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19 अप्रैल 2018

खुद से लड़ता हुआ इंसान


आजकल तो अब अपने से ही लड़ते रहते हैं, ये किसी भी शायराना अंदाज में कही हुई पंक्तियां मालूम हो सकती हैं पर ऐसा आजकल लगभग उन सभी के साथ हो रहा है जो दिल से देशहित में विचार करते रहते हैं। ऐसा भी नहीं है कि देशहित में विचार करने वालों की संख्या में कमी आ गई है अथवा लोगों ने इस ओर विचार करना बन्द कर दिया है। दरअसल हुआ यह है कि देशहित से मुख्य आजकल स्वार्थ हो गया है। इस स्वार्थ के कारण लोगों ने देशहित के स्थान पर स्वहित को तवज्जो देना शुरू कर दिया है। अपने आपसे लड़ने की बात अनायास नहीं उभरी, समाज में चल रही विचित्र-विचित्र स्थितियों के बाद लगा कि व्यक्ति स्वयं से ही लड़ने में लगा हुआ है। इस तरह के हालात सरकारों के द्वारा पैदा किये गये हैं और इन हालातों का शिकार समाज का व्यक्ति ही हो रहा है। देश के विकास की बात करता है वह आदमी जो सारा दिन अपने कार्यालय में खटने के बाद शाम को घर के सदस्यों के खाने-पीने की व्यवस्था करता है। मंहगाई की मार, सामानों की अनुपलब्धता, हर एक कदम के साथ रिश्वतखोरी जैसे हालात उसे अपने से ही लड़ने को मजबूर करते हैं।


हो सकता है कि बहुत से लोगों को इसमें शायराना अंदाज के साथ एक प्रकार की फिलोसॉफी दिखाई पड़े पर यह किसी प्रकार का दर्शन नहीं वरन् आज की कटु सत्यता है। आदमी हर कदम पर प्रताड़ित हो रहा है और मुंह ताकने का काम करता है सरकार की ओर, सरकार के नुमाइंदों की ओर। इसके बाद उसे पता चलता है कि सरकार और उसके तमाम सारे अवयव सिर्फ और सिर्फ स्वहित में लगे हैं तो एक अम आदमी के पास हताशा और निराशा के अलावा कुछ बचता नहीं है। ऐसी हताशा और निराशा यदि नक्सलवाद को पैदा करता है तो व्यक्ति को व्यक्ति से लड़ाती है। व्यक्ति का व्यक्ति से लड़ने का यही रूप जब सामने नहीं आता है तो आदमी अपने से ही लड़ने लग जाता है। उसकी यह लड़ाई उस हताशा का ही परिणाम होती है जो उसे किसी न किसी रूप में आये दिन परेशान करती है। घर के अन्दर रोजमर्रा की वस्तुओं से लेकर भौतिकतावादी सामानों में गिने जाने वाली वस्तुओं को देखें तो लगता है कि ये सब अब उनके लिए ही हैं जिनके पास सत्ता है अथवा उनके लिए जो किसी न किसी रूप में सत्ता के आसपास मंडरा रहे हैं।

हमारे तमाम सारे समाजशास्त्री, राजनीतिक विश्लेषक, विदेशनीति के जानकार किसी भी घटना के लिए एशियाई देशों के हालातों की व्याख्या कर उसका भारतीय संदर्भों में विश्लेषण करने लगते हैं पर विश्व स्तर पर घटित हुईं स्थितियों का भारतीय संदर्भ में किसी ने अध्ययन करने की आवश्यता महसूस नहीं की। इसका कारण क्या समझा जाये, या तो भारतीय इस प्रकार के परिवर्तन को लाने की क्षमता नहीं रखते हैं अथवा हमारे तमाम विश्लेषक विश्व स्तर की इन घटनाओं को पढ़ने और समझने में नाकाम रहे हैं। यहाँ याद रखना होगा कि देश जिस प्रकार के हालातों से जूझ रहा है; आये दिन आरक्षण के नाम पर होते हिंसात्मक प्रदर्शन से, विध्वंसात्मक प्रदर्शन से दो-चार होता है; वर्ग-संघर्ष के नाम पर आये दिन हत्याओं को होते देखा जा रहा है; इज्जत के नाम पर महिलाओं की इज्जत से खेलकर उन्हें मौत की नींद सुला दिया जाता हो; मासूम बच्चियों को हवस का शिकार बनाया जा रहा हो; जनता के धन को मूर्तियों, पार्कों में खपा दिया जाता हो; ईमानदारी और मासूमियत के नाम पर करोड़ों के घोटालों का पता न चलता हो; बड़े से बड़ा भ्रष्टाचारी सिर्फ इस कारण से छूट जाता है कि उसके विरुद्ध पाये गये सबूत इंटरनेट पर भी उपलब्ध हैं; जहां दाल, चावल, रोटी, सब्जी मंहगी और सिम, कम्प्यूटर, मोबाइल सस्ते हों; सत्ता पाने के लिए तुष्टिकरण, हिंसा का सहारा लिया जा रहा हो वहां के हालातों के विस्फोटक होने को कौन टाल सकता है? यह और बात है कि संतोषम् परम् सुखम् की जो घुट्टी हम भारतीयों को बचपन से ही पिलाई जाती रही है, उसके असर को कम होने में अभी भी सालों लगेंगे। इसके साथ ही यह भी स्मरण रखना होगा कि जैसे ही इस घुट्टी ने असर दिखाना कम अथवा बन्द किया उस दिन............!!!!

शेष अभी बहुत कुछ समय के गर्भ में है, अब तो अपने से लड़ते हुए मन करता है कि छोड़ कर इस तरह की शब्दों की कारीगरी कुछ दूसरी तरह की कारीगरी शुरू कर दी जाये। शायद उसी से कुछ परिणाम निकलना शुरू हो क्योंकि समाज के दुश्मन अब शब्दों की तलवार से भयभीत नहीं होते और मरते भी नहीं; आखिर उनकी शर्म-लिहाज जो मर चुकी है।

14 दिसंबर 2016

विसंगति बढ़ाएगा वेतन का विशाल अंतर

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा राज्य वेतन आयोग की सिफारिशों को मंजूरी देकर चुनावी दाँव चल दिया है. इस निर्णय से राज्य के सत्ताईस लाख कर्मियों को लाभ पहुँचेगा. वेतन आयोग की सिफारिशों को स्वीकार कर लिए जाने के बाद अब राज्य कर्मियों को और पेंशनरों को केन्द्रीय कर्मियों की तरह सातवें वेतन आयोग का लाभ मिलने लगेगा. चुनावों की आहट देखते हुए राज्य सरकार ने वेतन वृद्धि को इसी वर्ष जनवरी से स्वीकार किया है जबकि नकद रूप में यह लाभ अगले माह जनवरी से मिलने लगेगा. यह स्वाभाविक सी प्रक्रिया है कि समय-समय पर बने वेतन आयोगों द्वारा देश की स्थिति, मंहगाई और अन्य संसाधनों के सापेक्ष वेतनमान का निर्धारण किया जाता रहा है, जिसके आधार पर केन्द्रीय कर्मियों के साथ-साथ राज्यों के कर्मचारियों के वेतन में भी वृद्धि होती रही है. सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के मानने के बाद उत्तर प्रदेश के कर्मियों में औसतन 14.25 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिलेगी. इस वेतन वृद्धि के बाद राज्य में न्यूनतम वेतन 18000 रुपये हो जायेगा, जो अभी तक 15750 रुपये है. इसी तरह उच्चतम वेतन 2.24 लाख रुपये हो जायेगा, जो अभी 79000 रुपये है. उच्चतम वेतन का लाभ राज्य के पीसीएस उच्च संवर्ग को प्राप्त होगा.


राज्य कर्मियों के लिए ये ख़ुशी का पल हो सकता है कि उनके लिए सरकार ने राज्य वेतन आयोग की सिफारिशों को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया. नए वेतन का नकद लाभ भी अगले माह से मिलने लगेगा. इस ख़ुशी के साथ-साथ सामाजिक रूप से बढ़ती आर्थिक विषमता की तरफ किसी का ध्यान शायद नहीं जा रहा होगा. एक पल को रुक कर विचार किया जाये तो स्थिति में घनघोर असमानता नजर आती है. समाज का एक व्यक्ति को राज्य कर्मचारी के रूप में अंतिम पायदान पर खड़ा हुआ है वो बीस हजार रुपये का वेतन भी प्राप्त नहीं कर पा रहा है और उसी समाज का उच्च संवर्ग कर्मी उससे दस गुने से अधिक वेतन प्राप्त कर रहा है. समाज में तमाम सारी विषमताओं के साथ-साथ आर्थिक विषमतायें सदैव से प्रभावी रही हैं. इन विषमताओं ने हमेशा व्यक्ति व्यक्ति के मध्य प्रतिस्पर्द्धा पैदा करने के साथ-साथ वैमनष्यता भी पैदा की है. कमजोर वर्ग को हमेशा से ये लगता रहा है कि सुविधासंपन्न लोगों ने उनके अधिकारों को छीना है, उनके हक़ को मारा है. ऐसी सोच, मानसिकता बहुत हद तक वेतनभोगियों में भी देखने को मिलती है. छठें वेतन आयोग की सिफारिशें स्वीकार किये जाने के बाद से ऐसी सोच खुलेआम देखने को मिली थी. निचले स्तर के और उच्च स्तर के कर्मियों के मध्य वैचारिक टकराव देखने के साथ-साथ वैमनष्यपूर्ण तकरार तक देखने को मिली थी. अब जबकि वेतन का अंतर बहुत बड़ा हो गया है तब वैमनष्यता, टकराव का स्तर और बड़ा हो जाये, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है.


विगत कुछ समय से, जबसे वैश्वीकरण की, भूमंडलीकरण की बयार चली है, आर्थिक गतिविधियों के द्वारा समूचा जीवन संचालित होने लगा है, समाज अपने आपमें एक बाजार बनकर रह गया है तब सरकारों ने नागरिक हितों को भी आर्थिक स्तर पर संचालित करना शुरू कर दिया है. नागरिकों को मिलने वाले तमाम लाभों का निर्धारण लोगों के आर्थिक स्तर के आधार पर होने लगा है. एक निश्चित आय से नीचे के नागरिकों के लिए सरकारें सदैव से कार्यशील रही हैं किन्तु जिस तरह से अब वेतन में जबरदस्त अंतर देखने को मिला है वो न केवल मानसिक अशांति पैदा करेगा वरन सामाजिक विद्वेष का कारक भी बन सकता है. वैश्वीकरण के दौर में जीवन, समाज, व्यक्ति भले ही बाजार के हाथों में खेलने लगा हो किन्तु सरकारों को अपने आपको बाजार बनने से बचना चाहिए. उनका दायित्व अपने कर्मियों को वेतन देना मात्र नहीं है. सरकारों का उत्तरदायित्व अपने नागरिकों को सुरक्षा, उनके विकास, उन्नति का भरोसा दिलाना तो है ही साथ ही उसके लिए अवसर उपलब्ध करवाना भी है. ये सरकारें चाहे केन्द्रीय स्तर की हों अथवा राज्य स्तर की, इन सभी को नागरिक हित में ही कार्य करने होते हैं. वर्तमान सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को जिस तरह से केन्द्रीय स्तर पर और अब राज्य स्तर पर स्वीकार किया गया वो समस्त कर्मियों को लाभान्वित भले करता हो किन्तु मानसिक रूप से, सामाजिक रूप से बहुत से कम कर्मियों को लाभान्वित करेगा. वेतन का विशाल अंतर मानसिक अशांति बढ़ाने के साथ-साथ सामाजिक विद्वेष को बढ़ाएगा, आपसी वैमनष्यता को बढ़ाएगा, न्यूनतम वेतनभोगी कर्मियों की कार्यक्षमता को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा. 

10 अप्रैल 2016

उड़ती धूल, बंद होती आँखें

सड़क की भीड़-भाड़ के बीच रिक्शा आहिस्ते-आहिस्ते आगे बढ़ता जा रहा है. रिक्शे पर कोई सवारी नहीं, उसे चलाने वाला कोई बड़ी उम्र का व्यक्ति नहीं वरन दो छोटे-छोटे मासूम से बच्चे हैं. उनकी उम्र बमुश्किल १२-१३ वर्ष की रही होगी. वे रिक्शा चला क्या रहे थे, एक प्रकार से उसे धकेल सा रहे थे, खींच सा रहे थे. अपनी उम्र और शारीरिक आकार से कहीं बड़ा रिक्शा लिए धीरे-धीरे आगे बढ़ते उन बच्चों को देखकर किसी को आश्चर्य भी नहीं होता है. सब निस्पृह भाव से अपने-अपने कामों में लगे हुए हैं. सब अपने-अपने गंतव्य की ओर चले जा रहे हैं. न केवल सड़क पर अपनी-अपनी गतिविधियाँ करने वाले वरन सड़क के किनारे दुकान लगाये लोग, रेहड़ी, हथठेला लगाये लोग भी अपनी-अपनी गतिविधियों में निमग्न हैं. जिस तरह ये सब लोग उन दोनों लड़कों की तरफ से अनजान बने हुए हैं, उसी तरह से वे दोनों बच्चे बाकी सबकी गतिविधियों पर किसी तरह का ध्यान नहीं दे रहे हैं. बहुत ही धीमी गति से, रुक-रुक कर आगे बढ़ते बच्चे अपने रिक्शे में सवारी की जगह दो बड़े-बड़े बोरे रखे हुए हैं. सड़क किनारे, दुकानों के सामने कूड़े के ढेर को देखकर, सड़क पर बिखरी पड़ी कबाड़ सामग्री देखकर उसमें से अपने मतलब का सामान उठा-उठाकर उसे अपने बोरे में भरते जाते. कबाड़ उठाना, उसमें से अपने मतलब का सामान छाँटना, उसे बोरे में भरना और फिर आगे बढ़ जाना. नितांत मशीनी प्रक्रिया से सबकुछ क्रमबद्ध रूप से चलता जा रहा है. उन बच्चों के चेहरे पर न कोई हावभाव, आँखों में न कोई चमक, होंठों पर कोई मुस्कान भी नहीं. नितांत प्रौढ़ता ओढ़े वे दोनों बच्चे अपने जीवन को संचारी भाव देने के लिए धनोपार्जन हेतु सड़क पर, सड़क किनारे बिखरे पड़े कबाड़ को उठाते, समेटते जा रहे हैं.

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ये नजारा किसी एक दिन नहीं, लगभग रोज ही दिखाई देता है. ये दृश्य किसी के शहर की कहानी नहीं वरन लगभग सभी शहरों की है. आधुनिकता से, तकनीक से, प्रौद्योगिकी से लबालब भरे समाज में आर्थिक असमानता की ये एक बानगी भर है. एक वर्ग वो है जहाँ जानवरों को सम्पूर्ण सुख-सुविधाएँ मुहैया हो जाती हैं. उनके खाने-पीने-रहने-घूमने की स्थितियाँ उन्नत रूप में विकसित हैं. उनकी देखभाल के लिए कई-कई नौकर-चाकर हाथ बाँधे चौबीसों घंटे तत्पर, मुस्तैद दिखाई देते हैं. इसके उलट एक वर्ग इसी समाज में ऐसा है जिसके पास मूलभूत सुविधाओं की घनघोर कमी है. उसके खाने-पीने-रहने की स्थितियाँ बद से बदतर हैं. ऐसे वर्ग के बच्चों के लिए न तो खेलने का समय है और न ही खेलने के साधन. पढ़ने की न तो सुविधा है और न ही पढ़ने लायक स्थितियाँ. खेलने, पढ़ने, शरारतें करने की उम्र में ऐसे बच्चे अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए कहीं कबाड़ बीनते नजर आते हैं, कहीं किसी होटल-ढाबे में काम करने दिखते हैं, कहीं भिक्षावृत्ति में लिप्त पाए जाते हैं.

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सड़क पर रेंगते-रेंगते चलता उन दोनों बच्चों का रिक्शा एक मंदिर के बाहर बने बरामदे के किनारे रुक जाता है. उनके पीछे-पीछे चलते-चलते हमारे कदम भी ठहर जाते हैं. कुछ बात की जाये या नहीं? कुछ मदद की जाये या नहीं? सोचते-सोचते उन बच्चों के पास पहुँच गए, जो अब वहीं किनारे लगे नल के पानी से मुँह धोते हुए, पानी पीते हुए आपस में हलकी-फुलकी सी चुहलबाजी करने लगते हैं. पिछले कई मिनटों की प्रौढ़ता उनके चेहरे से अब गायब दिखती है. उनके नल से हटते ही जो जानकारी ली, उससे उनकी दयनीय दशा का भान हुआ. उनकी पारिवारिक स्थिति के साथ-साथ उनके जैसे लगभग एक दर्जन बच्चों का ऐसे ही कबाड़ बीनने में लगे होने के बारे में पता चला. भयंकर गरीबी से जूझते उन परिवारों के स्त्री-पुरुषों के पास इस साल कोई काम नहीं. सूखे ने खेतों में मिलते काम को भी समाप्त कर दिया. किसी तरह का कोई तकनीकी हुनर न होने के कारण वे सब ऐसे ही अनुपयोगी कार्यों में लगे हुए हैं. दो-दो, तीन-तीन लोगों की दिन भर की मेहनत के बाद शाम को दस-दस, पंद्रह-पंद्रह रुपयों का जुगाड़ हो जाता है. जिससे फाकाकशी को कुछ हद तक टाल लिया जाता है.

बगल से तेज गति से निकलती मँहगी सी कार देखकर हमारी भी आँखें फटी रह जाती इससे पहले उड़ती धूल ने हम सबकी आँखें बंद करवा दी. लगा, कुछ ऐसा ही शासन-प्रशासन तंत्र में हो रहा है. अंतरिक्ष को जाती तकनीक की, धनिकों तक पहुँचते विकास की, बाज़ार से बढ़ती चकाचौंध की, छुटभैये नेताओं के हूटरों की, सत्ताधारियों की लाल-नीली बत्तियों की, बाहुबलियों की धमक की उड़ती धूल ने सभी की आँखें बंद करवा दी हैं.


(चित्र लेखक द्वारा निकाला गया है) इस ब्लॉग की ये 975वीं पोस्ट....