज रफ़्तार से अपनी बाइक को. हम भी भीगना चाहते हैं हाईवे की आज़ाद बरसती बूंदों के साथ.

हमें भली-भांति जानकारी है अपनी आज़ादी की. हमें अच्छे से जानकारी है अपनी स्वतंत्रता की. हम समझते हैं अपनी उड़ान को. हमें मालूम है कि हमारी आज़ादी बारिश की बूंदों से अधिक नहीं होगी, इसके बाद भी हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि हम बारिश की बूंदों की आज़ादी को बाधित नहीं करेंगे. हम आपको विश्वास दिलाते है कि हम अपनी बाइक के सहारे बाकी किसी की बाइक की रफ़्तार को कम न होने देंगे. हम ये भी विश्वास दिलाते हैं कि हमारा भीगना किसी और को शर्मसार नहीं करेगा. हम बस भीगना चाहते हैं बारिश में. हम बस आनंद लेना चाहते हैं मौसम का. हम बस महसूस करना चाहते हैं अपनी आज़ादी का. हम बस स्वीकार करना चाहते हैं अपने व्यक्तित्व का. कम से कम समाज के और लोग तो नहीं पर आप तो इसे महसूस करो. हम आपसे ही हैं इसे आभासित तो होने दो. एक बार बरसती बूंदों को हमारे लिए बरसना समझ कर हमें घर की छत से आज़ाद होने दो. हम विश्वास दिलाते हैं कि हम भीगना चाहते हैं घनघोर मगर आपको आंसुओं में भीगने न देंगे. बस हम भीगना चाहते हैं, सिर्फ और सिर्फ भीगना चाहते हैं.



08 मार्च 2019

स्त्री, पुरुष दोनों को ही विचार करना होगा

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस का आना हुआ नहीं कि कार्यक्रमों की औपचारिकता का निर्वहन प्रारम्भ हो गया. जगह-जगह संगोष्ठियों, सभाओं, भाषणों, रैलियों आदि की औपचारिकता निभाई जाने लगी है. सरकारी संगठनों के साथ-साथ उन स्वयंसेवी संगठनों की मजबूरी भी है जो महिला-सशक्तीकरण के लिए कार्य कर रहे हैं कि वे इस दिन पर कार्यक्रम करें, सिर्फ करें ही नहीं अवश्य ही करें. यदि भाषणों, रैलियों, कार्यक्रमों से ही विकास होना सम्भव होता तो हमारा मानना है कि सबसे अधिक विकास हम भारतवासियों ने ही किया होता. आये दिन की भाषणबाजियों और सभाओं के बाद भी विकास वहीं का वहीं है, नारियों की स्थिति वहीं की वहीं है, कन्या भ्रूण हत्या की स्थिति वहीं की वहीं है, स्त्री-पुरुष लिंगानुपात वहीं का वहीं है. केवल भाषणों से नारी की स्थिति को सुधारा नहीं जा सकता है, यह चाहे पुरुषों द्वारा किया जा रहा हो या फिर खुद महिलाओं द्वारा. भाषणों में विकास के आयाम खोजने की बजाय यह खोजा जाता है कि एक और विभेद स्त्री-पुरुष के बीच कहाँ से पैदा किया जाये. यह सिद्ध करने की कोशिश की जाती है कि कैसे स्त्रियों को शोषित बताया जाये. कैसे स्त्री को पुरुष से ज्यादा संघर्ष करने वाली बताया जाये. कैसे साबित किया जाये कि एक बेटी के रूप में एक स्त्री अपने माता-पिता का ख्याल अधिक रखती है बजाय एक बेटे के.  


बहरहाल, कुछ बिन्दु ऐसे है जिन पर बिना किसी पूर्वाग्रह के विचार अवश्य होना चाहिए.

वंश-वृद्धि की लालसा में पुत्र प्राप्ति की चाह रखने वाले बतायें कि स्वामी विवेकानन्द, शहीद भगत सिंह, रानी लक्ष्मीबाई, नेता जी सुभाष चन्द्र बोस, चन्द्रशेखर आजाद आदि अनेक महापुरुषों का नाम किस लड़के के कारण चल रहा है?
बेटे की चाह में लड़की को मारने वाले अपने लड़के के विवाह के लिए लड़का कहाँ से लायेंगे?
इसी प्रकार से स्त्री-पुरुष लिंगानुपात कम होता रहा तो आने वाले समय में होने वाली स्त्री हिंसा की भयावहता को कौन रोकेगा?
बराबर का दर्जा सिद्ध करती स्त्री आने वाले समय में कम संख्या के कारण अपनी खरीद-बिक्री को कैसे रोक सकेगी? (आज भी कई घटनायें इस तरह की प्रकाश में आईं हैं जहाँ कि परिवारों में पुरुष स्त्रियों को खरीद कर ला रहे है)
लड़कियों की लगातार गिरती संख्या से क्या समाज में अनाचार की और विकट स्थिति पैदा होने वाली नहीं है?

सवाल बहुत हैं पर जवाब.......??? जवाब शायद हम सभी खोजना भी नहीं चाहते क्योंकि यही काम मुश्किल है. सरल काम है गोष्ठी करवा लेना, रैली निकलवा लेना, किसी कार्यक्रम का आयोजन करवा लेना. तो क्या हो? जवाब न खोजे जाएँ? ऐसा भी नहीं है. जवाब हमें ही देना होगा, जवाब हमें ही खोजने होंगे. मात्र किसी दिवस की औपचारिकता को पूरा करने के लिए ही आवाज उठाना और फिर शान्त हो जाना नैतिक नहीं है. समाज के सभी वर्गों को प्रयास करने होंगे, एकसाथ करने होंगे. पुरुष-स्त्री को आपसी विभेद को दूर करना होगा. क्या आधुनिकता का, ज्ञान का, अहम का रंग अपने ऊपर चढ़ा चुके स्त्री और पुरुष (दोनों को विचारना होगा) इस बात को समझेंगे?

11 फ़रवरी 2019

एक विभेद को दूसरे विभेद से नहीं मिटाया जा सकता है

आज फिर बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर मिला. ले-दे कर वही बातें. लगभग सभी वक्ताओं द्वारा पुरुषों को कोसने वाली मानसिकता. लगभग सभी के द्वारा महिलाओं को अपने अधीन बनाये रखने वाली बातें. इक्कीसवीं सदी में आने के बाद भी इस मानसिकता से न तो स्त्री मुक्ति पा सकी है और न ही पुरुष कि वे एक विभेद को दूर करने के लिए एक और विभेद को जन्म दे रहे हैं. कोई पुरुष किसी महिला के बारे में क्या विचार रखता है, ये बात तो बाद में विचारणीय है उससे पहले विचार करना होगा कि एक महिला खुद महिला के बारे में, अपने बारे में क्या सोचती है. यहाँ स्पष्ट है कि आज से नहीं बल्कि सदियों से महिलाओं ने खुद अपने आपको एक वस्तु, एक उत्पाद बना रखा है, समझ रखा है. यदि ऐसा न होता तो भीड़ में धोखे से भी किसी पुरुष द्वारा उनकी देह का स्पर्श किसी हंगामे का कारण न बनता. यदि ऐसा न होता तो आज भी किसी परीक्षा में कोई पुरुष परीक्षक किसी महिला परीक्षार्थी की नक़ल छुड़ाने में खुद को असमर्थ नहीं समझता. ये बहुत साफ़ सी समझने वाली बात है कि एक महिला आज खुद को, अपनी देह को किसी मूल्यवान वस्तु से अधिक नहीं समझ रही है. यह भी सत्य है कि इस समाज में चोर-उचक्के भी हैं जो किसी भी मूल्यवान वस्तु को चुराने के लिए ही काम कर रहे हैं. यहाँ ध्यान रखना होगा कि महिलाएं आज भी अपने आपको उन चोर-उचक्कों से बचाने में उसी दशा में समर्थ हैं जबकि उनके साथ कोई पुरुष हो. यहाँ समझना होगा कि एक पुरुष से बचने के लिए भी एक पुरुष का सहारा चाहिए होता है. 


यहाँ आकर स्मरण रखना होगा कि समाज के सभी पुरुष सभी महिलाओं का शोषण नहीं कर रहे हैं. यहाँ समझना होगा कि एक पिता द्वारा अपनी बेटी की परवरिश के लिए उस पर अनुशासनात्मक कदम उठाना क्या अत्याचार है? एक अभिभावक यदि अपनी बेटी की सुरक्षा समाज के अराजक लोगों से कर रहे हैं तो क्या यह उस महिला का शोषण है? समाज में ऐसी ही कुछ बातों को लेकर लगातार विभेद पैदा किया जा रहा है. एक तरफ अब बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे कार्यक्रमों में स्पष्ट सन्देश दिया जा रहा है कि बेटियाँ अपने माता-पिता की ज्यादा देखभाल कर रही हैं और बेटे इस तरफ ध्यान नहीं दे रहे हैं. यहाँ इसके सन्दर्भ में ध्यान रखना होगा कि किसी भी माता-पिता की विवाहित बेटी को यदि उनकी सेवा के लिए सहयोग करने वाला उसका पति, किसी न किसी का बेटा है. यहाँ स्मरण रखना चाहिए कि यदि किसी की बेटी ससुराल में जाकर पूरी तरह आज़ादी के साथ अपना जीवन व्यतीत करती है तो फिर वही अधिकार उसी व्यक्ति की बहू को क्यों नहीं मिलते हैं? क्यों उसी बहू का आज़ाद ख्याल होना उसके परिवार की इज्जत को धूल में मिलाने वाला दिखाई देने लगता है? यही वे स्थितियाँ हैं जहाँ आकर विभेद की साफ़-साफ़ दीवार दिखाई देने लगती है.

यदि समाज से बेटियों के प्रति होने वाले दुर्व्यवहार को सदा-सदा के लिए समाप्त करना है तो अपने दिमाग से हर तरीके के विभेद को हटाना होगा. दिमाग से निकालना होगा कि स्त्री देह कोई वस्तु है. दिमाग से यह भी निकालना होगा कि किसी पुरुष की सफलता के पीछे एक स्त्री का हाथ है, यहाँ ध्यान देना होगा कि एक महिला की सफलता के पीछे भी किसी न किसी पुरुष का हाथ होता है. समाज में एक विभेद को किसी भी तरह से दूसरे विभेद से दूर नहीं किया जा सकता है.


29 नवंबर 2018

संकल्पशक्ति का नाम मैरी कॉम


मैंगते चंग्नेइजैंग मैरी कॉम (एम०सी०मैरी कॉम) यह नाम आज किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है. एक ऐसी महिला, जिसका जन्म 1 मार्च 1983 को हुआ और समूचा विश्व आज उन्हें मैरी कॉम के नाम से जानता है, एक भारतीय महिला मुक्केबाज हैं. उन्होंने 24 नवंबर 2018 को नई दिल्ली में आयोजित 10 वीं एआईबीए महिला विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में 6 विश्व चैंपियनशिप जीतने वाली पहली महिला बनकर इतिहास रचा. इसके साथ सुखद तथ्य यह भी है कि वे जुड़वाँ बच्चों की माँ भी हैं.


वे अब तक दस राष्ट्रीय खिताब जीत चुकी हैं. उन्होंने पहली बार नेशनल वुमन्स बॉक्सिंग चैंपियनशिप वर्ष 2001 में जीती. इसके साथ-साथ 2012 के लंदन ओलम्पिक में उन्होंने काँस्य पदक जीता. एशियाई खेल 2010 में काँस्य तथा 2014 के एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक हासिल किया. बॉक्सिंग में देश का नाम रोशन करने के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2003 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से तथा वर्ष 2006 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया. वर्ष 2009 में उन्हें भारत के सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया. मध्यप्रदेश के ग्वालियर में वर्ष 2018 में उनको वीरांगना सम्मान से विभूषित किया गया.

मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में एक गरीब किसान के परिवार जन्मी मैरी कॉम की प्राथमिक शिक्षा लोकटक क्रिश्चियन मॉडल स्कूल और सेंट हेवियर स्कूल से पूरी हुई. बाद में उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय से परीक्षा दी. उनके मन में बॉक्सिंग के प्रति आकर्षण सन सन 1999 में उस समय उत्पन्न हुआ जब उन्होंने खुमान लम्पक स्पो‌र्ट्स कॉम्प्लेक्स में कुछ लड़कियों को बॉक्सिंग रिंग में लड़कों के साथ बॉक्सिंग करते देखा. उनके जीवन पर एक फिल्म भी बनी जिसका प्रदर्शन सन 2014 में हुआ. इस फिल्म में उनकी भूमिका प्रियंका चोपड़ा ने निभाई.

मैरी कॉम को उनकी उपलब्धि पर शुभकामनाओं सहित सुखद, स्वस्थ जीवन की मंगलकामना.


01 जुलाई 2018

बलात्कारियों में डर-भय नहीं कानून का


दिल्ली गैंगरेप के बाद दिल्ली समेत देश के कई भागों में इन बलात्कारियों को फाँसी की सजा देने की माँग जोर पकड़ने लगी थी, ऐसा ही कुछ अब हो रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे बलात्कारियों के लिए फांसी की सजा के निर्धारण से देश में बलात्कारियों में डर व्याप्त हो जायेगा अथवा बलात्कार होने बन्द हो जायेंगे। याद होगा शायद सभी को कि धनञ्जय चटर्जी को बलात्कार के आरोप में ही फाँसी दी गई थी। क्या हुआ उसके बाद? क्या बदला उसके बाद? विगत कुछ माह से लगातार होती आ रही या कहें कि रोज ही होती आ रही बलात्कार की घटनाएँ चिंतित करने वाली हैं, विचलित करने वाली हैं। चिंता इसकी कि अब ऐसा लग रहा है कि समाज में महिलाएं सुरक्षित ही नहीं हैं और विचलित करने वाली घटनाएँ इसलिए क्योंकि बलात्कार की, सामूहिक बलात्कार की घटनाओं में अब बच्चियों को शिकार बनाया जाने लगा है। कभी लगता है कि जनता जाग रही है तो कभी लगता है कि वह एकदम भावशून्य पड़ी हुई है। प्रशासन-शासन की विफलता के बाद उसको चेताने के लिए, जगाने के लिए जनता का जागरूक होना आवश्यक है। इस जागरण में सिर्फ और सिर्फ फाँसी की माँग करना अकेले ही इस समस्या का समाधान नहीं।


बलात्कार के लिए फांसी की सजा की मांग करने के पूर्व हमें उन तमाम सारे कानूनों की ओर भी ध्यान देना होगा जिनके द्वारा किसी अपराध के लिए फांसी की सजा का प्रावधान है। क्या उन तमाम अपराधों में कमी आई है अथवा वे अपराध होना बन्द हो गये है? पूर्वाग्रह दृष्टि न रखने वालों का एक ही जवाब इसके लिए होगा और वो भी न में। तमाम सारे वे अपराध आज भी तेजी से समाज में होते दिख रहे हैं, जिनके लिए सजा के रूप में फांसी की सजा का प्रावधान है। इसके अलावा एक और तथ्य महत्वपूर्ण है कि यदि बलात्कार की सजा के रूप में फांसी को मुख्य रूप से स्वीकार कर लिया गया तो इसके कई दुष्परिणाम महिलाओं के प्रति ही खड़े होने की आशंका है। यह सर्वविदित है कि यदि किसी भी महिला से बलात्कार हुआ तो जाहिर है कि वह महिला किसी न किसी रूप में शारीरिक दृष्टि में उस बलात्कारी पुरुष से कमजोर साबित हुई है। इसके अलावा गैंग रेप के केस में तो जाहिर है कि उस महिला के साथ दुराचार करने वालों की संख्या एक से अधिक रही होगी। ऐसे में यदि बलात्कार की सजा फांसी हो जाती है तो बहुत हद तक सम्भावना है कि सम्बन्धित महिला को दुराचारी लोग जीवित ही न छोड़ें। आखिर उन बलात्कारियों को पहचानने वाला, उनकी शिकायत करने वाला, उनके विरुद्ध गवाही देने वाला यदि कोई होगा तो सिर्फ और सिर्फ वह महिला ही। ऐसे में उन दुराचारियों के द्वारा उसको जीवित छोड़ देने की सम्भावना न्यूनतम होने की आशंका है।

जनता जागरूक होकर सरकार को, प्रशासन को घेरने का काम करे। वह इसके लिए शासन-प्रशासन को विवश कर दे कि वह चुस्त-दुरुस्त होकर काम करे। यदि शासन-प्रशासन अपनी तरफ से चुस्त-दुरुस्त व्यवस्था रखने के लिए तत्पर हो जाये तो परिणाम कुछ हद तक सुखद मिलने की सम्भावना है। यदि जागरूकता लोगों को सजग रहने के लिए दिखाई जाये तो महिलाओं को इस तरह से आये दिन दुराचारियों का शिकार न होना पड़े। यदि एकजुटता की स्थिति को अपराधियों में मन में खौफ पैदा करने के लिए दिखाई जाये तो पल प्रति पल ऐसी वीभत्स घटनाओं से हमें दो-चार नहीं होना पड़ेगा। दिल्ली कांड के बाद कानून बनाया गया मगर क्या हुआ उसका? इसी काण्ड के अपराधियों को अभी तक सजा नहीं दी जा सकी है। और तो और विपक्षी दल, वे चाहे कोई भी हों सब किसी न किसी बहाने सरकार पर हमला बोलने की मंशा बनाये रहते हैं। उनके कदमों से ऐसा लगता है जैसे उन्हें न महिलाओं से मतलब है, न बच्चियों से मतलब है, न ही अपराधियों से। वे सब महज अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकने के लिए आग तलाशते रहते हैं। यदि वाकई कानून का, किसी तरह की सजा का कोई डर-भय होता तो दिल्ली कांड के बाद भी देश के कई भागों में गैंगरेप के और मामले सामने नहीं आये होते।



20 जून 2018

एक जंग तेजाब की खुली बिक्री के विरोध में

पिछले दिनों तेजाबी हमले की पीड़ित प्रियंका मिश्रा जिंदगी की लड़ाई हार गई. उस पर तेजाबी हमला किसी बाहरी ने नहीं बल्कि उसके पति ने उस समय किया जबकि वह सो रही थी. ऐसी एक-दो नहीं बल्कि अनेक घटनाएँ हमारे समाज में हैं जहाँ किसी महिला से, लड़की से बदला लेने की नीयत से उसके चेहरे पर तेजाब से हमला किया गया. कभी एकतरफा प्यार के इंकार के परिणामस्वरूप, कभी दो प्यार करने वालों से बदला लेने की मनोवृत्ति में, कभी किसी तरह की रंजिश के चलते इस तरह की घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है. एसिड अटैक एक तरह की वह मनोवृत्ति या कहें कि मानसिक क्रूरता है जो पीड़ित पक्ष को मानसिक और शारीरिक रूप से हताहत करना चाहती है. इधर देखने में आया है कि विगत कुछ समय से तेजाबी हमलों के बढ़ने का मुख्य कारण बाजार में खुलेआम बिक्री के लिए तेजाब की उपलब्धता है.

बाजार में खुलेआम बिकता तेजाब और समाज में बदला लेने की नीयत से बढ़ती जा रही एसिड हमले की घटनाओं को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सार्थक निर्णय दिया गया. उच्चतम न्यायालय ने सन 2013 में एसिड अटैक को गंभीर अपराध मानते हुए सरकार, एसिड बेचनवाले दुकानदारों और एसिड अटैक पीड़ितों के लिए दिशा-निर्देश दिए थे. अदालत के अनुसार तेजाब केवल उन्हीं दुकानों पर बिक सकता है जिनको इसके लिए पंजीकृत किया गया हो. एसिड 18 वर्ष से कम उम्र के लोगों द्वारा नहीं बेचा जाएगा और जो भी इसे खरीदने आएगा दुकानदार द्वारा उसके घर का पता, टेलीफोन नंबर तथा एसिड खरीदने का उद्देश्य सहित अन्य जानकारी लेनी होगी और इसका पूरा लेखा-जोखा लिखित में अपने पास रखना होगा. जो दुकानदार एसिड बेच रहे हैं उनके पास इसका कितना स्टॉक है इसकी जानकारी जिला प्रशासन को देनी होगी. अदालत ने यह भी प्रावधान किया है कि यदि किसी दुकानदार द्वारा इन नियमों की अनदेखी की जाती है तो पकड़ने जाने पर  उस पर पचास हजार रुपये जुर्माना लगाया जाएगा. ऐसी स्थिति के बाद भी तेजाब की बिक्री खुलेआम हो रही है.

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद भी प्रशासन द्वारा सख्ती नहीं बरती जा रही है. आज भी कहीं घरों में प्रयोग करने के नाम पर, कहीं बैटरी में उपयोग के नाम पर कहीं अन्य छोटे उद्योगों में उपयोग के नाम पर तेजाब की खुलेआम बिक्री हो रही है. यह एक तरह से सिरफिरे और आपराधिक मानसिकता वालों को सहज हथियार उपलब्ध करवाने जैसा ही है. बाजार में खुलेआम तेजाब की बिक्री को रोकने और जन-जागरूकता लाने के लिए तेजाबी हमले की पीड़ित लक्ष्मी अग्रवाल द्वारा वर्तमान में ‘स्टॉप सेल एसिड’ अभियान को चलाया जा रहा है. लक्ष्मी अग्रवाल वर्ष 2005 में महज पंद्रह वर्ष की उम्र में एसिड अटैक का शिकार हुई थी. लम्बे और दर्दनाक समय में इलाज के बाद अपने आपको कमजोर न पड़ने देने वाली लक्ष्मी ने देश भर में एसिड अटैक के विरुद्ध आवाज़ उठानी शुरू की. वर्तमान में उनके द्वारा चलाये जा रहे अभियान का मूल उद्देश्य खुलेआम एसिड की बिक्री को रुकवाना है. ये हमारे समाज की विद्रूपता है कि इस तरह की कई-कई घटनाओं को देखने-सुनने के बाद भी जनसामान्य इस बारे में जागरूक या सचेत नहीं है.

यह सही है कि आज बहुतेरे काम ऐसे हैं जिसके लिए तेजाब की आवश्यकता होती है. ऐसे में तेजाब को हमेशा-हमेशा के लिए बिक्री से प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है मगर इसके साथ एक पहलू ये भी है कि यह अत्यंत घातक पदार्थ है. जब उच्चतम न्यायालय द्वारा इसकी बिक्री के लिए नियम बना दिए गए हैं तो प्रशासन द्वारा उन्हें सख्ती से लागू करने के कदम क्यों नहीं उठाये जा रहे हैं? उपयोगी कार्यों के अलावा तमाम सिरफिरे हैं जो तेजाब का दुरुपयोग करते हुए हमारी-आपकी बेटियों के भविष्य से, उनकी जान से खिलवाड़ करते हैं. न केवल प्रशासन को बल्कि नागरिकों को भी इसके लिए जागरूक होने की आवश्यकता है. हम लोग सजग हों और बिना ये सोचे कि इससे हमारा व्यक्तिगत क्या लेना-देना है हर उस व्यक्ति की, हर उस दुकानदार की शिकायत प्रशासन से करनी चाहिए जो खुलेआम तेजाब बेचने में लगा है. उन दुकानों को भी चिन्हित करने की आवश्यकता है जो गैर-पंजीकरण के तेजाब बेचने का काम कर रहे हैं.

सन 2016 में मुम्बई के प्रीति राठी तेजाब कांड में अदालत ने उस मामले को रेयर ऑफ द रेयरेस्ट मानते हुए आरोपी को फांसी की सजा सुनाई थी. यह अपने आपमें पहला मामला था जबकि एसिड अटैक मामले में किसी आरोपी को फाँसी की सजा सुनाई गई हो. इसके बाद भी एसिड हमलों में कमी आती नहीं दिखी है. देखा जाये तो महज सजा ही एकमात्र समाधान नहीं है. इससे बेहतर समाज को जागरूक होने की जरूरत है. दरअसल यह इंसानी दिमाग में कहीं गहरे बैठी पशुता, क्रूरता है, जो कब, किस रूप में सामने आये कहा नहीं जा सकता. किसी भी इन्सान की मूल प्रवृत्ति हिंसक ही होती है जो  अनेकानेक सोपान तय करने के बाद भी दूर नहीं हुई है न ही कम हुई है. यही कारण है कि आज भी उसे प्रेम, स्नेह, भाईचारे, शांति का पाठ नियमित रूप से पढ़ाया जाता है. उसकी मानसिक क्रूरता का ही दुष्परिणाम है कि समाज में रोज ही किसी न किसी तरह की आपराधिक घटनाएँ सुनाई देती हैं. तेजाबी हमले का शिकार सिर्फ और सिर्फ बेटियाँ हो रही हैं. किसी मनचले के एकतरफा प्रेम का इंकार और तेजाबी हमला, किसी अन्य इंकार के सुनाई देने पर महिला के चहरे पर एसिड अटैक कर देना. एक पल को सिर्फ विचार करने पर ही पूरा दिमाग झनझना जाता है कि कैसे कॉलेज में प्रैक्टिकल के दौरान दो-चार बूँद एसिड उँगलियों पर गिर जाने भर से घंटों जलन मचती रहती थी. किस तरह घर में, किसी व्यवसाय के दौरान एसिड से कार्य करने के दौरान असावधानीवश शरीर पर छिटक कर गिरा तेजाब कभी-कभी शरीर के उस हिस्से में खाल का, मांस को जला दिया करता है. घंटों, दिनों के हिसाब से न केवल जलन बल्कि अप्रत्याशित दर्द बना रहता है. जब दो-चार बूंदे पूरे दिल-दिमाग को हिलाकर रख देती हैं तो सोचिये क्या स्थिति होती होगी जबकि कोई दिमागी क्रूर इन्सान किसी के पूरे चेहरे पर तेजाब फेंक देता है.

हम सभी को आज ही सख्त कदम उठाने की जरूरत है. यह समय की माँग भी है और हमारी बेटियों के लिए सुरक्षात्मक भी है. आइये, हम सब एकजुट होकर तेजाब रुपी खतरनाक पदार्थ की खुलेआम बिक्री के खिलाफ खड़े हों. इसके साथ ही उस मानसिकता के खिलाफ भी खड़े हों जो महज अपनी पसंदगी के नकारने पर एसिड अटैक जैसे खतरनाक कदम उठाकर हमारी बेटियों की जान से, भविष्य से खेल रही है. आखिर किसी एक व्यक्ति की दिमागी क्रूरता का शिकार हम अपनी बच्चियों को कब तक होने देंगे? आज नहीं तो कल हमें जागना ही होगा, एकजुट होना ही होगा. और जब ऐसा करना ही है तो फिर कल का इंतजार क्यों?



उक्त आलेख जनसंदेश टाइम्स, दिनांक 20-06-2018 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.

28 अप्रैल 2018

रेप पर राजनीति


समाज असंवेदनशील हो गया है या हम सब, ये समझ से बाहर है. अब तो हम बच्चियों के साथ होने वाली दुराचार की घटनाओं को भी धर्म, जाति विचारधारा के आधार पर आंकने लगे हैं. इधर विगत कुछ दिनों से बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएँ बहुतायत में सामने आईं. कुछ घटनाओं विशेष में समाज के वर्ग विशेष का विरोध, सक्रियता देखने को मिली शेष सभी मामलों में वह चुप्पी साधे रहा. ऐसा वर्ग अपने आपको बुद्धिजीवी घोषित करता है. विगत दिनों कठुआ रेप काण्ड चर्चा का विषय बना. इसमें एक बच्ची के साथ रेप की घटना को मंदिर में अंजाम दिए जाने के संकेत मिले. ऐसा संकेत आते ही कि बच्ची जिसकी रेप के बाद हत्या कर दी गई, मुस्लिम समुदाय से है, बलात्कार करने वाला आरोपी हिन्दू समुदाय से है, बलात्कार से पहले अपहरण और उस बच्ची को रखने का स्थान मंदिर है समाज का एक बहुत बड़ा बुद्धिजीवी तबका तख्तियां, मोमबत्तियां लेकर सड़कों पर उतर आया. जस्टिस फॉर... की तख्तियां हवा में तैरने लगीं, सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों की प्रोफाइल पिक्चर बदलने लगी, लोगों ने जस्टिस फॉर... का अभियान सा छेड़ दिया. बच्ची के साथ रेप और उसकी हत्या को लेकर न केवल मुस्लिम समुदाय वरन हिन्दुओं ने भी अपना पुरजोर विरोध दर्ज करवाया. मुस्लिम समुदाय के साथ जुलूस निकालने से लेकर मोमबत्तियां जलाने तक, सरकार-विरोधी नारे लगाने तक बराबर से साथ दिया.


इसी बीच एक और बच्ची ऐसे दुर्दांत अपराधियों का शिकार बन गई. इस बार शोषित बच्ची का धर्म अलग था. आरोपी का मजहब अलग था. जहाँ उसके साथ कई-कई बार बलात्कार हुआ वह जगह अलग थी इस कारण से विरोध के स्वर भी कमजोर रहे. अबकी शोषित बच्ची हिन्दू समुदाय से निकली. बलात्कारी आरोपी एक मौलवी निकला और वह जगह जहाँ उस बच्ची के साथ बार-बार, कई बार बलात्कार हुआ वह मदरसा निकला. अबकी बार वे सारे बुद्धिजीवी जो कठुआ कांड में दहाड़ें मार-मार के रो रहे थे, मोमबतियां जला-जलाकर अँधेरे को भगा रहे थे, सोशल मीडिया पर अपनी प्रोफाइल पिक्चर को काला करके विरोध दर्ज करवा रहे थे वे अचानक न जाने कहाँ अलोप हो गए. इस बच्ची के बलात्कार पर वे कथित बुद्धिजीवी तो सामने नहीं आये वरन मुस्लिम समुदाय के मानसिक रोगी और मीडिया के मानसिक भडुए अवश्य ही सामने नजर आने लगे. जहाँ पूरा हिन्दू समुदाय कठुआ कांड पर मुस्लिम समुदाय के साथ खड़ा हुआ था वहीं इस मदरसा काण्ड पर मुस्लिम समुदाय उस बच्ची को भाभी के संबोधन से पुकारने लगा. उस बच्ची और आरोपी मौलवी के विवाह की बात करना लगा. इन मुस्लिमों के द्वारा जस्टिस फॉर निकाह आरम्भ किया गया. मानसिक पतन की इतनी पराकाष्ठ शायद ही किसी दौर में देखने को मिली होगी. 


ऐसी घटनाओं के बाद इस मुस्लिम समुदाय की ऐसी हरकतें आँखें खोलने वाली हैं. एक रेप पीड़ित बच्ची के साथ खड़े होने के बजाय वे सब अपने मजहब के उस आरोपी के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं. देखा जाये तो न केवल खड़े दिखाई दे रहे हैं वरन पुरजोर ढंग से उस आरोपी के समर्थन में खड़े होकर ऐसा माहौल बनाने में लगे हैं कि वह बच्ची स्वेच्छा से मदरसे में उस मौलवी से शारीरिक सम्बन्ध बनाने गई थी. इस पूरे माहौल को कुछ मीडिया संगठन भी हवा देने में लगे हैं. ऐसे समय में वे सभी बुद्धिजीवी संज्ञा-शून्य पड़े हैं. उनके मुंह से कोई शब्द नहीं निकल रहा है. उनके द्वारा कोई मोमबत्ती नहीं जलाई जा रही है. किसी की प्रोफाइल पिक्चर काली नहीं हो रही है. हिन्दू विरोध का, भाजपा विरोध का या कहें कि मोदी विरोध का इससे घिनौना कदम कभी देखने को नहीं मिला है. ऐसे लोग जो जाति, धर्म देखकर बच्चियों के साथ खड़े होते हैं, वे कहीं न कहीं अपनी खुद की बच्चियों के लिए खतरनाक अवसरों को जन्म दे रहे हैं. यहाँ समझने की बात है कि अपराधी सिर्फ और सिर्फ अपराधी है. उसके लिए हवस का साधन कोई स्त्री है, भले ही वह कुछ माह की बच्ची हो या फिर कई साल की वृद्धा मगर हम सब तो अपने आपको बुद्धिजीवी, जागरूक कहते हैं. हमें तो सजग होने की, सतर्क होने की, निष्पक्ष होने की आवश्यकता है.

25 अप्रैल 2018

कानूनी उपाय के साथ समाजिक उपाय भी आवश्यक हैं रेप रोकने को


इन दिनों रेप की घटनाओं की बाढ़ सी आई हुई है। कोई दिन ऐसा नहीं निकल रहा है जबकि रेप की घटनाओं से सामना न होता हो। शर्मनाक है ऐसी स्थिति। इससे ज्यादा चिंताजनक स्थिति यह भी है कि अब ऐसा कृत्य करने वाले मासूम बच्चियों को भी यौन शोषण का शिकार बनाने लगे हैं। दो-दो, चार-चार महीनों की बच्चियों के साथ रेप किया जा रहा है, रेप के प्रयास किये जा रहे हैं। घृणित कृत्य के साथ जघन्यता की पराकाष्ठा दिखाई जाने लगी है। ऐसा लगने लगा है जैसे समाज से संवेदनशीलता, मानवीयता पूरी तरह समाप्त हो गई है। यौन-कुंठा का इतना वीभत्स रूप शायद की कभी देखने को मिला हो। दिनों-दिन बढ़ती बलात्कार की घटनाएँ समाज में आ रहे मानवीय मूल्यों के अवमूल्यन का दुष्परिणाम हैं। एक एजेंसी के आँकड़ों के अनुसार देश में प्रतिदिन पचास से अधिक महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं, लगभग पाँच सौ महिलाएँ छेड़खानी का शिकार होती हैं। कार्यशील महिलाओं पर किये गए एक सर्वेक्षण के पश्चात् सामने आई एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार पचास प्रतिशत कामकाजी महिलाओं को अपने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। लगभग पच्चीस प्रतिशत महिलाएँ स्पर्श जैसे उत्पीड़न की पीड़ा सहती हैं। एक अध्ययन के अनुसार अस्सी प्रतिशत बलात्कार के मामले दस वर्ष से लेकर तीस वर्ष की युवतियों के साथ होते हैं। इसमें भी चौंकाने वाला तथ्य यह है कि दस वर्ष कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार के मामले भी चार प्रतिशत के आसपास पाये गये हैं। ये आँकड़े भले हों मगर दिखाते हैं कि यौन पिपासा में हमारा समाज कितना पतित हो चुका है।


इस पतन के लिए वर्तमान में सामाजिक जीवन-शैली बहुत अधिक जिम्मेवार है। सेल्युलाइड पर बिखरती रंगीनियों ने, टी०वी० कार्यक्रमों की नग्नता ने एक कुंठित वर्ग को जन्म दिया है। अश्लीलता घर-घर परोसी जा रही है। मोबाइल के कारण हर हाथ में पोर्न सहजता के साथ उपलब्ध है। पुरुषों के उपभोग की वस्तु हो, बच्चों की आवश्यकता सम्बन्धी हो या फिर महिलाओं की जरूरत, नारीदेह दर्शन बिना किसी भी तरह का विज्ञापन पूरा नहीं होता है। अधोवस्त्रों के विज्ञापन हों, सौन्दर्य प्रसाधनों के विज्ञापन हों, गर्भनिरोधकों के विज्ञापन हों, पेयपदार्थों के विज्ञापन हों, बॉडी स्प्रे हो, वाहन का विज्ञापन हो या फिर कोई अन्य उत्पाद सबका प्रस्तुतीकरण अश्लीलता-नग्नता से भरपूर रहता है। विज्ञापनों के अलावा फिल्मों, धारावाहिकों, म्यूजिक एल्बम, लाइव शो यहाँ तक कि कॉमेडी शो तक में महिलाओं को अशालीन, अर्द्धनग्न रूप में प्रदर्शित किया जा रहा है। उनकी भावभंगिमा, गीतों के बोल, आपसी बातचीत, संवाद अदायगी कहीं न कहीं शारीरिकता का बखान करती दिखती है। जिससे आभास होता है कि जीवन का एकमात्र उद्देश्य सेक्स की प्राप्ति है। इससे कामुक प्रवृत्ति के व्यक्ति को नारीदेह के बिना, सेक्स के बगैर अपना जीवन अधूरा सा लगने लगता है। ऐसी स्थिति में वह अपनी यौनेच्छा को पूरा करने के लिए किसी न किसी माध्यम की तलाश करता है। अश्लील, नग्नता सम्बन्धी दृश्य सामग्री देखने के बाद ऐसे कामातुर जिनके पास कामेच्छा संतुष्टि का साधन है वे सहज भाव से अपनी संतुष्टि प्राप्त कर लेते हैं किन्तु जिनके पास ऐसी सुविधा नहीं है वे अपनी यौनेच्छा की संतुष्टि का साधन खोजने निकल पड़ते हैं। ऐसे समय में ही उसकी यौनेच्छा का शिकार असहाय, कमजोर महिला वर्ग होता है। बच्चियाँ ऐसे लोगों को सबसे आसान शिकार जान पड़ती हैं। महिलाओं के साथ शारीरिक संबंधों की कठिनाई अथवा बाधा उत्पन्न होने पर इसका विकृत रूप सामूहिक बलात्कार, मासूम बच्चियों के शोषण के रूप में सामने आ रहा है। आज आधुनिकता के नाम पर सेक्स को प्रमुखता से स्वीकार करके देह की नुमाइश, खुलेआम शारीरिक सम्बन्धों की ओर मुड़ने, विवाहपूर्व-विवाहेतर शारीरिक सम्बन्ध बनाने की संस्कृति जिस तेजी से फ़ैल रही है वह आधुनिक उच्छृंखल महिला-पुरुष को तो दैहिक आवश्यकता की पूर्ति के रास्ते उपलब्ध करवा रही है किन्तु यौन-कुंठित वर्ग को यौन अपराधोन्मुख कर रही है।

फिल्मों, टी०वी० धारावाहिकों में प्रेम करना, दैहिक संबंधों की सहजता का दिखाया जाना एकमात्र कार्य बनता जा रहा है। कहानी भले ही किसी शैक्षिक संस्था से आरम्भ हो, भले ही किसी परिवार या अन्य जगह से शुरू हो पर जल्द ही वह प्यार करने, प्यार होने, शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने के आसपास घूमने लगती है। प्यार के नाम पर सेक्स को, नारी देह को दिमाग में इस तरह प्रत्यारोपित किया जा रहा है कि राजी, राजी नहीं तो गैर-राजीकी अवधारणा पर बस प्रेम करना है, शारीरिक सम्बन्ध बनाने हैं। प्रेम का किशोरवय अथवा युवाओं से सम्बंधित स्वरूप ही सामने नहीं रखा जा रहा है वरन विवाहेतर संबंधों को, जबरन प्रेम सम्बन्ध स्वीकार करवाए जाने को भी स्थापित सा किया जा रहा है। इसी का दुष्परिणाम है कि आये दिन बच्चियाँ तेजाबी हमले का शिकार हो रही हैं, कहीं किसी बच्ची के साथ बलात्कार किया जा रहा है तो कहीं किसी विवाहित महिला को जबरन प्रेम सम्बन्ध स्वीकारने को मजबूर किया जा रहा है। अत्याधुनिक समाज के चाल-चलन के अनुसार गर्लफ्रेंड, बॉयफ्रेंड जैसी अवधारणा अनिवार्य सी समझी जाने लगी है। आधुनिक बनने के इन क़दमों ने इन बच्चों को ही संकट में डाला है। बच्चियाँ आपराधिक प्रवृतियों के चंगुल में फँस जा रही हैं; कुत्सित मानसिकता के लड़कों के बहकावे में आकर या तो गर्भवती हो जा रही हैं या फिर गैंग रेप का शिकार बन रही हैं; बहला-फुसला उनको देह-व्यापार के दलदल में भी धकेला जा रहा है; प्रेम के नाम पर असफलता हाथ लगने वाले सिरफिरों के हमलों का शिकार बन रही हैं।

ऐसे विषम समय में हमें स्वयं तय करना है कि हमारे लिए प्राथमिकता क्या है, देह-दर्शना वस्त्र, यौनेच्छा को बढ़ाने वाली स्थितियां अथवा सुरक्षित समाज, सुरक्षित बच्चियां, सुरक्षित महिलायें? असल सुधार तो इस प्राथमिकता को निर्धारित करने के बाद ही होगा। सुरक्षा अपने हाथ में है क्योंकि विकृत मानसिकता, यौन-कुंठित व्यक्ति सिर्फ बच्ची के लिए नहीं, महिलाओं के लिए नहीं पूरे समाज के लिए घातक है। महिलाओं के विरुद्ध हो रहे अपराधों को रोकने अथवा कम करने का उपाय कानूनी दृष्टि से ज्यादा सामाजिक और सांस्कृतिक है। केंद्र सरकार द्वारा बारह वर्ष से कम आयु की बच्चियों के साथ रेप के मामले में फाँसी की सजा से ऐसी घटनाओं के रुकने की सम्भावना बहुत कम है। इसके उलट आशंका इसकी अवश्य है कि कहीं ये दरिन्दे अपनी हवस का शिकार बच्चियों की हत्या करना न शुरू कर दें। कानून अपना काम करता ही है मगर समाज का भी अपना दायित्व होता है। कुछ वर्ष पहले इसी केंद्र सरकार ने पोर्न साइट्स पर प्रतिबन्ध लगाया था तो सरकार विरोधी लोग इस प्रतिबन्ध के विरोध में सडकों पर उतर आये थे। उस समय इन लोगों का कुतर्क था कि सरकार कैसे और क्यों निर्धारित करेगी कि कोई क्या देखे। ये ठीक उसी तरह से है जैसे कि नारीवादियों द्वारा कुतर्क किया जाता है कि देह उनकी है, वे चाहे जैसे दिखाएँ। यहाँ सोचना होगा कि जो सक्षम है, जो कपड़ों के भीतर से झांकती देह को सुरक्षा घेरे में लिए घूम रहा है, जिसके आसपास दैहिक सम्बन्ध बनाये जाने के तमाम विकल्प उपलब्ध हैं वे कभी भी रेप का शिकार नहीं होती हैं पर उनकी अश्लील भाव-भंगिमाओं का खामियाजा बच्चियों को उठाना पड़ता है।

न केवल सरकार को वरन समाज को अब जागने की ही नहीं बल्कि सख्ती दिखाने की आवश्यकता है। किसी भी तरह से विज्ञापनों, धारावाहिकों, फिल्मों, कार्यक्रमों आदि में अनावश्यक रूप से नारीदेह की कामुक छवियों के चित्रण, प्रदर्शन आदि पर रोक लगाई जाए। किसी भी स्त्री को बाजार में उत्पाद की तरह से प्रस्तुत करने से बचना होगा। इसके साथ-साथ देश भर में सख्ती से पोर्न साइट्स पर पूर्णरूप से प्रतिबन्ध लगाया जाए। अब ऐसा इसलिए भी आवश्यक हो गया है क्योंकि मोबाइल के कारण बच्चों-बच्चों के हाथों में पोर्न साइट्स खेलने में लगी हैं। यही कारण है कि आज कम उम्र के बच्चों द्वारा भी शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने की घटनाएँ सामने आने लगी हैं। विद्यालयीन पाठ्यक्रमों में नैतिक शिक्षा के साथ-साथ यौन शिक्षा को भी अनिवार्य रूप से शामिल किया जाये। बालक-बालिकाओं को संस्कारवान बनाये जाने की आधारभूमि उनके विद्यालय से ही आरम्भ की जाये। इसी तरह से बच्चियों को शारीरिक सुरक्षा सम्बन्धी प्रशिक्षण अनिवार्य रूप से विद्यालयों में दिया जाना चाहिए। एक कदम सरकार को सख्ती से उठाये जाने की आवश्यकता है और वह है वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता देना। ये कहने-सुनने में भले ही असहज लगे मगर आज जिस तरह से घर-घर में, गली-गली में यौन-कुंठित व्यक्ति जन्म ले रहे हैं उनकी यौनेच्छा दमन के लिए कोई न कोई जगह अवश्य होनी चाहिए। यदि आधुनिकता का तकाजा देह-दर्शन है, छोटे वस्त्र हैं, यौन-सम्बन्ध हैं तो उसी आधुनिकता को सही दिशा देने के लिए यौन-कुंठित व्यक्तियों की यौनेच्छा शमन की व्यवस्था बनाये जाने के लिए वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता देनी होगी।

इसके साथ-साथ हम सबको ध्यान रखना होगा कि बलात्कार के मूल में यदि नारीदेह की कामुक छवि का प्रदर्शन है तो संस्कृति से विमुख होना भी एक अन्य कारण है। भारतीय संस्कृति के गौरवमयी आँचल की छाँव को त्यागकर मांसलता, अश्लीलता की चकाचौंध भरी धूप को स्वीकारने से रिश्तों की गर्माहट, भावनाओं की पवित्रता को सुखाने के अतिरिक्त और कुछ प्राप्त होने वाला नहीं और इसका खामियाजा हमारी बेटियों को उठाना पड़ रहा है। नारी देह दर्शन की वकालत करने वालों को समझना होगा कि हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, हिन्दू दत्तक पुत्र एवं अनुरक्षण अधिनियम, बाल विवाह प्रतिरोध अधिनियम, मातृत्व हितलाभ अधिनियम, मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेगनेंसी एक्ट, दहेज निरोध अधिनियम, अनैतिक व्यापार अधिनियम, परिवार न्यायालय, महिलाओं के प्रति अभद्र प्रस्तुतीकरण अधिनियम जैसे अनेक अधिनियमों के अलावा लड़कियों का अल्पायु में विवाह प्रतिबन्धित करने, तलाक लेने, पिता, पति और पुत्र की संपत्ति पर अधिकार पाने का हक, समान अवसर, कार्यस्थल पर सुरक्षा, मातृत्व अवकाश का अधिकार आदि महिलाओं के देह-विमर्श का, अश्लील आधुनिक बनने का परिणाम नहीं हैं।

21 अप्रैल 2018

संवेदनशीलता के साथ हो कठुआ काण्ड की जाँच


अभी तक किसी भी घटना पर मीडिया ट्रायल देखते आ रहे थे, अब सोशल मीडिया भी इसी भूमिका में आ गया है. पिछले दिनों कठुआ कांड को जिस तरह से मजहबी रंग देकर उछाला गया उसे लेकर मीडिया की अपनी भूमिका रही. उसकी भूमिका से इतर सोशल मीडिया पर लोगों के अपने-अपने विचार सामने आने लगे. फोटो, वीडियो खुलकर पीड़ित बच्ची का नाम, पता बताने में लग गए. इन्हीं फोटो, वीडियो के बीच ऐसी भी पोस्ट सामने आईं जो उस कांड की सत्यता उजागर करने की ओर बढ़ती दिख रही थीं. लोगों की न्यायविद बनने, पत्रकार बनने, नेता बनने, जज बनने, जासूस बनने की भूमिकाओं के बीच हिन्दू धर्म को कटघरे में खड़ा कर दिया गया. मंदिरों को अपराध-स्थल और हिंदुत्व को बलात्कारी धर्म जैसा साबित किया जाने लगा. कार्टून बनाये जाने लगे, टी-शर्ट पहनकर विदेशों तक में ये बताया जाने लगा कि भारत में स्त्री सुरक्षित नहीं है. विदेश की बातें फिर कभी क्योंकि वहां बैठे लोग और देश में बैठे उनके एजेंट देश की छवि वैश्विक स्तर पर ख़राब करने को सदैव से आमादा रहे हैं. बहरहाल, देश में कठुआ कांड को लेकर इस तरह की मोर्चेबंदी की जाने लगी जैसे भाजपा और हिंदूवादी लोग बलात्कार करने में लगे हैं. हिन्दू धर्म पर इसी बहाने न केवल उंगली उठाई गई बल्कि पूरी तरह से बदनाम भी किया गया. बहुतेरे बुद्धिभोगी टाइप लोगों को अपने हिन्दू होने पर, अपने पुरुष होने पर शर्म आने लगी. इसके बाद भी उन्होंने न अपना हिन्दू धर्म त्यागा और न ही पुरुष से लिंग परिवर्तन किया.


आरोपों, प्रत्यारोपों के बीच बहुत से ऑडियो, बहुत से वीडियो, बहुत सी रपटों ने कठुआ कांड की असलियत को सामने लाने का काम भी किया. घटना से सम्बंधित तमाम सारी बातों के बीच मीडिया में खबर छपी कि दुष्कर्म के एक आरोपी उस दिन अपनी परीक्षा दे रहा था. इस बावत साक्ष्य भी प्रस्तुत किये गए. इसी के साथ हल ही में खबर आई कि पीड़ित बच्ची के साथ रेप नहीं हुआ था. ये भी बताया गया कि उसकी खोपड़ी भी सुरक्षित थी जबकि इससे पहले बताया जा रहा था कि बच्ची की हत्या सिर कुचल कर की गई थी. मंदिर के सम्बन्ध में भी अनेक तथ्य सामने आने से और मृतक बिटिया की स्थिति से ये समझाने की कोशिश की गई कि अपराध मंदिर में नहीं हुआ था. रेप हुआ या नहीं, घटना मंदिर में हुई या नहीं, हत्या सिर कुचल कर की गई या अन्य तरीके से इन बिन्दुओं पर चर्चा होने से बेहतर है कि अब पहली चर्चा इस बात पर हो कि एक बेटी की हत्या हुई है, एक बच्ची की मौत हुई है उसकी यदि हत्या हुई है तो आरोपी कौन है? और यदि उसकी मृत्यु किसी दुर्घटना से या फिर किसी असामान्य स्थिति में हुई है तो वह क्या है? मीडिया या सोशल मीडिया इन बिन्दुओं पर चर्चा नहीं हो रही है. अभी तक कठुआ कांड में रेप घटना के बारे में बोलने वाले पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट को गलत बताने में लग गए हैं और इससे इतर लोग दूसरे तरह की बयानबाजी में लग गए हैं.


एक बच्ची की मृत्यु की जाँच के साथ-साथ एक जाँच और आवश्यक है कि किसने और क्यों इस पूरे मामले को हिन्दू-विरोधी रंग देने की कोशिश की? कैसे एक योजनाबद्ध तरीके से देश भर में उस बच्ची का नाम, फोटो सार्वजनिक किया गया? किस तरह से सामाजिक अपराधिक घटना को राजनैतिक रंग देकर किसके द्वारा अपना उल्लू सीधा करने का प्रयास किया गया? ऐसा नहीं है कि देश में रेप की या फिर बच्चियों के साथ रेप की यह पहली वारदात थी. इसके पहले भी ऐसी घिनौनी हरकतें होती रही हैं किन्तु इसी बार इस मामले को मजहबी रंग देने की कोशिश की गई है, इसकी भी जाँच की जानी चाहिए कि आखिर वे कौन लोग हैं जो संवेदनशील मामले को धार्मिक रंग देने में लगे थे? शर्मनाम यह रहा कि इस पूरे मामले में सोशल मीडिया के वे लोग भी पुरजोर ढंग से सरकार के, हिंदुत्व के खिलाफ दिखे जो अपने आपको बुद्धिजीवी बताते नहीं थकते हैं. इस मामले में एक शर्मनाक पहलू और भी सोशल मीडिया में निकल कर आया कि इस मामले के सापेक्ष समूचे माहौल को पुरुष-विरोधी साबित किया जाने लगा. बहुत सी महिलाओं द्वारा अपनी प्रोफाइल काली करके महिला-विहीन समाज होने की स्थिति बनाई गई. यहाँ उनकी खुद की समझ से परे था कि कैसे एक बच्ची की हत्या और यदि रेप हुआ है तो वह समाज में महिला-पुरुष विरोधी आन्दोलन की आधारभूमि कैसे बन सकता है. (इस विषय पर बाद में)

कुल मिलाकर जिन ताकतों ने एक बच्ची की मौत को धार्मिक उन्माद में बदलने की साजिश रची थी, वे सफल नहीं हो सके. हाँ, ऐसे लोग सोशल मीडिया पर अवश्य ही माहौल ख़राब करने में सफल रहे. किसी आपराधिक घटना को संवेदना-रहित बनाकर अपने-अपने तर्क-कुतर्क करते देखे गए. रेप की आड़ में पुरुष समाज को गाली देते देखे गए. मंदिर को निशाना बनाकर हिन्दू धर्म को कलंकित करते देखे गए. फ़िलहाल, सबके अपने-अपने तर्क-कुतर्क हैं मगर सत्य यह है कि एक बच्ची की मौत हुई है, सत्य यह भी है कि कतिपय स्वार्थी ताकतों ने धार्मिक उन्माद फ़ैलाने की कोशिश की है. ऐसे में जाँच एजेंसियों की, सरकार की जिम्मेवारी बनती है कि वह पूरी गंभीरता के साथ इस मामले की जाँच करे और इसके दोषी लोगों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाये.