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26 फ़रवरी 2019

वीर सावरकर को नमन


वीर सावरकर को याद करते हुए. आज, 26 फरवरी उनकी पुण्यतिथि है. विनम्र श्रद्धांजलि उस व्यक्तित्व को जिसने पूरे इतिहास में अकेले दो बार काला पानी की सजा पाई मगर राष्ट्रपिता की उपाधि से कोई और सम्मानित किया गया. ऐसे लोग जिनके परिवार का कोई व्यक्ति सेलुलर जेल में सजा काटने नहीं गया, वह देश का सर्वोच्च राजनैतिक परिवार माना गया मगर जिन दो भाइयों ने एकसाथ सेलुलर जेल में सजा काटी, वे अज्ञातवास काट रहे हैं.  

देश सबकुछ देख रहा है, सबकुछ याद किये है.... समय आने पर सब बदलेगा... सब बदलेगा.... याद रखना. 

19 जून 2018

रानी झाँसी का अंतिम युद्ध


17 जून को महारानी लक्ष्मीबाई का बलिदान के रूप में याद किया जाता है. वे अंग्रेजों को अपनी झाँसी न देने की जिद में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करती रहीं. इसी संघर्ष में वे अंग्रेजों के विरुद्ध अपने अंतिम युद्ध में 17 जून 1858 को ग्वालियर में शहीद हो गईं. 16 जून को अंग्रेज अधिकारी रोज अपनी सेना के साथ बहादुरपुर से मुरार की तरफ बढ़ा. रोज ने निश्चय किया की वह स्वयं मुरार पर अधिकार करेगा और वहीं से कोटा की सरायं में विद्यमान स्मिथ को सहयोग करेगा. ग्वालियर में क्रान्तिकारी सैनिक भी अपने-अपने मोर्चे पर तैनात थे. तात्या टोपे कम्पू में, राव साहब पश्चिम में, नवाब अलीबहादुर ग्वालियर नगर और किले की देखरेख में लगाये गए. 16 जून को हुए युद्ध में क्रान्तिकारी सेनाओं की हार हुई और उनको पीछे हटना पड़ा. मुरार पर रोज का अधिकार हो गया. इसके साथ ही ब्रिगेडियर जनरल नेपिअर और महाराजा जयाजीराव सिंधिया भी आगरा से मुरार आ गये. अंग्रेजों ने सिंधिया से एक विज्ञप्ति जारी करवाई जिसमें ग्वालियर के सैनिकों से, जो क्रांतिकारियों की तरफ से लड़ रहे थे, कहा गया कि अंग्रेजी फ़ौज उनको राजपद देने के लिए युद्ध कर रही है. अतः वे क्रांतिकारियों का साथ छोड़ दें, उनके लिए आम माफ़ी की घोषणा की जाती है. इस घोषणा का कुछ न कुछ असर अवश्य  हुआ क्योंकि क्रांतिकारी फौजियों में कुछ लोग फिर से सिंधिया से मिलने की सोचने लगे. रानी लक्ष्मीबाई ने खुद आगे आकर उनको अंग्रेजों की धूर्तता के बारे में समझाया.


अगली सुबह, यानि कि 17 जून को रानी झाँसी के लिए सिंधिया की अश्वशाला से एक नया घोडा लाया गया क्योंकि एक दिन पहले मुरार के युद्ध में रानी का घोडा घायल हो गया था. रानी ने हाथ में तलवार और कमर में खंजर बांध कर फौजियों की तरह सफ़ेद पैजामा और लाल कुरता पहना, साथ ही गले में मोतियों की माला डाली. पैरों में नागरा पहन सिर पर सफ़ेद चंदेरी मुरैठा धारण कर रानी युद्ध के लिए तैयार हो गई. सुबह होते ही स्मिथ की फ़ौज में युद्ध का बिगुल बज गया. स्मिथ ने एक भाग को रिजर्व में छोड़ा और अन्य के साथ आगे बढ़ा. उसका दल कुछ कदम आगे बढ़ा ही था कि क्रान्तिकारी सेना की तरफ से गोलों की बौछार होने लगी. स्मिथ ने पीछे हट कर अपने घुड़सवार दस्ते को आगे बढ़ाया और उसके पीछे से गोलों की मार शुरू की. घनघोर युद्ध शुरू हो गया. युद्ध होते-होते दोपहर हो गई, कोई भी पक्ष न जीतता और न ही हारता लग रहा था. अब अंग्रेजों की ओर से कर्नल हिक्स और लेफ्टिनेंट रेले ने मोर्चा संभाला लेकिन अभी वे थोडा ही आगे बढ़े थे कि रानी के मोर्चे से चले एक गोले ने रेले और उसके घोड़े के प्राण ले लिए. इस मोर्चे पर रानी की जीत लगभग तय लग रही थी. तभी कार्नेट गोल्डवर्थी ने वीरतापूर्ण कौशल से अंग्रेजों की हारती बाजी को बचाया. उसने और कर्नल ब्लेक ने क्रांतिकारियों के मोर्चे में खलबली मचा दी. दो घंटे के भयानक युद्ध के बाद क्रांतिकारियों की पार्श्व भाग की सेना पीछे हटने लगी. सारी सेना तेजी से फूलबाग के परेड मैदान की तरफ पीछे हटने लगी.

रानी लक्ष्मीबाई ने जब यह देखा तो वह अपने सैनिकों को उत्साहित करते हुए प्राणों की बाजी लगा कर युद्ध करने लगी. दिन के तीन बज चुके थे युद्ध करते-करते रानी अपने साथियों से बहुत दूर पहुँच गई थी। उनके अंगरक्षक भी उनसे बहुत दूरी पर थे. रानी के साथ केवल मुन्दर ही थी. इसी समय स्मिथ ने रिजर्व में रोकी हुई अपनी टुकड़ी को युद्ध में उतार दिया. ताजादम ये सैनिक एकदम से क्रांतिकारियों पर टूट पड़े. अब रानी ने प्राण बचाने के लिए सोनरेखा नाले को पार करना चाहा. इसी वक्त मुन्दर को एक गोली लगी. रानी ने सुना कि पीछे से मुन्दर कह रही थी कि अब वह नहीं भाग सकती तो रानी ने पीछे मुड़कर मुन्दर को गोली मारने वाले का काम तमाम कर दिया. तभी एक सैनिक की तलवार का करारा वार रानी पर पड़ा. उनके माथे से दाहिनी आँख तक का भाग कट गया. उसी समय एक गोली भी उनकी छाती में जा लगी. वह घोड़े पर गिर पड़ी. एक सैनिक उनको लेकर पास बनी कुटिया की तरफ भागा. अंग्रेजों ने समझा कि उन्होंने अंतिम सैनिक को मार दिया है. वे नहीं जानते थे कि घोड़े पर अचेतावस्था में गिरने वाली कोई और नहीं रानी झाँसी है.

रानी के शेष साथियों, जो उनको पास बनी कुटिया तक ले गए थे, ने देखा कि रानी की सांसे चल रही थी. कुटिया के साधू ने रानी के लिए अंतिम प्रार्थना करनी शुरू कर दी. रानी की एक आँख चोट के कारण बंद थी. उन्होंने बहुत मुश्किल से अपनी दूसरी आँख खोली. उनके मुंह से रुक-रुक कर अपने बेटे के लिए शब्द निकल रहे थे,...दामोदर... मैं उसे तुम्हारी... देखरेख में छोड़ती हूँ... उसे छावनी ले जाओ... दौड़ो उसे ले जाओ. ऐसा कहने के साथ उन्होंने अपने गले से मोतियों का हार निकालने की कोशिश की लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाई और फिर बेहोश हो गईं. साधू ने उनके गले से हार उतार कर उनके एक अंगरक्षक के हाथ में रखते हुए कहा इसे रखो... दामोदर के लिए. उसी समय रानी की साँसे तेज़ी से चलने लगी. अचानक जैसे उनमें फिर से जान आ गई. वो बोलीं, अंग्रेज़ों को मेरा शरीर नहीं मिलना चाहिए. इतना कहकर उनका सिर एक ओर लुड़क गया. उनकी साँसों में एक झटका आया और फिर सब कुछ शांत हो गया. झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अपने प्राण त्याग दिए. वहाँ मौजूद रानी के साथियों, साधू और रामचंद्र देशमुख ने रानी के पार्थिव शरीर पर उसी कुटिया को रखकर आग लगा दी. अंग्रेज जान नहीं सके कि आज के युद्ध में रानी लक्ष्मी युद्ध भूमि में लड़ते हुए मारी गई हैं.

इस लड़ाई में लड़ रहे कैप्टन क्लेमेंट वॉकर हेनीज ने बाद में रानी के अंतिम क्षणों का वर्णन करते हुए लिखा, हमारा विरोध ख़त्म हो चुका था. सिर्फ़ कुछ सैनिकों से घिरी और हथियारों से लैस एक महिला अपने सैनिकों में कुछ जान फूंकने की कोशिश कर रही थी. बार-बार वो इशारों और तेज़ आवाज़ से हार रहे सैनिकों का मनोबल बढ़ाने का प्रयास करती थी, लेकिन उसका कुछ ख़ास असर नहीं पड़ रहा था. कुछ ही मिनटों में हमने उस महिला पर भी काबू पा लिया. हमारे एक सैनिक की कटार का तेज़ वार उसके सिर पर पड़ा और सब कुछ समाप्त हो गया. बाद में पता चला कि वो महिला और कोई नहीं स्वयं झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई थी.


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इतिहासकार देवेन्द्र सिंह जी की मूल पोस्ट से 

10 मई 2018

प्रथम स्वाधीनता संग्राम शुरू हुआ था आज ही


भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का आरम्भ आज, 10 मई 1857 को हुआ था. इसे प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन के रूप में जाना जाता है. इस महान क्रांति की शुरुआत लॉर्ड कैनिंग के शासनकाल में हुई. 10 मई 1857 मेरठ से शुरू होकर यह धीरे-धीरे कानपुर, बरेली, झांसी, दिल्ली, अवध आदि स्थानों पर फैल गई. इसकी शुरुआत एक सैन्य विद्रोह के रूप में हुई किन्तु कालान्तर में यह ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध एक विद्रोह के रूप में परिवर्तित हो गई. देश की इस महान क्रान्ति को लेकर विद्धानों में मतभेद हैं. सभी इसे अपने मतानुसार अलग-अलग नामों जैसे- सिपाही विद्रोह, स्वतन्त्रता संग्राम, सामन्तवादी प्रतिक्रिया, जनक्रान्ति, राष्ट्रीय विद्रोह, मुस्लिम षडयंत्र, ईसाई धर्म के विरुद्ध एक धर्म युद्ध, सभ्यता एवं बर्बरता का संघर्ष आदि से परिभाषित करते हैं.


1857 ई. की क्रान्ति कोई अचानक भड़का हुआ विद्रोह नहीं था वरन इसके साथ अनेक आधारभूत कारण थे. राजनीतिक कारणों में लॉर्ड डलहौज़ी की गोद निषेध प्रथा या हड़प नीति प्रमुख है. आर्थिक कारकों में मुक्त व्यापार तथा अंग्रेज़ी वस्त्रों के भारत  अधिक मात्रा में आ जाने के कारण यहाँ के कुटीर एवं लघु उद्योग नष्ट होना रहा. गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक ने लिखा था कि व्यापार के इतिहास में ऐसा कोई दूसरा कष्टप्रद उदाहरण नहीं. भारत का मैदान सूती कपड़ा बुनने वालों के अस्थि पंजरों से भरा हुआ है. कृषि के क्षेत्र में अंग्रेज़ों की ग़लत नीति के कारण भारतीय किसानों की स्थिति अत्यन्त दयनीय हो गई. इसके साथ-साथ धार्मिक कारणों ने भी सहायक भूमिका निभाई. अंग्रेज़ अपनी नीति के अनुसार अधिकांश भारतीयों को ईसाई बनाकर भारत में अपने साम्राज्य को सुदृढ़ करना चाहते थे. सन 1850 में पास किये गये धार्मिक नियोग्यता अधिनियम द्वारा हिन्दू रीति-रिवाजों में परिवर्तन लाया गया. इस परिवर्तन से पुत्र अपने पिता की सम्पत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता था. इस क़ानून का मुख्य लाभ ईसाई बनने वालों का था. इस नीति ने हिन्दू और मुसलमान दोनों में कम्पनी के प्रति संदेह उत्पन्न कर दिया. इसके अलावा अंग्रेज़ों का अपनी श्वेत चमड़ी पर नाज और भारतीयों को काली चमड़ी कहकर उनका उपहास उड़ाने जैसा सामाजिक कारण भी एक कारक बना. विलियम बैंटिक द्वारा सती प्रथा, बाल हत्या, नर हत्या आदि को प्रतिबंधित करना तथा डलहौज़ी द्वारा विधवा विवाह को मान्यता देना रूढ़िवादी भारतीयों में असन्तोष भर गया. इसके अलावा मुख्य भूमिका सैन्य असन्तोष की रही. सन 1806 में वेल्लोर में लॉर्ड विलियम बैंटिक द्वारा माथे पर तिलक लगाने और पगड़ी पहनने पर रोक लगाना, सन 1824 में बैरकपुर में सैनिकों द्वारा समुद्र पार जाने से इनकार करने पर बर्मा रेजीमेण्ट को भंग करना, 1857 में लॉर्ड कैनिंग द्वारा पारित सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम के अंतर्गत सैनिकों को जहाँ चाहे वहाँ कार्य करवाने को भेजना, 1854 के डाकघर अधिनियम में सैनिकों की निःशुल्क डाक सुविधा समाप्त करना जैसे सैन्य असंतोष के बीच चर्बीयुक्त एनफ़ील्ड कारतूसों के प्रयोग के आदेश ने आग में घी का कार्य किया. 


विद्रोह आज के दिन सांयकाल 56 बजे के मध्य प्रारम्भ हुआ. सर्वप्रथम पैदल टुकड़ी 20 एन.आई. में विद्रोह की शुरुआत हुई तत्पश्चात 3 एल.सी. में भी विद्रोह फैल गया. मंगल पाण्डे ने हियरसे को गोली मारी जबकि अफ़सर बाग की हत्या कर दी गई. 11 मई को मेरठ के क्रान्तिकारी सैनिकों ने दिल्ली पहुँचकर अधिकार कर मुग़ल सम्राट बहादुरशाह द्वितीय को दिल्ली का सम्राट घोषित कर दिया. विद्रोह शीघ्र ही लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, बरेली, बनारस, बिहार तथा झांसी में भी फैल गया. हुमायुँ के मक़बरे में शरण लिए हुए बहादुरशाह द्वितीय को पकड़ लिया गया. उन पर मुकदमा चला और उन्हें बर्मा (रंगून) निर्वासित कर दिया गया. जुलाई 1858 तक सभी स्थानों पर विद्रोह को भले ही दबा दिया गया हो मगर पहला स्वतंत्रता संग्राम देश को आज़ादी की राह दिखा गया था.

23 जुलाई 2016

जालौन की पहली महिला क्रांतिकारी : ताईबाई - (1000वीं पोस्ट)

सन् 1857 की क्रान्ति में सभी ने अपनी क्षमता से अधिक आहुति दी। उत्तर प्रदेश का जनपद जालौन भी किसी दृष्टि से इस संघर्ष में पीछे नहीं रहा। छोटे-छोटे संघर्षों के अतिरिक्त सन् 1857 में यह क्रान्तिकारियों की कर्मभूमि बन कर उभरा। नाना साहब, तात्या तोपे, रानी लक्ष्मीबाई, कुंवर साहब आदि की रणनीति यहीं पर बनी और क्रियान्वित हुई। इन प्रसिद्ध नामों से इतर जनपद की पहली महिला क्रान्तिकारी ताईबाई ने इस आन्दोलन में सक्रियता दिखा कर क्षेत्र के क्रान्तिकारियों के मध्य एक अलख जगा दी थी। ताईबाई की स्मृति को मिटाने का कार्य तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों द्वारा शुरू कर दिया गया था। उनसे सम्बन्धित समस्त दस्तावेज, वस्तुओं यहां तक कि जालौन स्थित उनके किले को सन् 1860 में जमींदोज करवा दिया गया। अंग्रेजी सरकार की इस कायरतापूर्ण कार्यवाही के बाद भी इस वीर महिला की वीरता का वर्णन करते हुए तत्कालीन झांसी डिवीजन के एक अंग्रेज अधिकारी जे० डब्ल्यू० पिंकने ने लिखा था कि वर्ष 1858 के प्रारम्भ होते-होते दबोह और कछवाघार के कुछ भागों को छोड़ कर पूरा जालौन जिला ताईबाई के अधिकार में आ गया था।

जालौन के राजा बालाराव की मृत्यु पश्चात यहां उत्तराधिकार की समस्या सामने आई। राजा की पत्नी ने एक बालक गोद लेकर राज्य करने का विचार किया मगर उसकी अनुभवहीनता और आपसी झगड़ों में यहां की स्थिति बिगड़ गई। तब स्वर्गीय राजा की पत्नी ने अंग्रेजों से रियासत संभालने का आग्रह किया। तत्पश्चात सन् 1838 में यहां प्रशासक नियुक्त कर दिया गया। इसी दौरान सन् 1840 में गोद लिए बालक गोविन्दराव की मृत्यु हो गई। इस बार अंग्रेजों ने रानी को पुनः गोद लेने की अनुमति नहीं दी और जालौन रियासत को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया। जनपद जालौन की पहली महिला क्रान्तिकारी ताईबाई जालौन रियासत के स्वर्गीय राजा बालाराव की बहिन थीं। उनका विवाह सागर के नारायण राव से हुआ था परन्तु विवाहोपरान्त वे अपने पति सहित जालौन के किले में ही निवास करने लगीं। अंग्रेजों से बदला लेने के लिए उनके भीतर स्वाधीनता क्रान्ति का अंकुर फूटने लगा उन्होंने गुपचुप तरीके से अपनी योजना को क्रियान्वित करने का विचार बनाया।

उधर कानपुर में क्रान्ति की शुरूआत होने की सूचना 6 जून 1857 को उरई पहुंची। इसके पश्चात यहां भी क्रान्तिकारियों ने कार्यवाही प्रारम्भ कर दी। क्रान्ति का आरम्भ होते ही जालौन के डिप्टी कमिश्नर कैप्टन ब्राउन ने भागने में ही अपनी भलाई समझी। कैप्टन ने भागते समय गुरसराय के राजा केशवदास को पत्र लिख कर जालौन में शांति स्थापित करने में सरकारी अधिकारियों की सहायता करने को कहा। राजा केशवदास मौकापरस्त व्यक्ति था, उसने ताईबाई तथा अन्य क्रान्तिकारियों के तेवर देखे तो उसने ताईबाई का साथ देने में ही अपनी बधाई समझी। केशवदास ने अपने दोनों पुत्रों के साथ जालौन आकर अन्य सरकारी अधिकारियों को भगा कर किले पर अधिकार कर लिया। केशवदास के इस कृत्य को ताईबाई आदि ने क्रान्तिकारियों का सहयोग समझकर धन-बल से उसकी सहायता की। इस क्रान्ति में दो अंग्रेजी डिप्टी कलेक्टर पशन्हा और ग्रिफिथ को बन्दी बना लिया गया था। जिन्हें क्रान्तिकारियों की पराजय के साथ ही केशवदास ने परिवार सहित सकुशल कानपुर पहुंचा दिया। इस घटना के बाद से ताईबाई को विश्वास हो गया कि केशवदास अंग्रेजों के लिए कुछ भी कर सकता है।
पराजित क्रान्तिकारी कानपुर से भागकर कालपी आ गये। ताईबाई ने तात्या तोपे के साथ मिलकर केशवदास को वापस गुरसराय जाने पर विवश कर दिया। इस घटना के बाद तात्या ने ताईबाई के पांच वर्षीय पुत्र गोविन्द राव को जालौन की गद्दी पर बिठा कर उनको संरक्षिका घोषित कर दिया। इस कार्यवाही से जालौन में क्रान्तिकारियों की सरकार का गठन हो गया और पेशवाई राज्य की स्थापना हुई। क्रान्तिकारियों की सरकार बन चुकी थी और ताईबाई ने सफल संचालन के लिए प्रधानमंत्री तथा अन्य अधिकारियों की नियुक्ति की। उन्होंने अद्भुत क्षमता से अत्यल्प समय में एक बड़ी सेना का गठन किया। अपनी सूझबूझ और कुशल नेतृत्व क्षमता के कारण सम्पूर्ण जनपद में अंग्रेजों का नामोनिशान भी न रहने दिया। उनकी बढ़ती शक्ति से अंग्रेज भी परेशान थे। एक ओर क्रान्तिकारी घटनाएं हो रही थीं और रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब आदि की गतिविधियों के साथ-साथ ताईबाई का शासन अंग्रेजों को रास नहीं आ रहा था। इस समय तक कालपी क्रान्तिकारी घटनाओं के संचालन का केन्द्र बन चुका था। अंग्रेज भी जालौन के स्थान पर कालपी किले पर कब्जा करना चाह रहे थे। इसका कारण एक तो वे क्रान्तिकारियों की शक्ति को सीधे तौर पर कम करना चाहते थे और दूसरी ओर ताईबाई के साथ संघर्ष में अंग्रेज अपनी शक्ति को कम नहीं करना चाहते थे। अंग्रेजों ने नई कूटनीति का इस्तेमाल करते हुए उनके सहयोगियों को मिटाना शुरू कर दिया। इसके लिए उन्होंने युद्ध का नहीं वरन् नरसंहार का सहारा लिया। सबसे पहले हरदोई के जमींदार अंग्रेजी सेना के कोपभाजन बने। एक दर्जन से अधिक क्रान्तिकारियों को खुलेआम पेड़ से लटका दिया गया। अंग्रेजों का नरसंहार जारी रहा। अन्ततः ताईबाई ने नरसंहार रोकने के लिए मई 1858 को अपने पति और पुत्र के साथ आत्मसमर्पण कर दिया। अंग्रेजों ने उनकी समस्त सम्पत्ति जब्त कर ली। राजद्रोह और विद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें तथा उनके सहयोगियों को आजीवन कारावास की सजा सुना दी। ताईबाई की लोकप्रियता और शक्ति से घबराकर अंग्रेजों ने उन्हें जालौन से बहुत दूर मुंगेर-बिहार- भेज दिया गया। यहीं पर कैदी जीवन बिताते हुए उनकी मृत्यु सन् 1870 में हो गई। उनकी मृत्यु के बाद भी अंग्रेज उनकी लोकप्रियता और शक्ति से घबराते रहे। इसका प्रमाण इस बात से मिलता है कि उनकी मृत्यु के बाद उनके कैदी बेटे को पढ़ने के लिए तो इलाहाबाद भेज दिया गया किन्तु उनके बंदी पति को जालौन में रहने की आज्ञा नहीं दी गई।


छोटे से स्थान पर ताईबाई ने अपनी कार्यक्षमता और कुशल सैन्य संचालन से अक्टूबर 57 से मई 58 तक, सात माह, स्वतन्त्र सरकार की स्थापना कर उसका संचालन किया। जनपद जालौन की इस क्रान्तिकारी महिला को लोग इस कारण से भी नहीं पहचानते हैं कि अंग्रेजों ने यथासम्भव जालौन से उनसे सम्बन्धित सभी वस्तुओं, दस्तावेजों आदि को समूल नष्ट कर दिया था। अंग्रेजों द्वारा लिखे गये भ्रामक इतिहास को पुनः लिखने और सामने लाने की आवश्यकता है, कुछ इसी तरह की पहल की आवश्यकता ताईबाई के गौरवशाली इतिहास को सामने लाने की है। जनपद जालौन की पहली महिला क्रान्तिकारी को इन्हीं समवेत प्रयासों के माध्यम से ही देशवासियों के सामने लाया जा सकता है, तभी हम सभी अन्य वीर-वीरांगनाओं की तरह ही ताईबाई को भी याद रख सकेंगे।