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05 फ़रवरी 2018

देह और यौन सम्बन्धों की तरफ़ मुड़ती चर्चाएँ

जिस तेज़ी से समाज बदल रहा है, उतनी तेज़ी से समाज में चर्चाओं के विषय में भी परिवर्तन हो रहा है. ये बदलाव किसी तरह की सामाजिकता के चलते आता हुआ नहीं है बल्कि इसके पीछे भी एक तरह का सेक्सुअल कारक काम कर रहा है. सामान्य रूप से देखा जाए तो ऐसा लगता है जैसे समाज और यहाँ के चंद जागरूक नागरिक समाजिक बदलाव लाने को सचेत हैं. वे इसी सचेतन दशा में इन चर्चाओं को आगे लाते रहते हैं. वैसे समाज में कहीं भी किसी बदलाव के लिए चर्चाओं का होना ज़रूरी है. समाज में ही क्या कहीं भी किसी तरह के परिवर्तन के लिए चर्चा होती ही है. घर में कोई काम होना है तो चर्चा तय है. किसी की पढ़ाई का मामला हो, किसी की शादी का मामला हो, किसी की ख़रीददारी होनी हो, किसी के रोज़गार का विषय हो सभी में चर्चा का होना मुख्य है. होना भी चाहिए क्योंकि चर्चा करने से सम्बंधित विषय पर उपयुक्त राय मिल जाती है या फिर सही राह दिख जाती है. वैसे भी समवेत चर्चा से निकले निर्णयों के आधार पर ठोस परिणाम मिलने की अपेक्षा रहती है. इस अपेक्षा पर वे चर्चाएँ ही खरी उतरती हैं जिनमें कुछ सार्थकता होती है. इधर कुछ समय से बदलाव के दौर से गुज़रता समाज अतिशय चर्चाबाज़ हो गया है. चंद सार्थक चर्चाओं के चारों तरफ़ निरर्थक चर्चाओं की भीड़ लगी हुई है. सबकी अपनी चर्चाएँ हैं, सबके अपने मंतव्य हैं. 

चर्चाओं के चलते दौर लगातार परिवर्तित होकर स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की तरफ़ मुड़ जाते हैं. वैसे इधर चर्चाओं में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की अधिकता देखने को मिल रही है. चर्चा ही क्या दैनिक क्रियाकलाप भी इसी के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गए हैं. स्त्री ने ये किया, उस महिला ने वो पहना, फ़लाँ लड़की का फ़लाँ लड़के के साथ चक्कर है, वो आदमी उस महिला को घूर रहा है, फ़लाँ लड़का रोज़ नई लड़की को घुमा रहा है, उस व्यक्ति ने उस महिला को छुआ, वो उसे देख मुस्कुराई, उसने उसे अजीब नज़रों से देखा आदि-आदि विषय तो रोज़ चर्चा में रहते ही हैं. इनके अलावा भी कुछ क्रांतिकारी विषय चर्चा में आने लगे हैं. इनके मूल में समाजिक बदलाव की बात कही जाती है, किसी गोपन विषय पर अगोपन होने की मंशा व्यक्त की जाती है, व्यक्तिगत विषयों पर खुली बहस करवाने की बात की जाती है. सोशल मीडिया पर एक हैशटैग आंदोलन शुरू होता है और फिर सब खुलकर चर्चाओं में शामिल होने लगते हैं. फिर चर्चा काम प्रदर्शन शुरू होने लगता है. कौन कितनी अश्लीलता से खुलकर सामने आ सकता है, इसकी होड़ लग जाती है. कौन कितना अशालीन लिख सकता है, इस पर ज़ोर दिया जाने लगता है. किसके विषयों में, भावाभिव्यक्ति में कामुकता अधिक समाहित हो सकती है, इसको प्रमुखता दी जाने लगती है. महिला-पुरुष सम्बन्धों के सार्थक, सकारात्मक विस्तार के लिए शुरू होने वाली चर्चाएँ देह-विमर्श के रूप में बदलने लगती हैं. किसके दाग़ अच्छे हैं, किसकी दैहिक संतुष्टि अधिक है, कौन कितने मिनट टिक सकता है आदि चर्चा के विषय बनने लगते हैं. 

स्त्री हो या पुरुष, उसके सम्बन्धों को जब तक देह की तराज़ू पर तौला जाता रहेगा तब तक खुला विमर्श कामुकता, अश्लीलता की कहानी ही लिखता रहेगा. जिस तरह स्त्री देह की समस्या को लेकर खुली चर्चा की वकालत की जा रही है, उससे क्या लगता है कि सारी समस्या सुलझ जाएगी? क्या लगता है कि आज के तकनीकी, इंटरनेट युग में लोगों को माहवरी, उसकी समस्या, स्त्री की परेशानी के बारे में जानकारी न होगी? क्या लगता है कि ऐसे लोग पैड के बारे में न जानते होंगे? क्या लगता है कि खुली चर्चा से सभी एक-दूसरे की मदद करने लगेंगे उन पाँच दिनों में? क्या खुली चर्चा की सार्थकता तब होगी जब पारिवारिक मर्यादा को भूल लोग आपस में उन दिनों की चर्चा करने लगेंगे? आधुनिकता के कथित आवरण को ओढ़कर हम सोचने लगे हैं कि खुले दिमाग़ और विचार के हो गए हैं. जहाँ आज भी परीक्षा ड्यूटी के दौरान किसी पुरुष शिक्षक द्वारा लड़की के हाथों  नक़ल  पर्ची छीनना छेड़खानी माना जाता हो, बाज़ार में किसी सहायता के लिए महिला  पुकारना या उसकी तरफ़ मदद का हाथ बढ़ाना फ़्लर्ट करना समझा जाता है, ज़हम महिला को देखना भी अपराध की श्रेणी में आता हो वहाँ ख़ुद महिलाओं से उनके पीरियड्स पर, पैड पर, उसके दाग़ पर खुली चर्चा की अपेक्षा करना समझा जा सकता है. ऐसे लोगों से, जो इस तरह के विषयों पर खुली चर्चा का दम भरते हैं, एक सवाल कि किसी ऐसी युवती  जो अपने काम करने में सक्षम नहीं है, किसी परिस्थिति में उसके पिता, भाई द्वारा इसके पैड को बदलना-पहनाना सम्भव है? 

चर्चाएँ हों, खुलकर हों, इन्हीं विषयों पर हों पर उनके उद्देश्य को भटकाया न जाए, भटकने न दिया जाए. और ऐसा हाल-फ़िलहाल सम्भव नहीं दिखता है. 

04 फ़रवरी 2018

हैप्पी टू ब्लीड से पैडमैन तक

पता नहीं देश ज़्यादा जल्दी में है या कुछ देशवासी? वैसे कुछ की बजाय सभी किसी न किसी जल्दी में हैं. किसी को धन कमाने की जल्दी, किसी को अपने काम में तरक़्क़ी करने की जल्दी, किसी को सबकुछ पा लेने की जल्दी, किसी को सबकुछ सुधार देने की जल्दी, किसी को दोष मढ़ देने की जल्दी. इस जल्दी-जल्दी के खेल में बहुतेरे तो हड़बड़ी के शिकार हुए जा रहे हैं. इस हड़बड़ी में समय को समय से पहले खींचे ला रहे हैं. इस हड़बड़ी में उनको भान नहीं कि वे कर क्या रहे हैं? कह क्या रहे हैं? जल्दबाज़ी का खेल बिना सोचे-समझे खेला जा रहा है. इस खेल में अपने पक्ष को ही प्रामाणिक मानने को एक तरह की धौंस दी जा रही है और उसके लिए क्या सही, क्या ग़लत इस तरफ़ विचार भी नहीं किया जा रहा है. 

जल्दबाज़ी में ख़ुद को यथोचित स्थापित करने की लालसा ने समाज में बराबर स्त्री-सम्बंधी मुद्दों को स्त्रियों, पुरुषों द्वारा उठाया जाता रहा है. समाज में स्त्रियों को लेकर एक तरह की धारणा यही बनी हुई है कि वो कमज़ोर है, पुरुष के अधीन है, शोषित है. इन सबके साथ-साथ यहाँ तक माना जा रहा है कि स्त्रियों पर किसी भी तरह के धार्मिक, पारिवारिक, सामाजिक कृत्यों पर लगने वाले प्रतिबंधों को पुरुषों द्वारा लगाया गया है. घर में, घर बाहर किसी भी स्त्रीगत स्थिति का एकमात्र ज़िम्मेवार सिर्फ़ पुरुष को माना-समझा गया. इन्हीं विचारों के चलते कुछ समय पूर्व सोशल मीडिया पर अपने स्त्रीवादी आंदोलनों की धार को तेज़ करने के लिए हैप्पी टू ब्लीड जैसा कार्यक्रम चलाया गया था. इसका मक़सद महिलाओं के मासिक धर्म के प्रति समाज में बनी सोच के प्रति सकारात्मक माहौल बनाया जाना होना चाहिए था पर वही न होकर सबकुछ हुआ. एक से एक महिलाओं ने अपनी-अपनी फ़ोटो डाल कर समाज को बताने की कोशिश की कि उसको भी मासिक धर्म होता है. इन महिलाओं की अपने ब्लीड होने को लेकर हैप्पी वाली स्थिति सिर्फ़ फ़ोटो खींचने और सोशल मीडिया पर शेयर करने भर तक सीमित रही. इसके बाद पता नहीं वे कितने दिन बिना पैड के रहीं या फिर अब तक बिना पैड के ही रह रहीं हैं? 


आंदोलन छेड़ने वाली ये आधुनिक, क्रांतिकारी महिलाएँ पैड धारण कर रहीं हैं ता नहीं, उनको ब्लीड से हैप्पीनेस हो रही है या नहीं ये उनका विषय पर हाल ही में सामाजिक सुधारों के स्वनामधन्य ब्राण्ड एम्बेसडर बने अभिनेता जी पैड आधारित फ़िल्म लेकर आ गए. फ़िल्म देखी तो नहीं हमने पर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इसमें महिलाओं के उन्हीं पाँच दिनों की बात होगी. पैड वाली समस्या के साथ-साथ सुधारवादी चर्चा भी हो सकती है. पैड की आड़ में महिलाओं की शारीरिक सुरक्षा की बात हो सकती है. मासिक धर्म को लेकर सामाजिक विमर्श की चर्चा भी हो सकती है. होनी भी चाहिए क्योंकि आज भी इस मुद्दे को पुरुषों से ज़्यादा महिलाओं द्वारा ही नकारात्मक रूप से देखा जाता है. उन दिनों रसोई में  जाना, पूजा  करना, सामान  छूना आदि प्रतिबंध महिलाएँ ही लगाती हैं. सामाजिक दृष्टि से एक सार्थक पहल, यदि इस फ़िल्म से हो रही है, को कुछ नौटंकीधारियों ने भटकाना शुरू कर दिया है. नामचीन महिलाएँ पैड लेकर फ़ोटो सोशल मीडिया पर शेयर करने लग गईं हैं. इस क्रांति से चर्चा होगी. अब परिवार में सब एकसाथ बैठकर अलग-अलग उम्र की महिलाओं के अलग-अलग आकार, अलग-अलग ब्राण्ड के पैड को पसंद कर सकेंगे. इस फ़िल्म ने पैड का प्रचार कर हैप्पी टू ब्लीड समर्थकों के ख़िलाफ़ काम किया है. समाज में भ्रम को फैलाया है. अब ब्लीड करती हुई महिला बिना पैड सार्वजनिक आए या फिर पैड को बाँधे? आख़िर प्राकृतिक, नैसर्गिक शारीरिक क्रिया पर प्रतिबंध क्यों? चर्चाओं को विस्तार देते हुए सभी को झिझक छोड़ परिवार की, पड़ोस की, कार्यालय की महिलाओं से जानकारी लेते रहना चाहिए. आख़िर समभाव के नाते उन पाँच दिनों के कष्टों को सिर्फ़ हैप्पी टू ब्लीड वाले, पैडमैन वाले ही क्यों जानें, उसके बारे में सब जानें, सब समझें. बस महिलाएँ ख़ुद  तैयार कर लें इन पर चर्चा के लिए. क्या वे अभी हैं तैयार?