योगी आदित्यनाथ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
योगी आदित्यनाथ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

19 मई 2026

श्रम की महत्ता समझाएगा श्रमदान

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा विद्यालयों में बच्चों से श्रमदान करवाने वाले शिक्षकों को सम्मानित करने का विचार रखना एक प्रशासनिक औपचारिकता भर अथवा कोई तात्कालिक सुर्खी का विषय नहीं है. व्यावहारिक रूप में देखा जाये तो उनका वक्तव्य हमारी समकालीन शिक्षा व्यवस्था को पुनर्परिभाषित करने के प्रति एक विमर्श का सूचक है. अंकों की मारामारी के अंधे दौर में हमारी शिक्षा प्रणाली और अभिभावक सूचनाओं के संकलन, तकनीकी के नियंत्रण और अंकों की अबूझ प्रतिस्पर्धा में उलझकर रह गए हैं. इस व्यवस्था ने विद्यालयों से पारम्परिक और बुनियादी अवधारणाओं को लगभग समाप्त सा कर दिया है. श्रमदान भी इसी तरह की व्यावहारिक व्यवस्थाओं से बाहर कर दी गई है. हमें सोचना चाहिए कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य क्या है? क्या उसके द्वारा किसी इंसान को कामगार के रूप में तैयार करना है या फिर एक संवेदनशील, सामाजिक नागरिक का निर्माण करना है?

 


आधुनिक दौर की कॉरपोरेट संस्कृति ने बच्चों के मस्तिष्क
को भले ही तीक्ष्ण किया हो लेकिन उनके ह्रदय को श्रम, सामाजिकता, समन्वय से दूर ही किया है. अब न केवल बच्चों में बल्कि अभिभावकों में शिक्षा के प्रति, शिक्षण संस्थानों के प्रति आत्मीयता का, परिवारिकता का नहीं बल्कि व्यापारिकता का भाव होता है. बच्चों को अब शिक्षण संस्थानों में शिक्षा ग्रहण करने से अधिक पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए, अधिकाधिक अंक लाने के लिए भेजा जाने लगा है. अब किसी बच्चे द्वारा अपनी कक्षा की मेज साफ करना, विद्यालय प्रांगण में साफ़-सफाई करना अथवा पेड़-पौधों में, क्यारियों में पानी देना उसके आन्तरिक गुणों के विकसित होने के क्रम में नहीं बल्कि शारीरिक शोषण किये जाने के रूप में देखा जाता है. वास्तविकता तो यह है कि इस तरह के छोटे-छोटे कार्यों के द्वारा वह किसी शोषण का, बाल-श्रम का शिकार नहीं हो रहा होता है बल्कि वह अपने आसपास के भौतिक परिवेश के साथ एक आत्मीय सम्बन्ध स्थापित कर रहा होता है. इस तरह की गतिविधियाँ बच्चों के भीतर पनपने वाले अभिजात्य अहंकार, वर्ग-विभेद आदि को तोड़ती हैं. ऐसे कार्यों के द्वारा बच्चों को सिखाया जाता है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता और यही सीख उनके भीतर समन्वय का, सामंजस्य का निर्माण करती है.

 

समकालीन दौर में बाल विकास के सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में शारीरिक निष्क्रियता, मानसिक अवसाद, एकाकीपन आदि प्रमुख हैं. आज बच्चे मोबाइल के जाल में उलझकर प्रकृति से, शारीरिक श्रम से लगभग दूर हो चुके हैं. ऐसे में विद्यालयों में श्रमदान केवल किसी कार्य तक सीमित न समझा जाये बल्कि इसे एक तरह की शारीरिक और मानसिक चिकित्सा माना जाना चाहिए. सामूहिक रूप से किया जाने वाला शारीरिक श्रम बच्चों में सकारात्मकता बढ़ाता है, उनके मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करता है. श्रमदान को बालश्रम से जोड़कर देखना उचित नहीं क्योंकि यह एक सामूहिक विधा है जो अलग-अलग पृष्ठभूमि, जातियों, आर्थिक स्तरों से आने वाले विद्यार्थियों में टीम वर्क, सहानुभूति, सहयोग आदि की भावना विकसित करती है. इस तथ्य को उस समय और भी सहज भाव से देखा जा सकता है जबकि यही बच्चे उच्च शिक्षा में आने के पश्चात् बिना किसी संकोच, भेदभाव के एनसीसी, एनएसएस आदि के माध्यम से अपने आसपास की बस्तियों में श्रमदान करते हैं, स्वच्छता हेतु मिलजुल कर कार्य करते हैं.

 

श्रमदान बच्चों में भावनात्मकता का विकास करता है. हम सभी अपने घरों को, अपनी सम्पत्ति को साफ़-सुथरा रखते हैं, उनके प्रति आत्मीय भाव रखते हैं किन्तु सार्वजनिक सम्पत्ति को गंदा करने में संकोच नहीं करते हैं. यह प्रवृत्ति एक गम्भीर सामाजिक बीमारी बन चुकी है. इसके मूल में नागरिकों का सार्वजनिक संपत्तियों से भावनात्मक जुड़ाव न होना है. यदि एक बच्चा पसीना बहाकर अपने विद्यालय को सँवारता है तो उसके भीतर उस स्थान के प्रति भावनात्मकता का, अपनत्व का बोध जागृत होता है. ऐसा बच्चा भविष्य में सार्वजनिक सम्पत्ति के प्रति उदारता, अपनत्व के भाव से जुड़ेगा. श्रम की गरिमा का अभाव हमारे देश का एक कड़वा सच है. हमने मानसिक श्रम को उच्च और शारीरिक श्रम को हेय दृष्टि से देखने की मानसिकता बना ली है. यही कारण है कि आज देश का शिक्षित युवा किसी भी स्तर की नौकरी के लिए भी कतारों में खड़ा मिल जायेगा किन्तु वह किसी शारीरिक श्रम कार्य को अपनाने से बचता है. श्रमदान के द्वारा बच्चों में श्रम की महत्ता को समझाया जा सकता है, उसके प्रति निम्नता की ग्रंथि समाप्त किया जा सकता है.

 

मुख्यमंत्री के विचार के बाद विद्यालयों में बच्चों के श्रमदान को एक दिशा देने की आवश्यकता है. इसके लिए उठाने वाले तमाम उपायों के बीच देखना होगा कि श्रमदान के नाम पर उनको बालश्रम के रूप में परिवर्तित न कर दिया जाये. बच्चों को, अभिभावकों को बालश्रम और श्रमदान के अंतर को समझाना होगा. बच्चों द्वारा विद्यालय प्रांगण में साफ़-सफाई करना श्रमदान है मगर उन्हीं बच्चों से मिड-डे-मील बनवाया जाना बालश्रम होगा. विद्यालय परिसर में पौधारोपण करना, उनमें पानी देना श्रमदान है मगर किसी उच्चाधिकारी के आने पर उसकी आवभगत करवाना बालश्रम होगा. श्रमदान कोई सुधार कार्यक्रम नहीं है बल्कि यह एक सामाजिकता, परिवारिकता का पाठ है. यदि श्रमदान को सामाजिक सहयोग के रूप में धरातल पर क्रियान्वित किया जाए तो यह आत्मनिर्भरता का, स्वावलम्बन का, श्रम के प्रति पूजनीयता का भाव जागृत करेगा.

 


26 फ़रवरी 2026

अनावश्यक ज्ञान बाँटते अज्ञानी-जन

 ऐसे बहुत से लोग होते हैं जिनसे अपना घर न सँभलता है; घर की किसी योजना में उनकी कोई राय नहीं ली जाती है; जिनका काम न केवल घर में बल्कि आस-पड़ोस में भी सिर्फ बकैती करना हो, वे लोग भी विदेश-नीति पर, वैश्विक सम्बन्धों पर, दक्षिण-एशिया के विविध बिन्दुओं पर अपनी राय दे रहे हैं. कई लोग विदेश नीति को असफल बताने में लगे हैं. हास्यास्पद ये भी है कि जो व्यक्ति विगत दो दशक से अधिक समय से संवैधानिक पद पर है, उसके निर्णयों पर, उसके कार्यों पर वे लोग सलाह दे रहे हैं, जिनके हिस्से में किसी तरह का सम्मान आज तक नहीं आया है.

 



यहाँ एक बात स्पष्ट कर दें कि जिस UGC का विनियम 2026 का सहारा लेकर अपने लोग ही अब पीठ में छुरा भोंकने की स्थिति में आ गए हैं, आस्तीन का साँप बने बैठे हैं, वे सहज भाव में UGC के विनियम 2012 को पढ़ लें. ध्यान देने की आवश्यकता है कि अमित शाह के द्वारा अर्बन नक्सलवाद का सफाया करने वाले कदम उठाये जाने के बाद से ही क्यों इस तरह के मुद्दे उभर कर सामने आने लगे? इसका एक सीधा सा उत्तर है कि नक्सलवाद से, वामपंथ से जुड़े लोगों को भली-भांति मालूम है कि मोदी की टीम में ऐसे बकबकी करने वालों की संख्या ज्यादा ही है. वे एक बार में ही बहकने वाली मुद्रा में आ जाते हैं, उनको बहकाया जाना आसान है.

 

बहरहाल, बहेलिया (वामपंथ, अर्बन नक्सलवाद) ने जाल बिछाया और बकवास करने वाले कबूतर उसमें फँस गए. अब उन फँसे कबूतरों को सरकार के, मोदी के और तो और और योगी के भी हर कदम, हर निर्णय गलत लग रहे हैं. अब क्या ही कहा जाये, जो इन लोगों के बापों के समय में नहीं हुआ, वो सब हो गया, इनको देखने को मिल गया तो बकबकी निकल रही जुबान से, नहीं तो छिलवा दिए गए थे किसी समय में.


10 अक्टूबर 2025

कार्यकर्त्ता भी खुद को सबल बनाएँ

ध्यान रखना, ये नेरेटिव भाजपा के खिलाफ नहीं बल्कि मोदी-योगी के विरोध में तैयार किया जा रहा है.
+

योगी जी की उरई में हुई जनसभा के बाद दो-चार फोटो को केन्द्र में रखते हुए अनेक पोस्ट लिखी जा रही हैं. कुछेक को छोड़कर बाकी पोस्ट में पूर्व पदाधिकारियों की उपेक्षा की बात कही जा रही है.

यहाँ एक बात सबसे पहले भाजपा के ही पूर्व एवं वर्तमान पदाधिकारियों को, साथ ही भाजपा के आनुसंगिक संगठनों के पूर्व एवं वर्तमान पदाधिकारियों को याद रखनी चाहिए चाहिए कि इस जनसभा की स्वीकृति आने वाले दिन से ही इसे जिला प्रशासन का कार्यक्रम बताया जा रहा था. ऐसे में यह भी याद रखना होगा कि प्रशासन और सरकार एक तरह से एक सिक्के के दो पहलू होते हैं. ऐसे में मंच पर सरकार को ही वरीयता मिलनी थी.

एक बात और, जिले में भाजपा के अनेक पूर्व जिलाध्यक्ष है, क्या सबको ही मंच पर स्थान मिला था? यहाँ एक बात उन सभी को ध्यान रखनी चाहिए जो अपने आपको भाजपा का कर्तव्यनिष्ठ कार्यकर्त्ता बताते हैं, निष्ठावान बताते हैं कि किसी भी जिले के किसी भी संगठन में पद गिनी-चुनी संख्या में होते हैं मगर कार्यकर्त्ता लाखों में होते हैं. ऐसे में सभी को पदाधिकारी भी नहीं बनाया जा सकता और हजारों पूर्व पदाधिकारियों को मंच पर स्थान उपलब्ध नहीं कराया जा सकता.

जहाँ तक बात आयातित लोगों की है तो यहाँ भी दोष हम कार्यकर्ताओं का है. किसी भी दल से भाजपा में आने वाले बाहुबली, धनबली का स्वागत ऐसे करते हैं जैसे वह जन्म से ही भाजपा का कार्यकर्त्ता रहा हो. ठीक है कि शीर्ष नेतृत्व ने सत्ता-सुख के लिए, सीटों के लालच में, धन के कारण दूसरे दल से आये व्यक्ति को न केवल भाजपा में शामिल किया बल्कि उसे पद भी दिया, मगर इस स्थिति का भाजपा के सक्रिय, निष्ठावान कार्यकर्ताओं में से कितनों ने विरोध किया? विरोध तो दूर की बात, उस आयातित व्यक्ति का कालपी में यमुना पुल पर जिंदाबाद-जिंदाबाद करते हुए न केवल स्वागत किया बल्कि चौबीस घंटे उसी के इर्द-गिर्द टहलना शुरू कर दिया.

कुछ मिलने की आस में जिस तरह से कार्यकर्ताओं ने भी पलटी मारी है, उसे संगठन के कतिपय स्वार्थी लोगों ने समझा है, परखा है. यही कारण है कि बहुत से सच्चे कार्यकर्त्ता या तो संगठन से दूर हो गए हैं या फिर खुद को निष्क्रिय कर बैठे हैं. जनसभा में उपेक्षा या सादगी वाली बात से ज्यादा इसी तत्त्व ने अपनी भूमिका का निर्वहन किया है.

ध्यान रखिये कि कोई भी दल हो वह उसके कार्यकर्ताओं से है और इसके लिए कार्यकर्ताओं को भी सशक्त होना पड़ेगा, स्वार्थ-लिप्सा से दूर होना पड़ेगा, शीर्ष पदाधिकारियों के, विधायक-सांसद-मंत्री की चरण-वंदना करने से, परिक्रमा करने से, चाटुकारिता करने से बचना होगा. यदि ऐसा नहीं हो पा रहा है तो फिर शीर्ष क्रम के, आयातित लोगों के हाथों की कठपुतली बने रहिये, ऐसे ही उपेक्षित होने का रोना रोते रहिये.

28 जून 2018

मगहर की टोपी और मुस्लिमों के कबीरदास


गुजरात के टोपी विवाद के बाद उत्तर प्रदेश में भी टोपी को विवाद बनाया जा रहा है. कबीरदास की पाँच सौवीं पुण्यतिथि के अवसर पर प्रधानमंत्री के मगहर भ्रमण को लेकर होने वाली तैयारियों एवं अन्य स्थितियों का जायजा लेने के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वहाँ पहुँचे. मगहर में बनी कबीरदास की मजार में पहुँचने पर योगी जी को टोपी पहनाने की कोशिश की गई. योगी जी ने टोपी पहनने से इंकार कर दिया. इसके बाद भी उस टोपी को उनको पकड़ाने का प्रयास किया जाता रहा. मीडिया को जैसे इसी मौके की तलाश थी. अब उसके लिए देश भर से, उत्तर प्रदेश से सारे मुद्दे समाप्त हो गए हैं. सभी जगह एकमात्र मुद्दा योगी जी का टोपी न पहनना बना हुआ है.

मगहर में कबीरदास प्रतिमा 

मगहर में जिन कबीरदास जी के अंतिम संस्कार को लेकर हिन्दू-मुस्लिम विवाद हुआ था और कहते हैं कि इस विवाद के बाद कबीरदास जी के पार्थिव शव के स्थान पर फूल ही मिले, जिन्हें हिन्दू-मुस्लिम ने आपस में बाँट कर अपने-अपने धार्मिक तरीके से उनका अंतिम संस्कार किया. मगहर में आज भी दोनों धर्मों के प्रतीक एक स्थल पर बने हुए हैं. 27 एकड़ में फैले इस समाधि स्थल में कबीरदास की आदमकद प्रतिमा ने बरबस ध्यान आकर्षित करती है. एक तरफ मजार कबीर साहब की इबारत लिखी इमारत थी, जो अपने आपमें स्पष्ट संकेत दे रही थी इस्लामिक मजहबी होने का. इस इमारत के भीतर दो मजारें, एक कबीरदास की तथा दूसरी उनके बेटे की बताई जाती है. इसी इमारत के दूसरी तरफ एक छोटी सी दीवार पार करने पर बनी इमारत के प्रवेशद्वार पर सदगुरु कबीर समाधि का लिखा होना और भीतर कबीर की मूर्ति का होना उसके स्वतः ही हिन्दू धर्मावलम्बियों के होने के संकेत देती है. इस विस्तृत समाधि प्रांगण के एक तरफ पुस्तकालय, दूसरी तरफ कबीर साहित्य विक्रय हेतु उपलब्ध है.

लेखक ने स्वयं मगहर में इस स्थान का भ्रमण किया है. एक प्रांगण में दो धर्मों, मजहबों की इमारतों को अलग-अलग रूपों में देखने के बाद जहाँ एक तरफ ख़ुशी का एहसास हुआ वहीं मन में एक खटका सा भी लगा कि क्या मुसलमानों ने कबीर को वर्तमान में अपने मजहब का नहीं माना है? क्या मुसलमानों में कबीर-साहित्य के प्रति अनुराग नहीं है? हिन्दू धर्म के साथ-साथ इस्लाम की आलोचना करने वाले कबीर को क्या वर्तमान मुसलमानों ने विस्मृत कर दिया है? दोनों इमारतों की स्थिति, वहाँ आने वाले लोगों की स्थिति, दोनों तरफ की व्यवस्थाओं को देखकर, दोनों इमारतों में सेवाभाव से कार्य करने वालों को देखकर लगा कि आज के समय में कबीर भी धार्मिक विभेद का शिकार हो गए हैं. वो और बात रही होगी जबकि उनके अंतिम संस्कार के लिए आपस में हिन्दू-मुस्लिम में विवाद पैदा हुआ होगा किन्तु मगहर में स्थिति कुछ और ही दिखाई पड़ी. इस्लामिक इमारत के नीचे मजार के रूप में कबीर नितांत अकेलेपन से जूझते दिखाई दिए. जहाँ बस एक इमारत, एक सेवादार, नाममात्र को रौशनी और चंद हरे-भरे पेड़-पौधे उनके आसपास हैं. किसी समय में तत्कालीन सामाजिक विसंगतियों पर बेख़ौफ़ होकर बोलने वाले कबीर आज इस विभेद पर गहन ख़ामोशी ओढ़े लेटे दिखे. उस स्थल को और बेहतर बनाने, कबीरदास की स्वीकार्यता मुस्लिमों में भी बनाने, कबीरदास के साहित्य का प्रचार-प्रसार मुस्लिमों के बीच करने के बजाय वहाँ के सेवादार आने वाले को टोपी पहनाने को आतुर दिखे.

12 अगस्त 2017

दोषियों पर तत्काल सख्त कार्यवाही हो

गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में दो दिन के भीतर तीस बच्चों की मृत्यु कोई सामान्य घटना नहीं है. ये सीधे-सीधे प्रशासनिक लापरवाही का मामला है. इस घटना का कारण बताया जा रहा है कि मेडिकल कॉलेज के इंसेफेलाइटिस पीड़ित बच्चों के वार्ड में लिक्विड ऑक्सीजन की सप्लाई बाधित हुई थी. ऐसा बताया गया कि ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी का लाखों रूपया बकाया होने के बाद उसके द्वारा सप्लाई रोकने की बात भी कही जा चुकी थी. ऐसी स्थिति के बाद भी मेडिकल कॉलेज प्रबंधन द्वारा उसके बकाया का भुगतान न करना, ऑक्सीजन की व्यवस्था करने के उपाय न करना आदि दर्शाता है कि वह किस स्तर तक लापरवाह बना हुआ है. इसी मामले में प्रबन्ध तंत्र की तरफ से विशुद्ध लीपापोती होती दिख रही है. उसके द्वारा जानकारी सार्वजनिक की जा रही है कि लिक्विड ऑक्सीजन की किसी भी तरह कमी नहीं थी. कोई भी मौत इसकी कमी से नहीं हुई. ये भी अपने आपमें विशुद्ध गैर-जिम्मेवाराना हरकत है. एक पल को मान भी लिया जाये कि मेडिकल कॉलेज में कोई भी मौत लिक्विड ऑक्सीजन की कमी से नहीं हुई पर इससे कैसे इंकार किया जायेगा कि वहाँ तीस बच्चों की मृत्यु हुई है.


इस घटना का संज्ञान बहुत ही संवेदनशीलता से इसलिए भी लिया जाना चाहिए क्योंकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं इस घटना के एक दिन पहले मेडिकल के दौरे पर थे. वैसे तो मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका अपने गृहनगर गोरखपुर में ये सातवाँ दौरा था किन्तु इस बार का दौरा उन्होंने विशेष रूप से मेडिकल कॉलेज के लिए ही किया था. खुद इंसेफेलाइटिस पीड़ित बच्चों और उनके परिजनों से घंटों मुलाकात करने के बाद उन्होंने इसके इलाज से सम्बंधित सभी पक्षों, सुविधाओं, दवाइयों आदि की जानकारी लेने के लिए एक लम्बी मीटिंग भी की थी. इसके बावजूद इस तरह की घटना बताती है कि अकर्मण्य और गैर-जिम्मेवार अधिकारीयों, प्रशासन पर अपने मुख्यमंत्री का भी असर नहीं है. प्रथम दृष्टया ये मामला भले ही चिकित्सकीय सेवाओं, सुविधाओं में लापरवाही का दिखाई देता हो मगर यदि जरा सी गंभीरता से विचार किया जाये तो आसानी से समझ आ जायेगा कि इसके पीछे कितनी बड़ी प्रशासनिक लापरवाही है. दरअसल भाजपा द्वारा प्रशासनिक कार्यप्रणाली को सुचारू बनाने, उसे पारदर्शी बनाने, अधिकारियों को निर्भय होकर काम करने देने की एक प्रणाली विक्सित करने का प्रयास किया गया. इसी क्रम में प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद से शीर्ष नेतृत्व की तरफ से प्रशासन को, अधिकारियों को स्वतंत्रता से कार्य करने को कहा जा रहा है. भाजपा द्वारा अपने विधायकों, पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं को भी रोका गया है कि वे प्रशासनिक अधिकारियों पर किसी तरह का दबाव न बनायें. इस तरह के निर्देशों से प्रशासनिक अधिकारियों में कार्य के प्रति जवाबदेही आणि चाहिए थी वो न आने के बजाय निरंकुशता आ रही है. अभी भी बहुतायत में वे अधिकारी काम कर रहे हैं जो पिछली सरकार के प्रिय बने हुए थे. ऐसे में उनके द्वारा न केवल भाजपा पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं की अवहेलना की जा रही है वरन जनता के हितों को भी अनदेखा किया जा रहा है.


देखा जाये तो गोरखपुर की ये ह्रदयविदारक घटना इसी स्वतंत्रता का दुष्परिणाम है. सोचने वाली बात है कि प्रशासनिक अधिकारी इस कदर स्वतंत्र हो गए हैं कि महज एक दिन पहले मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए निर्देशों का अनुपालन करना भी उनको उचित न लगा. यदि ऑक्सीजन की सप्लाई किसी कारण से बाधित होने की आशंका थी तो इसके लिए पहले से समुचित प्रबन्ध क्यों नहीं किये गए थे? वे भी तब जबकि इस बीमारी से भर्ती होने वालों में बच्चों की संख्या ज्यादा था. गोरखपुर के प्रशासनिक अधिकारियों ने मेडिकल कॉलेज प्रबंधन द्वारा जानकारी देने के बाद भी बकाया चुकता करवाने, लिक्विड ऑक्सीजन की सप्लाई सुचारू करवाने की तरह क्यों नहीं ध्यान दिया? बच्चों की मृत्यु के बाद जिस तरह की सजगता वहाँ का प्रशासन दिखाने में लगा है यदि उसका शतांश भी पूर्व में दिखा लिया होता तो संभवतः बच्चों को बचा लिया गया होता. अब भले ही चिकित्सालय प्रबंधन अपने आपको सही सिद्ध करने के लिए किसी भी तरह की लीपापोती करे; सरकार अपने बचाव के लिए चाहे कुछ कहती रहे मगर कटुसत्य यही है कि बच्चों को वापस नहीं आना है. इस मामले में स्वयं मुख्यमंत्री योगी जी को विशेष रूप से संज्ञान लेते हुए न केवल चिकित्सकीय लापरवाही के बल्कि अन्य दूसरे पक्षों की भी जाँच करवानी चाहिए. जिस तरह से देश-प्रदेश में भाजपा-विरोधी माहौल उसके विरोधियों द्वारा बनाया जा रहा है; जिस तरह से असहिष्णुता जैसे शब्द के द्वारा लोगों में डर-भय का वातावरण बनाया जा रहा है; जिस तरह से शीर्ष पद पर बैठा व्यक्ति भी गैर-जिम्मेवाराना बयान देने लगता है उससे इस घटना के पीछे किसी तरह की साजिश से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. इसलिए स्वयं योगी जी द्वारा सम्पूर्ण घटनाक्रम का गंभीरतापुर्वक संज्ञान लेते हुए सभी गैर-जिम्मेवार लोगों पर सख्त कार्यवाही करनी चाहिए. अन्यथा की स्थिति में न केवल उनकी कार्यप्रणाली पर धब्बा लगेगा बल्कि विपक्षियों को इस संवेदनशील मुद्दे पर भी राजनीति करने का अवसर हाथ लगेगा, जो कम से कम इस समय कदापि उचित नहीं होगा.  

मासूम न्याय चाहते हैं - योगी जी के नाम खुला ख़त

माननीय योगी जी,
सादर प्रणाम,
आपके अपने क्षेत्र गोरखपुर के मेडिकल कॉलेज में दो दिन के भीतर तीस बच्चों की मृत्यु कोई सामान्य घटना नहीं है. यह उस समय और भी असामान्य हो जाती है जबकि आपका दौरा ऐसी ह्रदयविदारक घटना के ठीक पहले हुआ हो. ये सभी को भली-भांति विदित है कि उस दिन का आपका दौरा विशेष रूप से मेडिकल कॉलेज के लिए ही था. लगभग पूरा ही दिन आपने मेडिकल कॉलेज में इंसेफलाइटिस के मरीज बच्चों के बीच गुजारा था. आपने ICU और CCU में काफी देर तक इंसेफेलाइटिस से पीड़ित बच्चों और उनके परिजनों से मुलाकात भी की थी. इसके साथ ही आपने इसी सम्बन्ध में एक मीटिंग भी ली थी, जिसमें इस बीमारी से जुड़े चिकित्सकों, विशेषज्ञों आदि से सुरक्षा सम्बन्धी तमाम बिन्दुओं पर संतोषजनक जानकारी ली थी. इसके बाद ऐसा क्या हुआ कि बच्चों की एक-एक करके मृत्यु होने लगी.

प्रथम दृष्टया इसे ऑक्सीजन की सप्लाई बंद होना बताया गया वहीं इसके उलट बयान ये भी आया कि मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी से किसी रोगी की मृत्यु नहीं हुई. चलिए एक बारगी मान भी लिया जाये कि मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की सप्लाई बाधित नहीं हुई थी पर क्या इससे इंकार किया जा सकता है कि वहां तीस बच्चों की म्रत्यु नहीं हुई? क्या इससे इंकार किया जा सकता है कि किसी न किसी स्तर पर प्रशासनिक लापरवाही के चलते ये हादसा हुआ? क्या इससे इंकार किया जा सकता है कि बच्चों की सुरक्षा, उनके इलाज को लेकर किसी न किसी रूप में असंवेदनशीलता का परिचय दिया गया? आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्यों नहीं प्रशासन में सरकार का भय है? क्यों नहीं समाज के किसी भी क्षेत्र में प्रशासनिक सजगता देखने को मिल रही है? क्यों नहीं अपराधियों में, निष्क्रिय लोगों में, कर्तव्यहीन लोगों में, गैर-जिम्मेवार लोगों में सरकारी तंत्र का, उन पर सख्त कार्यवाही होने का डर दिख रहा है? आखिर क्यों? ये सवाल एक हमारे नहीं, बल्कि उन सबके हैं जिन्होंने बड़ी आशा-विश्वास से प्रदेश की अव्यवस्था को व्यवस्था में बदलना चाहा था. प्रदेश के बहुत बड़े तबके को अभी भी आपके सख्त कदम की अपेक्षा है क्योंकि विगत के तीन-चार माह में उन्हें सकारात्मक परिवर्तन देखने को नहीं मिला है. आज भी सड़क चलते अपराध हो रहे हैं. आज भी हत्याएं, डकैती, हिंसा पूर्व की भांति हो रही हैं. आज भी अराजक तत्त्वों से लोगों में भय बना हुआ है. आज भी प्रशासन पूरी तरह निष्क्रियता दिखा रहा है.

इतना सबकुछ होने के बाद भी प्रदेश के बहुतायत नागरिकों में आपके प्रति विश्वास, आस्था है कि आप यथाशीघ्र कोई ठोस कदम उठाकर प्रदेश को अराजकता से बाहर निकाल लेंगे. इस विश्वास के बीच गोरखपुर मेडिकल कॉलेज की ये घटना ठेस पहुँचाने का काम करती है. आपकी ईमानदारी, आपकी सत्यनिष्ठा, आपकी कार्यशैली, आपकी जीवनशैली, आपकी साफगोई की तरफ अब लोग निगाह लगाये बैठे हैं कि मासूमों को इंसाफ मिले. मृत्यु के अन्य कारणों की जाँच होती रहेगी किन्तु प्रथम दृष्टया बच्चों की मृत्यु होना सामने आया है. इससे सम्बंधित सभी जिम्मेवार लोगों को तत्काल सजा देने का काम करके आप निराश लोगों में आशा का संचार कर सकते हैं. इसके बाद आप सम्पुर्ण प्रदेश के प्रशासनिक ढाँचे में सख्ती लाने का कार्य करिए. प्रशासन को स्वतंत्रता से कार्य करने देना चाहिए पर इतना भी स्वतंत्र नहीं कर देना चाहिए कि उसमें सरकार के प्रति ही डर-भय न रह जाये.

यदि किसी मुख्यमंत्री के स्थल विशेष के दौरे और बीमारी विशेष से सम्बंधित मीटिंग लेने के बाद भी हीलाहवाली का ये आलम रहे कि तीस बच्चों की मृत्यु हो जाये तो समझा जा सकता है कि प्रशासनिक मशीनरी किस तरह से लापरवाह, अक्षम, असंवेदनशील है. ऐसे गैर-जिम्मेवार लोगों पर यथाशीघ्र सख्त कार्यवाही होनी चाहिए. कार्यवाही, सजा इस तरह की हो कि आने वाले समय में इस तरह की लापरवाही करने की, अपने दायित्व से खिलवाड़ करने की गलती कोई न करे.

आपसे आशा है कि आप इस संवेदनशील, ह्रदयविदारक घटना पर किसी भी तरह की राजनीति नहीं होने देंगे तथा सख्त और सकारात्मक कदम उठाते हुए प्रदेश की जनता को सार्थक सन्देश देने का कार्य करेंगे.


आपका ही.. 

21 मार्च 2017

विकास की राह चलने से बदलेगी छवि

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाये जाने की आवाज़ उनके समर्थकों की तरफ से लगातार उठाये जाने के बाद भी किसी को अंदाज़ा नहीं था कि भाजपा आलाकमान उनके नाम पर अपनी स्वीकृति देगा. उनका नाम बतौर मुख्यमंत्री घोषित होना अपने आपमें चौंकाने वाला निर्णय ही कहा जायेगा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सबका साथ, सबका विकास की नीति और सर्वहितकारी राजनीति के चलते अनुमान लगाना कठिन था कि योगी जैसे कट्टर हिंदुत्व छवि और विवादित बयान देने वाले व्यक्ति को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी जाएगी. ऐसे समय में जबकि ठीक दो वर्ष बाद केंद्र सरकार को या कहें कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सम्पूर्ण देश के सामने लोकसभा चुनाव की परीक्षा से गुजरना है, उत्तर प्रदेश में कट्टर हिंदुत्व छवि का मुख्यमंत्री बनाया जाना अपने आपमें एक चुनौती ही कहा जायेगा. मोदी के सामने ये चुनौती इस कारण और बड़ी है क्योंकि विगत डेढ़ दशक से अयोध्या राम मंदिर मामला जिस तरह से अपनी उपस्थिति राजनैतिक और सामाजिक हलकों में बनाये हुए है उसके फिर से तेजी से उभरने की आशंका बनती दिखाई दे रही है. राम मंदिर समर्थकों में, मोदी-योगी के समर्थकों में, हिंदुत्व के पक्षधर लोगों में अब आशा की किरण का संचार हुआ है कि केंद्र और प्रदेश में भाजपा की बहुमत की सरकार होने के कारण राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ होगा. विगत कुछ दशकों में नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से अपनी राजनैतिक कुशलता को प्रदर्शित किया है उसे देखने के बाद लगता नहीं कि यह निर्णय उन्होंने किसी दवाब में, किसी जल्दबाजी में या फिर महज हिंदुत्व अवधारणा के कारण लिया है. मोदी की राजनीति पूरी तरह से समेकित विकास की, समावेशी विकास की तरफ बढती दिखती है. ऐसे में योगी का मुख्यमंत्री बनना संकेत करता है कि वे उत्तर प्रदेश में हिंदुत्व की अवधारणा को विकास के साथ समन्वित करके आगे बढ़ना चाहते हैं. इसका कारण वर्तमान चुनावों में मतदाताओं का ध्रुवीकरण हो जाना रहा हो. 2014 के लोकसभा चुनाव रहे हों या फिर उत्तर प्रदेश के वर्तमान चुनाव, मतदाताओं का ध्रुवीकरण हुआ है. इसके चलते भाजपा को अन्य धर्मों, जातियों, वर्गों के साथ-साथ हिन्दुओं का संगठित मत प्राप्त हुआ है.


जिस तरह से विगत पंद्रह वर्षों से भाजपा प्रदेश सरकार से बाहर रही है और चक्रानुक्रम में जिस तरह से दो क्षेत्रीय दलों ने अपनी सरकार बनाकर क्षेत्रीयता, जातीयता, वर्गवाद, परिवारवाद को बढ़ावा दिया है उसने प्रदेश के विकास-क्रम को बाधित किया है. सड़कों, पार्कों, गलियारों, एक्सप्रेस वे आदि के द्वारा एक निश्चित क्षेत्र में विकास को सम्पूर्ण विकास का सूचक नहीं माना जा सकता है. प्रदेश का सर्वांगीण विकास करने का दावा करने वाली सरकार ने पूर्वांचल की तरफ, बुन्देलखण्ड की तरफ उस दृष्टि से नहीं देखा जिस विकास दृष्टि से वे अपने-अपने क्षेत्र को देखती रही हैं. अब जबकि योगी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले चुके हैं तब उन्हें और उनके मंत्रिमंडल को ये समझना होगा कि उनके पास मात्र दो वर्ष का ही समय है. योगी के सामने ये चुनौती रहेगी कि इन्हीं दो वर्षों में प्रदेश के विकास का एक मॉडल मतदाताओं के सामने रखना होगा.

वर्तमान विधानसभा चुनाव में जनता ने मोदी की विकासछवि को देखते हुए प्रचंड बहुमत प्रदान किया. इस बहुमत में न केवल हिन्दू मतदाता शामिल था वरन अल्पसंख्यकों विशेष रूप से मुसलमानों का भी मत शामिल है. ऐसे में योगी के सामने मुस्लिम समुदाय के भीतर जबरिया भर दिए गए भय को दूर करना भी एक चुनौती है. देश-प्रदेश की राजनीति में विगत कई दशकों से मुसलमानों को जिस तरह से वोट-बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है, उनको हिंदुत्व का भय दिखाकर ध्रुवीकरण किया जाता रहा है, सुविधाओं-सब्सिडी के नाम पर जिस तरह से वरीयता दी जाती रही है, राजनैतिक लाभ के लिए जिस तरह से उनका तुष्टिकरण किया जाता रहा है उसने भी मुस्लिम समुदाय की दृष्टि में भाजपा को, योगी को अछूत बना रखा है. उनके प्रति एक तरह का भय जगा रखा है.


आज जिस तरह का वातावरण योगी को लेकर बनाया जा रहा है ठीक वैसा ही वातावरण लोकसभा चुनाव के पहले मोदी को लेकर बनाया जा रहा था. मोदी की कट्टर छवि को स्वयं मोदी ने आकर तोड़ा है. इसके पीछे उनके कार्यों का प्रभावी होना रहा है. बिना पक्षपात के सबका साथ, सबका विकास की भावना का अन्तर्निहित होना रहा है. योगी को मुस्लिम समुदाय के भीतर बैठे डर को दूर करने के साथ सम्पूर्ण प्रदेश के विकास की राह निर्मित करनी होगी. इसके लिए किसानों के उत्पादों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदना, फसल बीमा की राह आसान करना, नागरिक सुरक्षा, जनकल्याण कार्यों को करना, बुन्देलखण्ड, पूर्वांचल, रुहेलखण्ड आदि पिछड़े क्षेत्रों के विकास हेतु अलग से कोई मॉडल बनाना आदि कार्यों को अंजाम देना होगा. जिस तरह के विकासकार्यों को प्रधानमंत्री मोदी आगे ला रहे हैं उसे फलीभूत होने का अवसर तभी मिल सकेगा इसलिए विगत वर्षों में जिस तरह का अनियमित, अनियंत्रित विकास देखने में आया है उसको नियमित करना होगा. गुंडाराज की स्थिति के चलते जिस तरह कानून व्यवस्था ध्वस्त हुई है उसे सुधारना होगा. जाति-धर्म विशेष के चलते होते आये छोटे-बड़े उपद्रवों के चलते जिस तरह आमजन में भय, असुरक्षा का माहौल बना हुआ है उसे दूर करना वर्तमान प्रदेश सरकार की प्राथमिकता में होना चाहिए. योगी और उनकी कट्टर हिंदूवादी छवि को पसंद करने वाले समर्थकों को एक बात याद रखनी होगी कि विवादित बयानों के चलते एकबारगी किसी की भी छवि एक वर्ग विशेष में स्थापित भले ही हो जाये किन्तु उस छवि को दीर्घकालिक रूप से स्थापित करने के लिए उसे विकास की राह चलना ही होता है. यदि योगी सरकार मोदी सरकार की तर्ज़ पर विकास की राह चल पड़ती है तो प्रदेश की जनता को उनकी सकारात्मक छवि बनाते देर नहीं लगेगी. अब देखना ये है कि योगी किस तरह से और कितना मोदी की समग्र विकासनीति वाली छवि का लाभ उठाते हैं.