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30 सितंबर 2021

विश्वास से निकलती विकास की राह

किसी भी देश की, समाज की मजबूती के लिए आर्थिक पक्ष का, सामरिक पक्ष का सशक्त होना जितना महत्त्वपूर्ण है उससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण वहाँ के नागरिकों के मध्य आपसी सामंजस्य का बना होना है. नागरिकों की सामंजस्यता, समन्वय से ही सफलता-उन्नति के मानक निर्धारित होते हैं. विदेशी संबंधों में भी किसी भी देश की साख उसके नागरिकों की जीवन-शैली, उनकी सामाजिकता, उनके आपसी व्यवहार, सद्भाव पर भी निर्भर करती है. देश के मानवीय और समन्वयपूर्ण माहौल को देखकर ही न केवल आंतरिक सशक्त बढ़ती है वरन विदेशी निवेश, पर्यटन को बढ़ावा मिलता है. इससे जहाँ देश की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है, वहीं देश के नागरिकों को रोजगार के अवसर मिलते हैं.


नागरिकों के आपसी समन्वय, भाईचारे की भावना को एकसूत्र में बाँधने का कार्य उनके बीच का विश्वास करता है. इधर देखने में आया है कि मानवीय समाज जितनी तेजी से उन्नति करता जा रहा है उसी तेजी से उनके बीच अविश्वास का माहौल बढ़ता जा रहा है. इस अविश्वास के कारण लोगों को आपस में बातचीत करने में डर लगने लगा है. साथ जाने का डर, साथ बैठने का डर, बाज़ार जाने में डर, ऑफिस में डर, बस में डर, घूमने में डर, घर में डर. हर तरफ बढ़ते इस डर-भय का कारण हम सभी के बीच पनपता अविश्वास है.


भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल समाज रिश्तों की मर्यादा को भुलाता जा रहा है. प्रगतिशीलता के नाम पर कुतर्कों को रखा जा रहा है. फैशन के नाम पर अश्लीलता फैलाई जा रही है. मनोरंजन के नाम पर नग्नता को दिखाया जा रहा है. अभिभावकों और बच्चों के बीच विश्वासपूर्ण सम्बन्ध में नकारात्मकता आई है. पति-पत्नी के आपसी विश्वास में गिरावट आ रही है. शासन-प्रशासन, सरकार-जनता, चिकित्सक-मरीज, शिक्षक-शिक्षार्थी आदि के साथ विभिन्न ताने-बाने को अविश्वास का शिकार होना पड़ रहा है. यही अविश्वास रिश्तों की गरिमा को तार-तार कर रहा है. महिलाओं-बच्चियों के प्रति आपराधिक प्रवृत्ति को जन्म दे रहा है. युवाओं में भटकाव पैदा कर उनको अपराध की दिशा में ले जा रहा है.


ऐसे अविश्वास के माहौल में जहाँ व्यक्ति कमजोर होता है वहीं समाज और देश भी कमजोर होता है. ऐसे में आपसी विश्वास को बढ़ाने की जरूरत है जिसके लिए किसी बिल की नहीं, किसी अध्यादेश की नहीं वरन भाईचारे की, स्नेह की, प्रेम की, विश्वास की आवश्यकता है. आने वाली पीढ़ी को यदि सभ्य समाज देना है; भविष्य को स्वर्णिम बनाये रखना है; रिश्तों के मध्य तनावरहित सम्बन्ध स्थापित करना है; सामाजिक मान्यताओं को बचाए रखना है, देश को सशक्त बनाना है तो बहुत तेजी से फैलते जा रहे अविश्वास को जड़ से समाप्त करना ही होगा.



दिनांक 30 सितम्बर 2021 के दैनिक जागरण, कानपुर के संस्कारशाला कॉलम में उक्त विचार प्रकाशित किये गए.

14 सितंबर 2021

अपनी भाषा का सम्मान रहे

हिन्दी दिवस का आयोजन बहुत से लोगों के लिए महज एक औपचारिकता सी है. इस औपचारिकता में लोग भूल जाते हैं कि यह दिवस हिन्दी के लिए है न कि हिन्दी साहित्य के लिए. आज सुबह-सुबह ही एक सज्जन मिल गए. उन्होंने हिन्दी दिवस की शुभकामनायें दी तो हमने भी जवाब में उनको शुभकामना बोल दिया. इस पर वे बड़े ही आत्ममुग्ध भाव से बोले कि न, ये हमारा दिन नहीं बल्कि आपका दिन है. हम तो साइंस वाले आदमी हैं. हमारा हिन्दी से क्या काम?


उनको ये बताते हुए कि हम भी साइंस वाले आदमी हैं, समझाया कि आपने अभी जो गर्वोक्ति की है वो किस भाषा में की? बस इसी भाषा को बोलने वालों का दिन है ये.


इस पर उनको ऐसा अनुभव हुआ जैसे कि किसी बहुत बुरी स्थिति में ला खड़ा कर दिया हो. उनके चेहरे की भाव-भंगिमा से लगा कि वे अपने आपको हिन्दी वाला आदमी बताये जाने पर अपमानित महसूस कर रहे हैं.


जब भी हिन्दी भाषी व्यक्तियों के साथ में इस तरह की मानसिकता जन्म लेगी, हिन्दी का विकास नहीं हो सकता. हिन्दी ही क्या किसी भी भाषा को बोलने, लिखने, पढ़ने वाले जब निम्न स्तर की मानसिकता लेकर समाज में कार्य करेंगे, उस भाषा का विकास होना कठिन है.


बहरहाल, हिन्दी दिवस पर हमारे कुछ विचार अपने मित्रों सहित प्रकाशित हैं. उनको पढ़िए और प्रयास करिए कि हिन्दी के विकास में अपना कुछ योगदान कर सकें.




09 सितंबर 2020

विचार थोपना प्राथमिकता में है

जैसे-जैसे हमें अपनी वैचारिकी के प्रसार-प्रचार के माध्यम मिलते जा रहे हैं, वैसे-वैसे हमारे आसपास संकुचन की स्थिति बनती जा रही है. विचारों का प्रसार करने के साथ-साथ हम सभी लोगों के मन में भावना बनी रहती है कि हमारे उन विचारों को स्वीकारने वाले अधिक से अधिक लोग हों. इसी के साथ एक दूसरी स्थिति भी बनती है जो अमूमन स्पष्ट रूप से दिखाई देने के बाद भी छिपी सी रहती है. यह स्थिति होती है कि कुछ भी हो हमारे ही विचारों को स्वीकारना है. स्वीकारने जैसी अवस्था कब थोपे जाने में बदल जाती है पता ही नहीं चलता है. विचारों के प्रस्फुटन से लेकर उसके थोपे जाने तक का जो विकास मानव जाति ने किया है वह अत्यंत विलक्षण कहा जायेगा. यह शायद ही कोई अस्वीकार करे कि इसके पीछे सोशल मीडिया का और लगभग मुफ्त जैसे इंटरनेट का हाथ है.


इंटरनेट की मुफ्त जैसी हालत और सोशल मीडिया के न के बराबर चलन वाले ज़माने में लोगों के विचारों को, उसकी बातों को ज्ञान का आधार समझा जाता था. यह स्वतः ही मान लिया जाता था कि किसी भी व्यक्ति द्वारा व्यक्त किये जा रहे विचार, लोगों के सामने आता ज्ञान उसके अनुभव का, उसकी शिक्षा का सुफल है. इसे किसी गूगल बाबा के द्वारा जन्मा नहीं समझा जाता था, किसी का कॉपी-पेस्ट किया हुआ नहीं बताया जाता था. सामाजिक स्थितियों में आते परिवर्तन के साथ शिक्षा में, वैचारिकी में भी व्यापक परिवर्तन देखने को मिले. विचारों पर किसी का आधिपत्य सा नहीं रह गया. ज्ञान, जानकारी, तकनीक आदि के प्रसार के लिए यह बहुत अच्छा संकेत था मगर इसी के पीछे-पीछे जो शंकाएँ चली आ रही थीं, वे छिपी न रहीं.


अब ज्ञान के लिए, विचारों के लिए, तकनीक के लिए किसी तरह के स्व-अनुभव की आवश्यकता नहीं. किसी तरह के स्व-अध्ययन की कोई आवश्यकता नहीं बस इंटरनेट की कृपा से घूम-टहल कर बस इतना देखना है कि खुद के मन की बात कहाँ लिखी हुई है. उसे कॉपी करना है और अपना बताकर दूसरों तक पहुँचाना है. यहाँ तक तो शायद ठीक भी रहता मगर हद तो तब हो गई जबकि विचारों को जबरिया मानने के लिए बाध्य किया जाने लगा. अगले ने जो लिखा है वही परम सत्य है, उसके आगे कुछ नहीं. यदि उसकी बात को काटा जा रहा है, उस पर किसी तरह की तार्किक बात की जा रही है तो विश्व युद्ध जैसी स्थिति बनी मानिए. विचारों के सन्दर्भ में उठा विमर्श कहिये आपकी निजी, व्यक्तिगत बातों तक पहुँच जाए. कहिये खुद के बारे में ऐसी-ऐसी बातें सुनाई पड़ जाएँ जो खुद को भी ज्ञात न हों. विचारों के प्रस्फुटन की तीव्रता के साथ इतनी संकुचित अवस्था शायद ही पहले कभी देखने को मिली हो.

बहरहाल, आज का दौर तकनीक का दौर है और तकनीक में वही गुरु है जो आपको एक क्लिक पर सबकुछ उपलब्ध करवा दे. उसके बाद अपने आपको यदि गुरु साबित करना है, यदि अपने विचारों की महत्ता सबके ऊपर थोपनी है तो फिर उन विचारों को (भले ही वे चोरी के हों) दूसरों से जबरिया स्वीकार करवाना ही है. उनके विचारों को गलत साबित करना ही है. ज्ञान-विज्ञान-तकनीक के दौर में विचारों का महत्त्व संभवतः इसी कारण कम होता जा रहा है, कोई किसी की बात सुनना-स्वीकारना पसंद नहीं कर रहा है. वर्तमान परिदृश्य में जहाँ समाज बचाना, जान बचाना, भविष्य बचाना प्राथमिकता में है वहीं विचारों का बचाया जाना भी लोगों को अपनी प्राथमिकता में शामिल करना होगा.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

30 अगस्त 2020

दिन भर उमड़ते विचार रात को चले जाते सोने

पूरे दिन अनेक-अनेक विचार दिमाग में चलते रहते हैं. लगता है कि लिखने बैठा जाये तो न जाने कितना लिख जाए. दिन भर तमाम और कामों की उठापटक में बहुत ज्यादा समय नहीं मिल पाता तो लिखना कम ही हो पाता है. अब जबकि रात को लिखने बैठते हैं, फुर्सत से तो दिमाग एकदम साफ़ नजर आने लगता है. ऐसा लगता है जैसे दिन भर के उठे तमाम विचार सोने चले गए हों. ऐसा नहीं कि शारीरिक रूप से अथवा मानसिक रूप से किसी तरह की थकान हो मगर इसके बाद भी ऐसा क्यों हो जाता है, पता नहीं. 

कहीं यह भी कोरोना काल में बहुत लम्बे समय से घर में घुसे रहने का नकारात्मक असर तो नहीं? बहरहाल, इसका भी निदान करना ही पड़ेगा.  


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

09 सितंबर 2019

सोशल मीडिया पर होती अनावश्यक उछल-कूद को नियंत्रित करना होगा


सोशल मीडिया ने नियंत्रण के सारे बिन्दुओं को किनारे लगा रखा है. इस मंच पर न रिश्तों की कोई कद्र है, न संबंधों की, न उम्र की. इसकी उन्मुक्तता ने सभी को आज़ादी दे रखी है और वह भी पूरी तरह से निरंकुशता वाली. इस निरंकुश आज़ादी की कीमत लोगों के अपमान से, लोगों की बेइज्जती से चुकाई जा रही है. कई साल पहले कहीं पढ़ रखा था कि देश की आज़ादी के समय बहुत से लोगों ने अपना विचार इस रूप में दिया था कि भारत अभी उस स्थिति में नहीं है कि आज़ादी का सही अर्थ समझ सके या फिर उसका सही उपयोग कर सके. उस समय बहुतेरे लोगों ने आज़ादी के बाद भी कुछ सालों तक एक तरह की तानाशाही की वकालत की थी. उन स्थितियों में ऐसा किया जाना सही होता या गलत ये तो अब विमर्श का विषय है मगर अब लगता है कि वाकई देश अभी भी ऐसी स्थिति में नहीं है कि यहाँ आज़ादी का सही उपयोग किया जा सके. इसके उदाहरण के रूप में सोशल मीडिया के तमाम मंचों को लिया जा सकता है.


यहाँ किसी भी विषय पर एकतरफा कुतर्क (इसे बहस कतई नहीं कहा जा सकता है) चलते रहते हैं. उम्र, अनुभव, ज्ञान को दरकिनार करते हुए बड़े-बड़ों की इज्जत का कचरा यहाँ सहजता से किया जाने लगता है. किसी भी विषय पर किसी भी व्यक्ति से ऐसी अपेक्षा की जा सकती है कि वह किसी विशेषज्ञ की तरह अपना ज्ञान उड़ेल सकता है. अपनी बात पर ही, अपने विचार पर ही जमे रहने की कला इसी मंच पर आसानी से देखने को मिलती है. यहाँ एक अपने अलावा बाकी सभी के विचार तुच्छ और क्षुद्र की श्रेणी में शामिल मान लिए जाते हैं. ऐसा व्यक्ति जिसने किसी विषय को पढ़ना तो दूर कभी देखा भी न हो, उस पर भी किसी बड़े विशेषज्ञ से ज्यादा गंभीरता से अपनी राय दे सकता है. ऐसा किये जाने से न केवल विषय से सम्बंधित जानकारी का, सामग्री का नुकसान हो रहा है वरन इंटरनेट पर ऐसी सामग्री का भी जमावड़ा होता जा रहा है जो विशुद्ध रूप से संशय, भ्रम फ़ैलाने का काम कर रही है. इसी अनावश्यक स्वतंत्रता के चलते सभी को अपनी बात रखने का, अपने विचार पोस्ट करने का अधिकार मिला हुआ है. बिना किसी सेंसर के, बिना किसी संपादन के ऐसी सामग्री इंटरनेट पर दिखाई दे रही है जो न केवल भ्रामक है वरन अराजक भी है. इसे रोकने का या फिर इस पर नियंत्रण लगाने जैसा कोई कदम कहीं से भी उठता हुआ नहीं दिख रहा है. 

इस तरह की अराजक और भ्रामक स्थिति में आने वाली उस पीढ़ी का भी नुकसान होने वाला है जो इंटरनेट की सामग्री को ही प्रमाणित मानती है. उसके लिए पुस्तकों का, बुजुर्गों के ज्ञान का कोई अर्थ ही नहीं है. ऐसी स्थिति में अधकचरे ज्ञान से, अशिक्षित लोगों के विचारों से सोशल मीडिया हरा-भरा बना हुआ है. आने वाले समय में यही भ्रामक और तथ्यहीन सामग्री ही सामाजिक क्षति करवाएगी. आज भले ही इसके मायने समझ न आ रहे हों मगर आने वाले समय में इसी तरह की सामग्री के सहारे लोगों के दिमाग को, उनके ज्ञान को गुलाम बनाया जा सकेगा. आवश्यक नहीं कि प्रत्येक कालखंड में सेना, हथियार से ही गुलामी लायी जाए. वर्तमान समय तकनीक का है और आने वाला इससे भी ज्यादा तकनीक का, विज्ञान का, जानकारियों का, तथ्यों का होगा. ऐसे में एक गलत अथवा भ्रामक सामग्री भी किसी हथियार से कम साबित नहीं होगी. आज के लिए न सही मगर आने वाले कल के लिए, आने वाली पीढ़ी के लिए आज तथ्यों की गलतियों को, भ्रम को, अराजकता को संभालना होगा. सोशल मीडिया पर होती अनावश्यक उछल-कूद को नियंत्रित करना होगा.

06 अक्टूबर 2018

चिंतन का वैज्ञानिक आधार


यह एक ऐसा लेख है जो आपको बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर सकता है। इसलिए इसे ध्यान से पढ़ें और पढ़ने के बाद अपने दिमाग से डिलीट कर दें अगर कर पाएं तो।

इस दुनिया में जितने भी विचार हैं वह वायुमंडल में तरंग के रूप में घूमते रहते हैं। हमारा दिमाग उन तरंगों को ग्रहण करने का एक हाईटेक यन्त्र है जो रिसीवर की तरह कार्य करता है। इस रिसीवर का एक विशेष असेम्बलिंग है जिसके अनुरूप वह अपना कार्य करता है। यह कुछ उसी तरह का कार्य है जैसे कोई रेडियो, मोबाइल या आपका डिश एंटीना कार्य करता है। मुझे लगता है कि अभी आप कुछ समझ नहीं पा रहे होंगे कि मैं कहना क्या चाहता हूँ।


आप जिस कमरे में बैठे हैं उस कमरे में सभी रेडियो चैनल, सभी मोबाइल कंपनी के सिग्नल, सभी टीवी चैनल के सिग्नल उपस्थित हैं पर क्या आप उन्हें देख पा रहे है? नहीं न। पर आपके पास जिस कंपनी का मोबाइल सिम है वह उसी कंपनी का नेटवर्क उन सबके बीच पकड़ लेता है और आप उसका प्रयोग कर किसी व्यक्ति से बात कर पाते हैं। इसी तरह आपका डिश टीवी नेटवर्क जिस कंपनी का है उसी अनुसार वह सिग्नल पकड़कर आपको चैनल दिखाता है।

अब हम थोड़ा पीछे चलते हैं अगर 25 वर्ष पहले कोई व्यक्ति आपसे यह कहता कि उसके पास एक ऐसा यंत्र है जिससे वह कहीं से भी अपने परिजनों से देखते हुए बात कर सकता है तो निश्चित ही आप उसे पागल करार देते। इसी तरह बहुत सारी बातें अभी भी ऐसी हैं जो कथा कहानियों ग्रंथो के माध्यम से कहीं तो गयीं हैं पर भौतिक रूप से देख न पाने के कारण हम उन्हें कपोल कथा घोषित कर देते हैं। जब पहला मोबाइल बना था तब हम वातावरण से केवल एक कंपनी का नेटवर्क यूज़ कर पाते थे अब एक मोबाइल में कई कई कंपनी का नेटवर्क यूज़ कर लेते हैं तो क्या यह सम्भव नहीं है कि भविष्य में कोई ऐसा यंत्र आ जाए जिससे वातावरण में उपलब्ध समस्त नेटवर्क का उपयोग करने में सक्षम हो जाएं।

आज से कोई तीस वर्ष पहले मैं नागराज और बुढ़िया टाइटल की कॉमिक्स पढ़ता था उसमें लिखा रहता थाबुढ़िया ने ग्लोब पर हाथ फेरकर देखा तो उसे नागराज गुफा की तरफ आता दिखाई दिया। कॉमिक्स के रचयिता संजय गुप्ता के दिमाग में यह यह कल्पना आयी होगी कि कोई ऐसा ग्लोब होता होगा जिस पर हाथ फेरकर देखा जा सकता है और मात्र 30 साल में टच स्क्रीन वीडियो कॉल ने हमें लगभग उसी स्थिति में पँहुचा दिया। मुझे याद है कि रामायण में रामानंद सागर ऐसे बाण की कल्पना करते हैं जो व्यक्ति को पाताल में भी ढूंढकर उसका संघार करने में सक्षम है और आप अप्रत्याशित रूप से पाएंगे कि वैज्ञानिक टारगेटड मिसाइल बना पाने में सफल हुए। आखिर कथा कहानियों के लेखक को ऐसे धांसू विचार कहाँ से आते हैं आखिर हमारे ऋषि मुनियों ने ऐसी परिकल्पनाएं कैसे कर लीं?


पुनः हम अपने दिमाग के रिसीबर पर आते हैं हमारा दिमाग भी हमारे जन्म के समय विशिष्ट संरचना या हमारे विशेष अभ्यास से कई विशेष तरंगों को ग्रहण करने में समर्थ है अब दिमाग जिस तरह से बना है उसी तरह की तरंगें वह ग्रहण कर पाने में सक्षम होता है और उसी के अनुरूप उसमें विचार आते हैं या यूँ कहें कि विचार ग्रहण कर पाता है। कभी कभी किन्ही खास लोगों में यह दिमाग विशिष्ट संरचना के चलते ऐसे विचार भी पकड़ लेता है जो पहले कभी किसी ने न सुने हो न देखे हो। ऐसे विचार ही सामान्य लोगों द्वारा कपोल कथा सिद्ध कर दिए जाते हैं पर समय बीतने के साथ जब अनेक लोगों का दिमाग उस विचार को पकड़ने लगता है और वैज्ञानिक प्रवृत्ति के लोग उस पर कार्य करने लगते हैं तब वह कपोल कथा यथार्थ पर परिणित होकर सबके सामने आ जाती है और तब आपको उस विचार को स्वीकार करना ही पड़ता है। अभी मात्र आधे दशक में ही हजारों कपोल कथाएं सच होने बाली हैं। जो व्यक्ति जेट विमान से ध्वनि की रफ़्तार से आवागमन में सक्षम हुआ है वह 50 साल बाद किसी चटाई पर खड़ा होकर यात्रा करता दिखे तो कोई आश्चर्य की बात न होगी। जो व्यक्ति आज मोबाइल से बात कर रहा है वह कल आँख बंद कर शरीर में फिट किसी यंत्र के माध्यम से किसी से मानसिक संपर्क करने में सक्षम हो जाए तो भी कोई आश्चर्य न होगा। 100 साल पहले मनोरंजन के उद्देश्य से रचीं गयी कपोल कथाएं अब सच सावित होती दिख रहीं है तो फिर आध्यात्मिक वेदों में लिखे तथ्य भी देर सवेर वैज्ञानिक कसौटी पर खरे उतरेंगे।


वस्तुतः हमारा शरीर एक बहुत उच्च कोटि का यंत्र है पर हम इसका उपयोग नहीं कर पाते है। मान लो कोई नया एंड्राइड आया है तो उपयोगकर्ता कुछ लोग केवल काल कर पाते हैं कुछ मैसेज भी कर लेते है कुछ मेल सीख लेते है कुछ वीडियो कॉल लेते है कुछ नेट चला लेते है कुछ सॉफ्टवेयर डाउनलोड कर लेते है पर इतना कुछ जानने के बाद भी उसके बहुत सारे फंक्शन ऐसे होते हैं जिन्हें आप कभी नहीं जान पाते हैं इसी तरह हमारे शरीर में भी असीमित शक्तियां होती है जिन्हें हम जान नहीं पाते है चिंतन और सृजन भी शक्तियां ही हैं। हमारे ऋषि मुनि योग अध्यात्म से इन शक्तियों को प्रयोग करने के तरीके सीख लेते थे वह इन शक्तियों से विश्व में घूम रहे विचारों को ग्रहण करने में सक्षम हो जाते थे और उसने हाँसिल अनुभव को ही लोगों को बताते थे या कहीं लिखते थे। जिन्हें आज का व्यक्ति इसलिए नकार देता है क्योंकि उसके दिमाग का तंत्र उस फ्रीक्वेंसी की बात कैच नहीं कर पा रहा है बिलकुल मोबाइल की तरह। जब तक उसका सिस्टम इस फ्रीक्वेंसी से ट्यून नहीं होगा तब तक विचार उसका दिमाग ग्रहण ही नहीं कर पायेगा। आपको ताज्जुब होता होगा कि पुराने समय में जब बच्चे के परदेश से चलते ही माँ को आभास हो जाता था कि उनका लड़का वापस आ रहा है। या उसके वीमार होते ही माँ को आभास हो जाता था। माँ सदैव बाहर गए अपने बच्चे से एक वायरलेस नेटवर्क से जुडी रहती थी।

अब आप सोच रहे होंगे की दिमाग तो सबके पास एक सा ही है, तो आप भूल में हैं। अल्बर्ट आइंस्टीन के दिमाग की विशिष्ट संरचना और दोनों ऑक्सिपिटल के बीच सामान्य व्यक्ति की तुलना में कई गुनी चौड़ी पट्टी आज भी दुनियाँ के लिए शोध का विषय है। महिलाओं का दिमाग पुरुषों की तुलना में ज्यादा विशिष्टताएं लिए होता है। अलग अलग लोगों के दिमाग की स्थिति भी साधारण कालिंग सिंगल सिम से आई फोन तक की सुविधा जैसी विभिन्नता बाली होती है और उसी के अनुसार किसी के दिमाग में कहानी, किसी के दिमाग में कबिता, किसी के दिमाग में साइंस प्रोजेक्ट और किसी के दिमाग में कपोल कल्पनाएं जन्म लेती है यह समस्त विचार वातावरण की तरंगों के इनपुट से दिमाग के कंप्यूटर में प्रोसेस होकर हमारी प्रतिक्रिया के रूप में बाहर आते हैं। इन ग्रहण किये गए विचारों के कारण ही धन लालसा, वैराग्य, समाज सेवा आदि को करने की इच्छा पैदा होती है।

आशा है कि आप समझ गए होंगे कि क्यों प्रथक प्रथक लोगों की, ग्रहण करने, सोचने और प्रतिउत्तर करने की क्षमता अलग अलग होती है और क्षमता से उसके सामाजिक क्रियाकलाप प्रभावित होते हैं।आप यह भी समझ गए होंगे कि कैसे अप्रत्याशित कल्पनाये जन्म लेती हैं पर समय के साथ स्वयं को सच सावित कर देती हैं। अगर नहीं समझे तो आप मान ले कि हमारे ब्राडकास्टिंग दिमाग को आपका दिमाग दिमाग ट्यून नहीं कर पा रहा है।

Disclaimer:- मैं इस आलेख की वैज्ञानिक प्रमाणिकता साबित नहीं कर सकता हूँ, इसे एक दिमागी फितूर की परिकल्पना के रूप में ही स्वीकार कर सकते हैं।
लेखक - अवनीन्द्र सिंह जादौन
इटावा

02 अक्टूबर 2018

परिस्थितियों के व्यामोह में भटकती गाँधी अहिंसा

गाँधी को अहिंसा के लिए भले जाना जाता हो मगर इसकी व्यावहारिकता पर विचार नहीं किया गया। बीते कुछ वर्षों में न केवल मंच से वरन फ़िल्मी मुन्नाभाई ने गांधीगीरी के द्वारा अहिंसा के व्यावहारिक रूप को नया रूप दिया। ऐसा साबित करने का प्रयास किया गया मानो सिर्फ अहिंसा के द्वारा ही समाज में क्रांतिकारी सोच पैदा की जा सकती है। ऐसे दिखाया जाने लगा जैसे वर्तमान सामाजिक परिदृश्य, स्थितियों में अहिंसा ही सारी समस्याओं का हल है। गाँधी जी की अहिंसा से सदियों पहले भी अहिंसा भारतीय समाज का हिस्सा रही। न केवल हिस्सा रही बल्कि यह भारतीय चिंतन परम्परा में प्रमुख रही। भारतीय चिंतन परम्परा में वेदों, धर्मग्रंथों, पातंजलि योग में तथा बौद्ध, जैन धर्म में अहिंसा की अभिव्यक्ति के कई आयाम विकसित होते रहे हैं। पातंजलि योग सूत्र के अनुसार समस्त प्रवृतियाँ, जो बैर-भाव उत्पन्न करती हैं, की समाप्ति ही अहिंसा है तो बौद्ध धर्म के अनुसार जीव-जगत की रक्षा करना ही अहिंसा है। गाँधी जी हिंसा-अहिंसा के मध्य एक बारीक रेखा खींच कर सारे समाज में अहिंसा का प्रचार-प्रसार कर रहे थे। उन्होंने लिखा है-“अहिंसा का अर्थ उसके गत्यात्मक अर्थों में, जानबूझ कर कष्ट सहना है। इसका अर्थ यह नहीं कि हम बुरा काम करने वाले व्यक्ति के सामने विनम्रता के साथ घुटने टेक दें। इसका अर्थ तो यह है कि हम आततायी की इच्छा के विरोध में अपनी समस्त आत्मशक्ति को झोंक दें। यह हमारे अस्तित्व का तकाजा है और इस नियम के अंतर्गत काम करते हुए एक व्यक्ति के लिए भी यह संभव है कि वह अन्याय के आधार पर टिके हुए एक साम्राज्य की समस्त शक्ति को अकेला ही चुनौती दे सके।” अहिंसा को गाँधी जी कमजोरों का बल कहते थे। उनके अनुसार बुराई को मात्र बुराई से न जीत कर अच्छाई से जीतना विशेष बात है।


असल में गाँधी जी कुछ मामलों में हिंसा को अहिंसा के रूप में परिभाषित करते दिखे हैं। वे स्त्रियों को शीलभंग होने की स्थिति में कायरतापूर्ण अथवा असहाय की दशा न अपनाकर हिंसक उपायों के अवलंबन की छूट देते हैं। अहिंसा का जो रूप उनके द्वारा तैयार किया गया था, साथ ही अपनाया गया था वह मात्र ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ था। वे विचारों, इच्छाओं और जीवन मूल्यों में बदलाव लाने के लिए शक्ति का प्रयोग स्वीकार नहीं करते थे। उनका मानना था कि मान्यता विचारों से बदलती है, बन्दूक से नहीं। वे लिखते हैं-“मेरा यह पक्का विश्वास है कि खून-खराबा या धोखेबाज़ी से ली गई स्वाधीनता वास्तव में स्वाधीनता ही नहीं है।” संभव हो कि गाँधी जी क्रांति के पक्ष में न रहे हों, पर यह बात तो गाँधीवादी भी स्वीकारेंगे कि भारतीय स्वाधीनता मात्र गाँधी जी की अहिंसा और सत्य की पृष्ठभूमि से नहीं उपजी, किसी न किसी रूप में इसमें शक्ति का समावेश भी रहा है। महात्मा गाँधी की अहिंसा अथवा मुन्नाभाई की गांधीगीरी, हमें भ्रष्टाचार से लड़वा सकती है, अपने अधिकारों से पहचान करा सकती है, सड़क-बिजली-पानी की समस्या के खिलाफ खड़ा करवा सकती है, पर क्या आतंकवाद से लड़ा सकती है? दंगों-बमों से जिता सकती है? स्वयं उन्हीं के शब्दों में-“ब्रिटिश हुकूमत को ख़तम करने के लिए पिछले 30 सालों से अहिंसा का जो तरीका अपनाया गया, कहीं उसी का तो नतीजा नहीं, क्या अब भी दुनिया के लिए आप का अहिंसा का सन्देश काम आ सकता है? मैंने यहाँ सवाल पूछने वालों की भावनाओं का अपने शब्दों में सार दिया है। इसके जवाब में मुझे अहिंसा का नहीं बल्कि अपना दीवालियापन कबूल करना चाहिए। इसके पहले मैंने साफ़ कर दिया है कि पिछले तीस वर्षों से जिस अहिंसा का उपयोग किया गया, वह कमजोरों की अहिंसा थी।.... आज की बदली परिस्थितियों में कमजोरों की अहिंसा कुछ काम नहीं दे सकती। हिन्दुस्तान को बहादुरों की अहिंसा का अनुभव नहीं है।” गाँधी जी का उक्त जवाब यह बताता है कि हिन्दुस्तान ने कभी बहादुरों की अहिंसा का अनुभव नहीं किया, सिद्ध करता है कि अहिंसा के साथ भी कमजोरी और बहादुरी का साथ होता है। वे कमजोरों की अहिंसा और बहादुरों की अहिंसा का स्वाद वे चख चुके थे। इसी कारण अहिंसा को उन्होंने अपने जीवन का नियम बनाकर परिस्थितियों के अनुसार उसे कमजोरों और बहादुरों की अहिंसा में बदलते रहते थे।

उनकी इन्हीं नीतियों ने उन्हें हमेशा से आलोचनाओं के केंद्र में बनाए रखा। वर्तमान में जब युवा वर्ग के सामने आदर्श व्यक्तित्व का अभाव है, उस समय गाँधी जी को आदर्श रूप में खड़ा करने की कोशिशें उन्हीं के व्यक्तित्व के कारण असफल सिद्ध हो जाती हैं। आश्रम में किसी युवक के ऊधम मचाने, झूठ बोलने, लड़ने-झगड़ने से परेशान होकर एक दिन स्वयं गाँधी जी ने रूल उठा ली। इस पर वे कहते हैं कि उस युवक को मार कर मैंने अपनी आत्मा का नहीं, बल्कि अपनी पशुता का ही दर्शन कराया था। इसे क्या गाँधी जी की हिंसा नहीं कहा जायेगा? इसी तरह गाँधी जी द्वारा अपने अतिथियों के मल-मूत्र की सफाई हेतु अपनी पत्नी कस्तूर बा से जबरदस्ती करना तथा क्रोध करना भी एक प्रकार की हिंसा की श्रेणी में ही आता है। एक अन्य घटना के रूप में आश्रम का एक बछड़ा जो मरणासन्न स्थिति में होता है, उसकी पीढ़ा और असहाय कष्ट को देखकर महात्मा गाँधी द्वारा उसे जहर का इंजेक्शन देने का विचार किया जाता है। गाँधी जी को बछड़े को मारने का निर्णय लेना क्या इस दृष्टि से अहिंसक कहा जायेगा कि यह एक प्राणी को कष्टों से मुक्ति दिलाना है। यदि यही कृत्य आज सभी लोग अपनानें लगें तो क्या अहिंसा का सिद्धांत काम करता दिखेगा? गाँधी जी के इस निर्णय की आलोचना हुई। इस बारे में भी गाँधी जी परिजनों की बीमारी की सेवा संभव न हो पाने, जीने की आशा न होने, बेसुध और महादुखी होने की स्थिति में उनके प्राण-हरण में लेशमात्र भी दोष नहीं मानते हैं। इस तरह की अहिंसा-हिंसा की स्थितियाँ वर्तमान समाज में युवाओं को क्या और कैसी दिशा देंगी? ऐसे एक-दो ही उदाहरण नहीं, अपितु महात्मा गाँधी के जीवन में अहिंसा की सोच के पैदा होने से लेकर अंत समय तक जब भी ऐसी स्थिति पैदा हुई कि महात्मा गाँधी की अपनी अघोषित सत्ता पर चोट प्रतीत हुई तो वे हिंसा का सहारा लेकर ही अपनी बात को मनवा सके।

आश्रम में युवकों-युवतियों के मध्य एक युवक और एक-दो युवतियों के व्याभिचार की घटना के सामने आने पर गाँधी जी द्वारा लड़कियों के बाल काटने का आदेश इस तर्क के साथ देना कि काले बालों की खूबसूरती ही युवकों को आकर्षित कर गुमराह करती है, भी एक प्रकार की हिंसा ही थी। दक्षिण अफ्रीका से आने के बाद भी गाँधी जी का क्रोध समय-असमय सामने आता रहा और उनकी हिंसा के रूप में अहिंसा का प्रचार-प्रसार होता रहा। स्वराज्य की लड़ाई में, सत्याग्रह में, चरखा कातने की अनिवार्यता को लेकर और अन्य बातों को लेकर अक्सर गाँधी जी अपना रुख कड़ा कर लेते थे। वे अहिंसा पालन की असफलता को स्वयं बताते हैं-“मेरे लिए अहिंसा महज एक दार्शनिक सिद्धांत ही नहीं है। यह तो मेरे जीवन का नियम है, इसके बिना मैं जी ही नहीं सकता। मैं जानता हूँ कि बहुत बार मैं इसके पालन में असफल रहता हूँ-कभी-कभी जाने में, बहुत बार अनजाने में।” उनके अहिंसात्मक सिद्धांतों के लगातार समाज में रहने के बाद भी यह स्थिति बनी रही कि ‘गांधीगीरी’ के नाम से अहिंसा, सत्य का सञ्चालन किया जाने लगा। व्यवहार और सिद्धांत के अंतर ने किसी भी स्थिति में गाँधी को युवाओं का वैसा आदर्श नहीं बनने दिया जैसा कि युवाओं ने विवेकानंद के रूप में पाया। ‘विवेकानंद से टकराव की स्थिति से महात्मा गाँधी के विचारों में कभी स्वामी विवेकानंद का जिक्र नहीं होता दिखा।’

ऐसे में भारतीय चिंतन परम्परा की अहिंसा ‘गांधीगीरी’ के रूप में सामने आती है न कि गाँधी-दर्शन अहिंसा के रूप में अथवा अहिंसा गाँधी-दर्शन के रूप में। युद्ध कोई नहीं चाहता, शांति की बात सभी को अच्छी लगती है, गाँधी जी की अहिंसा का मंचीय उदबोधन सुखद लगता है पर स्वयं को आदर्श अहिंसावादी सिद्ध न कर सकने के कारण व्यावहारिक रूप में गाँधी जी की अहिंसा कमजोरों का अस्त्र नहीं बनती बल्कि उसे और कमजोर बनाती रही है। समाज विकास, रक्षा, शांति के लिए अहिंसा के साथ-साथ क्रांतिकारी संघर्ष की अनिवार्यता भी है। और ऐसा कम से कम ‘गाँधी-अहिंसा-दर्शन’ अथवा ‘गांधीगीरी’ से संभव नहीं है।
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उक्त आलेख लेखन में अहिंसा और सत्य (गाँधी जी) - प्रधान संपादक, रामनाथ सुमन, गाँधी की अहिंसा, एक विश्लेषण (लेख) - डॉ० नागेश्वर प्रसाद, समाज विज्ञान शोध पत्रिका, गाँधी दर्शन – प्रभात कुमार भट्टाचार्य, गाँधी और अहिंसा  (लेख) - आशुतोष पाण्डेय और अर्चना त्रिपाठी, समाज विज्ञान शोध पत्रिका, दि पोलिटिकल फिलोसोफी ऑफ़ महात्मा गाँधी - डॉ० जी० एम० धवन, सिलेक्शन फ्रॉम गाँधी - निर्मल कुमार बोस, गाँधी जी का जीवन, उन्हीं के शब्दों में - संपादक, कृष्ण कृपलानी, गाँधी बेनकाब - हंसराज रहबर से सन्दर्भ लिए गए हैं.

30 अप्रैल 2018

बौद्ध धर्म के वर्तमान परिदृश्य में उसके समर्थक पुनर्मूल्यांकन करें


            गौतम बुद्ध का आविर्भाव भारतीय इतिहास की एक विशिष्ट घटना समझी जा सकती है। वे अपने समय के महापुरुष अथवा तीर्थंकर माने जाते हैं न कि अलौकिक अवतार, जैसा कि उनकी भक्ति में लीन बौद्धों ने उन्हें समझा और समाज को समझाया। गौतम बुद्ध को कालान्तर में महिमामंडित करने की दृष्टि से उनके उपदेशों को, संदेशों को प्रमुखता देने के अतिरिक्त स्वयं गौतम बुद्ध को भी अलौकिक तत्त्व के रूप में प्रतिस्थापित करने के प्रयास किये जाने लगे। बौद्ध मतावलम्बियों द्वारा किये गये हैं जिनमें बुद्ध को अलौकिक रूप में दर्शाने का प्रयास किया गया है। बुद्ध की अलौकिकता को दर्शाते हुए बताया गया है कि सुजाता नामक कुलीन युवती द्वारा प्रदान उत्तम अन्न की भिक्षा ग्रहण करके बोधिसत्त्व पीपल के पेड़ (जिसे बोधिवृक्ष कहा गया) के नीचे जा बैठे। यहाँ रात्रि के प्रथम याम में उन्होंने अपने पूर्वजन्मों की स्मृतिरूपी विद्या प्राप्त की। रात्रि के मध्य याम में उन्होंने दिव्यचक्षु प्राप्त किये और इसके द्वारा समस्त लोक को अपने कर्मों का फल अनुभव करते देखा। बौद्ध परम्परा के अनुसार बुद्ध के अनौत्सुक को देखकर ब्रह्मा उनके सम्मुख प्रकट हुए और कहा-धर्ममय प्रासाद से शोकावतीर्ण जनता को देखिये और धर्म का उपदेश कीजिये, जानने-समझने वाले भी होंगे। ब्रह्मा की याचना से बुद्ध ने जीवों पर करुणा कर बुद्ध-चक्षु से लोक का देखा और पाया कि जैसा सरसी (तलैया) में कुछ कमल जल से अनुद्गत, कुछ समोदक और कुछ जल से अभ्युद्गत होते हैं, ऐसे ही जीव भी संसार में आध्यात्मिक विकास की नाना अवस्थाओं में है। बौद्ध धर्मावलम्बी भी इस घटना की व्याख्या अलग-अलग मतानुसार करते दिखते हैं। एक मत के अनुसार बुद्ध को देवता (ब्रह्मा) ने संसारियों का उत्पल सादृश्य दिखाया और आध्यात्मिक विकास के धर्म प्रचार को प्रेरित किया। एक अन्य मत मानता है कि बुद्ध ने निश्चय किया कि वे अतक्र्य निर्वाण के विषय में मौन धारण करेंगे और केवल मार्ग की देशना करेंगे।


            अब यदि उक्त चन्द घटनाओं के आलोक में बुद्ध और बौद्ध धर्म के आविर्भाव के मूल को जानने का प्रयास किया जाये तो कहीं न कहीं विभ्रम की स्थिति पैदा होती है। ज़रा-रोगी-मृत्यु को देखकर सांसारिक मायामोह से विरक्ति का अनुभव कर ज्ञान की खोज में निकले राजुकमार गौतम को सम्बोधि स्वतः ही बिना गुरु के प्राप्त होती है। ब्राह्मणीय कर्मकाण्डों, पुरोहितों के दुष्चक्र में फँसे समाज को अपने ज्ञान, वचनों के द्वारा मार्ग दिखाने वाले गौतम बुद्ध के संशय को भी किसी लौकिक प्राणी ने नहीं अपितु स्वयं ब्रह्मा ने दूर करते हुए उनसे समाज को धर्म सम्बन्धी उपदेश देने की याचना की थी। बुद्ध के प्रवचनों, विचारों, उपदेशों, धर्म सम्बन्धी बौद्धिक विचारों के आधार पर यह तो आसानी से कहा जा सकता है कि गौतम बुद्ध पूर्णतः बुद्धिवादी थे। वे किसी भी तथ्य को विश्वास की कच्ची नींव पर रखना नहीं चाहते थे, प्रत्युत तर्क-बुद्धि की कसौटी पर सब तत्त्वों को कसना उनकी शिक्षा का प्रधान उद्देश्य था। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि ऐसे पूर्ण बुद्धिवादी व्यक्ति को मात्र तपस्या के आधार पर-बिना किसी गुरु के द्वारा-एक रात्रि में बोधज्ञान प्राप्त होना; संसार को उपदेश देने, न देने की संशयात्मक स्थिति से बाहर लाने का कार्य ब्रह्मा जैसी अलौकिक शक्ति द्वारा करना कितना तर्कसंगत प्रतीत होता है?

            कहा जाता है कि जागतिक दुःखों से व्यथित होकर गौतम बुद्ध ने अभिनिष्क्रमण करके प्रव्रज्या ग्रहण की थी। गया के बोधि-वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ होकर उन्होंने प्रातिभज्ञानमय अभिचिन्तन से अज्ञान, वेदना, तृष्णा, उपादान, जन्म, ज़रा, मरण, शोक आदि के रहस्य को जानकर उन्हें निष्प्रभावी करने की पद्धति का आविष्कार किया था। यदि इस पद्धति और इसकी क्रियाविधि पर विचार किया जाये तो बुद्ध ने न तो जनम-मरण के चक्र से छुटकारा पाने का कोई उपाय स्थापित किया था, न ही ज़रा, शोक, रोग से मुक्ति का कोई सूत्र निर्मित किया था और न ही अपने उपदेशों, धर्म सम्बन्धी बौद्धिक विचारों के द्वारा भी ऐसी किसी पद्धति की ओर रेखांकित किया था। उन्होंने शील अर्थात् सदाचार को जीवन में उतारने पर बल दिया था। आज हम जिन पंचशील सिद्धान्तों की वैश्विक स्तर पर चर्चा करते हैं, उन पंचशील सिद्धान्तों को महात्मा बुद्ध ने सर्वसाधारण के लिए सुनिश्चित किया था। ये पंचशील सिद्धान्त हैं- (1) अहिंसा, (2) अस्तेय (चोरी न करना), (3) ब्रह्मचर्य (यौन दुराचार से दूर रहना), (4) सत्य (झूठ न बोलना), (5) नशीली वस्तुओं का सेवन न करना। महात्मा बुद्ध द्वारा वैचारिक एवं व्यावहारिक धरातल पर मानव-कल्याण को समर्पित ये पंचशील कहीं न कहीं उस सनातन संस्कृति, हिन्दू-धर्म का ही भाग रहे जिसकी एक शाखा के रूप में एक नई धार्मिक शाखा, एक नये धर्म बौद्ध का सूत्रपात भारतभूमि पर हो रहा था।

            वर्ण-व्यवस्था के कारण छुआछूत का दंश सह रहे लोगों को अपना सा लगने वाला धर्म प्राप्त हो चुका था। सामाजिक परिवर्तनों के प्रति सचेत लोगों को भी कर्मकाण्ड, ब्राह्मणवाद, पुरोहित कर्म से इतर नवीन संकल्पना इस धर्म में दिखलाई दे रही थी। इसके बाद भी जो स्वरूप बौद्ध धर्म का निखरकर आना चाहिए था कदाचित् वैसा नहीं हुआ। वर्तमान में यह अपनी जन्मभूमि से लगभग विलुप्त सा होकर दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया और पूर्वी एशिया के कुछ देशों में ही जीवित है। बौद्ध धर्म की परिणति और उसके हृास के लिए एक ओर आक्रांता शासक जिम्मेवार रहे तो दूसरी ओर स्वयं बौद्ध समर्थकों, भिक्षुओं को भी इसका उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। महात्मा बुद्ध द्वारा अपने श्रोताओं की स्थिति के अनुसार जो भेद हीनयान एवं महायान के रूप में किये गये, कालान्तर में यही भेद बौद्ध धर्म के पराभव का कारक भी बने।

            हीनयान और महायान का यह विभेद धार्मिक क्रियाकलापों, भाषा, सम्प्रदाय, दर्शन आदि में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगा। शनैः-शनैः यह विभेद अपना विस्तारक रूप धारण करता रहा जो अन्ततः बौद्ध धर्म के हृास का एक कारक समझा जा सकता है। इस विभेद ने इतना विस्तार ले लिया कि हीनयान और महायान महात्मा बुद्ध को भी अलग-अलग रूपों में देखने लगे। हीनयान सम्प्रदाय के लोग बुद्ध को केवल एक महान व्यक्ति के रूप में स्वीकारते हैं जबकि महायान के लोग बुद्ध की उपासना देवतुल्य रूप में करने लगे। इसके अतिरिक्त हीनयान सम्प्रदाय के लोग बोधिसत्त्व में विश्वास न करने वाले, मूर्ति पूजा न करने वाले, केवल अपने निर्वाण की चिन्ता करने वाले, निर्वाण प्राप्ति के लिए भिक्षु बनने की अनिवार्यता वाले माने गये। इसके विपरीत महायान बोधिसत्त्व को स्वीकारते हैं, बुद्ध की मूर्ति की उपासना करना, अपने साथ-साथ अपने साथियों के निर्वाण की भी चिन्ता करना, निर्वाण के लिए भिक्षु बनने की अनिवार्यता न मानने वाले रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि महात्मा बुद्ध जिस दर्शन, जिन विचारों, जिस जीवनशैली, आचार-विचार के द्वारा बौद्ध धर्म को सम्पूर्ण समाज पर प्रकीर्णित करना चाहते थे, वह बौद्ध धर्म अनुयायियों के आपसी विभेद के चलते सम्भव नहीं हो सका।

            यदि धार्मिक संकल्पना को देखें तो बौद्ध दर्शन ने कहीं न कहीं उस विचारधारा को एक नये सिरे से प्रचारित-प्रसारित करना शुरू किया जो किसी रूप में हिन्दू-धर्म का अंग हुआ करती थी। बुद्ध के पंचशील तो हिन्दू धर्म-दर्शन का ही भाग कहे जा सकते हैं, यदि बौद्ध धर्म और हिन्दू-धर्म में कोई विशेष अन्तर दिख रहा था तो वह था मूर्ति पूजा का विरोध, कर्मकाण्डों का विरोध, ब्राह्मणवाद, पुरोहितवाद का विरोध, वर्ण-व्यवस्था का विरोध। जैसा कि बहुलता में होता आया है कि किसी भी धर्म के विकास की अनन्तर यात्रा में उसमें कर्मकाण्ड सम्बन्धी दोष, सामाजिक बुराइयाँ परिलक्षित होने लगती हैं, कुछ ऐसा ही बौद्ध धर्म के साथ भी हुआ। कर्मकाण्डों की शुरुआत होने लगी, संघ में प्रवेश के त्रिरत्नों (बुद्ध, धर्म, संघ) के सुनियोजन में कमी आने लगी (यद्यपि यह व्यवस्था आज भी अपनी महत्ता स्थापित किये है) संघ व्याभिचार का केन्द्र बनने लगे, आमजन की भाषा, पालि के स्थान पर विद्वानों की संस्कृत भाषा को अपनाया जाने लगा, तान्त्रिक क्रियाओं का समावेश होने लगा। तत्कालीन समाज ब्राह्मणवाद, वर्णव्यवस्था आदि से त्रस्त होकर ही व्यक्तित्व की स्वतन्त्रता हेतु, वैचारिक स्वतन्त्रता हेतु, मध्यम मार्ग अपनाने हेतु ही बौद्ध धर्म की शरण में आया था और प्रकारान्त में उसे वही बुराइयाँ संघ में, बौद्ध धर्म-दर्शन में दिखाई दी तो वह इससे छिटक कर अलग हो गया।

            इसके अतिरिक्त ब्राह्मण-धर्म की पुनस्र्थापना, राजकीय प्रश्रय में कमी आना, मूल सिद्धान्तों में परिवर्तन होना, राजपूतों का उत्कर्ष, विदेशियों के आक्रमण भी बौद्ध धर्म के हृास का कारण बने। यह स्थिति विचार करने योग्य है कि जिस तेजी से बौद्ध धर्म का विकास हुआ वह उसी तेजी से समाप्ति की ओर भी गया। सैद्धान्तिक कारण कुछ भी रहे हों पर व्यावहारिकता में देखा जाये तो कालान्तर में बौद्ध धर्म अपनी विकासात्मक प्रक्रिया से इतर हिन्दू-धर्म के, उसके क्रियाकलापों, उसके दर्शन के विरोधात्मक रूप में कार्य करने लगा। बौद्ध धर्म चिन्तकों का निशाना ब्राह्मण वर्ग या कहें कि हिन्दू सवर्ण वर्ग बनने लगा। दया, करुणा, मानव-कल्याण का विचार देते-देते बौद्ध धर्मावलम्बी हिन्दू उच्च वर्ग को कोसने का कार्य करने लगे, इसके मूल में वे वर्ण-व्यवस्था विरोधी लोग थे जो हिन्दू-धर्म में निम्न वर्ण से आते थे। इस वर्ग ने बौद्ध धर्म में स्वयं को वर्ण-व्यवस्था से मुक्त पाकर स्वविकास, बौद्धिक विकास, वैचारिक विकास करने के स्थान पर हिन्दू उच्च वर्ग पर, ब्राह्मण वर्ग पर दोषारोपण करने का कार्य किया। इससे वह उच्च वर्ग बौद्ध धर्म से जुड़ने में असहज महसूस करने लगा हो जो बौद्ध धर्म को, दर्शन को मानव-कल्याण हेतु स्वीकारता था; वे बौद्ध मतावलम्बी पुनः हिन्दू धर्मोन्मुख हुए जो ब्राह्मण कर्मकाण्ड, पुरोहिती के चलते बौद्ध धर्म में आये।

            वर्तमान स्थिति यह है कि स्वयं बौद्ध धर्मावलम्बियों में इसको लेकर विवाद बना हुआ है कि महात्मा बुद्ध की असली विरासत किसके पास है? हीनयान और महायान में विभक्त हुई विभ्रम की स्थिति ने बौद्ध धर्म को, दर्शन को एक विचारधारा बना दिया। इस विचारधारा को जो जैसा चाहे वैसा तोड़-मरोड़ कर पेश कर सकता है। गौतम बुद्ध के पंचशील सिद्धान्त को सार्वभौम समझकर बौद्ध धर्म को सर्वोच्च धार्मिक सत्ता पर प्रतिस्थापित करने के प्रयास में अवसरवादी नजरिया भी सामने आने लगा। इससे लाभान्वित लोगों ने स्वार्थपरक सोच को अपना कर बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि की प्रार्थना को भुला दिया। वहीं दूसरी ओर बौद्ध धर्म से विचलित, अलाभकारी लोगों ने बौद्ध दर्शन की बौद्धिकता को अपनी वैचारिक स्वतन्त्रता से छिन्न-भिन्न करना प्रारम्भ कर दिया। किसी ने सिद्धार्थ के गृह-त्याग को ज्ञान की खोज बताया तो किसी ने उनकी पलायनवादी प्रकृति; किसी ने बुद्ध को शान्ति, अहिंसा का प्रचारक बताया तो किसी ने धार्मिक आन्दोलन का सूत्रधार बताया; कोई आज भी बुद्ध का नाम लेकर शान्ति, अहिंसा, प्रेम का सपना देखता है तो कोई बुद्ध को मनुवादी व्यवस्था को कोसने का हथियार बनाता है; किसी के लिए बुद्ध निर्वाण प्राप्ति का मार्ग हैं तो किसी के लिए सत्ता पाने का माध्यम। इस तरह नहीं लगता कि लगभग मृतप्राय हो चुके बौद्ध धर्म को पुनर्जीवन प्राप्त हो सकेगा। बौद्ध धर्म के आविर्भाव का उद्देश्य कदापि किसी धर्म का विरोध करना नहीं था, किसी व्यवस्था का विरोध करना नहीं था। महात्मा बुद्ध ने एक महापुरुष के रूप में समाज को दिशा देने का कार्य किया था, अपने उपदेशों, वचनों के द्वारा वे समाज में फैली विषमताओं को, विसंगतियों को, भेदभाव को मिटाना चाहते थे। ऐसा कर पाने में वे कितने सफल रहे यह एक अलग विषय हो सकता है किन्तु बौद्ध धर्म के आविर्भाव से लेकर वर्तमान तक की यात्रा से यह तो स्पष्ट है कि महात्मा बुद्ध के उपदेशों को, विचारों को स्वयं उन्हीं के अनुयायियों द्वारा सकारात्मक रूप से आत्मसात् नहीं किया गया। देखा जाये तो वर्तमान संदर्भों में समाज को शान्ति, प्रेम, अहिंसा की आवश्यकता है, वह चाहे किसी भी धर्म के द्वारा प्राप्त हो। यदि बौद्ध धर्मावलम्बियों को ऐसा लगता है कि आज भी समाज को, विश्व को प्रेम, अहिंसा, दया, करुणा का संदेश देने के लिए बौद्ध धर्म ही एकमात्र विकल्प है तो इन धर्मानुयायियों को बौद्ध धर्म में व्याप्त हो चुकी उन बुराइयों को दूर करना होगा जिनके कारण बौद्ध धर्म रसातल की ओर गया। महात्मा बुद्ध को भगवान से इतर महापुरुष के रूप में प्रतिष्ठित कर उनके उपदेशों, विचारों को समाज के बीच प्रतिस्थापित करना होगा क्योंकि समाज का आदर्श कोई महापुरुष तो हो सकता है, ईश्वर कदापि नहीं। यदि बौद्ध धर्मावलम्बी इस धर्म को पुनर्जीवन प्रदान करना चाहते हैं; उसके दर्शन का प्रचार-प्रसार चाहते हैं; समाज में बौद्ध धर्म की प्रासंगिकता स्थापित करना चाहते हैं तो समाज में पुनः बुद्ध और बौद्ध दर्शन को, उसके ज्ञान को, उसकी शिक्षाओं को केन्द्रबिन्दु बनाना होगा किन्तु उससे पूर्व उसका पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है।

23 मार्च 2018

परिचय के मोहताज न रहें हमारे वीर शहीद


देश की आज़ादी के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले असंख्य वीर क्रांतिकारियों में अनेकानेक युवा भी रहे. उन्हीं युवाओं में से तीन युवाओं ने, जिनकी उम्र २३-२४ वर्ष रही थी, आज ही के दिन आज़ादी के हवनकुंड में अपने प्राणों की आहुति दी थी. भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के क्रांतिकारी कदम की देशवासियों को जानकारी होगी, ऐसी अपेक्षा की जा सकती है. क्रांति की अलख में युवा शक्ति के द्योतक बन चुके इन तीन नामों के सन्दर्भ में आज दशकों बाद भी एक सामान्य जानकारी ही सबके बीच है. असेम्बली में बम फेंकना, गिरफ़्तारी के भय से मुक्त रहते हुए वहाँ गिरफ़्तारी देना, मुक़दमे में भारत माता की आज़ादी के लिए अपने आपको कर्तव्यनिष्ठ दिखाना, इनकी फांसी की सजा रुकवाने के सम्बन्ध में महात्मा गाँधी का इंकार करना, सजा के पूर्व भगत सिंह का लेनिन की जीवनी पढ़ना, शहीद होने के पूर्व अपने परिजनों, मित्रों को पत्रों द्वारा देश की आज़ादी के लिए संघर्षरत रहने की बात समझाना, अंग्रेजी सरकार द्वारा नियत समय से पहले ही इनको फांसी की सजा दे देना आदि-आदि जानकारियाँ ही हम सबके बीच बराबर तैरती रहती हैं. इन तमाम सारी बातों के बीच ये तीनों युवा या कहें कि विशेष रूप से भगत सिंह को बम, बन्दूक, रिवाल्वर का पर्याय बना दिया गया है. उनके विचारों को विशेष-विचारधारा की चादर ओढ़ाकर भगत सिंह को कभी कामरेड, कभी मार्क्सवादी, कभी समाजवादी बनाया जाने लगता है. उनके आलेख विशेष का सन्दर्भ लेते हुए उन्हें ईश्वरीय-सत्ता विरोधी, नास्तिक बताये जाने की कवायद चलती रहती है. ऐसे लोगों के लिए आज का दिन सर्वाधिक उपयुक्त होता है, जबकि वे इन तीनों क्रांतिकारियों को याद करते हुए अपनी विचारधारा से इतर लोगों को कोसने का काम करने लग जाते हैं.


कई बार मन में विचार आता है कि आखिर ऐसा क्या चला होगा उस समय के युवाओं के मन में जो वे सब अपने प्राणों की परवाह न करते हुए तत्कालीन सरकार के खिलाफ खड़े हो गए थे? ऐसे ही युवाओं में ये तीनों युवा भी शामिल हैं. क्या इनके मन में कभी भी एक पल को अपनी मौत का, अंग्रेजी शासन के अत्याचारों का खौफ नहीं जागा होगा? ऐसा विचार इसलिए भी आता है कि आखिर २३-२४ वर्ष की उम्र होती ही कितनी है. आज इतने वर्ष का युवा अपने कैरियर के बारे में सोच रहा होता है. उसे न तो अपने परिवार की समस्याओं को दूर करने की फ़िक्र होती है और न ही उसे समाज की समस्याओं की तरफ ध्यान देने की फुर्सत होती है. क्या उस समय उन युवाओं के मन में या इन तीनों युवाओं के मन में अपने कैरियर, अपने परिवार, अपने भविष्य के प्रति कोई मोह नहीं जागा होगा? ऐसी कौन सी शक्ति इनके अन्दर उत्पन्न हो गई होगी जिससे ये शासन के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंकने की हिम्मत जुटा सके थे? ऐसी कौन सी शिक्षा इनको मिली थी जो महज दो दशक के जीवन में वैचारिकी का उत्कृष्ट उदाहरण सम्पूर्ण देश के लिए ये लोग छोड़ गए? युवा तो आज भी हैं. शिक्षा-व्यवस्था तो आज तत्कालीन समाज से बेहतर है. अव्यवस्थाएँ तो आज भी बनी हुई हैं. प्रशासनिक निरंकुशता, सरकारी अव्यवस्था तो आज भी दिखाई देती है. फिर आज का युवा इनके खिलाफ विद्रोह का बिगुल क्यों नहीं फूंक पाती है? आज का युवा अपने कैरियर का मोह त्याग कर क्यों नहीं सरकार के खिलाफ आन्दोलन खड़ा करता है?

जब-जब भी इन सवालों के जवाब भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु आदि के इंकलाब के सापेक्ष खोजने का काम किया जाता है तो लगता है कि इनकी वैचारिकी के प्रचार के स्थान पर इनके उस बम को ज्यादा प्रचारित किया गया है जिसे फेंकने के समय उछाले गए पर्चों का पहला ही वाक्य था कि बहरों को सुनाने के लिये विस्फोट के बहुत ऊँचे शब्द की आवश्यकता होती है. आज भी भगत सिंह और उनके साथियों को आज़ादी के संघर्ष में हिंसात्मक गतिविधियों का सहारा लेने वाला बताया जाता है. उनकी क्रांति को सीधे-सीधे बन्दूक से, हत्या से, धमाके से जोड़ दिया गया है. उनके इंकलाब जिंदाबाद को भी विशुद्ध रूप से अराजकता का द्योतक बताया जाने लगा है. किसी समय यह उद्घोष अंग्रेजी शासन के विरुद्ध लोगों को एकजुट करने का प्रतीक माना जाता था तो आज इसके द्वारा हिंसात्मक गतिविधि का सञ्चालन करना माना जाने लगा है. ऐसे में जबकि हमारे ही देश में हमारे देश के इन क्रांतिकारी युवाओं के बारे में संकुचित मानसिकता के साथ जानकारी दी जा रही हो, भावी पीढ़ी को इनके बारे में कम से कम या कहें कि अत्यल्प रूप से पढ़ाया जा रहा हो तो कैसे अपेक्षा की जाये कि आज का युवा किसी अव्यवस्था के खिलाफ, किसी अराजकता के विरुद्ध उठ खड़ा होगा. देखा जाये तो आज भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, आतंकवाद, नक्सलवाद, सामाजिक अपराध, राजनैतिक अपराध, लूटमार, हत्याएँ, हिंसा, जातिगत विभेग, लिंगभेद आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जो भले ही देशवासियों को गुलाम न बनाये हों मगर गुलामों जैसा व्यवहार करती दिखती हैं. इसके बाद भी आज का समाज, विशेष रूप से युवा इनके प्रति अनभिज्ञ बना हुआ बस अपने आपमें ही खोया हुआ है. उसके लिए उसके आसपास की दुनिया ही उसका अपना देश है. उसके लिए अपना कैरियर ही उसकी आज़ादी है. उसके लिए स्वार्थपूर्ति के लिए उठाया गया कोई भी कदम राष्ट्रहित में उठाया गया कदम है.

ऐसी विद्रूप स्थितियों में हम शहीदी दिवस मनाने की औपचारिकता का निर्वहन कर लेते हैं. भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव की प्रतिमाओं, चित्रों पर माल्यार्पण कर लेते हैं. उनके बारे में चलन में बनी सामान्य सी जानकारी को चंद लोगों के बीच गोष्ठी रूप में बार-बार प्रसारित करते रहते हैं. भगत सिंह को केंद्र में रखकर, उनको कामरेड, मार्क्सवादी, समाजवादी बनाकर दक्षिणपंथी विचारधारा वालों को गरियाने का काम कर लेते हैं. भगवा और लाल रंग का विभेद कर देश के लिए प्राण न्योछावर कर देने वाले युवाओं का भी बंटवारा कर लेते हैं. इन सबके बीच कभी किसी ने विचार करने का प्रयास किया है कि उस दिन असेम्बली में बम फेंकने की घटना के समय भगत सिंह के साथ राजगुरु, सुखदेव तो थे नहीं फिर इन दोनों वीरों को भगत सिंह के साथ फाँसी क्यों? उस दिन भगत सिंह के साथ एक अन्य युवक जो साथ था, उन बटुकेश्वर दत्त को आज कौन याद कर रहा है? उस वीर नौजवान के साथ क्या हुआ? आज भले ही शहीद भगत सिंह अपने अन्य साथियों के सापेक्ष बहुत बड़े कद के दिखाई देते हों पर हम सभी का कर्तव्य है कि देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर देने वालों के चित्र यदि एकसाथ रखे हों तो हम सबको पहचान सकें. इनके विचारों को किसी विचारधारा विशेष के खाँचे में बाँधकर प्रसारित न करें. आने वाली पीढ़ी को समझाएं कि आज वे जिस आज़ाद हवा-पानी में अपना जीवन गुजार रहे हैं वह ऐसे युवाओं के कारण संभव है. आज की पीढ़ी को बताना होगा कि भगत सिंह सहित अन्य युवा क्रांतिकारी हिंसा का, बन्दूक का, बम का पर्याय नहीं हैं. ऐसे वीर युवकों के विचारों की सान पर आज की पीढ़ी को तैयार करना होगा ताकि वह भी आज के समस्यारुपी शासकों के खिलाफ बिगुल फूंक सके.

यदि हम सब मिलकर खुद जाग सकें, आज की पीढ़ी को जगा सकें, आने वाली पीढ़ी को इन वीरों के बारे में समझा सकें, इन सबकी पहचान करवा सकें तो भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु सहित अनेकानेक ज्ञात-अज्ञात वीरों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

24 फ़रवरी 2018

भारतीय समाज में शिगूफों का कोई अंत नहीं है

भारतीय समाज में शिगूफों का कोई अंत नहीं है
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भारतीय समाज में शिगूफों का कोई अंत नहीं है। कब, कौन, कहाँ पर शिगूफा खड़ा कर दे कहा नहीं जा सकता है। इस मामले में हमारे देश के विशिष्टजन, फ़िल्मी हस्तियाँ और नेतागण काफी उन्नति पर हैं। राजनैतिक पटल पर भी कभी-कभार नए-नए शोशे देखने को मिलते हैं। आजकल तो जैसे इन्हीं का ज़माना आ गया है। हर पल यही अंदेशा लगा रहता है कि कब क्या हो जाये।

हमारे प्रसिद्द मौनी बाबा उर्फ़ पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने भी अँधेरे में तीर मारा था या कहें कि एक ऐसा शिगूफा छोड़ा था जो कि यदि सत्य हो जाता तो संभव था कि बड़े-बड़े दिग्गज नेताओं की एक अच्छी खासी जमात तिहाड़ जेल में मौजूद मिलती। अपने आपको स्वच्छ, निर्भीक, निष्पक्ष छवि का कहलाने के प्रयास में राव साहब ने हवाला कांड के हवाले एक से एक महान नेताओं को कर दिया था। सीबीआई जाँच हुई, समितियां बनी, गवाह व सबूत तैयार किये गए और फिर हुई अदालती कार्यवाही। लगा कि चलो इस बार तो सफ़ेद लकदक कुर्तों के भीतर झांकती कालिख को अदालत जनता के सामने लाएगी। बहुत लम्बे अरसे से देश और जनता का लहू चूसते नेताओं को भी जेल की राह देखनी पड़ेगी, पर क्या हुआ।

अदालत लगी, समस्त कार्यवाही की गई। दोषी, आरोपी सभी बुलाये गए पर नतीजा गुब्बारे की निकली हवा सा फिस्स। एक-एक करके सभी बरी होने लगे, बाइज्जत बरी। समझ न आया इसे क्या कहा जाये। सीबीआई ने अवश्य अपनी कार्यप्रणाली पर प्रश्नसूचक चिन्ह लगवा लिया। आख़िरकार क्या आवश्यकता आन पड़ी थी अदालत की शरण में जाने की वो भी बिना किसी पर्याप्त सबूत के। यह सही भी है कि बिना किसी सबूत के हमारा कानून सजा नहीं देता और किसी भी डायरी में लिखी दो लाइनें भी किसी के खिलाफ सबूत नहीं बन सकती हैं। खैर जो शिगूफा राव साहब ने छोड़ा वो तो बिना किसी भी आवाज़ के गीले पटाखे सा चल गया। एक-एक करके सारे नेता छूट रहे हैं और छूटेंगे भी पर क्या इससे सीबीआई या स्वयं अदालत संदेह के घेरे में नहीं आई है? या फिर वह पुनः किसी शिगूफे के चलते सबूतों को जुटाने चल पड़ेगी?

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13 जून 1997 – अमर उजाला समाचार पत्र

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किसी समय समाचार पत्रों के पत्र कॉलम में, पाठकों की प्रतिक्रियाओं आदि में खूब लिखा था. उसी समय अमर उजाला समाचार पत्र ने अपने पत्र कॉलम में 'खास ख़त' नाम से प्रतिदिन एक पत्र का प्रकाशन करना आरम्भ किया था. हमारे पत्र भी 'खास ख़त' में खूब प्रकाशित हुए.
ये सारे 'खास ख़त' पुस्तक रूप में प्रकाशित भी करवाए थे. अब इन्हें ब्लॉग के माध्यम से आप सबके सामने पुनः प्रकाशित किया जा रहा है. ये 'खास ख़त' यहाँ क्लिक करके पढ़े जा सकते हैं.