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29 जुलाई 2026

तकनीकी दौर में भी गुरु की प्रासंगिकता

 

भारतीय संस्कृति में आदिगुरु के रूप में पूजनीय महर्षि वेद व्यास के जन्मदिन के रूप में मनाया जाने वाला पर्व गुरु पूर्णिमा हमारी महान ज्ञान परम्परा के स्मरण का पवित्र अवसर है. भारतीय संस्कृति में अनादिकाल से गुरु-शिष्य परम्परा का गौरवशाली स्थान रहा है. इसी कारण से अज्ञानता के अंधकार को चीरकर मानवता को विवेक-मुक्ति का मार्ग दिखाने वाले गुरुओं के सम्मान में आषाढ़ मास की पूर्णिमा को श्रद्धा और उल्लास के साथ गुरु पूर्णिमा पर्व मनाया जाता है.

 

भारतीय संस्कृति में ज्ञान को एक तरह की ऊर्जा के रूप में परिभाषित किया गया है. भारतीय मनीषियों ने इसे जीवन की समग्रता को जानने-समझने की एक प्रक्रिया माना है. इसे ऐसी चेतना बताया है जो गुरु मुख से शिष्य के हृदय की ओर संचरित होती है. गुरु-शिष्य की इस परम्परा में ज्ञान और आचरण में किसी तरह का विभेद स्वीकारा नहीं गया है. कथनी और करनी में विभेद न होने को ही शिक्षा माना गया है. गुरु-शिष्य परम्परा के कारण भारतीय संस्कृति में गुरु का सम्मान सामाजिक शिष्टाचार के रूप में स्वीकार्य नहीं रहा है बल्कि इसे आध्यात्मिक साधना के रूप में स्वीकारा गया है. गुरुब्रह्मा गुरुविष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः, गुरुः साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः के रूप में यह बताया गया है कि समस्त शक्तियों का ज्ञान और उनका बोध कराने वाला माध्यम गुरु ही है और ऐसा माध्यम ईश्वर से भी उच्च पद पर है. गुरु ही है जो इंसान के भीतर की कुंठा, अहंकार, अज्ञानता, लालच, विद्वेष आदि को समाप्त करता है. उसके ऐसे परिष्करण से ही किसी भी शिष्य की आंतरिक प्रतिभा पूर्ण रूप से प्रस्फुटित होने लगती है.

 

समय के साथ गुरु-शिष्य परम्परा में भी परिवर्तन देखने को मिले हैं. इक्कीसवीं सदी के संदर्भ में देखें तो सम्पूर्ण विश्व तकनीकी विकास, उपभोक्तावाद, वैश्वीकरण आदि के दौर से गुजर रहा है. आज का युग सूचनाओं का युग बन गया है. इंटरनेट, गूगल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आदि के इस दौर में ज्ञान किसी एक व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा है. हर हाथ में डिवाइस ने एक क्लिक पर व्यक्ति के सामने वैश्विक जानकारी का भंडार लगा दिया है. यहाँ यह समझना बहुत आवश्यक है कि हमारे सामने एक क्लिक पर जानकारी आ रही है अथवा ज्ञान? हमें इस तकनीकी रफ़्तार वाले युग में यह भी समझना होगा कि उँगलियों के सहारे स्क्रॉल करती जानकारी हमारे लिए वाकई लाभकारी है अथवा हम अनावश्यक जानकारियों का भंडार-गृह बनते जा रहे हैं? तकनीकी के बदलते दौर में, शिक्षा के बदलते आयामों के युग में लोगों के मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या इस तकनीकी युग में गुरु की प्रासंगिकता शेष है?

 

इस प्रश्न के उत्तर के पूर्व हम सभी को वर्तमान सन्दर्भों में सूचनाओं का, आँकड़ों का सुलभता से मिलना और उसके उपयोग के बारे में सोचना, विचार करना पड़ेगा. भले ही तकनीकी माध्यमों से सूचनाएँ, आँकड़े, जानकारियाँ कितनी भी सुलभता से क्यों न उपलब्ध हो जाएँ किन्तु वे कभी भी ज्ञान का, बोध का का स्थान नहीं ले सकती हैं. अब जबकि मशीनी तकनीकी से जानकारियाँ तो उपलब्ध हो जा रही हैं मगर उनके उपयोग पर, उनके समायोजन पर, व्यक्ति के समन्वय पर, इंसानी चरित्र पर सवालिया निशान तो लग ही रहे हैं. तीव्र तकनीकी विकास के चलते जिस तरह से आज का युवा उन्मादित होकर भटकता; सोशल मीडिया के भ्रामक मायाजाल में फँसा हुआ; एकाकीपन से भरा हुआ; मानसिक अवसाद से गुजरता हुआ; तनाव से जूझता दिख रहा है तब वास्तविक गुरु की आवश्यकता और अधिक महसूस होने लगी है.

 

आज शिक्षा व्यवस्था को एक व्यावसायिक उत्पाद बना दिया गया है; शिक्षण संस्थानों को पाठ्यक्रम पूरा करवाने और डिग्री बाँटने का केन्द्र बना दिया गया है; चरित्र निर्माण, मूल्य-शिक्षा, नैतिकता, समन्वय, भावनात्मकता आदि का लोप होता दिखने लगा है तब समझ आ रहा है कि आधुनिक शिक्षा प्रणाली ने केवल सफल व्यक्ति बनाने का प्रयास किया है न कि संवेदनशील मनुष्य बनाने का. ऐसे व्यावसायिक दौर में गुरु-शिष्य का पवित्र रिश्ता विक्रेता और क्रेता के रूप में बदलता जा रहा है. कोचिंग संस्थानों, शिक्षा के बाजार ने सम्बन्धों की, रिश्तों की मर्यादा को, गरिमा को नष्ट कर दिया है. इस विकृति के बीच गुरु पूर्णिमा का पर्व मूल जड़ों की ओर लौटने की प्रेरणा देता है. यह पर्व हमें इस बात का भी एहसास कराता है कि भारतीय संस्कृति में केवल मनुष्य को ही गुरु के रूप में नहीं स्वीकारा गया है बल्कि प्रकृति, जीव-जन्तु, घटनाओं आदि को भी गुरु रूप में स्वीकारा गया है.

 

आज के डिजिटल युग में गुरु को वेदों, शास्त्रों, पौराणिक ग्रंथों के ज्ञाता  के रूप में नहीं बल्कि एक मार्गदर्शक, परामर्शदाता, जीवन-प्रशिक्षक की भूमिका में देखने की आवश्यकता है. समय बदलने के साथ-साथ गुरु का स्वरूप, उसकी भूमिका में भी परिवर्तन लाने की आवश्यकता है. आज भले ही ऑनलाइन माध्यमों से शिक्षण कार्य सम्पन्न होने लगा हो किन्तु यह समझना होगा कि तकनीकी प्रगति के बीच भी गुरु-शिष्य के बीच का मानवीय रिश्ता, संवेदना, नैतिक ऊर्जा का संस्कार विलुप्त न हो पाए. एक वास्तविक गुरु केवल विषयों को पढ़ाने का काम नहीं करता है बल्कि वह विद्यार्थियों के मन में उठने वाले संशयों का शमन करता है. अपने शिष्यों को सही और गलत के बीच का भेद समझा कर संकटकाल में नैतिक संबल प्रदान करता है. वर्तमान सन्दर्भों में ऐसे गुरुओं की आवश्यकता है जो तकनीकी कौशल के साथ-साथ करुणा, सहानुभूति, सहनशीलता, सहयोग, सामाजिक उत्तरदायित्व आदि जैसे मानवीय मूल्य भी सिखाएँ.

 

कह सकते हैं कि गुरु पूर्णिमा का पर्व अतीत की वंदना करने का ही नहीं बल्कि भविष्य के प्रति संकल्पित होने का दिन भी है. यह पर्व हमें याद दिलाता है कि भले ही युग बदल जाए, तकनीक विकसित हो जाए, जीवन की प्राथमिकताएँ बदल जाएँ परंतु मानव जीवन में गुरु की आवश्यकता सदैव रहेगी. व्यक्ति को सही दिशा देने के लिए एक प्रकाशपुंज, मार्गदर्शक, गुरु का होना अनिवार्य है. जब तक समाज में अज्ञान, द्वेष, अहंकार, भटकाव आदि रहेगा तब तक गुरु की प्रासंगिकता भी रहेगी.

31 मई 2026

आवश्यकता नीयत सुधारने की है

देश की सुरक्षा के लिए तत्पर रहने वाली वायु सेना को अब परीक्षार्थियों के भविष्य को सुरक्षित रखने का जिम्मा भी सौंपा गया है. नीट परीक्षा प्रश्न-पत्र के लीक हो जाने के बाद पुनः आयोजित होने वाली नीट परीक्षा को पूर्णतः सुरक्षित बनाने के लिए सरकार भारतीय वायु सेना की मदद लेने पर विचार कर रही है. इस बार परीक्षा प्रश्नपत्रों को सामान्य परिवहन के स्थान पर वायु सेना के विमानों से केन्द्रों तक सुरक्षित ढंग से एयरलिफ्ट करने का प्रस्ताव रखा गया है. इसे कुछ लोग भले ही परीक्षा के प्रति गम्भीरता के रूप में देखें किन्तु प्रथम दृष्टया यह हास्यास्पद प्रस्ताव ही कहा जाना चाहिए. समूची प्रशासनिक व्यवस्था, सरकारी तंत्र, नागरिकों के लिए यह एक तरह का शर्मनाक बिन्दु है जबकि देश की सुरक्षा करने वाली सेना अब परीक्षा प्रश्नपत्रों को इधर-उधर ले जाने का काम करेगी.

 

पिछले कुछ वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं के, शिक्षा सम्बन्धी प्रवेश परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों का सार्वजनिक हो जाना, उनकी गोपनीयता उजागर हो जाना एक आम चलन के रूप में उभर कर सामने आया है. किसी संक्रामक बीमारी की तरह यह एक परीक्षा से होते हुए दूसरी परीक्षा के लिए, एक राज्य से दूसरे राज्य के लिए बढ़ती दिखने लगी है. परीक्षा प्रश्नपत्रों को सार्वजनिक करने का कार्य दो-चार व्यक्तियों द्वारा नहीं होता है बल्कि इसके पीछे एक तरह का सिंडिकेट काम करता है. भले ही किसी परीक्षा प्रश्नपत्र के सार्वजनिक होने की घटना को प्रशासनिक व्यवस्था की नाकामी कहा जाये मगर सोचने वाली बात ये है कि क्या इस तरह के काम बिना किसी संरक्षण के संभव हो सकते हैं? प्रश्नपत्रों के बनने से लेकर उनके प्रकाशन तक, उनको व्यवस्थित करने से लेकर परीक्षा केन्द्रों तक पहुँचाने तक का कार्य नितांत गोपनीयता के साथ पूरा किया जाता है. ऐसे में कैसे सम्भव है कि किसी बड़े रसूखदार के संरक्षण बिना प्रश्नपत्र बाजार में बिकते दिखाई देने लगें. प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर परीक्षा आयोजन तक की लम्बी प्रक्रिया में जरा सी चूक से परीक्षा आयोजित कराने वाली बड़ी-बड़ी एजेंसियों की गोपनीयता पर भले ही सवाल उठ रहे हों किन्तु ऐसा कार्य तंत्र के भीतर बैठे लोगों की सहायता के बिना हो ही नहीं सकता है. इस तरह के कृत्य करने वाले माफियाओं को विभिन्न प्रकार का राजनीतिक-प्रशासनिक संरक्षण मिलता है.

 



इस पूरे संकट के उभरने के बाद कुछ निश्चित से कदम उठाये जाने लगते हैं. व्यवस्थागत सुधार के बजाय राजनीतिक खेल शुरू हो जाता है. सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलने लगता है. विपक्ष इसे सरकार की नाकामी और भ्रष्टाचार बताता है तो सत्तापक्ष इसे विरोधियों की साजिश कहकर अपना पल्ला झाड़ लेता है. सत्तापक्ष इसके साथ-साथ धरपकड़ करने की अपनी कार्यवाहियों को भी अंजाम देता रहता है. चार-छह छोटी मछली कहे जाने वाले व्यक्ति गिरफ्तार कर लिए जाते हैं, पूछताछ का प्रक्रम शुरू हो जाता है और फिर सालों-साल चलने वाली कानूनी प्रक्रिया की आड़ में लोग असली मुद्दा ही भूल जाते हैं. इन सबके बीच राजनीतिक असंवेदनशीलता यह होती है कि ऐसे मामलों को चुनावी रैलियों में, भाषणों में अपने प्रचार का माध्यम बना लिया जाता है मगर इस समस्या के स्थायी समाधान पर कोई भी चर्चा नहीं करता है.

 

इस तरह के घटनाक्रमों में यदि सबसे ज्यादा नुकसान में कोई रहता है तो वह आम परीक्षार्थी होता है, उसका परिवार होता है. दिन-रात की तैयारी के बाद पेपर लीक होना, पुनः पेपर देने के दौरान आशंकित बने रहना परीक्षार्थियों के भविष्य को भी धुंधलके में रखता है. एक आम परिवार अपने बच्चे को पढ़ाने के लिए अपना पेट काटकर उसे तैयारी करवाता है. कई परिवार तो अपनी जमीन गिरवी रख कर्ज लेते हैं. प्रश्नपत्र सार्वजनिक होने के कारण परीक्षा रद्द होने का अर्थ समय की बर्बादी मात्र नहीं बल्कि परिवार पर आर्थिक और मानसिक बोझ का पड़ना होता है. अनेक परीक्षार्थी मानसिक तनाव में आत्मघाती कदम तक उठा लेते हैं. आज इक्कीसवीं सदी में पहुँच जाने के बाद भी, तकनीक के लगातार विकास करने के बाद भी, उपग्रहों के द्वारा पल-पल की खबर रखने के बाद भी आज के युवाओं को सुरक्षित और पारदर्शी माहौल देने में नाकामी हाथ लग रही है.

 

तकनीक के इस दौर में किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र सुरक्षित न रख पाना हमारी तकनीकी और प्रशासनिक तंत्र  की बड़ी विफलता तो है ही साथ ही नागरिक अनुशासन की भी असफलता है. सोचने वाली बात ये है कि प्रश्नपत्र सार्वजनिक करने वाला सिंडिकेट ऐसा काम किसके लिए करता है? क्या ऐसा काम किसी राजनेता को चुनाव जिताने के लिए किया जाता है? क्या प्रश्नपत्र लीक किये जाने के पश्चात् अर्थव्यवस्था में तेजी आ जाती है? क्या इससे विदेश-नीति में किसी तरह का लाभ हो जाता है? प्रश्नपत्र सार्वजनिक करके का कार्य उन्हीं परीक्षार्थियों के लिए किया जाता है जिनको परीक्षा देनी होती है. प्रश्नपत्र भी उन्हीं के हिस्से में आता है जिनके अभिभावकों द्वारा भारी-भरकम धनराशि सम्बंधित सिंडिकेट तक पहुँचाई गई होती है. ऐसे में यदि राजनीतिक, प्रशासनिक व्यवस्था को दोषी माना जाता है तो नागरिकों को भी पूर्णतः दोष-मुक्त नहीं रखा जा सकता है. ऐसे में बाहरी आवरण को मजबूत और तकनीकयुक्त बनाने से कहीं ज्यादा कारगर होगा तंत्र के भीतर की व्यवस्था को मजबूत करना, उस पर सशक्त-सजग निगाह रखना. देखा जाये तो जितनी बड़ी समस्या परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों के सार्वजनिक होने की है, परीक्षाओं की गोपनीयता भंग होने की है उससे बड़ी समस्या उस नीयत की कमी का होना है जो भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करना चाहती है. राजनीतिक, प्रशासनिक, सामाजिक रूप से कहीं से भी अब जिम्मेदारी भरा ऐसा प्रयास नहीं दिखता जो भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करना चाहता हो.

 

अब केवल कड़े बयानों, कुछ छोटी-छोटी गिरफ्तारियों से काम नहीं चलने वाला. अब राजनैतिक-प्रशासनिक-सामाजिक तंत्र में बैठे ऐसे लोगों को चिन्हित किये जाने की, कड़ी सजा देने की आवश्यकता है जो परीक्षाओं की गोपनीयता के साथ-साथ परीक्षार्थियों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं.


30 मई 2026

शांत दिमाग से सोचना और विचार करना

शांत दिमाग से सोचना और विचार करना....

 

क्या कभी आपके घर कोई डॉक्टर आया, जिसने कहा हो कि आपके घर में कोई गर्भवती महिला है, जिसका अल्ट्रासाउंड करके वो बता देगा कि गर्भ में लड़का है या लड़की?

 

क्या कभी आपके घर में किसी परीक्षा से सबंधित कोई कर्मचारी आया है जिसने कहा हो कि सम्बंधित परीक्षा का पेपर इतने रुपये में मिल रहा है?

 

क्या आपके घर कभी यूनिवर्सिटी से कोई व्यक्ति आया है जिसने कहा हो कि वो आपकी संतानों के नंबर बढ़वा देगा?

 

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पिछले दो दशकों से अधिक के अध्यापन अनुभव में एक बात स्पष्ट रूप से देखने को मिली कि लगभग हर साल कुछ न कुछ अभिभावक आते हैं अपने बच्चों की सिफारिश लेकर. कुछ परीक्षा के दौरान ही 'कुछ देख लेने' का इरादा लेकर आते हैं; कुछ आते हैं जो परीक्षाओं बाद 'कुछ हो सकता है क्या?' के विचार के साथ आते हैं; कुछ वायवा-प्रैक्टिकल के समय अपने मंतव्य के साथ आते हैं.  ठीक ऐसी ही स्थिति प्रतियोगी परीक्षाओं के दौरान भी देखने को मिलती है. परीक्षा तिथि के पहले ही सब सेट कर लेने की मानसिकता में अभिभावक भटकने लगते हैं. लाखों रुपये में जो पेपर बेचे जा रहे हैं, उनके सन्दर्भ में विचार करिए कि कितने परीक्षार्थी सीधे तौर पर लाखों रुपये का सौदा करते हैं? बहुतायत के अभिभावक ही सामने आते हैं.

 

किसी भी सरकार को, किसी भी व्यवस्था को दोष देने के पहले हम सबको अपने ही गिरेबान में झाँकना चाहिए. कोई सीधे हमारे पास नहीं आता, हम भी भ्रष्ट बनने को आतुर रहते हैं और उस तरफ जाते हैं. सिस्टम में लगे लोगों को न इस व्यवस्था से मतलब होता है और न ही किसी परीक्षार्थी के भविष्य से. वे भौतिकतावाद के बाजार में उत्पाद लेकर खड़े हैं, जहाँ अभिभावक ग्राहक  के रूप में उपलब्ध हैं. कल को यही ग्राहक समाप्त हो जाएँ तो ये भ्रष्ट व्यवस्था किसे अपने पेपर बेचेगी? यहाँ वही बात सामने आती है कि हम सब चाहते हैं कि क्रांति हो, आन्दोलन हो, व्यवस्था बदले किन्तु इनके लिए कोई शहीद, कोई बलिदानी पैदा हो तो पड़ोस में हो. हमारी संतान कुछ बने, कहीं से उच्च शिक्षा ले मगर व्यवस्था बदलने के लिए, भ्रष्टाचार रोकने के लिए कोई संतान आगे बढे तो वो पड़ोस की हो.

 

अपनी सोच बदलिए साहब, बिना सोच बदले आप बस अपने मन की भड़ास निकालते रहेंगे और अगले ही पल अवसर मिलते ही अपने बच्चे के लिए गुहार लगायेंगे 'कुछ हो सकता है क्या?'


15 मई 2026

प्रतियोगी परीक्षाएँ और सुरक्षा जाँच का झमेला

प्रतियोगी परीक्षाएँ और पहनावे को लेकर बहुत सी पोस्ट सामने आती हैं. प्रशासन के द्वारा परीक्षा शुचिता के नाम पर अपनाये जाने वाले बहुत से कदमों का विरोध हम भी करते हैं. परीक्षा केन्द्र पर कलावा कटवाना, विवाहित महिलाओं का मंगलसूत्र उतरवाना, चेन लगी पैंटों में से चेन काटना आदि-आदि ऐसे कृत्य हैं जिनका लगातार विरोध होता है. इसके बाद भी एक बात को सहज रूप में स्वीकारते भी हैं कि परीक्षा के समय के पहनावे, साथ में लायी जाने वाली सामग्री, प्रतियोगी द्वारा क्या-क्या करना है, क्या-क्या नहीं करना है आदि-आदि के बारे में दिशा-निर्देश प्रवेश-पत्र पर स्पष्ट रूप से दिए जाते हैं. शासन-प्रशासन की तरफ से जारी किये गए प्रवेश-पत्र पर स्पष्ट रूप से दिए गए निर्देशों को या तो पढ़ा नहीं जाता है अथवा पढ़कर भी अनदेखा कर दिया जाता है. स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए होने के बाद भी यदि प्रतियोगी विद्यार्थी गलती करता है तो भले ही ऐसा अनजाने में हुआ हो मगर इसके लिए स्वयं विद्यार्थी को और अभिभावक को ध्यान रखना चाहिए. उनको इस बात का स्मरण होना चाहिए कि वे किसी प्रतियोगी परीक्षा के लिए जा रहे हैं, जिसके लिए साल भर मेहनत की गई है. ऐसी स्थिति में भी यदि लापरवाही विद्यार्थी की तरफ से हो रही है तो इसका साफ़ सा अर्थ है कि विद्यार्थी परीक्षा के लिए न तो ईमानदार है और न ही सजग.  

 

ये मान लिया जाये कि सारे दिशा-निर्देश दिए होने के बाद भी यदि विद्यार्थी उन पर ध्यान नहीं दे रहा है तो यहाँ एक बात प्रशासन को भी ध्यान रखनी चाहिए कि तमाम सारी कवायद के बाद भी पेपर लीक होने की घटनाएँ हो जाती हैं. ये घटनाएँ उस समय तो हो नहीं रही होती हैं जबकि विद्यार्थी परीक्षा केन्द्र के मुख्य द्वार पर खड़ा होता है. ऐसा भी नहीं है की वह कलावा में, मंगलसूत्र में, बड़े बालों में किसी तरह की अदृश्य तकनीक को छिपाकर ले जा रहा होगा. इसलिए ऐसे में उनके द्वारा सुरक्षा के नाम पर, जाँच के नाम पर अनावश्यक कदमों को उठाकर परीक्षार्थियों को परेशान नहीं करना चाहिए. उनको इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि पेपर लीक करवाने वाला न तो कलावा पहने होगा, न चेन वाली पेंट पहने होगा, न मंगलसूत्र पहने होगा, न फुल बाँह की शर्ट पहने होगा. जिसे पेपर लीक करने का खेल करना होता है, परीक्षार्थी को पास करवाने का ठेका लिया होता है वे शासन-प्रशासन के इंतजामों से कहीं आगे का इंतजाम किये होते हैं. ऐसे अपराधियों की धरपकड़ होती भी है, होनी ही चाहिए ताकि उन विद्यार्थियों के साथ गलत न हो सके जो मेहनत के साथ तैयारी करके अपना भविष्य बनाने के लिए परीक्षा में बैठते हैं. बावजूद इसके शासन-प्रशासन द्वारा अनावश्यक रूप से उठाये जाने वाले कदमों पर रोक लगनी चाहिए, उनको नियंत्रित होना चाहिए.

 

क्या चाहता है शासन-प्रशासन कि कल को परीक्षार्थी सिर्फ चड्डी-बनियान में परीक्षा-केन्द्र पर उपस्थित हो?


12 अप्रैल 2026

'विद्यार्थी' शब्द को 'छात्र' न बनायें

सामान्य बोलचाल में 'विद्यार्थी' शब्द के लिए 'छात्र' शब्द निःसंकोच, बहुतायत में प्रयोग होते दिखाई देता है. कभी विचार नहीं किया था कि ऐसी गलती शासन स्तर से देखने को भी मिलेगी. निदेशालय से जारी इस पत्र में एकाधिक जगह पर 'छात्र' शब्द का उपयोग किया गया है. यदि 'विद्यार्थी' शब्द लिखने में समस्या या कोई तकनीकी बाध्यता थी तो छात्र/छात्रा लिखा जा सकता था. यद्यपि निदेशालय की इस त्रुटि के लिए उनको पत्र लिख दिया गया है तथापि लगता नहीं है कि इसमें सुधार होगा. स्व-घोषित विद्वतजनों को समझाना, विशेष रूप से उनकी गलती पर, अत्यंत दुष्कर कार्य होता है.




05 नवंबर 2025

नैक के प्रति सुस्त चाल

भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों (कॉलेज, विश्वविद्यालय आदि) का मूल्यांकन और प्रमाणन का कार्य राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (National Assessment and Accreditation Council) द्वारा किया जाता है. संक्षेप में इसे नैक से सम्बोधित किया जाता है. यह यूजीसी का एक स्वायत्त निकाय है जिसकी स्थापना 1994 में हुई थी. नैक के द्वारा गुणवत्ता के मानकों के अनुरूप संस्थानों की ग्रेडिंग करना है. ऐसा किये जाने के पीछे मुख्य उद्देश्य यह था कि विद्यार्थियों को सही संस्थान चुनने में मदद मिले.

 

नैक के मुख्य कार्यों और उद्देश्यों में शैक्षणिक संस्थाओं की मान्यता को उनके मूल्यांकन के आधार पर की गई ग्रेडिंग से किया जाना है. शिक्षण क्षेत्र में उच्च शिक्षा से सम्बंधित संस्थाओं, चाहे वे महाविद्यालय हों अथवा विश्वविद्यालय सभी का मूल्यांकन नैक द्वारा किया जाता है.

 

इसके माध्यम से सुनिश्चित किया जाता है कि संस्थान गुणवत्ता मानकों को पूरा करते हैं अथवा नहीं. इन मानकों में पाठ्यक्रम, शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया, अनुसंधान, बुनियादी ढाँचा आदि के साथ-साथ अध्यापकों और विद्यार्थियों से सम्बंधित सुविधाओं और मूलभूत ढाँचे को शामिल किया जाता है.

 



विगत वर्षों में नैक को लेकर लगातार उठाये जाने वाले कदमों के बाद भी उच्च शिक्षण संस्थाओं में नैक मूल्यांकन करवाने को लेकर जागरूकता न के बराबर है. नैक मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कदम उठा रहा है. इसके लिए उसके द्वारा ऑनलाइन और हाइब्रिड मॉडल जैसी नई रणनीतियाँ शामिल हैं किन्तु निजी संस्थाएँ हों अथवा सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाएँ, सभी नैक करवाने में अभी बहुत पीछे हैं. उत्तर प्रदेश में यह स्थिति तो और भी सोचनीय है. 

 


27 जून 2025

विलय नहीं समस्या का समाधान हो

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पचास से कम नामांकन वाले प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों का नजदीकी विद्यालयों में विलय करने का निर्णय लिया है. ऐसे विद्यालयों की संख्या हजारों में है जहाँ पर नामांकन पचास से कम है. यदि नामांकन कम है तो उसे बढ़ाया जाये न कि विद्यालय का विलय कर दिया जाये, उसे बंद कर दिया जाये. वैसे भी सरकारों की प्राथमिकता बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना होता है. न केवल सरकारों द्वारा बल्कि विश्व बैंक द्वारा भी अनेक योजनाओं को क्रियान्वित किया गया जिनसे बच्चों को विद्यालय लाया जा सके. संविधान में 86वाँ संशोधन कर शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया. निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम अथवा शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के अन्तर्गत छह से चौदह वर्ष की आयु वर्ग के बालक-बालिकाओं को निःशुल्क प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है. सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत प्राथमिक शिक्षा से वंचित बस्तियों में विद्यालय खोले गए. इन सकारात्मक कार्यों, योजनाओं के बीच सरकार द्वारा शारदा (स्कूल हर दिन आयें) योजना क्रियान्वित है. इसमें छह से चौदह वर्ष की आयु वर्ग के ऐसे बालक-बालिकाओं का नामांकन होगा, जो किसी विद्यालय में नामांकित नहीं हैं अथवा नामांकन के बाद भी अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण नहीं कर सके. ऐसे बच्चों को चिन्हित कर उनका नामांकन नजदीकी विद्यालयों में आयु-संगत कक्षा में कराया जायेगा और शिक्षा से लेकर प्रत्येक सामग्री निःशुल्क उपलब्ध करायी जाएगी.  

 



बच्चों तक शिक्षा की सुलभता सम्बन्धी योजनाओं के बाद भी यदि सरकार को विद्यालयों का विलय करना पड़े तो स्थिति न केवल गम्भीर है बल्कि चिन्तनीय भी है. सरकार को नामांकन कम होने के कारणों-कारकों को खोजा जाना चाहिए. उन बिन्दुओं पर विचार करना चाहिए जो प्राथमिक विद्यालयों, उच्च प्राथमिक विद्यालयों के नामांकन को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहे हैं. विद्यालयों का विलय सिर्फ एक विद्यालय बंद होना नहीं होगा बल्कि यह अनेक दुष्परिणामों को साथ लेकर आएगा. सबसे बड़ा दुष्प्रभाव बच्चों की शिक्षा पर ही दिख रहा है. उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग के हाउसहोल्ड सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार 2020-21 में 4.81 लाख, 2021-22 में 4 लाख से अधिक और 2022-23 में 3.30 लाख बच्चों ने बीच में स्कूल छोड़ दिया. एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में स्कूल छोड़ने की दर अन्य प्रदेशों की तुलना में अधिक है. इसमें भी लड़कियों का प्रतिशत लड़कों की अपेक्षा अधिक है.

 

विद्यार्थियों का बड़ी संख्या में विद्यालय छोड़ना, नामांकन न करवाना चिन्ता का विषय है. सामाजिक-आर्थिक कारक, गरीबी, लैंगिक विभेद, शिक्षकों की कमी, बुनियादी ढाँचे की समस्या, शिक्षा में अरुचि, बाल श्रम का प्रचलन, अन्य सामजिक समस्याएँ आदि ड्रॉपआउट का कारण बनती हैं. ऐसे में विचार किया जाये कि जब बच्चे अपने ही गाँव में अथवा न्यूनतम दूरी पर बने विद्यालय नहीं जा रहे हैं, तो उनसे कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि वे कुछ किमी दूर स्थित विद्यालय जायेंगे? विद्यालयों का दूर होना बालिकाओं के लिए और बड़ी समस्या होगी. निम्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, घरेलू ज़िम्मेदारियाँ, सुरक्षा चिंताओं आदि के कारण उनकी शिक्षा पर पहले से ही संकट छाया रहता है. विद्यालय विलय पश्चात् उनके स्कूल छोड़ने की आशंका और ज़्यादा है. इसके साथ-साथ शिक्षकों के पदों की कटौती, नई शिक्षक भर्ती पर संकट, रसोइयों, शिक्षामित्रों का असुरक्षित भविष्य भी इसी से सम्बद्ध है.

  

यदि कम नामांकन पर ध्यान दें तो सरकारी नियम और कार्य-प्रणाली भी इसके लिए जिम्मेदार है. शिक्षा का अधिकार अधिनियम में प्रावधान के बावजूद सरकारी प्राथमिक विद्यालय के एक किमी परिक्षेत्र में खुलेआम निजी विद्यालयों को मान्यता दी जा रही है. निजी विद्यालयों का लगातार बड़ी संख्या में खुलते जाना और अधिनियम के अन्तर्गत गरीब विद्यार्थियों को प्रत्येक निजी विद्यालय द्वारा अपने यहाँ निशुल्क प्रवेश देने की बाध्यता भी कम नामांकन का एक कारक है. नियमानुसार निजी विद्यालयों द्वारा गरीब विद्यार्थियों को प्रवेश देने पर सरकार द्वारा निजी विद्यालयों को प्रतिपूर्ति शुल्क दिया जाता है, अभिभावकों को भी एक निश्चित राशि प्रदान की जाती है. इस आर्थिक पक्ष के कारण अभिभावकों, निजी विद्यालयों ने विद्यार्थियों को प्राथमिक विद्यालयों से दूर कर दिया. इसी तरह सरकारी प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश आयु छह वर्ष और निजी विद्यालय में तीन-चार वर्ष होने के कारण भी नामांकन पर असर पड़ा है. इसके चलते भी बहुत से माता-पिता अपने बच्चों को सरकारी विद्यालय के स्थान पर निजी विद्यालय में प्रवेश दिला देते हैं. इनके अलावा शिक्षकों की कमी, शिक्षकों का दूसरे सरकारी कार्यों में व्यस्त रहना, विद्यालयों में प्राथमिक सुविधाओं की कमी होना, स्मार्ट क्लासेज की शून्यता आदि भी कम नामांकन के लिए उत्तरदायी बिन्दु हैं.

 

विद्यालयों का विलय स्थायी अथवा दीर्घकालिक समाधान नहीं है. इसकी गारंटी कौन लेगा कि भविष्य में विलय किये गए विद्यालय में कम नामांकन नहीं होगा? ऐसे में विचारणीय बिन्दु यह होना चाहिए कि उन कारणों का पता लगाकर उनका समाधान किया जाये जिनके कारण विद्यालयों में कम नामांकन हो रहा है. सरकार को चाहिए कि विद्यालयों के मूलभूत ढाँचे को सुव्यवस्थित करे. शिक्षकों की कमी को पूरा करने के साथ अन्य कार्यों के लिए अलग से कर्मचारियों की नियुक्ति करे. कक्षाओं को विकसित बनाया जाये तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हेतु नवीनतम तकनीकों से विद्यार्थियों को परिचित कराया जाये. सरकारी नीतियों, योजनाओं को सहज तरीके से अनुपालन योग्य बनाया जाये ताकि अभिभावक परेशान न हों. सरकार प्राथमिक शिक्षा क्षेत्र में आ रही समस्या का समाधान करे, लगातार गहराते जा रहे रोग का इलाज करे न कि सम्बंधित अंग को ही काट कर अलग कर दे. शिक्षक संगठनों, अभिभावकों द्वारा इस निर्णय का विरोध किये जाने के बाद सरकार से अपेक्षा की जा सकती है कि वह अपने निर्णय पर पुनर्विचार करके शिक्षा को सुलभ, सहज बनाने का प्रयास करेगी. सरकार को ध्यान रखना चाहिए कि उसका लक्ष्य बच्चों को शिक्षा उपलब्ध करवाना है न कि उनको शिक्षा से वंचित करना, इसके लिए उसे अतिरिक्त आर्थिक बोझ ही क्यों न उठाना पड़े.

 


26 अगस्त 2023

असफलता जीवन का अंत नहीं

अपने निर्धारित समय पर चंद्रयान 3 के चंद्रमा की सतह पर उतरते ही हम वैश्विक स्तर पर चौथे देश हो गए जिन्होंने चंद्रमा का स्पर्श किया है. इस उपलब्धि के साथ ही हम इसके दक्षिणी ध्रुव पर पहुँचने वाले पहले देश भी बने. चंद्रयान 3 अब किस तरह से चंद्रमा के, अंतरिक्ष के रहस्यों को उजागर करेगा; कैसे नवीनतम खोजों को आधार मिलेगा; कैसे ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में चंद्रयान 3 भारत का नाम रोशन करेगा; कैसे हमारा देश अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की राह पर लगातार उन्नति के पथ पर बढ़ सकेगा; कैसे अंतरिक्ष यात्रा के लिए अन्य देशों को अपने यान प्रक्षेपित करने के लिए विश्वसनीय मंच उपलब्ध हो सकेगा आदि पर लगातार मंथन होता रहेगा, विमर्श होता रहेगा. इसके सापेक्ष अभियान की इस सफलता ने प्रमुखता से सिखाया है कि असफलताओं से खुद को निराश नहीं किया जाना चाहिए.  




मात्र चार साल की अल्पावधि में जिस तरह से इसरो के वैज्ञानिकों ने चंद्रयान 2 की असफल लैंडिंग की निराशा से बाहर निकल कर सफलता का झंडा चंद्रमा पर लहराया है, वह अनुकरणीय है. सन 2019 में भी हमारे वैज्ञानिकों ने चंद्रयान 2 को दक्षिणी ध्रुव पर उतारने का प्रयास किया था मगर चंद्रमा की सतह से कुछ पहले ही संपर्क नियंत्रण कक्ष से टूट गया था. लैंडर विक्रम की चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग न हो पाने और फिर ऑर्बिटर से उसका संपर्क टूट जाने बाद तत्कालीन इसरो प्रमुख के. सिवन भाव-विह्वल हो उठे थे. उनका अपने आँसू न रोक पाना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उनको गले लगाकर उनका हौसला बढ़ाना भारतवासी आज भी भूले नहीं हैं. उन आँसुओं के पीछे छिपी भावनात्मकता को आज की सफलता के बाद उमड़े आँसुओं से समझा जा सकता है, आज की स्वर्णिम गौरवमयी गाथा को समझा जा सकता है.


चंद्रयान 2 की असफल लैंडिंग के बाद से लेकर चंद्रयान 3 की सफल लैंडिंग के बीच वैज्ञानिकों के धैर्य, उनकी मेहनत, आत्मविश्वास की कहानी उन बच्चों को अवश्य ही सुनाई जानी चाहिए जो किसी एक प्रतियोगी परीक्षा की असफलता के बाद हताशा, निराशा, अवसाद के अंधकार में जाकर अपने जीवन को समाप्त कर लेते हैं. देश का एक शहर कोटा लम्बे समय से जहाँ प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए प्रसिद्ध रहा है वहीं अब वह बच्चों के द्वारा लगातार की जा रही आत्महत्याओं के लिए कलंकित हो रहा है. अभिभावकों को कोटा अथवा अन्य स्थानों पर कठिन परिश्रम कर रहे बच्चों के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरह हौसला, हिम्मत बननी चाहिए. अभिभावकों को समझाना और समझना चाहिए कि दो-चार प्रतियोगी परीक्षाओं की असफलता ही ज़िन्दगी का अभीष्ट नहीं है. ज़िन्दगी इसके भी बहुत आगे तक है. सफलताओं के लिए और भी रास्ते हैं, और भी मंच हैं.


इस अभियान की सफलता से यह भी सीखने को मिलता है कि किस तरह से असफलता के तनाव से बाहर निकलकर अल्प समय में भी सफलता को प्राप्त किया जा सकता है. एक-एक अभियान में देश सैकड़ों करोड़ रुपये के साथ-साथ सैकड़ों वैज्ञानिकों की मेधा, श्रम, समय, संसाधन आदि का समन्वित स्वरूप कार्य करता है. एक ऐसे देश के लिए जहाँ पर जनसंख्या का दबाव बहुत अधिक है; गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या भी अधिक है; जनहितकारी योजनाओं में धन की कमी नहीं रहने दी जाती है; प्राकृतिक आपदाओं में सरकारी खजाने से बिना किसी भेदभाव के सहायता उपलब्ध करवाई जाती है वहाँ स्पष्ट है कि न केवल आर्थिक संसाधनों पर बल्कि प्राकृतिक संसाधनों पर, मानवजन्य संसाधनों पर भी एक तरह का दबाव बन जाता है. संभव है कि अनेकानेक भावी योजनाओं को भविष्य के लिए सुरक्षित रख लिया गया होगा. संभव है कि अनेक संचालित योजनाओं के बजट को रोककर इस महत्त्वाकांक्षी अभियान को सफलता की राह ले जाया गया होगा. ऐसे में सफलता प्राप्त करने का दबाव किस स्थिति तक रहता होगा, इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता है.


इन स्थितियों का दबाव न केवल सरकार पर वरन वैज्ञानिकों पर भी रहता होगा. एक अभियान की असफल लैंडिंग का तनाव लेकर, देश की अनेकानेक परेशानियों, समस्याओं को जानते-समझते हुए, वैश्विक जगत में खुद को स्थापित करने के दबाव को लेकर भी हमारे वैज्ञानिकों ने महान उपलब्धि हासिल की है. उन्होंने दिखाया है कि हम भारतीय महज कीर्तिमान रचने के लिए नहीं वरन दुर्गम्य को सहज बनाने, अलभ्य को सुलभ बनाने के लिए पूर्ण मनोयोग, आत्मविश्वास से कार्य करते हैं. हमारे वैज्ञानिकों ने दिखाया है कि एक असफलता जीवन मे संभावनाओं का अंत नहीं करती है, बस हमें ही अपनी हिम्मत बनाये रखनी चाहिए. यही हौसला, हिम्मत ही मिशन चंद्रयान के बाद गगनयान और सूर्य मिशन के लिए प्रेरित कर रहा है. इसी हौसले को, असफलता के बाद सफलता पाने के जज्बे को हमें अपने बच्चों को समझाने की आवश्यकता है. 





 

01 मई 2022

मौखिकी परीक्षा (वायवा) एक अनावश्यक प्रक्रिया

आज बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी के अंतर्गत आने वाले तमाम महाविद्यालयों में परास्नातक स्तर के विद्यार्थियों की मौखिकी परीक्षा सम्पन्न हुई. परास्नातक अंतिम वर्ष के विद्यार्थियों की सामान्य परख ही इस मौखिकी परीक्षा में होने की, करने की सम्भावना बनती है. उनके ज्ञान से ज्यादा उनके प्रस्तुतीकरण को जाँचने का प्रयास किया जाता है. अपने अध्यापन के लम्बे समय में इस परीक्षा के दौरान विद्यार्थियों के ज्ञान में तो गिरावट देखने को मिली ही है, यह भी देखने को मिला है कि उनमें सामान्य शिष्टाचार भी जैसे समाप्त होता जा रहा है. मौखिकी परीक्षा के लिए आना, परीक्षकों के समक्ष अभिवादन, शिष्ट आचरण आदि जैसे कहीं लोप हो चुके हैं. ऐसा लगता है जैसे वे लोग अध्यापकों पर, परीक्षकों पर, महाविद्यालय पर किसी तरह का एहसान करने के लिए आये हुए हैं. 


कुछ साल पहले तक मौखिकी परीक्षा को रोक दिया गया था. हमें व्यक्तिगत स्तर पर वह निर्णय अत्यंत सुखद लगा था. ऐसा इसलिए क्योंकि विद्यार्थियों की एक बड़ी संख्या में एक बहुत सी छोटी संख्या होती है जो परीक्षकों को संतुष्ट करने का कार्य करती है, उनके पूछे प्रश्नों के सही उत्तर देती है. बहुतायत में तो स्थिति यह होती ही कि उनको हिन्दी साहित्य का काल-विभाजन भी नहीं पता, कालखंड अनुसार साहित्यकारों के नाम की जानकारी नहीं. इस पर भी विद्रूपता यह कि ऐसे विद्यार्थियों को भी अंक देना परीक्षकों की मजबूरी होती है. एक-एक विद्यार्थी के लिए कई-कई फोन, कई-कई सिफारिशें मेज पर अपनी उपस्थिति दर्शाती हैं.


विश्वविद्यालय स्तर पर बनी अनेक कमेटियों में मित्रों, परिचित सदस्यों से अनेक बार कहा भी है कि इस तरह की अनावश्यक व्यवस्था को बंद किया जाये या फिर इसे इस तरह से डिजाइन किया जाये कि विद्यार्थी इसके प्रति सक्रियता दिखाए. अपने ज्ञान को बढाए. जब तक इस मौखिकी परीक्षा में कोई ढाँचागत सुधार नहीं किया जायेगा तब तक सामने चुप्पी लगाये बैठे विद्यार्थी को भी उसके साथ चलकर आई सिफारिश के आधार पर अंक देने होंगे. उनको उत्तीर्ण करना होगा. यह सब शायद इसलिए भी सहज रूप में स्वीकार्य है क्योंकि हम सभी को भली-भांति जानकारी है कि वर्तमान दौर में परास्नातक करने के बाद भी किसी बच्चे का भविष्य निर्माण नहीं होने वाला.


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28 मार्च 2022

आत्मीय रिश्ते की सुगन्धित महक

एक शिक्षक के रूप में किसी संस्थान में पढ़ाना कभी भी सोचा नहीं था और विडम्बना देखिये कि आज भी एक संस्थान में अध्यापक के रूप में नियुक्त होने के बाद भी खुद को इसके लायक नहीं समझते हैं. जीवन के किसी भी पल में शिक्षक बनने का ख्याल मन में नहीं आया. इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई के दौरान तो पढ़ना ही बहुत ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं लगता था. ये बात है नब्बे के दशक की, उस समय के बच्चों में बहुत कम बच्चे ही ऐसे होंगे जो अपने कैरियर के लिए गधे के जैसे लगे रहते होंगे. हम तमाम मित्र तो अपने पेपर वाले दिन भी ये प्लान बनाने में ज्यादा समय बिताया करते थे कि पेपर के बाद और शाम को कहाँ पर बैडमिंटन खेलना है, कहाँ पर क्रिकेट खेलना है.


आज के बच्चों को, उनके माता-पिता को देखते हैं तो लगता है कि जैसे हमारे दौर में न तो बच्चे हुआ करते थे, और न ही माता-पिता. सबके सब एकदम निर्द्वंद्व, स्वतंत्र से दिखाई देते थे, जिनके सामने एकमात्र उद्देश्य स्वस्थ जीवन बिताना हुआ करता था, बाकी की बातें द्वितीयक थीं. खैर, माता-पिता-गुरुजनों के आशीर्वाद से इतना पढ़ गए कि अपने से बहुत छोटे बच्चों को कुछ समझा सकते. इसी कड़ी में उरई के अपने ही अभिन्न पारिवारिक सदस्य के शैक्षिक संस्थान से स्नेहिल आदेश जैसा आया कुछ महीने हिन्दी विषय में अध्यापन कार्य का. चूँकि उस समय तक परास्नातक किये भी पाँच-छह वर्ष बीत चुके थे, सिविल सेवा की तैयारी भी ठीक-ठाक चल रही थी ऐसे में एक पल को लगा कि किसी संस्थान में पढ़ाने के लिए जाने पर भले ही कुछ आर्थिक सहायता हो जाये मगर हमारी खुद की तैयारी में नकारात्मक असर होगा. ऐसी ही सोच के चलते पहले तो वहाँ पढ़ाने से इंकार कर दिया मगर पारिवारिक रूप से जुड़े होने के कारण वहाँ पढ़ाने के लिए सहमति दे दी.


स्कूल में जाना हुआ तो बहुत से विद्यार्थियों से संपर्क हुआ. बहुत से विद्यार्थी पूर्व-परिचित निकले तो कुछ उसके बाद परिचित हो गए. स्कूल के कुछ विद्यार्थी पढ़ने के इच्छुक रहते थे तो कुछ के लिए स्कूल महज तफरी का माध्यम. हमने अपने स्तर पर जैसा बन पड़ता था वैसा किया. किसी भी विद्यार्थी के साथ किसी भी स्तर का भेदभाव नहीं किया. पढ़ाने के मामले में जो, जितना ज्ञान हमें था उतना सब अपने विद्यार्थियों के बीच बांटने की कोशिश की. इस कोशिश में बहुत विद्यार्थी अत्यंत निकट आ गए. उन सभी से ये निकटता न केवल उन तक रही बल्कि पारिवारिक हो गई. आज वे विद्यार्थी भले ही उच्च सेवाओं के चलते, वैदेशिक व्यवस्थाओं के चलते हमसे बहुत दूर हों मगर इंटरनेट के कारण से, सोशल मीडिया के कारण से उतने ही निकट हैं.




अपनी ऐसी ही एक विद्यार्थी, अर्चना से मुलाकात हुई. कई वर्षों के बाद हुई मुलाकात में बहुत सी पुरानी बातें सामने से गुजरीं, बहुत से घटनाक्रम ने फिर से उसी दौर में पहुँचा दिया. अर्चना से और उसके परिवार से सोशल मीडिया के माध्यम से मिलना होता रहता है, इस कारण से लगा नहीं कि बहुत दिन बाद मिल रहे हैं. बहुत सारी बातें हुईं और उन्हीं बातों में वो दौर भी याद आया और आज का समय भी सामने आया. आज भी हम एक शैक्षिक संस्था में अध्यापन कार्य कर रहे हैं. वहाँ भी हमारा वर्ष 2005 से अध्यापन कार्य में जुड़ना हो गया था. इसके बाद भी लगता है कि वे विद्यार्थी जो हमसे वर्ष 2000 में जुड़े थे, वे आज भी दिल से जुड़े हैं, ईमानदारी से जुड़े हैं.


बहरहाल, हमारे जो भी विद्यार्थी रहे हैं, आज हैं उन सबको आशीर्वाद कि वे उच्च पदों पर विराजमान हों मगर गुरु-शिष्य की पावन परम्परा को विस्मृत न करें. उस परम्परा का पूरी ईमानदारी, सकारात्मकता से पालन करते अर्चना को देखा, अन्य कई विद्यार्थियों को भी देखा है.


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21 सितंबर 2020

जाने-अनजाने हो गई मदद

अक्सर ऐसा होता है कि किसी की सहायता करने का मन होता है मगर स्थितियों और नियमों के चलते ऐसा कर पाना मुश्किल हो जाता है. ऐसी स्थिति बड़ी ही जटिल हो जाती है. सामने वाला समझता है कि जिस व्यक्ति से मदद माँगी जा रही है वह सहायता करना नहीं चाह रहा और जो मदद करना चाहता है वह नियमों, परिस्थितियों के कारण मजबूर रहता है. इधर पिछले तीन-चार दिन से कुछ ऐसा ही हो रहा था हमारे साथ. चीनी वायरस कोरोना के चलते विश्वविद्यालय की परीक्षाओं को बीच में ही स्थगित करना पड़ा था. उसी में परास्नातक की मौखिकी परीक्षाओं को भी टालना पड़ा था. इधर जैसे-जैसे अनलॉक की स्थिति आगे बढ़ती रही शासन स्तर से परीक्षाओं को लेकर अपने कदम बढाए जाने लगे. इसी में आदेश आया कि अंतिम वर्ष की छूटी हुई परीक्षाओं को करवाया जाएगा. इन्हीं में परास्नातक की मौखिकी परीक्षाओं को भी शामिल किया गया था.


अभी मौखिकी परीक्षा के तीन-चार दिन पहले मोबाइल पर घंटी बजी. उस नम्बर पर बहुत सीमित लोगों की ही कॉल आती है, उन सबके नम्बर उसमें सेव हैं ऐसे में अनजाना नम्बर चमकने पर आश्चर्य हुआ. फोन उठाया तो पता चला कि परास्नातक का छात्र है जिसकी मौखिकी परीक्षा से सम्बंधित समस्या है. उसके समाधान के बारे में कुछ कहने के पहले जानकारी की कि ये नम्बर उसे दिया किसने है. उसने बताया कि बहुत खोजबीन के बाद इंटरनेट से प्राप्त हुआ. वह नम्बर सार्वजनिक नहीं है फिर याद आया कि बहुत पहले उस नम्बर को कुछ जगहों पर दे रखा था, दूसरे मोबाइल नम्बर के विकल्प रूप में. उसकी बात सुनने के बाद लगा कि उसकी सहायता की जानी चाहिए मगर स्थिति ऐसी थी कि चाह कर भी मदद नहीं हो सकती थी.


उसकी पूरी बात सुनने-समझने के बाद उसको समझाया. आश्वस्त किया कि यथासंभव मदद की जाएगी. वह दिन में दो-तीन बार फोन करके किसी भी तरह से सहायता करने की बात करता और हम हर बार उसे आश्वस्त करते. असल में रविवार को मौखिकी परीक्षा थी और उसी दिन एक प्रतियोगी परीक्षा होने के कारण उसकी उपस्थिति में कुछ विलम्ब की सम्भावना थी. मौखिकी परीक्षा सम्पन्न होने, सभी विद्यार्थियों के अंक इंटरनेट के माध्यम से विश्वविद्यालय भेजने की प्रक्रिया में समय बहुत नहीं लगता है. ऐसे में आंतरिक और वाह्य परीक्षक भी अपना कार्य पूर्ण करके घर पहुँचने की कोशिश में रहते हैं. आखिर वे भी सुबह नौ बजे से आधा सैकड़ा से अधिक विद्यार्थियों के विस्मयकारी ज्ञान से जूझ रहे होते हैं.


अध्यापन कार्य से जुड़े होने के कारण अन्दर से यह भी लग रहा था कि किसी विद्यार्थी का नुकसान न हो. इस सम्बन्ध में किसी तरह की सहायता न कर पाने की विवशता के कारण खुद में बुरा भी लग रहा था. उसे अपनी प्रतियोगी परीक्षा पूर्ण मनोयोग से देने की बात कहते हुए उस दिन भी उसे आश्वस्त किया. किसी बच्चे का भला हो जाने की नीयत से किये जाने वाले आश्वासन संभवतः सत्य में बदल गए. विश्वविद्यालय से सूचना प्राप्त हुई कि मौखिकी परीक्षा के अंकों को विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर शाम छह बजे के बाद ही अपलोड किया जाएगा. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि मौखिकी परीक्षा की सूचना विद्यार्थियों को अल्प समय में दी गई थी. ऐसे में विश्वविद्यालय की तरफ से शाम छह बजे तक अनुपस्थित विद्यार्थियों की प्रतीक्षा करने को कहा गया.


ऐसी जानकारी मिलते ही उस छात्र को खबर कर दी. वह अत्यंत ख़ुशी के भाव से अपनी परीक्षा देने उपस्थित हो गया. उससे मुलाकात तो नहीं हो सकी क्योंकि हम आंतरिक अथवा वाह्य परीक्षक के दायित्व से मुक्त थे. बात करते-करते उसका बार-बार गला भर आता. उसे समझाया कि इसमें हमारा कोई प्रयास नहीं है, यह विश्वविद्यालय के आदेश से स्वतः ही हुआ है. वह पिछले तीन-चार दिन से लगातार हमारे द्वारा फोन रिसीव किये जाने, उसकी बात लगातार सुनने, उसे आश्वस्त करने आदि को लेकर वह अत्यंत भावुक हो रहा था. अच्छा लगा कि भले ही कोई काम हमारे प्रयास से न हुआ हो मगर एक छात्र ख़ुशी-ख़ुशी अपने परीक्षा में शामिल हो सका.


हमसे मिलने, मिठाई खिलाने की उसकी बात पर कहा कि बस हमें याद रखना और जब नौकरी लग जाए तो आना मिठाई खिलाने. उस छात्र को शुभकामनाएँ.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

07 जनवरी 2020

विद्यार्थियों का नहीं राजनैतिक है जेएनयू विवाद


चुनाव की तिथियाँ घोषित होने के आसार पहले से ही थे और उसी के हेरफेर में आखिरकार उत्पाती गैंग, लोटा गैंग ने अपना कारनामा दिखा दिया. जेएनयू में पंजीकरण के नाम पर उत्पात किया गया उसके बाद उन्हीं उत्पातियों को अपनी तरह से दूसरे गैंग ने सबक भी सिखाया. पंजीकरण रोकने को मचा उत्पात किसी भी तरह से सुर्ख़ियों में नहीं आ सका मगर उसकी प्रतिक्रिया में जब हंगामा मचा तो सबकी निगाहों में आ गया. खून-खराबा हुआ, लड़कियों से, शिक्षकों से भी हाथापाई हुई. दोनों पक्ष अपनी-अपनी तरह से अपने-अपने तर्क रख रहे हैं. बहरहाल, ये हंगामा अब विश्वविद्यालय से संदर्भित कम केन्द्र सरकार से संदर्भित अधिक हो गया है. विश्वविद्यालय के विद्यार्थी गुटों की आपसी तनातनी से अधिक ये केन्द्र सरकार के निर्णयों के विरोध का हो गया है. यदि ऐसा न होता तो फिर उत्पात के बाद बामपंथियों द्वारा फ्री कश्मीर, हिन्दू राष्ट्र विरोधी, ब्राह्मण विरोधी, हिंदुत्व विरोधी नारे क्यों लगाये गए? स्पष्ट सी बात है कि इस उत्पात के बहाने बामपंथियों ने या कहें कि भाजपा-विरोधियों ने चुनावी रंगत को जमाना शुरू कर दिया है.

यदि इस हंगामे को, मारपीट को महज विद्यार्थी गुटों की लड़ाई माना जाये तो वे सारे लोग जो किसी न किसी रूप से हॉस्टल से अथवा विश्वविद्यालय की राजनीति के संपर्क में रहे हैं सहजता से बता सकते हैं कि ये हंगामा विद्यार्थियों के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए करवाया गया है. यदि ये हंगामा विद्यार्थियों के आपसी तनाव का, विभेद का मसला है तो इसमें वे राजनीतिज्ञ शामिल क्यों हुए जो अब किसी भी रूप में विश्वविद्यालय का हिस्सा नहीं हैं? इस संघर्ष में क्यों वे लोग शामिल होते चले जा रहे हैं जिनका न तो शिक्षा से कोई लेना-देना है और न ही शैक्षिक संस्थान से? स्पष्ट है कि ये दो विद्यार्थी गुटों का नहीं वरन राजनीति का उत्पात है. जो लोग भी हॉस्टल की जीवन-शैली से परिचित रहे होंगे, कॉलेज की गुटबंदी को जिसने पास से देखा होगा उसके लिए समझना आसान है कि ऐसे संघर्ष, ऐसी मारपीट आये दिन गुटों में होती रहती है. किसी दिन कोई एक गुट हावी रहता है, किसी दिन दूसरा गुट हावी हो जाता है. इस संघर्ष में, इस तनाव में किसी तरह का ऐसा मुद्दा मुख्य नहीं होता है जैसा कि इस उत्पात के बाद जेएनयू में दिख रहा है. 

इस तरह के तनाव, उत्पात जहाँ राजनीति के चलते बढ़ते जा रहे हैं वहीं इनके पीछे मीडिया का भी हाथ है. इसमें सोशल मीडिया को कतई दोषमुक्त नहीं कहा जा सकता है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया से ज्यादा दोषी तो वर्तमान में सोशल मीडिया ही है, ऐसे तनाव, संघर्ष के लिए. हर हाथ मोबाइल से लैस है. ऐसे में एक व्यक्ति उत्पात को अंजाम दे रहा होता है, दूसरा व्यक्ति उसको सोशल मीडिया पर पोस्ट करने में लगा होता है, तीसरा व्यक्ति उसे शेयर करके उसका फैलाव करता है तो चौथा व्यक्ति उस पर आपत्तिजनक टिप्पणी करके उत्पात को भड़काने का काम करता है. ऐसे न जाने कितने-कितने ग्रुप छोटे-बड़े रूप में बड़े योजनाबद्ध तरीके से कुत्सित मंसूबों को सफल बनाने के प्रयास करते रहते हैं. समाज में लोगों के बीच आग लगाने का काम करते हैं. वर्तमान में जेएनयू विवाद के पीछे विशुद्ध रूप से दिल्ली विधानसभा का होने वाला चुनाव है. इस चुनाव के चलते विद्यार्थियों की आड़ में केन्द्र सरकार के निर्णयों का विरोध करने और मतदाताओं के बीच नकारात्मक सन्देश प्रसारित करने की स्पष्ट मंशा दिख रही है.

22 जुलाई 2019

नाबालिग बाइक स्टंटबाज़ और जान हथेली पर


क्या आपने कभी बीच शहर में बाइक से स्टंटबाजी होते देखी है? शहर की उस सड़क पर ऐसा होते देखा है जहाँ आवागमन बहुतायत में रहता हो? क्या ऐसा कारनामा सड़क पर नाबालिगों द्वारा होते देखा है? बहुत से लोगों का जवाब इसके लिए न में होगा. आपमें से बहुतों का जवाब भले ही न में हो मगर हमारा शहर ऐसा ही है. यहाँ ऐसा ही होता है, बीच सड़क पर होता है, भीड़ भरी सड़क पर होता है, विद्यार्थियों द्वारा होता है. अंदाजा लगाइए, शहर का मुख्य मार्ग, लोगों की पैदल आवाजाही के बीच वाहनों का निर्बाध आवागमन और उसी के बीच स्टंट करते बाईकर्स. बाइक पर स्टंट करते ये लोग कोई व्यावसायिक अथवा प्रशिक्षित स्टंटबाज नहीं होते हैं. ये किसी बाइक कंपनी का प्रचार करने वाले भी नहीं हैं. इन स्टंट करने वालों को किसी भी तरह से बाइक बेचना नहीं है. किसी तरह का कोई पारिश्रमिक भी नहीं मिलना है इसके लिए. इसके बाद भी इनकी स्टंटबाज़ी लगातार ज़ारी रहती है. और तो और स्टंट करते समय ये बाइक पर अकेले भी नहीं होते हैं. इनका कोई निश्चित समय भी नहीं होता है स्टंट करने का. तेज रफ़्तार, अनियंत्रित ढंग से सड़क पर बाइक दौड़ाते ये बाईकर्स किसी तरह के यातायात नियमों का पालन भी नहीं करते हैं. चौंकिए नहीं, ये किसी फिल्म का, किसी टीवी सीरियल का सीन नहीं बल्कि उरई की स्टेशन रोड का नित्य का हाल है. सुबह हो या शाम, दोपहर हो या फिर रात सड़क खाली हो या फिर लोगों से भरी, ये बाइकर्स अपनी-अपनी बाइक पर करतब दिखाते यहाँ आसानी से दिख जाते हैं.


शहर के प्रसिद्द चौराहा जो कभी नगर के प्रसिद्द व्यापारी मच्छर मल सिन्धी के नाम पर मच्छर चौराहा के नाम से जाना जाता था अब इसे शहीद भगत सिंह चौराहा के नाम से जानते हैं, यहाँ से रेलवे स्टेशन तक बाइक वाले स्टंटधारियों की कलाकारी दिखती है. यह कलाकारी इतने तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि इससे बाद उसी सड़क पर राठ रोड नवनिर्मित ओवर ब्रिज तक इनकी अनियंत्रित भागती बाइक को देखा जा सकता है. तेज गति से बाइक को दौड़ाना, एकसाथ दो-दो, तीन-तीन लोगों का बैठना, पूरी सड़क पर लहरा-लहरा कर बाइक का भगाना, बाइक के साइड स्टैंड को सड़क पर रगड़ करवा कर चिंगारी पैदा करना, कभी-कभी एक पहिये के सहारे बाइक को चलाने का स्टंट करना, तेज एक्सीलेटर के द्वारा फायरिंग की आवाज़ करवाना आदि को नियमित रूप से देखा जा सकता है. आश्चर्य की बात ये कि ये सभी बाइकर्स किशोरावस्था के हैं. विद्यालयों में पढ़ने वाले ये विद्यार्थी इस सड़क पर अपने करतब दिखाते नजर आते हैं. उन्हें न तो अपनी जान की परवाह रहती है और न ही उस सड़क पर आवागमन करते नागरिकों की. इस कारण आये दिन इस सड़क पर हादसे होते रहते हैं. कई बार यही बाइकर्स चोट-चपेट का शिकार बनते हैं तो कई बार ये आम नागरिकों को घायल करते हैं. विडम्बना ये है कि स्टेशन रोड के आसपास रिहायशी नागरिकों द्वारा, दुकानदारों द्वारा यदि इनको समझाने का प्रयास किया जाता है तो ये किशोर बाइकर्स लड़ने-झगड़ने पर भी आमादा रहते हैं. अनेक बार दुकानदार, नागरिक इनकी हिंसा का शिकार भी हुए हैं.  

ऐसा नहीं है कि इस सड़क को प्रशासन द्वारा बाइक स्टंट के लिए अनुमति दी गई है. बच्चों के बाइक पर स्टंट करने का एक कारण इस सड़क पर संचालित तमाम कोचिंग सेंटर्स, कॉलेज और फास्ट फ़ूड सेंटर्स हैं. यहाँ किशोरों की, युवाओं की बहुतायत में आमद रहती है. इनके एकसाथ आने-जाने के कारण तमाम सारे छोटे-बड़े ग्रुप सड़क पर अनियंत्रित ढंग से अपने क्रियाकलापों को संपन्न करते रहते हैं. इन बच्चों के परिवार वाले तो जैसे इनके प्रति, इनकी सुरक्षा के प्रति आँखें मूँदें ही हैं, प्रशासन भी इस सड़क पर इन बाइकर्स के खिलाफ किसी भी तरह की सख्त कार्यवाही करने से बचता है. शहर भर में जगह-जगह आये दिन वाहनों की जांच की जाती है. वहां चालकों के कानूनी कागजातों की जांच की जाती है. हेलमेट, सीट बेल्ट लगाये जाने के सन्देश प्रसारित किये जाते हैं. आये दिन स्कूल के बच्चों के साथ यातायात नियमों के पालन करने सम्बन्धी रैलियाँ निकाली जाती हैं. इन सबके बाद भी स्टेशन रोड प्रशासनिक सख्ती की आस निहारती रहती है. ये समझ से परे है कि आखिर प्रशासन स्टेशन रोड पर होते स्टंट पर, तेज रफ़्तार दौड़ती बाइक पर नियंत्रण क्यों नहीं कर रहा है? यहाँ बाइक दौड़ाते बच्चों के ड्राइविंग लाइसेंस की जांच क्यों नहीं की जाती है? सोचने वाली बात ये है कि इस सड़क की ये सारी गतिविधियाँ प्रशसन के संज्ञान में हैं. इसके बाद भी ऐसा लगता है जैसे कार्यवाही के लिए वह किसी बहुत बड़े हादसे के इंतजार में है.


19 फ़रवरी 2019

बाजार में बदलती शिक्षा व्यवस्था


परीक्षाओं का मौसम आया हुआ है. हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के बच्चों की विभिन्न बोर्ड से सम्बंधित परीक्षाएं संचालित हैं. कुछ दिनों में यूनिवर्सिटी से सम्बंधित परीक्षाएं भी आरम्भ हो जाएँगी. इन तमाम सारी परीक्षाओं में कई विषय ऐसे होते हैं, जिनमें प्रयोगात्मक परीक्षाएं भी संपन्न होती हैं. विगत कई वर्षों से अध्यापन क्षेत्र से जुड़े होने के कारण परीक्षाओं के मौसम में आते जा रहे बदलाव को निरन्तर बहुत नजदीक से देखने का मौका मिला है. किसी समय में हमारे शहर में गिने-चुने विद्यालय हुआ करते थे. उनमें भी इक्का-दुक्का हुआ करते थे जिनकी अपनी प्रतिष्ठा थी. हाईस्कूल, इंटर की परीक्षाओं के लिए कुछ विद्यालय तो मानक रूप में सबके सामने थे. वहाँ की पढ़ाई, वहाँ परीक्षाओं के दौरान की पारदर्शिता, शुचिता का अपना ही स्वरूप था.


समय बदलता रहा. सरकारों की नीतियां बदलती रहीं. स्व-वित्त प्रणाली ने निजी विद्यालयों, महाविद्यालयों को जैसे कुकुरमुत्तों की तरह उगा दिया. गली-गली में विद्यालय खुल गए हैं, खेतों-खेतों में महाविद्यालय खुले हुए हैं. जहाँ पहले कम शैक्षिक संस्थानों के होने के बाद भी अध्ययन में गुणवत्ता देखने को मिलती थी वहीं अब इसी में सबसे ज्यादा गिरावट दिखाई दे रही है. और ऐसा तब हो रहा है जबकि इन संस्थानों की संख्या बहुत अधिक हो गई है. शैक्षिक संस्थानों की बाढ़ के बीच आती शैक्षिक गिरावट के साथ-साथ अब अभिभावकों में, शिक्षकों में, विद्यार्थियों में भी गिरावट देखने को मिली है. यदि कहें कि शिक्षा जगत के जितने भी अंग-प्रत्यंग हैं वे सबके सब गिरावट का शिकार हुए हैं तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. किसी भी संस्थान में प्रवेश के मानक अब वहाँ नक़ल करवाने-करने में मिलने वाली सुविधा बन गई है. प्रयोगात्मक परीक्षाओं में भी अधिकाधिक अंक दिलवाने को किसी भी संस्था का आदर्श रूप माना जाने लगा है. किसी समय में अभिभावकों द्वारा अपने पाल्यों के प्रति इस तरह का भाव देखने को नहीं मिलता था मगर अब उनमें भी इस तरह का भाव दिखाई देता है. परीक्षा आरम्भ होने से लेकर समापन तक कदम-कदम पर उसके लिए अधिकाधिक अंकों की जुगाड़ में लिप्त रहना साफतौर पर दिखाई देता है. परीक्षाओं के दौरान नक़ल की व्यवस्था, परीक्षा पश्चात् मूल्यांकन के दौरान भी अधिकाधिक अंक प्राप्त करने की जुगाड़ खोजना अब बहुतायत अभिभावकों का जैसे स्वभाव बनता जा रहा है. 

संभव है कि ऐसा सभी जगह न हो मगर आज अधिकाधिक जगहों पर ऐसा ही हो रहा है. ऐसे में सोचा जा सकता है कि किसी भी जगह पर वहाँ की शिक्षा व्यवस्था कैसे विकास करेगी? जहाँ अभिभावकों में, शिक्षकों में, विद्यार्थियों में इस तरह की मानसिकता पनप रही हो वहाँ वे शिक्षा के द्वारा, अध्ययन-अध्यापन के द्वारा खुद को सफलता के मार्ग पर कैसे ले जा सकते हैं? शायद यही कारण है कि अब शहरों में विज्ञापनों के बीच डिग्री के, शिक्षा संस्थानों के विज्ञापन दिखाई पड़ते हैं जो नौकरी देने की, रोजगार दिलवाने की बात करते हैं. कोई भी शैक्षिक संस्थान संस्कारों की, सभ्यता की, शिक्षा की बात नहीं करता है. रोजगारपरक शिक्षा आज की आवश्यकता भले ही हो गई हो मगर जब किसी भी शिक्षा का, किसी भी डिग्री का एकमात्र उद्देश्य सिर्फ नौकरी लेना ही हो जाये तो उसके लिए फिर बाजारवाद का सिद्धांत ही लागू होगा. वहाँ सिर्फ बाजार के नियम ही लागू होंगे.

27 जुलाई 2018

गुरु की बदलती स्थिति-प्रस्थिति


तमाम सारे विदेशी कार्यक्रमों की धूम-हंगामे के बीच एक-दो भारतीय पर्व ऐसे भी हैं जो बहुत शोर-शराबे से न सही मगर मना लिए जाते हैं. इनके मनाये जाने के पीछे सोशल मीडिया की भूमिका बहुत बड़ी है. किसी भारतीय पर्व के एक-दो दिन पहले से कुछ बैनर, कुछ चित्र, कुछ विचार सोशल मीडिया पर इधर से उधर तैरने लगते हैं और इसी धार में बहुतेरे लोग तैराकी सीख लेते हैं. किसी समय विद्यालयों, महाविद्यालयों में गुरु पूर्णिमा के नाम पर संस्कारित आयोजन हो जाया करते थे, जो अब नितांत अवकाश में बदल गए हैं या फिर शुभकामनायें देने भर तक. संभव है कि गुरु पूर्णिमा की बधाइयाँ, शुभकामनायें इधर से उधर करते बहुतेरे लोगों को जानकारी भी न हो कि गुरु पूर्णिमा किस कारण से मनाई जाती है. वैसे आज के समय में आधुनिक गुरु गूगल बाबा ने सबकुछ सहज सा कर दिया है. यहाँ आपने जिज्ञासा रखी, उधर उनका समाधान आया. अब ये समाधान कितना सही, कितना गलत ये आप पर निर्भर करता है. इसी सही-गलत के बीच फंसने से पहले गुरु पूर्णिमा पर प्रकाश डालते चलें.


आषाड़ मास की पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा के नाम से जाना जाता है. कृष्ण द्वैपायन व्यास जी का जन्म इसी दिन हुआ था. उनके द्वारा महाभारत की रचना की गई थी. वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और ऐसा माना जाता है कि चारों वेदों की रचना उन्हीं के द्वारा की गई थी. इसी कारण से उनको वेदव्यास के नाम से भी जाना जाता है. गुरु-शिष्य परंपरा में उनको आदिगुरु माने जाने के कारण उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है. इस पर्व के सन्दर्भ में ऐसी मान्यता है कि प्राचीनकाल में जब शिष्य अपने गुरु से पूर्ण शिक्षा प्राप्त कर लेता था, उसके बाद वो शिष्य श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर इसी दिन अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था. वर्तमान में प्राचीन गुरुकुल पद्धति चलन में न होने के बाद भी गुरुपूर्णिमा का महत्व कम नहीं हुआ है. आज भले ही शैक्षिणक संस्थानों में पारंपरिक रूप से शिक्षा दी जा रही हो किन्तु इनमें आज भी इस दिन गुरुजनों को सम्मानित किया जाता है.

गुरु, शिक्षक से सम्बंधित अनेक सूक्तियाँ, श्लोक, सार-वाक्य हमारे आसपास मिल जाते हैं. व्यक्ति इनको न केवल सुनता आ रहा है वरन आत्मसात भी करता रहा है. ये और बात है कि वर्तमान में सामाजिक भटकाव की स्थिति में बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोगों को भी समझ नहीं आ रहा है कि वे क्या कर रहे हैं. इसे भटकाव कहें या फिर सामाजिक विसंगति कि गुरुपूर्णिमा का आयोजन करने वाले देश में गुरुओं द्वारा दी गई शिक्षा को विस्मृत कर दिया गया है. आज शिक्षा के नाम पर बाजार उपलब्ध है. संस्थानों के नाम पर दुकानें बनी दिख रही हैं. शिक्षकों को राजनीति का, नेतागीरी का पर्याय माना जाने लगा है. गुरु शब्द की गरिमा अब उसको ताना मारने के रूप में, गाली देने के रूप में बदल गई है. गुरु का, शिक्षक का सम्मान जिस तरह से कभी समाज में बना हुआ था, अब वैसा सम्मान देखने को कम ही मिलता है. अभिभावक हों या फिर स्वयं विद्यार्थी उसके लिए शिक्षक का अर्थ मुफ्त में वेतन लेने वाला हो गया है. इसके पीछे यदि सामाजिकता का, मानसिकता का पतन जिम्मेवार है तो खुद शिक्षक भी किसी न किसी रूप में न सही पूरी तरह, तो आंशिक ही, मगर जिम्मेवार है. स्वार्थलिप्सा में दुकानों, बाजार में बदल चुके शिक्षा क्षेत्र में बहुतेरे शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों के साथ दोहरा व्यवहार किया जाता दिखता है. उनके साथ पक्षपात करने जैसी स्थिति भी दिखाई देती है. इसमें अब तो शर्म भी महसूस नहीं होती, न अभिभावक को, न विद्यार्थी को और न ही बहुतेरे शिक्षकों को कि नक़ल, पक्षपात जैसी स्थितियाँ आपसी सहमति से बनायी जाने लगती हैं.

वैसे शर्म अब इसलिए भी नहीं आती क्योंकि सभी ने अपनी शर्म को सोशल मीडिया के द्वारा समाप्त कर लिया है. गुरुपूर्णिमा हो, शिक्षक दिवस हो, स्वतंत्रता दिवस हो अथवा कोई अन्य राष्ट्रीय महत्त्व का दिन, सभी कुछ तो आजकल सोशल मीडिया पर मना लिए जाते हैं. गुरुजनों को विस्मृत किया जाने लगा है. शिक्षकों और शिष्यों में भी सामाजिक प्रस्थिति का अंतर दिखाई देने लगा है. आज फिर गुरु पूर्णिमा है. सोशल मीडिया पर दिखाई दे रहा है कि ऐसे बहुत से शिष्य गुरुओं को शुभकामनायें देने में लगे हैं जो वास्तविक जीवन में उनको गाली देने से भी नहीं चूकते हैं. उच्च शिक्षा क्षेत्र में कार्यरत होने के कारण ऐसे आधुनिक शिष्यों से आये दिन संपर्क होता रहता है जिनकी निगाह में शिक्षकों की महत्ता न के बराबर है. अपने गुरुओं के सम्मान की खातिर, उनकी शिक्षाओं पर अमल करने की खातिर हमें खुद ही विचार करना होगा कि आखिर विश्वगुरु की उपाधि पाए देश में गुरुजनों की स्थिति, प्रस्थिति में इतनी गिरावट आई कैसे?