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27 जून 2026

भाजपा का कमजोर पक्ष

भाजपा के संदर्भ में हम एक बात बहुत शुरुआती दौर से कहते आए हैं कि इनके पास ऐसी टीम का घनघोर अभाव है जो भाजपा के ख़िलाफ़ फैलाई जाने वाली अफ़वाहों, इसके विरुद्ध सेट किए जाने वाले नैरेटिव आदि को समाप्त कर सकें. उनके बारे में स्थिति को स्पष्ट कर सकें. ऐसा एक-बार नहीं कई बार हुआ और हर बार भाजपा को बैकफुट पर आते देखा गया. ऐसा ही एक षड्यंत्र विरोधियों द्वारा फिर रचा गया, फिर एक अफवाह फैलाई गई श्रीराम मंदिर में चढ़ावा-दान की चोरी को लेकर. दान की चोरी को लेकर स्थिति स्पष्ट हुई और चढ़ावा चोरी के सम्बन्ध में आरोपितों को जेल. बावजूद इसके विरोधियों द्वारा अपना षड्यंत्र चालू है.

 

ये ध्यान रखना होगा कि श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण ने इसके विरोधियों की प्रतिष्ठा पर चोट की है; मुस्लिम आक्रांताओं के उस अहं को धूल चटाई है जिसके दम पर वे हिन्दू आस्थाओं पर कब्जा किए रहे. इन लोगों को फूटी आँख नहीं सुहा रहा कि श्रीराम जन्मभूमि मंदिर वैश्विक स्तर पर न केवल आस्था का बल्कि भारतीय सांस्कृतिक पहचान का केन्द्र बन गया. चढ़ावा की चोरी निश्चित रूप से मानवीय स्वभाव-जनित सोच के रूप में सामने आई है साथ ही इसमें विरोधी साजिश की भी आशंका है. जाँच चले, पूरी गम्भीरता से चले और बड़े से बड़ा दोषी भी न छूटे. इसके साथ ही विरोधियों की अफवाहों से, षड्यंत्र से बचने की आवश्यकता है.

 

मंदिर को गिराकर बने ढाँचे को मिटाकर मंदिर तो पुनः बना लिया गया है किंतु आस्था-प्रतिष्ठा के धूमिल हो जाने पर उसे बनाया जाना मुश्किल है.


01 अगस्त 2025

प्रेमचन्द का इस्लामिक तुष्टिकरण

आये दिन चर्चा होती है फिल्मों में तुष्टिकरण के सम्बन्ध में. नायक को हिन्दू देवी-देवताओं से नफरत होती है पर 786 के बिल्ले पर विश्वास होता है. साधु-संत ढोंगी दिखाए जाते हैं मगर मौलवी-मौलाना विश्वासी होते हैं. ऐसी अनेकानेक घटनाएँ हैं, अनेकानेक फ़िल्में हैं. गौर करियेगा, ये फ़िल्मी बातें आज़ादी के बहुत बाद की हैं. किसी दौर में तो मुस्लिम अभिनेताओं को भी अपना स्थान बनाये रखने के लिए हिन्दू नाम अपनाने पड़े थे. बहरहाल, फिल्मों में इस तरह की हरकतें आज़ादी के बहुत बाद शुरू हुईं जबकि हिन्दू पात्र खलनायक और मुस्लिम पात्र नायक दिखाए गए. हिन्दू आस्था को ढोंग बताया गया और इस्लामिक पद्धति को स्वीकारा गया.

 



आज़ादी के बहुत पहले 1933 में एक कहानी प्रकाशित हुई थी ईदगाह, आप सबने पढ़ी होगी. लेखक हैं इसके प्रेमचन्द. गौर करियेगा, इस कहानी में हामिद दया का मानक बनता है, अपनी दादी के लिए चिमटा खरीदता है. आखिर ऐसा पात्र हिन्दू भी गढ़ा जा सकता था लेकिन प्रेमचन्द ने नहीं गढ़ा. प्रेमचन्द ने हिन्दू पात्र में रचा घीसू और माधव को, कहानी को (उपन्यास) नाम दिया कफ़न. जिस-जिसने इसे पढ़ा होगा वे अंदाजा लगा सकते हैं कि किस तरह का हिन्दू पात्र रचा गया. ऐसा उस लेखक द्वारा किया गया जिसे उपन्यास सम्राट कहा गया. जिसकी कोई फंडिंग इस्लामिक देशों से नहीं थी. समझना कठिन नहीं कि हिन्दू विरोधी नैरेटिव बरसों से बहुत ही सहजता के साथ चलाया-फैलाया जाता रहा है.

 


27 अप्रैल 2025

नफरत फ़ैलाने वाले भी तुम

अनुभव कीजिए कि क्या पहलगाम हत्याकांड के ठीक पहले मिनट तक किसी ने पोस्ट किया कि पहलगाम के मुसलमानों की सेवा न ली जाए?


दो चार मुसलमानों की तात्कालिक सहायता के वशीभूत क्या ये भुला दिया जाएगा कि उन आतंकियों ने ही हिन्दू, मुस्लिम की पहचान करने के बाद ही गोली मारी?


पर्यटकों को घुमाने और अन्य सेवायें देने वाले स्थानीय मुसलमान जो अब सीना ठोंक कर सहायता करने का झंडा गाड़ रहे, उस समय मिलकर आतंकियों का मुक़ाबला करने का दम क्यों न दिखा पाए?


हिन्दू मुस्लिम उन आतंकियों ने शुरू किया था, उसका विरोध बंद हो गया, क्यों?


इस घटना ने आतंकियों को अब नया ढंग दे दिया है हत्याएं करने का. अब वे विशुद्ध काफिरों को ही मार सकेंगे. अपने मजहबियों की हत्या करने का दोष अब उनके सिर नहीं आयेगा.


इस घटना के दौरान या बाद में सम्भव है कि स्थानीय लोगों में सहायता की होगी पर क्या मात्र इसी कारण से भुला दिया जाए कि जो लोग मारे गए, उनको मुसलमान न होने के कारण मारा गया?


फिर हिन्दू मुसलमान कौन कर रहा?


आँखें खोलिए और सजग, सचेत, सुरक्षित रहिए. ज़्यादा भावनाओं में बहने से पहले आतंकवाद का इतिहास देख लें, कट्टरपंथियों की मानसिकता देख लें. यहाँ वक़्फ़ के ख़िलाफ़ बोलने पर शहर भर आग में जलने लगता है. एक पोस्ट लगाने पर दर्जी का गला काट दिया जाता है. क्रिकेट के विवाद में मुहल्ले भर में मारा-काटी मचा दी जाती है.


और आप सब कहते हो कि नफ़रत हम फैलाते हैं. सच को पहचानो और उसे सामने लाने की कुव्वत रखो.


19 अप्रैल 2025

शांतिदूत लिखने का सन्दर्भ भी समझो

'शांतिदूत' शब्द का प्रयोग करना बंद करो.

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यदि खुलकर मुस्लिम समुदाय के हमलावरों, आतातायी लोगों, उत्पात मचाते युवकों के खिलाफ हत्यारे, बवाली, हिंसक शब्द का प्रयोग नहीं कर सकते तो कुछ न लिखो.... चुपचाप रहो.... मगर 'शांतिदूत' लिखकर उनको भविष्य के लिए वाकई शांतिदूत माने जाने का रास्ता न बनाओ.


वर्तमान इंटरनेट युग में इस शब्द के द्वारा सम्पूर्ण विश्व में एक सन्देश जायेगा वहीं भविष्य में इसी एक शब्द के द्वारा इन वर्तमान मुस्लिम आक्रान्ताओं को, हमलावरों को वास्तविक रूप में शांतिदूत माना-स्वीकारा जाने लगेगा.


क्या पता तब आज की तरह से फिल्मों के द्वारा सच दिखाने वाले लोग जिंदा भी मिलें या नहीं?


04 अप्रैल 2025

वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 पारित

संसद ने वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 को पारित कर दिया है. लोकसभा के बाद यह विधेयक राज्यसभा में भी पारित हो गया. राज्यसभा में विधेयक पर लगभग बारह घंटे तक चली चर्चा के बाद देर रात दो बजे के बाद मत-विभाजन करवाया गया. इसमें विधेयक के पक्ष में 128 सदस्यों ने मतदान किया जबकि 95 सदस्यों ने विधेयक के विरोध में मतदान किया. लोकसभा पहले ही विधेयक को मंजूरी दे चुकी है. यहाँ इस विधेयक के पक्ष में 288 और विरोध में 232 मत पड़े.

 



अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने ये संशोधन बिल पेश किया था. विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि इस कानून से करोड़ों गरीब मुसलमानों को फायदा होगा और किसी भी तरह से यह किसी भी मुसलमान को नुकसान नहीं पहुँचाएगा. उन्होंने कहा कि यह कानून वक्फ संपत्तियों में हस्तक्षेप नहीं करता है. वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन को सुव्यवस्थित करना है, जिसमें विरासत स्थलों की सुरक्षा और सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देने के प्रावधान हैं. इस विधेयक का उद्देश्य संपत्ति प्रबंधन में पारदर्शिता बढ़ाकर, वक्फ बोर्ड और स्थानीय अधिकारियों के बीच समन्वय को सुव्यवस्थित करके और हितधारकों के अधिकारों की रक्षा करके शासन में सुधार करना भी है. इस विधेयक का उद्देश्य वक्फ बोर्ड को अधिक समावेशी बनाना है.

 

इसी के साथ संसद ने मुसलमान वक्फ (निरसन) विधेयक, 2025 को भी मंजूरी दे दी है. यह विधेयक मुसलमान वक्फ अधिनियम 1923 को निरस्त करता है, जिसे राज्यसभा ने मंजूरी दे दी है. लोकसभा में पहले ही इस विधेयक को पारित किया जा चुका है.


12 मार्च 2024

अपने ही नागरिकों को नागरिकता देने वाला कानून

चार वर्ष से अधिक की प्रतीक्षा के पश्चात् अंततः नागरिक संशोधन अधिनियम को भारत के राजपत्र में अधिसूचित कर दिया गया. दिसम्बर 2019 में यह अधिनियम संसद के दोनों सदनों में पारित हुआ था. अब इसे अधिसूचित किये जाने के बाद इस अधिनियम के क्रियान्वयन का मार्ग प्रशस्त हो गया है. इस कानून के लागू हो जाने से भारत के तीन पड़ोसी देशों-पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को भारत की नागरिकता मिल सकेगी. संसद के दोनों सदनों से पारित इस अधिनियम के द्वारा अफगानिस्तान , बांग्लादेश और पाकिस्तान से प्रताड़ित धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए भारतीय नागरिकता का त्वरित मार्ग प्रदान करके के लिए नागरिकता अधिनियम 1955 में संशोधन किया गया था. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 तक नागरिकता सम्बन्धी नियमों में परिवर्तन किये गए.

 



देश की स्वतंत्रता के बाद जब 26 जनवरी 1950 को यहाँ का संविधान लागू हुआ तो भारत में जन्म लेने वाले नागरिकों को यहाँ की नागरिकता स्वतः ही मिल गई थी. इसके पश्चात् 1955 में नागरिकता कानून बनाकर उन सभी नागरिकों को भारत की नागरिकता प्रदान की गई जो पूर्व-रियासतों के नागरिक रहे थे. इस कानून में समय-समय पर परिवर्तन भी किये जाते रहे. ऐसा करने के पीछे कारण गोवा, दमन-दीव, पुडुचेरी की भौगौलिक स्थितियों में आये परिवर्तन रहे थे. दरअसल पाकिस्तान और बांग्लादेश से भूमि विवाद सुलझाने के कारण से इन क्षेत्रों में रहने वाले निवासियों को भारत की नागरिकता देने के लिए ये संशोधन किये गए थे. भूमि विवाद के साथ-साथ इन पड़ोसी देशों में धार्मिक विवाद भी लगातार देखने को मिल रहे थे. इससे शायद ही कोई इंकार करे कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान में वहाँ के अल्पसंख्यक नागरिकों-हिन्दू, सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध और पारसी आदि को लगातार अमानवीय व्यवहार, उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है. पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा, संरक्षण के लिए नेहरू-लियाकत समझौता भी इसी कारण से धरातल पर लाया गया था. कालांतर में उसका अनुपालन असल हो गया.

 

ये एक विचारणीय स्थिति है कि देश के विभाजन के पूर्व इन तीनों पड़ोसी देशों के ये अल्पसंख्यक नागरिक इसी भारत देश के नागरिक थे, यही इनकी भी मातृभूमि थी. ऐसी स्थिति जबकि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के संरक्षण के लिए किये गए समझौते का अनुपालन करना संभव नहीं हो रहा था तो भारत की संवैधानिक जिम्मेवारी बनती थी कि वह इन प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को संरक्षण प्रदान करे. लगातार मिलते उत्पीड़न, शोषण के कारण इन देशों के अल्पसंख्यक नागरिक लगातार अपनी मातृभूमि-भारत की तरफ एक आशा की दृष्टि के साथ दौड़ पड़ते हैं. पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के ऐसे हजारों नागरिक अवैध प्रवासी के रूप में भारत में रह रहे हैं. मानवीयता के आधार पर भले ही उनकी सहायता की जा सके मगर देश की कोई भी सरकार, राज्यों की सरकारें चाह कर भी संवैधानिक रूप से उनकी सहायता नहीं कर पा रही थीं. ये तीनों देश भी अपने देश में अपने अल्पसंख्यक नागरिकों की सहायता करने में असमर्थ ही नजर आ रहे थे. ऐसे में भारत सरकार ने अपना दायित्व समझते हुए नागरिकता संशोधन अधिनियम को दोनों सदनों में पारित करवाया और उसकी विस्तीर्ण नियमावली को अधिसूचित कर दिया. यह अधिनियम इन तीनों देशों के धार्मिक अल्पसंख्यकों को देश की नागरिकता लेने की सुविधा प्रदान करता है किन्तु वह इन्हीं तीनों पडोसी देशों के मुस्लिम नागरिकों को भारत की नागरिकता लेने की सुविधा प्रदान नहीं करता है.

 

देखा जाये तो भारत सरकार की तरफ से यह एक महत्त्वपूर्ण कदम का उठाया जाना है. इस अधिनियम से देश के किसी भी अल्पसंख्यक और मुस्लिम की नागरिकता पर किसी तरह का संकट नहीं खड़ा होता है, जैसा कि पूर्व में अनेक विपक्षी राजनैतिक दलों द्वारा कहा जाता रहा है. अनेक राजनैतिक दलों के साथ-साथ अनेक मुस्लिम संगठनों ने इस अधिनियम के पारित होने के पश्चात् इसका जबरदस्त विरोध किया था. शाहीन बाग़ में एक लम्बी अवधि तक चला विरोध प्रदर्शन इसका उदाहरण है. यहाँ स्पष्ट रूप से समझने वाली बात है कि यह अधिनियम देश के किसी भी व्यक्ति, वह चाहे किसी भी धर्म का हो, की नागरिकता को खतरे में नहीं डालता है न ही उसका हनन करता है. यह अधिनियम उन वंचितों को, धार्मिक अल्पसंख्यकों को कानूनी अधिकार देता है जो पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान में प्रताड़ित होकर भारत में शरणार्थी की स्थिति में हैं. नागरिकता अधिनियम में नागरिकता के प्रावधान के सन्दर्भ में आवेदक को पिछले 12 महीनों के दौरान और पिछले 14 वर्षों में से आखिरी वर्ष में 11 महीने भारत में रहना चाहिए. कानून में हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई जो तीन देशों-अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से सम्बंधित हैं, उनके लिए 11 वर्ष की जगह 6 वर्ष तक का समय निर्धारित किया गया है. कानून में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि किसी नियम का उल्लंघन किया जाता है तो ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया कार्डधारकों का पंजीकरण रद्द किया जा सकता है. 


भारत सरकार द्वारा कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में अपने ही उन नागरिकों को संरक्षण, सुरक्षा प्रदान किये जाने का प्रावधान किया है जो आज़ादी के समय तत्कालीन स्थितियों के चलते अनचाहे ही किसी दूसरे देश के नागरिक बन गए थे और उन देशों में वे धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यक भी थे, प्रताड़ित भी थे. इस तरह के कदम के लिए देशव्यापी समर्थन, सहयोग मिलना चाहिए था मगर कतिपय राजनैतिक स्वार्थ के चलते इस अधिनियम का अतार्किक विरोध किया गया. अब जबकि इस अधिनियम को अधिसूचित कर दिया गया है, राज्यों का अनापेक्षित हस्तक्षेप न रहे इसके लिए केन्द्रीय पोर्टल की व्यवस्था की गई है, तब सभी को अपने ही पूर्व-नागरिकों का स्वागत, सम्मान करना चाहिए जो अभी तक अपने ही देश में शरणार्थी की तरह रहने को विवश थे. 





 

02 जनवरी 2024

हलाल प्रमाण पत्र : सरकारी कार्य में मजहबी घुसपैठ

कुछ दिनों से हलाल और हलाल प्रमाण पत्र ने पर्याप्त सुर्खियाँ बटोरी हैं. चर्चा में आने का कारण उत्‍तर प्रदेश में योगी सरकार द्वारा हलाल प्रमाण पत्र पर रोक लगा देना है. देश में न केवल माँसाहार पर बल्कि सौन्दर्य प्रसाधनों सहित अनेक सामानों के लिए हलाल प्रमाण पत्र दिया जाने लगा है. देश में वर्तमान में ऐसी कोई सरकारी संस्था मान्यता में नहीं है जिसके द्वारा इस तरह का प्रमाण पत्र जारी किया जाये. उत्तर प्रदेश ने तत्काल प्रभाव से अवैध तरीके से हलाल प्रमाण पत्र देने के कारोबार पर प्रतिबन्ध लगा दिया है. ऐसा होते ही प्रदेश में हलाल प्रमाणित उत्पाद का निर्माण, उसकी बिक्री और भंडारण को अवैध घोषित कर दिया गया है. यदि इस तरह की कार्यविधि में कोई भी व्यक्ति अथवा संस्था संलिप्त पाए जाते हैं तो उनके विरुद्ध औषधि और प्रसाधन सामग्री कानून के अंतर्गत सख्त कार्रवाई की जाएगी. ऐसा आरोप है कुछ संस्थाएँ हलाल प्रमाण पत्र के नाम पर पर अवैध कारोबार में संलिप्त हैं. इस प्रमाण पत्र के नाम पर धन को जुटाया जा रहा है, जिसके माध्यम से आतंकवादी संगठनों और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को मदद की जा रही है.

 



हलाल को माँसाहार और शाकाहार खाद्य पदार्थों के लिए प्रयोग में लाया जा रहा है अर्थात माँसाहार के अलावा अनेक तरह के शत-प्रतिशत शाकाहारी खाद्य पदार्थों को भी हलाल की श्रेणी में शामिल माना जा रहा है. हलाल प्रमाण पत्र जारी करने के अवैध कारोबार के बाद ऐसे तमाम उत्पादों को गैर-इस्लामिक माना जाने लगा, जिनके पास हलाल प्रमाण पत्र नहीं है. इस तरह की सामग्री को हराम मानते हुए इसे गैर-इस्लामिक भी माना गया और इसका बहिष्कार भी किया जाने लगा. हलाल प्रमाण पत्र देने सम्बन्धी प्रक्रिया को पहली बार 1974 में वध किए गए माँस के लिए शुरू किया गया था. इससे पहले हलाल प्रमाणन का कोई रिकॉर्ड नहीं मिलता है. यहाँ हलाल माँस से तात्पर्य उस माँस से है, जिसे इस्लामी प्रक्रिया की मदद से हासिल किया जाता है. वर्ष 1993 में हलाल प्रमाणीकरण सिर्फ माँस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे अन्य उत्पादों पर भी लागू किया गया.

 

हलाल प्रमाण पत्र देने के लिए पूरे देश में अब तक कोई भी संस्था पंजीकृत नहीं है. माँसाहार पदार्थों के अलावा  हलाल प्रमाण पत्र का प्रयोग सौंदर्य प्रसाधन, चीनी, पिपरमिंट तेल, खाद्य तेलों, रवा और बेकरी उत्पादों पर भी होने लगा. इसके पीछे कारण बताया गया कि देश से बहुत सारे उत्पादों का निर्यात इस्लामिक देशों में किया जाता है अथवा ऐसे देशों में भी किया जाता है जहाँ मुस्लिम आबादी इन उत्पादों का उपयोग करती है. इन्हीं देशों और नागरिकों में हलाल की बाध्यता होने के कारण निर्यात किये जाने वाले उत्पादों के लिए हलाल प्रमाण पत्र जारी किये गए. देश में इस तरह के प्रमाण पत्र जारी करने वाली कोई आधिकारिक अथवा सरकारी संस्‍था न होने के कारण यह कार्य अनेक निजी कंपनियों और एजेंसियों द्वारा किया जाने लगा. इनके माध्यम से व्‍यक्तिगत तौर पर कंपनियों को हलाल प्रमाण पत्र उपलब्ध करवाया जाने लगा. इस तरह की एक कंपनी हलाल इंडिया के प्रमाण पत्र को कतर, यूएई और मलेशिया जैसे इस्‍लामिक देशों में मान्‍यता मिली हुई है. इस कंपनी द्वारा अपनी वेबसाइट पर दावा किया जाता है कि वह किसी भी उत्पाद को प्रयोगशाला में परीक्षण करवाने और अनेक तरह के ऑडिट करवाने के बाद ही हलाल प्रमाण पत्र देती है. देश में वर्तमान में चेन्नई की हलाल इंडिया, दिल्ली की जमीयत उलमा-ए-हिंद हलाल ट्रस्ट और मुम्बई की हलाल काउंसिल ऑफ इंडिया भी हलाल सर्टिफिकेट बाँट रही हैं.

 

हलाल प्रमाणन का विरोध होने पर तमाम सारी कंपनियों, मुस्लिमों और हलाल समर्थकों ने यह तर्क रखा कि गैर माँसाहारी खाद्य पदार्थ, सौंदर्य प्रसाधन और अन्य शाकाहारी उत्पादों के लिए भी हलाल प्रमाणपत्र आवश्यक है. इस प्रमाण पत्र का सम्बन्ध केवल शुद्धता और प्रामाणिकता से है. इसके द्वारा उत्पादों के लिए एक प्रमाणीकरण प्रक्रिया को स्वीकारा गया है, इसका अर्थ केवल यह है कि उत्पाद अच्छा है. यदि हलाल प्रमाण पत्र समर्थकों के दावे को मान भी लिया जाये और इन उत्पादों पर हलाल प्रमाणपत्र स्वीकार कर लिया जाये तो क्या यह मान लिया जाये कि आईएसआई और एफएसएसएआई जैसे उपभोक्ता उत्पादों पर वर्तमान सरकारी प्रमाण पत्र पर्याप्त नहीं हैं? क्या मान लिया जाये कि हलाल प्रमाण पत्र प्रदान करने वाले किसी तरह की कोई पारदर्शी, वैज्ञानिक और किसी परिभाषित विधि को अपनाते हैं जो उत्पादों की शुद्धता अथवा उसकी अच्छाई का निर्धारण करती है? हलाल प्रमाणन विशुद्ध रूप से मजहबी इस्लामी संगठनों द्वारा जारी किया जाता है, ऐसे में उत्पादों की शुद्धता अथवा उनके प्रमाणीकरण से अधिक यह विचार गैर-इस्लामिक समुदायों के प्रति भेदभावपूर्ण है. यह प्रक्रिया एक तरह से गैर-इस्लामिक समुदायों पर भी इस्लामी भावनाओं को थोपने का कार्य करती है. यदि कल को गैर-इस्लामिक समुदायों द्वारा भी इस तरह की प्रमाणीकरण प्रक्रिया को अपनाया जाने लगे तो सरकारी मान्यता प्राप्त, पंजीकृत संस्थाओं का औचित्य ही क्या रह जायेगा?

 

देखा जाये तो सरकारी पंजीकृत संस्थाओं के सामानांतर इस तरह की व्यवस्था बनाना एक तरह से सरकारी तंत्र को चुनौती देना है. भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में सरकार के सामानांतर इस तरह की अर्थव्यवस्था को अपनाए जाने का मंतव्य क्या हो सकता है? इस तरह की व्यवस्था को किसी भी रूप में न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता है, भले ही ऐसा उन देशों के सन्दर्भ में ही क्यों न आवश्यक महसूस हो जहाँ निर्यात किये जाने वाले उत्पादों का उपयोग मुस्लिम आबादी द्वारा किया जा रहा हो. मुसलमानों के लिए अपने उत्पादों का विक्रय करने के लिए हलाल प्रमाणपत्र की माँग करना न केवल अनुचित है बल्कि गैर-कानूनी भी है. यह जिम्मेदारी सरकार की है कि जब देश में सरकारी प्रमाणन पर्याप्त है तो एक विशेष समुदाय द्वारा समानांतर प्रमाणन तंत्र की स्थापना कैसे हो रही है?

 




 

25 अक्टूबर 2023

मजहबी कट्टरता छोड़ें भारतीय मुसलमान

फिलिस्तीन के इस्लामी आतंकी संगठन हमास ने इजरायल पर जबरदस्त तरीके से हमला किया था. इस हमले में आतंकियों ने इजरायल के आम नागरिकों, सैनिकों को मारने के साथ-साथ वहाँ की अनेक महिलाओं, बच्चों को बंधक बना लिया था. आतंकियों द्वारा अल्लाह-हू-अकबर के नारों के बीच महिलाओं को प्रताड़ित करने के वीडियो भी सामने आये. बंधक महिलाओं को नग्न कर उनके साथ घिनौनी हरकतें की जा रही. हमास के आतंकी इस्लामी नारों के साथ जश्न मनाते हुए बंधक महिलाओं, बच्चों के साथ वहशियाना हरकतें तक कर रहे. हमास आंतकियों के ऐसे कृत्यों की एक तरफ समूचे विश्व ने निंदा की, वहीं दूसरी तरफ भारत के कट्टरपंथी मुस्लिमों ने ऐसी कबीलाई हरकतों, मानसिकता का समर्थन किया है. ये कट्टरपंथी मुस्लिम खुलकर हमास के हमले का समर्थन करते हुए उसे जायज बता रहे हैं.

 



आश्चर्य की बात ये है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में, जामिया में हमास के समर्थन में सैकड़ों विद्यार्थियों द्वारा जुलूस निकाला गया. यद्यपि पुलिस द्वारा इस मामले में प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है तथापि ये घटना बताने को पर्याप्त है कि देश का बहुसंख्यक शिक्षित मुस्लिम क्या सोच रखता है. इसी तरह ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा कि वास्तविकता यह है कि हमास-इजराइल युद्ध का असली कारण खुद इजराइल है. फिलिस्तीन सिर्फ अपने ऊपर हुए उत्पीड़न का बचाव कर रहा है. पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की परंपरा को नजरअंदाज करते हुए शोषितों के बजाय उत्पीड़कों का समर्थन किया. यह पूरे देश के लिए शर्मनाक और दुखद है. यहीं आकर भारतीय राजनीतिज्ञों को, भारतीय मुसलमानों को, इस्लामिक आतंकवाद को छद्म बताने वालों को, तुष्टिकरण के नाम पर मुस्लिम आतंकियों की पैरवी करने वालों को जागने की जरूरत है. एक बात सामाजिक सन्दर्भों में कभी समझ नहीं आई कि ऐसी स्थिति के बाद भी जब कभी भारतीय मुसलमानों को अवसर मिला तो वे अपनी प्रतिबद्धता आतंकवाद के विरोध में दिखाने से चूक गए. मुस्लिम पक्षधर बनने के लोभ में, मजहबी दिखने की कट्टरता में वे जाने-अनजाने दूसरे पाले में खड़े दिखाई दिए.

 

आखिर ऐसी मुस्लिम कट्टरता, पक्षधरता समाज को कहाँ ले जाएगी? कितनी जगह आतंकी वारदातें करने के बाद, कितने मासूमों की, निर्दोषों की जान लेने के बाद ये मानसिकता बदलेगी? इजरायल और फिलिस्तीन के सन्दर्भ में किसी एक का पक्षधर होना तो समझ आता है मगर फिलिस्तीन के सन्दर्भ में हमास जैसे आतंकी का पक्ष लेना समझ से परे है. इस बिंदु पर आकर भारत के मुसलमानों को समझना चाहिए कि आखिर यूएई और सऊदी अरब के मुसलमान क्यों हमास के पक्ष में नहीं हैं? क्यों अरब देश फिलिस्तीनी नागरिकों को अपने यहाँ शरण देने को तैयार नहीं हैं? मिस्र ने एक भी फिलिस्तीनी नागरिक को अपनी सीमा में दाखिल नहीं होने दिया है. इसका कारण इन फिलिस्तीनी नागरिकों का मूलरूप से हमास को समर्थन देना है. इसके साथ ही आतंकी समर्थित फिलिस्तीनी नागरिकों के कारण इन देशों को अपनी व्यवस्था में गड़बड़ी की आशंका बनी रहती है. असल में किसी भी देश के नागरिकों के लिए उनका राष्ट्रहित सर्वोपरि है. जबकि यही बात भारतीय मुसलमानों के सन्दर्भ में उपयुक्त नहीं लगती है.

 

आज जबकि वैश्विक सन्दर्भ में इस्लामिक आतंकवाद का विरोध होने लगा है, तब देश के मुस्लिम संगठनों को, मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करते राजनीतिज्ञों को, मुस्लिम नेताओं को एकसुर में हमास के इस हमले का पुरजोर विरोध करने की आवश्यकता है. इस हमले के बाद भी हमास का साथ देना आतंकवाद को पोषित करना ही है. ऐसे नाजुक पल में मुस्लिम कट्टर होने की बजाय इस देश के समस्त मुस्लिमों को जागने की जरूरत है. यदि इस घटना के बाद भी इस्लामिक आतंकवाद का विरोध मुस्लिम नेताओं, मुस्लिम मजहबी संगठनों, मुस्लिम बुद्धिजीवियों द्वारा नहीं किया गया तो न केवल आतंकी मजबूत होंगे वरन भारतीय धर्मनिरपेक्षता को कमजोर करने वाले भी मजबूत होंगे.




 

15 जून 2023

समान नागरिक संहिता का अतार्किक विरोध

समान नागरिक संहिता का मसला उस समय चर्चा में आया जबकि इसी 14 जून को 22वें विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता पर जनता और मान्यता प्राप्त धार्मिक संगठनों के विचार माँगे हैं. एक सामान्य नागरिक भी इस पर अपने विचार विधि आयोग को तीस दिन के भीतर भेज सकता है. आयोग ने यह भी कहा है कि यदि आवश्यकता महसूस हुई तो वह चर्चा के लिए व्यक्ति अथवा संगठन को बुला भी सकता है. जैसे ही समान नागरिक संहिता की चर्चा शुरू हुई वैसे ही इसका विरोध भी शुरू कर दिया गया. समान नागरिक संहिता का मुद्दा कोई राजनैतिक नहीं वरन संविधान में ही इसके तत्त्व समाहित हैं. संविधान की प्रस्तावना और नीति निर्देशक सिद्धांतों के अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि सरकार सभी के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने की कोशिश करे. 


आज़ादी के बाद नवम्बर 1948 में संविधान सभा की बैठक में समान नागरिक संहिता को लागू किये जाने पर लम्बी बहस चली. बहस में इस्लामिक चिन्तक मोहम्मद इस्माईल, जेड एच लारी, बिहार के मुस्लिम सदस्य हुसैन इमाम, नजीरुद्दीन अहमद सहित अनेक मुस्लिम नेताओं ने भीमराव अम्बेडकर का विरोध किया था. तब डॉ० अम्बेडकर ने समान नागरिक संहिता का समर्थन करते हुए कहा था कि देश में एक आपराधिक विधि संहिता है, दंड विधान में एक विधि है, संपत्ति हस्तांतरण का एक विधान है. जबरदस्त विरोध के बीच हुए मतदान में डॉ० अम्बेडकर का प्रस्ताव विजयी हुआ. मुस्लिम सदस्य बुरी तरह पराजित हुए और संविधान के अनुच्छेद 44 में बहुमत की राय से समान नागरिक संहिता को लागू किये जाने सम्बन्धी विधान लाया गया. इसके बाद भी बँटवारे की त्रासदी झेल रहे मुसलमानों के प्रति सौहार्द्र दर्शाते हुए समान नागरिक संहिता को लागू करने का विचार कुछ वर्षों के लिए टाल दिया गया. समय गुजरने के साथ-साथ मुस्लिम कट्टरता बढ़ती गई, मुस्लिम तुष्टिकरण बढ़ता गया और समान नागरिक संहिता की राह संकीर्ण होती गई. इसी विरोध और कट्टरता के चलते सन 1972 में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का जन्म हुआ. तबसे यह समान नागरिक संहिता का विरोध करते हुए शरीयत को संविधान और कानून से ऊपर बताती-मानती है.




इसके विरोध में खड़े लोगों का यह तर्क तो अत्यंत हास्यास्पद है कि समान नागरिक संहिता की बात हिन्दुओं द्वारा महज इस कारण की जाती है क्योंकि वे मुसलमानों की चार शादी और तलाक देने की सुविधा को आबादी बढ़ाने वाला मानते हैं. यहाँ सवाल उठता है कि क्या ये प्रासंगिक है कि एक महिला को मात्र तीन बार तलाक बोलकर हमेशा के लिए बेघर कर दिया जाये, जैसा कि शाहबानो प्रकरण में हुआ? 1985 में शाहबानो की उम्र 62 वर्ष थी और उसके पति ने तीन बार तलाक कहकर उससे सम्बन्ध विच्छेद कर लिया था. पाँच बच्चों की माँ शाहबानो को तब सिर्फ मैहर की रकम वापस की गई थी. इसी वर्ष उच्चतम न्यायालय ने कहा भी था कि संसद को समान नागरिक संहिता पर आगे बढ़ना चाहिए. वर्ष 2015 में भी पुनः उच्चतम न्यायालय ने इसकी आवश्यकता पर बल दिया. सर्वोच्च न्यायालय ने इससे पूर्व वर्ष 2003 में भी भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 की धारा 118 को असंवैधानिक करार देते हुए संसद को समान नागरिक संहिता के निर्माण के सम्बन्ध में अपनी टिप्पणी प्रेषित की थी.


गैर-भाजपा राजनैतिक दलों का आरोप है कि भाजपा ध्रुवीकरण के लिए इस विषय को उठाती रहती है. सत्तारूढ़ केंद्र सरकार द्वारा राम मंदिर और अनुच्छेद 370 के वायदे को पूरा करने के बाद ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि वह हिंदुत्व, हिन्दू वोट के लिए समान नागरिक संहिता को देश में लागू करना चाहती है. ये समझने का विषय है कि आज़ादी के तुरंत बाद तो भाजपा नहीं थी, तब हिंदुत्व साम्प्रदायिकता जैसी कोई स्थिति भी नहीं थी तब उस समय क्यों इसका विरोध किया गया? सभी नागरिकों के एक अधिकार हो जाने का विरोध क्यों? शरीयत की बात करने वाला कट्टरपंथी मुसलमान क्या सभी कार्य शरीयत के अनुसार ही करता है? किसी मुसलमान द्वारा अपराध किये जाने पर शरीयत के अनुसार उसको कोड़े मारना, हाथ काटना, पत्थर मारना, फांसी पर लटकाना आदि जैसी सजाएँ दी जाती हैं? कुरान में बाल विवाह प्रतिबंधित है. उसके अनुसार विवाह केवल बालिग स्त्री-पुरुष के बीच हो सकता है. जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार ख्याल-उल-बलूग अर्थात बाल विवाह का प्रावधान है. कुरान के अनुसार तलाक बिना अदालती हस्तक्षेप के संभव नहीं जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार मुस्लिम मर्द को अपनी मर्जी से तलाक लेने का अधिकार है. कुरान विधवा विवाह और पुनर्विवाह को मान्य करती है जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ऐसा प्रतिबंधित करता है. ऐसे एक-दो नहीं अनेक उदाहरण हैं जिनके आधार पर न ही शरीयत का सम्पूर्ण पालन होता दिखता है न ही कुरान और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में समन्वय दिखता है. ऐसे में ये लोग किस शरीयत की दुहाई देते हुए समान नागरिक संहिता का विरोध करने में लगे हैं? क्यों इस विषय पर मुस्लिमों के एकमत होने का इंतजार किया जाता है? क्यों उनको अंतरात्मा की आवाज़ सुनने के लिए कहा जाता है? सवाल उठता है कि क्या सन 1955-56 में हिन्दू कोड बिल लागू करते समय हिन्दुओं की भावनाओं का ख्याल रखा गया था? क्या उत्तराधिकार, बाल विवाह आदि पर नियम बनाते समय हिन्दुओं की अंतरात्मा की आवाज़ को सुनने का प्रयास किया गया था?


आखिर चन्द गैरजिम्मेवार लोगों के विरोध के चलते कब तक अपरिहार्य विधान को लागू होने से रोका जाता रहेगा? समान नागरिक संहिता किसी एक समुदाय विशेष के विवाह अथवा तलाक की बात नहीं करती वरन एक महिला को भी नागरिक के रूप में अधिकार प्रदान किये जाने की बात करती है. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आवश्यकता इसकी है कि सभी लोग हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई आदि धार्मिक मानसिकता से ऊपर उठकर विशुद्ध भारतीय नागरिक की मानसिकता से विचार करें. देश में एक ऐसी संहिता का निर्माण करने में योगदान दें जो सभी समुदायों पर समान रूप से लागू हो, सभी को भारतीयता की पहचान कराती हो.






 

10 अक्टूबर 2022

संघ प्रमुख और इमाम की मुलाकात का स्वागत हो

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा पिछले दो महीनों में दो मुलाकातें मुस्लिम समाज के प्रमुख व्यक्ति से कर लेने के सियासी मकसद खोजे जाने शुरू कर दिए गए हैं. मुस्लिम समुदाय से मुलाकात के सियासी मकसद भाजपा या फिर संघ के सन्दर्भों में ही होता है, अन्य किसी दल या संगठन के सन्दर्भ में नहीं. मोहन भागवत की मुलाकात ने तब सियासी हलचल मचा दी जबकि उन्होंने अखिल भारतीय इमाम संगठन के प्रमुख डॉ. उमैर अहमद इलियासी से दूसरी मुलाकात की. मोहन भागवत ने दिल्ली की एक मस्जिद में मरहूम मौलाना जमील इलियासी की मजार पर पहुँच कर फूल चढ़ाए. इसके बाद वहीं मस्जिद के बंद कमरे में उनकी और मस्जिद के इमाम डॉ. उमर अहमद इलियासी की लगभग एक घंटे तक चली गुफ्तगू ने सियासी पारे में हलचल पैदा कर दी. इसमें गर्मी उस समय बढ़ गई जबकि भागवत से मुलाकात के बाद इलियासी ने मंत्रमुग्ध हो उनकी तारीफ करते-करते उन्हें राष्ट्रपिता कह दिया.


देखा जाये तो यह कोई पहला अवसर नहीं है जबकि मोहन भागवत ने किसी मुस्लिम धर्मगुरु अथवा मुस्लिम नेता से मुलाकात की हो. इससे पहले वे पूर्व सांसद शाहिद सिद्दीकी, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई कुरैशी, पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति जमीरुद्दीन शाह और कारोबारी सईद शेरवानी से भी मुलाकात कर चुके हैं. इन मुलाकातों के सन्दर्भ में यदि संघ की गतिविधियों को मुस्लिम समाज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो संघ ने मुस्लिम समुदाय में अपनी सकारात्मक पहुँच बनाने के लिए मुस्लिम राष्ट्रीय मंच बनाया हुआ है. इसके अलावा संघ ने मुस्लिम और ईसाई समुदाय के लोगों से संवाद के लिए एक समिति भी बना रखी है. जिसमें इंद्रेश कुमार, कृष्ण गोपाल, मनमोहन वैद्य और रामलाल जैसे वरिष्ठ व्यक्तित्व शामिल हैं.




समाज में, राजनैतिक हलकों में इन मुलाकातों को लेकर एक आमराय यही बनी हुई है कि संघ की तरफ से मुस्लिमों के दिलों में पैठ बनाने के लिए ऐसी मुलाकातें की जा रही हैं. यदि संघ की इन सहयोगी संस्थाओं का या फिर मुलाकातों का निहितार्थ मुस्लिम समाज में उसकी पैठ बनाने को लेकर ही माना जाये तो प्रथम दृष्टया इसमें बुराई क्या है? देश की आज़ादी के बाद के बरसों में राजनैतिक दलों ने मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए अनेकानेक कदम उठाये. मुस्लिम समाज को महज वोट-बैंक मानकर ही तमाम राजनैतिक दल अपनी-अपनी राजनैतिक गोटियाँ सजाते रहे. भाजपा या फिर संघ को गैर-भाजपाई, गैर-संघी मानसिकता के दलों, संगठनों ने मुसलमानों की निगाह में दुश्मन, आक्रामक, हत्यारा जैसा बना दिया है. रामजन्मभूमि मामले में विवादित ढाँचा गिराए जाने के बाद से संघ-विरोधी दलों को जैसे एक सूत्र हाथ लग गया था. उनके द्वारा विवादित ढाँचे की घटना को आधार बनाकर अनेकानेक चुनावों में खुलेआम संघ को, भाजपा को मुस्लिम समाज का दुश्मन और खुद को उनका हितैषी बताया जाता.


इस तरह की घटनाओं, मंचों से संघ को मुस्लिम विरोधी बताये जाने के बयान आदि से निश्चित ही सामाजिक वातावरण नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है. ऐसे में समाज विरोधी तमाम ताकतों को यह डर है कि यदि मुस्लिम समाज में संघ अपनी सकारात्मक पहुँच बनाने में सफल हो गया तो न केवल उन तमाम दलों, संगठनों की असलियत सामने आ जाएगी बल्कि उनकी राजनैतिक जमीन भी खिसक जाएगी.   


मोहन भागवत की मुलाकात का मकसद यदि संघ की छवि को मुस्लिम समाज की निगाह में बदलना है, तो यह समाज की बेहतरी के लिए एक सकारात्मक कदम है. ऐसा इसलिए क्योंकि संघ को इसके लिए भी बदनाम किया जाता है कि वह इस देश को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहता है. समझने वाली बात ये है कि भारत किसी एक राज्य का, एक संस्कृति का, एक भाषा का नाम नहीं है वरन यह अनेक राज्यों, अनेकानेक संस्कृतियों, भाषाओं का समुच्चय है. इसे किसी एक धर्म, मजहब के रूप में बदलना सहज नहीं. इन स्थितियों में, छवियों में परिवर्तन तभी लाया जा सकता है जबकि खुद मुस्लिम समाज संघ की बात सुनने को, उसके विचार जानने को आगे आये. इसके प्रति मुस्लिम समाज को अपनी सोच में, अपनी कट्टरता में बदलाव करने की आवश्यकता है. इसके लिए भी कोई बाहर से आकर काम नहीं कर सकता बल्कि खुद मुस्लिम समाज के भीतर से किसी व्यक्ति को सामने आना होगा.


मुसलमानों का संघ-विरोधी रवैया सिर्फ संघ के लिए ही नुकसानदायक नहीं है बल्कि वह पूरे समाज के लिए घातक है. वे केवल संघ को ही अपना विरोधी या दुश्मन न मानकर समस्त हिन्दुओं के प्रति ऐसी धारणा बनाये हैं. आये दिन छोटी से छोटी बात पर होती हिन्दू-मुस्लिम झड़पें, किसी-किसी राज्य में जानलेवा हिंसा के पीछे यही मानसिकता काम करती है. इनके उदाहरण समय-समय पर सामने आते ही रहते हैं. ऐसे में यदि मोहन भागवत की पहल पर मुस्लिम समाज से किसी ने एक सकारात्मक कदम बढ़ाया है तो उसमें किसी तरह की राजनैतिक मंशा न देखते हुए उस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए. गैर-संघ मानसिकता वाले दलों और संगठनों ने इस तरह की मुलाकातों को सियासी रंग देते हुए इसे महज चुनावों के सन्दर्भ में सीमित कर दिया है. ऐसे लोगों का कहना है कि यदि संघ के, मोहन भागवत के प्रयासों से हिन्दू और मुस्लिम समाज के बीच बनी दूरी कम होती है तो इसका सबसे बड़ा फायदा भाजपा को आने वाले 2024 के लोकसभा चुनाव में मिल सकता है. स्पष्ट है कि गैर-संघ, गैर-भाजपा दल, संगठन नहीं चाहेंगे कि संघ के, मोहन भागवत के ऐसे कोई भी प्रयास फलीभूत हों, जिनसे हिन्दू और मुस्लिम समाज की दूरी मिटे.


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अवधारणा सबका साथ, सबका साथ वाली रही है. इसी तरह उनके द्वारा इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से दिए गए भाषण में पाँच प्रण की बात कही गई. इन पाँच प्रणों में उनका सबसे पहला सपना विकसित भारत का है, जिसके लिए उन्होंने एकता और एकजुटता की बात कही है. यह तभी संभव है जब मुस्लिम आबादी का संशय संघ और भाजपा को लेकर दूर हो. अगर ऐसा होता है तो निश्चित ही केन्द्र सरकार को अपनी कूटनीति, आर्थिक नीति, राजनीति को चलाना सहज होगा. ऐसे में न केवल समाज की बेहतरी के लिए बल्कि स्वयं मुस्लिम समुदाय के प्रति बनते जा रहे नकारात्मक माहौल को दूर करने के लिए भी संघ प्रमुख मोहन भागवत और इमाम डॉ. उमैर अहमद इलियासी की मुलाकात का स्वागत होना चाहिए. मुस्लिम समाज को ऐसी और भी मुलाकातों के प्रति सकारात्मक रुख अपनाये जाने की आवश्यकता है.   





 

31 मई 2022

मुस्लिम समाज को सकारात्मक पहल करने का अवसर

काशी को केन्द्र और उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार होने के बाद से भगवान शिव की नगरी नहीं स्वीकारा गया है बल्कि महादेव की इस नगरी का जिक्र सनातन संस्कृति में अनादि काल से देखने को मिलता है. विगत कई वर्षों से जिस तरह से रामलला की जन्मभूमि को लेकर इस देश में विवाद मचा रहा, वैसा ही कुछ मसला काशी में ज्ञानवापी को लेकर बना रहा. अब जबकि विगत दिनों अदालत के आदेश के बाद हुए सर्वे से मस्जिद में यह स्पष्ट रूप से देखने में आया कि वुजू करने की जगह पर शिवलिंग स्थापित है. शिवलिंग जैसे पावन स्थल को, श्रद्धा के केन्द्र को किसने वुजू करने के स्थान में परिवर्तित किया होगा, ये अलग चर्चा का विषय है मगर इस बात से शायद ही कोई इनकार कर सके कि ऐसा करने के पीछे तात्कालिक आतातायियों में मन में, दिल में हिन्दुओं और उनके आराध्यों के विरुद्ध नफरत का होना रहा होगा. 


ऐसा समझने के लिए किसी राकेट साइंस की आवश्यकता नहीं है. देश भर में सैकड़ों की संख्या में हिन्दुओं के, सनातनधर्मियों के आस्था के केन्द्रों को, उनके आराध्यों को क्षत-विक्षत किया गया. बहुतेरे मंदिरों, श्रद्धा केन्द्रों का ध्वंस करके उन आतातायियों ने अपने मजहबी स्थलों का निर्माण किया. कालांतर में सनातनधर्मियों के सहिष्णु व्यवहार और सरकारों के तुष्टिकरण नीति के कारण ऐसे स्थलों पर विवाद भले ही बना रहा हो मगर कब्ज़ा मुस्लिम समाज ने बनाये रखा.


कहते हैं कि इतिहास खुद को दोहराने का काम करता है. पूर्व में सरकारों के सामने, इतिहास लेखन करने वालों के सामने, इतिहास पढ़ाने वालों के सामने, पुरातत्त्व विभाग वालों के सामने, धार्मिक-मजहबी व्यक्तित्वों के सामने क्या स्थिति रही होगी कि उनके द्वारा भी सत्य को सामने लाकर विवादों को समाप्त करने का प्रयास नहीं किया गया. बहरहाल, अब जबकि अदालत के आदेश पर हुए सर्वे में ज्ञानवापी में शिवलिंग मिला है. यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य ये है कि ऐसा होने के चिन्ह मात्र नहीं मिले हैं, कोई ध्वंस अवशेष नहीं मिले हैं बल्कि स्पष्ट दृष्टिगोचर शिवलिंग मिला है. ऐसी स्थिति के बाद किसी तरह के विवाद की कोई गुंजाइश नहीं बचती थी मगर इसके बाद भी मुस्लिम पक्ष की तरफ से ऐसा किया गया.




एक पल को ये स्वीकार लिया जाये कि मुस्लिम समाज बहुत लम्बे समय से उस स्थान पर अपने मजहबी कृत्य को अंजाम देता आ रहा था, तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि वर्तमान में जो प्रमाण मिला है उसे सिरे से नकार दिया जाये. इस स्थान पर सन 1993 तक नियमित रूप से श्रृंगार गौरी की पूजा होती थी, बाद में सन 1996-97 में हिन्दू और मुस्लिम, दोनों धर्मों के त्योहार एक ही दिन पड़ गए थे. रामजन्मभूमि मामले के चलते पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा की दृष्टि से यहाँ केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की एक टुकड़ी की तैनाती कर दी. बाद में यही टुकड़ी यहाँ स्थायी हो गई. समय के गुजरने के साथ श्रृंगार गौरी जाने वाले रास्ते को भी पुलिस-प्रशासन ने बंद कर दिया. ऐसा होने के बाद मामला अदालत पहुँचा तो अदालत ने वासंतिक नवरात्रि के चौथे दिन दर्शन-पूजन करने का आदेश दिया. अदालत के आदेश के बाद श्रृंगार गौरी की साल में एक दिन वासंतिक नवरात्रि की चतुर्थी को दर्शन-पूजन की अनुमति प्रशासन ने दी. इसके बाद गत वर्ष 2021 में पाँच महिलाओं ने श्रृंगार गौरी की नियमित पूजा-अर्चना की माँग को लेकर वाराणसी के सिविल जज सीनियर डिवीजन रवि कुमार दिवाकर की अदालत में याचिका दायर की. इन महिलाओं ने अदालत से ये माँग भी की थी कि नंदी, गणेश के साथ अन्य देवताओं की स्थिति जानने के लिए एक कमीशन बनाया जाए. सिविल जज सीनियर डिवीजन की अदालत ने इसी के बाद एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किया और कमीशन की कार्यवाही, वीडियोग्राफी की कार्यवाही पूरी कर रिपोर्ट देने के लिए कहा.


रिपोर्ट के बाद जब सच्चाई सामने आ ही गई थी तो मुस्लिम पक्ष को एक कदम आगे आकर उस स्थल पर पूर्व की भांति हिन्दुओं को पूजा-दर्शन करने की पहल की जानी चाहिए थी. ऐसा तो हुआ नहीं बल्कि इसके उलट जाकर शिवलिंग को फव्वारा बताये जाने की, औरंगजेब को दयालु बताये जाने की, तमाम मंदिरों के नीचे मस्जिद होने की अनर्गल बयानबाजियाँ होने लगीं. देश में एक तरफ सरकारें, अनेक बुद्धिजीवी, संस्थाएँ हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए जी-जान से लगी रहती हैं. बात-बात पर गंगा-जमुनी संस्कृति का उदाहरण दिया जाता है. बहुत से मुस्लिम व्यक्तित्वों को देश में भय लगने लगता है. असहिष्णुता बढ़ती दिखाई देने लगती है मगर जब भी मुस्लिम समाज के सामने इस तरह का कोई भी अवसर आता है जबकि वे सौहार्द्र, समन्वय का उदाहरण दे सकते हैं, उसी समय उनकी तरफ से अनर्गल बयान दिए जाने शुरू कर दिए जाते हैं.


इसे लोग भले ही सार्वजनिक रूप से न स्वीकारें मगर सत्य यही है कि विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं ने देश में हिन्दू धार्मिक स्थलों, सनातनधर्मी आस्था केन्द्रों को नष्ट करके उन पर अपने मजहब की इमारतों का निर्माण किया है. अब जबकि ज्ञानवापी में स्पष्ट रूप से शिवलिंग मिला है, कुतुबमीनार और ताजमहल की चर्चा जनमानस के बीच टहलने लगी है, तब मुस्लिम समुदाय को अपने सहिष्णु होने का उदाहरण देना चाहिए. अभी तक किसी भी मुस्लिम संगठन ने खुलकर ज्ञानवापी में स्थापित शिवलिंग पर कोई सकारात्मक बयान नहीं दिया है. किसी मुस्लिम बुद्धिजीवी, किसी मुस्लिम साहित्यकार ने, किसी मुस्लिम फ़िल्मी कलाकार ने अथवा किसी मुस्लिम राजनीतिज्ञ ने हिन्दुओं के पक्ष में कोई बयान या कोई अपील नहीं की है. एक मुस्लिम राजनीतिक व्यक्ति शिवलिंग के मिलने के दिन से बयान देने में लगे हैं, तो वे भी भड़काऊ हैं, मुस्लिम समाज को बरगलाने वाले हैं.


ज्ञानवापी पर जिस तरह से गैर-मुस्लिम नागरिकों द्वारा समर्थन आ रहा है, उसी तरह से देश के समस्त मुस्लिम नागरिकों को भी संगठित होकर इसका समर्थन करना चाहिए. यदि इसके बाद भी मुस्लिम नेताओं, मुस्लिम मजहबी संगठनों, मुस्लिम बुद्धिजीवियों द्वारा समर्थन नहीं किया गया तो न केवल आपसी समन्वय, सौहार्द्र कमजोर होने की आशंका है बल्कि अन्य स्थलों पर विवाद बढ़ना भी स्वाभाविक है.


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26 अक्टूबर 2021

इंडोनेशिया के पूर्व राष्‍ट्रपति सुकर्णो की बेटी सुकमावती ने इस्‍लाम छोड़ हिन्दू धर्म अपनाया

इंडोनेशिया के पूर्व राष्‍ट्रपति सुकर्णो की बेटी सुकमावती सुकर्णोपुत्री एक बड़े घटनाक्रम में इस्‍लाम धर्म छोड़कर हिन्दू धर्म अपनाने जा रही हैं. बताया जा रहा है कि आज यानि मंगलवार, 26 अक्तूबर 2021 को सुकमावती हिंदू धर्म अपनाएंगी. इसके लिए बाली में सुकर्णो सेंटर हेरिटेज एरिया में एक पारंपरिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया है. बाली में हिंदू धर्म से जुड़े कई मंदिर हैं और दुनियाभर से लोग इसे देखने आते हैं. इंडोनेशिया के बाली द्वीप पर बड़ी संख्‍या में हिन्दू भी रहते हैं. यहाँ कई मंदिर बने हैं और रामायण का मंचन होता है. सुकमावती सुकर्णोपुत्री सुकर्णो की तीसरी बेटी हैं और पूर्व राष्ट्रपति मेगावती सुकर्णोपुत्री की छोटी बहन हैं. वह इंडोनेशियाई नेशनल पार्टी की संस्थापक रह चुकी हैं.


सीएनएन इंडोनेशिया की रिपोर्ट के मुताबिक सुकमावती के हिन्दू धर्म ग्रहण करने के पीछे  उनकी दादी इदा अयू नयोमान राई श्रीमबेन काफी हद तक वजह बनी हैं. मीडिया को सुकर्णोपुत्री के फैसले के बारे में बताते हुए उनके वकील ने कहा कि सुकर्णोपुत्री को हिन्दू धर्म का काफी ज्ञान है. वह हिंदू धर्मशास्त्र के सभी सिद्धांतों और अनुष्ठानों से भी अवगत हैं. सुकमावती अभी 70 साल की हैं और सुकर्णो की तीसरी बेटी हैं।


उनके हिन्दू धर्म ग्रहण करने की चर्चा इसलिए भी और है क्योंकि इंडोनेशिया में इस्‍लाम सबसे बड़ा धर्म है. यही नहीं दक्षिणपूर्वी एशियाई देश में दुनिया की सबसे ज्‍यादा मुस्लिम आबादी रहती है. सुकर्णोपुत्री बाली की यात्रा के दौरान अकसर हिंदू धार्मिक समारोहों में शामिल होती रही हैं. वह हिंदू धार्मिक हस्तियों से भी बातचीत करती हैं. अब शुद्धि वदानी नाम के कार्यक्रम में वह अपना धर्म परिवर्तन करेंगी. उनके रिश्तेदारों को भी इस फैसले से कोई आपत्ति नहीं है. रिश्तेदारों का कहना है कि सुकर्णोपुत्री काफी समय से हिंदू धर्म अपनाना चाह रही थीं.




23 नवंबर 2020

नजरिया बदलने से आएगा साम्प्रदायिक सद्भाव

राष्ट्रीय सांप्रदायिक सद्भाव प्रतिष्ठान द्वारा 19-25 नवम्बर 2020 तक सांप्रदायिक सद्भाव सप्ताह का आयोजन कर रहा है. इसके लिए उसके द्वारा देश भर में विभिन्न आयोजन उसके द्वारा करवाए जा रहे हैं. इसकी स्थापना 19 फरवरी 1992 को की गई थी. इसका उद्देश्य देशभर में सांप्रदायिक सद्भावना की स्थापना करना है. सवाल उठता है कि सांप्रदायिक सद्भाव है क्या? आखिर देश में आये दिन साम्प्रदायिकता, सांप्रदायिक सद्भाव की बात उठती क्यों है? यहाँ समझना होगा कि सांप्रदायिक सद्भाव का तात्पर्य किसी भी स्थान पर विभिन्न धर्मों के लोगों का एकसाथ, मिलजुल कर, अच्छी भावना के साथ रहने से लगाया जाता है. देखा जाये तो यह सांप्रदायिक सद्भाव की विस्तृत दृष्टि है मगर देश में जब भी सांप्रदायिक सद्भाव की चर्चा की जाती है तो सिर्फ हिन्दू और मुसलमान से संदर्भित करके देखा जाने लगता है. जैसे ही साम्प्रदायिकता की बात होती है तो उसे बिना किसी जाँच-पड़ताल के हिन्दू, मुसलमान से जोड़ दिया जाता है. जैसे ही साम्प्रदायिकता की चर्चा होती है वैसे ही देश भर में सबकी दृष्टि में गुजरात उभर आता है, गोधरा-काण्ड के बाद के दंगे उभर आते हैं. ये सोच या दृष्टि सांप्रदायिक सद्भाव की विस्तृत सोच के ठीक उलट है.




कोरोना के इस माहौल के बीच सभी अपनी-अपनी तरह से आयोजन को मनाने में लगे हैं मगर यहाँ भी अनेक सवाल फिर उठते हैं कि आखिर देश में सांप्रदायिक सद्भाव की आवश्यकता पड़ती क्यों है? क्यों सरकारों को ऐसे आयोजन करवाने पड़ते हैं? क्यों देशवासियों को सांप्रदायिक सद्भाव बनाये रखने सम्बन्धी शपथ दिलवाई जाती है? क्यों इन सब प्रयासों के बाद भी सांप्रदायिक सद्भाव की स्थापना नहीं हो पा रही है? क्यों साम्प्रदायिकता के नाम पर आये दिन खून-खराबा होता रहता है? क्यों साम्प्रदायिकता का तात्पर्य सिर्फ हिन्दुओं, मुसलमानों से लगाया जाता है? इन सवालों का जवाब सरकारों के पास तो कतई नहीं है. इनके जवाब खोजने के लिए हम नागरिकों को अपने आपसे बात करनी होगी. खुद के व्यवहार को, सोच को, मानसिकता को समझना होगा. ये समझने वाली बात ही है जहाँ क्षेत्र, धर्म, जाति के आधार पर सभी नागरिक बंटे हुए हों वहाँ सांप्रदायिक सद्भाव के लिए ऐसे आयोजनों का कोई महत्त्व नहीं.


एक-एक व्यक्ति को खुद में बदलाव लाना होगा. सैद्धांतिक रूप से यह बात बहुत सुन्दर लगती है मगर व्यावहारिक रूप में इस पर अमल कर पाना सहज नहीं होता. जब तक व्यक्ति के अन्दर से खुद को क्षेत्र, धर्म, जाति अथवा किसी अन्य कारण से श्रेष्ठ समझने की प्रवृत्ति समाप्त नहीं होती तब तक सांप्रदायिक सद्भाव जैसी स्थिति व्यवहार में बनती समझ नहीं आती. पूरे देश में इक्का-दुक्का जो भी मामले सांप्रदायिक सद्भाव के सामने आते हैं, वे ऐसे ही व्यक्तियों के कारण संभव हैं जिन्होंने अपनी सोच को, अपनी मानसिकता को समझ लिया है, बदल लिया है. यह सबसे प्रमुख है कि जब तक इन्सान स्वयं को बदलने का भाव नहीं रखता किसी सरकार के, किसी प्रतिष्ठान के वश में नहीं कि वह सांप्रदायिक सद्भाव की स्थापना कर दे.


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15 अक्टूबर 2020

गंगा-जमुनी संस्कृति का संकुचित ताला खोलो अब

इधर तनिष्क का एक विज्ञापन देखने को मिला और उसका विरोध भी साथ-साथ दिखाई देता रहा. विज्ञापन की अच्छाई-बुराई को एक किनारे लगा दिया जाये तो एक बात आज तक समझ नहीं आई कि समाज में कुछ लोगों को ये कीड़ा कहाँ से काट लेता है कि वे गंगा-जमुनी तहजीब के नाम पर हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों की वकालत शुरू कर देते हैं? क्या हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द्र के लिए आवश्यक है कि दोनों के बीच रोटी-बेटी का रिश्ता रखा जाये? यदि ऐसा करना आवश्यक है तो फिर रोटी-बेटी का रिश्ता बनाने में बेटी सदैव हिन्दू की ही क्यों नजर आती है? ये तनिष्क का विज्ञापन हो या फिर होली का कोई विज्ञापन, सभी जगह हिन्दू बेटी ही निशाने पर रखी जाती है. आखिर तनिष्क का ये विज्ञापन मुस्लिम को लेकर बनाया-दिखाया जाना अनिवार्य था तो उन्हीं के रीति-रिवाजों, चाल-चलन के साथ भी तो बनाया जा सकता था. उनकी मजहबी मान्यताएँ भी विज्ञापन में दिखाकर सोने का, ज्वेलरी का प्रचार किया जा सकता था, मगर ऐसा नहीं किया गया.



ये आज से नहीं, अचानक से नहीं बल्कि बहुत सोची-समझी रणनीति के तहत होता आ रहा है. इसे भी विवाद का विषय बना दिया जाता है मगर आये दिन अब घटनाएँ सबूत के साथ सामने आ रही हैं जहाँ कि हिन्दू बेटी पहले किसी मुस्लिम लड़के के प्यार में पागल हो जाती है फिर वो धर्म परिवर्तन करके निकाह करती है. कालांतर में उसके शोषण के वीडियो सोशल मीडिया में दिखाई देने लगते हैं. किसी-किसी खबर में, घटना में बेटी की लाश भी मिलती है. आखिर ये क्या है, क्यों है? यह बात किसी समय में आतंकियों के सन्दर्भ में कही जाती थी कि मुसमलानों को आतंकी के रूप में ही क्यों देखा जाता है? इसके जवाब के रूप में यह आम धारणा बनी हुई थी कि भले ही हर मुसलमान आतंकी नहीं मगर पकड़े जाने वाला हर आतंकी मुस्लमान ही निकलता है. इधर आतंक का ये नया चेहरा लव जिहाद के रूप में सामने आया है.


समझ नहीं आता कि शासन-प्रशासन कहाँ तक, किस बात की निगरानी करे, किस-किसके पीछे पहरेदारों की तरह भागती रहे. ऐसी किसी भी मानसिकता के लिए, किसी भी घटना के लिए परिवार वाले, समाज के लोग भी जिम्मेवार हैं. आखिर क्यों एक परिवार अपने बच्चों के चाल-चलन, उनकी मानसिकता पर नजर नहीं रख पा रहा है? आखिर क्यों किसी हिन्दू परिवार में उनके बच्चों में उनके धर्म, संस्कृति, सभ्यता के प्रति सकारात्मक वातावरण देखने को नहीं मिल रहा है? क्यों हिन्दू परिवारों के बच्चे लगातार अपनी धार्मिक मान्यताओं से विमुख होते जा रहे हैं? इन सवालों को समाज में, अपने परिवार में परखने की आवश्यकता है. ये विज्ञापन हो अथवा फ़िल्में, कोई कहानी हो या फिर किसी भी तरह का सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण सभी के पीछे कोई कुत्सित मानसिकता काम कर रही है. इस मानसिकता का एकमात्र उद्देश्य हिन्दू धर्म का मखौल बनाना, उसकी जड़ों को खोखला करना ही है.


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26 मार्च 2020

विरोधी मानसिकता

सीएए को लेकर देश भर में तमाम राजनैतिक दलों के साथ-साथ मुस्लिम भी विरोध में हैं. देश भर में इसे लेकर हिंसा, उपद्रव होते रहे हैं. कोरोना वायरस की महामारी के चलते दिल्ली में सड़क जाम किये बैठे शाहीन बाग़ के विरोधियों को भी वहाँ से हटा दिया गया है. अब खुले रूप में कहीं भी इसका विरोध नहीं दिखाई दे रहा है. वर्तमान में ये विरोध ऊपरी तौर पर भले ही देश में न दिखाई दे रहा हो मगर मुस्लिम समुदाय के लोगों के दिमाग से विरोधी मानसिकता अभी भी गई नहीं है. अभी हाल में ऐसी घटनाएँ सामने आईं हैं जिनमें ऐसा देखने को मिला है. घटनाएँ भी सामान्य नहीं कही जा सकती हैं. 

हाल-फिलहाल हमारी अपनी निगाह से दो घटनाएँ ऐसी सामने आई हैं जिनमें सीएए का विरोध मुसलमानों में दिखाई दे रहा है, जबकि समय और स्थिति के अनुसार ऐसा किया जाना शर्मनाक कहा जाना चाहिए. ऐसी ही एक घटना में जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर अबरार अहमद ने अपने गैर-मुस्लिम विद्यार्थियों को फ़ेल कर दिया था. इसका कारण उन विद्यार्थियों का सीएए का समर्थन करना रहा है. इसे उन्होंने स्वयं अपने एक ट्वीट के द्वारा व्यक्त किया.

अपने ट्वीट में उन्होंने कहा “15 गैर मुस्लिमों को छोड़कर मेरे सभी छात्र पास हो गए हैं. अगर आप सीएए के खिलाफ आंदोलन करते हैं तो मेरे पास सीएए के पक्ष में  55 छात्र हैं. अगर आंदोलन खत्म नहीं हुआ तो बहुमत आपको सबक सिखाएगा. कोरोना के चलते आपके आंदोलन के चिह्न मिट गए हैं. मैं हैरान हूं कि आपको मुझसे नफरत क्यों है?


मामला तूल पकड़ने के बाद यूनिवर्सिटी ने उनको सस्पेंड कर दिया और जांच शुरू हो गई है. समझने वाली बात है कि यदि शिक्षक ही इसी तरह की विभेदपूर्ण मानसिकता रखेंगे तो विद्यार्थियों के साथ न्याय कैसे हो सकेगा? प्रशासन और जनता को खासतौर पर अभिभावकों को अपने आस-पास ऐसी बातों का संज्ञान लेना चाहिए.

इसी तरह एक अन्य घटना में कोरोना वायरस संक्रमण से रोकने के लिए विभिन्न समुदाय, संस्था के लोग मास्क का, दवाइयों का, सेनेटाइजर आदि का वितरण कर रहे हैं. इसी में मुस्लिम समुदाय के कुछ युवकों की तस्वीर सामने आई है जिसमें कि वे कोरोना से बचाव के लिए मास्क का वितरण कर रहे हैं. विभेद इस वितरण से नहीं अपितु उस मानसिकता से है जो इसके पीछे दिख रही है. उनके द्वारा वितरित किये जाने मास्क में No CAA छपा हुआ है. सोचने वाली बात है कि आखिर महामारी के इस संकट भरे समय में भी उनकी मानसिकता सहायता करने की बनी तो भी एक विभेद के साथ.



सरकार को, प्रशासन को ऐसी घटनाओं पर निगाह डालते हुए कार्यवाही करनी चाहिए जिससे सामाजिक सद्भाव न बिगड़ने पाए. 

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01 मार्च 2020

स्थितियाँ बदली नहीं हैं एक साल बाद भी

ठीक एक वर्ष पूर्व पूरा देश अपने जांबाज़ अभिनन्दन के सकुशल स्वदेश वापसी की प्रार्थना कर रहा था. पाकिस्तान के एक विमान को मार गिराने के बाद के क्रम में अभिनन्दन पाकिस्तानी सीमा में गिर पड़े. पाकिस्तान द्वारा उनको कैद किया गया. बाद में भारत की तरफ से जबरदस्त कूटनीतिज्ञ दवाब बनाया गया. इसका सुखद परिणाम ये हुआ कि अभिनन्दन की घर वापसी एक मार्च को हो गई. 



आज, ठीक एक साल बाद पूरा देश दिल्ली में हुई हिंसा के पक्ष-विपक्ष में लगा हुआ है. नागरिकता संशोधन अधिनियम को लेकर चलते विरोध के पीछे हिंसा की मानसिकता पनपती रही. अंततः दिल्ली हिंसा की चपेट में आ गई. लगभग तीन दर्जन लोग मारे गए. इसमें आम जनता शामिल है, साथ ही पुलिस के, आई बी के जवान भी चपेट में आये. सैनिकों पर तेजाब फेंका गया. 

फिलहाल कुछ शांति सी समझ आ रही है, वास्तविकता क्या है, ये दंगाई ही जानें. एक वर्ष पहले हम सीमा पार के दुश्मन से लड़ रहे थे. ठीक एक वर्ष के अंतराल में हम सीमा के भीतर के दुश्मनों से संघर्ष कर रहे हैं. स्थितियाँ बदली नहीं हैं, एक साल बाद भी. 

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27 फ़रवरी 2020

हिंसात्मक चिंगारी भड़कने का डर हमेशा रहेगा

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के भारत आगमन के समय ही दिल्ली में हिंसात्मक गतिविधियों का होना एक तरह का षड्यंत्र समझ आया मगर इसके पीछे खतरनाक कदम, मंसूबे छिपे होंगे ये अंदाज शायद किसी को नहीं रहा होगा. जबरदस्त उत्पात के बाद, खुलेआम कत्लेआम जैसी स्थिति बनाये रखने के बाद जब दिल्ली में दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश दिए गए, तब हालात नियंत्रण में आते दिखे. इस नियंत्रित स्थिति के बाद स्थिति की भयावहता सामने आने लगी है. पुलिस के एक हेड कांस्टेबल की मृत्यु इसी हिंसात्मक गतिविधि में हुई. उसके साथ ही एक आईबी अधिकारी की हत्या किये जाने और उनकी लाश को नाले में फेंक दिए जाने की खबर सामने आई. डॉक्टर्स के द्वारा पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट के अनुसार उस अधिकारी के लगभग हर अंग में चाकुओं से वार किया गया है. आंतें निकाल ली गईं हैं. पूरे शरीर में अनगिनत घाव हैं. इस तरह की जघन्य हत्या आखिर किसलिए? इस हत्या के पीछे आम आदमी पार्टी के एक मुस्लिम पार्षद को आरोपी माना जा रहा है. मीडिया द्वारा, सोशल मीडिया पर अपलोड विभिन्न वीडियो द्वारा जानकारी मिली कि इस हत्या तथा उत्पात के पीछे यही मुस्लिम पार्षद का हाथ है. उसकी छत से पेट्रोल बम फेंकने, पत्थर फेंकने के कई वीडियो सामने आये. इसी के साथ-साथ जब मीडिया द्वारा सम्बंधित जगह का मुआयना किया गया तो छत पर पेट्रोल, तेजाब, पत्थर का व्यापक जखीरा पकड़ में आया.


सोचने वाली बात है कि ये हिंसा महज CAA का विरोध है? क्या CAA में ऐसे प्रावधान हैं जिनके चलते देश के या कहें कि दिल्ली के मुसलमान इस कदर हिंसा पर उतारू हो गए. पिछले दो महीने से अधिक समय से शाहीन बाग़ में दिया जा रहा धरना, सड़क का अवरोध शायद इनके लिए पर्याप्त नहीं था. न्यायालय द्वारा, केन्द्र सरकार द्वारा, दिल्ली सरकार द्वारा पूरे मामले को गंभीरता से नहीं लिया गया. दो महीने से अधिक समय तक किसी सड़क को रोके रखना, इस्लाम समुदाय के प्रमुखों द्वारा लगातार उत्तेजक भाषण देना आदि इनको नहीं दिखाई दिया. दिन-प्रतिदिन मामला अन्दर ही अन्दर सुलग तो रहा ही था साथ ही किसी बड़े हमले की, हिंसात्मक गतिविधि की योजना भी बनाई जा रही थी. यही कारण है कि इसके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति के देश में रहने का समय चुना गया. सोचा गया होगा कि इस बहाने अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में भी ये बात फ़ैल जाएगी कि केन्द्र सरकार किसी राष्ट्राध्यक्ष के समय अपने देश की स्थिति को नियंत्रित नहीं रख सकी. इसके साथ-साथ CAA के प्रति भी एक तरह की नकारात्मकता वैश्विक स्तर पर फ़ैल जाएगी. इसी मंसूबे के चलते हिंसा का आरम्भ हुआ.

इस हिंसा ने लाखों-करोड़ों रुपये का नुकसान तो किया ही साथ ही दो दर्जन से अधिक इंसानों को भी अपनी चपेट में निगल लिया. इससे अधिक नुकसान एकबार फिर उस विश्वास का हुआ जो विगत कई वर्षों से सभी के द्वारा समय-समय पर बनाया जाता रहता है. एक बार फिर आपसी सद्भाव, समन्वय की उस स्थिति की हत्या हुई है जिसे अभी हाल में बड़ी मुश्किल के साथ बनते, स्थापित होते महसूस किया जा रहा था. दिल्ली के दिलवाले मतदाताओं को बुद्धिजीवी बताया जा रहा था और जिस पार्टी को व्यवस्था परिवर्तन करने के लिए आया हुआ बताया जा रहा था, उसके सदस्यों द्वारा इस तरह के जघन्य कृत्य में शामिल होने ने भरोसे का ही खून किया है. जो लोग यह कहते नहीं थकते हैं कि किसी के बाप का नहीं है हिन्दुस्तान, वे भी इस हिन्दुस्तान को खून से लाल करने चल दिए.



अभी तक ऐसा लग रहा था कि ये लोग सिर्फ सीएए के विरोध करने में लगे हैं. काल्पनिक एनआरसी का विरोध करने में लगे हैं मगर जिस तरह के चित्र सामने आ रहे हैं, जिस तरह के वीडियो सामने आये हैं, जैसी खबरें मीडिया के द्वारा दिखाई जा रही हैं उनको देखकर लगता है कि इनका असल मंसूबा दिल्ली को भयानक दंगाक्षेत्र में बदल देना था. इना उद्देश्य समाज में बुरी तरह से कत्लेआम करना था. इनका मकसद गैर-मुस्लिमों के मन में भय पैदा करना था. देखा जाये तो ये कहीं न कहीं इसमें सफल भी हुए हैं. हाल-फिलहाल तो स्थिति नियंत्रित लग रही है मगर कितने समय तक ये स्थिति बनी रहेगी कहा नहीं जा सकता. शाहीन बाग़ का अनशन अभी भी चल रहा है. अदालत ने अगले माह तक के लिए तारीख देकर एक तरह से उनके प्रति ही समर्थन दर्शाया है. ऐसे में यदि इस विभेदकारी आग को, हिंसात्मक वृत्ति को पूरी तरह से समाप्त न किया गया तो दिल्ली में सुलगी हिंसात्मक चिंगारी भड़कने का डर हमेशा लगा रहेगा. 
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26 फ़रवरी 2020

हम CAA का समर्थन करते हैं

देश में CAA से किसी की नागरिकता नहीं जानी है, किसी की नागरिकता छीनी नहीं जा रही है, इसके बाद भी भाजपा के विपक्षी दलों का, मुसलमानों का हंगामा मचा हुआ है. समूचे कानूनी स्वरूप में बस इतना है कि इस कानून से बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता मिलने का रास्ता खुल गया है. यह कानून कहता है कि 31 दिसंबर 2014 या उससे पहले भारत आने वाले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के छह धर्मों के अल्पसंख्यकों को घुसपैठिया नहीं माना जाएगा. इससे पूर्व बना नागरिकता अधिनियम 1955 अवैध प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्राप्त करने से प्रतिबंधित करता था. इसमें इन तीन देशों के धार्मिक अल्पसंख्यक भी शामिल थे. वर्तमान संशोधन अधिनियम के बाद इन तीन देशों के हिन्दू, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी धार्मिक अल्प्संखयक रूप में माने गए हैं.


इसी बिन्दु पर देश के मुसलमानों को राजनैतिक दलों ने बरगला कर उत्पात मचवाया हुआ है. मुसलमानों में यह भ्रान्ति फैला दी गई है कि इस कानून से उनकी नागरिकता खतरे में है. असलियत में ऐसा कुछ नहीं है मगर राजनैतिक रोटियाँ सेंकने वालों ने ऐसा माहौल बना दिया है कि समूचे देश में आग लगी हुई है. 

सच से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता. कुछ भी हो हम CAA का समर्थन करते हैं. 


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25 फ़रवरी 2020

नमस्ते ट्रंप और दिल्ली हिंसा का सह-सम्बन्ध


जैसा कि मन में अंदेशा था और वैसा ही हुआ. अमेरिका राष्ट्रपति ट्रंप की भारत यात्रा को लेकर मोदी विरोधियों को विचलित किये जा रही थी. मोदी विरोधियों के लिए ऐसा कोई भी काम असहनीय हो जा रहा है जो मोदी की लोकप्रियता में किसी भी तरह की वृद्धि करते हैं. अमेरिका में संपन्न हुए हाउडी मोदी की जबरदस्त लोकप्रियता के बाद भारत में अमेरिकी राष्ट्रपति के सम्मान में संपन्न होने वाले नमस्ते ट्रंप से मोदी विरोधी बौखलाए थे. वे भली-भांति जानते थे कि यह कार्यक्रम और ट्रंप की यात्रा अद्भुत रूप से सफल होगी. इस कार्यक्रम में विरोधी प्रत्यक्ष रूप से कोई व्यवधान डालने की स्थिति में ही नहीं थे, ऐसे में उनके द्वारा अप्रत्यक्ष कदम उठाने की शंका मन में थी. अमेरिकी राष्ट्रपति के आने और दिल्ली में उत्पात मचने के अपने ही सह-सम्बन्ध हैं.


दिल्ली में दो महीने से अधिक समय से चल रहे शाहीन बाद प्रदर्शन से केन्द्र सरकार पर किसी तरह का कोई असर नहीं हो रहा था. यद्यपि इस अवरोध से आम नागरिक अवश्य परेशान था तथापि उनके द्वारा भी कोई आक्रोश कहीं व्यक्त नहीं किया गया. इधर अमेरिकी राष्ट्रपति के आने का कार्यक्रम बना उधर CAA का और काल्पनिक NRC का विरोध कर रहे लोगों को जैसे मौका मिल गया. मोदी विरोधियों के लिए, CAA विरोधियों के लिए देश का कोई मतलब नहीं. वे अपने किसी भी कदम से ट्रंप तक, वैश्विक मीडिया तक सन्देश पहुँचाना चाह रहे थे कि देश में केन्द्र सरकार नाकाम है. देश की राजधानी में आग लगी हुई है. इस मकसद में वे कितने कामयाब हुए, कितने नहीं यह तो समय बताएगा किन्तु राजधानी में जबरदस्त हिंसा मचाने में वे अवश्य ही सफल रहे. 


खुलेआम हिंसा, आगजनी, उत्पात में कई लोगों की जान गई, सैकड़ों वाहनों में आग लगा दी गई, करोड़ों रुपये की संपत्ति का नुकसान हुआ. विरोध का विस्तार शाहीन बाग़ से बाहर और भी कई जगहों पर हुआ. सड़कों पर अवरोधक का भी विस्तार हुआ. यह किसी भी स्थिति में देश के लिए सुखद नहीं है. मोदी विरोध के नाम पर विरोध अब देश का होने लगा है. इससे भी बुरी बात यह है कि कथित मीडिया और कथित बुद्धिजीवी इसमें भी उत्पातियों का पक्ष लेते नजर आ रहे हैं. पुलिस के सामने खुलेआम रिवाल्वर के फायरिंग करने वाले को मासूम बताया जा रहा है. जगह-जगह घरों में घुसकर हिंसा फैलाने वालों को नजरंदाज किया जा रहा है. इन सब पर चर्चा करने के बजाय ट्रंप यात्रा के खर्चे को निशाना बनाया जा रहा है. समझने वाली बात यह है कि आखिर CAA पर इन विपक्षी दलों का इतना विरोध क्यों? विरोध के नाम पर खुलेआम इस्लामिक आतंकवाद को समर्थन क्यों? ये स्थितियाँ न तो वर्तमान के लिए सुखद हैं और न ही भविष्य के लिए. इस पोस्ट के लिखे जाने के समय तक उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश दे दिए गए हैं. आखिर इस समय तक ट्रंप भी देश से अपनी रवानगी कर चुके हैं. अब देखना है स्थिति कैसे नियंत्रण में आती है?