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19 दिसंबर 2020

छोटे-छोटे सपनों के साथ बढ़ें सफलता की राह

कहते हैं कि सपने बड़े देखना चाहिए, बड़े सपने लगातार आगे बढ़ने को प्रेरित करते हैं. ऐसा कहने वालों का हो सकता है कि अपना अनुभव रहा हो इस तरह का. उनके द्वारा कोई बड़ा सपना देखा गया हो और वे उसी के लिए लगातार कार्य करते रहे हों, संघर्षशील रहे हों और अंततः अपने सपने को सच करने में सफल रहे हों. इसके उलट हमारा अपना व्यक्तिगत अनुभव है कि सपने बड़े उन स्थितियों में देखना चाहिए जबकि उनको सच करने के लिए संघर्ष करने की क्षमता असीमित हो. बड़े सपनों को देखने के बारे में उसी समय सोचना चाहिए जबकि अपने उस सपने को सच करने के अलावा किसी और तरह के कदमों को न बढ़ाना हो. यदि ऐसी स्थिति नहीं है तो छोटे-छोटे सपने देखने चाहिए और उनको लगातार सच करते हुए क्रमिक रूप से बड़े सपने की तरफ बढ़ते रहना चाहिए.


इस सन्दर्भ में अपने अनुभव के द्वारा इसलिए भी कह सकते हैं क्योंकि बहुत लम्बे समय से सामाजिक जीवन में सक्रियता बनी हुई है. लगातार व्यावहारिक कार्य करने के साथ-साथ युवा वर्ग को इसके लिए प्रोत्साहित भी करते रहे हैं. अनेकानेक अवसरों पर राष्ट्रीय सेवा योजना के, राष्ट्रीय कैडेट कोर के बच्चों के साथ संवाद करने का मौका मिला. इसके अलावा बहुत सी स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में भी लोगों को सामाजिक कार्यों के प्रति, कैरियर के प्रति जागरूक करने का अवसर मिला. इन सबके अपने अनुभवों से यह सीखने को मिला कि किसी भी सपने को, अपने किसी भी लक्ष्य को पूरा करने के लिए लगता मेहनत की जाती है, लगातार प्रयास किया जाता है और इसके बाद भी यदि असफलता मिलती है तो बहुत ज्यादा निराशा होती है. लगातार मिलती असफलता, निराशा व्यक्ति में हताशा भी पैदा कर देती है.




जिन लोगों ने बड़े सपने, बड़े लक्ष्य निर्धारित करने के बारे में कहा होगा उनका भी अपना अनुभव रहा होगा. यहाँ उनके द्वारा कही गई बात को अथवा उनके अनुभव को गलत साबित करना हमारा इरादा नहीं है. आज जिस तरह से प्रतिस्पर्द्धा का माहौल है, आज जिस तरह से आपस में गलाकाट प्रतियोगिता हो रही है, इस समय जिस तरह से एक-दूसरे की टांग खींचते हुए खुद आगे निकल जाने की स्थिति दिखाई दे रही है उसमें सफलता की राह में एक-एक कदम बढ़ाना मुश्किल साबित हो रहा है. इसके साथ-साथ संसाधनों का लाभ लगभग सभी को मिल रहा है. इसमें उन्नीस-बीस का आँकड़ा भले हो मगर आज सभी किसी न किसी रूप में संसाधनों का लाभ ले उठा रहे हैं. ऐसे में योग्यता, तकनीक, ज्ञान, जानकारी किसी एक वर्ग अथवा एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रह गई है. इससे भी आपसी प्रतिस्पर्द्धा में, प्रतियोगिता में बहुत ज्यादा संघर्ष बढ़ गया है. ऐसी स्थिति के चलते भी सफलता की तरफ बढ़ते कदमों में कदम-कदम पर अवरोध दिखाई देते हैं.


ऐसी स्थिति में आज की पीढ़ी बहुत जल्दी हताशा, निराशा, अवसाद में चली जाती है. एक-दो प्रयासों के बाद सफलता का मिल पाना उनके लिए जैसे जीवन की सभी राहों को बंद होने जैसा हो जाता है. ऐसा समझ में आते ही उनके द्वारा गलत कदम भी उठा लिए जाते हैं. आज की स्थिति को देखते हुए भी, आज के बहुसंख्यक युवाओं की कमजोर इच्छा-शक्ति को देखते हुए भी हमारा विचार यही रहता है कि सपने छोटे-छोटे देखे जाएँ, लक्ष्य छोटे-छोटे निर्धारित किये जाएँ. ये सपने सच भी हो सकते हैं, लक्ष्य की प्राप्ति भी हो सकती है, इससे हौसला भी बढ़ेगा और नए सपने, नए लक्ष्य की तरफ बढ़ने का प्रोत्साहन भी मिलेगा.



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वंदेमातरम्

01 जुलाई 2020

वर्षों पुराना सपना शायद वापस गाँव ले जाए

क्या हम लोग गाँवों की तरफ लौटना पसंद करेंगे? क्या हम शहर की भौतिकतावादी ज़िन्दगी को आज तक जीने के बाद अब गाँव में जीवन बिताना स्वीकार करेंगे? ऐसे और भी सवाल उस समय भी उठे थे जबकि चीनी वायरस कोरोना के चलते लगाये गए लॉकडाउन में मजदूरों की, श्रमिकों की वापसी गाँव के लिए हुई थी. इस तरह के सवाल उस समय भी हमारे मन में उभरे थे जबकि पिताजी के देहांत के पश्चात् गाँव के पैतृक घर की स्थिति देखी थी. उस घर के आँगन में, छत पर, चौक पर, वहाँ की छोटी सी फुलवारी में हमने अपना बचपन बिताया है, गर्मियों की छुट्टियाँ बिताई हैं इस कारण तो उस घर, आँगन से लगाव होना स्वाभाविक ही है. इसके साथ-साथ उस मकान से अपने पुरखों की तमाम स्मृतियों को जुड़े हुए देखा है, उनकी कहानियों को सुना है, उस घर के अनेक किस्सों को सुना है इसके चलते भी उस जगह से लगाव होना सहज है.


बाबा जी के देहांत के पश्चात् गाँव के घर में जाना-रहना एकाधिक बार ही हुआ. उनके बाद कभी-कभार ही जाना होता रहा. धीरे-धीरे यह आना-जाना भी बंद सा हो गया. गाँव के मकान की तरफ विचार इसलिए भी नहीं आया क्योंकि अभी वह पिताजी की देखरेख में था. उस घर में बाद में रहने का मौका भले ही न मिला हो मगर हमेशा एक सपना मन के कोने में कहीं दुबका बैठा रहता. सोचते थे कि ज़िन्दगी के एक पड़ाव पर आने के बाद पुरखों की उस विरासत पर बहुत भव्य इमारत बनवाई जाएगी. एक निश्चित समय तक कुछ न कुछ करने के बाद सारी आपाधापी से दूर उसी की छाँव में रहा जायेगा. चूँकि घर का पैतृक मकान बहुत बड़ा है, इसलिए यह भी विचार आता था कि उस मकान के एक हिस्से में गाँव के बच्चों के लिए विद्यालय खुलवा दिया जायेगा.



कालांतर में स्थितियाँ बदलती रहीं मगर मन के कोने में सजा वह सपना ज्यों का त्यों बना हुआ है. अब जबकि परिवार की नई पीढ़ी (हमारी और हमारे बाद वाली) में से किसी का गाँव आना या कहें कि वापस लौटना असंभव है. सभी भाई अपने-अपने कार्यों, रोजगार के कारण घर से बहुत दूर हैं. ऐसे में संभव है कि आने वाले समय में पैतृक घर-जमीन को निकालने की सहज, समवेत स्वीकृति बन जाये. हमारा सपना भी पूरा होगा या नहीं यह अभी कहा नहीं जा सकता है क्योंकि परिस्थितियाँ जिस तेजी से इस वर्ष बदलीं हैं, आने वाले समय में उनका क्या स्वरूप होगा इसका आकलन नहीं किया जा सकता. ऐसा नहीं कि गाँव में रहना आज के समय में मुश्किल हो गया है. आज भी हमारे परिचित में अनेक लोग ऐसे हैं जिन्होंने बहुत सुख-सुविधाओं भरा जीवन बड़े-बड़े शहरों में व्यतीत करने के बाद वृद्धावस्था में गाँव में निवास करना ही पसंद किया.

आने वाले समय के बारे में अभी से कुछ कहना संभव नहीं. भविष्य की किसी योजना के फलीभूत होने के बारे में अभी से कोई भविष्यवाणी नहीं. इसके बाद भी पैतृक घर में गाँव के बच्चों के लिए स्कूल खोलने का सपना किसी न किसी हाल में पूरा करने का प्रयास किया जायेगा. उस जमीन पर जहाँ कभी हमारे पुरखों की उपस्थिति रही हो, जिस जगह का अपना इतिहास रहा हो उस जगह पर भव्य इमारत न बने मगर एक छोटी झोपड़ी बनाने का सपना पूरा करने का प्रयास होगा. भले ही उसमें स्थायी रूप से निवास करने का अवसर न मिले मगर क्षणिक रूप से वहाँ कुछ पल गुजार कर बीते दिनों का अनुभव लेने का प्रयास किया जायेगा.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

05 जून 2020

कमजोर आत्मविश्वास से सच न हो सके बहुत से सपने

स्नातक स्तर तक की पढ़ाई पूरी न हो सकी थी कि पिताजी का आदेश मिला कि वापस घर आ जाओ, आगे नहीं पढ़ाना है. उस समय हम स्थिति समझ सकते थे. घर से पढ़ने के लिए ग्वालियर पहुँचे और वहाँ पढ़ने से ज्यादा नाम सामने आने लगा लड़ाई-झगडा करने में. कहते हैं न कि बद अच्छा, बदनाम बुरा. कुछ नाम वास्तविक रूप में हुआ तो कुछ में नाम काल्पनिकता का शिकार होकर सामने आया. चर्चा उसकी नहीं क्योंकि उन दिनों की अपनी ही एक अलग कहानी है जिस पर घंटों लिखा-बताया जा सकता है. जैसा कि पिताजी का आदेश था बिना किसी विरोध के घर आ गए. आगे की पढ़ाई के रूप में लॉ करने का विचार था या फिर सांख्यिकी से परास्नातक करने का. दोनों में कुछ सहमति सी न दिखी तो सिविल सर्विस की तैयारियों की तरफ ध्यान लगाने की कोशिश की. इसी बीच फ़िल्मी कीड़ा काटने लगा.


उरई जैसे शहर में आने के बाद इस कीड़े के काटने का कोई इलाज भी नहीं था. जिस तरह का माहौल यहाँ दिख रहा था उसमें कुछ नाटकों और कुछ नुक्कड़ नाटकों के द्वारा ही संतुष्टि का एहसास किया जा सकता था मगर आगे बढ़ने जैसा कुछ हिसाब समझ नहीं आ रहा था. कुछ महीनों की भागदौड़ के बाद यहाँ का सांस्कृतिक माहौल भी समझ आने लगा. ऊपरी तौर पर भले ही सब एक मंच पर दिखाई पड़ते हों मगर अंदरूनी रूप से, अपने बैनर के रूप में सभी अलग-अलग विचारधाराओं के पोषक थे. इनके साथ बहुत लम्बा समय नहीं बीत सकता था या कहें कि अपने काटे कीड़े का इलाज यहाँ नहीं समझ आ रहा था.


उन्हीं दिनों एक जगह विज्ञापन दिखाई दिया किसी विज्ञापन कंपनी का. मित्रों के सुझाव के साथ विचार किया गया कि यदि एक बार इस क्षेत्र में घुसना हो गया तो शायद आगे का रास्ता भी यहीं से मिल जाये. विज्ञापन की कुछ शर्तों को पूरा करने के लिए फोटो की आवश्यकता थी. अपने फोटोग्राफी के शौक और सेन्स को प्रयोग में लाने का विचार बनाया. एक दोस्त के कैमरे में रील डालकर खुद को निर्देशित करते हुए, खुद के लिए कैमरामैन बने. आनन-फानन पाँच-दस फोटो निकालकर उनको जल्द से जल्द बनवाया गया. जिस दिन सारी औपचारिकतायें पूरी करके फॉर्म को पोस्ट किया उस दिन से न जाने कितनी सफल फिल्मों के हीरो हम नजर आने लगे.

इतना सारा काम घर में बिना किसी की जानकारी में आये हुआ. उसके बाद का दौर किसी खतरनाक फिल्म की तरह से हमारे सामने आया. एक दिन पिताजी की अदालत में पुकार लगी. बिना किसी गवाह, सबूत के हमें उपस्थित होना पड़ा. उनके हाथ में एक लिफाफा चमक रहा था जो हमारे अपराध की गवाही खुद दे रहा था. उस लिफाफे के साथ-साथ जाने कितनी तरह की बातें हमारे हाथ में रख दी गईं. विज्ञान स्नातक की पढ़ाई का मंतव्य सिद्ध करने को कहा गया, सिविल सेवा की तैयारियों का मतलब बताने को कहा गया, नाचने-गाने को सामाजिकता की श्रेणी में शामिल करने के आधार को बताने को कहा गया.

एक हम चुपचाप सिर झुकाए अपने विज्ञान स्नातक होने का कथित अहंकारी गर्व लिए खड़े रहे. हमारे पास कोई तर्क नहीं थे, सिवाय आज्ञा पालन करने के. वो फॉर्म बरसों हमारे पास सुरक्षित रहा, इस सबूत के साथ कि पहली स्टेज में हम पास हो गए थे. आगे के लिए मुंबई जाना था, कुछ फोटोशूट और अन्य औपचारिकताओं को करना था. फिर एक दिन बहुत सारे फालतू कागजातों के साथ उस फॉर्म और उसके साथ आये पत्र को भी मकान के सामने बहती नाली में प्रवाहित कर दिया. वो पत्र मर गया, वो फॉर्म बह गया मगर आज तक वो कीड़ा न मरा, आज तक वो कीड़ा कहीं और नहीं गया.

बहुत सी बातें हैं जो आज तक समझ आती रहीं, नहीं भी समझ आती रहीं मगर एक बात ये समझ न पाए कि क्या हम डरपोक निकले? क्या हमारे अन्दर अपने सपनों को पूरा करने के लिए पारिवारिक निर्णयों के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत न थी? क्या हमारे अन्दर किसी विश्वास की कमी थी जो हम पिताजी के उस निर्णय का विरोध न कर सके? क्या हम अन्दर ही अन्दर कमजोर थे? ऐसा इसलिए क्योंकि यह उसी एक निर्णय पर नहीं हुआ वरन हमारे साथ एकाधिक मामलों में, बहुतायत विषयों पर ऐसा हुआ. अब लगता है कि उस जैसे अनेक पारिवारिक निर्णयों पर हमारी चुप्पी हमारे आज्ञाकारी होने का नहीं वरन हमारे कमजोर आत्मविश्वास की परिचायक है. ऐसी अनेक चुप्पियों का परिणाम आज भी हम ही भोग रहे हैं.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

24 सितंबर 2019

खुद का मरना, जिन्दा दिखना सपने में


क्या सपनों का कोई मतलब होता है? क्या देखे हुए सपनों में कोई सन्देश छिपा होता है या फिर ये अचेतन मन की प्रतिक्रिया होती है? सपने महज मन की स्थिति नहीं होती होगी क्योंकि जो कभी सोचा न जाये, जिसके बारे में कभी चर्चा न की जाये वह भी सपनों में दिखाई पड़ जाता है. क्या माना जाये कि सपने किसी पूर्वाग्रह की तरफ इशारा करते हैं? ऐसा इसलिए क्योंकि व्यक्तिगत हमारे साथ कई बार ऐसा हुआ कि जो कुछ सपने में देखा वह एक-दो दिन के भीतर ही ज्यों का त्यों हमारे साथ गुजरा. कुछ सपने ऐसे भी सामने आये जिनके होने का कोई मतलब समझ नहीं आया. सपनों में कुछ स्थितियां, कुछ घटनाएँ, कुछ जगहें ऐसी हैं जो नियमित रूप से आती ही हैं. अतीत की कुछ बातें घूम-फिर कर बार-बार सपनों के द्वारा दिखाई दे जाती हैं. कुछ सपने तो ऐसे हैं जो विगत कई वर्षों से दिखाई दे रहे हैं और ज्यों के त्यों उतने ही दिखाई देते हैं. जहाँ से शुरू, जहाँ से ख़त्म ठीक वैसे ही हर बार. वैसी ही एक सी कहानी, वैसी ही एक सी स्थिति. समझ नहीं आता कि आखिर इस तरह के सपनों के द्वारा कोई शक्ति, मन, अचेतन अवस्था क्या सन्देश देना चाहती है?


सपनों का विस्तार करने बैठें तो न जाने कितना कुछ है लिखने को, बताने को. इधर कुछ दिन पहले एक सपना देखा जिसका न तो ओर-छोर समझ आया और न उसके दिखाई देने का अर्थ पकड़ में आया. अपने सपने में अपनी ही मृत्यु को देखना. घर का बाहर वाला कमरा, उसमें हमारी ही मृत देह पड़ी हुई है. तमाम लोग आसपास खड़े हैं, बैठे हैं और आश्चर्य देखिये कि खुद हम भी उसी भीड़ में खड़े हुए हैं. ऐसे में अचानक हमारे एक मित्र का आना होता है. उसका आना हमें आश्चर्य में डालता है. कुछ भी धुंधला सा नहीं है, सबकुछ साफ़-साफ़. हम ही बात कर रहे, हम ही मृत पड़े हैं. उसी समय जेब में पड़ा मोबाइल बज उठता है और हम बिना कोई बात किये बाहर निकल आते हैं. खुद अपनी मृत देह को उसी स्थान पर लेटा छोड़ कर, दोस्त को खुद की देह के पास छोड़कर. मोबाइल बज रहा है, हम रिसीव करना चाह रह मगर कॉल रिसीव नहीं हो रही. उसी में आँख खुल जाती है. असल में सपने में मोबाइल का बजना उस एलार्म का बजना था जो हमने मोबाइल में लगा रखा है. 

आँख खुलने के बाद मन में अजीब-अजीब से ख्याल आते रहे. सुबह उठकर अपने अन्य कामों की तरफ बढ़ना था सो उन ख्यालों में दिमाग ज्यादा न लगाते हुए नित्यकर्मों में जुट गए. बाकी, सपनों का संसार लगातार विस्मृत करता रहता है, आश्चर्य में डालता रहता है. अबूझ पहेली की तरह परेशान भी करता रहता है. एक हम हैं जो सभी सपनों को बस सपना समझ कर भुलाने की कोशिश करते रहते हैं. आखिर करें भी क्या, क्योंकि इनका कोई अर्थ पकड़ में आता नहीं है और परेशान होना भी हमें आता नहीं. सपनों की अजब दुनिया से बाहर निकल कर आज रात फिर किसी नए सपने की सैर या फिर पुराने सपनों में से कोई एक सपना फिर से?

26 मार्च 2019

सफलता के लिए लक्ष्य निर्धारण पर विचार करें


अक्सर किसी न किसी बड़े-बुजुर्ग के द्वारा समझाने की नीयत से ऐसा कहा जाता है कि सपने बड़े देखने चाहिए, महत्त्वाकांक्षा बड़ी होनी चाहिए. यदि सपने बड़े होंगे, महत्त्वाकांक्षा बड़ी होगी तो उसके लिए प्रयास करने के दौरान अन्य सपने या महत्त्वाकांक्षा पूरी हो सकती है. संभव है कि ऐसा सच हो कि बड़े सपने के लिए प्रयास होने से उसके सापेक्ष कोई न कोई छोटी अपेक्षा पूरी हो जाये. ऐसा उनके अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है किन्तु यदि सामाजिक अनुभवों की बात करें, व्यक्तिगत अनुभव की बात करें तो ऐसा हमेशा सच नहीं होता है. अक्सर ऐसी स्थिति में यदि बड़े सपने पूरे न हो पा रहे हैं या फिर कोई बड़ा लक्ष्य प्राप्त नहीं हो पा रहा है तो प्रयास करने वाले व्यक्ति को निराशा उत्पन्न होने लगती है. कई बार उस व्यक्ति को बड़े प्रयासों, लक्ष्यों के सापेक्ष किसी न किसी छोटी स्थिति से समझौता सा करना पड़ता है. यह स्थिति हर उस व्यक्ति के लिए कष्टकारी होती है जो किसी बड़े लक्ष्य के लिए कृत-संकल्पित था. ये कहना कि सफलता न मिलने का अर्थ यह है कि सफलता का प्रयास पूरे मन से नहीं किया गया, सभी सन्दर्भों में उचित नहीं. आज के प्रतियोगी दौर में कई बार बहुत छोटे-छोटे अंतर से सफलता-असफलता देखने को मिलती है. ऐसे में ईमानदार प्रयास करने वाले की नीयत पर संशय करना उसकी ईमानदारी पर सवाल खड़े करना होता है. 


बड़े लक्ष्य तय करने चाहिए, बड़े सपने देखने चाहिए मगर उनके साथ-साथ व्यक्ति को अपनी क्षमता, अपने कौशल, अपने व्यक्तित्व का भी आकलन कर लेना चाहिए. कई बार व्यक्ति अपनी क्षमताओं का आकलन किये बिना ही बड़े-बड़े लक्ष्य तय कर लेता है. ऐसे में असफलता मिलने पर वह निराशा के गर्त में चला जाता है. इसके अलावा कई बार व्यक्ति अपने आकलन करने में खुद को सक्षम पाता है, किसी भी बड़े लक्ष्य के प्रति खुद को समर्पित मानता है, अपनी क्षमताओं को यथोचित पाता है, इसके बाद भी अपने लक्ष्य के प्रति असफल रहता है. ऐसे में भी वह निराश हो उठता है. यदि ऐसे अवसरों किसी भी व्यक्ति को निर्धारित लक्ष्य से कम पर, अपने देखे या तय किये गए सपने से कम पर रुकने को कहा जाये तो वह स्थिति भी उसे सहज नहीं होती है. ऐसे हालातों में भी समस्या उत्पन्न होना स्वाभाविक है. 

ऐसी स्थिति में किसी भी व्यक्ति को जो बड़े-बड़े लक्ष्य निर्धारित करना चाहता है वह बजाय एक बड़ा लक्ष्य बनाने के उसकी राह में आने वाले छोटे-छोटे पड़ावों को अपना लक्ष्य बनाते हुए उन पर सफलता प्राप्त करे.  अपने किसी बड़े सपने के बजाय उसके छोटे-छोटे सपने देखते हुए उन्हें पूरा करते हुए उसी सफलता को बड़ा बनाने के लिए प्रयास करे. इससे एक तो ये होगा कि उस व्यक्ति के द्वारा तय किये गए छोटे-छोटे लक्ष्यों का पूरा होना ही उसमें विश्वास बढ़ाएगा. उसके बढ़े हुए आत्मविश्वास में वह लगातार सफलता प्राप्त करता रह सकता है. छोटे-छोटे लक्ष्यों की पूर्ति से किसी भी व्यक्ति को अपने बड़े लक्ष्य पर पहुँचने का मार्ग सहज और सरल समझ आएगा. ऐसा होने से उसके प्रयासों में जबरन किसी तरह का बोझ पड़ता नहीं दिखाई देगा. इसके साथ-साथ वह बिना किसी तरह की निराशा ओढ़े सतत आगे बढ़ता जायेगा. यही छोटी-छोटी महत्त्वाकांक्षाएं पूरी होते-होते बड़ा रूप धारण कर लेंगी.

प्रत्येक व्यक्ति को, भले ही उसमें कौशल हो, भले ही उसके काबिलियत हो, भले ही उसमें क्षमता हो यह ध्यान रखना चाहिए कि जरूरी नहीं कि सोचा हुआ हर सपना, हर महत्त्वाकांक्षा पूरी ही हो. ऐसे में अधूरे ख्वाब, अपूर्ण महत्त्वाकांक्षा असफलता का एहसास कराती है. असफल होने का यही एहसास व्यक्ति को अवसाद की स्थिति में ले जाता है, निराशा के आगोश में ले जाता है. इससे बचने के लिए बेहतर है कि छोटे-छोटे रास्तों से, छोटी-छोटी सफलताओं को साथ लेकर एक बड़ी सफलता बनाई जाये. एक बड़ा सपना सच किया जाये.

14 अगस्त 2013

सच्ची सलामी के इंतज़ार में तिरंगा अभी भी है



पहली बार आधी रात को तिरंगा फहराते समय हवा हमारी थी, पानी हमारा था, जमीन हमारी थी, आसमान हमारा था. गर्व के साथ-साथ तब जन-जन की आँखों में नमी थी. अपने प्यारे तिरंगे को पहली बार खुली हवा में सलामी देने के लिए उठे हाथों में एक कम्पन था मगर आत्मा में दृढ़ता थी, स्वभाव में अभिमान था, स्वर प्रसन्नता से भरे थे, सिर गर्व से ऊपर उठे हुए थे. तिरंगा हमेशा फहराया जाता रहा, हर वर्ष फहराया जाता रहा, सलामी हर बार दी जाती रही किन्तु गर्व से भरा सिर हर बार झुकता रहा, आत्मा की दृढ़ता हर बार कम होती रही. यह एहसास साल दर साल बढ़ता ही रहा. हाथों का कम्पन, आँखों के बहते आंसू हर बार तेज़ी से बढ़ते रहे. पहली बार हमारे हाथों का कांपना हमारे स्वाभिमान का परिचायक था, अब यही कम्पन हमारे नैतिक, चारित्रिक पतन को दिखा रहा है. पहली बार बहते हुए आँसू ख़ुशी के थे मगर अब लाचारी, बेबसी, हताशा, भय, आतंक, अविश्वास के हैं.
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लहराता प्यारा तिरंगा हर बार हमसे हमारी स्वतंत्रता का अर्थ पूछता है, शहीदों के सपनों का सच होना पूछता है. हम हर बार निरुत्तर हो जाते हैं. क्या हम शहीदों के सपनों को सच कर पाए हैं? शिक्षा के लिए भटकते लोगों को किताब-कलाम के स्थान पर हथियार थमा दिए. पानी को नजरंदाज़ करके हाथों में जाम थमा दिए गए. कलात्मक हाथों को विध्वंसकारी बना दिया गया. विकास की ऐसी स्थिति हमारे शहीदों का सपना नहीं थी. स्वतन्त्र भारत पर जाति, धर्म, वर्ग विशेष का अधिकार उन्होंने नहीं चाहा था. गर्व करने वाली संस्कृति के स्थान पर पश्चिमी अन्धानुकरण उन्होंने नहीं माँगा था. हमारी सोच संकुचित हुई है, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, भाई-भतीजावाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद हम पर हावी हो चुका है.
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जब भी सामने लहराता हुआ तिरंगा देखते हैं तो उन शहीदों की याद आती है, उनके सपनों की तस्वीर नजर आती है. यही कारण है कि हम अब लहराते तिरंगे से अपनी आँखें नहीं मिला पाते. सलामी देने को उठते हाथों में कम्पन साफ़-साफ़ दिखाई देता है. सिर गर्व से उठा नहीं रहता है. ‘जयहिन्द’ ‘वन्देमातरम’ की आवाज़ हमारे कंठ से बाहर नहीं निकल पाती. हमारी बेबसी, वीर शहीदों की शहादत से किया गया विश्वासघात हमें भीतर तक कंपा जाता है. उनके सपनों को चूर-चूर कर डालने की हमारी प्रवृत्ति हमें शर्मिंदा करती है मगर हम फिर भी नहीं सुधरते. प्रतिवर्ष तिरंगे के सामने कुछ पल सिर झुका कर अगले वर्ष सुधार लाने की सोचकर पुनः आकंठ बुराई में डूब जाते हैं. क्या हम कभी औपचारिकताओं का त्याग कर उनकी चिताओं पर मेले लगने का उनका स्वप्न कभी पूरा कर सकेंगे? कभी तिरंगे को सच्ची सलामी देने की हिम्मत जुटा सकेंगे? प्रत्येक देशवासी को स्वयं से ये सवाल पूछने होंगे.

16 सितंबर 2011

कितना समझाया है मन मतवाले....==600वीं पोस्ट

अभी एक घंटे पहले जब अपनी पोस्ट लगाई तो पता चला कि अगली पोस्ट की संख्या 600 होगी। सोचा कि कल कोई अच्छी सी पोस्ट को लगा कर 600 की संख्या का उत्सव मनाया जाये या फिर अपने जन्मदिन 19 सितम्बर को दोहरा आनन्द लिया जाये। उत्सव के नाम पर याद आया कि आज 16 सितम्बर को हमारे किसी अपने का जन्मदिन है। बस फिर क्या था, एक पोस्ट लगा देने के बाद भी उत्सव और आनन्द उठाने का लोभ संवरण नहीं कर सके और अपनी 600वीं पोस्ट को कविता के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

समर्पित अपने किसी करीबी सदस्य को.....उनके जन्मदिन की शुभकामनाओं सहित--


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कितना समझाया है मन मतवाले,

न सपने तू देखा कर-

सपनों की दुनिया में महज छलावे,

न सपने तू देखा कर-

सपनों की दुनिया निर्मोही,

खो जायेगा ओ मनमौजी,

सुख है केवल दो पल का,

वह भी केवल कोरा-कोरा,

मृगतृष्णा सी एक जगाकर,

आ जाते हैं हमें डराने,

कितना समझाया है मन मतवाले,

न सपने तू देखा कर-

सपने हैं इक झील विशाल,

चमके जगमग नीला आकाश,

चांद तारों का रूप दमकता,

मोहित होता तू देख छटा,

झोंका हवा का अगले ही पल,

मचा देता है जैसे हलचल,

जगमग झील का रूप बदलता,

मंजर बस उठती गिरती लहरों का,

ढूँढें किसमें चन्दा तारे,

अब तो बस धारे ही धारे,

कितना समझाया है मन मतवाले,

न सपने तू देखा कर-

सपना एक सजाया फिर भी,

घरौंदा एक बनाया फिर भी,

जुगनू की जगमगाहट जिसमें,

चिड़ियों की चहचहाहट जिसमें,

राह-राह पर फूल खिले हैं,

नहीं कहीं भी शूल मिले हैं,

महकी जिसमें खुशियां ही खुशियां,

नहीं दिलों के बीच दूरियां,

लेकिन जीवन एक हकीकत,

न सपनों से जाये काटे,

कितना समझाया है मन मतवाले,

न सपने तू देखा कर-

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चित्र गूगल छवियों से साभार