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23 अगस्त 2024

स्वस्थ राजनीति के प्रतीक-पुरुष कृष्ण

"कृष्ण को क्या आप अपहरण-भूषण नहीं कहेंगे? खुद ने तो रुक्मिणी का अपहरण किया ही था, अर्जुन को भी बहन सुभद्रा का अपहरण करने को लालायित करते हैं।"

 

असल में समाज की व्यवस्थायें जब बदल जाती हैं, तो बहुत-सी बेतुकी हो जाती हैं। एक युग था जब किसी स्त्री का अपहरण न किया जाए, तो उसका एक ही मतलब था कि उस स्त्री को किसी ने भी नहीं चाहा। एक युग था कि जब किसी स्त्री का अपहरण न किया जाए, तो उसका मतलब था कि उसकी कुरूपता सुनिश्चित है। एक युग था जब सौंदर्य का सम्मान अपहरण था। और अब वह युग नहीं है। लेकिन आज भी अगर यूनिवर्सिटी कैंपस में किसी लड़की को कोई भी धक्का नहीं मारता तो उसके दुख का कोई अंत नहीं है। कोई अंत नहीं है उसके दुख का। और जब कोई लड़की आकर दुख प्रगट करती है कि उसे बहुत धक्के मारे जा रहे हैं तब उसके चेहरे को गौर से देखें, उसके रस का कोई अंत नहीं है। स्त्री चाहती रही है कोई अपहरण करने वाला उसे मिले। कोई उसे इतना चाहे कि चुराना मजबूरी, जरूरी हो जाए। कोई उसे इतना चाहे कि मांगेंगे नहीं, चुराने को तैयार हो जाए।

 



तो कृष्ण जिस युग में थे उस युग को समझेंगे तब यह बात खयाल में आ सकती है। और मैं मानता हूं कि यह हिम्मतवर युग था। यह भी कोई बात कि पंचांग और पत्रा को दिखाकर कोई विवाह कर ले! लेकिन कृष्ण जब किसी को उत्प्रेरित भी कर रहे हैं अपहरण के लिए, तो इसीलिए कि वह कहते हैं कि प्रेम इतनी बड़ी चीज है कि अगर वह है, तो अपहरण भी किया जा सकता है, दांव लगाया जा सकता है। और प्रेम कोई नियम नहीं मानता। और युग था वह जो प्रेम का युग था। जिस दिन नियम शुरू हो जाते हैं, उसी दिन मानना चाहिए कि प्रेम की शक्ति शिथिल हो गई है। अब प्रेम बहुत चुनौतियां नहीं लेता, दांव नहीं लगाता। उस युग के पूरे-के-पूरे ढांचे को समझेंगे तो खयाल में आएगा। यह कृष्ण किसी विशेष युग में पैदा हुए हैं। उस युग की व्यवस्था का हमें खयाल नहीं है। हमारे युग की व्यवस्था को हम उन पर थोपने जाएंगे तो वह कई बार अनैतिक मालूम पड़ने लगेंगे। लेकिन मुझे भी लगता है कि शौर्य के युग, जब जिंदगी में तेज होता है और जब जिंदगी में शान होती है, तो चुनौती के और दांव के युग होते हैं। शिथिल और मरे हुए समाज, जब जिंदगी में सब चुनौती खो जाती है और सब ढीला-ढाला होता है, और तरह की नीतियां बनाते हैं जो मुर्दा नीतियां होती हैं। न, मैं तो कहूंगा कि कृष्ण अगर अपहरण करके न लाएं किसी स्त्री का और उसी स्त्री के बगैर खबर भेजें, उसके पिता के हाथ-पैर पड़ें और सब उपाय करें, तो उस स्त्री का अपमान होगा, उस युग में अपमान होगा। वह स्त्री इसे पसंद नहीं करती। वह कहती कि इतनी भी हिम्मत नहीं है मुझे चुरा सको, तो छोड़ो यह बात!

 

हमें खयाल नहीं है कि आज भी--युग तो बदल जाते हैं, लेकिन कुछ ढांचे चलते चले जाते हैं--आज भी जिसे हम बरात कहते हैं, किसी दिन वे प्रेमी के साथ गए हुए सैनिक थे। और जिसे आज हम दूल्हा को घोड़ा पर बिठाते हैं, दूल्हे को--दूल्हे को घोड़े पर बिठाना बिलकुल बेमानी है, कोई मतलब नहीं है--और एक छुरी भी लटका देते हैं उसके बगल में, वह कभी तलवार थी और कभी वह घोड़ा किसी को चुराने गया था और कुछ साथी थे उसके जो उसके साथ गए थे, वह बरात थी। और आज भी आपको पता होगा कि जब बरात आती है तो लड़की के घरवाली स्त्रियां गालियां देना शुरू करती हैं। कभी सोचा कि वे गालियां क्यों देती हैं? वह जिसके घर की लड़की चुराई जा रही होगी, उसकी दी गई गालियां होंगी। लेकिन अब काहे के लिए गालियां दे रही हैं, वह खुद ही इंतजाम किए हैं सब। आज की लड़की का पिता झुकता है, आज भी। अब कोई कारण नहीं है लड़की के पिता के झुकने का। कभी उसे झुकना पड़ा था। कभी जो उसे छीनकर ले जाता था, जो विजेता होता था, उसके सामने झुक जाना पड़ा था। वह कभी के नियम थे, जो अब भी सरकते हुए मुर्दा हालत में चलते चले जाते हैं।

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साभार ओशो - कृष्‍ण स्‍मृति, प्रवचन – १०

स्वस्थ राजनीति के प्रतीकपुरुष कृष्ण


26 अगस्त 2020

राधा अष्टमी

प्रेम की बात होती है तो राधा-कृष्ण का नाम ही सबसे पहले और अत्यंत पावन स्वरूप में सामने आता है. यद्यपि राधा-कृष्ण का आपस में विवाह न हो सका तथापि उनके अमर प्रेम को सम्पूर्ण विश्व ने स्वीकारा है. इसे संयोग हो कहा जाना चाहिए कि राधा-कृष्ण की इस अमर जोड़ी का जन्मदिन भी एक ही तिथि को पड़ता है. जी हाँ, कृष्ण जन्माष्टमी के ठीक पंद्रह दिन पश्चात भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधा अष्टमी मनाई जाती है. राधा अष्टमी को राधा जी के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है. वैदिक मान्यताओं के अनुसार द्वापर में इसी दिन वृषभानु और कीर्तिजी की पुत्री के रूप में राधा का जन्म हुआ था. ऐसा माना जाता है कि कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत रखने वाला यदि राधा अष्टमी का व्रत नहीं रखता है तो उसे कृष्ण जन्माष्टमी का सम्पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है.



उत्तर भारत में इस जन्मोत्सव को विशेष रूप से मथुरा, वृंदावन और बरसाना के मंदिरों में बड़े उत्साह से मनाया जाता है. भक्तजन कृष्ण जन्माष्टमी के बाद यहाँ के मंदिरों में राधा जी के दर्शन अवश्य करते हैं. शास्त्रगत मान्यता है की भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण और लक्ष्मी जी ने राधा जी के रूप में जन्म लिया था.  राधा और कृष्ण के प्रेम सम्बन्धी प्रसंगों को लेकर अलग-अलग जनश्रुतियाँ हैं. इसके साथ-साथ हिन्दी साहित्य में इनके प्रेम को रास से सम्बंधित करके भी अलग-अलग कवियों ने प्रेमपरक रचनाएँ की हैं कहीं-कहीं कवित्व के आधिक्य के चलते और मनोभावों के पूर्वाग्रह ने राधा-कृष्ण को लेकर अत्यंत अश्लील चित्रण भी किया है. ऐसा बहुतायत में देखने को मिलता है कि जब भी सनातन धर्मी मान्यताओं से पूर्वाग्रह रखने वालों ने राधा-कृष्ण के जीवन को लेकर कुछ न कुछ लिखा है अथवा कहा है तो रासलीला को आधार बनाकर उसका अश्लील, अशोभनीय चित्रण ही किया है.

आज के समय में जबकि सभी धर्मों की अपनी-अपनी मान्यताओं का अपने विवेक से पालन किया जा रहा है तब सनातन संस्कृति को मानने वालों से इसकी अपेक्षा की जाती है कि वे भी राधा के चरित्र को, उनके जीवन को जानने-समझने का प्रयास करें.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

03 सितंबर 2018

राधा सी, मीरा सी बस दीवानी बनो


प्रेम-संगीत मिल के सजाएँ प्रिये,
अधरों की बांसुरी अधरों पर धरो.
मन-मुदित श्याम-रंग में रँग जायेगा,
राधा सी, मीरा सी बस दीवानी बनो.

बनकर आओ गुलाबी भोर महकती
या ठहर जाओ बनकर शाम बहकती,
मेरे दिन-रात तुमसे ही रोशन रहें,
आँचल तारों का ले चाँदनी सी सजो.

गीत मेरे मगर कोई स्वर ही नहीं,
न ही संगीत है कोई लय भी नहीं,
शांत झील में हलचल मचाने को अब,
मेरे जीवन में तुम इक लहर सी बहो.

दूर सागर से मिलना है तुमको अगर,
तोड़ अवरोध सारे बनाओ डगर,
रात अंधियारी काली भी कट जाएगी,
जुगनुओं की तरह तुम जगमग जलो.




बांसुरी की धुन पर सब मगन रहें, 
सुर सजें असुर मिटें सब प्रसन्न रहें. 

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श्रीकृष्ण जन्मोत्सव शुभ हो 
03-09-2018

बिटिया रानी की झाँकी संग श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की शुभकामनायें








बांसुरी की धुन पर सब मगन रहें, 
सुर सजें असुर मिटें सब प्रसन्न रहें.