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19 अक्टूबर 2024

पढ़ने की आदत

1. वॉरेन बफेट अपनी अत्यधिक पढ़ने की आदतों के लिए जाने जाते हैं। वह अपने दिन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा विभिन्न सामग्रियों को पढ़ने में बिताते हैं, जिनमें वार्षिक रिपोर्ट, व्यावसायिक समाचार पत्र और विभिन्न विषयों, विशेष रूप से निवेश और व्यवसाय प्रबंधन पर किताबें शामिल हैं।


2. ओपरा विन्फ्रे एक शौकीन पाठक हैं और उनका एक प्रसिद्ध पुस्तक क्लब है जहां वह अपने दर्शकों के साथ पुस्तकों की सिफारिश करती हैं और उन पर चर्चा करती हैं। वह अपनी सफलता का श्रेय पढ़कर लगातार सीखने की आदत को देती हैं।


3. एलोन मस्क को छोटी उम्र से ही एक शौकीन पाठक के रूप में जाना जाता है। उन्होंने साक्षात्कारों में उल्लेख किया है कि वह एक बच्चे के रूप में प्रतिदिन 10 घंटे पढ़ते थे। वह अक्सर अपने व्यापक ज्ञान का श्रेय अपनी व्यापक पढ़ने की आदतों को देते हैं।


4. बिल गेट्स एक शौकीन पाठक के रूप में जाने जाते हैं और अक्सर अपने ब्लॉग गेट्स नोट्स के माध्यम से अपनी पढ़ने की सिफारिशें साझा करते हैं। वह प्रौद्योगिकी और विज्ञान के बारे में गैर-काल्पनिक पुस्तकों से लेकर उपन्यासों और जीवनियों तक, कई प्रकार की सामग्री पढ़ता है।




5. फेसबुक की सीओओ शेरिल सैंडबर्ग अपनी अनुशासित पढ़ने की आदतों के लिए जानी जाती हैं। वह हर दिन पढ़ने के लिए समय निकालती है और अक्सर अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पढ़ी गई किताबों से अंतर्दृष्टि साझा करती देखी जाती है।


6. फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने हर दो हफ्ते में एक किताब पढ़ना एक व्यक्तिगत चुनौती बना दी है। वह सालाना अपनी पढ़ने की सूची साझा करते हैं और अक्सर किताबों के उनके व्यक्तिगत और व्यावसायिक विकास पर पड़ने वाले प्रभाव पर चर्चा करते हैं।


7. माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला कविता और साहित्य के प्रति अपने प्रेम के लिए जाने जाते हैं। वह अक्सर साहित्य से सीखे गए पाठों को अपनी नेतृत्व शैली और निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करते हैं।


8. पेप्सिको की पूर्व सीईओ इंद्रा नूयी एक उत्साही पाठक हैं, जिन्होंने अपनी नेतृत्व शैली और व्यवसाय के प्रति दृष्टिकोण को आकार देने का श्रेय पुस्तकों को दिया है। वह अक्सर अपने कर्मचारियों और साथियों को निरंतर सीखने और विकास को बढ़ावा देने के तरीके के रूप में किताबों की सिफारिश करती है।


ये व्यक्ति व्यक्तिगत और व्यावसायिक विकास के साथ-साथ अपने दृष्टिकोण और ज्ञान के आधार को व्यापक बनाने के लिए एक आदत के रूप में पढ़ने के महत्व को प्रदर्शित करते हैं।


पढ़ने की आदत कभी भी खराब, बुरी नहीं मानी जा सकती. एक बार आप भी इस आदत को अपनाकर देखें.  यद्यपि हम भी ऐसी आदत का शिकार हैं तथापि ऐसे बड़े-बड़े नामों वाले समूह का हिस्सा न बनने के कारण अपने बारे में यहाँ नहीं, कभी और सही। 


(उक्त जानकारी सोशल मीडिया पर अपने मित्र की प्रोफाइल से साभार) 

24 अक्टूबर 2021

मुलाकात एक महान व्यक्तित्व से

कैप्टन लक्ष्मी सहगल से दो बार मिलने का अवसर मिला था. पहली बार मुलाकात बहुत संक्षिप्त रही और उस मुलाकात में बातचीत का सौभाग्य भी मिला था. दोबारा जब मिलना हुआ तो बस उनको दूर से देखने भर का अवसर मिला. उनसे न बात कर सकते थे, न उनका स्पर्श कर सकते थे. पहली बार उनसे मिलना हुआ था अपने पर्यावरण विषय पर आयोजित होने वाले एक सेमिनार के सम्बन्ध में. उन्होंने अपनी आयु, स्वास्थ्य आदि का हवाला देते हुए सेमिनार में उपस्थित होने में असमर्थता व्यक्त की. हम उनके एक तरह के इंकार से दुखी थे और उसके बाद दोबारा जब मिलना हुआ तो उससे बड़े दुःख के साथ.


खबर मिली कि वे कानपुर के एक मेडिकल सेंटर में एडमिट हैं. उनको देखने वहाँ जाना हुआ तो दूर से ही दर्शन का मौका मिला. यह मौका भी बहुत देर के लिए नहीं मिला था, सबको भी नहीं मिला था. उनकी पुत्री सुहासिनी अली से मुलाकात हुई और उनसे लक्ष्मी सहगल जी से पिछली मुलाकात के बारे में बताते हुए बस चंद पल के दर्शन कर लेने का निवेदन किया. सुहासिनी अली जी को हमारी बातों से जो भी एहसास हुआ हो, एक सेकेण्ड अपने आपसे जैसे विचार किया और फिर लक्ष्मी सहगल जी के दर्शन कराने पर सहमति व्यक्त की. हमें एहसास नहीं था कि लक्ष्मी सहगल जी को आखिरी बार देख रहे हैं. उनकी आँख बंद किये छवि को अपनी आँखों में भरकर, सुहासिनी जी से जरा सी बात करके हम आँखों में एक नमी लिए वापस उरई लौट आये. उसी माह उनके देहांत की खबर हम लोगों को रुला गई. उनका निधन 23 जुलाई 2012 को कानपुर में ही हुआ. उनकी सामाजिकता को, समाज के प्रति अपनी जिम्मेवारी को ऐसे समझा जा सकता है कि उन्होंने अपनी देह को दान कर दिया था. उनके निधन के पश्चात् उनकी पार्थिव देह कानपुर में मेडिकल कॉलेज को सौंप दी गई.




यह हम जैसे लोगों के लिए गौरव का विषय है कि ऐसी महान विभूति से बात करने का, उनका स्पर्श करने का, उनके दर्शन करने का अवसर मिला. गर्व का विषय इसलिए है क्योंकि वे आजाद हिन्द फौज की अधिकारी थीं. फ़ौज में स्थापित रानी लक्ष्मी रेजिमेन्ट की कमाण्डर थीं. आजाद हिन्द सरकार का गठन होने पर उनको महिला मामलों का मंत्री बनाया गया था. उनका जन्म 24 अक्टूबर 1914 को एक तमिल परिवार में हुआ था. राष्ट्रवादी आंदोलन का प्रभाव उन पर बचपन से ही था. इस कारण जब द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सेना ने सिंगापुर में ब्रिटिश सेना पर हमला किया तो वे सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फ़ौज में शामिल हो गईं. 1943 में अस्थायी आज़ाद हिन्द सरकार की कैबिनेट में पहली महिला सदस्य बनीं.


सन 1947 में उन्होंने कर्नल प्रेम कुमार सहगल से विवाह किया और कानपुर आकर बस गईं. यहाँ आकर उन्होंने अपनी चिकित्सा शिक्षा को जनसेवा में लगाया और इसके साथ-साथ वे वंचितों की सेवा में लग गईं. उनके समाजोपयोगी कार्यों, सेवाओं को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें सन 1998 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया.


उनकी जन्मतिथि पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि.

18 अक्टूबर 2020

भ्रमों का टूटना आवश्यक है

व्यक्तित्व विकास के लिए भ्रमों का टूटना आवश्यक होता है. यदि ऐसा नहीं हो रहा तो व्यक्ति लगातार भ्रम में जीते हुए अपना विकास-पथ नहीं चुन पाता है. भ्रमों का टूटना उसे जीवन की, समाज की सत्यता से परिचित करवाता है.


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13 जनवरी 2019

देश के पहले अंतरिक्ष यात्री को जन्मदिन की शुभकामनायें


सन 1984 को जब देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पूछने पर कि अंतरिक्ष से भारत कैसा लगता है, तब सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा का जवाब देने वाले भारत के पहले अन्तरिक्ष यात्री राकेश शर्मा आज, 13 जनवरी को सत्तरवीं उड़ान की तरफ अग्रसर हैं. उनका जन्म 13 जनवरी 1949 को पंजाब के पटियाला में हुआ था. उन्होंने अपनी सैनिक शिक्षा हैदराबाद में ली थी. पायलट बनने की इच्छा रखने वाले राकेश शर्मा भारतीय वायुसेना द्वारा टेस्ट पायलट भी चुन लिए गए. 20 सितम्बर 1982 को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा तत्कालीन सोवियत संघ की अंतरिक्ष एजेंसी इंटरकॉस्मोस के अभियान के लिए चुना गया.


2 अप्रैल 1984 के रूप में वह ऐतिहासिक दिन आया जबकि सोवियत संघ के बैकानूर से सोयूज टी-11 अंतरिक्ष यान ने तीन अंतरिक्ष यात्रियों- राकेश शर्मा, अंतरिक्ष यान के कमांडर वाई०वी० मालिशेव और फ़्लाइट इंजीनियर जी० एम स्ट्रकोलॉफ़- के साथ उड़ान भरी. सोयूज टी-11 ने इन तीनों अंतरिक्ष यात्रियों को सोवियत रूस के ऑबिटल स्टेशन सेल्यूत-7 में पहुँचा दिया. राकेश शर्मा विश्व के 138वें अंतरिक्ष यात्री बने. उन्होंने सात दिन स्पेस स्टेशन पर बिताए. इन सात दिनों में उन्होंने 33 प्रयोग किए. सेल्यूत-7 में रहते हुए भारत की कई तस्वीरें उतारीं.  

अंतरिक्ष मिशन पूर्ण हो जाने के बाद भारत सरकार ने राकेश शर्मा और उनके दोनों अंतरिक्ष साथियों को अशोक चक्र से सम्मानित किया. इसके साथ-साथ उन्हें हीरो ऑफ़ सोवियत यूनियन सम्मान से भी विभूषित किया गया था. विंग कमाडर के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद राकेश शर्मा हिन्दुस्तान एरोनेट्किस लिमिटेड में टेस्ट पायलट के तौर पर कार्य करते रहे. सन 2006 में राकेश शर्मा को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की समिति में सदस्य के रूप में शामिल किया गया.

राकेश शर्मा जी के जन्मदिन पर उनको हार्दिक शुभकामनाएं.

12 जनवरी 2019

एक और विवेकानन्द चाहिए विवेकानन्द को समझने के लिए


स्वामी विवेकानन्द, आज जिनका जन्मदिन है. उनका जन्म 12 जनवरी सन् 1863 को कलकत्ता में हुआ था. उनके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था. नरेंद्र पर अपने माता-पिता के धार्मिक, प्रगतिशील तथा तर्कसंगत व्यक्तित्व का प्रभाव रहा, जिसने उनकी सोच और व्यक्तित्व को आकार प्रदान किया. वे अपने ओजस्वी और सारगर्भित व्याख्यानों के लिए समूचे विश्व में प्रसिद्द हैं. उन्होंने अपने अल्प जीवन में जिस तरह का विराट स्वरूप प्राप्त कर लिया था, वैसा विरले ही कर पाते हैं. मात्र 25 वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने संन्यास धारण कर लिया था. इसके बाद वे पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा पर निकल गए थे. उनका आत्मविश्वास, उनकी संयमित जीवनशैली के कारण ही यह सब संभव हो सका था.


सन 1893 में शिकागो (अमरीका) में हो रही विश्व धर्म परिषद् में वे भारत के प्रतिनिधि के रूप में पहुँचे. यूरोप-अमेरिका के लोग पराधीन भारतवासियों को हेय दृष्टि से देखते थे. उन लोगों ने प्रयास किया कि स्वामी विवेकानन्द को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का अवसर न मिले. बाद में एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें बहुत कम समय दिया गया और इसी अल्प समय का सदुपयोग करते हुए उन्होंने वहाँ उपस्थित सभी विद्वानों को चकित कर दिया. इसके बाद तो पूरा अमेरिका उनका जबरदस्त प्रशंसक बन गया और वहाँ उनके भक्तों का एक बड़ा समुदाय बन गया. उनकी वक्तृत्व-शैली तथा ज्ञान को देखते हुए वहाँ के मीडिया ने उन्हें साइक्लॉनिक हिन्दू नाम दिया था. स्वामी विवेकानन्द का भारतीय दर्शन की शक्ति पर दृढ़ विश्वास था. उनका मानना था कि आध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जायेगा. स्वामी विवेकानन्द ने स्वयं को गरीबों का सेवक माना और देश के गौरव को देश-देशान्तरों में उज्ज्वल करने का सदा प्रयत्न किया.

महज 39 वर्ष के अल्प जीवनकाल में स्वामी विवेकानन्द जो काम कर गये वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे. उनके दर्शन, कार्यों, व्याख्यानों को देखते हुए गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था कि यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये. उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं.

रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था कि उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है, वे जहाँ भी गये, सर्वप्रथम ही रहे. हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था. वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी. हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा था - शिव!यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो.

उनका दर्शन नितांत व्यावहारिक था. यही कारण था कि उन्होंने कहा था कि मुझे बहुत से युवा संन्यासी चाहिये जो भारत के ग्रामों में फैलकर देशवासियों की सेवा में खप जायें. हिन्दू धर्म, दर्शन, आध्यात्म को मानने वाले विवेकानन्द पुरोहितवाद, धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के सख्त खिलाफ थे. इसी के चलते उन्होंने विद्रोही बयान इस देश के तैंतीस करोड़ भूखे, दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी देवताओं की तरह मन्दिरों में स्थापित कर दिया जाये और मन्दिरों से देवी देवताओं की मूर्तियों को हटा दिया जाये, भी दिया था. आज ऐसे विचार देना तो दूर, ऐसा सोच पाना खुद सरकार के लिए आसान नहीं है. देखा जाये तो यह स्वामी विवेकानन्द का अपने देश की धरोहर के लिये दम्भ या बड़बोलापन नहीं था वरन यह एक वेदान्ती साधु की भारतीय सभ्यता और संस्कृति की तटस्थ, वस्तुपरक और मूल्यगत आलोचना थी. 

आज उनके जन्मदिन पर उनको श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए उनके जीवन के अन्तिम दिन शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या करते समय उनके द्वारा उच्चारित कथन स्मरण हो आता है कि एक और विवेकानन्द चाहिये, यह समझने के लिये कि इस विवेकानन्द ने अब तक क्या किया है. यह कहीं से भी अतिश्योक्ति नहीं है क्योंकि उन्होंने धर्म को मनुष्य की सेवा के केन्द्र में रखकर ही आध्यात्मिक चिंतन किया था. उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ. अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये, में इसकी प्रतिध्वनि स्पष्ट रूप से सुनाई भी देती है.  

25 सितंबर 2018

कठिन डगर से एकात्म मानववाद तक का सफ़र


दीनदयाल उपाध्याय, जिनका आज जन्मदिवस है, एक प्रखर विचारक, उत्कृष्ट संगठनकर्ता तथा ऐसे नेता थे जिन्होंने जीवनपर्यंन्त व्यक्तिगत ईमानदारी और सत्यनिष्ठा को महत्त्व दिया. वे भारतीय जनता पार्टी के लिए वैचारिक मार्गदर्शन और नैतिक प्रेरणा के स्रोत हैं. उनकी पुस्तक एकात्म मानववाद (इंटीगरल ह्यूमेनिज्म) है, जिसमें साम्यवाद और पूंजीवाद की समालोचना की गई है.


उनका जन्म 25 सितंबर 1916 को मथुरा के गाँव नगला चंद्रभान में हुआ था. उनके पिता का नाम भगवती प्रसाद उपाध्याय तथा माता का नाम रामप्यारी था. रेलवे की नौकरी में व्यस्तता के कारण उनके पिता ने उनको और उनकी माता जी को ननिहाल भेज दिया. तीन वर्ष की उम्र में उनके पिता का देहांत हो गया. विपत्ति ने यहाँ ही पीछा न छोड़ा. सात वर्ष की उम्र में उनकी माँ का भी निधन हो गया. कुछ समय बाद बीमारी के कारण उनके भाई का भी देहान्त हो गया. अपने मामा के सहयोग से उनकी शिक्षा होती रही. सन 1937 में इण्टरमीडिएट की परीक्षा में उन्होंने सर्वाधिक अंक प्राप्त कर कीर्तिमान स्थापित किया. बिड़ला कॉलेज में इससे पूर्व किसी भी छात्र के इतने अंक नहीं आए थे. दीनदयाल जी को स्वर्ण पदक प्रदान करते हुए बिड़ला जी ने उन्हें छात्रवृत्ति प्रदान की. इसके बाद दीनदयाल जी बी०ए० करने के लिए कानपुर आ गए. यहाँ उनमें राष्ट्रसेवा का बीज अंकुरित हुआ. दीनदयाल जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रमों में रुचि लेने लगे. सन 1939 में प्रथम श्रेणी में बी०ए० उत्तीर्ण करने के बाद वे एम०ए० करने के लिए आगरा चले गये. यहाँ नानाजी देशमुख और भाऊ जुगाडे के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे. इसी बीच उनकी चचेरी बहन का बीमारी से निधन हो गया. इस घटना से वे बहुत उदास रहने लगे और एम०ए० की परीक्षा नहीं दे सके.

आगरा से वे लखनऊ आये और यहाँ से राष्ट्रधर्म प्रकाशन संस्थान की स्थापना की. यहीं से एक मासिक पत्रिका राष्ट्रधर्म सहित पांचजन्य (साप्ताहिक) तथा स्वदेश (दैनिक) का प्रकाशन शुरु किया. दीनदयाल जी ने 21 सितम्बर 1951 को उत्तर प्रदेश में एक राजनीतिक सम्मेलन आयोजित करके भारतीय जनसंघ की नींव डाली. सन 1968 में उन्हें अध्यक्ष बनाया गया. दीनदयाल उपाध्याय जी ने राजनीति के साथ-साथ विचारात्मक योगदान भी दिया. उन्होंने अनेक महत्त्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार रखे. जिनमें एकात्म मानववाद, लोकमान्य तिलक की राजनीति, जनसंघ का सिद्धांत और नीति, जीवन का ध्येय राष्ट्र जीवन की समस्यायें, राष्ट्रीय अनुभूति, कश्मीर, अखंड भारत, भारतीय राष्ट्रधारा का पुनः प्रवाह, भारतीय संविधान, इनको भी आज़ादी चाहिए, अमेरिकी अनाज, भारतीय अर्थनीति, विकास की एक दिशा, बेकारी समस्या और हल, टैक्स या लूट, विश्वासघात, द ट्रू प्लान्स, डिवैलुएशन ए, ग्रेटकाल आदि प्रमुख हैं. उनके लेखन का एकमात्र लक्ष्य भारत की विश्व पटल पर पुनर्प्रतिष्ठा और विश्व विजय स्थापित करना था. विलक्षण बुद्धि, सरल व्यक्तित्व एवं नेतृत्व के अनगिनत गुणों से संपन्न दीनदयाल उपाध्याय जी की मृत्यु मात्र 52 वर्ष की उम्र में 11 फ़रवरी 1968 को मुग़लसराय के पास रेलगाड़ी में यात्रा करते समय संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी. उनका पार्थिव शरीर मुग़लसराय स्टेशन के वार्ड में मिला था. 

भारतीय राजनीतिक क्षितिज के इस प्रकाशमान सूर्य को, जिसने सभ्यतामूलक राजनीतिक विचारधारा का प्रचार एवं प्रोत्साहन करते हुए अपना सर्वस्व राष्ट्र को समर्पित किया, उनके जन्मदिवस पर सादर नमन.

20 सितंबर 2018

युगदृष्टा श्रीराम शर्मा आचार्य


आज शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो श्रीराम शर्मा आचार्य नाम से अपरिचित हो. उन्हें देश के युगदृष्टा मनीषी के रूप में स्वीकार किया जाता है. उन्होने आधुनिक एवं प्राचीन विज्ञान तथा धर्म को समन्वित करके उसके द्वारा आध्यात्मिक नवचेतना को जगाने का कार्य किया. इसी उद्देश्य के लिए उनके द्वारा अखिल भारतीय गायत्री परिवार की स्थापना की गई. उनका सम्पूर्ण  व्यक्तित्व एक साधु पुरुष, आध्यात्म विज्ञानी, योगी, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, लेखक, सुधारक का समन्वित रूप कहा जा सकता है. आज इसी विभूति का जन्मदिन है. उनका जन्म 20 सितम्बर 1911 को उत्तर प्रदेश के आगरा के आँवलखेड़ा ग्राम में हुआ था. साधना के प्रति उनका झुकाव बचपन से ही दिखने लगा था. वे अपने सहपाठियों, छोटे बच्चों को सुसंस्कारिता अपनाने वाली विद्या का ज्ञान देने लगे थे. किशोरावस्था में ही समाज सुधार की रचनात्मक प्रवृत्तियाँ उनमें विकसित हो चुकी थीं. वे चाहते थे कि लोग स्वावलम्बी बनें, राष्ट्र के प्रति स्वाभिमान उसका जागे.


सन् 1926 में महामना मदनमोहन मालवीय जी से काशी में गायत्री मंत्र की दीक्षा लेने के बाद आराधना उनके जीवन का अंग बन गई. आध्यात्मिक रुचि होने के साथ-साथ उनमें राष्ट्रवाद की भावना भी चरम पर थी. सन 1927 से 1933 तक वे एक स्वयंसेवक, स्वतंत्रता सेनानी के रूप में सक्रिय रहे. अनेकानेक मित्रों के साथ भूमिगत हो कार्य करते रहे तथा समय आने पर जेल भी गये. वे जेल में भी निरक्षर साथियों को शिक्षण देकर व स्वयं अंग्रेजी सीखकर लौटै. उन्होंने मालवीय जी से एक मूलमंत्र सीखा कि जन-जन की साझेदारी बढ़ाने के लिए हर व्यक्ति के अंशदान से, मुट्ठी भर फण्ड से रचनात्मक प्रवृत्तियाँ संचालित की जा सकती हैं. इसी मन्त्र के सहारे उन्होंने गायत्री परिवार का आधार निर्मित किया. सन 1935 के बाद उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया. आगरा में सैनिक समाचार पत्र के कार्यवाहक संपादक के रूप में कार्य किया. बाद में सन 1938 की बसंत पंचमी को अखण्ड ज्योति पत्रिका का पहला अंक प्रकाशित किया. इसके बाद पुनः सारी तैयारी के साथ विधिवत सन 1940 की जनवरी से अखण्ड ज्योति पत्रिका का शुभारंभ किया गया. यह पत्रिका आज दस लाख से भी अधिक संख्या में विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित होती है तथा करोड़ों व्यक्तियों द्वारा पढ़ी जाती है. आचार्य जी द्वारा अनेक पुस्तकें लिखी गईं जो आध्यात्म, परिवार, धर्म, वेद, स्वास्थ्य आदि विषय पर ज्ञान देती हैं.

श्रीराम मत्त, गुरुदेव, वेदमूर्ति, युग ॠषि, गुरुजी आदि अन्य नामों से प्रसिद्ध आचार्य जी का देहांत 02 जून 1990 को हरिद्वार में हुआ. आज उनके जन्मदिन पर उनको सादर नमन.

17 अगस्त 2018

वो सवाल ही दोहरा देते खामोश जाते अटल जी


मौत से कई बार ठनी और हर बार मौत को सामने से वार करने की चुनौती देकर वापस लौटाते रहे. इस बार फिर मौत से ठनी. इस बार की ठना-ठनी कुछ गंभीरता से हो गई. अबकी न मौत वापस जाने को तैयार दिखी और न ही राजनीति के अजातशत्रु हारने को राजी हुए. भाजपा के ही नहीं वरन राजनीति के भीष्म पितामह रूप में स्वीकार अटल जी विगत लगभग एक दशक तक अटल बने रहे. महाभारतकालीन भीष्म पितामह की भांति अटल जी ने कोई प्रतिज्ञा तो नहीं ले रखी थी किन्तु भाजपा रुपी हस्तिनापुर को वे सुरक्षित देखना चाहते थे; भारत माता को सुरक्षित हाथों में देखना चाहते थे; संसद में किसी समय संख्याबल को लेकर हुए उपहास पर दिए गए जवाब को सार्थक देखना चाहते थे; अंधियारी रात में हवा-पानी के किनारे किये गए हुँकार कि कमल खिलेगा, अवश्य खिलेगा को साकार होते देखना चाहते थे; इसी कारण पिछले एक दशक से अधिक का समय वे नितांत एकांतवास की स्थिति में व्यतीत करने के बाद भी आमजनमानस के बीच पूरी तरह रचे-बसे रहे. मौत से ठना-ठनी होने के बाद भी मौत के साथ चलने को तब तक तैयार नहीं हुए जब तक कि वह सब नहीं देख लिया जो वे देखना चाहते थे. ऐसा लगा मानो भीष्म पितामह की भांति समय का इंतजार करने के बाद उन्होंने मौत को सीधे-सीधे हराने के बजाय उसे जिताकर हराने का विचार बनाया.


मौत से उनकी वर्षों पुरानी ठना-ठनी बंद हुई. वे मौत को जिताने का भ्रम पैदाकर खुद जीतकर अनंत यात्रा पर उसके साथ निकल गए. लगभग एक दशक तक सार्वजनिक जीवन से लगभग विलुप्त, दूर रहने के बाद भी जब वे तिरंगे का आँचल लपेट मौत के साथ कदम से कदम मिलाते हुए चले तो वे अकेले नहीं थे. उनका विशाल भाजपा परिवार उनके साथ था. उनकी भारतमाता की संतानें उनके साथ थीं. उनके सहृदय व्यवहार के कायल सभी धर्म, जातियाँ, वर्ग उनके साथ थे. उनकी राजनैतिक शुचिता के प्रशंसक अनेक राजनैतिक दल, व्यक्ति उनके साथ थे. अपनी कार्यप्रणाली और निर्भीक निर्णय क्षमता का वैश्विक स्तर पर लोहा मनवाने वाले देशों के लोग उनके साथ थे. सारा देश ही नहीं वरन समूचा विश्व उनके साथ चल रहा था. ये सब उनकी वो थाती है जो मौत के जीत जाने के बाद उसे हारा साबित कर रही थी. वे अब एक शरीर के रूप में नहीं, एक व्यक्ति के रूप में नहीं, एक कवि के रूप में नहीं, एक राजनेता के रूप में नहीं वरन एक-एक व्यक्ति के रूप में जीवित हो उठे थे; एक-एक नागरिक के रूप में जिन्दा दिख रहे थे; एक-एक साँस में जीवन निर्वहन करते दिख रहे थे; अपनी अंतिम यात्रा में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष शामिल एक-एक व्यक्ति में वे एक एहसास के सहारे जिंदा दिखे. यह देखकर मौत खुद हतप्रभ दिखी. जीतने के बाद भी हारी हुई लगी. उनके लम्बे एकांतवास को तोड़कर मौत जब उन्हें बाहर लेकर आई तो सोचा होगा कि वे खामोश ही रहेंगे. उनका बाहर आना हुआ तो उनकी कविताएँ बोलने लगीं, उनके संसद में दिए गए चुटीले अंदाज के कथन बोलने लगे, सार्वजनिक सभाओं में दिए गए उनके भाषण बोलने लगे, समरसता, मानवता, शांति के लिए किये गए उनके प्रयास बोलने लगे.


आज भी याद है उनका वो बोलना. हास-परिहास के उसी चिर-परिचित अंदाज में उनका बोलना. परिवार के बुजुर्ग की तरह से पढ़ाई के बारे में पूछना. ढाई दशक से अधिक समय पहले उनका पहली बार स्पर्श. उनके चरणों का स्पर्श. उनका प्यार से सिर पर हाथ फिराना. खुश रहो का आशीर्वाद देना. उस समय भी और आज भी अटल जी सम्मोहित व्यक्तित्व दिखे. ग्वालियर के शैक्षिक प्रवास के दौरान अनेकानेक गतिविधियों में सहभागिता बनी ही रहती थी. ऐसी ही एक सहभागिता के चलते पता चला कि अटल जी का एक कार्यक्रम है. हम हॉस्टल वालों को कुछ जिम्मेवारियों का निर्वहन करना है. कोई मंच की व्यवस्था में, को खानपान की व्यवस्था में, कोई जलपान की व्यवस्था में, कोई यातायात की व्यवस्था में, कोई अतिथियों के व्यवस्थित ढंग से आने-जाने की व्यवस्था में. सहज आकर्षित करने वाले, सम्मोहित करने वाले, मुस्कुराते चेहरे के साथ अटल जी मंचासीन हुए. सामान्य सा मंच, सामान्य सी व्यवस्था, गद्दे-मसनद के सहारे टिके, अधलेटे, बैठे मंचासीन अतिथि. अटल जी से मिलने का लोभ हम हॉस्टल के भाइयों में था. व्यवस्था हमारे ही हाथों थी सो कभी कोई किसी बहाने मंच पर जाता, तो कभी कोई किसी और बहाने से. आज की तरह कोई तामझाम नहीं, कोई अविश्वास नहीं, फालतू का पुलिसिया रोब नहीं. मंचासीन अतिथियों से मिलने का सबसे आसान तरीका था पानी के गिलास पहुँचाते रहना. तीन-चार बार की जल्दी-जल्दी पानी की आवाजाही देखने के बाद अटल जी ने मुस्कुराते हुए बस इतना ही कहा कि क्या पानी पिला-पिलाकर पेट भर दोगे? भोजन नहीं करवाओगे? अपने पसंदीदा व्यक्ति से बातचीत का अवसर, बहाना खोजते हम लोगों से पहला वार्तालाप इस तरह मजाकिया, सवालिया अंदाज में हो जायेगा, किसी ने सोचा न था. हम सब झेंपते हुए मंच से उतर आये मगर कार्यक्रम के बाद भोजन के दौर में खूब बातें हुईं. खुलकर बातें हुईं.  

काश कि वे आज भी वैसे ही बोल देते. काश कि आज उनको पानी पिलाने के बहाने उनके पास तक जाना हो पाता तो शायद वे वही सवाल दोहरा बैठते. काश कि वे आज चरण स्पर्श करने पर उसी तरह आशीर्वाद भरा हाथ सिर पर फिरा देते. अब तो बस काश ही काश है, याद ही याद है.  



16 अगस्त 2018

मौत से ठन गई : अटल जी - सादर नमन


पूर्व प्रधानमंत्री माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की कविता उन्हीं को श्रद्धांजलि स्वरूप समर्पित.... 
(24.12.1924 - 16.08.2018) 



ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।

04 जुलाई 2018

साइक्लॉनिक हिन्दू को समझना शेष है अभी


आज, 4 जुलाई, स्वामी विवेकानन्द की पुण्यतिथि. वे अपने ओजस्वी और सारगर्भित व्याख्यानों के लिए समूचे विश्व में प्रसिद्द हैं. उन्होंने अपने अल्प जीवन में जिस तरह का विराट स्वरूप प्राप्त कर लिया था, वैसा विरले ही कर पाते हैं. उनका आत्मविश्वास, उनकी संयमित जीवनशैली के कारण ही यह सब संभव हो सका था. यही कारण है कि उन्होंने अंतिम दिन भी अपनी दिनचर्या को बदला नहीं. उनके शिष्यों के अनुसार उन्होंने अन्तिम दिन (4 जुलाई 1902) को भी प्रात: ध्यान किया और ध्यानावस्था में ही अपने ब्रह्मरन्ध्र को भेदकर महासमाधि ले ली. बेलूर में गंगा तट पर चन्दन की चिता पर उनको मुखाग्नि दी गई. इसी गंगा तट के दूसरी ओर उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का भी अन्तिम संस्कार किया गया था. स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी सन् 1863 को कलकत्ता के एक कायस्थ परिवार में हुआ था. उनके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था. नरेंद्र पर अपने माता-पिता के धार्मिक, प्रगतिशील तथा तर्कसंगत व्यक्तित्व का प्रभाव रहा, जिसने उनकी सोच और व्यक्तित्व को आकार प्रदान किया.


वे 25 वर्ष की अवस्था में ही संन्यास धारण करके पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा पर निकल गए. सन 1893 में शिकागो (अमरीका) में हो रही विश्व धर्म परिषद् में वे भारत के प्रतिनिधि के रूप में पहुँचे. यूरोप-अमेरिका के लोग पराधीन भारतवासियों को हेय दृष्टि से देखते थे. उन लोगों ने प्रयास किया कि स्वामी विवेकानन्द को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का अवसर न मिले. बाद में एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें बहुत कम समय दिया गया और इसी अल्प समय का सदुपयोग करते हुए उन्होंने वहाँ उपस्थित सभी विद्वानों को चकित कर दिया. इसके बाद तो पूरा अमेरिका उनका जबरदस्त प्रशंसक बन गया और वहाँ उनके भक्तों का एक बड़ा समुदाय बन गया. उनकी वक्तृत्व-शैली तथा ज्ञान को देखते हुए वहाँ के मीडिया ने उन्हें साइक्लॉनिक हिन्दू का नाम दिया था. स्वामी विवेकानन्द का भारतीय दर्शन की शक्ति पर दृढ़ विश्वास था. उनका मानना था कि आध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जायेगा. स्वामी विवेकानन्द ने स्वयं को गरीबों का सेवक माना और देश के गौरव को देश-देशान्तरों में उज्ज्वल करने का सदा प्रयत्न किया.

महज 39 वर्ष के अल्प जीवनकाल में स्वामी विवेकानन्द जो काम कर गये वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे. उनके दर्शन, कार्यों, व्याख्यानों को देखते हुए गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था कि यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये. उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं. 

रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था कि उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है, वे जहाँ भी गये, सर्वप्रथम ही रहे. हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था. वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी. हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा था - शिव!यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो.

उनका दर्शन नितांत व्यावहारिक था. यही कारण था कि उन्होंने कहा था कि मुझे बहुत से युवा संन्यासी चाहिये जो भारत के ग्रामों में फैलकर देशवासियों की सेवा में खप जायें. हिन्दू धर्म, दर्शन, आध्यात्म को मानने वाले विवेकानन्द पुरोहितवाद, धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के सख्त खिलाफ थे. इसी के चलते उन्होंने विद्रोही बयान कि इस देश के तैंतीस करोड़ भूखे, दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी देवताओं की तरह मन्दिरों में स्थापित कर दिया जाये और मन्दिरों से देवी देवताओं की मूर्तियों को हटा दिया जाये, भी दिया था. आज ऐसे विचार देना तो दूर, ऐसा सोच पाना खुद सरकार के लिए आसान नहीं है. देखा जाये तो यह स्वामी विवेकानन्द का अपने देश की धरोहर के लिये दम्भ या बड़बोलापन नहीं था वरन यह एक वेदान्ती साधु की भारतीय सभ्यता और संस्कृति की तटस्थ, वस्तुपरक और मूल्यगत आलोचना थी.


आज उनकी पुण्यतिथि पर उनको श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए उनके जीवन के अन्तिम दिन शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या करते समय उनके द्वारा उच्चारित कथन स्मरण हो आता है कि एक और विवेकानन्द चाहिये, यह समझने के लिये कि इस विवेकानन्द ने अब तक क्या किया है. यह कहीं से भी अतिश्योक्ति नहीं है क्योंकि उन्होंने धर्म को मनुष्य की सेवा के केन्द्र में रखकर ही आध्यात्मिक चिंतन किया था. उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ. अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये, में इसकी प्रतिध्वनि स्पष्ट रूप से सुनाई भी देती है.

04 मई 2018

उपेक्षा का शिकार हैं बुन्देलखण्ड केसरी


बुन्देलखण्ड सदैव ही अपनी आन-बान-शान के लिए प्रसिद्ध रहा है। यहाँ के प्रतापी राजा अपने कार्य, साहस के कारण आज भी अमर-अजर हैं। ऐसे वीर प्रतापी राजाओं में एक महाराजा छत्रसाल का नाम अग्रगण्य है। उन्होंने अपनी वीरता, पराक्रम और रणनीतिक कौशल से बुन्देलखण्ड को वैभवशाली राज्य के रूप में स्थापित किया था। बुन्देलखण्ड केसरी के रूप में प्रसिद्ध महाराजा छत्रसाल के राज्य का सीमांकन निम्न रूप में वर्णित है-
इत यमुना, उन नर्मदा, इत चंबल, उत टोंस,
छत्रसाल सौं लरन की, रही न काहू हौंस।

राजकीय संग्रहालय, धुबेला में स्थित महाराजा छत्रसाल की प्रतिमा 

छत्रसाल का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल 3 संवत् 1707 (4 मई 1649 ई०) को विंध्याचल पर्वत श्रेणियों के मध्य बने जंगलों में हुआ था। उनके पिता राजा चम्पतराय को विश्वासघातियों के कारण अपना राज्य गँवा जंगलों में जाना पड़ा। इन्हीं जंगलों, प्राकृतिक वातावरण, रणभूमि में छत्रसाल का पालन-पोषण हुआ, जिससे उनमें किसी भी स्थिति से निपटने की नैसर्गिक क्षमता का विकास स्फूर्त रूप से हुआ। बुन्देलखण्ड राज्य की स्वतन्त्रता के लिए मुगलों से संघर्ष करने वाले उनके पिता तथा उनकी माता रानी लालकुँअरि ने विश्वासघातियों के कारण आत्माहुति दे दी। ऐसे विपरीत हालातों में भी छत्रसाल ने हार न मानते हुए कालान्तर में सूझबूझ का परिचय देते हुए राष्ट्रीयता के दैदीप्यमान नक्षत्र छत्रपति शिवाजी से सन् 1668 ई० में भेंट की। छत्रपति शिवाजी उनकी वीरता, आत्मविश्वास के साथ-साथ राष्ट्रचेतना, स्वतन्त्रता के प्रति उनकी क्रियाशीलता, दूरगामी नीतियों से प्रभावित हुए। छत्रसाल को स्वतन्त्र राज्य स्थापना हेतु प्रेरित करते हुए छत्रपति शिवाजी ने समर्थगुरु रामदास के आशीष वचन सहित भवानी तलवार भेंट की-
करो देस के राज छतारे। हम तुम तें कबहूँ नहीं न्यारे।।
दौर देस मुगलन को मारो। दपटि दिली के दल संहारो।।
तुम हो महावीर मरदाने। करिहो भूमि भोग हम जाने।।
जो इतही तुमको हम राखे। तो सब सुयश हमारे भाषे।।

वीर छत्रसाल स्वराज्य का मंत्र लेकर वापस आकर और अपने साथियों की मदद से 22 वर्ष की उम्र में मात्र 5 घुड़सवारों तथा 25 पैदलों की छोटी सी सेना तैयार की। इतनी छोटी उम्र में सेना का गठन, सैनिकों का चयन वीर छत्रसाल की कार्यक्षमता, बौद्धिक प्रतिभा को दर्शाता है। सेना बनाने के बाद सबसे पहला आक्रमण उन्होंने अपने माता-पिता के विश्वासघाती सेहरा के धंधेरों पर किया। पहले आक्रमण में प्राप्त विजय से जहाँ छत्रसाल और उनके साथियों का मनोबल ऊँचा हुआ वहीं क्षेत्रवासियों में भी उनके प्रति विश्वास बढ़ा। अपनी विजय यात्रा को बढ़ाते हुए छत्रसाल बुन्देलखण्ड राज्य की स्वतन्त्रता और उसके विस्तार हेतु लगातार प्रयासरत रहे। उन्होंने पूर्व में चित्रकूट और पन्ना का क्षेत्र, पश्चिम में ग्वालियर, उत्तर में कालपी से लेकर दक्षिण में सागर, गढ़कोटा और दमोह तक अपने राज्य का विस्तार किया। उनके रणविजय की पताका मालवा, बघेलखण्ड, राजस्थान, पंजाब तक पहराने लगी थी, जिसके चलते यमुना, चम्बल, नर्मदा, टोंस आदि नदियों में बुन्देल राज्य स्थापित हो गया था।
जैतपुर में हुए अंतिम युद्ध में महाराजा छत्रसाल पराजित होने की स्थिति में आने लगे। ऐसी विषम परिस्थिति में उन्होंने बाजीरव पेशवा को अपने पुराने सम्बन्धों का परिचय देते हुए एक काव्यात्मक पत्र लिखा, जिसकी चन्द पंक्तियाँ पूरे पत्र का सार प्रस्तुत कर देती हैं-
जो गति गज और ग्राह की, सो गति भई है आज।
बाजी जात बुन्देल की, राखौ बाजी लाज।।

इस पत्र के मिलते ही बाजीराव पेशवा की सेना ने मुहम्मद बंगश पर आक्रमण कर पराजित कर दिया। इस युद्ध में महाराजा छत्रसाल पराजित हो सकते थे किन्तु मराठों के साथ अपने प्रगाढ़ रिश्तों के चलते अपना और बुन्देलखण्ड राज्य का सम्मान बचाए रखा। इसके बाद उन्होंने अपने राज्य का बंटवारा अपने दोनों पुत्रों और बाजीराव में कर दिया। बाजीराव से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मस्तानी, जिसे वे अपनी पुत्री मानते थे, के साथ उनका विवाह करवा दिया। बुन्देलखण्ड राज्य का विस्तार चहुँ ओर करने वाले प्रतापी महाराजा छत्रसाल ने पौष शुक्ल तृतीया संवत् 1788 (19 दिसम्बर 1731 ई०) को अपने बसाये नगर छतरपुर में नौगाँव के निकट अंतिम साँस लेकर जगमगाते नक्षत्रों में शामिल हो गये। बाजीराव पेशवा ने उनके सम्मान में समाधि-स्थल का निर्माण छतरपुर जिले में धुबेला ग्राम में धुबेला ताल के पास करवाया।

महाराजा छत्रसाल समाधि स्थल 

आजीवन बुन्देलखण्ड की स्वतन्त्रता, उसके स्वाभिमान के लिए संघर्ष करने वाले महाराजा छत्रसाल की अंतिम निशानी वर्तमान में उपेक्षा का शिकार है। धुबेला में उनके नाम से राजकीय  संग्रहालय का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया था। इसी राजकीय संग्रहालय के पार्श्व में महाराजा छत्रसाल की पहली रानी कमलापति की स्मृति में बना समाधि स्थल है। यहाँ से लगभग एक सौ मीटर की दूरी पर महाराजा छत्रसाल की समाधि स्थित है। महाराजा छत्रसाल के नाम से संचालित राजकीय संग्रहालय में उनसे सम्बन्धित विक्रमी सम्वत 1759 (सन् 1702 ई०) का ताम्रपत्र है, जिसमें उनकी उपलब्धियों, दान देने की सनद, ताम्रपत्र लिखने की तिथि एवं स्थान आदि का उल्लेख मिलता है। महाराजा छत्रसाल को चित्रांकित करती एक पेंटिंग तथा संग्रहालय के प्रांगण में आदमकद प्रतिमा भी देखने को मिलती है।


बुन्देलखण्ड के नाम को अपने नाम से पहचान देने वाले महाराजा छत्रसाल की शासन अथवा प्रशासन स्तर से उपेक्षा की जा रही है। उनके समाधि स्थल के आसपास का स्थान कच्चा, मिट्टीदार होने के कारण बहुत बड़ी संख्या में जगली पेड़-पौधों, खरपतवारों, कंटीली झाडि़यों आदि ने उस इमारत को घेर रखा है। उसके अंदर की दीवारें जर्जर, जीर्ण-शीर्ण स्थिति में हैं। वहाँ आने वालों द्वारा एवं स्थानीय लोगों द्वारा पान खाकर थूकने का, दीवारों पर खरोंचने का काम किया जा रहा है। आसपास के क्षेत्रवासियों द्वारा, युवाओं द्वारा इन गौरवशाली प्रतीकों को मौजमस्ती का अड्डा बना लिया गया है। इनके आसपास बड़ी संख्या में सिगरेट, गुटखा, तम्बाकू, शराब आदि सेवन करने के अवशेष देखने को मिलते हैं। देखा जाये तो सरकारी स्तर पर इन ऐतिहासिक स्थलों की देखरेख करने की, अराजक तत्वों से इनको बचाये रखने की, इनके जीर्णोद्धार आदि की कोई समुचित व्यवस्था नहीं की गई है। इसी कारण से इन ऐतिहासिक स्मारकों पर, धुबेला ताल पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। यह अपने आपमें शर्म का विषय है कि जहाँ एक व्यक्ति ने अपना सर्वस्य बुन्देलखण्ड की आन-बान-शान के लिए न्यौछावर कर दिया वहीं स्वयं बुन्देलखण्डवासी ही उसके प्रतीकों की, उसकी धरोहर की उपेक्षा करने में लगे हुए हैं।

12 जनवरी 2018

फिर याद आया विवेकानन्द मेमोरियल रॉक


पहले दिन समुद्र तट से विवेकानन्द रॉक के दर्शन करने के बाद उसको एकदम करीब से देखने की चाहत और बढ़ गई थी. सूर्यास्त का अद्भुत दृश्य देखने के बाद सूर्योदय देखने की उत्कंठा बढ़ गई. बहरहाल दो दिन की यात्रापहले दिन का समुद्र तट का जबरदस्त भ्रमण तन-मन को बाहरी रूप में भले ही न थका सका हो मगर अंदरूनी रूप से ये दोनों आराम चाह रहे थे. ये तो नहीं कहेंगे कि पलंग पर हमारे बिछते ही नींद ने हमें घेर लिया क्योंकि तन-मन भले शांति चाह रहे थे मगर दिमाग अगले दिन की तैयारियों में भागदौड़ करने में लगा हुआ था. सुबह उठना हैसूर्योदय देखना हैफिर रॉक जाना हैबहुत-बहुत सी फोटो निकालना हैकैमरे की बैटरी को फुल्ली चार्ज रखना हैपैर में दिक्कत न हो इसका बंदोवस्त करना है आदि-आदि सोचा-विचारी में दिमाग लगा रहा. दिमाग को शांत न होता देखकर तन-मन ने उसको अकेला छोड़ दिया और नींद की गोद में जा छिपे. 

भोर में उठाने के लिए मोबाइल से ज्यादा दिमाग सक्रिय था. इससे पहले कि मोबाइल घनघनातादिमाग ने अपनी बत्ती जला दी. आश्चर्य कि हम तो उठे ही बिटिया रानी हमसे ज्यादा चैतन्य रूप में बैठी हुई थी. स्कूल जाने की आनाकानी यहाँ नहीं दिख रही थी. फटाफट हम सब तैयार होकर विवेकानन्द केंद्र परिसर के आखिरी छोर पर चल दिए. पक्की सड़क के दोनों तरफ हरे-भरे पेड़इधर-उधर नाचते मोर मन को मोह रहे थे. कई-कई सहयात्रियों के साथ चलते-चलते हम लोग भी सूर्योदय स्थल पर पहुँचे. कैमरामोबाइल कैमरासेल्फी स्टिक सब अपने-अपने काम को अंजाम देने के लिए तैयार थे. ओह गज़ब! मुँह खुला का खुला रह गया. कल दोपहर से शाम तक देखे गए समुद्र से एकदम अलग रूप दिख रहा था समुद्र का. बाँयी तरफ से सूर्य निकलने का संकेत मिल रहा था और दाँयी तरफ विवेकानन्द रॉक मेमोरियल पूरी गरिमा-भव्यता से खड़ा हुआ था. सामने से दूधिया लहरें काली रेत पर बिखर-बिखर जा रही थी. धीरे-धीरे सूर्योदय होने लगा. रजत रश्मियाँ बिखर-बिखर कर समूचे समुद्र को रजतमय बनाने लगीं. 


विवेकानन्द केंद्र से रॉक मेमोरियल
हम सब सम्मोहित से किंकर्तव्यविमूढ़ वाली स्थिति में खड़े हुए थे. बिटिया रानी रेत पर कभी नाम लिखतीकभी घरौंदे बनाती. लहरें आ-आकर इन सबको अपने साथ ले जाती. बिटिया रानी उछल-उछल कर लहरों के साथ अपना तारतम्य जोड़ती दिखती. हम भी मंत्रमुग्ध से कैमरे में सबकुछ कैद कर लेना चाहते थे. सो दाँए-बाँएइधर-उधर होकरसारी स्थितियों में समूचे दृश्यों को पकड़ते जा रहे थे. (यहाँ के आनंद के बारे में आगे फिर कभी) यद्यपि समुद्री लहरेंबहुत-बहुत दूर दिखती छोटी-छोटी नौकाएँजमीन से आसमान की राह पर चढ़ता सूरज का सौन्दर्य हम सबको रोकने की भरपूर कोशिश कर रहा था मगर विवेकानन्द रॉक मेमोरियल देखने की अभिलाषा के चलते इन सारे दृश्यों से विदा ली. 


रेत पर बिटिया की कलाकारी


रेत पर बिटिया की कलाकारी
जल्दी-जल्दी समूचे काम निपटाकर विवेकानन्द रॉक मेमोरियल के द्वार पहुँच गए. बड़े से जालीदार फाटक को पार करके अन्दर परिसर में प्रवेश किया. कोई छुट्टी नहीं थी फिर भी लगभग 100 लोगों की भीड़ लाइन में लगी दिख रही थी. चैतन्य सेवाव्रतियों (सेवाभाव से विवेकानन्द केंद्र में अपनी सेवाएं देने वाले व्यक्ति)स्वयंसेवकोंवर्दीधारी सहज व्यक्तियों ने मुस्कुराकर स्वागत किया. हमारी शारीरिक स्थिति को देखकर लाइन में लगने की बाध्यता को हमारे ऊपर लागू न करते हुए उस स्थान पर पहुँचने का संकेत किया जहाँ से फैरी पर चढ़ने का इंतजार किया जाता है. हमारी धर्मपत्नी निशा और उनके साथ बितिया रानी भी टिकट लेने के लिए लाइन में लग गई. हम और मित्र सुभाष सुरक्षाकर्मी द्वारा बताये गए स्थान की तरफ चल दिए. जिस बरामदे में लगभग 200 से अधिक लोग बैठे हुए अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे. हम लोगों ने परिसर में बड़े से पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर बैठकर लोगों को पढ़ने काआसपास की स्थितियों को जानने-परखने का शौक अंजाम देना शुरू किया. दिमागी और जुबानी क्रियाविधि के साथ-साथ उंगलियाँ कैमरे पर थिरकती रहीं और आसपास के दृश्यों को कैद करती रहीं. 

सामान्य टिकट के साथ-साथ विशेष टिकट की भी वहाँ व्यवस्था थी. जिसमें निर्धारित से कहीं अधिक मूल्य चुकाकर लाइन में लगने से बचा जा सकता था. हालाँकि बहुतायत में ऐसे लोग ही थे जो सामान्य टिकट ले रहे थे. विशेष टिकट लेने वालों में विदेशी सैलानीकुछ अधिकारी जैसे लोग समझ आये. उस बड़े से जालीदार फाटक से अन्दर प्रवेश करने वाले सभी लोगों को उसी पंक्ति में लगना पड़ता. विशेष टिकट लेने के इच्छुक सीधे परिसर में आ पाते थे. इस बीच देखा कि एक स्वयंसेवक लगातार भागदौड़ करने में लगा था. दो-तीन सुरक्षाकर्मियों से मिलकर उसने हर बार हमारी तरफ इशारा किया. कुछ संशय सा लगा तो उसके पास जाकर पूछा कि कोई समस्या है क्याउसने बताया कि ऐसा कुछ नहींबस उन सभी सुरक्षाकर्मियों को ये बताना था कि आप लोगों को अन्दर जाने दें. हम लोगों को समझ आया कि वो अपनी जिम्मेवारी को पूरी तरफ से सम्पादित करने में लगा हुआ है. उधर टिकट की लाइन पीछे से बढ़ती जा रही थी और आगे से घटती जा रही थी. इसी बीच एक सुरक्षाकर्मी सेजो उसी इंतजार करने वाले हॉल की व्यवस्था में संलग्न थाबातचीत से ज्ञात हुआ कि वो सेना से सेवानिवृत व्यक्ति है. झाँसी में सेवारत रहने के कारण उसे भी हम लोगों से विशेष लगाव महसूस हुआ. काफी देर तक बातचीत के बाद आखिरकार हम लोगों की बारी आ गई. 


आत्मीय सुरक्षाकर्मी के साथ सुभाष और हम
आवश्यक सुरक्षा जाँच के बादटिकट जाँच के बाद हम लोग तट पर खड़ी फैरी की तरफ बढ़ चले. इससे पहले एक विशेष बात जो वहाँ की व्यवस्था के बारे में पता की वो बड़ी मजेदार लगी. जो व्यक्ति हमारे लिए बड़ी मुस्तैदी से भागदौड़ कर रहा थाउसी से पूछा कि आखिर आप लोग सभी को टिकट लेने की लाइन में क्यों लगा रहे हैंक्या सभी को अपना-अपना टिकट लेना पड़ता हैतब उसने बताया कि ऐसा कुछ नहीं है. एक व्यक्ति कितने भी टिकट ले सकता है मगर परिसर के अन्दर भीड़ न फैलेइधर-उधर किसी और काम में न लग जाये इसलिए ऐसा नियम बना दिया है कि सभी को टिकट लेने वाली लाइन में लग्न पड़ेगा. समझ आया कि वाकई एक-एक व्यक्ति का टिकट लेना और उसके साथ आये कई-कई लोगों का परिसर में नाहक टहलना इन स्वयंसेवकों के लिएसुरक्षाकर्मियों के लिए सिरदर्दी तो हो ही सकता था. अब ऐसे में उन सबका ध्यान सिर्फ लाइन पर ही था.  


चल पड़े फैरी में बैठ
किनारे खड़ी फैरी ने हम सबको आदर सहित अपने अन्दर स्थान दिया. एकबार में 150 लोगों को लेकर फैरी हिलते-डुलते विवेकानन्द रॉक मेमोरियल की तरफ चल पड़ी. चन्द मिनट में फैरी जब रॉक किनारे लगी तो विशालकाय इमारत सामने खड़ी हाथ फैलाये हमारा इंतजार कर रही थी. सबसे ऊपर फहराता भगवा ध्वज पूरी गरिमा से विवेकानन्द रॉक मेमोरियल को भव्यता प्रदान कर रहा था. सन 1970 में नीलेलालकालेहरे रंग के ग्रेनाइट पत्थरों से बना मेमोरियलजिसका गुंबद 70 फुट ऊंचा हैसमुद्रतल से लगभग 20 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है. पता चला कि यह स्थान 6 एकड़ के क्षेत्र में फैला है. यह विवेकानन्द जी के 24, 25 और 26 दिसम्बर 1892 को श्रीपद पराई आने तथा गहरे ध्यान-आध्यात्मिक ज्ञान का स्मारक है. 


शान से लहराता भगवा ध्वज
चट्टान पर बने निश्चित रास्ते पर चलते समय चारों तरफ समुद्र की विशालता अद्भुत लग रही थी. हमारे बाँयी तरफ वे लोग कतारबद्ध रूप से खड़े थे जो रॉक से वापस जा रहे थे. हम लोग प्रसन्नताउत्साहउमंग में बढ़ते हुए आगे चले जा रहे थे. सामने से आती बहुत तेज हवा जैसे पीछे गिराने के मूड में हो और हम लोग उसी दृढ़ता के साथ आगे बढ़ने के मूड में. रॉक पर चढ़ने के क्रम में बाँयी तरफ वापस जाने वालों की कतार तथा दाँयी तरफ इमारतेंमेमोरियल का प्रशासनिक भवनटिकट वितरण केंद्र बना हुआ था. सामान्य से शुल्क वाले टिकट को लेकर हम लोग आगे बढ़तेवहाँ व्यवस्था देख रहे एक सेवाव्रती श्री राजकुमार जी को अपने आने की सूचना दी. उनसे विवेकानन्द केंद्र पर ही मुलाकात हुई थी और वे बड़े ही प्रभावित हुए थे. 


टिकट वितरण केंद्र
उनसे चन्द मिनट की औपचारिक मुलाकात के बाद आगे बढ़े तो देखा कि मेमोरियल के दर्शन के लिए बनी सीढ़ियों के सहारे ऊपर जाना होगा. इन सीढ़ियों पर चढ़ने से पहले जूते-चप्पल वहाँ बने नियत स्थान पर जमा करने थे. ऊपर बिना जूते-चप्पल के ही जाने की अनुमति थी. ये स्थिति व्यक्तिगत रूप से हमारे लिए सहज नहीं थी. उस लड़के सेवहाँ तैनात सुरक्षाकर्मी से जूते न उतार पाने की अपनी समस्या बताई तो उसने इसे आवश्यक बताया. भाषाई दिक्कत का सामना यहाँ करना ही पड़ रहा था. किसी तरह उसको अपने परेशानी बताई तो उसने जूतों की तरफ इशारा करते हुए कहानो लेदरहमने उसको बताया कि जूते लेदर के नहीं हैं तो उसने मुस्कुराते हुए इशारों में समझाया कि जूतों पर कपड़ा लपेट लीजिये. अब जूते-चप्पलें एकत्र करता बालक और वो सुरक्षाकर्मी कपड़ा खोजने में लग गए. अंततः एक कपड़ा मिल ही गया और उसे दो हिस्सों में बाँटकर जूतों पर चढ़ा सीढ़ियों की तरफ बढ़ चले. उन लोगों की सहायतासहजता को देखकर मन प्रफुल्लित हो उठा. 


प्रशासनिक भवन


समुद्र तट से विवेकानन्द रॉक मेमोरियल
ऊपर उस स्थान पर पहुँचने परजहाँ कि एक तरफ श्रीपद मंडपम और विवेकानन्द मंडपम बना हुआ हैखुद को चारों तरफ से समुद्र से घिरा हुआ पाया. बहुत तीव्रगति से चलती हवा एक जगह स्थिर नहीं रहने दे रही थी. समुद्र की लहरें पूरी ताकत से आकर शिला से टकराती और बिखर जाती. चारों तरफ से उठता समुद्र का शोर उसकी विशालता के साथ-साथ उसकी भयावहता का परिचय करवा रहा था. ये सोचकर ही समूचे बदन में सिरहन दौड़ गई कि लगभग सवा सौ वर्ष पहले नितांत निर्जन में निपट अकेले ही स्वामी विवेकानन्द ने इसी भयंकर शोर को जीता था. आसमान पर सूर्य पूरे तेज के साथ चमक रहा थाहवा पूरे जोश से बह रही थीसमुद्र चारों तरफ तो नहीं मगर तीन तरफ से अपनी लहरों के द्वारा टकराने में लगा था मगर ये सब भयावहता के बजाय अद्भुत पावनता का एहसास करा रहे थे. 


श्रीपद मंडपम
विचारों का प्रभाव किस तरह समूचे वातावरण को परिवर्तित कर देता हैइसे यहाँ आकर महसूस किया जा सकता है. सैकड़ों लोगों की भीड़तीन-तीन सागरों का गर्जनलहरों और हवा का रौद्र रूप का समाहित स्वरूप भी स्वर्गिक शांति का आभास करा रहे थे. अब हम ठीक उस स्थान पर खड़े हुए थे जहाँ सामने समुद्रपीछे समुद्र दाँए हाथ श्रीपद मण्डपम और बाँए हाथ विवेकानन्द मंडपम बना हुआ है. श्रीपद मण्डपम श्रीपद पराई पर स्थित है जिसे पवित्र स्थल माना जाता है. कहा जाता है कि यहीं देवी कन्याकुमारी (देवी पार्वती का रूप) ने अपना पहला कदम रखा था. यहाँ बने मंडपम में एक शिला पर प्रथम पाद के रूप में चरण का चिन्ह आज भी बना हुआ है. 


विवेकानन्द मंडपम प्रवेश द्वार
विवेकानन्द मंडपम में प्रवेश के लिए सीढियाँ चढ़कर पहुँचना होता है. इस भवन में प्रवेश करते ही मुख्य द्वार के ठीक सामने स्वामी विवेकानन्द की प्रभावशाली प्रतिमा के दर्शन होते हैं. लगभग चार फुट ऊंचे आधारतल पर कांसे की बनी इस मूर्ति की ऊंचाई साढ़े आठ फुट है. यह इतनी प्रभावशाली है कि इसमें स्वामी जी का व्यक्तित्व एकदम सजीव प्रतीत होता है. किसी तरह से आदेशित हुए बिना लोग गहन शांति में उस प्रभावशाली व्यक्तित्व के दर्शन कर कृतार्थ महसूस करते दिखे. प्रवेश द्वार के ठीक अगल-बगल स्वामी विवेकानन्द के गुरु रामकृष्ण परमहंस और गुरुमाता के चित्र स्थापित है. ऐसा प्रतीत होता है जैसे विवेकानन्द उन दोनों को निहार रहे हैं और वे दोनों वात्सल्यभाव से उनको आशीष दे रहे हैं. ऐसा माना जाता है कि विवेकानन्द जी तैरकर इस शिलाखंड पर आये और इसी स्थान पर तीन दिनतीन रात गहरी ध्यान साधना में लीन रहकर खुद को देश सेवा के प्रति समर्पित करने तथा वेन्दान्त दर्शन को समूचे विश्व में प्रसारित करने को तैयार किया. इस भवन में ही मूर्ति के पार्श्व में बने द्वार से नीचे उतर कर ध्यान मंडपम में पहुँचा जा सकता है. ध्यान मंडपम में जाकर ध्यान करने की कोई अनिवार्यता नहीं है. यह स्वेच्छा पर आधारित है. छोटे से अत्यधिक कम रौशनी से ढंके हॉल में द्वार से प्रवेश करते ही सामने दीवार पर चमकता ॐ दिखाई देता है. इसके साथ-साथ अत्यधिक धीमे स्वर में इसका उच्चारण वहाँ आध्यात्मिक उपस्थिति का एहसास करवाता है. हम चारों लोगों ने भी चमकते ॐ के सामने कुछ देर ध्यान की मुद्रा में बैठकर मानसिक शांति का अनुभव किया. 


विवेकानन्द मंडपम भवन  
कुछ देर बाद बाहर आकर शांत भाव से चारों तरफ घूम-टहलकर समुद्र के भयावह सौन्दर्य को निहारते रहे. यदि वहाँ से नियत समय पर वापसी का कोई नियम न होता तो संभवतः रात को वहीं रुककर उस भयावह कोलाहल का एहसास किया जाताजिसे विराट व्यक्तित्व के स्वामी ने अपने में समाहित कर लिया था. मन ही मन विवेकानन्द जी को नमन करते हुए वापस फैरी की राह चल दिए. फैरी समुद्र की लहरों पर मंथर गति से दौड़ने लगी. रॉक मेमोरियल पीछे छूटने लगा. हृदय में फिर एक बार उसे छूने कीदर्शन करने की उत्कंठा जन्मने लगी. 
समुद्र तट से विवेकानन्द रॉक मेमोरियल और तमिल कवि की प्रतिमा

तमिल कवि तिरुवल्लुवर
जहाँ से फैरी पर बैठे थे वहाँ वापस उतरकर भी बाहर जाने का मन नहीं हुआ. बहुत देर तक वहीं किनारे बैठे-बैठे रॉक को निहारते रहे. इसी रॉक के बगल में प्रसिद्द तमिल कवि तिरुवल्लुवर की 133 फुट ऊँची विशालकाय प्रतिमा स्थापित है. अरब सागरबंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर के संगम पर स्थापित इस मूर्ति की ऊँचाई तमिल मुक्तक काव्य तिरुक्कुरल के 133 अध्यायों या अथियाकरम का प्रतिनिधित्व करती है. इसी तरह उनकी तीन उंगलियाँ अरमपोरूल और इनबम नामक तीन विषयों अर्थात नैतिकताधन और प्रेम के अर्थ को इंगित करती हैं.  अंततः वहाँ परिसर से बाहर आकर थोड़ी दी पेटपूजा करने के बाद समुद्रतट पर किनारे आकर फिर बैठ गए. जहाँ से दाँयी तरफ सूर्यास्त का और बाँयी तरफ विवेकानन्द रॉक मेमोरियल का दर्शन किया जा सकता था. सब कुछ अपने हृदय में भर लेने के लिए एकटक देखकर अपनी आँखें बंद कर लीं.