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09 मई 2026

महापुरुषों का सम्मान या फोटो खिंचवाने की चाहत?

यदि महाराणा प्रताप के चरणों में पुष्प अर्पित कर दिए जाते तो क्या ये उनके प्रति सम्मान न होता?

 

आजकल सम्मान का अर्थ महापुरुषों के बराबर खड़े होने से है, उनको माल्यार्पण करने से है. इसी सनक ने मूर्तियों/प्रतिमाओं की भव्यता को समाप्त कर दिया है. उरई शहर की लगभग सभी प्रतिमाओं/मूर्तियों में इस तरह की सीढ़ियाँ लगवा दी गई हैं. इससे नेताओं के, जनप्रतिनिधियों के कथित अहं को संतुष्टि भी मिल जाती है. जिला प्रशासन को, जिला जनप्रतिनिधियों को लगातार लिखित, मौखिक निवेदन करने के बाद भी किसी पर कोई असर नहीं हो रहा है. दिखावे का सम्मान महापुरुषों की दिव्यता-भव्यता पर हावी है.




16 मार्च 2026

पिताजी के बाद का समय

कुछ घटनाएँ कभी भूलती ही नहीं, भुलाई भी नहीं जाती. कोशिश करने पर भी दिल-दिमाग से वे पल नहीं हटते. आपका जाना अनायास हुआ. ज़िन्दगी भर एक मलाल रह गया की कि आपसे न कुछ कह सके, आपसे बात भी नहीं कर सके, आपके लिए जब कुछ करने लायक स्थिति में आये तो कर भी न सके. इन बीस सालों में हर कदम आपके ही कामों को पूरा करने का प्रयास किया, आपकी ही तरह बनने की कोशिश की, सभी को एकसूत्र में बाँधे रखने की कोशिश की. कहाँ तक और कितने सफल हुए, इसका आकलन आप ही करियेगा. 

आज बहुत सी घटनाओं के समय लगता है कि समय ने बहुत कुछ दिया मगर उससे ज्यादा कष्ट दिया है. बावजूद इसके कोशिश यही रहती है कि कहीं से कमजोर न पड़ें. आपकी उपस्थिति को अपने आसपास महसूस करते हुए जीवन में आई दिक्कतों, उलझनों से निपटने, निकलने का रास्ता बनाते रहते हैं. 

आपके श्रीचरणों में सादर नमन.

23 फ़रवरी 2026

अइया को याद करते हुए

संसार में आने वाले व्यक्ति को जाना होता ही है, ये विधान है. अवस्था कैसी भी हो अपने सदस्य के जाने का दुःख होता ही है. अईया के जाने का दुःख तो था ही. संतोष इसका था कि उनके अंतिम समय में पूरा परिवार उनके सामने था, उनके साथ था, जैसा कि बाबा के साथ न हो सका था. अईया के चले जाने के बाद के पच्चीस वर्ष बीत चुके हैं मगर एक-एक घटना, एक-एक बात जीवंत है. उनके कमरे के साथ, उनके सामान के साथ, उनकी यादों के साथ. जिस दिन उनको पेंशन मिलती, हम तीनों भाइयों को वे कुछ न कुछ देतीं मगर उस नाती को कुछ ज्यादा धनराशि मिलती जो उनको लेकर जाता था.

 

खाने-पीने को लेकर होती चुहल, उनके पुराने दिनों को लेकर होती बातें, उनकी कुछ बनी-बनाई धारणाओं पर हँसी-मजाक बराबर होता रहता, जो उनके बाद बस याद का जरिया है. अपने अंतिम समय तक वे इसे मानने को तैयार न हुईं कि सीलिंग फैन कमरे की हवा को ही चारों तरफ फेंकता है, उसमें किसी तरह का बिजली का करेंट नहीं होता है. वे अपनी त्वचा दिखाकर बराबर कहती कि ये पंखा बिजली से चलता है और बिजली फेंकता है. तभी हमारी खाल जल गई है. इसी तरह की धारणा रसोई गैस को लेकर बनी हुई थी. गैस की शिकायत होने पर वे कहती कि गैस की रोटी, सब्जी, दाल खाई जाएगी तो पेट में गैस ही बनेगी. ऐसी बहुत सी बातें हैं जो अईया की याद में आये आँसुओं को मुस्कान में बदल देतीं हैं.


16 दिसंबर 2025

विजय दिवस 16 दिसम्बर

आज 16 दिसम्बर को विजय दिवस देश भर में मनाया जाता है. इसको मनाये जाने का कारण 1971 में हुए युद्ध में भारत की पाकिस्तान पर जीत है. पाकिस्तान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी ने भारत के पूर्वी सैन्य कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था. इस युद्ध के अंत के बाद 93000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया था. इस युद्ध में पाकिस्तान की पराजय के बाद पूर्वी पाकिस्तान स्वतंत्र हो गया था. यही स्वतंत्र भाग आज बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है. इस युद्ध में लगभग चार हजार भारतीय सैनिकों को वीरगति प्राप्त हुई थी और दस हजार के आसपास सैनिक घायल हुए थे. 




16 मार्च 2025

आपके बिना दो दशक का सफ़र

 दो दशक की यात्रा, आपके बिना. 

कुछ घटनाएँ कभी भूलती ही नहीं, भुलाई भी नहीं जाती. कोशिश करने पर भी दिल-दिमाग से वे पल नहीं हटते. आपका जाना अनायास हुआ. ज़िन्दगी भर एक मलाल रह गया की कि आपसे न कुछ कह सके, आपसे बात भी नहीं कर सके, आपके लिए जब कुछ करने लायक स्थिति में आये तो कर भी न सके. इन बीस सालों में हर कदम आपके ही कामों को पूरा करने का प्रयास किया, आपकी ही तरह बनने की कोशिश की, सभी को एकसूत्र में बाँधे रखने की कोशिश की. कहाँ तक और कितने सफल हुए, इसका आकलन आप ही करियेगा. 


27 दिसंबर 2024

काश! जीवित रहते तारीफ कर देते

मनमोहन सिंह की जितनी तारीफें, उपलब्धियाँ अब उनके निधन के बाद सुनाई जा रहीं हैं, काश! उनको जीवित रहते सुना दी गईं होतीं.

 

=>> कम से कम उनको एहसास होता कि वे ही परमाणु सम्बन्धी मामले के अगुआ थे.

=>> कम से कम उनको एहसास तो होता कि उनके कारण ही भारत आर्थिक रूप से सक्षम हुआ है.

=>> कम से कम उनको एहसास होता कि मौन रहने के बाद भी वही भारतीय राजनीति की रीढ़ थे.

=>> कम से कम उनको एहसास तो होता कि वे ही एकमात्र विद्वान थे जिन्होंने आर्थिक नीतियों को सही से देश में लागू करवाया.




17 मार्च 2024

पिताजी के जैसा बनने की कोशिश

उन्नीस साल का सफ़र, जिसमें सब लोग तो साथ थे बस एक आप ही न थे. आपके जाने के बाद बहुत कोशिश की जिम्मेवार बनने की, परिवार को साथ लेकर चलने की. आपके जाने वाली तारीख से लेकर आज तक की तारीख की अपनी यात्रा पर नजर डालते हैं तो लगता है कि हर स्थिति में असफल ही हुए हैं. आपके जैसा स्वभाव नहीं ही पा सके, यदि उसका शतांश भी पाया होता तो मिंटू को नहीं खोते.

 

कोशिश तो हर पल करते हैं आपके जैसे बनने की मगर आज तक नहीं बन सके. बहुत अच्छे से याद है आपके जाने के एक महीने बाद घर के लिए बाजार से लौटते समय पहली बार ककड़ी खरीद कर लाये थे. उस समय और घर आने के दौरान बहुत बार आँखें नम हुईं. समय को कुछ और ही मंजूर था, उसी दिन हम शाम को ट्रेन एक्सीडेंट का शिकार हो गए. साल भर तक वे सभी पारिवारिक जिम्मेवारियाँ, जो हमें उठानी थीं उनको पिंटू-मिंटू ने उठाया.

 

पता नहीं समय ख़राब रहा या फिर कुछ और ही. धीरे-धीरे जब लगा कि सबकुछ सही होने जा रहा है तो मिंटू हम सबको छोड़ आपके पास चल दिया. ये भी एक तरह से हमारी ही गैर-जिम्मेवारी है, इसे हम स्वीकारते हैं. सबसे बड़े भाई होने का दम भरते रहे मगर एक छोटे भाई की समस्या को,उसकी मनोदशा को न समझ सके.

 

पता नहीं समय क्या-क्या दिखाएगा? कोशिश यही है कि जो रास्ता आपने दिखाया है, जो शिक्षा आपने दी है उसका अनुपालन कर सकें. हार-जीत के संघर्च के बीच से खुद को निकाल कर आपकी नज़रों में खुद को साबित कर सकें. कोशिश यही है कि पारिवारिक जिम्मेवारियों को निभाने में आपके जैसा बन सकें. 






 

23 फ़रवरी 2024

अइया के साथ अंतिम समय में

समय गुजरता जाता है मगर यादें नहीं गुजरती हैं. वे जहाँ कल थीं, वहीं आज भी दिखाई देती हैं. ये यादें हँसाती भी हैं, रुलाती भी हैं. इन्हीं यादों के साथ जीवन सहज-असहज तरीके से गुजरता हुआ अपनी अंतिम अवस्था तक पहुँच जाता है. यादों के केन्द्र में समाहित व्यक्ति जितना महत्त्वपूर्ण होता है, उससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं उस व्यक्ति से जुड़ी वस्तुएँ. इसका एक मुख्य कारण ये होता है कि जो व्यक्ति यादों के केन्द्र में है, वो हमें न तो दिखाई देता है और न ही उसका आभास हमें होता है. हम सभी अपनी यादों में, अपनी कल्पना में उसे याद करते हुए उसका एहसास करते रहते हैं. ऐसे में उससे जुड़ी वस्तुएँ, उसके द्वारा उपयोग किये गए सामान ही उसका स्थान ले लेते हैं, उसकी उपस्थिति का एहसास करवाते हैं.

 



कुछ ऐसी ही है ये स्केल, जिसका बहुत ज्यादा उपयोग अइया ने नहीं किया बल्कि सत्य तो ये है कि उन्होंने इसका उपयोग एक पल को भी नहीं किया मगर चंद घंटों के उपयोग के चलते यह उनसे जुड़ गई. असल में अइया को उनके घायल होने के बाद कानपुर में एक हॉस्पिटल में एडमिट करवाया गया. उनके बारे में जैसा सुनते रहे थे और देखते भी रहे थे, स्वभाव से कुछ जिद्दी थीं. इलाज के दौरान उनको विगो लगाईं जाती तो वे उसे किसी न किसी तरह से ख़राब कर देती थीं. इस कारण से उनके इलाज के दौरान चढ़ाई जाने वाली दवाएँ वगैरह उचित ढंग से उनको नहीं दी जा पा रही थीं. ऐसे में एक दिन हॉस्पिटल के डॉक्टर ने कहा कि ऐसे तो इलाज में बहुत दिक्कत आएगी, कैसे भी करके इनका विगो को डिस्टर्ब करना रोकिये. पिछले आठ-नौ दिन से लगातार विगो, इंजेक्शन लगने के कारण हॉस्पिटल के स्टाफ को भी समस्या का सामना करना पड़ रहा था.

 

अइया के द्वारा विगो को डिस्टर्ब करने की समस्या का एक हल हमने सोचा और उसे अमल में लाने का विचार बनाया. हाथ में विगो लगाने के बाद उनकी कोहनी से इसी स्केल को हमने बाँध दिया. यहाँ एक बात और आप सबको बताते चलें कि अइया के उन हॉस्पिटल में एडमिट रहने वाले दिनों में उनके सारे बेटे-बहू, नाती-नातिन उनके पास थे मगर वे सिर्फ अम्मा-पिताजी का या फिर हमारा कहना मानती थीं. इसी कारण हमने उनको समझाया और कोहनी में स्केल बाँध दी. पता नहीं समय क्या कुछ दिखाना चाह रहा था. रात को अइया के हाथों में स्केल बाँधी उसके बाद उनका बातचीत करना कुछ और कम हो गया. अपने ऊपर लगाए गए इस बंधन को उनके द्वारा पूरे चौबीस घंटे भी स्वीकार नहीं किया गया. अगले दिन के शाम होने तक अइया ने हम सबको छोड़कर बाबा जी के पास जाने का मन बना लिया.

 

फरवरी का आज का ही दिन था. उस दिन से लेकर आज तक अइया के बिना एक पल न गुजरा. उनके साथ अंतिम समय में जुड़ी इस स्केल को भी हम भुला नहीं पाए. आज भी ये स्केल हमारी किताबों की अलमारी में सुरक्षित है. पता नहीं आज के समय के हिसाब से हम क्या हैं मगर इसे देखकर लगता है कि अइया आज भी हमारे साथ हैं. 





 

वीनस तो आखिर वीनस ही है

समय ब्लैक एंड व्हाइट के ज़माने से रंगीन से गुजरता हुआ बहुरंगी होता चला गया. विकास की दौड़ में शामिल होकर श्रव्य के साथ दृश्य भी जुड़ते चले गए. एकमात्र चैनल के मनोरंजन से सजे भारी-भरकम टीवी की दुनिया असंख्य चैनलों के साथ स्लिम से स्लिम टीवी के साथ आगे बढ़ती रही. वीडियो पर कभी-कभार एकसाथ तीन-तीन, चार-चार फ़िल्में देख डालने के सुख का विकास इतना हुआ कि अब हर हाथ में मोबाइल के सहारे चौबीस घंटे का नियमित वीडियो उपलब्ध हो गया. सेल्युलाइड की दुनिया वीनस गर्ल से निकल कर धक-धक गर्ल, मिर्ची गर्ल, कांटा गर्ल, चोली गर्ल की राह से गुजरती हुई नग्न-अर्धनग्न कमनीय बालाओं के साथ लगातार आगे बढ़ती रही. विकास की राह पर किसी-किसी मामले में शून्य से आरम्भ होकर अनंत की दिशा में जाने के साथ-साथ लगातार कई-कई पीढ़ियाँ भी आती रहीं, विलीन होती रहीं. इन सबके बीच भी लोगों के स्वभाव बदले, रुचियाँ बदलीं, पसंद बदलीं, पसंदीदा व्यक्ति बदले. इस बदलाव के दौर में यदि कुछ बदलता न दिखा तो वो है प्रसिद्द अभिनेत्री मधुबाला के प्रति लोगों का आकर्षण. अपने समय में वीनस गर्ल के रूप में मशहूर मधुबाला के प्रशंसक आज भी उतने ही मिल जाते हैं, जितने कि उनके दौर में मिलते होंगे. उम्र, व्यवसाय, जाति, धर्म, कार्य, क्षेत्र से इतर आज भी मधुबाला के प्रशंसकों में कमी नहीं आई है. और ऐसा तब है जबकि उनको इस दुनिया को हमेशा-हमेशा को अलविदा कहे हुए आधी सदी से अधिक हो गए हैं.


समाज में और लोगों के बारे में क्या कहा जाए, हम जब खुद अपने को देखते हैं तो आश्चर्य होता है. हमारे इस संसार में आने के चार-पांच साल पहले मधुबाला इस संसार को अलविदा कह गई थी. हमारे समय की और उसके बाद जन्मने वाली पीढ़ी ने मधुबाला को सिर्फ परदे पर ही देखा है, टीवी पर देखा है और अब इंटरनेट के माध्यम से कई-कई सोशल मीडिया मंचों पर देख रही है. इस पीढ़ी ने कभी भी उनको लाइव रूप में नहीं देखा है, किसी कार्यक्रम में उनसे परिचय नहीं हुआ है, किसी समारोह में उनके साथ फोटो खिंचवाने का अवसर नहीं मिला है, किसी आयोजन में उनके ऑटोग्राफ लेने का मौका भी नहीं मिला है इसके बाद भी मधुबाला की मनमोहक छवि इस पीढ़ी के बीच भी जीवित है. इंटरमीडिएट तक की शिक्षा के दौरान घर-परिवार में ही रहना हुआ. उसी दौरान परिवार के अनुशासन में जितना टीवी, वीडियो देखने को मिला उसी में पुरानी फिल्मों को खूब देखने का अवसर मिला. उस समय बहुत सारे अभिनेता-अभिनेत्रियों के बीच मधुबाला सर्वाधिक आकर्षक महसूस हुईं. हँसने का अंदाज, आँखों की शरारत और उनकी अदाकारी ने उनके प्रति अजब सी दीवानगी पैदा कर दी थी. घर के अनुशासन में, छोटे से घर में कभी हिम्मत ही नहीं कर सके कि मधुबाला के पोस्टर कमरे की दीवारों पर लगा सकते किन्तु पत्रिकाओं में, अख़बारों में कभी-कभी निकलती फोटो किताबों, कापियों की शोभा बनती. किताबों, कापियों के कवर के रूप में भी कभी-कभी मधुबाला का चित्र आँखों के सामने दिखता रहता. बाद में आगे की पढ़ाई के लिए जब बाहर निकलना हुआ तब अपनी इस इच्छा को जीभर कर पूरा किया गया. हॉस्टल के अपने कमरे में अलग-अलग अंदाज में मधुबाला अवतरित होने लगीं.


हमारे घर वाले, कई रिश्तेदार, मित्र आदि हमारे इस शौक या कहिये कि दीवानगी पर खूब हँसा भी करते. खूब मस्ती भी किया करते. एक मामा जी तो यहाँ तक कहे कि बेटा कितनी भी तपस्या कर लो, अब ये न मिलने वाली. कई सारे दोस्त हमारे इस शौक पर मौज लिया करते कि शादी के बाद मधुबाला की एक फोटो भी न लगा पाओगे, पोस्टर तो बहुत बड़ी बात है. ये दीवानगी ही कही जाएगी कि आज शादी को भी चौदह साल हो गए हैं मगर कमरे में मधुबाला अपने पूरे सौन्दर्य के साथ ज्यों की त्यों उपस्थित हैं. तकनीकी दौर ने हाथों में मोबाइल पकड़ाया तो मधुबाला कमरे के साथ-साथ वहाँ भी उपस्थित रहने लगीं. संभव है कि आज की एकदम नवोन्मेषी पीढ़ी ने सौन्दर्य के प्रतिमान बदल दिए हों. उसके लिए सौन्दर्य का सम्बन्ध कम वस्त्रों से, कामुक मुद्राओं से, अर्धनग्न प्रदर्शन से, आधुनिकता के नाम पर फूहड़ता से होने लगा हो किन्तु इसके बाद भी बहुतायत में ऐसे युवा आज भी मिलते हैं जो मधुबाला के प्रशंसक हैं. आज २३ फरवरी को मधुबाला की पुण्यतिथि है. उनको श्रद्धा-सुमन इस आकांक्षा के साथ कि उनका अप्रतिम मनमोहक रूप-सौन्दर्य सदैव समाज में अंकित रहे. वीनस गर्ल के रूप में उनकी छवि और भी चमकती रहे.




 

29 अक्टूबर 2023

हर कदम पर प्रोत्साहित करते अभय अंकल

आज, 29.10.2023 को अभय अंकल की स्मृति में संगीत निशा का आयोजन वातायन, उरई द्वारा किया गया था. इस एक पंक्ति में दो-तीन शब्द हमारे ब्लॉग के पाठकों के अलावा बहुत सारे लोगों के लिए एकदम नए और अपरिचित होंगे. इसमें पहला शब्द है अभय अंकल, देश-विदेश के वे सारे लोग जो हमसे परिचित हैं, वे सहज ही अभय अंकल से समझ लेंगे कि किस व्यक्तित्व के लिए ये लिखा गया है. हमसे अपरिचित लोगों के लिए एक संक्षिप्त परिचय देना तो बनता ही है. यहाँ एक बात स्पष्ट कर दें कि यदि विस्तीर्ण परिचय देना शुरू कर दें तो यह पोस्ट बहुत ही अधिक लम्बी हो जाएगी. साइंस कॉलेज, ग्वालियर से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे उरई के दयानंद वैदिक महाविद्यालय में रक्षा अध्ययन विभाग में अध्यक्ष के रूप में कार्यरत रहे. इसके अलावा जनपद की अनेकानेक सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक संस्थाओं में पदाधिकारी के रूप में भी सक्रिय रहे. 



पहली पंक्ति में जिस दूसरे अनजान शब्द वातायन का जिक्र है, उसके जन्म के पीछे दो लोगों का महत्त्वपूर्ण योगदान है. इसमें एक तो अभय अंकल हैं ही और दूसरे थे ब्रजेश अंकल यानि कि डॉ. ब्रजेश कुमार जी. (ब्रजेश अंकल के बारे में एक पोस्ट अलग से) अभय अंकल वातायन के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में रहे. इस सांस्कृतिक संस्था द्वारा अनेकानेक नाट्य-प्रस्तुतियाँ जनपद में और जनपद के बाहर भी दी गईं. नाट्य-प्रस्तुतियों के अलावा अनेकानेक सांस्कृतिक कार्यक्रम वातायन के बैनर पर होते रहे. अभय अंकल के बारे में एक बात निर्विवाद रूप से कही जा सकती है कि वे नैसर्गिक रूप से बहुत बेहतरीन संयोजक थे. किसी भी तरह का कार्यक्रम हो, उनके द्वारा ऐसे संयोजन किया जाता मानो वह कार्यक्रम उनकी उँगलियों पर नाच रहा हो.


इस संयोजन क्षमता के पीछे उनका बुद्धि कौशल तो था ही, उससे बड़ी थी टीम भावना. यहाँ बहुत सारी बातों का जिक्र न करने स्वयं अपने अनुभव से गुजरी एक घटना का जिक्र करना चाहेंगे, जिसने सिद्ध किया कि अभय अंकल किस तरह अद्भुत नेतृत्व क्षमता से परिपूर्ण थे. वर्ष 2004 की बात है. एक दिन दोपहर में अभय अंकल का फोन आया कि तुरंत विभाग में आओ. अगले क्षण हम डीवी कॉलेज में रक्षा अध्ययन विभाग में उपस्थित थे. एक पत्र उन्होंने हमारे सामने रखते हुए कहा कि एक नेशनल सेमीनार करवाना है. तुम बताओ क्या काम करोगे इसमें? हमने कहा कि जो भी काम हमारे लायक समझें. इस पर अंकल ने कहा कि हमें पता है कि तुम सभी काम बेहतर ढंग से कर सकते हो पर जिसमें तुम्हारी रुचि हो वो बताओ. हमने पूरी बात अंकल पर ही डाल दी.


कुछ देर इधर-उधर की बातों के बाद अंकल ने कहा कि तुम स्मारिका का काम देख लो. इंकार का कोई मतलब ही नहीं था. स्मारिका पर काम अगले दिन से ही शुरू हो गया. अंकल द्वारा बस इतना बताया गया कि इस पर इतना बजट खर्च करना है और इतने पेज की बनना है. इसके बाद उनके द्वारा किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं किया गया. हम प्रतिदिन अपने काम के बारे में अंकल को बताते तो वे कहते कि जब फाइनल हो जाये तभी बताना. हमें विश्वास है कि तुम बेहतर स्मारिका निकाल दोगे. फाइनल होते-होते एक समस्या एकदम अंत में आ गई. अभय अंकल द्वारा बताये गए पेज से एक पेज अधिक हो रहा था. इसका कारण भी अभय अंकल द्वारा दिया गया सन्देश था. एक दिन बड़े झिझकते हुए उनको बताया तो बोले कि जब पूरा सम्पादकीय अधिकार तुम्हारे पास है तो झिझको नहीं, अपना काम करो. बस फिर क्या था, अभय अंकल के सन्देश पर भी सम्पादकीय कैंची चला दी गई.


उन्होंने और राजेन्द्र निगम अंकल ने स्मारिका प्रकाशित होने के ठीक एक दिन पहले उसका फाइनल रूप देखा और बहुत आशीर्वाद दिया. स्मारिका का कवर पेज, उसके अन्दर की सामग्री, उसका क्रम आदि सबकुछ हमारे द्वारा ही निर्धारित किया गया. इस पूरे काम को करके इतनी ख़ुशी मिली जो व्यक्त नहीं की जा सकती. इसका कारण काम करने की पूरी स्वतंत्रता मिलना था. इस घटना ने एक सीख दी कि यदि काम सहज रूप में सफलता के साथ पूर्ण करवाना है तो अपनी टीम पर विश्वास करते हुए उसे पूरी तरह से स्वतंत्र कर देना चाहिए. अभय अंकल द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से मिली इस सीख ने आज तक अपना असर दिखाया है. टीम के साथ किये जाने वाले कोई भी काम आजतक असफल नहीं हुए हैं.


आज उनकी स्मृति में आयोजित संगीत निशा के दौरान अभय अंकल बार-बार स्मृति-पटल पर उभरते रहे, आँखों को नम करते रहे, होंठों पर मुस्कान लाते रहे. अभय अंकल को सादर नमन. 





 

30 सितंबर 2023

मंजुल मयंक : एक ही दिन का आना-जाना

बुन्देलखण्ड सदैव से अपने रत्नों के लिए प्रसिद्ध रहा है. भले ही ये रत्न साहस, जौहर दिखाने वाले रहे हों या फिर कलम के रहे हों. ऐसे ही एक कलम के धनी रत्न मंजुल मयंक का आज, 30 सितम्बर को जन्मदिन पड़ता है. इसे संयोग ही कहा जायेगा कि इस अद्भुत गीतकार की पुण्यतिथि भी आज, 30 सितम्बर को पड़ती है.




एक से बढ़कर एक कर्णप्रिय, मधुर गीत रचने वाले मंजुल मयंक का जन्म 30 सितम्बर सन 1922 को हुआ था. उनका पूरा नाम गणेश प्रसाद खरे था, मंजुल मयंक उनका उपनाम था. कालांतर में वे इसी नाम से प्रसिद्ध हुए. उनके पिता का नाम श्री महावीर प्रसाद खरे और माता का नाम श्रीमती गोविन्द खरे था. मूलतः इलाहाबाद के रहने वाले महावीर प्रसाद जब नौकरी के लिए बुन्देलखण्ड के हमीरपुर में आये तो फिर यहीं के होकर रह गए. सन 1941 में जब मयंक जी अपनी नौकरी के सिलसिले में बाँदा पहुँचे तो यहाँ उन्हें बेढ़ब बनारसी, श्याम नारायण पाण्डेय, निराला और बच्चन आदि जैसे साहित्यकारों, कवियों को सुनने का अवसर मिला. यहीं पर उनके भीतर का कवि जागृत हुआ और उन्होंने अपनी पहली कविता सिंदूर बिन्दु की रचना की.


सन 1953 में मयंक जी बाँदा से वापस लौट आये और मौदहा आकर शिक्षा क्षेत्र से जुड़ गए. यहीं पर उनका पहला काव्य-संग्रह ‘रूपरागिनी’ प्रकाशित हुआ. तीन वर्ष तक यहाँ सेवा देने के पश्चात् वे सन 1956 में हमीरपुर लौट आये. ‘जनता ही अजन्ता है’ काव्य-संग्रह और ‘तन मन की भाँवरें’ उपन्यास उन्होंने यहीं प्रकाशित करवाए. 30 सितम्बर 2007 को मयंक जी अपने मधुर गीत, अपनी कलम की अमानत बुन्देलखण्ड की धरती पर छोड़कर सदैव के लिए दूर चले गए.


आज उनकी जन्मतिथि और पुण्यतिथि पर उनको सादर नमन  






 

17 सितंबर 2023

बाबा जी की शिक्षाओं ने रखा विवादों से दूर

साइंस कॉलेज, ग्वालियर में बी.एस-सी. में प्रवेश लेने के लिए जाने का दिन निश्चित हो गया था. जाने के कोई पाँच-छह दिन पहले अचानक से मन में आया कि गाँव जाकर बाबा-अइया से मिल आया जाये. घर पर पिताजी से गाँव जाने की अनुमति लेकर अगले दिन गाँव के लिए निकल पड़े. इससे पहले भी बहुत बार गाँव जाना हुआ था मगर निपट अकेले गाँव जाने का यह पहला मौका था. उस समय फोन, मोबाइल की व्यवस्था आज के जैसी नहीं थी कि अपने आने की जानकारी बाबा तक पहुँचा पाते, सो अचानक से हमें देखकर बाबा और अइया का चौंकना स्वाभाविक था. जमींदार परिवार से होने के बाद भी बाबा जी ने अपने छात्र जीवन में बहुत संघर्ष किया था, खुद को अपने बलबूते स्थापित किया था, सो वे हम भाइयों को आत्मनिर्भर होने के लिए प्रेरित करते रहते थे. बाबा जी को बहुत ख़ुशी हुई कि हम ग्वालियर जाने के पहले उनके पास गाँव आये, वो भी अकेले. 




तीन दिन बड़े ही ख़ुशी से गुजर गए. कहते हैं न कि ब्याज मूलधन से ज्यादा प्यारा होता है, बस कुछ यही स्थिति हमारी भी थी. अइया ने तमाम सारे पकवान, व्यंजन बनाये, बाबा जी से खूब सारी बातें हुईं. जिस दिन हमारा गाँव से उरई आने का तय हुआ, उस दिन चलने से कुछ देर पहले बाबा जी ने कहा कि चलते-चलते जरा पैर की उँगलियाँ चटका दो. बाबा जी जब उरई में हम लोगों के साथ होते तो दिन में कई-कई बार पैर की उँगलियाँ हम भाइयों से चटकवाया करते थे. पैर के पंजे को हलके हाथों से कुछ देर दबाने के बाद उँगलियों के चटकाने का नंबर आता था, उतनी देर में बाबा जी खूब सारी बातें बताया करते, कभी अपनी नौकरी की, कभी अपने बचपन की, कभी अपनी पढ़ाई की. हम लोगों को भी खूब मजा आता था सो दिन में कई-कई बार खुद ही बाबा जी से उँगलियों को चटकाने के लिए पूछ लिया करते थे.


पैर के पंजे दबाने के समय बाबा जी ने हमेशा की तरह बहुत सी बातें बताईं. उसी में उन्होंने कहा कि अब तुम उच्च शिक्षा के लिए बाहर जा रहे हो. अच्छा लगा कि बाहर जाते समय तुमको अपना गाँव याद रहा, यहाँ आने का मन बनाया. बाबा जी बोले कि हमारी एक बात हमेशा याद रखना कि अपने जीवन को बनाने के लिए ही तुम घर से बाहर जा रहे हो, जीवन को बर्बाद करने के लिए वापस आने की जरूरत नहीं. पहले तो हमारी समझ में नहीं आया कि बाबा जी आखिर किस बात के लिए कह रहे हैं. जब हमने अपनी शंका सामने रखी तो उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए कहा क्योंकि संपत्ति का मोह बहुत बुरा होता है. गाँव के ये मकान, खेत-खलिहान आदि न तुम्हारे पिताजी लेकर आये, न हम लेकर आये, न हमारे बाप-दादा लेकर आये थे. ये पुश्तैनी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को अपने आप मिलते रहे हैं. इनके लिए गाँव आकर फौजदारी करने की जरूरत नहीं. तुम्हारे पिताजी, चाचा लोगों को पढ़ा-लिखाकर बाहर इसीलिए निकाला कि अपना जीवन सुधार सकें. तुम लोग भी ऐसा करना. दुर्भाग्य से कभी कोई ऐसा करे कि वो गाँव की संपत्ति पर कब्ज़ा कर ले तो स्वाभिमान के साथ उससे कानूनी लड़ाई लड़ना, खून-खच्चर करने की जरूरत नहीं. अच्छी शिक्षा, ज्ञान की जो संपत्ति तुम लोग बनाओगे उसे कोई नहीं कब्ज़ा सकेगा और उसके बल पर तुम लोग कहीं भी इससे ज्यादा संपत्ति हासिल कर लोगे. चूँकि बाबा जी ने स्वयं लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद गाँव में अपने हिस्से की संपत्ति को हासिल किया था. उन्होंने गाँव में और अपनी पुलिस की नौकरी के दौरान उन्होंने संपत्ति के विवादों, लड़ाई-झगड़ों के दुष्परिणामों को करीब से देखा था, इस कारण वे अपने अनुभवों को हमसे बताते हुए भविष्य के लिए हमें जागरूक कर रहे थे.      


उस दिन तो बहुत सी बातें समझ में भी नहीं आईं मगर उनको दिल-दिमाग में गहरे से बैठा लिया था. समय का चक्र ऐसा घूमा कि उसके बाद बाबा जी से बहुत ज्यादा मिलना नहीं हो सका. जितना भी मिलना हुआ, बाबा जी ने उसमें इस तरह की कोई बात नहीं की. ये घटना जुलाई-अगस्त 1990 की थी और एक साल बीतते-बीतते 1991 की आज की तारीख में बाबा जी हम सबसे बहुत दूर चले गए. बाबा जी के बाद भी गाँव की पैतृक संपत्ति से सम्बंधित किसी भी मामले में हमारा सीधा हस्तक्षेप नहीं रहा किन्तु हमारे पिताजी के वर्ष 2005 में चले जाने के बाद गाँव की इस छिपी हुई वास्तविकता से सामना हुआ. एक-एक इंच जमीन को कब्जाने का लालच देखा, खेतों पर गिद्ध दृष्टि लगाये लोगों को देखा. ये तो बाबा जी की शिक्षाओं का, उनके आशीर्वाद का सुफल कहा जायेगा कि बहुत सी विषम स्थितियों से आराम से निकल आये.


आज बाबा जी हम सबसे दूर हुए 32 वर्ष हो गए हैं, दो दिन बाद हम भी 50 का आँकड़ा छू लेंगे किन्तु अभी भी गाँव की पैतृक संपत्ति को बिना किसी विवाद के, बिना किसी लड़ाई-झगड़े के सुरक्षित रखे हुए हैं. यही कामना करते हैं कि ज़िन्दगी भर बाबा जी की, अइया की शिक्षाओं का पालन कर सकें, उनके दिखाए रास्ते पर चल सकें.


आज बाबा जी की पुण्यतिथि पर उनको सादर नमन. 






 

16 मार्च 2023

पिताजी के साथ स्मृति यात्रा

कुछ तारीखें ऐसी होती हैं जिनको लाख कोशिशों के बाद भी भुलाना संभव नहीं होता है. वे तारीखें अपने आप सम्बंधित घटनाओं को किसी चलचित्र की तरह आँखों के सामने रख देती हैं. हमारे अपने जीवन में ऐसी कोई एक-दो नहीं बल्कि बहुत सारी तारीखें हैं, जिनको चाह कर भुलाया नहीं जा सकता और यदि भूलने की कोशिश भी करते हैं तो उनको भूल नहीं पाते हैं. ऐसी ही अनेक तारीखों की तरह आज, 16 मार्च की तारीख है. आज के दिन हमारे सिर से पिताजी का साया हमेशा के लिए हट गया था. सामान्य परम्परा में यह मन को संतुष्टि देने वाली बात होती है कि पिताजी भले ही शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, पर वे आत्मिक रूप में हमारे साथ हैं. यह सोच, यह मानसिकता खुद को कमजोर होने से बचाती है.


बहरहाल, पिताजी का जाना हमारे लिए गहरी चोट जैसा था. खुद को नवजीवन की राह पर उतारे अभी महज एक वर्ष ही बीता था, अभी खुद ही जिम्मेवार होने जैसा कोई एहसास अपने में जगा नहीं पाए थे कि बहुत बड़ी जिम्मेवारी हमारे कंधों पर आ गई थी. विगत 18 सालों में कोई दिन ऐसा नहीं बीता कि पिताजी की कमी को महसूस न किया हो, इसके साथ ही किसी न किसी रूप में उनको अपने साथ बने रहने का भाव भी बनाये रखा है. उनके न होने के भाव ने जहाँ बहुत बार भावनात्मक रूप से कमजोर किया तो उनके साथ रहने के भाव ने आत्मविश्वास बनाये रखा.


बहुत कुछ सोचा था पिताजी के बारे में लिखने को मगर आँखों के धुँधलेपन ने ऐसा करने नहीं दिया. बैठे-बैठे तमाम एल्बम, अनेक फोटो देखकर बीते दिनों को याद कर लिया गया. अब फोटो के रूप में बस यही यादें शेष हैं, बस यही यादें ही साथ हैं. 




























 

19 नवंबर 2022

अल्पायु में बनी क्रांति मशाल

खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी, ये कविता आज भी रानी लक्ष्मीबाई की वीरता की कहानी सुनाती है। वास्तव में अंग्रेजों के सामने घुटने न टेक, मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी का घोष कर रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए। वाराणासी में जन्मी मणिकर्णिका के रानी लक्ष्मीबाई बनने की गाथा भी उनके कार्यों की तरह अविस्मरणीय है। रानी लक्ष्मीबाई कही जाने वाली मनु का जन्म 19 नवम्बर 1835 को काशी में एक महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम मोरोपन्त ताम्बे और माता का नाम भागीरथी बाई था। मोरोपन्त मराठा बाजीराव की सेवा करते थे। उनके पारिवारिक संरक्षण में ही मनु ने बचपन में ही शस्त्र और शास्त्र, दोनों की ही शिक्षा ली। इस दौरान लोग उन्हें प्यार से ‘छबीली’ के नाम से भी पुकारने लगे। 

 

पन्द्रह वर्ष की आयु में, सन 1850 में मणिकर्णिका का विवाह झाँसी के महाराजा गंगाधर राव के साथ हुआ। यहीं आने के बाद वे मनु या मणिकर्णिका से झाँसी की रानी बन गयी। विवाह पश्चात उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। ये शायद दैवीय विधान कहा जाये या कि नियति का खेल कि विवाह के एक वर्ष पश्चात लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसकी चार माह पश्चात ही मृत्यु हो गयी। इस दुख के सदमे के कारण राजा अस्वस्थ रहने लगे। इसी के चलते बाद में 21 नवम्बर 1853 को राजा गंगाधर राव का निधन हो गया। एक तरफ झाँसी शोक में डूबी थी और दूसरी तरफ अंग्रेज उसे हड़पने का मन बनाये थे। इसीलिए अंग्रेजों द्वारा चाल चलते हुए रानी लक्ष्मीबाई द्वारा 20 नवम्बर 1853 को गोद लिए बालक दामोदर राव को रानी लक्ष्मीबाई का वारिस मानने से इंकार कर दिया।

 



अंग्रेजों ने झाँसी पर चढ़ाई कर दी। रानी ने भी ईंट का जवाब पत्थर से देते हुए अंग्रेजों को सा़फ कह दिया ‘मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी’। उधर 1857 के विद्रोहियों ने सदर बा़जार स्थित किले पर कब़्जा कर लिया। अपनी मौत से भागते हुए झाँसी में मौजूद सभी अंग्रे़जों ने झाँसी के मुख्य किले में शरण ली। इस संघर्ष में 61 अंग्रेजों को मौत के घाट उतारा गया। 6 जून से 8 जून 1857 तक चले इस संघर्ष में कैप्टन डनलप, लेफ्टिनेण्ट टेलर और कैप्टन गॉर्डन मारे गये। कैप्टन स्कीन ने बचे हुए अंग्रे़ज सैनिकों सहित विद्रोहियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इस घटना के बाद 12 जून 1857 को रानी लक्ष्मीबाई ने एक बार फिर झाँसी राज्य का प्रशासन संभाला। 

 

अंग्रेज अपनी हार को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे। उनका जनरल ह्यूरो़ज आखिरकार बदला लेने की नीयत से 21 मार्च 1858 को झाँसी आ पहुँचा। यहाँ 21 मार्च से 3 अप्रैल उसका  रानी के साथ घनघोर युद्ध हुआ। युद्ध जब चरम पर पहुँच गया था किन्तु रानी को जीत सुनिश्चित नहीं दिख रही थी। उनके कुछ अपने लोगों ने विश्वासघात करके अंग्रेजों को अवसर दे दिया। अपने सलाहकारों की सलाह से रानी लक्ष्मीबाई 03 अप्रैल 1858 को आधी रात के बाद अपने अतिनिकट और विश्वस्त सैनिकों के साथ कालपी की ओर रवाना हुई। अंग्रेज सैनिकों ने उनका पीछा किया, पर वे हाथ नहीं आयीं। 

 

कालपी से युद्ध की स्थिति में ही रानी ग्वालियर पहुंची। यहाँ के किले पर कब्जा करने के बाद उनका युद्ध अंग्रेजों से फिर शुरू हुआ। यहाँ भी रानी के भयंकर प्रहारों से अंग्रे़जी सेना को पीछे हटना पड़ा। युद्ध के विषम क्षणों में रानी लक्ष्मीबाई अपने दत्तक पुत्र को अपनी पीठ पर बाँध कर किले से कूद पड़ी। उनको पकड़ने की नीयत से जनरल ह्यूरो़ज स्वयं युद्धभूमि में डटा हुआ था। अंग्रेजों को लगातार परास्त करती रानी ने जब सोनरेखा नाले को पार करना चाहा तो दुर्भाग्यवश उनका घोड़ा इस नाले को पार नहीं कर सका। वह वहीं अड़ा रहा। उसी समय पीछे से एक अंग्रे़ज सैनिक ने रानी पर तलवार से हमला कर दिया। इस हमले में उनको गम्भीर चोट आई। इस कारण मात्र 23 वर्ष की आयु में 18 जून 1858 को वे वीरगति को प्राप्त हुई। कहते हैं उनके सैनिक साथी उनको घायलावस्था में बाबा गंगादास की कुटिया में ले गये। यहीं रानी लक्ष्मीबाई का प्राणान्त हुआ था। इसी स्थान पर उनका अन्तिम संस्कार किया गया। 

 

अल्पायु में वे संघर्ष की चेतना ना केवल बुन्देलखण्ड में जगा गईं बल्कि महिलाओं को भी जगा गईं। रानी का बलिदान अमर है और बरसों तक सभी को आलोकित करता रहेगा।





 

04 सितंबर 2022

मोना अंकल की यादें

कुछ रिश्ते किसी तरह के नामकरण से मुक्त दिल के करीब होते हैं, दिल से बने होते हैं. ऐसे ही रिश्ते की डोर से हम सबको बाँधे हुए थे हमारे मोना अंकल. जी हाँ, सामाजिक रूप में ‘मोना भाईसाहब के रूप में ख्याति प्राप्त श्री सुरेन्द्र सिंह जी को हम तीनों भाई मोना अंकल ही पुकारते रहे हैं. पिताजी से उनकी बहुत ज्यादा घनिष्टता रही और हमारे मामा लोगों को वे भाई की तरह मानते रहे. पिताजी से उम्र में बड़े होने के कारण मोना अंकल उनका नाम लेते थे और मामा जी से रिश्ता होने के कारण अम्मा जी को छोटी बहिन जैसा मानते हुए पैर छूते थे. ऐसे में बचपन में हम भाइयों के सामने बड़ी समस्या थी मोना अंकल को किस रिश्ते से पुकारा जाये. इसका भी समाधान करते हुए उन्होंने अंकल संबोधन को पास कर दिया, जिसमें ताऊजी और मामाजी दोनों शामिल थे. उनको अंकल भले पुकारते रहे मगर मोना अंकल की धर्मपत्नी ने मामी के अलावा कोई और संबोधन स्वीकार नहीं किया. मोना अंकल राजमाता श्रीमती विजयाराजे सिंधिया के छोटे भाई थे. हमारे परिवार का अत्यंत निकट का सम्बन्ध होने के कारण बचपन से ही घर आना-जाना हुआ करता था. जब कभी राजमाता का आना होता तो पिताजी के साथ हमारा भी यदाकदा जाना होता. वे बुआ कहलवाना पसंद करती थीं.




उनकी इंटरनेशनल ट्रैक्टर की एजेंसी हुआ करती. उसके और कभी-कभी अपनी जमीन आदि की कानूनी सलाह के लिए मोना अंकल का अक्सर घर आना हुआ करता था. उन दिनों वे विल्ली की जीप खुद चलाकर आया करते थे. वापस जाने पर हम भाइयों को जीप में बिठाकर दो-चार किमी का चक्कर लगवाना जैसे उनका नियम था. सिर पर गोल कैप, चेहरे पर मोहक मुस्कान उनकी पहचान हुआ करती थी. राजकीय इंटर कॉलेज में अपनी पढ़ाई के दौरान अपने मित्रों पर रोब गाँठने के चक्कर में हम उनको लेकर आये दिन कॉलेज के सामने बनी अंकल की ट्रैक्टर एजेंसी चले जाया करते थे.


जो स्नेह, दुलार, प्यार अंकल से, मामी से मिलता रहा वही स्नेह उस घर में भाइयों और भाभियों से मिलता है. ये किसी के लिए भी बहुत सौभाग्य की बात होती है कि तीन पीढ़ियों से किसी परिवार से स्नेह-सूत्र जुड़ा हुआ है. आज मोना अंकल के अनंत-यात्रा को प्रस्थान कर जाने की खबर मिली तो भीतर से बहुत कुछ समाप्त होता सा लगा. बहुत सारी बातें, उनकी सादगी, पिताजी पर उनका विश्वास, हम भाइयों पर उनका स्नेह आदि जाने कितना कुछ याद आया. कहा जाये तो अपने आपमें एक युग का अवसान हो गया आज. अब बस उनकी यादें शेष हैं, उन सुहाने दिनों की बातें शेष हैं.


अंकल को सादर नमन. 




 

28 मई 2022

वीर सावरकर और सेलुलर जेल की कोठरी

घूमने का शौक बचपन से रहा है. भले ही देश में भी बहुत सारी जगहों पर घूमना न हो पाया हो मगर अपने आसपास घूम कर अपने शौक को पूरा कर लिया करते हैं. ये तो घूमने वाली एक बात हुई मगर दूसरी बात ये कि देश के बहुत सारे स्थानों को देखने की इच्छा रही है, अभी भी है. ऐसी ही जगहों में एक जगह सेलुलर जेल हुआ करती थी. बचपन से पढ़ाई के दौरान, परिवार से मिलती जानकारी के कारण से अंडमान निकोबार द्वीप समूह को काला पानी के नाम से ही पहचानते थे. उसमें भी उस काला पानी में सेलुलर जेल का नाम सुन रखा था. बचपन में तो नहीं मगर जैसे-जैसे समझ आती रही, बचपन की पकड़ से बाहर आते रहे, सेलुलर जेल को देखने की, वहाँ की मिट्टी को माथे लगाने की इच्छा बलबती होती रही. कालांतर में वीर सावरकर जी के बारे में पढ़ने को मिला तो न केवल सेलुलर जेल को बल्कि उस कोठरी को भी नमन करने का मन होने लगा जहाँ वीर सावरकर को कैद किया गया था. 


समय गुजरता रहा, मन में अंडमान निकोबार जाने की, सेलुलर जेल दर्शन की अभिलाषा और विकट रूप धारण करती रही. आखिरकार एक दिन ऐसा आ ही गया कि अंडमान निकोबार जाने का, पोर्ट ब्लेयर की धरती छूने का, सेलुलर जेल की मिट्टी को माथे लगाने का सुअवसर आ ही गया. दिल्ली से उड़े हवाई जहाज ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस एयरपोर्ट के दर्शन करवाते हुए वीर सावरकर एयरपोर्ट पर उतार दिया. हवाई जहाज से बाहर आने पर वीर सावरकर जी का नाम देखकर सिर स्वतः ही उनके प्रति श्रद्धा से झुक गया.


अपने छोटे भाई के घर पहुँचने के बाद सबसे पहले सेलुलर जेल के दर्शन किये गए. जेल की सभी जगहों को अपने हिसाब से देखा, उनका एहसास किया गया. सेलुलर जेल अपनी जिस मूल स्थिति में थी, अब वैसी नहीं है. मूल रूप में यह जेल सात शाखाओं में बनाई गई थी. बाद में इसकी चार शाखाएँ स्थानीय लोगों द्वारा ही नष्ट कर दी गईं. अब इस जेल की कुल सात शाखाओं में से केवल तीन शाखाएँ शेष बची हुई हैं.


सेलुलर जेल का मॉडल 

तीन मंजिल की इस जेल का नाम सेलुलर जेल रखने के पीछे का कारण इसका रूप-विन्यास भी है. इसमें प्रत्येक शाखा में कई-कई कोठरियाँ हैं. सभी कोठरी इस तरह से बनी हैं कि किसी कोठरी में कैद व्यक्ति दूसरी कोठरी को नहीं देख सकता था. एक सेल की तरह से बने होने के कारण इसे सेलुलर जेल कहा गया. इसी में एक मंजिल पर सीढ़ी के पास ही वीर सावरकर सेल की पट्टिका लगी हुई है. जब हम लोग यहाँ घूम रहे थे तो इस जेल में शेष बची इमारत की कोठरियों के एक जैसे दिखने के कारण वीर सावरकर सेल वाली पट्टिका देखने के बाद उस तरफ जाना हुआ. ये सुन-पढ़ रखा था कि वीर सावरकर को इसी जेल की किसी कोठरी में कैद किया गया था. 


एक सेल के किनारे पर लगी इस पट्टिका के बारे में जानकारी करने के बाद मालूम हुआ कि इसी मंजिल पर वीर सावरकर को एक कोठरी में कैद करके रखा गया था. ऐसा मालूम पड़ते ही एक सिरहन सी पूरे शरीर में दौड़ गई. पैर ऐसा महसूस होने लगे जैसे उनमें शक्ति बची न हो. जैसा पढ़ते आये थे, उसका ध्यान अचानक से आते ही आँखों के सामने अँधेरा जैसा समझ आने लगा. अपने आपको एक पल में संयत करके उस कोठरी के दर्शन करने को कदम बढ़ाये जहाँ वीर सावरकर ने अपना लम्बा जीवन व्यतीत किया था. हम लोग पूरी श्रद्धाभाव से, तन-मन में सिरहन लिए, आँखों में पानी लिए सेलुलर जेल के कोने-कोने को जैसे आत्मसात करने के लिए घूम रहे थे. ऐसी स्थिति में जब उस कोठरी के सामने पहुँचे जहाँ वीर सावरकर को कैद में रखा गया था तो आँखों से आँसू स्वतः ही बह निकले. सभी कोठरियों में सामान्य एक गेट था मगर वीर सावरकर की कोठरी को दो फाटकों से बंद किया गया था. तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों को इतने से भी संतोष नहीं था, उन्होंने वीर सावरकर को डराने, भयभीत करने के लिए ऐसी कोठरी में रखा था जो फाँसीघर के सबसे नजदीक थी. उन अंग्रेजों का मानना था कि फाँसी लगाए जाने के दौरान आती चीखों से घबराकर किसी दिन वीर सावरकर भी टूट जायेंगे.


सावरकर कोठरी, इसे दो फाटकों से बंद किया गया था 

इसी शाखा में सबसे अंत में है कोठरी सावरकर जी जहाँ कैद रखे गए 

वीर तो वीर ही होता है और सावरकार तो वास्तविक में वीर थे, जिन्होंने सेलुलर जेल से भाग निकलने का दुस्साहस किया. भारतीय इतिहास में वे एकमात्र व्यक्ति हैं जिनको दो बार काला पानी की, सेलुलर जेल की सजा दी गई. ये भी तथ्य बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि इतिहास में वे ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिनके साथ उनके भाई को भी सेलुलर जेल में सजा काटने भेजा गया था. आश्चर्य देखिये कि एक ही जेल में बंद दो भाइयों को महीनों तक इसकी जानकारी ही नहीं हुई कि दो सगे भाई एकसाथ एक ही जेल में सजा काट रहे हैं.


वीर सावरकर जी की कोठरी में कुछ समय बिताने के बाद, उनकी फोटो के सामने अपनी मनोभावनाओं को प्रकट करने के बाद भी वहाँ से जाने का मन नहीं कर रहा था. दिल में, मन में अत्यंत श्रद्धाभाव लेकर, सावरकर जी के प्रति, तमाम वीर सेनानियों के प्रति कृतज्ञता भाव लेकर, उनका आशीष लेकर हम लोग वास्तविक धाम के, क्रांतिधाम के दर्शन करके घर लौट आये. हमारा अपना व्यक्तिगत विचार ये है कि देश भर के किसी व्यक्ति को अपने जीवन में भले ही अपने धार्मिक स्थल के दर्शन का अवसर न मिले मगर एक बार सेलुलर जेल के, इस क्रांतिधाम के दर्शन अवश्य करने चाहिए.


वीर सावरकर जी को उनकी जन्मतिथि पर सादर नमन. 


सावरकर कोठरी में 

सेलुलर जेल के सामने बने पार्क में 




06 मई 2022

नमन संजू भैया

 


परिवार को एक और आघात. जिस तरह की घटनाएँ कभी सोची भी न हों, कभी सपने में भी उस तरह की घटनाओं का आना न हो वैसी परिवार में वास्तविकता में घटित हो जाएँ तो मन व्यथित रहता है. बस, कुछ कहने का मन नहीं. विगत एक वर्ष से लगातार किसी न किसी रूप में आघात पहुँच रहा है, भावनात्मक रूप से कमजोर हो रहे हैं.

नमन संजू भैया.


16 मार्च 2022

जो जगह चले गए हो खाली छोड़ कर

समय कितनी तेजी से भाग रहा है, इसका अंदाजा सामान्य रूप में नहीं होता है. जैसे ही कोई अवसर विशेष की बात हो, किसी यादगार दिन की बात हो, किसी पारिवारिक घटना की चर्चा हो, किसी स्मृति के सम्बन्ध में कोई दिन याद किया जाये (भले ही ऐसा सुखद अथवा दुखद घटना के रूप में हो) तो समझ आता है समय का भागना, बहुत ज्यादा गति से भागना.


आज 16 मार्च है. इस तारीख को भुला पाना संभव ही नहीं है. आज काल-गणना में समझ आई काल की गति. देखते-देखते सत्रह वर्ष गुजर गए, और आँखों के सामने सबकुछ वैसे ही ताजा है जैसे वर्ष 2005 में था. एक-एक फोन, एक-एक शब्द, एक-एक घटना, एक-एक व्यक्ति सबकुछ. कुछ भी आँखों से ओझल नहीं है, सिवाय पिताजी के.


बहरहाल, किया भी क्या जा सकता था, अब किया भी क्या जा सकता है? किसी समय पिताजी को याद करते हुए चंद लाइन लिख गईं थीं, वे ही आज की पोस्ट में पिताजी को समर्पित हैं.



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26 फ़रवरी 2022

क्रांतिधाम सेलुलर जेल और वीर सावरकर के दर्शन

घूमने का, फोटोग्राफी का शौक बचपन से रहा है. ये और बात है कि देशकाल, परिस्थिति के कारण बहुत सारी जगहों पर बहुत घूमना न हुआ मगर आसपास की जगहों पर खूब घूमना होता रहा. तमाम सारी जगहों के बारे में पढ़ने-देखने के कारण बहुत सी जगहों को देखने का, वहाँ के बारे में जानने-लिखने का, उसकी फोटोग्राफी खुद करने का बहुत मन हुआ करता था. ऐसी ही जगहों में एक जगह सेलुलर जेल हुआ करती थी. बचपन से पढ़ाई के दौरान, परिवार से मिलती जानकारी के कारण से अंडमान निकोबार द्वीप समूह को काला पानी के नाम से ही पहचानते थे. उसमें भी उस काला पानी में सेलुलर जेल का नाम सुन रखा था. बचपन में तो नहीं मगर जैसे-जैसे समझ आती रही, बचपन की पकड़ से बाहर आते रहे, सेलुलर जेल को देखने की, वहाँ की मिट्टी को माथे लगाने की इच्छा बलबती होती रही. कालांतर में वीर सावरकर जी के बारे में पढ़ने को मिला तो न केवल सेलुलर जेल को बल्कि उस कोठरी को भी नमन करने का मन होने लगा जहाँ वीर सावरकर को कैद किया गया था. 


समय गुजरता रहा, मन में अंडमान निकोबार जाने की, सेलुलर जेल दर्शन की अभिलाषा और विकट रूप धारण करती रही. आखिरकार एक दिन ऐसा आ ही गया कि अंडमान निकोबार जाने का, पोर्ट ब्लेयर की धरती छूने का, सेलुलर जेल की मिट्टी को माथे लगाने का सुअवसर आ ही गया. दिल्ली से उड़े हवाई जहाज ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस एयरपोर्ट के दर्शन करवाते हुए वीर सावरकर एयरपोर्ट पर उतार दिया. हवाई जहाज से बाहर आने पर वीर सावरकर जी का नाम देखकर सिर स्वतः ही उनके प्रति श्रद्धा से झुक गया.


अपने छोटे भाई के घर पहुँचने के बाद सबसे पहले सेलुलर जेल के दर्शन किये गए. जेल की सभी जगहों को अपने हिसाब से देखा, उनका एहसास किया गया. सेलुलर जेल अपनी जिस मूल स्थिति में थी, अब वैसी नहीं है. मूल रूप में यह जेल सात शाखाओं में बनाई गई थी. बाद में इसकी चार शाखाएँ स्थानीय लोगों द्वारा ही नष्ट कर दी गईं. अब इस जेल की कुल सात शाखाओं में से केवल तीन शाखाएँ शेष बची हुई हैं.


सेलुलर जेल का मॉडल 

तीन मंजिल की इस जेल का नाम सेलुलर जेल रखने के पीछे का कारण इसका रूप-विन्यास भी है. इसमें प्रत्येक शाखा में कई-कई कोठरियाँ हैं. सभी कोठरी इस तरह से बनी हैं कि किसी कोठरी में कैद व्यक्ति दूसरी कोठरी को नहीं देख सकता था. एक सेल की तरह से बने होने के कारण इसे सेलुलर जेल कहा गया. इसी में एक मंजिल पर सीढ़ी के पास ही वीर सावरकर सेल की पट्टिका लगी हुई है. 


जानकारी करने के बाद मालूम हुआ कि इसी मंजिल पर वीर सावरकर को एक कोठरी में कैद करके रखा गया था. हम लोग पूरी श्रद्धाभाव से, तन-मन में सिरहन लिए, आँखों में पानी लिए सेलुलर जेल के कोने-कोने को जैसे आत्मसात करने के लिए घूम रहे थे. ऐसी स्थिति में जब उस कोठरी के सामने पहुँचे जहाँ वीर सावरकर को कैद में रखा गया था तो आँखों से आँसू स्वतः ही बह निकले. सभी कोठरियों में सामान्य एक गेट था मगर वीर सावरकर की कोठरी को दो फाटकों से बंद किया गया था. तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों को इतने से भी संतोष नहीं था, उन्होंने वीर सावरकर को डराने, भयभीत करने के लिए ऐसी कोठरी में रखा था जो फाँसीघर के सबसे नजदीक थी. उन अंग्रेजों का मानना था कि फाँसी लगाए जाने के दौरान आती चीखों से घबराकर किसी दिन वीर सावरकर भी टूट जायेंगे.


सावरकर कोठरी, इसे दो फाटकों से बंद किया गया था 

इसी शाखा में सबसे अंत में है कोठरी सावरकर जी जहाँ कैद रखे गए 

वीर तो वीर ही होता है और सावरकार तो वास्तविक में वीर थे, जिन्होंने सेलुलर जेल से भाग निकलने का दुस्साहस किया. भारतीय इतिहास में वे एकमात्र व्यक्ति हैं जिनको दो बार काला पानी की, सेलुलर जेल की सजा दी गई. ये भी तथ्य बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि इतिहास में वे ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिनके साथ उनके भाई को भी सेलुलर जेल में सजा काटने भेजा गया था. आश्चर्य देखिये कि एक ही जेल में बंद दो भाइयों को महीनों तक इसकी जानकारी ही नहीं हुई कि दो सगे भाई एकसाथ एक ही जेल में सजा काट रहे हैं.


वीर सावरकर जी की कोठरी में कुछ समय बिताने के बाद, उनकी फोटो के सामने अपनी मनोभावनाओं को प्रकट करने के बाद भी वहाँ से जाने का मन नहीं कर रहा था. दिल में, मन में अत्यंत श्रद्धाभाव लेकर, सावरकर जी के प्रति, तमाम वीर सेनानियों के प्रति कृतज्ञता भाव लेकर, उनका आशीष लेकर हम लोग वास्तविक धाम के, क्रांतिधाम के दर्शन करके घर लौट आये. हमारा अपना व्यक्तिगत विचार ये है कि देश भर के किसी व्यक्ति को अपने जीवन में भले ही अपने धार्मिक स्थल के दर्शन का अवसर न मिले मगर एक बार सेलुलर जेल के, इस क्रांतिधाम के दर्शन अवश्य करने चाहिए.


वीर सावरकर जी को उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन. 


सावरकर कोठरी में 

सेलुलर जेल के सामने बने पार्क में