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03 मार्च 2025

अमर्यादित, अशालीन कूटनीतिक व्यवहार

वर्तमान में दो राष्ट्रों रूस और यूक्रेन के बीच का युद्ध जितनी चर्चा में है, उससे कहीं अधिक चर्चा दो राष्ट्रों अमेरिका और यूक्रेन के राष्ट्रपतियों की मुलाकात की है. व्हाइट हाउस के ओवल हाउस में मीडिया के सामने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प और यूक्रेनी राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की की मुलाकात में शालीनता, मर्यादा, कूटनीति के सभी मानदण्डों का विखंडन देखने को मिला. अत्यंत कठोर और अमर्यादित लहजे में हुई बातचीत को समूचे विश्व ने देखा-सुना. अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सख्त अंदाज़ में यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की को खरी-खोटी सुनाई वह अप्रत्याशित ही नहीं अशोभनीय भी है. सामान्य शिष्टाचार के रूप में ऐसा आचरण स्वीकार्य नहीं है, इसके साथ-साथ वैश्विक कूटनीति के स्तर पर भी इसे मर्यादित नहीं कह सकते. ट्रम्प के व्यवहार को देखकर लगा जैसे वे अपनी ताकत के बल पर, अपने सहयोग के एहसान के बदले यूक्रेन को युद्ध विराम के लिए एक तरह का दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं. यूक्रेन को युद्ध के समय अमेरिकी मदद का जिक्र करना, मदद बिना यूक्रेन का युद्ध लड़ने में सक्षम न होने का दंभ दिखाना, यूक्रेन पर तीसरे विश्व युद्ध जैसे हालात उत्पन्न करने जैसा आरोप लगाना ट्रम्प का अहंकारी रवैया ही कहा जायेगा. अमेरिका संग खनन समझौते के लिए वाशिंगटन पहुँचे ज़ेलेंस्की पर अशालीन ढंग से ट्रम्प द्वारा अपना फैसला थोपने जैसा कदम उठाया गया.

 



जहाँ तक रूस-यूक्रेन युद्ध की बात है तो पिछले तीन सालों से चले आ रहे इस युद्ध का कोई अंतिम निष्कर्ष न तो निकला है और न ही निकलता दिखाई दे रहा है. इस बातचीत के बाद तो इस दिशा में अवरोध खड़े होने के आसार अधिक नजर आ रहे हैं. चूँकि ट्रम्प अपने चुनाव प्रचार के समय से ही रूस-यूक्रेन युद्ध विराम की बात करते रहे हैं, ऐसे में उनकी हडबडाहट को समझा जा सकता है. इस जल्दबाजी के कारण ही ट्रम्प पूरी मुलाकात में यूक्रेन के प्रति गम्भीर भाव नहीं दिखा सके. तीन वर्ष पूर्व आरम्भ हुए युद्ध के लिए वास्तविक जिम्मेदार कौन है, यह चर्चा का विषय अवश्य हो सकता है. रूस कभी भी इससे प्रसन्न नहीं रहा कि सोवियत संघ के कई देशों ने नाटो की सदस्यता ले ली. 1999 में अन्य यूरोपियन देशों के साथ हुई एक संधि पर रूस ने इस बात के लिए हस्ताक्षर किये थे कि प्रत्येक देश अपनी सुरक्षा के लिये किसी भी संगठन से जुड़ने को स्वतंत्र है. ऐसी संधि स्वीकारने के बाद भी रूस को सुखद प्रतीत नहीं हो रहा था कि यूक्रेन नाटो से जुड़े. ये और बात है कि 2008 में यूक्रेन द्वारा नाटो की सदस्यता माँगे जाने पर नाटो ने सदस्यता तो नहीं दी किन्तु भविष्य के लिए सदस्यता सम्बन्धी विकल्प को खुला रखा.

 

बहरहाल, रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला करने का एक कारण यूक्रेन द्वारा नाटो की सदस्यता की मंशा रखना था. रूस द्वारा हमला किये जाने के पश्चात् यूक्रेन ने अपने दुश्मन के विरुद्ध हथियार नहीं डाले. ये भले ही अमरीकी मदद के बिना सम्भव नहीं हुआ मगर इसका अर्थ यह तो कतई नहीं कि एक राष्ट्रपति द्वारा दूसरे राष्ट्रपति को अपमानित किया जाये. ट्रम्प इस तथ्य से भली-भांति परिचित हैं कि अमेरिका की सैन्य सहायता के बिना यूक्रेन द्वारा रूस का प्रतिरोध कर पाना सहज नहीं होगा. ऐसे में युद्ध विराम के लिए ट्रम्प किसी अगुआ की भांति, किसी महाशक्ति की तरह, किसी सर्वमान्य नेता की तरह कूटनीति अपनाते हुए ज़ेलेंस्की को युद्ध विराम के लिए तैयार कर लेते तो उनके प्रयासों का महत्त्व समझ आता. जैसा कि ट्रम्प अपने बड़बोलेपन और अलग तरह की कार्य-शैली के लिए जाने जाते हैं किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वे स्वयं को अहंकारी, अक्खड़ तरीके से प्रस्तुत करते हुए किसी दूसरे राष्ट्राध्यक्ष पर दबाव बनायें. यहाँ ट्रम्प को समझना चाहिए था कि ज़ेलेंस्की ने ट्रम्प से एक तरह का भरोसा चाहा था. अमेरिका के साथ अपने खनिज संसाधनों को बाँटने की स्थिति में यूक्रेन को भी आश्वासन चाहिए था कि रूस पीछे हट जाएगा, यूक्रेन के कब्ज़ाए हुए क्षेत्र वापस कर देगा और भविष्य में यूक्रेन पर आक्रमण नहीं करेगा. देखा जाये तो एक राष्ट्राध्यक्ष के नाते युद्ध विराम के बदले में ऐसी माँग अनुचित तो नहीं थी. ज़ेलेंस्की भी अच्छी तरह से जानते होंगे कि रूस के विरुद्ध युद्ध करते हुए यूक्रेन लगातार अपना ही नुकसान कर रहा है. भले ही यूक्रेन पूरी तरह से परास्त न हो पर वो रूस को अकेले नहीं हरा सकता है. ऐसे में सम्भव है कि ज़ेलेंस्की और यूक्रेन के नागरिक युद्ध-विराम जैसी स्थिति चाहते हों, भले ही इसके लिए अमेरिका अथवा किसी अन्य भरोसेमंद राष्ट्र की पहल का इंतजार कर रहे हों.

 

यहाँ ट्रम्प को यह नहीं भूलना चाहिए था कि वे राजनयिक अधिकारों एवं शिष्टाचार सम्बन्धी वियना समझौते के हस्ताक्षरकर्ता राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. अहंकार में आकर वे यूक्रेन की सार्वभौमिकता, सम्प्रभुता का अपमान नहीं कर सकते. जेलेंस्की उनके मातहत किसी अधिकारी नहीं बल्कि एक संप्रभु, स्वतंत्र राष्ट्र के प्रतिनिधि के रूप में वहाँ उपस्थित थे. यह अपमान और प्रदर्शन व्हाइट हाउस की असभ्यता है, संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धांतों का मखौल उड़ाना है. राजनैतिक असहमति के प्रदर्शन का यह तरीका निहायत ही निम्नस्तरीय है. ज़ेलेंस्की का खनिज समझौते पर हस्ताक्षर किये बिना वापस लौट आना, ट्रम्प का एकतरफा ऐलान सा करना कि ज़ेलेंस्की अभी शांति के मूड में नहीं हैं और जब शांति की बात करना चाहें तो हमारे दरवाजे उनके लिए खुले हैं, निश्चित रूप से युद्ध विराम सम्बन्धी स्थिति का बनने के पहले ही बिगड़ना है. ट्रम्प के इस तरह के बर्ताव के बाद यूरोपीय देशों में भी हलचल बढ़ने लगी है; रूस को भी हिम्मत मिली होगी, अब वह और अधिक हमलावर स्थिति में आने की कोशिश करेगा. यह बदलता परिदृश्य अनिश्चितताएँ बढ़ाने का कार्य करेगा.


19 अगस्त 2024

युद्ध-काल में मोदी की यूक्रेन यात्रा

रूस-यूक्रेन युद्ध को चलते हुए दो वर्ष से अधिक का समय हो चुका है मगर अभी भी इस युद्ध की अंतिम परिणति दिखाई नहीं दे रही है. दोनों देशों में जिसे जब अवसर मिलता है, वह जबरदस्त हमला करके दूसरे देश को क्षति पहुँचा देता है. युद्ध के चलते रहने की ऐसी स्थिति के बीच भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा यूक्रेन का दौरा करना वैश्विक चर्चा का विषय बना हुआ है. इसी माह की 23 तारीख को नरेन्द्र मोदी अपनी पोलैंड यात्रा के तुरंत बाद यूक्रेन दौरा करेंगे. भारत और यूक्रेन के बीच तीस वर्ष पूर्व, 1992 में राजनयिक सम्बन्ध स्थापित होने के बाद पहली बार है जब किसी भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा यूक्रेन की यात्रा की जा रही है. अपनी इसी महत्ता के साथ-साथ रूस-यूक्रेन युद्ध तेज होने के बीच भारतीय प्रधानमंत्री का यूक्रेन दौरा महत्त्वपूर्ण समझा जा रहा है.

 

ऐसा नहीं है कि रूस-यूक्रेन युद्ध-काल में मोदी और जेलेंस्की की यह पहली मुलाकात है. इससे पहले भी इन दोनों नेताओं की तीन बार मुलाकात हो चुकी है. यूक्रेन दौरे पर नरेन्द्र मोदी और जेलेंस्की की होने वाली मुलाकात उनकी चौथी मुलाकात होगी. पहली बार इन दोनों नेताओं की मुलाकात 2021 में ग्लासगो में हुई थी. इसके बाद मई 2023 को जी7 शिखर सम्मलेन के दौरान दोनों नेताओं का हिरोशिमा में मिलना हुआ था. तीसरी मुलाकात जून 2024 को इटली में हुए जी7 शिखर सम्मलेन में हुई थी, यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के तीसरे कार्यकाल की पहली विदेश यात्रा की थी. इस चौथी को इस कारण से और भी महत्त्वपूर्ण समझा जा रहा है क्योंकि इन दोनों नेताओं के मध्य यह पहली आधिकारिक मुलाकात होगी. इससे पहले दोनों नेताओं की मुलाकात किसी दूसरे देश में किसी अन्य मंच पर ही होती रही है. प्रधानमंत्री मोदी इस बार जेलेंस्की के आमंत्रण पर यूक्रेन जा रहे हैं. 

 



प्रधानमंत्री मोदी द्वारा रूस-यूक्रेन युद्ध के समय में अभी हाल ही में रूस की यात्रा की गई थी. युद्ध-काल में रूस की अपनी पहली यात्रा में रूसी राष्ट्रपति पुतिन और नरेन्द्र मोदी का गले मिलना पश्चिमी मीडिया के गले नहीं उतरा था. मीडिया के द्वारा इसकी आलोचना करने के साथ-साथ स्वयं यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की द्वारा भी इस पर आपत्ति की गई थी. इस पर उन्होंने कहा था कि आज रूस के मिसाइल हमले में 37 लोग मारे गए, इसमें तीन बच्चे भी शामिल थे. रूस ने यूक्रेन में बच्चों के सबसे बड़े अस्पताल पर हमला किया. एक ऐसे दिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेता का दुनिया के सबसे ख़ूनी अपराधी से मॉस्को में गले लगाना शांति स्थापित करने की कोशिशों के लिए बड़ी निराशा की बात है. ऐसे में जहाँ मोदी की रूस यात्रा के दौरान जेलेंस्की को आपत्ति हुई थी, माना जा रहा है कि मोदी की यूक्रेन यात्रा से रूस को आपत्ति, असहजता हो सकती है.

 

यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य ये है कि भारत के रूस और यूक्रेन से अपने-अपने स्तर से अलग-अलग सम्बन्ध हैं. जहाँ तक रूस-यूक्रेन के इस युद्ध का सवाल है तो भारत द्वारा कूटनीतिज्ञ भूमिका अपनाते हुए लगातार यही प्रयास किया गया है कि यह युद्ध समाप्त हो. उसके द्वारा किसी एक देश का न तो समर्थन किया गया है और न ही विरोध. भारत के रूस और यूक्रेन दोनों से मजबूत और स्वतंत्र सम्बन्ध होने का ही परिणाम है कि भारत ने यूक्रेन पर रूसी हमले की न तो निंदा की और न ही संयुक्त राष्ट्र में रूस के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव का समर्थन किया. इसी तरह से भारत द्वारा युद्ध-काल में यूक्रेन को लगातार मानवीय सहायता उपलब्ध करवाई जाती रही है. यूक्रेन और रूस के साथ भारत के राजनयिक सम्बन्ध होने के साथ-साथ व्यापारिक सम्बन्ध भी बने हुए हैं, जो इस युद्ध के दौरान भी लगातार स्थापित रहे. दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2021-22 में 386 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया. इसके साथ ही दोनों देशों के मध्य कृषि उत्पाद, धातुकर्म उत्पाद, प्लास्टिक, पॉलिमर, फार्मास्यूटिकल्स, मशीनरी, रसायन, खाद्य उत्पाद आदि का आयात-निर्यात पूर्व की भांति होता रहा.

 

मोदी और जेलेंस्की की यह मुलाकात कृषि, बुनियादी ढाँचे, स्वास्थ्य, शिक्षा, रक्षा आदि सहित अनेक बिन्दुओं पर केन्द्रित रहेगी. इसके अलावा इस मुलाकात से रूस-यूक्रेन युद्ध के सन्दर्भ में कोई सकारात्मक बिन्दु सामने आने की अपेक्षा की जा रही है क्योंकि भारत हमेशा से युद्ध के बजाय आपसी बातचीत के द्वारा रूस और यूक्रेन के मध्य विवाद के समाधान तक पहुँचने की बात करता रहा है.स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि यह युद्ध का समय नहीं है. युद्ध के मैदान में समाधान नहीं ढूंढे जा सकते. युद्ध और वैश्विक अराजकता के इस दौर में पिछले महीने भारतीय प्रधानमंत्री की रूस यात्रा के बाद अब यूक्रेन की यात्रा से सकारात्मक सन्दर्भ तलाशने की आवश्यकता है.  

 


08 जुलाई 2024

नरेन्द्र मोदी की रूस यात्रा के निहितार्थ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार को अपनी दो दिवसीय यात्रा पर रूस पहुँचे. यहाँ वे रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ भारत-रूस द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे. तीसरे कार्यकाल की उनकी यह पहली द्विपक्षीय विदेश यात्रा है. ऐसे समय में जबकि नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री के रूप में तीसरा कार्यकाल है; रूस-यूक्रेन युद्ध लम्बे समय से बेनतीजा चल रहा है; रूस और चीन के बीच सम्बन्ध दोस्ताना दिख रहे हैं, यह यात्रा महत्त्वपूर्ण हो जाती है. यह यात्रा उनकी पिछली परम्परा से हटकर है, इसलिए भी उनकी इस यात्रा को अलग नजरिये से देखा जा रहा है. नरेन्द्र मोदी ने पूर्व के दोनों कार्यकालों में पहली द्विपक्षीय यात्रा में पडोसी देशों को महत्त्व दिया था. पहले और दूसरे कार्यकाल में उनकी यात्रा क्रमशः भूटान और मालदीव की हुई थी. ऐसे में इस बार उनका पहली द्विपक्षीय विदेश यात्रा के लिए रूस जाना कूटनीतिक, व्यापारिक, सामरिक केन्द्र में है.

 

रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते भी मोदी की रूस यात्रा महत्त्वपूर्ण है. मोदी ने वर्ष 2022 में उज्बेकिस्तान के समरकंद में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन में पुतिन संग द्विपक्षीय वार्ता के दौरान यूक्रेन से युद्ध समाप्त करने को कहा था. पुतिन और यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की के साथ मोदी ने कई बार टेलीफोन पर बातचीत करते हुए युद्ध समाप्ति हेतु कूटनीतिक दबाव बनाना जारी रखा है. चूँकि इस बार भारत शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के कजाकिस्तान शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं हुआ. रक्षा मामलों के विशेषज्ञों की राय है कि भारत इस उम्मीद के साथ एससीओ में शामिल हुआ था कि उसका प्रभाव मध्य एशिया में बढ़ेगा किन्तु इसमें चीन के बढ़ते हस्तक्षेप के कारण ऐसा नहीं हो सका. इसके अलावा पाकिस्तान भी अब एससीओ का सदस्य है. ऐसे में चीन के बढ़ते प्रभाव और हस्तक्षेप के कारण भारत को अपनी स्थिति महत्त्वपूर्ण न लगी होगी. विशेष बात ये है कि रूस और चीन इस संगठन के सदस्य हैं. ऐसे में इस रूस यात्रा में सम्भव है कि मोदी द्वारा चीन के बढ़ते प्रभावों का मुद्दा भी उठाया जाये.

 



रूस भारत का सबसे पुराना और भरोसेमंद मित्र, सहयोगी है. रूस के द्वारा अनेक मुश्किल पलों में भारत का साथ दिया गया. आज भी भारत के साथ उसके गहरे व्यापारिक सम्बन्ध हैं. दोनों देशों में लम्बे समय से रणनीतिक साझेदारी के अन्तर्गत रक्षा, अंतरिक्ष और आर्थिक समझौतों पर सहमति है. भारत द्वारा भी रूस के साथ अपनी मित्रता और भरोसे को बनाये रखा गया है. रूस पर लगे प्रतिबंधों के बावजूद भारत-रूस का आयात-निर्यात सम्बन्ध बना हुआ है. भारत से निर्यात की जाने वाली प्रमुख वस्तुओं में फार्मास्यूटिकल्स, कार्बनिक रसायन, विद्युत मशीनरी और यांत्रिक उपकरण, लोहा और इस्पात शामिल हैं जबकि रूस से आयात की जाने वाली प्रमुख वस्तुओं में तेल और पेट्रोलियम उत्पाद, उर्वरक, खनिज संसाधन, कीमती पत्थर और धातु, वनस्पति तेल आदि शामिल हैं. व्यापारिक संबंधों की महत्ता को वाणिज्य विभाग के आँकड़ों से समझा जा सकता है. उसके अनुसार वित्त वर्ष 2023-24 में द्विपक्षीय व्यापार 65.70 बिलियन डॉलर में भारत का निर्यात 4.26 बिलियन डॉलर और आयात 61.44 बिलियन डॉलर रहा जो अपने सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गया है.

 

व्यापारिक महत्त्व के रूप में अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (आईएनएसटीसी) भी प्रमुख है. भारत और रूस दोनों के लिए यह सम्पर्क मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण है. यह गलियारा माल ढुलाई के लिए जहाज, रेल और सड़क मार्गों का 7200 किमी लंबा मल्टी-मोड नेटवर्क है. भारत, ईरान और रूस ने इससे सम्बंधित समझौते पर हस्ताक्षर किए थे ताकि ईरान और सेंट पीटर्सबर्ग के माध्यम से हिन्द महासागर और फारस की खाड़ी को कैस्पियन सागर से जोड़ने वाला सबसे छोटा परिवहन मार्ग प्रदान करने के लिए एक गलियारा बनाया जा सके. हाल ही में रूस ने पहली बार इसके द्वारा भारत को कोयला ले जाने वाली दो ट्रेनें भेजी हैं. यद्यपि यह मार्ग अभी पूर्ण रूप से शुरू नहीं हुआ है तथापि जब यह मार्ग पूरी तरह चालू हो जाएगा तो भारत और रूस के बीच व्यापारिक गतिविधियाँ तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.

 

पश्चिमी यूरोपीय देशों द्वारा रूस पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगाने का उद्देश्य रूस को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अकेला करना था मगर भारत ने रूस का साथ देते हुए कहा कि पश्चिमी देशों द्वारा रूस के साथ किये जा रहे सौतेले व्यवहार के पक्ष में भारत नहीं है. ऐसे में भारत ने रूस के साथ व्यापारिक सम्बन्धों के साथ-साथ सामरिक सम्बन्धों को भी बनाये रखा. सामरिक महत्त्व में भारत द्वारा रूस से एस-400 मिसाइलों की खरीदारी महत्त्वपूर्ण विषय है. टी-90 टैंक, एसयू 30, एके 203 राइफलें भी भारत में ही संयुक्त उत्पादन में निर्मित हो रही हैं. इस तरह के रक्षा सम्बन्धों के साथ-साथ सहयोगात्मक विदेश नीति के कारण भारत-रूस सम्बन्धों का वैश्विक दृष्टि से व्यापक प्रभाव है.

 

विगत कुछ समय से वैश्विक स्तर पर युद्ध की स्थितियाँ चारों तरफ बनती दिखाई देने लगी हैं. बहुसंख्यक देशों के बीच तनाव भी नजर आ रहा है. ऐसे में वैश्विक व्यवस्था को अमेरिका, चीन, पश्चिमी देशों की अनावश्यक अराजकता, आक्रामकता, विस्तारवाद जैसी स्थितियों से बचाने के लिए शक्ति संतुलन की आवश्यकता है. नरेन्द्र मोदी सम्बन्धों को प्रगाढ़ बनाते हुए भारतीय सम्बन्धों को पश्चिमी देशों, यूरोपीय देशों सहित अमेरिका के साथ संतुलन बनाये रखने हेतु लगातार प्रयासरत हैं. निश्चित ही रूस की इस यात्रा से भारत के साथ-साथ सकल विश्व को भी सकारात्मक सन्देश प्राप्त होगा.


26 मार्च 2024

रूस पर बड़ा आतंकी हमला

रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने अपनी ऐतिहासिक और प्रचंड बहुमत वाली जीत के बाद रूस के और अधिक शक्तिशाली रूप में उभर कर आने का विश्वास व्यक्त किया था. इस दावे के साथ ही उन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध में नाटो सेनाओं के शामिल होने के अपने विश्वासपरक दावे के सापेक्ष दुनिया को विश्वयुद्ध से एक कदम दूर बताया था. पुतिन की विश्वयुद्ध की सम्भावित चेतावनी नाटो सेनाओं, पश्चिमी देशों के लिए थी. इन सबके पीछे रूस की सशक्त सेना, पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था, सजग सुरक्षा एजेंसियों का होना माना जा रहा था मगर चंद आतंकियों ने रूस के, पुतिन के इस विश्वास को हिला डाला. चार आतंकियों ने मॉस्को के नज़दीक स्थित क्रोकस कॉन्सर्ट हॉल में घुसकर सोवियत काल के रॉक बैंड ग्रुप पिकनिक के एक म्यूजिक कॉन्सर्ट के दौरान गोलियों की बौछार कर दी थी. एके 47 से की गई अंधाधुंध गोलीबारी में सैकड़ों लोगों की जान गई और घायल हुए.

 



जहाँ इस हमले की जिम्मेवारी एक तरफ इस्लामिक स्टेट ख़ोरासान प्रान्त (ISIS-K) ने ली वहीं दूसरी तरफ पुतिन इस आतंकी हमले को यूक्रेन की साजिश बता रहे हैं. पुतिन के इस संदेह का कारण आतंकियों का यूक्रेनी सीमा से यूक्रेन में प्रवेश करने की कोशिश करना रहा है. एक तरफ रूसी राष्ट्रपति इस्लामिक आतंकी संगठन को, यूक्रेन को इसके लिए जिम्मेवार ठहरा रहे हैं, दूसरी तरफ जैसै-जैसे इस आतंकी हमले की जाँच आगे बड़ रही है वैसे-वैसे चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं. इस आतंकी हमले में संलिप्त चारों आतंकियों सहित कुल ग्यारह लोगों को पकड़ने का दावा रूसी सुरक्षा एजेंसियों ने किया है. इन सभी गिरफ्तार व्यक्तियों का सम्बन्ध अफगानिस्तान में सक्रिय इस्लामिक स्टेट की खोरासान शाखा से बताया गया है. इससे इस हमले में तुर्किये का सम्बन्ध होना सामने आया है. रूस की संघीय सुरक्षा एजेंसी (FSB) ने दावा किया है कि पहले भी मॉस्को में इसी तरह के दो आतंकी हमले की कोशिशों को नाकाम किया गया है. इस हमले में तुर्किये कनेक्शन सामने के बाद सवाल खड़ा हो गया है कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन को अपना दोस्त बताने वाले तुर्किये राष्ट्रपति एर्दोगन क्या अब धोखा दे रहे हैं?

 

रूस में हुए इस आतंकी हमले में अलग-अलग दृष्टिकोण से अलग-अलग पेंच और सम्बन्ध दिखाई देते हैं. हमले की जिम्मेवारी सबसे पहले इस्लामिक आतंकी संगठन ने ली थी. रूसी सुरक्षा एजेंसियों की जाँच से तुर्किये कनेक्शन दिखाई दिया. रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने इस हमले को यूक्रेन की साजिश बताया. इस संदेह के चलते ही यूक्रेन को पुतिन के गुस्से का खामियाजा उठाना पड़ा. रूस ने यूक्रेन के बाईस से ज्यादा शहरों में हमले किए. यूक्रेन के इस हमले में शामिल होने के दावे का असर अमेरिका पर पड़ता दिख रहा है. पुतिन के नजदीकी विश्वस्त अफसरों को संदेह है कि अमेरिका को इस तरह का आतंकी हमला होने की जानकारी थी लेकिन उसने रूस को इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी. रूसी अधिकारियों द्वारा इस तरह का संदेह उठाये जाने का एक कारण अमेरिका द्वारा सात मार्च का वह अलर्ट है जिसमें अमेरिकी दूतावास ने अपने नागरिकों से कहा था कि वे मॉस्को में होने वाली बड़ी सभाओं और कार्यक्रमों से दूर रहें. इस अलर्ट के बीस दिनों के भीतर ही आतंकी हमला होने का सीधा मतलब यही लगाया जा रहा है कि अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों के पास आतंकी हमले को लेकर जानकारी थी.  

 

आतंकी हमले के तार कहाँ-कहाँ, किस-किस से जुड़े हैं ये तो आने वाले समय में होने वाली जाँच से पता चलता रहेगा मगर अब अंदेशा रूस के हमलावर होने का है. ऐसा होता नजर आने भी लगा है. सुरक्षा एजेंसियों ने देश भर में सार्वजनिक कार्यक्रमों को रद्द कर दिया है. सभी जगहों पर सुरक्षा व्यवस्था को और कड़ा कर दिया है. यूक्रेन पर हमले बढ़ गए हैं, देखा जाये तो ये बढ़े हुए हमले कहीं का कहीं अमेरिका और नाटो सेनाओं के विरुद्ध क्रोध का संकेत हैं. दरअसल वर्ष 2002 में चेचन अलगाववादियों द्वारा नॉर्ड-ओस्ट थियेटर में बंधक बनाये जाने के बाद से यह सबसे बड़ा आतंकी हमला है. उस हमले में एक सौ सत्तर के आसपास लोग मारे गए थे. रूस अभी तक उस आतंकी हमले को भुला नहीं पाया है. इसके अलावा इसमें कोई संदेह नहीं कि पुतिन अपने नेतृत्व में रूस से इस्लामिक, कट्टरपंथी आतंकवाद का एक तरह से सफाया कर दिया है. ऐसे में पुतिन की प्रचंड और ऐतिहासिक बहुमत वाली जीत ने उनके विरोधियों में नाराजगी और निराशा पैदा कर दी.

 

यह आतंकी हमला इसी निराशा और हताशा का परिणाम हो या न हो किन्तु यह हमला पुतिन के विश्वास और स्वाभिमान पर अवश्य है. इस आतंकी हमले के बाद रूस आक्रामक मुद्रा में है और अमेरिका द्वारा यूक्रेन को बेगुनाह बताते हुए क्लीन चिट दी जा रही है. विश्व की इन दो महाशक्तियों द्वारा उठाये जा रहे कदमों, बयानों का अंतिम निष्कर्ष क्या निकलेगा ये तो भविष्य के गर्भ में छिपा है किन्तु इस आतंकी घटना ने एक तरह का वैश्विक भय अवश्य पैदा कर दिया है. इस आतंकी हमले ने विश्व की दो महाशक्तियों के बीच खतरनाक संघर्ष के शुरू होने का बीज बो दिया है. 






 

27 अक्टूबर 2022

स्ट्रेटेजिक वॉर की रणनीति पर रूस

वैश्विक राजनीति के साथ-साथ सामरिक क्षेत्र के विशेषज्ञों ने भी नहीं सोचा होगा कि रूस और यूक्रेन युद्ध इस तरह लम्बा खिंचेगा. विगत कई महीनों से युद्ध लगातार चल रहा है किन्तु दोनों तरफ से कोई भी शांत होने की स्थिति में नहीं दिख रहा है. हालातों से लग नहीं रहा है कि रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध हाल-फ़िलहाल रुकने वाला है. इसके उलट रूसी राष्ट्रपति पुतिन द्वारा परमाणु हमले की धमकी ने वैश्विक समाज की चिंता को बढ़ा दिया है. युद्ध किस स्थिति में पहुँच गया है ये एक अलग मुद्दा है मगर जिस तरह से माहौल बनता दिख रहा है उससे लग रहा है कि विश्व की दूसरी सबसे ताकतवर रूसी सेना इन दिनों स्ट्रेटेजिक लड़ाई पर ध्यान लगा रही है. उसके द्वारा कुछ समय पूर्व यूक्रेन के कब्जाए गए क्षेत्रों में जनमत संग्रह करा कर उन्हें रूस में शामिल तो करवा लिया था मगर यूक्रेन ने इसे सहज रूप में स्वीकार नहीं किया है. वह अपने क्षेत्रों को वापस लेने के लिए संघर्ष करता दिख रहा है. ऐसी खींचतान के बीच राष्ट्रपति पुतिन की परमाणु हमले की धमकी ने दुनिया को चिंता में डाल दिया है. पुतिन ने अपने एक सम्बोधन में साफ तौर पर कहा कि उसके द्वारा कब्जाए और रूस में शामिल किये गए क्षेत्रों पर यदि यूक्रेन ने हमला किया तो वह परमाणु हमला करने से भी नहीं चूकेंगे.


पुतिन की परमाणु हमला करने की धमकी के बीच यदि रूस के परमाणु हथियारों पर निगाह डालें तो संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के सात देशों के पास कुल 12700 परमाणु हथियार मौजूद हैं. इनमें से रूस के पास सबसे अधिक 5977 परमाणु बम उसके सैन्य ठिकानों में मौजूद हैं. फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स के अनुसार रूस के पास इन वारहेड में से 1100 से अधिक इंटरकॉन्टिनेंटल बैलेस्टिक मिसाइल हैं जो रूस से बैठ कर ही दुनिया के हर कोने तक भेजी जा सकती हैं. रूस की नौसेना ने सबमरीन से परमाणु हमले करने के लिए अपने बेड़े में 800 बैलिस्टिक मिसाइल को सजा रखा है.




रूस के इतनी विशाल परमाणु हथियार क्षमता से संपन्न होने के बाद भी सवाल उठता है कि जापान में परमाणु हमले की विभीषिका देखने के बाद भी क्या पुतिन परमाणु हमला करने जैसा जघन्य कदम उठायेंगे? सन 1945 में अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा पर जिस परमाणु बम को गिराया गया था वह केवल 15 किलोटन का था. उस हमले में एक लाख से अधिक लोग मारे गए थे और आज भी कई तरह की गंभीर बीमारियाँ वहाँ देखने को मिल रही हैं. ऐसी स्थिति के कारण एक सम्भावना यह व्यक्त की जा रही है कि रूस एक या अधिक टैक्टिकल परमाणु बम तैनात कर सकता है. जिनका उद्देश्य यूक्रेन पर दवाब बनाना हो सकता है. यहाँ बताते चलें कि टैक्टिकल परमाणु छोटे हथियार होते हैं, जिनमें 0.3 किलोटन से लेकर 100 किलोटन तक की विस्फोटक शक्ति होती है. यदि टैक्टिकल परमाणु बम की जगह स्ट्रेटेजिक परमाणु बम का इस्तेमाल किया गया तो वह समूचे विश्व के लिए अत्यंत विनाशकारी साबित होगा. इस कारण लगता नहीं कि यूक्रेन युद्ध में रूस स्ट्रेटेजिक परमाणु हमला करने जैसा कदम उठाएगा.


रूस यह भी नहीं चाहेगा कि उसके हमलों में अधिक जानमाल का नुकसान हो अथवा स्वयं उसे भी नुकसान उठाना पड़े. ऐसे में वह टैक्टिकल परमाणु बम के द्वारा यूक्रेन को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर करना चाहेगा अथवा उसे बातचीत के लिए राजी करना चाहेगा. ऐसी स्थिति के लिए रूस यूक्रेन के दो सबसे महत्त्वपूर्ण शहरों, यूक्रेन की राजधानी और खारकीव को अपने निशाने पर ले सकता है. दोनों ही शहरों की कुल आबादी करीब 42 लाख से अधिक है, ऐसे में अगर रूस अपने टैक्टिकल परमाणु हथियार इन शहरों पर गिराता है तो भीषण तबाही मच सकती है. रूस इसी विशाल आबादी के ऊपर खतरा दिखा कर यूक्रेन को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर सकता है.


इन सब संभावनाओं, आशंकाओं के बीच व्हाइट हाउस के पूर्व परमाणु नीति विशेषज्ञ जॉन वोल्फस्टल का कहना है कि रूस द्वारा यूक्रेन को एक ताकतवर संदेश देने के लिए पानी के ऊपर परमाणु बम का विस्फोट किया जा सकता है. इससे लोगों की जान भी नहीं जाएगी और यूक्रेन के खिलाफ परमाणु हमले किये जाने की चेतावनी को अमल में लाने का कार्य आरम्भ हो जायेगा. इसके साथ ही यूक्रेन के ऊपर हवा में काफी ऊँचाई पर इस तरह के बम का प्रयोग हो सकता है, जिससे पैदा होने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक पल्स यूक्रेन के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को बर्बाद कर देगी. पुतिन द्वारा  परमाणु बम गिराए जाने पर स्वीकार्यता इसलिए भी बनती नहीं दिखती है क्योंकि इससे बड़े पैमाने पर लोग मरेंगे. इससे भले ही यूक्रेन का राजनैतिक नेतृत्व खत्म हो जायेगा किन्तु यह स्थिति पुतिन के लिए सकारात्मक नहीं होगी. एक हमले के बाद ही समूचा विश्व पुतिन के खिलाफ नजर आने लगेगा.


पुतिन द्वारा परमाणु हमले की धमकी भले दे डी गई हो मगर जिस तरह का माहौल बना हुआ है उसे देखते हुए ऐसा किया जाना संभव नहीं लगता है. पश्चिमी देश इस मामले में भी अपनी मानसिकता को प्रदर्शित कर चुके हैं. यूक्रेन के नाटो का सदस्य न होने के कारण भले ही वर्तमान में नाटो सेनाएँ प्रत्यक्ष रूप से यूक्रेन के साथ नहीं हैं मगर परमाणु हमला हो जाने की स्थिति में वे सब मानवता की रक्षा के नाम पर एकसाथ रूस के खिलाफ उतर आएँगी. ऐसे में रूस के लिए दोतरफा युद्ध लड़ना लाभ का सौदा नहीं होगा. यदि ऐसी स्थिति बनी तो रूस को जबरदस्त नुकसान उठाना पड़ सकता है. इसलिए लगता नहीं कि एक छोटे से क्षेत्र पर कब्ज़ा करने के छोटे लाभ के लिए पुतिन पुतिन बड़ा जोखिम उठायेंगे.