ग़म छिपाने को
सीखना है दूसरा हुनर,
होंठ थक गये
झूठी हँसी बिखेरते।
छिपाये थे राज
बड़ी ही खामोशी से,
आँखें कह गईं सब
भावनाओं में बह के।
बात होती उनसे
मगर अधूरी रहती,
कैसे हो पूरी
यही बात न समझे।
इक उम्र मिली
चार दिन के लिए,
जन्मों की कहानी
उनसे कैसे कहते।
हथेलियों में थामे
हथेलियों का एहसास,
उनकी उँगलियों को
फिसलता देखते रहे।
(इस ब्लॉग की 2250वीं पोस्ट)

