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14 मार्च 2026

सहयोग, प्रेम-भाव में कमी भी एक समस्या है

इसे वही समझ सकते हैं जो संयुक्त परिवार में रहते हैं या रहे हैं... या फिर जिनके घर में पर्व-त्यौहार-किसी आयोजन में समूचे नाते-रिश्तेदार जुटते हैं... एकसाथ एक ही घर में रहते हैं....

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सोचिए एक पल को कि घर-परिवार के सब लोग, नाते-रिश्तेदार एकसाथ किसी आयोजन में मिले. पंद्रह-बीस लोगों से घर में चहल-पहल मची है, हल्ला-गुल्ला मचा हुआ है. ऐसे में भोजन के समय चार-चार, पाँच-पाँच लोग सहजता से खाना खाते जा रहे हैं. रसोई में घर की महिलाएँ हँसी-मजाक के साथ सभी को सहजता के साथ भोजन उपलब्ध कराती जा रहीं हैं.

 

किसी दिन इस हँसी-मजाक में, हल्ला-गुल्ला में परिवार में जुटे सभी लोग एकसाथ भोजन करने बैठ जाते हैं, एक-दूसरे के साथ भोजन करने की ललक में. ऐसा होता है बिना किसी पूर्व सूचना के, बिना किसी पूर्व जानकारी के... अचानक से ही. चार-छह लगी थालियों में ही परिवार के कई लोग एकसाथ बैठकर मिलजुल कर भोजन करने लगते हैं. किसी की थाली से सब्जी, किसी की थाली से दाल, किसी की थाली से अचार, किसी की थाली से रोटी, किसी की थाली से रायता.... अब फिर सोचिए कि क्या स्थिति उत्पन्न होगी? भोजन करने वाले तो हँसी-मजाक करते हुए बिना कुछ परवाह किये खाना खाने में लगे हैं तभी अचानक से रसोई से रोटियाँ आने की गति रुक जाती है या कहें कि रोटियों का आना रुक सा जाता है. 

 

ऐसा नहीं है कि रसोई में घर की महिलाएँ रोटियाँ नहीं बना रहीं. ऐसा भी नहीं कि आटा समाप्त हो गया हो. ऐसा भी नहीं कि किसी तरह की कोई समस्या उत्पन्न हो गई हो. इसके बाद भी रोटियों के आने की गति थम गई, रोटियाँ एक-दो, एक-दो करके आने लगीं, बाहर खाने के लिए जुटे सभी लोगों को रोटियों की उपलब्धता सहजता से नहीं हो पा रही. किसी को आधी रोटी मिल रही, किसी को उसी में से एक कौर मिल  रहा, कोई किसी की थाली में आने के पहले ही रोटी का कौर उसके हाथ से खींच ले रहा. इन सबके बीच कोई रोष नहीं, कोई गुस्सा नहीं, कोई गाली-गलौज नहीं बल्कि हँसी-मजाक और बढ़ने लगता है, आपसी प्रेम और नजर आने लगता है.

 

क्यों नहीं कोई व्यक्ति बाहर सड़क पर जाकर कूड़े के ढेर में रोटी तलाशने लगता है? क्यों नहीं रोटी का एक कौर भी न हासिल कर पाने वाला व्यक्ति घर की महिलाओं की बुराई करने लगता है? क्यों नहीं घर का कोई सदस्य नाली से गंदगी निकाल कर रोटी की जगह खाने लगता है? और भी बहुत कुछ क्यों नहीं होता है? फिर सोचिए, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि परिवार के सभी सदस्यों में आपस में प्रेम-भाव है, एक-दूसरे के प्रति सम्मान है, एक-दूसरे की स्थिति का भान है. यही नहीं है हम सबमें. समाज में व्यक्तिगत रूप से जो है वो पहले हमारे लिए है. समाज में जो है वो पहले हमें मिले. इस तरह की मानसिकता से न समाज का भला होता है और न ही देश का. कुछ ऐसा ही इस समय दिख रहा है. घर में एक सिलेंडर भरा रखा है मगर एक और मिल जाए. बाकी का क्या ही लिखें. जो युद्ध की माँग करते हैं, सीमा पर जान देने का दम भरते हैं, वे दो-चार रोज की स्थिति में अपनी ही गैस निकाल बैठे.


03 जनवरी 2023

आपसी सहयोग, विश्वास को नहीं छोड़ेंगे

विगत दो वर्षों की उथल-पुथल भरी जीवन-शैली के बीच भी लोगों ने अपने उत्साह को नहीं छोड़ा. जिस तरह से कोरोना ने लोगों के दिल-दिमाग में गहरे घाव छोड़े थे उसे देखकर लगता नहीं था कि लोग सहजता से बाहर निकल सकेंगे. बावजूद इसके लोगों ने अपनी जिजीविषा को नहीं छोड़ा और कोरोनाकाल के डरावने घेरे से खुद को बाहर निकाल लाये. लोगों की जिजीविषा ने जहाँ उनके अपने-अपने पर्वों-त्योहारों को मनाने का अवसर दिया वहीं दूसरों के सुख-दुःख में भी शामिल होने का मौका दिया.


अब जबकि पुराने साल को पीछे छोड़कर हम सब नए साल में पहुँच गए हैं तब हमें अपने डरावने अतीत और उसकी भयावहता को पीछे छोड़ने की आवश्यकता है. लोगों ने सब कुछ भूल कर नए वर्ष का स्वागत पूरे जोश, उत्साह, उमंग से किया है, ये सुखद है मगर इसी सुखद के पीछे से कोरोना वायरस की खतरनाक आहट फिर से सुनाई देने लगी है. खबरें डरावनी ही नहीं अत्यंत भयावह हैं. लोग बाहर से उत्साहित दिखाई दे रहे हैं मगर भीतर ही भीतर उनको बहुत कुछ डरा रहा है. यह डर लोगों के खुद के प्रति नहीं बल्कि अपनों के लिए है. उन नौनिहालों के लिए है जिन्होंने अभी ज़िन्दगी का बहुत सूक्ष्म पल ही देखा और उनके सामने भयानक वायरस आकर खड़ा हो गया. विगत दो सालों में जिस तरह से नौनिहालों ने, युवाओं ने इस संसार को त्यागा है, उनको कोरोना ने अपना ग्रास बनाया है वह वाकई दुखद भी है, भयावह भी है. ऐसी घटनाओं से दिल सिहर उठता है. अपने हाथों में ऐसी जिंदगियों को जाते देखना, जिनको भविष्य के लिए नए-नए सपने देखना था, अत्यंत कष्टकारी होता है.




ज़िन्दगी का यही वो क्षण होता है जबकि तकनीकी, ज्ञान, विज्ञान से संपन्न व्यक्ति के हाथ में कुछ नहीं होता है. उसके पास सिवाय हाथ मलने के, सिवाय पछताने के कुछ नहीं रह जाता है. देखा जाये तो यही स्थितियाँ व्यक्ति को सिखाती भी हैं. यही हालात व्यक्ति को लड़ने के लिए ऊर्जा भी देते हैं. जिजीविषा और विश्वास से भरे जनमानस को अपनी पिछली इन्हीं घटनाओं से सबक लेने की आवश्यकता है. एक बार पीछे पलट कर देखने की आवश्यकता है. हम सभी ने लॉकडाउन जैसी भयावहता को देखा और सहा है. क्या उस दौर में हमने भौतिकतावादी वस्तुओं का संग्रह करने का विचार किया? क्या उन दिनों में लोगों ने लक्जरी गाड़ियों, सामानों, जेवरातों को खरीदने के लिए प्रयास किये? सभी ने प्रयास किये अपने लोगों की सुरक्षा के. सभी ने कोशिश की एकसाथ रहने की. सभी के कदम बढ़ाये सामुदायिकता के लिए. सभी ने संग्रह किया जीवन देने वाली खाद्य-सामग्री का.


उन दिनों एक बहुत लम्बा समय बिना भौतिकता के बीता. उस समय को लोगों ने आपस में एक-दूसरे का साथ देकर बिता दिया. ऐसे में यह समझने वाली बात है कि ज़िन्दगी में आवश्यक क्या है, अनिवार्य क्या है. यही वो समझ है जो इंसानियत सिखाती है, इन्सान बनाती है. हमने जब भी इस सोच को, इस समझ को छोड़ा है हम सभी इन्सान से जानवर में बदल गए. इसी बदलाव ने समाज को ख़राब कर दिया. इसी परिवर्तन ने प्रकृति का विनाश करना शुरू कर दिया. इसी बदलाव ने पर्यावरण को असुरक्षित कर दिया. इसी परिवर्तन ने मानसिकता को दूषित कर दिया है. आज हम अपने चारों तरफ नजर डालें तो प्रदूषित वातावरण ज्यादा देखने को मिल रहा है. चाहे प्रकृति की बात करें, पर्यावरण की बात करें, संस्कृति की बात करें, खान-पान की बात करें, सामाजिकता की बात करें, पहनावे की बात करें, बोल-चाल की बात करें सभी में एक तरह का प्रदूषण स्पष्ट दिखाई देने लगा है.


विगत को विस्मृत करते हुए हम सभी आगत के स्वागत में लगे हैं, अच्छा है मगर हमें विगत को पूरी तरह से विस्मृत नहीं करना चाहिए. नए साल के जश्न के ठीक पहले जाने वाले साल के सबक को याद रखें. जाने वाले साल ने हमें क्या-क्या सीखने योग्य दिया उसे याद रखें. बीत चुके अन्य सालों में भी हम सबने किस तरह दुःख-दर्द सहकर भी सबके साथ को स्वीकार किया, सबके विश्वास को बनाये रखा, उसी को आने वाले साल के साथ भी बनाये रखें. आने वाला समय कितना भयावह होगा, होगा भी या नहीं इस बारे में आज से परेशान होने की नहीं बल्कि सजग रहने की आवश्यकता है. आने वाले कल की चिंता में हमें अपना आज ख़राब नहीं करना है.


जाने वाले इस साल के साथ अपने नौनिहालों को, युवाओं को सिखाना है कि कैसे अतीत से सीख लेते हुए हम आगे बढ़ें. निश्चित ही ये पीढ़ी रफ़्तार की शौक़ीन है, तकनीक की प्रेमी है. ऐसे में उसको ये समझाने की महती आवश्यकता है कि रफ़्तार और तकनीक के शौक में ज़िन्दगी को ख़त्म नहीं किया जाना चाहिए. इसी पीढ़ी को समाज, संस्कृति, साहित्य, सामाजिकता आदि का पाठ सिखाना होगा. हम सभी को नए साल के स्वागत के जश्न के साथ याद रखना होगा कि आने वाले साल को हम जो भी धरोहर सौंपेंगे, वही हमको वो अपने जाते समय देकर जायेगा. तो संकल्पित हों कि एक-दूसरे का विश्वास बनते हुए, एक-दूसरे का साथ बनते हुए आने वाले संकटों का सामना करेंगे. नए साल को हम खुशियाँ, स्वास्थ्य, सुखद मनोभाव, बेहतर इन्सान, सामाजिकता आदि से सजाते हुए आगे बढ़ेंगे. 






 

29 दिसंबर 2022

आपसी विश्वास नहीं तोड़ेंगे

विगत दो वर्षों की उथल-पुथल भरी जीवन-शैली के बीच भी लोगों ने अपने उत्साह को नहीं छोड़ा. जिस तरह से कोरोना ने लोगों के दिल-दिमाग में गहरे घाव छोड़े थे उसे देखकर लगता नहीं था कि लोग सहजता से बाहर निकल सकेंगे. बावजूद इसके लोगों ने अपनी जिजीविषा को नहीं छोड़ा और कोरोनाकाल के डरावने घेरे से खुद को बाहर निकाल लाये. लोगों की जिजीविषा ने जहाँ उनके अपने-अपने पर्वों-त्योहारों को मनाने का अवसर दिया वहीं दूसरों के सुख-दुःख में भी शामिल होने का मौका दिया. 


अब जबकि ये साल अपनी निपट अंतिम अवस्था में है. लोग फिर एकबार सबकुछ भूल कर नए वर्ष के स्वागत के लिए तत्पर दिखने लगे हैं तब उसी के पीछे से कोरोना वायरस की खतरनाक आहट फिर से सुनाई देने लगी है. खबरें डरावनी ही नहीं अत्यंत भयावह हैं. लोग बाहर से उत्साहित दिखाई दे रहे हैं मगर भीतर ही भीतर उनको बहुत कुछ डरा रहा है. यह डर लोगों के खुद के प्रति नहीं बल्कि अपनों के लिए है. उन नौनिहालों के लिए है जिन्होंने अभी ज़िन्दगी का बहुत सूक्ष्म पल ही देखा और उनके सामने भयानक वायरस आकर खड़ा हो गया. विगत दो सालों में जिस तरह से नौनिहालों ने, युवाओं ने इस संसार को त्यागा है, उनको कोरोना ने अपना ग्रास बनाया है वह वाकई दुखद भी है, भयावह भी है. ऐसी घटनाओं से दिल सिहर उठता है. अपने हाथों में ऐसी जिंदगियों को जाते देखना, जिनको भविष्य के लिए नए-नए सपने देखना था, अत्यंत कष्टकारी होता है.




ज़िन्दगी का यही वो क्षण होता है जबकि तकनीकी, ज्ञान, विज्ञान से संपन्न व्यक्ति के हाथ में कुछ नहीं होता है. उसके पास सिवाय हाथ मलने के, सिवाय पछताने के कुछ नहीं रह जाता है. देखा जाये तो यही स्थितियाँ व्यक्ति को सिखाती भी हैं. यही हालात व्यक्ति को लड़ने के लिए ऊर्जा भी देते हैं. जिजीविषा और विश्वास से भरे जनमानस को अपनी पिछली इन्हीं घटनाओं से सबक लेने की आवश्यकता है. एक बार पीछे पलट कर देखने की आवश्यकता है. हम सभी ने लॉकडाउन जैसी भयावहता को देखा और सहा है. क्या उस दौर में हमने भौतिकतावादी वस्तुओं का संग्रह करने का विचार किया? क्या उन दिनों में लोगों ने लक्जरी गाड़ियों, सामानों, जेवरातों को खरीदने के लिए प्रयास किये? सभी ने प्रयास किये अपने लोगों की सुरक्षा के. सभी ने कोशिश की एकसाथ रहने की. सभी के कदम बढ़ाये सामुदायिकता के लिए. सभी ने संग्रह किया जीवन देने वाली खाद्य-सामग्री का.


उन दिनों एक बहुत लम्बा समय बिना भौतिकता के बीता. उस समय को लोगों ने आपस में एक-दूसरे का साथ देकर बिता दिया. ऐसे में यह समझने वाली बात है कि ज़िन्दगी में आवश्यक क्या है, अनिवार्य क्या है. यही वो समझ है जो इंसानियत सिखाती है, इन्सान बनाती है. हमने जब भी इस सोच को, इस समझ को छोड़ा है हम सभी इन्सान से जानवर में बदल गए. इसी बदलाव ने समाज को ख़राब कर दिया. इसी परिवर्तन ने प्रकृति का विनाश करना शुरू कर दिया. इसी बदलाव ने पर्यावरण को असुरक्षित कर दिया. इसी परिवर्तन ने मानसिकता को दूषित कर दिया है. आज हम अपने चारों तरफ नजर डालें तो प्रदूषित वातावरण ज्यादा देखने को मिल रहा है. चाहे प्रकृति की बात करें, पर्यावरण की बात करें, संस्कृति की बात करें, खान-पान की बात करें, सामाजिकता की बात करें, पहनावे की बात करें, बोल-चाल की बात करें सभी में एक तरह का प्रदूषण स्पष्ट दिखाई देने लगा है.


विगत को विस्मृत करते हुए हम सभी आगत के स्वागत में लगे हैं, अच्छा है मगर हमें विगत को पूरी तरह से विस्मृत नहीं करना चाहिए. नए साल के जश्न के ठीक पहले जाने वाले साल के सबक को याद रखें. जाने वाले साल ने हमें क्या-क्या सीखने योग्य दिया उसे याद रखें. बीत चुके अन्य सालों में भी हम सबने किस तरह दुःख-दर्द सहकर भी सबके साथ को स्वीकार किया, सबके विश्वास को बनाये रखा, उसी को आने वाले साल के साथ भी बनाये रखें. आने वाला समय कितना भयावह होगा, होगा भी या नहीं इस बारे में आज से परेशान होने की नहीं बल्कि सजग रहने की आवश्यकता है. आने वाले कल की चिंता में हमें अपना आज ख़राब नहीं करना है.


जाने वाले इस साल के साथ अपने नौनिहालों को, युवाओं को सिखाना है कि कैसे अतीत से सीख लेते हुए हम आगे बढ़ें. निश्चित ही ये पीढ़ी रफ़्तार की शौक़ीन है, तकनीक की प्रेमी है. ऐसे में उसको ये समझाने की महती आवश्यकता है कि रफ़्तार और तकनीक के शौक में ज़िन्दगी को ख़त्म नहीं किया जाना चाहिए. इसी पीढ़ी को समाज, संस्कृति, साहित्य, सामाजिकता आदि का पाठ सिखाना होगा. हम सभी को नए साल के स्वागत के जश्न के साथ याद रखना होगा कि आने वाले साल को हम जो भी धरोहर सौंपेंगे, वही हमको वो अपने जाते समय देकर जायेगा. तो संकल्पित हों कि एक-दूसरे का विश्वास बनते हुए, एक-दूसरे का साथ बनते हुए आने वाले संकटों का सामना करेंगे. नए साल को हम खुशियाँ, स्वास्थ्य, सुखद मनोभाव, बेहतर इन्सान, सामाजिकता आदि से सजाते हुए आगे बढ़ेंगे. 





 

14 मार्च 2022

बनना होगा बुजुर्गों का साथी

आये दिन हम सबको बुजुर्गों से सम्बंधित नकारात्मक ख़बरें पढ़ने-देखने को मिलती हैं. इस तरह की खबरें जिसमें कोई बुजुर्ग सड़क किनारे रहने को मजबूर है, कोई परिवार के होते हुए भी वृद्धाश्रम में रहने को बेबस है, निश्चित तौर पर उस परिवार के लिए और समाज के लिए कलंक ही हैं. ऐसी खबरों के पढ़ने के बाद समझ नहीं आता है कि हम सबने समाज को किस दिशा में ले जाने का काम किया है? क्या हम समाज में सिर्फ धन उगाने की मशीन बनकर रह गए हैं? क्या हम सबके लिए संस्कार, संस्कृति, सभ्यता आदि की बातें महज किताबी, मंचीय रह गई हैं? परिवार जिस तरह से संयुक्त से एकल में परिवर्तित हुए और उसके बाद उनका स्वरूप नाभिकीय में बदल गया है, वहाँ बुजुर्गों के लिए ‘स्पेस दिखता नहीं है.




देखा जाये तो हम सभी ने पश्चिमी सभ्यता के सुर-लय को पकड़ने की कोशिशों में पहनावारहन-सहनशालीनतासंस्कृतिभाषारिश्तोंमर्यादा आदि तक को दरकिनार करने से परहेज नहीं किया है. अनेकानेक दिवस के मस्ती भरे आयोजनों के बीच पश्चिम से आये संस्कारों ने हम सभी को संस्कार-विहीन कर दिया है. इन विदेशी संस्कारों की चकाचौंध में हमारे परिवारों की दिव्यता कहीं गायब ही हो गई है. युवाओं की जोशपूर्ण मस्ती के बीच परिवार केसमाज के बुजुर्गों की हस्ती सिमटने सी लगी है. निर्द्वन्द्वस्वच्छंद भटकते झुण्ड के बीच बुजुर्ग एकाकीपन में पिसता सा लगता है. पश्चिमी सभ्यता, संस्कारों को अपनाने के बाद भी हमें अपने मूल को नहीं भूलना चाहिए. बुजुर्गों की अहमियत को विस्मृत नहीं करना चाहिए. ऐसे में किसी भी परिवार के युवाओं का दायित्व बनता है कि वे अपने अति-व्यस्ततम समय में से कुछ समय निकाल कर अपने परिजनों को भी दें. आज के वैश्वीकरण के दौर में, भौतिकतावादी दृष्टिकोण से सजी दुनिया में जबकि लोगों के पास काम का कोई निश्चित समय नहीं रह गया है, दिनचर्या अस्त-व्यस्त सी हो गई है, लोगों के पास खुद के लिए समय निकालना दुष्कर होता जा रहा है, वहाँ बुजुर्गों के लिए समय निकालने की बात सोचना भी कई बार हास्यास्पद लगता है.


इस संसार में किसी भी व्यक्ति के लिए अकेलापन सबसे बड़ा दुश्मन है. अकेलापन किसी उम्र विशेष के लिए दुश्मन नहीं है वरन हर उम्र के लिए दुश्मन है. यह दुश्मन बुजुर्गों के बीच बहुत तेजी से अपनी पैठ बनाता जा रहा है. अब बुजुर्गों के साथ बातचीत करने वाले युवा नहीं हैं, बच्चे नहीं हैं. एक समय हुआ करता था जबकि अपने जीवन का बहुत बड़ा समय अपने बाबा-दादी, नाना-नानी के साथ बिताया जाता था. इससे बुजुर्गों के जीवन का यह भाग हँसते-गाते कब बीत जाता था, किसी को पता ही नहीं चलता था. आज आलम ये है कि परिवार के बुजुर्ग कहीं दूर अकेले पड़े हुए हैं और उनके परिजन अपनी ही दुनिया में मगन हैं. ऐसी स्थितियों के कारण जहाँ बुजुर्गों को अकेलापन महसूस हो रहा है वहीं बच्चों को, युवाओं को इन बुजुर्गों से सीख नहीं मिल रही है. हमारे परिवार के ये बुजुर्ग अपने आपमें एक पाठशाला, एक विश्वविद्यालय हुआ करते हैं. इनसे न केवल सैद्धांतिक ज्ञान मिलता है वरन व्यावहारिक ज्ञान भी मिलता है. आज जबकि हम सभी भौतिकतावादी समाज में रहने के आदी होते जा रहे हैं, हम सभी को अपने बुजुर्गों के अकेलेपन को दूर करने का प्रयास करना चाहिए. हमारा एक पल यदि उनको असाधारण ख़ुशी देता है तो हमें इसके लिए अपने कई-कई पलों को न्योछावर कर देना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि हमें याद रखना होगा कि हमारे भविष्य की इमारत इन्हीं के अतीत की नींव पर निर्मित है.


आज एहसास और विश्वास की मर्यादा-पावनता को अपने परिवार के बुजुर्गों के बीच बाँटने की आवश्यकता है. आधुनिकता के दौर में चाहे कुछ कितना भी बदल गया हो पर हमें विश्वास को नहीं बदलने देना हैएहसास को नहीं बदलने देना हैरिश्तों को नहीं बदलने देना हैमर्यादा को नहीं बदलने देना हैसंस्कृति को नहीं बदलने देना है. दोस्ती के नाम पर मस्ती में चूर आज की पीढ़ी को इसका आभास कराये जाने की जरूरत है कि बुजुर्ग उनके लिए बोझ नहींउनकी रफ़्तार में अवरोध नहींउनकी मस्ती की बोरियत नहीं हैं. अपनी संस्कृति-सभ्यता से विरत हो रहेपरिवार को बंधन समझ रहेज़िम्मेवारियों से मुक्ति चाह रहे युवा वर्ग को समझाना ही होगा कि बुजुर्ग हमारा एहसास हैंहमारा विश्वास हैंहमारी संस्कृति हैंहमारा परिवार हैंहमारा अस्तित्व हैं. आइये कम से कम दोस्ती के नाम का एक दिन तो इनके नाम कर ही देंबाकी दिन तो अपने हमउम्र दोस्तों के साथ मौज-मस्तीसैर-सपाटागलबहियाँ करते हुए बिताना ही है.


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22 दिसंबर 2021

प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाना होगा

आए दिन हम लोग देखते हैं कि बहुत से लोग निराशा में, अवसाद में अपना जीवन व्यतीत कर रहे होते हैं। ऐसा लगता है जैसे उनके सामने जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है। यह स्वाभाविक सी बात है कि कई बार मन के काम न होने पर, लक्ष्य की पूर्ति न होने पर अथवा लगातार असफलता मिलने से मन में निराशा के भाव उत्पन्न होने लगते हैं। निराशा के इस दौर से बाहर निकलने का काम भी मनुष्य के हाथ में है। दरअसल तमाम सारी भौतिकतावादी स्थितियों के पीछे भागने के कारण से इंसान ने खुश रहना, छोटी छोटी बात में खुशियां तलाशना बंद कर दिया। उसके लिए जीवन का उद्देश्य धनोपार्जन, परिवार का भरण पोषण, नौकरी करना आदि रह गया है। यदि देखा जाए तो जीवन में यह उद्देश्य बहुत छोटे हैं।


व्यक्तियों को चाहिए कि वे जीवन के इन बने बनाए कारणों से अलग प्रकृति के साथ अपना तारतम्य और सामंजस्य स्थापित करके देखें। प्रकृति बहुत सी बातों की शिक्षा देती है और परेशानी में भी आगे बढ़ने का रास्ता दिखाती है। वर्तमान में व्यक्ति की परेशानी का बहुत बड़ा कारण उसका प्रकृति से दूर हो जाना है। जरा-जरा से फ़्लैट हों या फिर बड़े-बड़े मकान, अब बहुत सी जगहों पर प्राकृतिक पौधों का होना कम दिखाई देता है। इसके पीछे मुख्य कारण प्रकृति के इस अंग की देखभाल करना, उसी सेवा करना है। अब व्यक्ति अपने घर में आये हुए किसी बाहरी व्यक्ति को पानी पिलाने से बचना चाहता है, ऐसे में वह पेड़-पौधों को कैसे पानी दे सकता है? इस तरह की स्वार्थपरक सोच के कारण ही व्यक्ति पल-पल प्रकृति से दूर होता जा रहा है। 


प्रकृति से दूरी व्यक्तियों में तनाव पैदा कर रही है। प्रकृति से दूर होने के कारण इंसान उसके विविध रूपों से परिचय प्राप्त नहीं कर पा रहा है। उसे प्रकृति के साथ तालमेल बिठाना खुद को कमतर समझने जैसा लगने लगा है। इंसान को प्रकृति के साथ अपने सम्बन्ध को, रिश्ते को समझना होगा। उसके विविध रूपों के साथ खुद को जोड़ना होगा। उसके मनोरम दृश्यों को आत्मसात करते हुए खुद को खुशहाली के रास्ते पर ले जाना होगा।

16 दिसंबर 2021

खुशियों को खोजा जा रहा है

प्रत्येक वर्ष ऐसा होता है कि उसमें दुःख भी मिलते हैं और सुख भी मिलते हैं. ऐसा सभी के साथ ही होता है. सुख-दुःख का अपना ही साथ है. शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा होगा जो कह सकता होगा कि उसे किसी वर्ष में सिर्फ और सिर्फ सुख ही मिला है. इसी तरह शायद ही कोई होगा जिसे किसी वर्ष में सिर्फ दुःख ही दुःख मिले हों. सुख और दुःख के मिलने का अनुपात कुछ भी हो सकता है, उसकी तीव्रता कुछ भी हो सकती है.


इस वर्ष का आगमन बहुत ही बुरी खबर से हुआ. उस खबर को बुरा ही नहीं कहा जायेगा बल्कि वह एक ऐसा ज़ख्म है जिसे आजीवन भरना नहीं है. उस खबर के बाद से बहुत से पल ऐसे आये जिनके साथ कुछ न कुछ ख़ुशी जैसी स्थिति आई मगर पूरे वर्ष भर की या कहें कि जीवन भर की खुशियों को उस एक बुरी खबर के बराबर भी खड़ा नहीं कर सकते हैं. आखिर कैसे जीवन भर की ख़ुशी छोटे भाई की मृत्यु पर भारी बैठ जाएगी?


फ़िलहाल तो बस खुशियों को खोजा जा रहा है, कब तक खोजा जाता रहेगा पता नहीं. हाँ, कुछ छोटे-छोटे कार्यों को करके, कुछ कार्यों में सहयोगी बनकर मन को बहला लिया जा रहा है. कुछ यही कर रहे हैं प्रतिमाह नर नारायण सेवा में सहयोग देकर. 








16.12.2021
 

03 मई 2021

आत्मबल से मिली साँसों को ज़िन्दगी

कल, 02 मई को खबर मिली कि शिवम मिश्रा जी की तबियत ठीक नहीं है। ऑक्सीजन लेवल 80-84 पर घूम रहा है। इसके बाद कई मित्रों को फोन खटखटाए सहायता के लिए। पवन मिश्रा जी, अजय कुमार झा जी, कंचन सिंह चौहान जी, ललित कुमार जी, छोटे भाई सुनील चौहान ने पूरी तत्परता, सक्रियता दिखाई। राजनीतिक, प्रशासनिक स्तर पर अलग सक्रियता बनी हुई थी। उधर मैनपुरी में शिवम के परिजन अपने प्रयास कर रहे थे।

इस दौरान शिवम से लगातार फोन से बातचीत होती रही। बातचीत में हँसी, मजाक भी होता रहा। उनको लखनऊ ब्लॉगर सम्मेलन की उनकी एक बात याद दिलाई, जबकि भोजन के समय हाॅल में भीड़ थी तो शिवम बोले थे कि कहो तो कमर का एक ठुमका लगा कर भीड़ इधर-उधर कर दें?

कल उनसे यही कहा कि जल्दी एक ठुमका लगा कर ये बीमारी इधर-उधर कर दो।

शिवम जी की सक्रियता ब्लॉग पर, सोशल मीडिया पर लगातार बनी रहती है। उनकी ज़िन्दादिली और मित्रता निभाने का जज्बा बहुत सारे लोगों को उनका प्रशंसक बनाए है। इसी के चलते सोशल मीडिया पर भी लगातार उनके स्वास्थ्य को लेकर लोगों के मैसेज, फोन आ रहे थे। काफी देर से शिवम जी के हालचाल न लिए थे सो फोन करने के बजाय रात 12:15 पर मैसेज किया तो उन्होंने ये चित्र भेजा। ऑक्सीजन लेवल देख अपार खुशी हुई। ये स्थिति बिना ऑक्सीजन सिलेंडर के बनी हुई थी।



उसी समय उनके मैसेज "आप के ठुमके वाली बात की लाज रखनी थी" के साथ उनकी वीडियो काॅल आई। आवाज़ में वही पुरानी खनक, होंठों पर वही हँसी। 

ब्लॉग संसार के ज़िन्दादिल, यारबाज व्यक्तित्व ने अपनी ज़िन्दादिली से खुद को सुरक्षित घेरे में पहुँचाया। 

जो लोग किसी भी तरह से परेशान हैं, वे प्रेरणा ले सकते हैं शिवम मिश्रा से।

रात साढ़े बारह बजे वीडियो काॅल का स्क्रीनशॉट 

❤😍



वंदेमातरम्

14 दिसंबर 2020

कोरोनाकाल की नकारात्मकता में सकारात्मकता

नववर्ष के उल्लास के बीच से निकल कर सामने आया यह वर्ष अब अपने अंतिम चरण में है. कोरोना वायरस की मारक उपस्थिति के बीच इस वर्ष ने नितांत खालीपन पैदा करने के साथ-साथ बहुत कुछ सिखाने का काम भी किया है. आर्थिक दृष्टि से, रोजगार की दृष्टि से, कामगारों, गरीबों, मजदूरों आदि के नजरिये से देखें तो इस वर्ष में अत्यंत कठिनाई भरे दौर देखने को मिले हैं. बहुत से परिवारों ने अपने प्रियजनों को हमेशा-हमेशा के लिए खोया है तो बहुत से परिवारों में इसका खौफ बना रहा. इस वर्ष को बहुत सारी नकारात्मकता के साथ गुजरने वाला वर्ष कहा जा सकता है.


जैसा कि प्रकृति का नियम है तथा सामान्य जीवन में भी देखने को मिलता है कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं. प्राकृतिक रूप से भी सुख-दुःख, दिन-रात, धरती-आकाश, माता-पिता, पति-पत्नी आदि जैसी युगल अवधारणा हमारे समाज में उपस्थित है. यही वह अवधारणा है जो सामान्य दिनों में, कष्ट के समय में लोगों का विश्वास बढ़ाती है, उनको संयम प्रदान करती है. इस अवधारणा की सशक्तता को यह जाता हुआ वर्ष भी समझाता हुआ समझ आता है.


कोरोना की उपस्थिति होने के बाद जब सरकार द्वारा देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की गई, उस समय संभवतः किसी को भी इसका भान नहीं था कि यह कुछ दिनों की नहीं बल्कि महीनों तक चलने वाली स्थिति होगी. लॉकडाउन के प्रथम चरण के आगे बढ़ने के बाद ही लोगों में अपने परिवार, अपने परिजनों के प्रति चिंता का भाव बहुत गहराई से दिखाई दिया. जिन परिवारों के बच्चे बाहर शिक्षा में थे अथवा किसी रोजगार में थे उनको वापस घर लाने की कवायद होने लगी. जिन परिजनों में बुजुर्ग लोग थे, कहीं तन्हा रह रहे थे उनके प्रति भी एक तरह की चिंता देखने को मिली थी. परिवार के सक्षम लोग जहाँ एक तरफ अपने बच्चों के सकुशल घर वापसी की कामना कर रहे थे तो वही लोग दूसरी तरफ अपने घर के बुजुर्गों के स्वास्थ्य का, उनकी सेहत का ख्याल रख रहे थे.


बुजुर्गों के मामले में बहुतायत में एक अलग तरह की स्थिति इधर विगत कई वर्षों से देखने को मिल रही थी. जन-जीवन सामान्य रूप से गुजरते रहने के कारण परिवार संयुक्त से एकल और फिर एकल से नाभिकीय रूप में परिवर्तित होने लगे थे. इससे भी परिवार के बुजुर्ग व्यक्तियों को अकेलेपन का सामना करना पड़ रहा था. भौतिकता, आधुनिकता, धन की अंधाधुंध दौड़ में बहुसंख्यक लोगों में परिवार के प्रति, अपने बुजुर्ग परिजनों के प्रति उपेक्षा का भाव भी पनपने लगा था. कोरोना की भयावहता के चलते घरों में कैद रहने के कारण लोगों ने अचानक से परिवार के सदस्यों की अहमियत को समझना शुरू किया.


अधिकांशतः देखने में आता है कि जब कोई हमारे साथ होता है, हमारी नज़रों के सामने होता है, हमारी पहुँच में होता है तब हमें उसकी कदर नहीं होती है. यह स्थिति व्यक्ति, वस्तु, समय आदि सभी के लिए एकसमान रूप से प्रभावी होती है. हमारे पास जिसकी उपलब्धता होती है, उसकी फ़िक्र हम नहीं करते हैं. ऐसा अपने घर-परिवार के बुजुर्गों के मामले में बहुत होता है. उनके हमारे साथ रहने की स्थिति में हमें उनके अनुभवों का, उनके ज्ञान का, उनके कार्यों का भान होते हुए भी उसके बारे में विचार करने का, उनसे सीखने का जरा भी एहसास नहीं होता है. उम्र, समय, कार्यों, अनुभव आदि से बहुत अधिक सक्षम हमारे बुजुर्ग हमारे लिए एक अनमोल खजाना होते हैं, एक परिपक्व संस्थान की भांति हमारे साथ होते हैं मगर हम अपने में मगन उनसे लाभ नहीं ले पाते हैं.


आधुनिकता, भौतिकता की दौड़ में शामिल होकर बुजुर्गों के प्रति एक तरह का उपेक्षा का भाव समाज में दिखाई देने लगा था. भले ही घर-परिवार में बुजुर्गों को यथोचित सुख-सुविधाओं का ढेर लगा दिया जाये मगर उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलने-जुलने, उनके साथ समय बिताने के मामले में कमी आई थी. लॉकडाउन अवधि ने परिवार के सभी सदस्यों को एकसाथ रहने पर विवश किया. इस दौरान नई पीढ़ी के लोगों ने, बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करती पीढ़ी ने भले ही वर्क फ्रॉम होम के द्वारा अपने काम की पूर्ति की हो मगर उंनका सम्बन्ध अपने परिजनों से बना रहा. वीकेंड जैसी शब्दावली में उनका सामना इस दौरान बाजार से नहीं बल्कि घर के लोगों से हुआ, परिवार के अनुभवी बुजुर्गों से हुआ. यह इस नकारात्मक अवधि की सकारात्मकता ही कही जाएगी.


अब जबकि लॉकडाउन के कारण घर में एकसाथ रहने पर लोगों में, विशेष रूप से आधुनिक जीवन-शैली के प्रति दीवानगी की हद तक पागल होकर भागती पीढ़ी ने भी संबंधों का, रिश्तों का महत्त्व समझा है. इस पीढ़ी को घर के बुजुर्गों के अनुभवों, उनकी शिक्षाओं, कार्यों के प्रति सजग बनाये रखने की आवश्यकता है. कोरोना का भयावह काल आज नहीं तो कल समाप्त होगा ही किन्तु इस अवधि में जिस तरह की आत्मीयता परिवारों में बनती दिखाई दी, बुजुर्गों के प्रति सकारात्मकता दिखाई दी, उसे निरंतरता दिया जाना समय की माँग है. विचार इसी बात पर किया जाना चाहिए कि घर के बुजुर्ग स्वयं को अकेला न महसूस करें. परिजनों को भी चाहिए कि वे अपने बुजुर्गों के अनुभवों का लाभ अपनी जीवन-शैली को सरल बनाने में, अपने कार्यों को और अधिक प्रभावी बनाने में लेने का प्रयास करें. जीवन में बहुत से पल ऐसे आते हैं जबकि व्यक्ति के सामने असमंजस की स्थिति होती है. ऐसी स्थिति में बहुत बार बुजुर्गों के अनुभव ही सहायक बनते हैं. यह हम सभी ने अनुभव कर लिया है कि आप कुछ भी क्यों न हो जाएँ मगर आपको मानसिक संबल परिजनों द्वारा ही प्राप्त होता है. ऐसे में समय के साथ इस शक्ति को बचाए रखा जाना चाहिए.


आज समय की, समाज की जैसी माँग है उसके अनुसार खुद को आधुनिक बनाना अपराध नहीं, खुद के लिए भौतिकता के संसाधनों का इस्तेमाल करना, उनका जुटाना दोष नहीं है मगर इसमें ध्यान इसका रखा जाना चाहिए कि संसाधनों के जुटाने में कहीं परिवार की असल सम्पदा तो नष्ट नहीं हो रही. घर का वास्तविक खजाना तो बेकार नहीं हो रहा.




(उक्त लेख आज, 14-12-2020 के बीपीएन टाइम्स समाचार पत्र के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.)
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वंदेमातरम्

18 नवंबर 2020

मिलजुल कर महफ़िल सजाएँ

जब भी ये दिल उदास होता है, जाने कौन आसपास होता है या फिर अकेले हैं चले आओ, जहाँ हो आदि गीत की पंक्तियाँ दिल के उदास होने पर किसी अपने के अपने आसपास होने की गवाही दे रही हैं. दिल के उदास होने और उस उदासी में किसी अपने के पास होने की अभिलाषा करना इंसान को इंसान से जोड़े रखने की संकल्पना को पुष्ट करती है. यह एकजुटता, पारिवारिकता मानवीय आधार पर निर्मित अनेकानेक मान्यताओं, परम्पराओं का वैज्ञानिक आधार रही है. वसुधैव कुटुम्बकम महज एक विचार नहीं, चंद शब्द नहीं वरन अपने आपमें एक समृद्ध अवधारणा है, जिसके द्वारा इंसान को न केवल इंसान से बल्कि इंसान को प्रकृति के अंग-अंग से समन्विति बनाये रखने को बल मिलता है. आधुनिकता के वशीभूत हमने न केवल वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा को छिन्न-भिन्न किया वरन अपने आपको नितांत अकेलेपन का शिकार बना लिया. तकनीकी, ज्ञान, कार्य की असीमित व्यस्तता के बीच भी इंसान किस कदर अकेला पड़ गया है इसे महानगरों के साथ-साथ छोटे-छोटे नगरों, कस्बों में भी सहजता से देखा जा सकता है. किसी समय छोटे-छोटे नगरों, कस्बों, गाँवों आदि को प्रेम-स्नेह-सौहार्द्र के, आपसी सहयोग के, समर्पण के रूप में प्रस्तुत किया जाता था किन्तु आज इन सबको भी आधुनिकता की बयार में बदलते देखा जा सकता है.



आधुनिकता का आलम ये है कि इंसान के संगठित रूप में रहने को अब कबीलाई संस्कृति समझा जाने लगा है; खिलखिलाकर, ठहाका मारकर हँसने को अब ज़ाहिलाना हरकत करार दिया जाता है; अंतरंगता दिखाने को चापलूसी समझा जाने लगता है; गले मिलने, आत्मीयता जताने को अवैध संबंधों से जोड़कर देखा जाने लगता है, ऐसे में दिल का उदास होना, अकेला होना लाजिमी है. उत्सव, त्यौहार, आयोजन अब हर्ष-उल्लास का विषय नहीं वरन विवाद का विषय बनने लगे हैं, ऐसे में इंसान को भरे-पूरे होने का एहसास कैसे हो? दोस्तों की महफ़िल कहीं दूर हो गई है, सांझ ढलने से देर रात चलने वाली हँसी-मस्ती की आवारगी अब देखने को नहीं मिलती है. बच्चों के लिए खेल के मैदानों को बड़ी-बड़ी इमारतों ने निगल लिया है, अब वे मैदान में मस्ती करने के स्थान पर मोबाइल, टीवी, वीडियो गेम के सामने अकेले-अकेले अपनी सक्रियता प्रदर्शित करते हैं. बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सबको अकेलापन सालता भी है और विडम्बना देखिये कि यही अकेलापन उन्हें पसंद भी आता है, या कहें कि अकेलेपन से लगातार जूझते रहने के कारण ये अकेलापन उन्हें पसंद आने लगता है. अकेलेपन का ये रोग ऐसे लोगों के मन-मष्तिष्क में इस कदर हावी हो जाता है कि किसी का साथ, मित्रों की संगत, महफ़िलों की रौनक, हंसी-ठहाके ऐसे लोगों को अकेलेपन की तरफ और ज्यादा धकेलते से मालूम पड़ते हैं.

 

इससे पहले कि हमारे परिवार के बीच में अकेलेपन का भयावह साया किसी सदस्य को अपनी गिरफ्त में ले, किसी बच्चे को अवसाद की तरफ ले जाये, किसी युवा को अपराध की तरफ धकेले, हम सबको एकजुटता की आवश्यकता है. हम सभी को सहयोग की, अपनत्व की महफ़िल सजाकर अपने लोगों को अपने लोगों के बीच उपस्थित करना होगा. एक-दूसरे से करते हैं प्यार हम, एक-दूसरे के लिए बेक़रार हम या फिर साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जायेगा... आदि गीतों की पंक्तियाँ स्मृति में बसाकर सबको एकसाथ गाना-गुनगुनाना होगा.


14 अप्रैल 2020

ब्लॉगर पर ब्लॉग बनाना सीखें

ब्लॉग जगत के वरिष्ठ और सक्रिय साथियों द्वारा एक बार फिर ब्लॉग जगत को उसकी पुरानी रौनक लौटाने का प्रयास किया जा रहा है. इस सम्बन्ध में बहुत से पुराने साथियों के साथ-साथ कुछ नए साथियों में भी उत्साह देखने को मिल रहा है. अपने ऐसे नए साथियों के लिए ब्लॉगर पर ब्लॉग बनाये जाने का तरीका यहाँ चित्र के माध्यम से प्रस्तुत कर रहे हैं. वैसे तो इंटरनेट पर अनेक वेबसाइट और ब्लॉग पर ब्लॉग बनाने के वीडियो, चित्र उपलब्ध हैं इसके बाद भी सहयोग भाव से यह पोस्ट उन नए साथियों के लिए जो ब्लॉग जगत से जुड़ने की अभिलाषा रखते हैं. आशा है कि आप नए साथियों को अवश्य ही मदद मिलेगी.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग



















यदि ब्लॉग बनाने में किसी तरह की समस्या आये तो कृपया टिप्पणी में अपनी समस्या से अवगत करा सकते हैं अथवा kumarendra.com@gmail.com पर हमें मेल कर सकते हैं. 

ब्लॉग बनाने वाले सभी साथियों से अनुरोध है कि ब्लॉग बनाने के बाद अपनी पहली पोस्ट तुरंत ही लिखें और हमें लिंक भेजकर अवश्य ही अवगत कराएँ. आपका ब्लॉग जगत में स्वागत करने को हम तत्पर हैं.

30 नवंबर 2019

डरते हैं हम बवंडर आने के पहले की अपनी ही ख़ामोशी से


वर्षों पुराने दो परिचित. सामाजिक ताने-बाने के चक्कर में, शिक्षा-कैरियर के कारण चकरघिन्नी बन दोनों कई वर्षों तक परिचित होने के बाद भी अपरिचित से रहे. समय, स्थान की अपनी सीमाओं के चलते अनजान बने रहे. तकनीकी विकास ने सभी दूरियों को पाट दिया तो उन दोनों के बीच की दूरियाँ भी मिट गईं. वर्षों पुरानी दोस्ती फिर अपने पुराने स्वरूप में लौटने लगी. इस क्रम में समय, परिस्थितियों ने भी अपना असर दिखाया. कुछ ख्वाहिशों ने सिर उठाया, कुछ मजबूरियों ने कदम रोके, कुछ ज्यादा पाने की लालसा, कुछ गलतफहमियों का सामना और फिर जैसा कि होता है कुछ अबोल जैसी स्थिति बनी. दोनों के बीच कॉमन परिचित हम भी रहे. जैसा कि स्वभाव है कि दो दोस्तों के बीच, संबंधों, रिश्तों के बीच आने वाली किसी भी खटास को दूर किया जाये. कोशिश कुछ अच्छा करने की हुई मगर वह गलत साबित हो गई. उन दोनों की अबोल की स्थिति बद से बदतर स्थिति में जाती लगी. प्रयास बराबर किये मगर हमारे हाथ असफलता ही हाथ लगी.

समय ने करवट बदली. उसे शायद उतने बुरे भर से संतोष नहीं था. अभी हमारी झोली में कुछ और ज्यादा बुरा सा उसके द्वारा भेजा जाना था. फिर एक बार वही दोनों दोस्तों का घटनाक्रम आँखों के सामने से गुजरा. फिर उन दोनों के बीच की स्थिति को अपने स्तर से संवारने की, सुधारने की कोशिश की. सोचा किसी अनावश्यक विवाद को कोई और हवा न दे, सोचा किसी और के दिमाग का संदेह किसी मित्र के जीवन में जहर न घोले मगर सोचना बस सोचना ही रहा. बात सँभालने के चक्कर में और ज्यादा उलझ गई. अबकी हम गलत के साथ-साथ बुरे भी साबित किये गए. हमें खुद समझ नहीं आया कि हम बात को सही से समझा न सके या फिर दोनों दोस्तों के बीच के मतभेद को, मनभेद को हम ही सही ढंग से समझ न सके?


वैसे ये कोई नई बात नहीं कि हम कुछ अच्छा करने निकलें और उसका परिणाम बुरे के रूप में हमारे पास न लौटे. हमारे साथ ऐसा अक्सर होता है कि अच्छा करने के प्रयास में बुरा हो जाता है, न केवल बुरा बल्कि बहुत बुरा हो जाता है. किसी के साथ अच्छा करने के पीछे किसी तरह की स्वार्थी भावना भी नहीं रहती है कि एकबारगी ये लगे कि इसी सोच का परिणाम मिला. याद करते हैं अपने बीते दिनों को तो सामाजिक कार्यों के प्रति, लोगों की सहायता के लिए खुद को हरदम तत्पर देखा. उस दौर में जबकि किसी भी युवा के सामने उसका कैरियर महत्त्वपूर्ण होता है, उस दौर में भी लोगों की सहायता के लिए खुद को पीछे नहीं रखा. अपना शहर रहा हो या किसी अनजाने शहर में रहे हों, लोगों की सहायता करने के स्वभाव को न बदला. शहर का कोई भी हिस्सा रहा हो, बाजार हो, कार्यालय को, कॉलेज हो, सफ़र हो, बस हो, ट्रेन हो या फिर कहीं भी हरदम मन में यही भावना रही कि खुद के द्वारा किसी भी जरूरतमंद की जितनी मदद हो सके, कर दी जाये. कभी भी इसके बदले किसी तरह की चाह न रखी. अनेक बार तो सहायता करने के दौरान मुसीबतों से भी पाला पड़ा. लड़ाई-झगड़े की स्थिति तक बनी, कई बार कानूनी पचड़ों में पड़ने तक की नौबत आ गई मगर कहीं न कहीं लोगों की सद्भावना काम आती रही और बिना किसी बड़ी मुसीबत के सहजता से सभी मुश्किलों से निकल लोगों के काम आते रहे.

सहयोग की, अच्छा करने की भावना का कई लोगों द्वारा नाजायज फायदा भी उठाया गया. काम निकल जाने पर ऐसे बहुत से लोगों ने पहचानना भी बंद कर दिया. ऐसे-ऐसे लोगों को जो अपने एक-एक दिन के बहुतायत घंटे हमारे साथ, हमारे घर पर बिताया करते थे, वे भी अनजानों की तरह से व्यवहार करते देखे गए. अच्छा करने की भावना लिए काम करने के बदले में जब आलोचना, धोखा अथवा गलत बातें सुनने को मिलती तो कष्ट होता था. शुरूआती दौर में ऐसी बातें अन्दर तक हिलाकर रख देती थीं मगर समय ने बड़े-बड़े घाव दिए और बड़े-बड़े घावों पर मरहम भी लगाया. कुछ ऐसा यहाँ भी होता रहा. हम अपने स्वभाव के अनुसार लोगों की सहायता करते रहे, क्या अपना क्या पराया, कौन परिचित का, कौन अपरिचित यह बिना जाने-समझे सबके काम आने का प्रयास करते रहे. इस प्रयास के सुफल भी मिले. लोगों की सहायता करने के साथ-साथ सदैव से एक विचार मन में रहा कि किसी के रिश्तों में हमारे कारण खटास न आये. किसी ने यदि हमसे सम्बन्ध बनाये हैं तो वे हमारी तरफ से न बिगड़ें. विगत के अनेक वर्षों में अनेक अवसर ऐसे आये जबकि संबंधों ने, रिश्तों ने जैसे हमारी परीक्षा लेनी चाही. हमारे सबसे करीब बताने से न चूकने वाले भी मौका पड़ने पर मुंह फेरने से न चूके. बिना हमारे एक कदम आगे न बढ़ाने वाले भी हमें पीछे छोड़कर किसी और के साथ आगे निकल लिए. दोस्ती का दंभ भरने वाले लोगों के रिश्तों को बचाने के चक्कर में हम खुद चक्कर खा गए.

जब-जब प्रयास किया कि हमारे कारण लोगों के संबंधों में एकजुटता बनी रहे, हमारे साथ वालों के संबंधों में मजबूती बनी रहे, सभी के बीच आपसी विश्वास-प्रेम-स्नेह बना रहे तब-तब ही हम गलत साबित किये गए. ऐसा कुछ यदि किसी अनजान के साथ हो, अनजान के द्वारा हो तो कष्ट नहीं होता है मगर यदि ऐसा कुछ अपने लोगों के द्वारा किया जाये तो कष्ट होना स्वाभाविक है. हाल की कुछ घटनाओं ने इस बार अन्दर से हिलाकर रख दिया. सोचा न था कि इस बार किसी अपने के द्वारा हमें गलत साबित किया जायेगा. वर्षों के संबंधों को एक झटके में अपरिचित सा साबित कर दिया जायेगा. संबंधों, रिश्तों में समन्वय, विश्वास बनाए रखने की कीमत संबंधों, रिश्तों की समाप्ति जैसी स्थिति से चुकानी पड़ेगी. दो दोस्तों के बीच संबंधों में कटुता न आये उसके लिए उठाया गया कदम हमारे लिए ही घातक साबित होगा समझ नहीं आया था. इसी तरह किसी गलत बात को, अफवाह को रोकने की कोशिश में एक बार फिर अपने आपको ही गलत महसूस किया. 


जीवन में घटित होने वाला कोई भी हादसा, कोई भी घटनाक्रम सीख देता है, ये और बात है कि हम उससे कितना और क्या सीखना चाहते हैं. ऐसी घटनाएँ हमें सदैव एक तरह का पाठ पढ़ाती हैं और हम भी ऐसी किसी भी तरह की घटना से सीखने की कोशिश करते हुए आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं. किसी भी बात पर अटके रहना हमारी आदत कभी न रही है, जिसके चलते कोई बात बहुत लम्बे समय तक परेशान नहीं कर पाती है. किसी भी बुरी से बुरी घटना भी आत्मविश्वास को, आत्मबल को हिला नहीं पाती है, यही वो शक्ति है जो हमें हर गलत बात से लड़ने के लिए प्रेरित करती है, हमारी ऊर्जा बनती है. ये और बात है कि कुछ समय को अन्दर उथल-पुथल तो मचा ही जाती है. इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ. भीतर उठा बवंडर अब शांत है, खामोश है. उठे बवंडर के बाद की ख़ामोशी हमें नहीं डराती, डर लगता है हमें बवंडर आने के पहले अपनी ही ख़ामोशी से. खुद की शक्ति से खुद के बवंडर को खामोश करके पुनः अपने रास्ते चल पड़े हैं क्योंकि हमारी राह में बहुत से लोग ऐसे हैं जो हमारा इंतजार कर रहे हैं. बहुत से मजबूर लोग ऐसे बैठे हुए हैं जिन्हें हमारी आवश्यकता है. सहायता, सहयोग, मदद का कार्य चलता रहे, सतत चलता रहे, आत्मविश्वास, आत्मबल कमजोर न पड़े, यही कामना करते हैं खुद के लिए.

18 अप्रैल 2019

कुछ पल परिवार के बुजुर्गों के लिए भी


वैश्विक समुदाय के साथ कदमताल करने के प्रयास में लगभग सारा समाज पूरे जीजान से जुटा हुआ है. पश्चिमी सभ्यता के सुर-लय को पकड़ने की कोशिशों में हमने पहनावा, रहन-सहन, शालीनता, संस्कृति, भाषा, रिश्तों, मर्यादा आदि तक को दरकिनार करने से परहेज नहीं किया जा रहा है. पश्चिम से हमारे समाज ने कुछ सीखा हो या न सीखा हो मगर उसने संबंधों का खुलापन अवश्य सीखा है. सिर्फ सीखा ही नहीं है वरन उसे आत्मसात भी कर लिया है. यही कारण है कि आज विपरीतलिंगियों के छोटे-बड़े झुण्ड सडकों पर तैरते दिखाई देते हैं. दिन हो या फिर रात, सुबह का समय ही या शाम का, कॉलेज का पूरी गर्मजोशी से हमने हाथों में पट्टा बाँध, गलबहियाँ करते हुए, बाइक को फर्राटा बनाकर, कुछ तरल पदार्थ गले के नीचे उतार इस विशेष डे को और भी विशेष बना दिया. आपस में चहकते, मटकते, तेज़-तेज़ आवाज़ में अजीब-अजीब सी ध्वनियाँ निकालते, बेतरतीब वस्त्रों के साथ खुद को आधुनिक सा सजाते हुए विपरीतलिंगियों में दोस्ती, दोस्ती में प्यार और प्यार में भी प्यार से आगे का बहुत कुछ खोजते तमाम झुण्ड आयोजन की सफलता की कहानी लिखने में लगे होंगे. इसी सफल-असफल सी कहानी के साये में बहुत कुछ बिखरता सा दिखता है, बहुत कुछ छीजता सा दिखता है.


विदेशी आयोजनों की भव्यता के बीच हमारे परिवार की दिव्यता कहीं बिखरती सी दिखती है. युवाओं की जोशपूर्ण मस्ती के बीच परिवार के, समाज के बुजुर्गों की हस्ती सिमटती सी लगती है. निर्द्वन्द्व, स्वच्छंद भटकते झुण्ड के बीच बुजुर्गों का एकाकीपन पिसता सा लगता है. ये आयोजन भले ही एक दिन का हो पर आज की पीढ़ी अपना हर दिन, हर पल सिर्फ और सिर्फ मौज में जीना चाहती है. मस्ती में सराबोर होने के तरीके खोजती हुई अपने आपको सिर्फ और सिर्फ अपने में केन्द्रित कर लेना चाहती है. उसके लिए अपने अस्तित्व और अपनी दोस्ती के अलावा कुछ और मायने नहीं रखता है. ये और बात है कि आज के तीव्रगति से भागते समय में अधिकांश दोस्ती भरे रिश्ते कब बनते हैं और कब बिखर जाते हैं, ये खुद इन दोस्तों को ही पता नहीं चलता. ऐसे भटकन भरे दौर में कम से कम कुछ समय हमारे युवा अपने उन बुजुर्गों के लिए भी निकालें जो उनके साथ रहते हुए भी, उनके आसपास रहते हुए भी एकाकी जीवन गुजार रहे हैं. दोस्ती के मायने सिर्फ गुलछर्रे उड़ाना, पार्टियाँ करना, सडकों पर हुल्लड़ काटना, देह की परिभाषा तय करना ही नहीं है बल्कि एक एहसास को जन्म देना है, एक विश्वास को स्थापित करना है. 

एहसास और विश्वास की मर्यादा-पावनता को हम अपने परिवार के बुजुर्गों के बीच भी बाँटने का प्रयास करें. दोस्ती के नाम पर भले ही हमारी युवा पीढ़ी उनके साथ बाइक के स्टंट न कर सके, बीयर-वाइन के जाम न छलका सके, गलबहियाँ करते हुए मॉल-पब, डिस्कोथिक में मस्ती न कर सके पर ये सत्य है कि उन बुजुर्गों को ख़ुशी का बहुत बड़ा तोहफा दे सकती है. आधुनिकता के दौर में चाहे कुछ कितना भी बदल गया हो पर हमें विश्वास को नहीं बदलने देना है, एहसास को नहीं बदलने देना है, रिश्तों को नहीं बदलने देना है, मर्यादा को नहीं बदलने देना है, संस्कृति को नहीं बदलने देना है. दोस्ती के नाम पर मस्ती में चूर आज की पीढ़ी को इसका आभास कराये जाने की जरूरत है कि बुजुर्ग उनके लिए बोझ नहीं, उनकी रफ़्तार में अवरोध नहीं, उनकी मस्ती की बोरियत नहीं हैं. अपनी संस्कृति-सभ्यता से विरत हो रहे, परिवार को बंधन समझ रहे, ज़िम्मेवारियों से मुक्ति चाह रहे युवा वर्ग को समझाना ही होगा कि बुजुर्ग हमारा एहसास हैं, हमारा विश्वास हैं, हमारी संस्कृति हैं, हमारा परिवार हैं, हमारा अस्तित्व हैं. आइये कम से कम दोस्ती के नाम का एक दिन तो इनके नाम कर ही दें, बाकी दिन तो अपने हमउम्र दोस्तों के साथ मौज-मस्ती, सैर-सपाटा, गलबहियाँ करते हुए बिताना ही है.


18 फ़रवरी 2019

वीर सैनिकों के परिवार का हिस्सा बनें हम भी


पुलवामा में आतंकी हमले के बाद से पूरे देश में सेना के प्रति, सैनिकों के प्रति संवेदनात्मक माहौल बना हुआ है. युद्ध की बात भी हो रही है मगर उसके साथ-साथ सैनिकों के हितार्थ बात भी हो रही है. शहीद सैनिकों के सम्मान में नागरिकों में जागरूकता दिख रही है. देश में भले ही लोगों में आपस में कितने भी विभेद क्यों न रहे हों, लोगों में आपस में कितने भी राजनैतिक विरोधाभास भले ही दिखाई देते हों किन्तु सेना के नाम पर, सैनिकों के नाम पर एकजुटता देखने को मिलती है. इसी एकजुटता, सम्मान की भावना का ही परिणाम है कि सैनिकों की मदद के लिए सरकार द्वारा संचालित एक वेबसाइट लगातार हैंग कर जा रही है.


ये संवेदना, ये एकजुटता, सैनिकों के प्रति सम्मान भाव ऐसे समय और तेजी से उभर कर सामने आता है जबकि उनके साथ कोई न कोई हादसा हो जाता है. इस हादसे में हमारे वीर सैनिकों के शहीद होने के बाद उनके परिजनों की तरफ मीडिया का, राजनीतिज्ञों का, समाज सेवा करने वालों का, आम नागरिकों का ध्यान भी जाता है. ऐसा होना अच्छा है मगर यह अच्छा काम लगातार बना नहीं रह पाता है. इन वीर शहीदों के परिजनों के प्रति चंद दिनों तक तो लोगों की संवेदना बनी रहती है और कुछ दिनों, महीनों बाद उस शहीद के परिजन अकेले से पड़ जाते हैं. चंद दिनों के बाद वे जीवन की वास्तविक कठिनाइयों से जूझने लगते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि बहुतायत सैनिकों के परिवार मध्यम अथवा निम्न मध्यम आय वर्ग से आते हैं. किसी-किसी परिवार में वही सैनिक एकमात्र कमाऊ पूत होता है. कहीं-कहीं वही एक सैनिक समूचे परिवार का आधार होता है. किसी-किसी घर में वही एक सैनिक अपने छोटे भाई-बहिन के भविष्य का ख्याल रखने वाला होता है. किसी-किसी परिवार में कोई शहीद सैनिक नव-विवाहित होते हैं, कहीं-कहीं वे नवजात शिशु के पिता बने होते हैं. ऐसे में स्पष्ट है कि शहीद हुए उस जवान के घर पर चंद दिनों के बाद वास्तविक कठिनाइयाँ सिर उठाना शुरू कर देती हैं. वर्ष भर के पर्व-त्यौहार, आस-पड़ोस के आयोजन आदि के समय भी उन परिवारों को अपने खोये हुए सदस्य की याद बहुत गहराई से आती होगी. 

यही वह बिंदु होता है, यही वो स्थिति होती है जहाँ शहीद जवानों के परिजनों को वास्तविक रूप से हमारे साथ की आवश्यकता होती है. हम नागरिक जो किसी जवान की शहादत के समय संवेदित होकर एकजुट होना शुरू कर देते हैं उनको सतत एकजुट और संवेदित बने रहने की आवश्यकता है. हमें याद रखना चाहिए कि कोई सैनिक जो सेना में भर्ती होकर देश-सेवा कर रहा है, कोई सैनिक शहीद हो जाता है वे सभी किसी न किसी रूप में हमारे लिए ही सुखद माहौल बना रहे होते हैं. ऐसे में हमें उनका भी ख्याल रखने की आवश्यकता है. उनके परिजनों के अकेले होने की स्थिति में, जबकि सैनिक सेना में अपनी ड्यूटी निभा रहा है, या फिर कोई जवान शहीद हो गया होता है, हमें उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए उनका साथ देने की आवश्यकता होती है. इसके लिए हम पूरे देश भर में ऐसा करने के बजाय अपने-अपने जिले में, अपने-अपने क्षेत्र के सैनिकों की जानकारी कर सकते हैं और उनके परिजनों से समय-समय पर मिल सकते हैं. उनके साथ पर्व-त्यौहार को मना सकते हैं. उनकी किसी भी तरह की समस्या का समाधान बन सकते हैं. शहीद सैनिकों के बच्चों की शिक्षा से सम्बंधित, उनके माता-पिता के स्वास्थ्य, चिकित्सा से सम्बंधित समस्याओं का निराकरण कर सकते हैं. उनके अन्य परिजनों की परेशानियों का समाधान भी कर सकते हैं. हमारे एक कदम इस तरह से उठाने पर उन परिजनों को भी गर्व की अनुभूति होगी और वे अपने आपको कभी भी अकेला महसूस नहीं करेंगे. ये आवश्यक नहीं कि हर मदद आर्थिक रूप से हो, यह भी जरूरी नहीं कि हर शहादत के बाद ही संवेदित हुआ जाये, हम सभी ऐसा कभी भी, कहीं भी कर सकते हैं और अपने वीर सैनिकों के परिजनों का हिस्सा बन सकते हैं.

06 फ़रवरी 2018

चंद पलों में कई जीवन जीना

बीते दिन दिल में हरदम बसे रहते हैं और जैसे ही कोई अपना मिलता है, वे सामने आ जाते हैं. साइंस कॉलेज, ग्वालियर के छात्रावास में रहने के बजाय उस छात्रावास जीवन को आत्मसात कर चुके लोग किसी अनदेखी डोर से आज तक बँधे हुए हैं. इसी डोर के सहारे सब खिंचे चले आते हैं, अपने-अपने समय को वर्तमान में उतार लाते हैं. उसके बाद तो सारी व्यस्तता ग़ायब, सारी ज़िम्मेवरियाँ एक तरफ़, सारी गम्भीरता उड़नछू. बस होती हैं तो कहानियाँ, पुराने लोगों की बातें, हँसी-ठहाके, शरारतें. 


कुछ ऐसा ही हुआ 05 फ़रवरी 2018 को छात्रावासी भाई की बेटियों के वैवाहिक अवसर पर. कुछ भाई मिले और विवाह का उल्लास कई-कई गुना बढ़ गया. हँसी-ठहाकों से पंडाल गूँज रहा था, आगंतुक भी विस्मित थे. उसी समय सुरक्षा-कर्मियों से घिरे, भीड़ के बीच गम्भीर मुख-मुद्रा में किसी का प्रवेश हुआ. छतरवासी भाइयों ने अपने ठहाकों को विराम देकर एकसुर में पुकारा, बघेल भाईसाहब. अगले क्षण उस आने वाले व्यक्ति को ज्यों ही सबने परिचय दिया, उनकी मुख-मुद्रा की गम्भीरता ग़ायब हो गई. चेहरे पर प्रसन्नता के भाव तैरने लगे. उनकी भाव-भंगिमा देख कर उनके सुरक्षा-कर्मी निश्चिन्त हो गए कि वे अपने परिवार के बीच ही हैं. 


जी हाँ, वे भी साइंस कॉलेज छात्रावास परिवार के सदस्य हैं. ऐसे सदस्य जिन्होंने हॉस्टल लाइफ़ को न केवल जिया बल्कि उसे आज तक सहेजे रखा. वे अब अपने समय की चर्चा कर रहे थे, हम सबकी शैतानियाँ पूछ रहे थे. अपने और अपने साथी भाइयों के बारे में बता रहे थे और हॉस्टल की पारिवारिक मर्यादा को भी याद कर रहे थे. चार-पाँच बार के संसद सदस्य, वर्तमान में उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री एसपी सिंह बघेल भाईसाहब वैवाहिक कार्यक्रम में चंद पलों के लिए ही आए थे पर हॉस्टल परिजनों को देख समय को भूल बैठे. 


उनकी सहजता, हॉस्टल लाइफ़ के अनुभवों पर साफ़गोई देखकर एहसास हुआ कि हमारे बड़े भाइयों ने जिस पारिवारिक संस्कारों का बीज हॉस्टल में बोया था, वह सुखद छाँव हम सभी भाइयों को दे रहा है. 

04 जून 2015

हानिकारक खाद्य पदार्थों का विरोध हो, राजनीति न हो


बच्चों के लिए ‘बस दो मिनट’ में तैयार होने वाली मैगी संकट की स्थिति में दिख रही है. मनमाफिक घरेलू पकवानों, नाश्ते की स्वादिष्ट परम्परा को समाप्त करके मैगी विगत कई वर्षों से माताओं के लिए वरदान साबित हो रही थी. किसी भी समय नाश्ते में, भोजन में. छुट्टियों में, सुबह में, शाम में, दिन में, रात में ‘कुछ भी’ बनाकर खिलाने की बचपन की जिद का समाधान मैगी ने माताओं के हाथ में थमा दिया था. मैगी और अन्य जंक फ़ूड पारंपरिक नाश्ते पर, खाद्य पदार्थ पर भारी सिद्ध हो रहे थे. भागदौड़ भरी जिंदगी में, आपाधापी के माहौल में, शारीरिक मेहनत से बचने की कवायद में कब इन खाद्य पदार्थों ने रसोई पर कब्ज़ा कर लिया, कब हमारी मानसिकता पर कब्ज़ा कर लिया हमें पता ही नहीं चल सका. समय के साथ इन खाद्य पदार्थों का चलन बढ़ता ही जा रहा है. घर हो, रेस्टोरेंट हो, होटल हो, बच्चों की पार्टी हो, वैवाहिक कार्यक्रम हो अथवा किसी भी तरह का कोई भी आयोजन सभी में ऐसे खाद्य पदार्थों की उपलब्धता सहजता से मिलती है. ये जानते-समझते हुए भी कि ये खाद्य पदार्थ कहीं न कहीं हमारी जीवनशैली को, हमारे शरीर को, हमारी सोच को, हमारे बच्चों के भविष्य को प्रभावित कर रहे हैं, इनका प्रयोग कम नहीं हुआ. रसोई को थकाऊ, उबाऊ प्रक्रिया मानने, अभिभावकों के नौकरीपेशा होने ने, जीवनशैली के अनियमित होने ने भी इन खाद्य पदार्थों को स्वीकार्यता प्रदान करवा दी. माता-पिता की मजबूरी का फायदा उठाते हुए मैगी जैसे अन्य खाद्य पदार्थों ने बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी अपना दीवाना बना दिया. इस दीवानगी का खामियाजा कहीं न कहीं अपने शरीर पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों के चलते भुगतना पड़ रहा है.
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ऐसे खाद्य पदार्थों के प्रतिकूल प्रभावों के प्रति अकेले हम ही चिंतित नहीं दिख रहे हैं वरन वैश्विक रूप से अनेक देश इसके प्रति चिंतित नज़र आ रहे हैं. कुछ वर्ष पहले अमेरिका, चीन सहित अनेक यूरोपीय देशों ने इन जंक फ़ूड को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की थी, बच्चों के शारीरिक परिवर्तनों का अध्ययन करते हुए उनके प्रतिकूल व्यवहार को सामने रखा था. अब जबकि हमारे देश में मैगी में खतरनाक तत्त्व मिलने की पुष्टि हुई है, कई-कई राज्यों में मैगी अपने परीक्षण में असफल हुई है, इससे भी इसके हानिकारक होने की पुष्टि हुई है. ऐसा नहीं है कि अकेले मैगी ही हानिकारक है और अन्य दूसरे खाद्य पदार्थ, पेय पदार्थ आदि सुरक्षित हैं. ये समझने वाली बात है कि जब किसी खाद्य पदार्थ को उसकी प्राकृतिक अवस्था से इतर कई-कई माह के लिए सुरक्षित रखा जाना हो तो उसको किसी न किसी रासायनिक पदार्थ के द्वारा संरक्षित करना पड़ेगा. जाहिर सी बात है कि ये रासायनिक पदार्थ भले ही खाद्य पदार्थों को, पेय पदार्थों को देखने में, स्वाद में भले ही ताजा बनाये रखते हों किन्तु इनके प्राकृतिक तत्त्वों को नष्ट करके कहीं का कहीं मानव शरीर के लिए हानिकारक बना देते हैं. स्पष्ट है कि भले ही ऐसे पदार्थ अपना दुष्प्रभाव तात्कालिक रूप में न दिखाते हों किन्तु इनके दुष्प्रभाव दीर्घकालिक अवश्य ही रहता है.
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अब जबकि किसी भी तरह से मैगी पर कार्यवाही के चलते ऐसे खाद्य पदार्थों पर अंकुश लगाये जाने की प्रक्रिया शुरू हुई है तो बजाय इसका स्वागत किये जाने के दबे-छिपे स्वर में इसका विरोध किया जा रहा है. इसको भी राजनैतिक रंग दिए जाने की कोशिश की जाने लगी है. मैगी का भले ही खुलेआम समर्थन न किया जा रहा हो किन्तु अनेक अभिभावकों द्वारा अन्य दूसरे पदार्थों पर अंकुश लगाये जाने की वकालत किया जाना अप्रत्यक्ष रूप से मैगी का समर्थन ही कहा जायेगा. ऐसे मौके पर होना ये चाहिए कि समवेत रूप से ऐसे सभी पदार्थों का विरोध किया जाना चाहिए जो बचपन के साथ खिलवाड़ करने में लगे हैं, बच्चों के भविष्य को खोखला बनाने में लगे हैं. समझना होगा कि ऐसे पदार्थों के सेवन से ही बच्चों में आक्रमकता जन्म ले रही है, समय से पूर्व उनके हारमोंस विकसित होने की खबर भी आई है, मोटापा, अनिद्रा, अवसाद जैसी अनेक स्थितियों ने भी जन्म लिया है. हम सभी को अपने लिए नहीं वरन अपने बच्चों के लिए मैगी के विरुद्ध चलने वाली प्रक्रिया में सहयोग करें. मैगी पर ही ऐसी आफत क्यों आई, मैगी अकेले पर प्रतिबन्ध क्यों, अन्य नशे वाले पदार्थों पर रोक क्यों नहीं आदि-आदि कहकर मैगी का अप्रत्यक्ष सहयोग न करें. ये हम सभी कहीं न कहीं स्वीकारते ही हैं कि ये पदार्थ शरीर पर दुष्प्रभाव डालते हैं तो महज दो मिनट की सुविधा के लिए अपने बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ न हम करें न किसी और को करने दें. एक मैगी के सहारे अन्य दूसरे दूषित, हानिकारक पदार्थों का भी विरोध करें. आइये इसके लिए बिना राजनीति किये एकजुट हो जाएँ.

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