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29 जुलाई 2026

तकनीकी दौर में भी गुरु की प्रासंगिकता

 

भारतीय संस्कृति में आदिगुरु के रूप में पूजनीय महर्षि वेद व्यास के जन्मदिन के रूप में मनाया जाने वाला पर्व गुरु पूर्णिमा हमारी महान ज्ञान परम्परा के स्मरण का पवित्र अवसर है. भारतीय संस्कृति में अनादिकाल से गुरु-शिष्य परम्परा का गौरवशाली स्थान रहा है. इसी कारण से अज्ञानता के अंधकार को चीरकर मानवता को विवेक-मुक्ति का मार्ग दिखाने वाले गुरुओं के सम्मान में आषाढ़ मास की पूर्णिमा को श्रद्धा और उल्लास के साथ गुरु पूर्णिमा पर्व मनाया जाता है.

 

भारतीय संस्कृति में ज्ञान को एक तरह की ऊर्जा के रूप में परिभाषित किया गया है. भारतीय मनीषियों ने इसे जीवन की समग्रता को जानने-समझने की एक प्रक्रिया माना है. इसे ऐसी चेतना बताया है जो गुरु मुख से शिष्य के हृदय की ओर संचरित होती है. गुरु-शिष्य की इस परम्परा में ज्ञान और आचरण में किसी तरह का विभेद स्वीकारा नहीं गया है. कथनी और करनी में विभेद न होने को ही शिक्षा माना गया है. गुरु-शिष्य परम्परा के कारण भारतीय संस्कृति में गुरु का सम्मान सामाजिक शिष्टाचार के रूप में स्वीकार्य नहीं रहा है बल्कि इसे आध्यात्मिक साधना के रूप में स्वीकारा गया है. गुरुब्रह्मा गुरुविष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः, गुरुः साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः के रूप में यह बताया गया है कि समस्त शक्तियों का ज्ञान और उनका बोध कराने वाला माध्यम गुरु ही है और ऐसा माध्यम ईश्वर से भी उच्च पद पर है. गुरु ही है जो इंसान के भीतर की कुंठा, अहंकार, अज्ञानता, लालच, विद्वेष आदि को समाप्त करता है. उसके ऐसे परिष्करण से ही किसी भी शिष्य की आंतरिक प्रतिभा पूर्ण रूप से प्रस्फुटित होने लगती है.

 

समय के साथ गुरु-शिष्य परम्परा में भी परिवर्तन देखने को मिले हैं. इक्कीसवीं सदी के संदर्भ में देखें तो सम्पूर्ण विश्व तकनीकी विकास, उपभोक्तावाद, वैश्वीकरण आदि के दौर से गुजर रहा है. आज का युग सूचनाओं का युग बन गया है. इंटरनेट, गूगल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आदि के इस दौर में ज्ञान किसी एक व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा है. हर हाथ में डिवाइस ने एक क्लिक पर व्यक्ति के सामने वैश्विक जानकारी का भंडार लगा दिया है. यहाँ यह समझना बहुत आवश्यक है कि हमारे सामने एक क्लिक पर जानकारी आ रही है अथवा ज्ञान? हमें इस तकनीकी रफ़्तार वाले युग में यह भी समझना होगा कि उँगलियों के सहारे स्क्रॉल करती जानकारी हमारे लिए वाकई लाभकारी है अथवा हम अनावश्यक जानकारियों का भंडार-गृह बनते जा रहे हैं? तकनीकी के बदलते दौर में, शिक्षा के बदलते आयामों के युग में लोगों के मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या इस तकनीकी युग में गुरु की प्रासंगिकता शेष है?

 

इस प्रश्न के उत्तर के पूर्व हम सभी को वर्तमान सन्दर्भों में सूचनाओं का, आँकड़ों का सुलभता से मिलना और उसके उपयोग के बारे में सोचना, विचार करना पड़ेगा. भले ही तकनीकी माध्यमों से सूचनाएँ, आँकड़े, जानकारियाँ कितनी भी सुलभता से क्यों न उपलब्ध हो जाएँ किन्तु वे कभी भी ज्ञान का, बोध का का स्थान नहीं ले सकती हैं. अब जबकि मशीनी तकनीकी से जानकारियाँ तो उपलब्ध हो जा रही हैं मगर उनके उपयोग पर, उनके समायोजन पर, व्यक्ति के समन्वय पर, इंसानी चरित्र पर सवालिया निशान तो लग ही रहे हैं. तीव्र तकनीकी विकास के चलते जिस तरह से आज का युवा उन्मादित होकर भटकता; सोशल मीडिया के भ्रामक मायाजाल में फँसा हुआ; एकाकीपन से भरा हुआ; मानसिक अवसाद से गुजरता हुआ; तनाव से जूझता दिख रहा है तब वास्तविक गुरु की आवश्यकता और अधिक महसूस होने लगी है.

 

आज शिक्षा व्यवस्था को एक व्यावसायिक उत्पाद बना दिया गया है; शिक्षण संस्थानों को पाठ्यक्रम पूरा करवाने और डिग्री बाँटने का केन्द्र बना दिया गया है; चरित्र निर्माण, मूल्य-शिक्षा, नैतिकता, समन्वय, भावनात्मकता आदि का लोप होता दिखने लगा है तब समझ आ रहा है कि आधुनिक शिक्षा प्रणाली ने केवल सफल व्यक्ति बनाने का प्रयास किया है न कि संवेदनशील मनुष्य बनाने का. ऐसे व्यावसायिक दौर में गुरु-शिष्य का पवित्र रिश्ता विक्रेता और क्रेता के रूप में बदलता जा रहा है. कोचिंग संस्थानों, शिक्षा के बाजार ने सम्बन्धों की, रिश्तों की मर्यादा को, गरिमा को नष्ट कर दिया है. इस विकृति के बीच गुरु पूर्णिमा का पर्व मूल जड़ों की ओर लौटने की प्रेरणा देता है. यह पर्व हमें इस बात का भी एहसास कराता है कि भारतीय संस्कृति में केवल मनुष्य को ही गुरु के रूप में नहीं स्वीकारा गया है बल्कि प्रकृति, जीव-जन्तु, घटनाओं आदि को भी गुरु रूप में स्वीकारा गया है.

 

आज के डिजिटल युग में गुरु को वेदों, शास्त्रों, पौराणिक ग्रंथों के ज्ञाता  के रूप में नहीं बल्कि एक मार्गदर्शक, परामर्शदाता, जीवन-प्रशिक्षक की भूमिका में देखने की आवश्यकता है. समय बदलने के साथ-साथ गुरु का स्वरूप, उसकी भूमिका में भी परिवर्तन लाने की आवश्यकता है. आज भले ही ऑनलाइन माध्यमों से शिक्षण कार्य सम्पन्न होने लगा हो किन्तु यह समझना होगा कि तकनीकी प्रगति के बीच भी गुरु-शिष्य के बीच का मानवीय रिश्ता, संवेदना, नैतिक ऊर्जा का संस्कार विलुप्त न हो पाए. एक वास्तविक गुरु केवल विषयों को पढ़ाने का काम नहीं करता है बल्कि वह विद्यार्थियों के मन में उठने वाले संशयों का शमन करता है. अपने शिष्यों को सही और गलत के बीच का भेद समझा कर संकटकाल में नैतिक संबल प्रदान करता है. वर्तमान सन्दर्भों में ऐसे गुरुओं की आवश्यकता है जो तकनीकी कौशल के साथ-साथ करुणा, सहानुभूति, सहनशीलता, सहयोग, सामाजिक उत्तरदायित्व आदि जैसे मानवीय मूल्य भी सिखाएँ.

 

कह सकते हैं कि गुरु पूर्णिमा का पर्व अतीत की वंदना करने का ही नहीं बल्कि भविष्य के प्रति संकल्पित होने का दिन भी है. यह पर्व हमें याद दिलाता है कि भले ही युग बदल जाए, तकनीक विकसित हो जाए, जीवन की प्राथमिकताएँ बदल जाएँ परंतु मानव जीवन में गुरु की आवश्यकता सदैव रहेगी. व्यक्ति को सही दिशा देने के लिए एक प्रकाशपुंज, मार्गदर्शक, गुरु का होना अनिवार्य है. जब तक समाज में अज्ञान, द्वेष, अहंकार, भटकाव आदि रहेगा तब तक गुरु की प्रासंगिकता भी रहेगी.

05 सितंबर 2024

गुरु और शिक्षक का अंतर

ओ फ़ेसबुक की भेड़चाल में बहकने वाले/वालियो

 

आप सबने ज़िन्दगी से सीखा, माता-पिता पहले गुरु रहे, प्रकृति से ज्ञान प्राप्त किया, इससे लिया, उससे बटोरा, कण-कण ने दिया, वक्त ने सिखाया आदि-आदि. सारी बातें सही हैं, आदर्श विचारक हैं मगर बहकते-भटकते कुछ और जानकारी भी सीख लो, सहेज लो. गुरु कोई भी हो सकता है, कोई भी से मतलब कोई भी. ज्ञान किसी से भी मिल सकता है, किसी से भी माने किसी से भी. ये लोग माता-पिता, कोई रिश्तेदार, सहयोगी, मित्र, कोई भी कामगार, किसी भी व्यवसाय का व्यक्ति, किसी भी संस्थान का सदस्य, निरक्षर, साक्षर आदि कोई भी हो सकते हैं. ये गुरु हो सकते हैं पर शिक्षक नहीं.

 

हर कोई शिक्षक नहीं बन सकता. हर किसी को शिक्षक नहीं कहा जा सकता. प्रशासनिक अधिकारी प्रशासनिक अधिकारी ही होगा. पुलिस वाला पुलिस वाला ही रहेगा. डॉक्टर को डॉक्टर ही कहा जायेगा. इंजीनियर इंजीनियर ही रहेगा. व्यापारी भी यही रहेगा. हाँ, ये गुरु हो सकते हैं. इनको गुरु माना-समझा-कहा जा सकता है. इससे इतर शिक्षक एक निश्चित प्रक्रिया के बाद शैक्षिक संस्थान में नियुक्त व्यक्ति होता है. निश्चित डिग्री, निश्चित अर्हता, निश्चित प्रक्रिया के बाद ही कोई व्यक्ति शिक्षक कहलाता है.

 

शिक्षक दिवस देश के एक शिक्षक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के सम्मान में उनके जन्मदिन पर मनाते हैं. यह दिन उनके जन्मदिन पर शिक्षकों का सम्मान करने का दिन है. इनसे इतर किसी और से ज्ञान पाने वाले को गुरु कहिए, उनका सम्मान गुरु पूर्णिमा को करिए.


27 जुलाई 2018

गुरु की बदलती स्थिति-प्रस्थिति


तमाम सारे विदेशी कार्यक्रमों की धूम-हंगामे के बीच एक-दो भारतीय पर्व ऐसे भी हैं जो बहुत शोर-शराबे से न सही मगर मना लिए जाते हैं. इनके मनाये जाने के पीछे सोशल मीडिया की भूमिका बहुत बड़ी है. किसी भारतीय पर्व के एक-दो दिन पहले से कुछ बैनर, कुछ चित्र, कुछ विचार सोशल मीडिया पर इधर से उधर तैरने लगते हैं और इसी धार में बहुतेरे लोग तैराकी सीख लेते हैं. किसी समय विद्यालयों, महाविद्यालयों में गुरु पूर्णिमा के नाम पर संस्कारित आयोजन हो जाया करते थे, जो अब नितांत अवकाश में बदल गए हैं या फिर शुभकामनायें देने भर तक. संभव है कि गुरु पूर्णिमा की बधाइयाँ, शुभकामनायें इधर से उधर करते बहुतेरे लोगों को जानकारी भी न हो कि गुरु पूर्णिमा किस कारण से मनाई जाती है. वैसे आज के समय में आधुनिक गुरु गूगल बाबा ने सबकुछ सहज सा कर दिया है. यहाँ आपने जिज्ञासा रखी, उधर उनका समाधान आया. अब ये समाधान कितना सही, कितना गलत ये आप पर निर्भर करता है. इसी सही-गलत के बीच फंसने से पहले गुरु पूर्णिमा पर प्रकाश डालते चलें.


आषाड़ मास की पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा के नाम से जाना जाता है. कृष्ण द्वैपायन व्यास जी का जन्म इसी दिन हुआ था. उनके द्वारा महाभारत की रचना की गई थी. वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और ऐसा माना जाता है कि चारों वेदों की रचना उन्हीं के द्वारा की गई थी. इसी कारण से उनको वेदव्यास के नाम से भी जाना जाता है. गुरु-शिष्य परंपरा में उनको आदिगुरु माने जाने के कारण उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है. इस पर्व के सन्दर्भ में ऐसी मान्यता है कि प्राचीनकाल में जब शिष्य अपने गुरु से पूर्ण शिक्षा प्राप्त कर लेता था, उसके बाद वो शिष्य श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर इसी दिन अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था. वर्तमान में प्राचीन गुरुकुल पद्धति चलन में न होने के बाद भी गुरुपूर्णिमा का महत्व कम नहीं हुआ है. आज भले ही शैक्षिणक संस्थानों में पारंपरिक रूप से शिक्षा दी जा रही हो किन्तु इनमें आज भी इस दिन गुरुजनों को सम्मानित किया जाता है.

गुरु, शिक्षक से सम्बंधित अनेक सूक्तियाँ, श्लोक, सार-वाक्य हमारे आसपास मिल जाते हैं. व्यक्ति इनको न केवल सुनता आ रहा है वरन आत्मसात भी करता रहा है. ये और बात है कि वर्तमान में सामाजिक भटकाव की स्थिति में बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोगों को भी समझ नहीं आ रहा है कि वे क्या कर रहे हैं. इसे भटकाव कहें या फिर सामाजिक विसंगति कि गुरुपूर्णिमा का आयोजन करने वाले देश में गुरुओं द्वारा दी गई शिक्षा को विस्मृत कर दिया गया है. आज शिक्षा के नाम पर बाजार उपलब्ध है. संस्थानों के नाम पर दुकानें बनी दिख रही हैं. शिक्षकों को राजनीति का, नेतागीरी का पर्याय माना जाने लगा है. गुरु शब्द की गरिमा अब उसको ताना मारने के रूप में, गाली देने के रूप में बदल गई है. गुरु का, शिक्षक का सम्मान जिस तरह से कभी समाज में बना हुआ था, अब वैसा सम्मान देखने को कम ही मिलता है. अभिभावक हों या फिर स्वयं विद्यार्थी उसके लिए शिक्षक का अर्थ मुफ्त में वेतन लेने वाला हो गया है. इसके पीछे यदि सामाजिकता का, मानसिकता का पतन जिम्मेवार है तो खुद शिक्षक भी किसी न किसी रूप में न सही पूरी तरह, तो आंशिक ही, मगर जिम्मेवार है. स्वार्थलिप्सा में दुकानों, बाजार में बदल चुके शिक्षा क्षेत्र में बहुतेरे शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों के साथ दोहरा व्यवहार किया जाता दिखता है. उनके साथ पक्षपात करने जैसी स्थिति भी दिखाई देती है. इसमें अब तो शर्म भी महसूस नहीं होती, न अभिभावक को, न विद्यार्थी को और न ही बहुतेरे शिक्षकों को कि नक़ल, पक्षपात जैसी स्थितियाँ आपसी सहमति से बनायी जाने लगती हैं.

वैसे शर्म अब इसलिए भी नहीं आती क्योंकि सभी ने अपनी शर्म को सोशल मीडिया के द्वारा समाप्त कर लिया है. गुरुपूर्णिमा हो, शिक्षक दिवस हो, स्वतंत्रता दिवस हो अथवा कोई अन्य राष्ट्रीय महत्त्व का दिन, सभी कुछ तो आजकल सोशल मीडिया पर मना लिए जाते हैं. गुरुजनों को विस्मृत किया जाने लगा है. शिक्षकों और शिष्यों में भी सामाजिक प्रस्थिति का अंतर दिखाई देने लगा है. आज फिर गुरु पूर्णिमा है. सोशल मीडिया पर दिखाई दे रहा है कि ऐसे बहुत से शिष्य गुरुओं को शुभकामनायें देने में लगे हैं जो वास्तविक जीवन में उनको गाली देने से भी नहीं चूकते हैं. उच्च शिक्षा क्षेत्र में कार्यरत होने के कारण ऐसे आधुनिक शिष्यों से आये दिन संपर्क होता रहता है जिनकी निगाह में शिक्षकों की महत्ता न के बराबर है. अपने गुरुओं के सम्मान की खातिर, उनकी शिक्षाओं पर अमल करने की खातिर हमें खुद ही विचार करना होगा कि आखिर विश्वगुरु की उपाधि पाए देश में गुरुजनों की स्थिति, प्रस्थिति में इतनी गिरावट आई कैसे?

20 जुलाई 2016

भटकाव के दौर में संस्कार

आषाड़ मास की पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा के नाम से जाना जाता है. कृष्ण द्वैपायन व्यास जी का जन्म इसी दिन हुआ था. उनके द्वारा महाभारत की रचना की गई थी. वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और ऐसा माना जाता है कि चारों वेदों की रचना उन्हीं के द्वारा की गई थी. इसी कारण से उनको वेदव्यास के नाम से भी जाना जाता है. भारतीय संस्कृति, गुरु-शिष्य परंपरा में उनको आदिगुरु माना जाता है और उन्हीं के सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है. गुरुपूर्णिमा को गुरु पूजन का विधान है. देश में गुरुपूर्णिमा का पर्व बड़ी ही श्रद्धा-भक्ति और धूमधाम से मनाया जाता है. ऐसी मान्यता है कि प्राचीनकाल में जब शिष्य अपने गुरु से पूर्ण शिक्षा प्राप्त कर लेता था, उसके बाद वो शिष्य श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर इसी दिन अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था. वर्तमान में प्राचीन गुरुकुल पद्धति चलन में न होने के बाद भी गुरुपूर्णिमा का महत्व कम नहीं हुआ है. आज भले ही शैक्षिणक संस्थानों में पारंपरिक रूप से शिक्षा दी जा रही हो किन्तु इनमें आज भी इस दिन गुरुजनों को सम्मानित किया जाता है.


गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरु साक्षात्‌ परब्रह्म तस्मै श्रीगुरुवे नमः॥के साथ-साथ गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥को प्रत्येक व्यक्ति बचपन से सुनता चला आ रहा है. इनको न केवल वो सुनता आ रहा है वरन आत्मसात भी करता रहा है. इसके बाद भी वर्तमान में समाज भटकाव की स्थिति में है. भटकाव इस कदर है कि बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोगों को भी समझ नहीं आ रहा है कि वे क्या कर रहे हैं. ये भटकाव ही कहा जायेगा कि आज देश में सेना के समर्थन के लिए मुहिम छेड़नी पड़ रही है. सपोर्ट टू इंडियन आर्मीके द्वारा ये जताना पड़ रहा है कि देश सेना के साथ है. इसे सामाजिक विसंगति ही कही जाएगी कि गुरुपूर्णिमा का आयोजन करने वाले देश में गुरुओं द्वारा दी गई शिक्षा को विस्मृत कर दिया गया है. आम आदमी से लेकर सेना तक को पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर देखा जाने लगा है. देश का एक-एक व्यक्ति जिस आज़ादी की बात करता है, जिस स्वतंत्रता से सरकार को गरिया लेता है, जिस उन्मुक्तता के साथ सेना की बुराई कर लेता है, जिस बेफिक्री के साथ मौज-मस्ती कर लेता है वो कहीं न कहीं भारतीय सेना की देन है. अपनी मौज-मस्ती, अपनी उन्मुक्तता, अपनी स्वच्छंदता को एक पल के लिए रोककर विचार करिए कि जिस समय आप ये सब कर रहे होते हैं, ठीक उसी समय सैनिक किसी आतंकी से लोहा ले रहा होता है. किसी उपद्रवी के ईंट-पत्थर को सह रहा होता है. कहीं बर्फीली चट्टान पर मुस्तैद खड़ा होता है. अपने परिवार से कहीं बहुत दूर अकेले देश की रक्षा के लिए, हम सबकी सुरक्षा के लिए तैनात होता है. आज उसी भारतीय सेना के लिए समर्थन करने जैसी मुहिम चलाना अपने आपमें शर्म का विषय है.


वैसे शर्म हम नागरिकों को क्यों आने लगी? आम नागरिकों ने अपनी शर्म को सोशल मीडिया के द्वारा समाप्त कर लिया है. गुरुपूर्णिमा हो, शिक्षक दिवस हो, स्वतंत्रता दिवस हो अथवा कोई अन्य राष्ट्रीय महत्त्व का दिन, सभी कुछ तो आजकल सोशल मीडिया पर मना लिए जाते हैं. गुरुजनों को विस्मृत किया जाने लगा है, इसके बाद भी शर्म है कि आती नहीं. देखा जाये तो शर्म उन शहीदों को आ रही होगी जिन्होंने एक पल सोचे बिना अपनी जान इस देश पर न्योछावर कर दी. शर्म उन सैनिकों को आ रही होगी जिन्होंने शहादत देकर देश को आज़ादी दिलवाई. शर्म जंगे-आज़ादी के उस प्रथम यौद्धा मंगल पांडे को भी आ रही होगी जिनकी १८९वीं जयंती इस बार गुरुपूर्णिमा के दिन पड़ी मगर सूनी-सूनी सी निकल गई. आइये, अपने शहीदों को शर्मसार होने से बचाने के लिए आगे बढ़ें. अपनी भारतीय सेना को ये दिखाने के लिए कि हम उसके साथ हर पल हैं, उसके परिवार के साथ हर क्षण हैं आगे चलें. अपने गुरुओं के सम्मान की खातिर, उनकी शिक्षाओं पर अमल करने की खातिर आगे बढ़ें.

चित्र गूगल छवियों से साभार लिया गया है