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22 नवंबर 2023

सादगी की प्रतिमूर्ति मेहरुन्निसा परवेज़

आज सोशल मीडिया में टहलते-टहलते अचानक से एक पोस्ट सामने आई, पोस्ट से पहले उसके संग लगी फोटो ने हमारा ध्यान अपनी तरफ खींचा. बिना किसी शंका के इतने वर्षों बाद भी उस चित्र को पहचानने में कोई दिक्कत नहीं हुई. समय जिस तेजी से गुजरा था उसी तेजी से उम्र ने अपना असर भी उनके चेहरे पर दिखाया था मगर चेहरे पर जिस तेज को उनके साथ हुई पहली मुलाकात में देखा था, वह अब भी उसी तरह था या कहें कि उसमें और अधिक सौम्यता के दर्शन हो रहे थे. चलिए, आपका संशय दूर करते हैं. हम बात कर रहे हैं सुप्रसिद्ध साहित्यकार मेहरुन्निसा परवेज़ जी की. उनसे हमारी पहली मुलाकात हुई थी, उस समय को बीते भी कोई दो दशक से अधिक समय हो गया है. 




उनके सम्पादन में प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘समर लोक’ से परिचय उनसे भी पहले से हुआ. पत्रिका पहली नजर में ही आकर्षित करने वाली थी. उसका कलेवर, उसकी सामग्री ने मन मोह लिया. एक-दो अंकों के बाद पत्रिका के नामकरण का राज़ पता चला. उसी दौरान समर लोक के बैनर के अंतर्गत समर समागम जैसे मंचों की स्थापना के बारे में जानकारी हुई. पत्रिका के वशीभूत आनन-फानन अपने मित्रों की सहमति से समर समागम का गठन करके उसके बैनर तले साहित्यिक गतिविधियाँ संचालित होने लगी.


इसी बीच चाचा जी के पास भोपाल जाना हुआ. यह संयोग ही कहा जायेगा कि चाचा और मेहरुन्निसा जी का निवास आसपास ही था. चार इमली नामक स्थान पर बने प्रशासनिक भवनों में से एक भवन मेहरुन्निसा जी का था. इसी चार इमली में प्रशासनिक परिसर से लगा हुआ भारतीय स्टेट बैंक का परिसर था. मेहरुन्निसा जी का निवास अत्यंत नजदीक होने के कारण उनसे मुलाकात का लोभ संवरण नहीं कर सके. उनसे मुलाकात का समय लेकर निश्चित समय पर उनके निवास पहुँचे. वरिष्ठ आईएएस परिवार की सदस्य, खुद में अत्यंत प्रतिष्ठित साहित्यकार-व्यक्तित्व होने के बाद भी उनकी सादगी, सौम्यता अनुकरणीय कही जाएगी. नौकरों-चाकरों की भीड़ के बाद भी खुद अन्दर जाकर चाय-नाश्ता लेकर आना, केतली से चाय अपने हाथों निकाल कर अत्यंत स्नेह के साथ स्वयं ही देना उनके सरल व्यवहार को दर्शा रहा था. बहुत देर तक उनके साथ अनेकानेक बिन्दुओं पर चर्चा होती रही. आज के कई प्रतिष्ठित प्रकाशनों की वास्तविक स्थिति के बारे में उन्होंने समझाया.


कालांतर में स्थिति ऐसी बनी कि उनके वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी पति के सेवानिवृत्त होने के कारण प्रशासनिक परिसर को छोड़कर वे अपने घर में आ गईं, हम भी अपनी दुर्घटना के कारण कई साल भोपाल नहीं जा सके. फोन से, पत्राचार से सम्पर्क बना रहा. विचार है कि पुनः समर समागम की गतिविधियों को शुरू किया जाये. एक बार पुनः उनसे मुलाकात की जाये. फिर एक बार उनके हाथ से मिली चाय का स्वाद लिया जाये. 




 

30 सितंबर 2023

मंजुल मयंक : एक ही दिन का आना-जाना

बुन्देलखण्ड सदैव से अपने रत्नों के लिए प्रसिद्ध रहा है. भले ही ये रत्न साहस, जौहर दिखाने वाले रहे हों या फिर कलम के रहे हों. ऐसे ही एक कलम के धनी रत्न मंजुल मयंक का आज, 30 सितम्बर को जन्मदिन पड़ता है. इसे संयोग ही कहा जायेगा कि इस अद्भुत गीतकार की पुण्यतिथि भी आज, 30 सितम्बर को पड़ती है.




एक से बढ़कर एक कर्णप्रिय, मधुर गीत रचने वाले मंजुल मयंक का जन्म 30 सितम्बर सन 1922 को हुआ था. उनका पूरा नाम गणेश प्रसाद खरे था, मंजुल मयंक उनका उपनाम था. कालांतर में वे इसी नाम से प्रसिद्ध हुए. उनके पिता का नाम श्री महावीर प्रसाद खरे और माता का नाम श्रीमती गोविन्द खरे था. मूलतः इलाहाबाद के रहने वाले महावीर प्रसाद जब नौकरी के लिए बुन्देलखण्ड के हमीरपुर में आये तो फिर यहीं के होकर रह गए. सन 1941 में जब मयंक जी अपनी नौकरी के सिलसिले में बाँदा पहुँचे तो यहाँ उन्हें बेढ़ब बनारसी, श्याम नारायण पाण्डेय, निराला और बच्चन आदि जैसे साहित्यकारों, कवियों को सुनने का अवसर मिला. यहीं पर उनके भीतर का कवि जागृत हुआ और उन्होंने अपनी पहली कविता सिंदूर बिन्दु की रचना की.


सन 1953 में मयंक जी बाँदा से वापस लौट आये और मौदहा आकर शिक्षा क्षेत्र से जुड़ गए. यहीं पर उनका पहला काव्य-संग्रह ‘रूपरागिनी’ प्रकाशित हुआ. तीन वर्ष तक यहाँ सेवा देने के पश्चात् वे सन 1956 में हमीरपुर लौट आये. ‘जनता ही अजन्ता है’ काव्य-संग्रह और ‘तन मन की भाँवरें’ उपन्यास उन्होंने यहीं प्रकाशित करवाए. 30 सितम्बर 2007 को मयंक जी अपने मधुर गीत, अपनी कलम की अमानत बुन्देलखण्ड की धरती पर छोड़कर सदैव के लिए दूर चले गए.


आज उनकी जन्मतिथि और पुण्यतिथि पर उनको सादर नमन  






 

06 अप्रैल 2023

लोकप्रियता को स्वीकारना ही होगा

अधिकतर देखने में आता है कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान में, बोर्ड में हिन्दी साहित्य के पाठ्यक्रम में जैसे ही किसी तरह का बदलाव होता है, वैसे ही न केवल लेखक-संसार में बल्कि आलोचक वर्ग में भी उथल-पुथल मच जाती है. अभी तक बदलाव का मुख्य विरोध किसी साहित्यकार के नाम को हटाने, जोड़ने से संदर्भित हुआ करता था. यह मनुष्य का स्वाभाविक गुण है कि समाज में किसी भी तरह के बदलाव का उसने सदैव विरोध किया है. साहित्य जगत में बदलाव का विरोध कुछ दिनों से बना हुआ है. खबर आई कि गोरखपुर विश्वविद्यालय में अब परास्नातक के विद्यार्थी हिन्दी साहित्य में वे चुनिन्दा उपन्यास पढ़ सकेंगे, जिनको लुगदी साहित्य कहकर साहित्य की मुख्यधारा से बाहर रखा गया है. इस खबर के आते ही हिन्दी साहित्य जगत में जैसे कोहराम मच गया. लगातार एक बहस सी मची हुई है. मीडिया, सोशल मीडिया पर अपने-अपने तरह के बयान लगातार आ-जा रहे हैं. यहाँ लोगों का विरोध एक तो इस बात के लिए है कि सस्ते साहित्यकार कहे जाने वाले या फिर लुगदी साहित्य कहे जाने वाले उपन्यास, उपन्यासकारों के लिए स्थापित, नामचीन साहित्यकारों को पाठ्यक्रम से निकाल दिया गया है. विरोध इसका भी है कि लुगदी साहित्य के नाम से समाज में चल रहे उपन्यासों के द्वारा किस तरह का जीवन-दर्शन, जीवन-मूल्य विद्यार्थियों के बीच पहुँचाने का प्रयास विश्वविद्यालय द्वारा किया जा रहा है.


यहाँ बहुतों को अभी इसका भान ही नहीं है कि विश्वविद्यालय ने इन उपन्यासकारों को लोकप्रिय साहित्य की श्रेणी में पाठ्यक्रम में जोड़ा है, किसी भी साहित्यकार को हटाया नहीं है. स्थापित साहित्यकारों ने, साहित्य-जगत ने भले ही इन उपन्यासकारों को, उनके लेखन को मान्यता न दी हो मगर इसमें कोई दोराय नहीं कि इन उपन्यासकारों के उपन्यासों ने लोकप्रियता के आयामों को छुआ है. साठ और सत्तर के दशक में गुलशन नन्दा इस दुनिया के बेताज़ बादशाह रहे. ऐसा कहा जाता है कि वेद प्रकाश शर्मा के बहुचर्चित उपन्यास ‘वर्दी वाला गुण्डा’ की पहले ही दिन पंद्रह लाख प्रतियाँ बिक गयी थीं. सुरेन्द्र मोहन पाठक के एक-एक उपन्यास के एक-एक संस्करण में तीस हजार से अधिक प्रतियों का प्रकाशन हुआ करता है. इस तरह की लोकप्रियता अपने देश में किसी भी हिन्दी उपन्यास अथवा हिन्दी उपन्यासकार के सन्दर्भ में देखने को नहीं मिलती है.




जहाँ तक बात लुगदी उपन्यासों के द्वारा विद्यार्थियों में जीवन-मूल्यों, संस्कारों की है तो ऐसा नहीं है कि इस श्रेणी के सभी उपन्यासों में सेक्स का तड़का रहता हो. किसी समय में अपने दो मित्रों-राही मासूम रज़ा और इब्ने सईद की बात को चुनौती की तरह लेते हुए इब्ने सफ़ी ने साफ़-सुथरे जासूसी उपन्यासों की लम्बी कतार लगा दी थी, जिनमें अश्लीलता बिलकुल नहीं हुआ करती थी. जासूसी उपन्यास लेखन के मामले में जैसी लोकप्रियता इब्ने सफ़ी को प्राप्त हुई वैसी किसी को नसीब न हुई. एकबारगी इन उपन्यासों की, उपन्यासकारों की लोकप्रियता को साहित्य का मानक न माना जाये मगर इस बहस के बहाने एक विमर्श और भी शुरू किया जाना चाहिए कि क्या वाकई साहित्य के द्वारा मूल्यों की स्थापना संभव है? जिन साहित्यकारों को, उनके साहित्य को समाज ने मान्यता दे रखी है, क्या उनकी सभी कृतियों में, उपन्यासों में उत्कृष्टता का भाव समाहित है? साहित्य जगत में आधुनिक काल से लेकर वर्तमान तक स्थापित माने गए तमाम साहित्यकारों की कृतियों से क्या समाज ने मूल्य स्थापना के लिए, संस्कार ग्रहण करने के लिए, जीवन को सहज बनाने के लिए वाकई सकारात्मक, सार्थक कदम उठाये हैं?


यहाँ विचार किया जाना आवश्यक हो जाता है कि किसी पाठ्यक्रम में साहित्य जगत के समस्त साहित्यकारों को शामिल नहीं किया जा सकता है. ऐसे में जिनको शामिल नहीं किया जा सका है, क्या वे साहित्यकार उच्च कोटि के नहीं? क्या उनकी रचनाएँ स्तरीय नहीं? इसके अलावा जिन साहित्यकारों को शामिल किया जाता है क्या उनकी सभी कृतियों को, रचनाओं को पाठ्यक्रम में स्थान मिलता है? इसका क्या अर्थ निकाला जाये कि जिन रचनाओं को, कृतियों को पाठ्यक्रम में स्थान नहीं मिला है, वे स्तरीय नहीं हैं? या उनके द्वारा किसी तरह के मूल्यों, संस्कारों की स्थापना करने में मदद नहीं मिलेगी? इसी तरह यदि शिक्षा जगत में साहित्य की उपस्थिति का ही आकलन किया जाये, उसके द्वारा मूल्य स्थापना की बात को स्वीकारा जाये तो क्या साहित्य के विद्यार्थियों के अतिरिक्त अन्य संकाय के विद्यार्थी मूल्य स्थापना के योग्य नहीं समझे जाते? क्यों नहीं इंजीनियरिंग, चिकित्सा, वाणिज्य, प्रबंधन आदि पाठ्यक्रमों में साहित्य को पढ़ाया जाता?


इसी बिन्दु के सापेक्ष इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिए कि आज जिस तरह से हर हाथ में इंटरनेट सुविधा से संपन्न स्मार्ट फोन है, आज जिस तरह से इंटरनेट के विभिन्न प्लेटफ़ॉर्म पर अश्लील दृश्य, अश्लील भाषा शैली, गालियाँ नितांत अगोपन रूप में प्रस्तुत की जा रही हैं तब मात्र साहित्य के द्वारा नैतिकता, संस्कार, सभ्यता, आदर्श की बातें करना कहाँ तक उचित है. यह हमेशा से कहा जाता रहा है कि साहित्य समाज का दर्पण है. क्या आज का समाज प्रेमचन्द की नैतिकता को, आदर्शों को स्वाभाविक रूप में अपने जीवन में उतारता है? लुगदी साहित्य कहकर जिन उपन्यासों को अभी तक समाज की मुख्यधारा से बाहर रखा गया क्या उनके सापेक्ष इस पर विचार किया गया कि जो उपन्यास उत्कृष्ट साहित्य के रूप में स्वीकारे गए हैं, वे संस्कार, सभ्यता, शालीनता का पाठ पढ़ा रहे हैं? यदि साहित्य ही संस्कारों को, आदर्शों को, शालीनता को समाज में स्थापित करने की क्षमता रखता तो आज आज़ादी के अमृत्काल में समाज में अनेकानेक बुराइयाँ परिलक्षित न हो रही होतीं.


निःसंदेह जो साहित्य उत्कृष्ट है, अनुकरणीय है, विचारपरक है उसका अनुगमन किया जाना चाहिए. इसके बाद भी समाज की दिशा और उसकी मानसिकता को पहचानते हुए भी आधुनिकता को स्वीकारना ही होगा. आज की पीढ़ी को अपने अतीत के साथ-साथ वर्तमान से भी परिचित होने का अधिकार है. इसी बहाने आज की पीढ़ी में आलोचनात्मक दृष्टि का उद्भव होगा. उनके भीतर कल्पनाशीलता, फैंटेसी, वास्तविकता, संस्कार, शालीनता, अश्लीलता, लेखन, विषय, शोध आदि की व्यापक समझ पैदा हो सकेगी. ध्यान रखना होगा कि आज के दौर में किसी भी विषय को, वो चाहे नितांत गलत हो, पूर्णतः सही हो एकदम से नकारा नहीं जा सकता है. यदि किसी भी कृति में पठनीयता है, कल्पनाशीलता है, दृश्यता है, स्वीकारता है तो उसका आकलन करने के लिए एक बार उसे भी मुख्यधारा में आने का अवसर देना होगा. एक बार दिया जाने वाला अवसर पत्थर की लकीर नहीं है, जिसे मिटाया नहीं जा सकता किन्तु पूर्वाग्रहयुक्त कोई भी निर्णय भ्रम और संशय के ही द्वार खोलता है. 






 

03 अप्रैल 2023

मौलिकता, रोचकता के आधार पर एक अवसर देना सही है

एक खबर प्रकाशित हुई कि गोरखपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी लोकप्रिय साहित्य के अंतर्गत गुलशन नंदा, वेदप्रकाश, सुरेन्द्र मोहन के उपन्यास पढ़ सकेंगे. इनमें इब्ने सफी की जासूसी दुनिया, गुलशन नंदा के नीलकंठ, वेदप्रकाश शर्मा के वर्दी वाला गुंडा को स्थान दिया गया है. इस खबर के आते ही साहित्य जगत में शालीनता की खेती करने वाले बहुतेरे छुपे रुस्तमों के पेट में मरोड़ उठना शुरू हो गई. इस मरोड़ उठने का एक कारण तो ये भी है कि अभी तक हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है कि तर्ज़ पर ऐसे लेखकों ने गुलशन नंदा, वेदप्रकाश शर्मा, सुरेन्द्र मोहन पाठक जैसे लेखकों-उपन्यासकारों की कृतियों को लुगदी साहित्य का नाम देकर चलन से बाहर कर रखा था. बावजूद इसके इन लेखकों की, इनके उपन्यासों की माँग जबरदस्त रूप से रहती है. इनके पाठकों की संख्या लाखों में है.




छटपटाहट से भरे ऐसे तमाम लेखकों ने इस निर्णय का विरोध किया. सामग्री, साहित्यकार, शालीनता आदि का वास्ता देकर इनको कूड़े का बताना शुरू कर दिया गया. संभव है कि लुगदी साहित्य कहे जाने वाले इन उपन्यासों में अश्लीलता जबरन ठूंसी जाती रही हो मगर सभी उपन्यासों में ऐसा होता है ऐसा नहीं है. इन्हीं में से बहुतेरे उपन्यास ऐसे हैं जिन पर हिन्दी फिल्म बनी हैं और बहुत लोकप्रिय भी रही हैं. जहाँ तक सामग्री की, शालीनता की बात है तो ऐसा लगता है कि इन विरोधी स्वर उचारते लेखकों ने, पाठकों ने उन लेखकों को नहीं पढ़ा है जो स्वयंभू रूप में साहित्य में सबसे ऊपर होने का दावा करते हैं मगर उनकी रचनाओं में रति-क्रिया का वर्णन किसी अश्लील साहित्य से कम नहीं. जिन विरोधी आवाजों ने मित्रो मरजानी, दिल्ली, चाक, पीली छतरी वाली लड़की आदि को पढ़ लिया होगा वे कहना भूल जाएँगे कि शालीनता क्या होती है.


रही बात लोकप्रियता के नाम की तो क्या ये आवश्यक है कि प्रत्येक कालखंड में सदियों पुराने, दशकों पुराने लेखकों को ही पढ़ते रहा जाए? क्या तकनीक के इस दौर में शालीनता पर वैसा ही पर्दा पड़ा हुआ है जैसा कि आज से कोई दो-तीन दशक पहले पड़ा हुआ था? फिल्मों, धारावाहिकों में सत्यता, वास्तविकता के नाम पर जिस तरह से अश्लीलता, गालियों का आना हुआ है वह ये बताने को पर्याप्त है कि अब किसी से कुछ भी गोपन नहीं है. विश्वविद्यालय के परास्नातक के विद्यार्थी किशोरावस्था के नहीं हैं. संभवतः उनमें सही-गलत को समझने का नजरिया होगा. आज हर हाथ में स्मार्ट फोन, इंटरनेट ने अश्लीलता को, पोर्नोग्राफी को सर्वसुलभ बना दिया है. ऐसे में इस साहित्य के द्वारा अश्लीलता का फैलना सिवाय गाल बजाने के कुछ और नहीं लगता है. कम से कम इन उपन्यासों की मौलिकता, रोचकता देखकर एक बार इनको अवसर दिया जाना उचित है. 





 

09 जनवरी 2022

सिर्फ ऐतिहासिक उपन्यासकार ही नहीं थे वृन्दावन लाल वर्मा जी

आज प्रसिद्द उपन्यासकार वृन्दावन लाल वर्मा जी का जन्मदिन है. उनका जन्म आज ही के दिन १८८९ उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले के मऊरानीपुर को हुआ था. वृन्दावन जी को मुख्य रूप से ऐतिहासिक उपन्यासकार के रूप में जाना जाता है. बहुत से कम लोगों को ये जानकारी है कि उन्होंने सामाजिक उपन्यास भी कम नहीं लिखे हैं. ऐसा होना निश्चित रूप से उनकी लेखकीय प्रतिभा का पूरा सम्मान नहीं है. उनको ऐतिहासिक उपन्यासकार के रूप में स्वीकारने का मुख्य कारण उनके दो प्रमुख उपन्यास ‘गढ़ कुंडार और ‘मृगनयनी भी हैं. आम लोगों ने उनको इसी कारण से विशुद्ध ऐतिहासिक लेखक या कहें कि उपन्यासकार के रूप में जाना है.




इस पोस्ट का उद्देश्य वृन्दावन लाल वर्मा जी के बारे में यही जानकारी देनी है कि वे मात्र ऐतिहासिक लेखक नहीं हैं, न ही वे विशुद्ध उपन्यासकार हैं बल्कि उन्होंने उपन्यास के अलावा अन्य कृतियों की भी रचना की है, ऐतिहासिक कृतियों के अलावा सामाजिक कृतियाँ भी साहित्य जगत को दी हैं. जब ये उन्नीस साल के किशोर थे तो इन्होंने अपनी पहली रचना ‘महात्मा बुद्ध का जीवन चरित’(१९०८) लिख डाली थी। उनके लिखे नाटक ‘सेनापति ऊदल’(१९०९) में अभिव्यक्त विद्रोही तेवरों को देखते हुये तत्कालीन अंग्रजी सरकार ने इसी प्रतिबंधित कर दिया था. सन १९२० ई० तक छोटी-छोटी कहानियाँ लिखते रहे. इन्होंने मुख्य रूप से ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित उपन्यास, नाटक, लेख आदि गद्य रचनायें लिखी हैं साथ ही कुछ निबंध एवं लधुकथायें भी लिखी हैं. उनकी रचनाओं को यहाँ सामान्य परिचय के रूप में यहाँ आप सबकी जानकारी के लिए दिया जा रहा है.


ऐतिहासिक उपन्यास

  • गढ़ कुंडार (1930 ई.)
  • टूटे काँटे (1945 ई.)
  • झाँसी की रानी (1946 ई.)
  • महारानी दुर्गावती
  • मुसाहिबजू (1946 ई.)
  • कचनार (1947 ई.)
  • मृगनयनी (1950 ई.)
  • माधवजी सिंधिया (1950 ई.)
  • रामगढ़ की रानी (1950 ई.)
  • भुवनविक्रम (1957 ई.)
  • ललितादित्य
  • अहिल्याबाई
  • देवगढ़ की मुस्कान


सामाजिक उपन्यास

  • प्रत्यागत (1927 ई.)
  • संगम (1928 ई.)
  • प्रेम की भेट (1928 ई.)
  • कुंडलीचक्र (1932 ई.)
  • कभी न कभी (1945 ई.)
  • अचल मेरा कोई (1948 ई.)
  • सोना (1952 ई.)
  • अमरबेल (1953 ई.)
  • सोती आग
  • डूबता शंखनाद
  • लगन
  • उदय किरण
  • अमर-ज्योति
  • कीचड़ और कमल
  • आहत


नाटक

  • धीरे-धीरे
  • राखी की लाज
  • सगुन
  • जहाँदारशाह
  • फूलों की बोली
  • बाँस की फाँस
  • काश्मीर का काँटा
  • हंसमयूर
  • रानी लक्ष्मीबाई
  • बीरबल
  • खिलौने की खोज
  • पूर्व की ओर
  • कनेर
  • पीले हाथ
  • नीलकण्ठ
  • केवट
  • ललित विक्रम
  • निस्तार
  • मंगलसूत्र
  • लो भाई पंचों लो
  • देखादेखी


कहानी संग्रह

  • दबे पाँब
  • मेढ़क का ब्याह
  • अम्बपुर के अमर वीर
  • ऐतिहासिक कहानियाँ
  • अँगूठी का दान
  • शरणागत
  • कलाकार का दण्ड
  • तोषी


निबन्ध

  • हृदय की हिलोर 

 

18 जुलाई 2020

बिना पढ़े लिखने का सुख

बहुत बार ऐसा होता है कि दिमाग में खूब सारे विचार उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं मगर जब लिखने बैठो तो लगता है जैसे सबकुछ साफ़ हो गया है. दिमाग किसी कोरे कागज़ सा नजर आने लगता है जहाँ कुछ भी लिखा नहीं है. लिखने का मन होने के बाद भी कुछ न लिख पाना, विचारों का आधिक्य होने के बाद भी उनको शब्दों का रूप न दे पाना जैसे सामान्य सी घटना हो जाती है. ऐसा बहुत बार उस समय भी होता है जबकि किसी विशेष आयोजन पर कोई साहित्यिक रचना लिखनी हो. किसी अवसर विशेष पर पद्य रचना लिखनी हो. ऐसे समय में लिखने की मुश्किल से लगता है कि अभी और बहुत सारा पढ़ने की आवश्यकता है.


ऐसे विचार आते समय ऐसे बहुत से लोग दिमाग में कौंध जाते हैं जो आये दिन अपने लेखन से परिचय करवाते हैं. अपनी तमाम रचनाओं को सुनाते हुए अपने आपको साहित्यकार की श्रेणी में शामिल बताते हैं. ऐसे में उनकी तारीफ करते हुए यदि जानकरी ली जाये कि वे किसे पढ़ते रहे हैं, हाल-फ़िलहाल किसे पढ़ रहे हैं तो इधर-उधर झाँकने लगते हैं. उनसे जानकारी की जाये कि कौन-कौन सी साहित्यिक रचनाओं को पढ़ा है, किस-किस पुस्तक को पढ़ा है तो वे भौचक से बस मुँह खोले खड़े रह जाते हैं.


हमारी समझ से परे है कि आखिर बिना पढ़े लिखने की आदत कैसे बन जाती है? आखिर बिना कुछ पढ़े लोग लिख भी कैसे लेते हैं?



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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

09 जनवरी 2019

इतिहास का सच दर्शाने वाले कलमकार को नमन

आज, 9 जनवरी हिन्दी उपन्यासों के वाल्टर स्कॉट के रूप में प्रसिद्द वृन्दावनलाल वर्मा की का जन्मदिन है. वाल्टर स्कॉट मूलतः शिकारी साहित्य के उपन्यासकार माने गए हैं. इसके साथ-साथ उन्होंने ऐतिहासिक उपन्यास भी लिखे. उनसे प्रेरणा पाकर और अपने बचपन में भारतीय इतिहास के प्रति गलत धारणा देखकर वृन्दावन लाल वर्मा जी के मन में देश का सही साहित्य, इतिहास लिखने का संकल्प जगा. उसी के कारण उन्होंने प्रेमचंद जैसे साहित्यकार के काल में ऐतिहासिक उपन्यास लेखन की दिशा में कदम बढ़ाया.


वृन्दावन लाल वर्मा जी का जन्म झाँसी जिले के मऊरानीपुर में 9 जनवरी 1889 को हुआ था. अपने चाचा के पास ललितपुर में रहकर उन्होंने साहित्य के प्रति अनुराग पैदा हुआ. जब वे कक्षा नौ में पढ़ते थे तभी इन्होंने तीन छोटे-छोटे नाटक लिखकर इण्डियन प्रेस, प्रयाग को भेजे. इन नाटकों के लिए उनको पुरस्कारस्वरूप 50 रुपये प्राप्त हुए थे. मात्र बीस वर्ष की उम्र में उन्होंने सेनापति ऊदल नाटक लिखा था. इस नाटक में निहित राष्ट्रवादी तेवरों से बौखलाकर अंग्रेज़ सरकार ने इस नाटक पर पाबंदी लगा दी थी और इसकी प्रतियाँ जब्त कर ली गईं. 

उनके ऐतिहासिक उपन्यासों में गढ़कुंडार, विराटा की पद्मिनी, कचनार, झाँसी की रानी, माधवजी सिंधिया, मुसाहिबजू, भुवन विक्रम , अहिल्याबाई, टूटे कांटे, मृगनयनी आदि प्रसिद्ध हैं. गढ़कुंडार उपन्यास के बहुत से अंश तो उन्होंने एक रात शिकार के दौरान उस किले को देखते-देखते ही तैयार कर लिए थे. उनके उपन्यासों में इतिहास जीवन्त होकर बोलता है. उन्होंने ऐतिहासिक उपन्यासों के अलावा संगम, लगन, प्रत्यागत, अचल मेरा कोई, सोना, प्रेम की भेंट, अमरवेल सरीखे सामाजिक उपन्यास भी लिखे. इन उपन्यासों में उन्होंने समाज की वास्तविक कहानियों को आधार बनाया था. इनके द्वारा लिखित उपन्यास संगम और लगन पर हिन्दी फिल्में भी बनी हैं जो कई भाषाओं में अनुदित हुयी हैं. उनकी आत्मकथा अपनी कहानी भी सुविख्यात है.

भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मभूषण से अलंकृत किया गया. हिन्दी साहित्य में परास्नातक उपाधि उत्तीर्ण करने के  पश्चात् पी-एच०डी० उपाधि के लिए गुरुजनों (डॉ० ब्रजेश अंकल, डॉ० दुर्गा प्रसाद खरे) द्वारा आदेशित किया गया. चूँकि बुन्देलखण्ड क्षेत्र के किसी साहित्यकार पर शोध-कार्य करने की अभिलाषा थी. अपने मन की बात जब अपने गुरुजन के समक्ष रखी तो अगले ही पल उन्होंने वृन्दावन लाल वर्मा जी के साहित्य पर कार्य करने को प्रेरित किया. इसके बाद वृन्दावन लाल वर्मा के उपन्यासों में अभिव्यक्त सौन्दर्य का अनुशीलन नामक शोध विषय के रूप में अपना शोध-कार्य डॉ० दुर्गा प्रसाद खरे जी के निर्देशन में आरम्भ किया. इसी शोध-कार्य के सुफल रूप में विद्या वाचस्पति (Ph.D.) उपाधि बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी से प्राप्त हुई. 

आज उनकी जयंती पर उनको सादर नमन.

18 दिसंबर 2018

बहुत कुछ अधूरा है अभी, बहुत कुछ सीखना है अभी

अपने इस ब्लॉग पर चौदह सौ पोस्ट लिखने के बाद भी लगता है जैसे लिखना अभी भी सीख नहीं पाए. अनेकानेक विषयों पर कलम चलाने के बाद भी इसका एहसास गहराई तक है कि किसी सार्थक विषय पर अभी लिखना बाकी है. लिखने के लिए भले ही लगातार लिखना होता आ रहा है; साहित्य की लगभग सभी विधाओं में लेखन के साथ-साथ समाज के अन्य बिन्दुओं, विषयों पर भी पर्याप्त लिखा गया; अध्यापन क्षेत्र से जुड़े होने के कारण शोध-पत्रों का भी लेखन किया गया; मीडिया से जुड़ाव के चलते अनेक सामाजिक-राजनैतिक विषयों को छुआ गया इसके बाद भी बहुत अधूरा सा महसूस होता है. लेखन का शौक बचपन से था. नौ-दस वर्ष की उम्र में पहली बार मन में उभरे भावों को कलमबद्ध किया और उसे कागज पर कविता के रूप में पाया. यह पारिवारिक सहयोग ही था जिसके चलते वह कविता उसी समय दो-दो समाचार-पत्रों में प्रकाशित भी हुई थी.

बचपन का वह क्षणिक प्रस्फुटन उम्र के साथ विस्तार पाता गया. इधर तकनीक के दौर में जब इंटरनेट से, ब्लॉग से, वेबसाइट से परिचय हुआ तब लगा कि लेखन को व्यापक आकाश मिल गया है. जहाँ तक मर्जी हो उड़ा जा सकता है, जितनी इच्छा हो वहां तक जाया जा सकता है. लेखन को वाकई विस्तार मिला, पहचान मिली, हमें भी पहचान मिली, ब्लॉग को सराहना मिली, सबका सहयोग-आशीर्वाद-स्नेह भी मिला. इस अमूल्य निधि के बाद भी हाथ आज भी खाली-खाली महसूस होते हैं. चौदह सौ की संख्या कम नहीं होती है. इतनी पोस्ट सिर्फ इसी ब्लॉग की है, इसके अलावा अन्य ब्लॉग पर भी कलम चल रही है, सम्बंधित विषयों पर विचार, रचनाएँ सामने आ रही हैं. ऐसे में यदि कुछ कमी सी समझ आये तो लगता है कि अभी लेखन को सार्थकता नहीं मिली है या कहें कि अपने लेखन के द्वारा हम सार्थकता को जन्म नहीं दे पाए. मन में लगातार उथल-पुथल मची हुई है और ऐसा आज ही नहीं पिछले काफी समय से ऐसा हो रहा है. मन-मष्तिष्क कुछ अलग सा लिखने को प्रेरित करते हैं मगर वही मन-मष्तिष्क समझ नहीं पा रहा है और न ही समझा पा रहा है कि अलग सा क्या लिखा जाये?

अपने आसपास अनेक लेखकों को, रचनाकारों को अलग-अलग, वैविध्य विषयों पर कलम चलाते हुए देखते हैं तो सुखद अनुभूति होती है. अनेक लोगों को अपनी तरह के किसी अलग से, विशेष विषय पर लिखते देखते हैं, उनको पढ़ते हैं तो सुखद अनुभूति के साथ-साथ अपनी इस कमी का गहराई से एहसास होता है. अनेकानेक विषय ऐसे हैं जिन पर लिखा जा सकता है किन्तु उनको अभी समझने की आवश्यकता है. साहित्य, कला, संस्कृति, धर्म, इतिहास, समाज, राजनीति, अर्थनीति सहित अनेकानेक विषय ऐसे हैं जिन पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है, अलग तरह से लिखा जा सकता है. ऐसे बहुत से अनछुए विषय, बिंदु अपनी तरफ आकर्षित भी करते हैं मगर पता नहीं कौन सा अनदेखा सा अवरोध कलम को रोक देता है. तब ऐसे मोड़ पर आकर लगता है कि अभी लिखने से ज्यादा पढ़ने की आवश्यकता है. जिन-जिन विषयों पर लेखन की चाह है उनको गंभीरता से पढ़ने की, उनका अध्ययन करने की आवश्यकता है. किसी भी विषय के सतही ज्ञान के द्वारा सतही लेखन किया जा सकता है, उसमें गंभीरता का समावेश नहीं किया जा सकता है. सतही, सामान्य को गंभीर, सार्थक बनाने के लिए हमें अभी और मेहनत की आवश्यकता है, अभी और अध्ययन की आवश्यकता है. शायद आने वाला समय इसमें हमारी मदद करेगा.

27 नवंबर 2018

हालावाद के प्रणेता को नमन


बैर कराते मंदिर-मस्जिद मेल कराती मधुशाला, जैसा अंदाज मधुशाला के माध्यम से देने वाले हरिवंश राय बच्चन का आज, 27 नवम्बर 1907 को इलाहाबाद में जन्म हुआ था. इनको बचपन में बच्चन अर्थात बच्चा या संतान कहकर पुकारा जाता था, बाद में वे इसी बच्चन नाम से प्रसिद्द हुए. सन 1926 में वे जब 19 वर्ष के थे तब उनका 14 वर्षीय श्यामा से हुआ. दुर्भाग्य से सन 1936 में श्यामा का निधन टी०बी० के कारण हो गया. इसके पाँच साल बाद बच्चन का विवाह पंजाब की तेजी सूरी से हुआ जो स्वयं में रंगमंच तथा गायन से जुड़ी हुई थीं. अमिताभ और अजिताभ इन्हीं के पुत्र हैं. 


हरिवंश राय बच्चन ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में एम०ए० और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पी-एच०डी० की उपाधि प्राप्त की. अंग्रेज़ी कवि यीट्स पर लिखा उनका शोध प्रबन्ध काफ़ी प्रशंसित हुआ.  वे अनेक वर्षों तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग में प्राध्यापक रहे. बाद में सन 1955 में वह विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषज्ञ होकर दिल्ली चले गये. उनका पहला काव्य संग्रह सन 1935 में प्रकाशित मधुशाला को भले माना जाता हो किन्तु इससे पहले उनका तेरा हार प्रकाशित हो चुका था. मधुशाला के प्रकाशन से बच्चन नाम साहित्य जगत पर छा गया. मधुशाला के बाद मधुबाला और मधुकलश के लगभग एकसाथ शीघ्र ही सामने आने पर इसे हिन्दी का हालावाद कहा गया. उनकी कृति दो चट्टानें को सन 1968 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार तथा एफ्रो एशियाई सम्मेलन के कमल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था. बिड़ला फाउन्डेशन ने उनकी आत्मकथा के लिये उन्हें सरस्वती सम्मान प्रदान किया था. उनको भारत सरकार द्वारा सन 1976 में साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था. उनका निधन 18 जनवरी 2003 को हुआ.

आज उनके जन्मदिन पर सादर श्रद्धांजलि अर्पित है.

18 अप्रैल 2018

पहले साहित्य का मर्म तो समझो


पिछले दिनों एक महाशय सोशल मीडिया पर कुछ तना-तनी करते दिखे, एक टिप्पणी को लेकर। सवाल साहित्यकार को लेकर उठा जो एक विवाद के रूप में सामने आया। किसी ने उसे अपने स्वाभिमान पर लिया तो किसी ने साहित्यकार शब्द पर ही संशय कर डाला। चूँकि हम हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी हैं और एक सवाल हमेशा हर उस व्यक्ति से पूछते हैं जो अपने को साहित्य से जुड़ा बताता है कि साहित्य किसे कहेंगे?इस सवाल ने हमेशा हमें परेशान किया है। उपन्यास, कहानी, कविता, ग़ज़ल, लघुकथा, नाटक आदि विधायें ही साहित्य हैं? साहित्य में संस्मरण, आलेखों को भी स्थान दिया जाता है, बस यहीं पर आकर सवाल फँसा देता है कि किस प्रकार के आलेखों को साहित्य में शामिल करेंगे?


आलेखों में किसी साहित्यकार के ऊपर लिखना, साहित्य की किसी भी विधा के बारे में बताना, किसी साहित्यिक विषय की आलोचना आदि करना आता है। यह सब किसी न किसी रूप में साहित्य का अंग स्वीकारे गये हैं। इसी के साथ निबंध को भी साहित्य का अंग माना जाता है और निबंध के ही एक रूप ललित निबंधको भी साहित्य में शामिल माना जाता है। अब फिर वही सवाल कि यदि निबंध भी साहित्य का हिस्सा है तो किस प्रकार के निबंध? क्या राजनैतिक पृष्ठभूमि को समेटे लिखे गये निबंधों को साहित्य में शामिल करेंगे? निबंध के द्वारा यदि भारत की विदेश नीति की चर्चा की जा रही हो, भारत के अपने पड़ोसी देशों की चर्चा की जा रही हो, देश-प्रदेश के भौगोलिक वातावरण की बात की जा रही हो, सामाजिक विसंगतियों की चर्चा की जा रही हो, जाति-धर्म-क्षेत्र की बात की जा रही हो तो क्या इस प्रकार के निबंधों को साहित्य में शामिल करेंगे? (यह सवाल जो भी सही ढंग से हमें समझा सके उसका बहुत आभार, क्योंकि यही हमें सबसे अधिक परेशान करता है)

साहित्य के अंग के इसी क्रम में एक जरा सी बात और। उपन्यास भी साहित्य की लोकप्रिय विधा है पर किस प्रकार के उपन्यास साहित्य में आते हैं और किस प्रकार के उपन्यासों को साहित्य में शामिल नहीं माना जाता है? यदि सभी प्रकार के उपन्यास साहित्य का हिस्सा हैं तो उन सस्ते से उपन्यासों को क्यों हेय दृष्टि से देखा जाता है जो सस्ते कागज पर, कम मूल्य पर होने के बाद भी सबसे अधिक बिकते हैं? नाम बताने की आवश्यकता नहीं, जासूसी उपन्यासों के (पाठक, शर्मा, आनन्द जैसे नामों वाले लेखकों के लोकप्रिय उपन्यास) पाठक तथाकथित साहित्यकारों से अधिक बिक्री करते हैं और आम पाठकों में अधिक लोकप्रिय हैं। क्या इन्हें साहित्य में शामिल किया जायेगा?

अब थोड़ी सी बात करें साहित्यकार की। आप साहित्यकार किसे मानते हैं? जो कुछ भी लिखना जानता हो वह साहित्यकार हो गया? अब लेखन चाहे प्रिंट का हो, इलेक्ट्रानिक का हो या आजकल भूत बन कर सभी को अपनी गिरफ्त में लेता सोशल मीडिया पर लेखन हो, क्या इन सभी में कुछ भी लिख देना, छपवा लेना ही साहित्य और साहित्यकार की श्रेणी में आता है? जिसे देखो वही इधर-उधर का जोड़-घटाना करके कुछ न कुछ छपवा कर चेंपने में लगा है। आज समस्या यही है कि सभी साहित्यकार है (लेखक कोई नहीं है) पाठक कोई भी नहीं। जिससे पूछो वही कुछ न कुछ लिख रहा है पर कुछ भी पढ़ नहीं रहा है। क्या साहित्यकार इतना छोटा और सस्ता शब्द हो गया है कि जो देखो वही साहित्यकार हो गया है? याद कीजिए उन साहित्यकारों को जिनको साहित्यकार कहते में हमें भी गर्व होता है। उनका लिखा गया साहित्य देखिए तब ज्ञात होगा कि आज जो लिखा जा रहा है क्या उसे साहित्य कहा जा सकता है, उसके लिखने वाले को साहित्यकार कहा जा सकता है? एक शब्द पकड़ लिया और बन बैठे अपनी मर्जी के मालिक। अब जिसे देखो उसे बना दें साहित्यकार और जिसे देखो उसे थमा दें कोई भी पुरस्कार।

यह सत्य हो सकता है कि सोशल मीडिया पर लिखने वाला व्यक्ति अच्छा लेखक हो, उसके भाव सौन्दर्य की प्रस्तुति करते हों, उनके लेखन से किसी प्रकार से सरोकरों की स्थापना होती हो, किसी न किसी प्रकार के मूल्यों को संरक्षण प्राप्त होता हो। इसके बाद भी इस सब का तात्पर्य कदापि यह नहीं कि वह साहित्यकार हो गया। साहित्यकार बनने के लिए कोई एक दो किताबों का छपवा लेना, कई कविताओं को प्रकाशित करना लेना, कई सारे ग्रुप से जुड़ जाना ही काफी नहीं। साहित्य का मर्म जो भी जानता होगा वो अपने कुछ भी लिख लेने पर अपने को साहित्यकार कहलवाना पसंद नहीं करेगा। 

पहले साहित्य का मर्म समझो, साहित्यकार की साधना समझो फिर अपने को साहित्यकार कहलवाने का दम पैदा करो। अपनी दैनिक चर्या को लिख देना, कुछ इधर-उधर की बकवास को चाशनी लगाकर लिख देना, सुंदरता, विमर्श की चर्चा कर देना, समाचारों को आधार बनाकर उसे लेखन का रंग देना, तमाम सारी टिप्पणियों को इस हाथ दे, उस हाथ ले के सिद्धांत से पा लेना ही साहित्य की तथा साहित्यकार की पहचान नहीं। जरा साहित्य पर दया करिए, हिन्दी साहित्य पर दया करिए साहित्यकारों का सम्मान कीजिए। यदि इतना कर सके तो ठीक अन्यथा साहित्य एवं साहित्यकार की लुटिया न डुबोइये।

26 मार्च 2018

आधुनिक काल की मीराबाई


हिन्दी कविता के साहित्यिक कालखंड छायावाद का प्रमुख स्तम्भ माने जाने वाली कवयित्री  महादेवी वर्मा का जन्म आज, 26 मार्च 1907 को फ़र्रुख़ाबाद में हुआ था. उनके पिता श्री गोविन्द प्रसाद वर्मा एक वकील और माता श्रीमती हेमरानी देवी गृहणी थीं. दोनों ही शिक्षा के अनन्य प्रेमी थे, जिसके चलते उनको भी पर्याप्त शिक्षा-दीक्षा मिली. इलाहाबाद में क्रॉस्थवेट कॉलेज से शिक्षा का प्रारंभ करते हुए महादेवी वर्मा ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की. तब तक उनके दो काव्य संकलन नीहार और रश्मि प्रकाशित होकर चर्चा में आ चुके थे. उनकी काव्य प्रतिभा सात वर्ष की उम्र से ही पहचान पा चुकी थी. महादेवी वर्मा हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभ सुमित्रानन्दन पन्त, जयशंकर प्रसाद और सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला के साथ की एक कड़ी मानी जाती हैं. उन्होंने खड़ी बोली हिन्दी को कोमलता और मधुरता से सँवारकर सहज मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति का द्वार खोला. उनकी रचनाओं में विरह की दीपशिखा का गौरवगान मिलता है.


उनका विवाह लगभग नौ वर्ष की उम्र में ही हो गया था परन्तु उनको सांसारिकता से कोई लगाव नहीं था. वे बौद्ध धर्म से बहुत प्रभावित थीं और स्वयं भी एक बौद्ध भिक्षुणी बनना चाहतीं थीं. विवाह पश्चात् उन्होंने अपना अध्ययन जारी रखा. बाद में उन्होंने अपने प्रयत्नों से इलाहाबाद में प्रयाग महिला विद्यापीठ की स्थापना की. इसकी वे प्रधानाचार्य एवं कुलपति भी रहीं. सन 1932 में उन्होंने महिलाओं की प्रमुख पत्रिका चाँद का कार्यभार सँभाला. उन्होंने न केवल चाँद का सम्पादन किया वरन् हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयाग में साहित्यकार संसद की स्थापना की. उन्होंने साहित्यकार मासिक का संपादन भी किया और रंगवाणी नाट्य संस्था की भी स्थापना की. महादेवी वर्मा को आधुनिक काल की मीराबाई कहा जाता है. हिन्दुस्तानी स्त्री की उदारता, करुणा, सात्विकता, आधुनिक बौद्धिकता, गंभीरता और सरलता उनके व्यक्तित्व में समाविष्ट थी. उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की विलक्षणता से अभिभूत होकर विभिन्न रचनाकारों ने उन्हें साहित्य साम्राज्ञी, हिन्दी के विशाल मंदिर की वीणापाणि, शारदा की प्रतिमा आदि विशेषणों से सम्मानित किया.

सन 1952 में वे उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्य मनोनीत की गईं. सन 1956 में भारत सरकार ने उनकी साहित्यिक सेवा के लिए उन्हें पद्म भूषण की उपाधि से सम्मानित किया. इससे पूर्व उनको सन 1934 में सेकसरिया पुरस्कार, सन 1942 में द्विवेदी पदक से सम्मानित किया गया. सन 1943 में उन्हें मंगला प्रसाद पुरस्कार एवं उत्तर प्रदेश सरकार के भारत भारती पुरस्कार से सम्मानित किया गया. यामा नामक काव्य संकलन के लिए उन्हें भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ. साहित्य के साथ-साथ सामाजिक क्षेत्र से जुड़ी महादेवी वर्मा का निधन 11 सितम्बर 1987 को प्रयाग में हुआ.

09 जनवरी 2018

ऐतिहासिकता और जीवंतता का सम्मिश्रण

हिन्दी उपन्यासों के वाल्टर स्कॉट कहलाने वाले वृन्दावनलाल वर्मा की आज 129 वीं जयंती है. आज ही 9 जनवरी सन 1889 को उनका जन्म झाँसी जिले के मऊरानीपुर में हुआ था. उनका बचपन अपने चाचा के पास ललितपुर में बीता. चाचा के साहित्यिक-सांस्कृतिक रुचि के होने के कारण उनकी भी रुचि पौराणिक तथा ऐतिहासिक कथाओं के प्रति बचपन से ही थी. लेखन प्रवृत्ति बचपन से ही होने के कारण उन्होंने नौंवीं कक्षा में ही तीन छोटे-छोटे नाटक लिखकर इण्डियन प्रेस प्रयाग को भेजे. जहाँ से उनको पुरस्कार स्वरूप 50 रुपये भी प्राप्त हुए. प्रारम्भिक शिक्षा भिन्न-भिन्न स्थानों पर संपन्न करने के बाद उन्होंने बी.ए. और क़ानून की परीक्षा पास की. इसके बाद वे झाँसी में वकालत करने लगे.


पौराणिक और ऐतिहासिक विषयों के प्रति रुचि होने के चलते और लेखन के द्वारा भारतीय इतिहास की सत्यता सबके सामने लाने की उनकी प्रतिज्ञा ने मात्र बीस साल की अल्पायु में सन 1909 में उनसे सेनापति ऊदल नाटक लिखवा लिया. इसके राष्ट्रवादी तेवरों से बौखलाकर अंग्रेज़ सरकार ने इस नाटक पर पाबंदी लगा कर इसकी प्रतियाँ जब्त कर लीं. बचपन में भारतीय समृद्ध इतिहास के प्रति नकारात्मक भाव देखकर वृन्दावन लाल वर्मा देश का वास्तविक इतिहास सबके सामने लाने की प्रतिज्ञा कर चुके थे. इसी के चलते उन्होंने ऐतिहासिक विषयों की ओर अपना ध्यान केन्द्रित किया. इसके साथ-साथ ऐतिहासिक उपन्यास लिखने की प्रेरणा उनको प्रसिद्द ऐतिहासिक उपन्यासकार वाल्टर स्काट से मिली.

उनका ऐतिहासिक उपन्यास लेखन की तरफ प्रवृत्त होना उस समय बहुत ही साहसिक कदम कहा जायेगा क्योंकि उस दौर में प्रेमचंद उपन्यास सम्राट के रूप में अपनी सशक्त उपस्थिति हिन्दी साहित्य में बनाये हुए थे. इसके बाद भी उनके पहले ऐतिहासिक उपन्यास गढ़कुंडार को जबरदस्त प्रसिद्धि मिली. इसके बाद तो वृन्दावन लाल वर्मा ने विराटा की पद्मिनी, कचनार, झाँसी की रानी, माधवजी सिंधिया, मुसाहिबजू, भुवन विक्रम, अहिल्याबाई, टूटे कांटे, मृगनयनी आदि सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास लिखे. उनके उपन्यासों में इतिहास जीवन्त होकर बोलता है. इसके साथ-साथ उन्होंने सामाजिक उपन्यास, नाटक, कहानियाँ भी लिखीं. उनकी आत्मकथा अपनी कहानी भी सुविख्यात है.

भारतीय ऐतिहासिकता को साहित्यिक जगत में जीवंत स्वरूप में प्रदान करने वाले साहित्यकार वृन्दावन लाल वर्मा सन 23 फ़रवरी 1969 में हमसे विदा हो गए. उनकी मृत्यु के 28 साल बाद 9 जनवरी सन 1997 को भारत सरकार ने उन पर एक डाक टिकट जारी किया.



आज उनके जन्मदिन पर उनकी पुण्य स्मृतियों को नमन...