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09 अप्रैल 2026

वित्तीय वर्ष 2025-26 में श्वेतवर्णा से प्रकाशित पुस्तकों पर रॉयल्टी

वित्तीय वर्ष 2025-26 में श्वेतवर्णा से प्रकाशित पुस्तकों में से सात पुस्तकों पर रॉयल्टी



शारदा जी से पहली मुलाकात हुई थी हमारे ही जनपद के कोंच में एक साहित्यिक कार्यक्रम में. परिचय इस मुलाकात से भी पुराना था और ये दोनों बातें ही श्वेतवर्णा के जन्म लेने से भी बहुत पुरानी थीं.


बहरहाल, श्वेतवर्णा का अस्तित्व में आना हुआ और हम जैसे स्वान्तः सुखाय लेखकों को भी जीवन मिला. अपने छपास रोग के आरम्भिक दिनों में कुछ पुस्तकों का प्रकाशन स्वयं ही करवाया. इसके बाद एक-दो पुस्तकों का प्रकाशन हुआ अपने मित्रों के सहयोग से. उसी समय शारदा जी ने श्वेतवर्णा की जानकारी दी. इसके बाद तपती दुपहरी की शाम के साथ पुराने परिचय-सम्बन्ध-विश्वास ने ऐसा रंग जमाया कि अपनी पुस्तकों का कहीं और से प्रकाशन का सोच भी नहीं सके. जिस विश्वास से हमने पुस्तकों का प्रकाशन जारी रखा, उसी अधिकार से एक बार शारदा जी ने धमकी भी दे डाली थी कि हमने कहीं और से पुस्तकें प्रकाशित करवाईं तो अच्छा नहीं होगा.


आज उसी विश्वास-अपनत्व ने सुखद एहसास करवाया. इस वित्तीय वर्ष 2025-26 में श्वेतवर्णा से प्रकाशित पुस्तकों में से सात पुस्तकों पर रॉयल्टी भी प्राप्त हुई है. यह सुखद एहसास विगत कई वर्षों में पहली बार मिला है. इसमें हमारी एकल लेखन वाली पुस्तकें तो हैं ही, इसके साथ ही देवेन्द्र सिंह जी की पुस्तक और ऋचा सिंह राठौर के साथ लिखी गईं पुस्तकें भी शामिल हैं. (हालाँकि इन लोगों के साथ वाली पुस्तकों की रॉयल्टी हम ही डकार जायेंगे)


संलग्न चित्र में बाकी विवरण इसीलिए छिपा दिया है ताकि कुछ लोग जलन महसूस न करने लगें. विवरण के लिए ऐसे लोग आकुल-व्याकुल न हों. ये विवरण हमारी थाती है, हमारे-शारदा जी के-श्वेतवर्णा के आपसी विश्वास, अपनत्व-अधिकार का परिचायक है.




15 जनवरी 2026

जिन्दगी जिन्दाबाद: पीड़ा के विरुद्ध जिन्दगी की घोषणा - डॉ. लखन लाल पाल

जिन्दगी जिन्दाबाद’ डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी की आत्मकथा है। आत्मकथा का यह दूसरा भाग उनके जीवन की एक ऐसी दुर्घटना पर केंद्रित है, जिसे पढ़ते हुए पाठक के भीतर लगातार एक टीस उठती रहती है। कई जगह पढ़ते-पढ़ते रुकना पड़ता है। यह रचना केवल पढ़ी नहीं जाती, बल्कि उसके दर्द को जीवंत रूप में महसूस किया जाता है। घटना अत्यंत पीड़ादायक और मर्मस्पर्शी है, किंतु लेखक जिस सहजता से उसे अभिव्यक्त करता है, वह काबिले-तारीफ है। भाषा का प्रवाह इतना स्वाभाविक है कि पाठक बिना किसी अटकन या भटकन के उसके साथ बहता चला जाता है।

 

यह आत्मकथा पीड़ादायक होते हुए भी कहीं भी सहानुभूति अर्जित करने का प्रयास नहीं करती। लेखक बस कहता चला जाता है—अपने अपनों के साथ, अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ। पीड़ा को पीते हुए, उसी पीड़ा के बीच वह अपने लिए हँसी-ठिठोली का एक छोटा-सा अंतराल निकाल लेता है। इस मर्माहत पीड़ा को वह अकेले ही सहने का प्रयास करता है, ताकि परिवारजन उसके दर्द को जान न सकें।

 



22 अप्रैल 2005 की शाम लेखक का ट्रेन से भीषण एक्सीडेंट हो जाता है। एक पैर जाँघ से कटकर दूर जा गिरता है, दूसरा पैर टखने से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाता है। कितना खून बहा होगा और वह दृश्य कितना भयावह रहा होगा—कल्पना मात्र से रूह काँप जाती है। लेखक की जीवटता का प्रमाण यह है कि इतनी भयावह स्थिति में भी वह स्वयं को बेहोश नहीं होने देता और पूरी चेतना के साथ अपने को सँभाले रखता है।     

 

हम प्रायः ऐसी घटनाएँ फिल्मों या टीवी धारावाहिकों में देखते हैं। वे क्षणिक रूप से हमें द्रवित कर देती हैं, किंतु ठीक होने की प्रक्रिया को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। वास्तविक जीवन में यह प्रक्रिया हर क्षण करुण क्रंदन में बीतती है। हर पल दर्द के दरिया में डूबे रहना पड़ता है। यही दर्द का दरिया इस पूरी आत्मकथा में प्रवाहित होता रहता है।

 

इसी समय पिता का निधन, माँ की स्थिति, एक वर्ष पहले ब्याह कर आई नवयुवती पत्नी निशा और दोनों भाइयों की मानसिक अवस्था—इन सबको लेखक ने जिस संवेदनशीलता से जिया है, उसे पढ़ते हुए पाठक उन परिस्थितियों की गहराई को समझ पाता है। पर यह दर्द का दरिया उस क्षण हार मानने लगता है, जब लेखक साहस और धैर्य को अपनी नौका बना लेता है। उस नौका से वह अकेला नहीं, बल्कि पूरा परिवार, मित्र और रिश्तेदार धीरे-धीरे पार लगने लगते हैं।

 

ऑपरेशन का दृश्य, पैरों से लगातार बहता खून और तीन-चार महीनों तक चलने वाली मरहम-पट्टी—हर बार की पट्टी असहनीय पीड़ा से दिल-दिमाग को झकझोर देती है। इसके बावजूद लेखक के चेहरे पर बनी रहने वाली मीठी मुस्कान और बीच-बीच में फूट पड़ने वाले ठहाके यह एहसास ही नहीं होने देते कि वह अपने शरीर का एक आवश्यक अंग हमेशा के लिए खो चुका है और अब कृत्रिम पैर के सहारे जीवन जीना है।

 

मैं डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी से सन् 2006 से जुड़ा हूँ। दुर्घटना के बाद उन्होंने ‘स्पंदन’ पत्रिका का संपादन शुरू किया था, जिसमें मेरी एक बुंदेली कहानी प्रकाशित हुई। तभी से हम साहित्यिक मित्र बने। इन उन्नीस-बीस वर्षों में कभी यह अनुभव नहीं हुआ कि यह व्यक्ति इतनी गहरी पीड़ा से गुज़रा है—और आज भी गुज़र रहा है। यह रचना पढ़कर अब उस जीवटता का वास्तविक अर्थ समझ में आता है। क्या इंसान है भाई!

 

इस आत्मकथा का एक अत्यंत प्रभावशाली जीवित पात्र डॉक्टर रवि है—लेखक का बचपन का मित्र और आर्थोपेडिक सर्जन। लेखक ने पूरे विश्वास के साथ स्वयं को उसके हवाले कर दिया था—यह सोचकर कि अब यह मुझे मरने नहीं देगा।

 

पढ़ते समय मेरा ध्यान बार-बार डॉक्टर रवि पर ठहर जाता है। उस समय उसकी मानसिक स्थिति क्या रही होगी? लेखक ने तो स्वयं को उसे सौंप दिया था, पर उसके लिए हर क्षण अनदेखी अनहोनी से जूझना था। एक डॉक्टर के लिए सभी मरीज समान होते हैं, किंतु यहाँ तो लंगोटिया यार का रिश्ता था। एक छोटी-सी चूक भी जीवन भर का बोझ बन सकती थी। ऑपरेशन थियेटर में जाने से पहले परिवार के हस्ताक्षर लेने का दृश्य अत्यंत हृदयविदारक है। यहाँ पेशेगत नियम और व्यक्तिगत संबंधों का द्वंद्व गहराई से उभरता है। इस रचना को पढ़ते हुए डॉक्टर रवि का पात्र लंबे समय तक मन से ओझल नहीं हो पाता।

 

आत्मकथा की भाषा-शैली, उसका प्रवाह और स्वयं तथा दूसरों की मानसिकता को अभिव्यक्त करने का कौशल इसे विशिष्ट बनाता है। यही कारण है कि यह रचना पाठक को एक ही बैठक में पढ़ने को विवश कर देती है।   

 

इस आत्मकथा को पढ़ने के बाद मैं बस इतना ही कह सकता हूँ—

डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी, वाकई ‘जिन्दगी जिन्दाबाद’।

-- डॉ. लखन लाल पाल की प्रतिक्रिया 

07 जनवरी 2026

ज़िन्दगी जिन्दाबाद का प्रकाशन

ज़िन्दगी जिन्दाबाद का प्रकाशन हो गया है...

हमारे बारे में, हमारे एक्सीडेंट के बारे में, उसके बाद की स्थिति के बारे में बहुत से लोग सवाल करते हैं, प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हैं. ऐसे अनगिनत सवालों का एक ही जवाब.... 'ज़िन्दगी जिन्दाबाद'

इसे चाहने वालों के लिए श्वेतवर्णा की वेबसाइट चौबीस घंटे खुली हुई है..... यहाँ क्लिक करें





20 दिसंबर 2025

ज़िन्दगी जिन्दाबाद का घोष जल्द ही आपके साथ होगा

वर्ष 2025 भी जाने की तैयारी कर रहा है. जितने दिन इस अंतिम महीने में निकल गए हैं, अब उतने दिन भी शेष नहीं बचे हैं. समय की गति के अनुसार आना और जाना लगा ही रहना है. कल को इसी वर्ष का स्वागत किया था, अब इसी को विदा करने का समय आ गया है. कुछ ऐसा ही आने वाले वर्ष 2026 के साथ भी होगा. इन आते-जाते वर्षों के स्वागत और विदाई के बीच याद बस यही रह जाता है कि उस एक वर्ष में हम सबने क्या किया? क्या पाया, क्या खोया? क्या सुखद रहा, क्या दुखद रहा?


आप सभी सुधिजनों को याद होगा कि वर्ष 2019 में आत्मकथा ‘कुछ सच्ची कुछ झूठी आपके बीच हमारी बातों को लेकर उपस्थित हुई थी. उसी समय हमारे शुभेच्छुजनों ने प्रेरित किया था कि वर्ष 2005 में हुई दुर्घटना के बाद की अपनी जीवन-यात्रा को भी एकसूत्र में पिरोकर प्रकाशित करवाया जाये. विचार तो था कि वर्ष 2020 में इसे भी ‘ज़िन्दगी जिन्दाबाद के रूप में प्रकाशित करवाया जायेगा. अक्सर ऐसा होता है कि सोचा कुछ जाता है और हो कुछ जाता है, हमारे साथ भी यही हुआ. ज़िन्दगी जिन्दाबाद का घोष करने बैठे तो हाथों ने काँपना शुरू कर दिया, आँखों ने नम होना शुरू कर दिया, दर्द ने अपना अलग रूप दिखाना शुरू कर दिया. इन सबके बीच कुछ दुखद घटनाओं ने हिला दिया और ज़िन्दगी जिन्दाबाद को बीच में रोक देना पड़ा. यद्यपि समय के दिए गए आघातों से उबरते हुए ज़िन्दगी जिन्दाबाद को ब्लॉग पर कहानी के रूप में लिखते रहे.

 



इसी लेखन को एडिट करके, पुस्तक के रूप में संयोजित करके इस जाते हुए वर्ष 2025 में आप सबके बीच लाने का मन बना लिया है. जल्दी ही ‘ज़िन्दगी जिन्दाबाद को आप सब अपने बीच पाएँगे. ‘कुछ सच्ची कुछ झूठी की तरह आप सबका स्नेह ‘ज़िन्दगी जिन्दाबाद को भी मिलेगा, ऐसा विश्वास है.


15 मार्च 2025

दस पृष्ठ की पुस्तक पढ़ने में लगेंगे लगभग बीस करोड़ वर्ष





जो चित्र आप इस पोस्ट में देख रहे हैं, वे एक पुस्तक के हैं. यह एक ऐसी पुस्तक है जिसके बारे में अकाट्य तथ्य है कि कोई भी इंसान अपनी पूरी ज़िंदगी में इसे पूरा नहीं पढ़ सकता है. ये बात अपने आपमें एक आश्चर्य है और उससे बड़ा आश्चर्य ये है कि इस पुस्तक में मात्र 10 पृष्ठ हैं. आपको भी ये जानकार निश्चित ही आश्चर्य हुआ होगा.

 

यह कोई आश्चर्य नहीं, कोई काल्पनिकता नहीं, कोई जादू नहीं और न ही किसी और दुनिया की बात है. सन 1960 में फ्रेंच लेखक रेयमों क्वेनो (Raymond Queneau) ने दुनिया की सबसे कम पृष्ठ की मगर सबसे लम्बी पुस्तक इस संसार के सामने प्रस्तुत की. इस पुस्तक का नाम है Cent Mille Milliards De Poèmes अर्थात एक लाख अरब कविताएँ. मात्र दस पृष्ठों की इस पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर एक सॉनेट (Sonnet) छपा हुआ है. ये जानकर तो और भी अचम्भा लगा होगा कि मात्र दस सॉनेट को पूरी ज़िन्दगी में नहीं पढ़ा जा सकता. दरअसल सॉनेट की पंक्तियाँ एक ही तुकबंदी पर बनी हुई हैं और इसकी प्रत्येक पंक्ति को एक पट्टी (स्ट्रिप) में छापा गया है. ऐसा होने के कारण पुस्तक का पाठक अलग-अलग सॉनेट की पंक्तियों को आपस में मिलाकर नई कविताएँ बना सकते हैं.

 

पुस्तक की इस अनोखी संरचना के कारण कविता के कुल संभावित संयोजनों की संख्या 10¹⁴ यानी सौ लाख करोड़ (100 ट्रिलियन) बनती है. इसका सीधा सा अर्थ है कि इस पुस्तक में सौ लाख करोड़ अलग-अलग कविताएँ हैं. निश्चित है कि इतनी सारी सम्भावित कविताओं को पढ़ना किसी भी इंसान के लिए नामुमकिन है. यदि कोई व्यक्ति लगातार बिना खाए-पिए, सोए या कुछ और पढ़े बिना केवल यही पुस्तक पढ़ता रहे तब भी उसे सारी कविताएँ पढ़ने में लाखों साल लग जाएँगे. खुद क्वेनो ने कहा था कि अगर एक कविता पढ़ने में लगभग 45 सेकंड और अगली कविता तैयार करने में 15 सेकंड लगते हैं तो सारी संभावित कविताएँ पढ़ने में लगभग 20 करोड़ साल लगेंगे.

 

पुस्तक का मूल फ्रेंच संस्करण रॉबर्ट मैसिन द्वारा डिज़ाइन किया गया था. अंग्रेजी में दो पूर्ण अनुवाद प्रकाशित किए गए हैं जो जॉन क्रॉम्बी और स्टेनली चैपमैन द्वारा किए गए हैं. 1997 में एक फ्रांसीसी अदालत के फैसले ने क्यूनेउ एस्टेट और गैलिमार्ड प्रकाशन के विशेष नैतिक अधिकार का हवाला देते हुए इंटरनेट पर मूल कविता के प्रकाशन को गैरकानूनी घोषित कर दिया था.

 

इस पुस्तक का वीडियो यहाँ क्लिक करके देखा जा सकता है.  


उक्त जानकारी इंटरनेट, सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफ़ॉर्म से ली गई है. सभी का आभार.


19 अक्टूबर 2024

पढ़ने की आदत

1. वॉरेन बफेट अपनी अत्यधिक पढ़ने की आदतों के लिए जाने जाते हैं। वह अपने दिन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा विभिन्न सामग्रियों को पढ़ने में बिताते हैं, जिनमें वार्षिक रिपोर्ट, व्यावसायिक समाचार पत्र और विभिन्न विषयों, विशेष रूप से निवेश और व्यवसाय प्रबंधन पर किताबें शामिल हैं।


2. ओपरा विन्फ्रे एक शौकीन पाठक हैं और उनका एक प्रसिद्ध पुस्तक क्लब है जहां वह अपने दर्शकों के साथ पुस्तकों की सिफारिश करती हैं और उन पर चर्चा करती हैं। वह अपनी सफलता का श्रेय पढ़कर लगातार सीखने की आदत को देती हैं।


3. एलोन मस्क को छोटी उम्र से ही एक शौकीन पाठक के रूप में जाना जाता है। उन्होंने साक्षात्कारों में उल्लेख किया है कि वह एक बच्चे के रूप में प्रतिदिन 10 घंटे पढ़ते थे। वह अक्सर अपने व्यापक ज्ञान का श्रेय अपनी व्यापक पढ़ने की आदतों को देते हैं।


4. बिल गेट्स एक शौकीन पाठक के रूप में जाने जाते हैं और अक्सर अपने ब्लॉग गेट्स नोट्स के माध्यम से अपनी पढ़ने की सिफारिशें साझा करते हैं। वह प्रौद्योगिकी और विज्ञान के बारे में गैर-काल्पनिक पुस्तकों से लेकर उपन्यासों और जीवनियों तक, कई प्रकार की सामग्री पढ़ता है।




5. फेसबुक की सीओओ शेरिल सैंडबर्ग अपनी अनुशासित पढ़ने की आदतों के लिए जानी जाती हैं। वह हर दिन पढ़ने के लिए समय निकालती है और अक्सर अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पढ़ी गई किताबों से अंतर्दृष्टि साझा करती देखी जाती है।


6. फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने हर दो हफ्ते में एक किताब पढ़ना एक व्यक्तिगत चुनौती बना दी है। वह सालाना अपनी पढ़ने की सूची साझा करते हैं और अक्सर किताबों के उनके व्यक्तिगत और व्यावसायिक विकास पर पड़ने वाले प्रभाव पर चर्चा करते हैं।


7. माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला कविता और साहित्य के प्रति अपने प्रेम के लिए जाने जाते हैं। वह अक्सर साहित्य से सीखे गए पाठों को अपनी नेतृत्व शैली और निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करते हैं।


8. पेप्सिको की पूर्व सीईओ इंद्रा नूयी एक उत्साही पाठक हैं, जिन्होंने अपनी नेतृत्व शैली और व्यवसाय के प्रति दृष्टिकोण को आकार देने का श्रेय पुस्तकों को दिया है। वह अक्सर अपने कर्मचारियों और साथियों को निरंतर सीखने और विकास को बढ़ावा देने के तरीके के रूप में किताबों की सिफारिश करती है।


ये व्यक्ति व्यक्तिगत और व्यावसायिक विकास के साथ-साथ अपने दृष्टिकोण और ज्ञान के आधार को व्यापक बनाने के लिए एक आदत के रूप में पढ़ने के महत्व को प्रदर्शित करते हैं।


पढ़ने की आदत कभी भी खराब, बुरी नहीं मानी जा सकती. एक बार आप भी इस आदत को अपनाकर देखें.  यद्यपि हम भी ऐसी आदत का शिकार हैं तथापि ऐसे बड़े-बड़े नामों वाले समूह का हिस्सा न बनने के कारण अपने बारे में यहाँ नहीं, कभी और सही। 


(उक्त जानकारी सोशल मीडिया पर अपने मित्र की प्रोफाइल से साभार) 

14 मई 2024

अटकी हुई कृपा दूर कर दी

एक सप्ताह से अधिक हो गया था क्रेडिट कार्ड बनकर आए हुए. तबसे कल रात तक छह अलग-अलग जगहों पर उसी क्रेडिट कार्ड से भुगतान करने की प्रक्रिया अपनाई. हर बार भुगतान प्रक्रिया पूर्ण न हो सकी. किसी न किसी कारण से भुगतान न हो पाता.

कई बार लगा कि पहली बार उपयोग कर रहे हैं सम्भव है कि ग़लत तरीक़े से कर रहे हों. कभी लगा कि नया कार्ड है हो सकता है बैंक से कुछ अलग एक्टिवेट करवाना पड़ता हो. अनुभवी लोगों से जानकारी की तो पता चला कि हम भुगतान की सही प्रक्रिया अपना रहे हैं, कोई गलती नहीं कर रहे हैं.

इसके बाद कल रात दिमाग़ घुमाया तो समझ आ गया कि कृपा कहाँ एक जगह अटकी हुई है, तभी भुगतान सफल न हो रहा. बस, आज सुबह ख़रीददारी मुहूर्त में दो फ़ाउण्टेन पेनऔर दो पुस्तकोंके ऑर्डर दिए, तत्काल भुगतान हो गया.

कल समझ आ गया था कि क्रेडिट कार्ड का पहला भुगतना अत्यंत मनपसंद सामग्री पेन या पुस्तक पर होना है. सो पेन और पुस्तक दोनों को वरीयता देते हुए अटकी कृपाको दूर किया.

 





 

11 अप्रैल 2024

उम्मीदों की प्याली : एक अभिनव प्रयोग

पिछले दिनों 'उम्मीदों की प्याली' का आना हुआ. इसे लेकर मित्रों में, परिचितों में एक उत्सुकता दिखाई दी. प्रकाशन पूर्व जब भी इस बारे में चर्चा हुई तो सभी को यही बताया गया कि इस पुस्तक में एक तरह का प्रयोग किया गया है.



अब प्रकाशन पश्चात् इस प्रयोग से कितने लोग पुस्तक के माध्यम से परिचित हुए, इसकी जानकारी नहीं मगर प्रयोग के बारे में पूछा बहुत लोगों ने. पुस्तक कौन खरीदेगा, कौन नहीं... ये अलग विषय है, यहाँ इस पुस्तक में किये गए प्रयोग के बारे में कुछ शब्द.

कविताओं के रूप में होने के बाद भी इसमें संकलित रचनाओं को कविता नहीं कह सकते. असल में किसी कविता को पढ़ कर, बातचीत के दौरान उभरे पद्य विचार को, दो-चार काव्य-पंक्तियों के प्रत्युत्तर के रूप में उभरी काव्य-पंक्तियों को संकलित करके पुस्तक का रूप दे दिया.



इस प्रयोग के साथ-साथ एक प्रयोग ये भी किया कि इस पुस्तक में संकलित सभी 80 काव्य-रचनाओं को एक-एक स्केच के द्वारा सजाया है.




रचनाकार-द्वय के बीच बातचीत के रूप में उभरी काव्य-रचनाओं को स्केच भी रचनाकार-द्वय के द्वारा मिले हैं.
उम्मीदों की प्याली को आप अपने हाथों में लेकर उसका स्वाद लेंगे तो एहसास और भी सुखद होगा.





'उम्मीदों की प्याली' श्वेतवर्णा प्रकाशन की वेबसाइट www.shwetwarna.com पर उपलब्ध है.



 

06 जनवरी 2024

तुहिना सहेजे है शबनम सी सहज भावनाओं को

बहुत दिनों बाद एक ऐसा काव्य-संग्रह देखने-पढ़ने का अवसर मिला जिसकी न केवल रचनाएँ साहित्यिक हैं बल्कि उसका नाम भी साहित्यिक है. तुहिना, जी हाँ, यही नाम है काव्य-संग्रह का. चलिए, पहला परिचय संग्रह के शीर्षक से ही करवाते हैं आपका. बहुत से लोगों के लिए यह शब्द जाना-पहचाना होगा और बहुत से लोगों के लिए इस शब्द, तुहिना से पहली बार परिचय हुआ होगा. ओस की बूँद का अर्थ स्वयं में सहेजे इस शब्द के संग्रह में कुछ इसी तरह की रचनाएँ हैं जो ओस की बूँद की तरह अपनी तरफ आकर्षित करती हैं.


इस आकर्षण में चमक उस समय और बढ़ जाती है जबकि जानकारी होती है कि यह काव्य-संग्रह लेखिका का पहला काव्य-संग्रह है. अध्यापन, लेखन से जुड़ी डॉ. ऋचा सिंह राठौर का पहला काव्य-संग्रह, तुहिना उनकी रचनात्मकता के साथ-साथ उनकी भावनात्मकता, संवेदनशीलता को दर्शाता है. जिस तरह से उन्होंने सूक्ष्म बिंदु से लेकर विस्तृत फलक तक अपनी दृष्टि को दौड़कर उसे अपनी कलम के सहारे शब्दों से सजाया है, वह सराहनीय है.


उनकी रचनाओं में एक तरफ उनके अपने जीवन की गति सी दिखाई देती है तो उसी के साथ वे देश भावना के साथ भी दिखाई देती हैं. प्रकृति के अंगों-उपांगों को जहाँ वे अपनी कलम से सजाती हैं तो देश के वीरों-वीरांगनाओं के प्रति भी सम्मान भाव प्रकट करती हैं. ऋचा सिंह की कविताएँ ऊर्जा का संचार करती सी मालूम होती हैं. उनकी शब्द संरचना निराशा का नहीं वरन आशा का संचार करती हैं. इसका प्रमाण उनकी रचनाएँ स्वतः देती हैं. इसे महज इस रूप में समझा जा सकता है कि ज़िन्दगी, एक लम्हे की ज़िन्दगी, ज़िन्दगी मुझे छोड़ आगे निकल गई, बूँद सी ज़िन्दगी, ज़िन्दगी के फैसले, जी भर जीने दो ज़िन्दगी आदि कविताओं में वे ज़िन्दगी के विविध रूप-रंग को दर्शाती हैं. इस ऊर्जा के कारण वे कहती हैं कि


ज़िन्दगी जाम तो नहीं

जो घूँट-घूँट पी जाये,

मिली है बड़ी शिद्दतों से

क्यों न जी भर के जी जाये.


उनकी कलम ज़िन्दगी को लेकर बस इतनी सी बात न कह कर आगे उसके खेल के बारे में भी अपनी बात रखती है.


ज़िन्दगी भी अजब

खेल दिखाती है

सोचो कुछ और

कुछ और करवाती है.


यह वाकई एक ऐसा सत्य है जिससे प्रत्येक व्यक्ति दो-चार होता है. हर एक व्यक्ति अपने जीवन में बहुत कुछ सोचता है मगर उसे क्या करना पड़ जाये, इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता. जीवन के अनिश्चय के बीच वे खुशियों को अपने घर बस जाने का आमंत्रण देती हैं.


हौसला, विश्वास, इरादा, भाव-बोध आदि कविताओं के द्वारा ऋचा सिंह दिल में छिपे गुबार को/अश्क बन कर बह जाने दो की तरह से बहुत सारे विचारों को तुहिना में बहा देती हैं. इसके लिए वे नियति को किसी भी तरह दोषी नहीं मानती हैं. वे बड़े ही सकारात्मक भाव से स्वीकारती हैं कि


क्या ख़ुशी क्या ग़म

आँसू थे किस्मत में

तो खुशियों में भी

आँखों से गिरे.


इसी सकारात्मकता के कारण वे जहाँ जीवन के विविध रंगों को अपनी कलम से सजाती हैं तो वे काली कराल सी, अंतस के राम, गांडीव उठा अर्जुन, लहू राणा का, दुर्गा स्वरूपा लक्ष्मी आदि के द्वारा ऐतिहासिक प्रतीकों को निखारती हुईं आज की बात करती हैं. वे अपनी इन कविताओं के सहारे लोगों को जागने का सन्देश देती हैं.


हे राम! अपने जीवन का

लक्ष्य साधो

नाराच के प्रहार से

पापियों को

मर्यादा में बांधो,

हे अंतस के राम!

तुम जागो.


ज़िन्दगी के, प्रकृति के, देश के बारे में कलम चलाती ऋचा सिंह बहुत ही सहज भाव से जीवन के कोमलकांत पक्ष पर भी लेखनी का प्रवाह दिखाती हैं. उन्होंने जिस सहजता के साथ ज़िन्दगी की कठोरता को चित्रित किया है, उसी सहजता के साथ वे प्यार, ख़ुशी जैसी कोमल भावना को चित्रित करती हैं. ऐ ख़ुशी, तू आना मेरा घर/बस जाना तू यहाँ आकर जैसी रचना स्वतः ही उनकी कोमल भावनाओं का उदघाटन करती है. वे ज़िन्दगी के कठोर और कोमल भावनाओं को समझती हैं.


जब लब होते खामोश

आँखें कहती हैं सारी कहानी

शब्दों से जो न कहा गया

वो मौन बहता है बनके

तेरी आँखों का पानी.


इसी तरह से


जज्बात-ए-दिल को

दफ्न किये रहे बरसों,

ख़ामोशी से लबों को

सिये रहे बरसों.


के द्वारा उनकी कलम दिल की मजबूरी को दर्शाती है. यह सूक्ष्म भावना उसी रचनाकार के दिल से उभर सकती है जिसने गंभीरता के साथ समाज के सभी पहलुओं पर अपनी दृष्टि डाली हो.


अपने पहले ही काव्य-संग्रह के द्वारा डॉ. ऋचा सिंह राठौर ने साहित्य जगत में एक आशा की किरण जगाई है. निश्चित ही निकट भविष्य में उनके द्वारा और भी महत्त्वपूर्ण कृतियों से साहित्य संसार जगमगाएगा.  


एक बूँद बन मोती की

धरती को

अम्बर की कहानी

सुनाती तुहिना.


निश्चित ही तुहिना ऐसी अनेक कहानियाँ सुनाती है. बस इसे दिल से, संवेदना से सुनने की आवश्यकता है.   

 


12 मई 2023

मोबाइल पर आये संदेशों की पुस्तक

व्हाट्सएप पर दोस्तों से बात करते समय कई बार दिल को छू लेने वाले संदेशों का आदान-प्रदान हो जाता है. उनको डिलीट करने का मन नहीं करता. इस तरह के संदेशों में कभी कविताएँ होती हैं तो कभी सामान्य सी बातें; कभी शुभकामना सन्देश तो कभी आपसी चुहल; कभी आज की बातें होती हैं तो कभी बचपन के किस्से, सभी में कुछ न कुछ ऐसा विशेष होता है जो कभी गुदगुदा देता है, कभी आँखों को नम कर देता है.


हम ऐसे सैकड़ों संदेश सुरक्षित रखे हुए हैं. विचार है कि कभी इनको लेकर एक किताब प्रकाशित करवाई जाएगी.

25 सितंबर 2022

पुस्तकों से दूर होता युवा

इंसानों ने अपने विकास के विभिन्न चरणों में खुद को और अधिक विकसित करने के लिए तकनीक का चयन किया, उसके द्वारा विभिन्न उपकरणों का निर्माण किया. निश्चित ही ऐसा करने के पीछे उसका उद्देश्य जीवन-शैली को सहज ढंग से चलाना रहा होगा. इसी सहज जीवन की संकल्पना में मोबाइल भी बनाया गया होगा. मोबाइल ने इंसानों की ज़िन्दगी को कितना आसान किया या कितना कठिन किया, इस बारे में सबकी अलग-अलग राय है. इसके बाद भी एक बात से शायद ही कोई इंकार करेगा कि मोबाइल के आने ने, मोबाइल के अत्यधिक उपयोग ने प्रत्येक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से, समाज से जैसे अलग कर दिया है. प्रत्येक व्यक्ति अपने मोबाइल के साथ अपने ही बने-बनाए एक खाँचे में बंद नजर आ रहा है. कहीं भी निकल जाइए, किसी भी जगह नजर दौड़ाइए, हर कोई मोबाइल में तल्लीन दिखाई दे रहा है. बड़े हों या बच्चे, युवा हों या वृद्ध, स्त्री हो या पुरुष, अधिकारी हो या व्यापारी सभी के सभी मोबाइल में ऐसे मग्न समझ आते हैं जैसे बिना मोबाइल के उनका एक पल काटना मुश्किल है.


मोबाइल किसके लिए कितना उपयोगी है, कितना नहीं यह उसकी स्थिति और उसके कार्य पर निर्भर करता है. इधर देखने में आ रहा है कि विद्यालयों, महाविद्यालयों के विद्यार्थी भी मोबाइल का बुरी तरह से इस्तेमाल कर रहे हैं. इनमें से शायद ही इक्का-दुक्का होंगे जो अपने पाठ्यक्रम से सम्बंधित जानकारियों को मोबाइल पर खोजते होंगे. महाविद्यालय में घुसते ही चारों तरफ हरियाली मन प्रसन्न कर देती है और उसी हरियाली के बीच जगह-जगह लड़के-लड़कियों के छोटे-छोटे झुण्ड सेल्फी लेने में तल्लीन दिखाई देते हैं. अध्ययन संस्थाओं के अलावा भी बाजार में, टैम्पो में, बस में, ट्रेन में, रिक्शे आदि में भी लड़के, लड़कियों का मोबाइल से चिपके रहना दिखाई देता है. अब सफ़र के दौरान या फिर कहीं फुर्सत के समय में युवाओं का किताबों से दोस्ती करते दिखाई पड़ना लगभग विलुप्त सा हो गया है.




सफ़र के दौरान, ट्रेन या बस का इंतजार करने के समय, खाली समय में पहले की तरफ अब इक्का-दुक्का लड़के-लड़कियाँ दिखाई देते हैं जो किसी पुस्तक के साथ हैं. युवा वर्ग बहुतायत में अपने मोबाइल में ही मगन है. तकनीकी ने ही पुस्तकों का विकल्प किंडल संस्करण के रूप में उतारा था. इसके प्रति भी युवाओं का रुझान बहुत ज्यादा देखने को नहीं मिलता है. समझ नहीं आता है कि आखिर कोई युवा बिना पढ़े कैसे अपने आपको भविष्य के लिए तैयार कर रहा है? इस आश्चर्य से ज्यादा आश्चर्य की बात यह लगती है कि अध्यापन से जुड़े हुए बहुतेरे लोग भी किताबों से दूरी बनाये हुए हैं. अपने आसपास के लोगों में, अपनी मित्र-मंडली में बहुत कम ही मित्र ऐसे मिलते हैं जो पुस्तक पाठन के प्रति आकर्षण बनाये हुए हैं. आये दिन प्रकाशित होने वाली पुस्तकों के सम्बन्ध में चर्चा करने पर जानकारी मिलती है कि न तो युवा वर्ग के लोग पुस्तक पढ़ना चाहते हैं और न ही बच्चों को पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित किया जा रहा है. 


असल में पठन-पाठन के प्रति रुचि को जागृत करना पड़ता है. समाज में जिस तरह से मोबाइल के अथवा अन्य आधुनिक उपकरणों के आने से व्यक्तियों ने अपने आपको उसी में व्यस्त रखना शुरू कर दिया है, उससे भी पुस्तकों के प्रति लोगों की अरुचि देखने को मिलती है. मोबाइल और इंटरनेट की सहज उपलब्धता में युवा वर्ग तेजी से सोशल मीडिया की तरफ मुड़ा है. उसका बहुतायत समय इसी पर गुजरने लगा है. सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर उसकी लेखकीय सक्रियता देखने को मिलती है किन्तु यह भी सीमित शब्दों में बनी हुई है. इन सीमित शब्दों की लेखकीय यात्रा में भी ज्यादातर युवा कॉपी-पेस्ट की तकनीक के सहारे अपना काम चला रहे हैं. यह सोचने वाली बात है कि जब पढ़ा ही नहीं जा रहा है तो लिखा कैसे जा सकता है? लिखने के पहले बहुत सारा पढ़ने की आवश्यकता होती है. सच तो यह है कि अब घरों से ही धीरे-धीरे पढ़ने की, पुस्तकें-पत्रिकाएं लाने की प्रक्रिया ही समाप्त होती जा रही है.


चूँकि एक धारणा लगभग सभी ने बना रखी है कि मोबाइल के, तकनीक के इस दौर में आज सबकुछ इंटरनेट पर उपलब्ध है. इसने भी पढ़ने के प्रति सक्रियता को कम किया है. किसी भी जानकारी के लिए, तथ्यात्मक खोज के लिए बजाय पुस्तकों के युवा वर्ग अब मोबाइल की तरफ जाना पसंद करने लगे हैं. यही कारण है किंडल संस्करण एकसाथ, एक जगह पर हजारों-हजार पुस्तकों को उपलब्ध करवाने के बाद भी युवा वर्ग में पुस्तक पाठन के प्रति शौक पैदा नहीं कर पा रहा है. इसका एक बहुत बड़ा कारण बचपन से ही बच्चों में किताबों को पढ़ने के लिए प्रेरित न कर पाना रहा है. आज बच्चे जिस शौक के साथ मोबाइल को अपना साथी बना रहे हैं, यदि उन्हें किताबों का महत्त्व समझाएं, उसकी उपयोगिता के बारे में बताते हुए किताबें पढ़ने को प्रोत्साहित करें तो संभव है कि वे इस ओर आगे बढ़ें. बच्चों को समझाना होगा कि अपने देश की संस्कृति, सभ्यता, इतिहास, महापुरुषों आदि के बारे में जानने-समझने के लिए किताबों से अच्छा कोई साथी नहीं. वास्तव में यदि समझ आ जाये तो पुस्तकों से बेहतर कोई मित्र नहीं. सफ़र हो, घर को, भीड़ हो, अकेलापन हो या कहीं, कैसी भी स्थिति सभी में किताबें मित्रवत साथ निभाती हैं.




 

11 जनवरी 2022

आखिर शास्त्री जी के साथ क्या हुआ था?

11 जनवरी, देश के दुर्भाग्य की तारीख. इस दिन देश के लाल ने विदेशी धरती पर अंतिम साँस ली थी. जी हाँ, आप सही समझ रहे हैं. देश के दूसरे और अत्यंत लोकप्रिय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी के बारे में ही ये बात कही गई. वर्ष 1966 को ताशकंद किस कारण से शास्त्री जी का जाना हुआ, वहाँ समझौते के बाद की उनकी गतिविधियाँ क्या रहीं, रात को कैसे भगदड़ मची इस बारे में बहुत बार वही सामान्य सी बात लिखी जा चुकी है, हम सभी के द्वारा बराबर पढ़ी भी जाती रही है. किसी भी सरकार की तरफ से शास्त्री जी की सामान्य और असामान्य मृत्यु के बीच की बारीक सी रेखा न मिटाई जा सकी, झीना सा पर्दा गिराया न जा सका. ऐसा क्यों होता रहा, क्यों हुआ ये बस सवाल बने हुए हैं मगर इनके जवाब मिलते न तब दिखे थे और न अब दिख रहे हैं.


शास्त्री जी की मृत्यु से जुड़े तमाम सारे मुद्दों, पहलुओं को अत्यंत नजदीक से अध्ययन करने वाले अनुज धर कुछ समय पूर्व आई विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘द ताशकंद फाइल्स से बहुत आशान्वित दिखाई दे रहे इसके पीछे वे अमेरिका की एक फिल्म का हवाला देते हैं, जिसके आने के बाद से अमेरिका में खलबली मच गई थी. यह फिल्म जॉन एफ. कैनेडी की हत्या से सम्बंधित तमाम दावों पर आधारित थी. बताया जाता है कि इस फिल्म के आने के बाद अमेरिका में कैनेडी की हत्या की सच्चाई जानने के लिए लोगों का दबा आक्रोश बाहर निकल आया था. ‘द ताशकंद फाइल्स फिल्म के आने के बाद ऐसा कुछ भारत देश में तो दिखाई नहीं दिया. क्या इसलिए कि यहाँ कि जनता वास्तविक जीवन पर बनी ऐसी फिल्मों को भी मनोरंजन की दृष्टि से देखती है? कहीं ऐसा तो नहीं कि यहाँ फिल्मों का सम्बन्ध नाचने-गाने से जोड़ दिया गया है? कहीं ऐसा भी तो नहीं कि फिल्मों का तात्पर्य कमाई करना, करोड़ों रुपयों के क्लब में शामिल होना बना हुआ है? या फिर देशवासी शास्त्री जी की मृत्यु का सच जानने के इच्छुक नहीं?




इस फिल्म की बात को एक तरफ कर भी दिया जाये तो ऐसा सच जान पड़ता है कि आम भारतीय नागरिक अब किसी भी रूप में देश की दो संदिग्ध मौतों के खुलासे के लिए लालायित नहीं है. उसे इसकी फ़िक्र नहीं कि देश के दो अत्यंत लोकप्रिय व्यक्तित्वों की मृत्यु का सच सामने आये. शास्त्री जी की तरह ही नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु का सच अभी भी परदे के पीछे छिपा हुआ है. बहरहाल, आज चर्चा शास्त्री जी की. एक पल को सोचिये कि देश का प्रधानमंत्री देश से बाहर किसी समझौते के लिए जाए और वहाँ से उसका जीवित आना न हो. मृत्यु भी सामान्य सी स्थिति में न हुई हो. उस व्यक्ति का पार्थिव शव जब विदेश से अपनी धरती पर लाया जाये तो उसका पोस्टमोर्टेम न करवाया जाये. शव भी देखने में सामान्य न समझ आ रहा हो. ऐसी तमाम स्थितियों के बाद सबकुछ सामान्य तरीके से गुजर गया. इतने वर्षों के बाद भी शास्त्री जी के परिजन कैसे अपने दिल को समझाते होंगे? कैसे उस समय में देश की सरकार ने चुप्पी साध ली होगी? कैसे अभी तक तमाम सरकारें ख़ामोशी बनाये बैठी हैं?


और भी बहुत सारे सवाल हैं जो मन को व्यथित कर जाते हैं. दिल-दिमाग में उथल-पुथल उस समय और बढ़ जाती है जबकि अनुज धर की पुस्तक ‘शास्त्री के साथ क्या हुआ था? में दिए गए तथ्यों, विचारों, रिपोर्टों, बयानों आदि को गंभीरता से पढ़ा जाता है. पृष्ठ दर पृष्ठ बहुत कुछ सामने आता रहता है. चूँकि किसी भी पुस्तक के साथ वैधानिकता का सवाल जुड़ा होता है, ऐसे में उस पुस्तक के अंश यहाँ दे पाना हमारे लिए सहज नहीं. इसके बाद भी कह सकते हैं कि अनुज धर ने बहुत से तथ्यों के आलोक में बहुत सी स्थितियों को स्पष्ट किया है. बहुत से उपायों, कदमों की भी सम्भावना व्यक्त की है.


फिलहाल तो हम सभी शास्त्री जी को बस श्रद्धांजलि ही दे सकते हैं. सच कितना क्रूर हो सकता है, ये तो उसी समय पता चलेगा जबकि झीना सा पर्दा गिरे या फिर वो बारीक सी रेखा मिटे.

11 जनवरी 2021

शास्त्री के साथ क्या हुआ था?

जब साल 1966 के अप्रैल में ताशकंद में आए एक विनाशकारी भूकंप में सैकड़ों जानें चली गयी, तब सलामत बचे लोगों में कुछ को ऐसा लगा कि जैसे ईश्वर भारतीय प्रधानमंत्री की उनके यहाँ उसी साल हुई मौत से नाराज थे. कुछ महीनों बाद आँखों में आँसू लिए ललिता शास्त्री उस विला को देखने को पहुँचीं, जहाँ उनके पति को ठहराया गया था. एक महिला कर्मचारी उन्हें उस बेडरूम तक ले गई, जहाँ शास्त्री ने अपनी आखिरी साँस ली थी. शास्त्री का कमरा दिखाते वक्त वो उज्बेकी महिला अपनी भवों में सिलवटें डालकर गंभीरता से फुसफुसाई... “कोई टेलीफोन नहीं”- यानी अपने आखिरी वक्त में भारतीय प्रधानमंत्री एक तरह से बाकी दुनिया से कटे हुए थे.


लोगों को संदेह था कि लाल बहादुर शास्त्री की मौत के बारे में आधिकारिक तौर पर जो जानकारी दी गई थी, उसमें कुछ न कुछ जरूर छिपाया गया था. शास्त्री की मौत से जुड़ी शंकाओं के बारे में जहाँ ताशकंद में दबी जुबान में बातें होती थीं, तो वहीं उन दिनों भारत में यही चर्चा सबसे बड़ा विषय था. आज भी ताशकंद में शास्त्री जी की मृत्यु और नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का रहस्यमई हालत में लापता होना देश के सबसे विवादित सियासी मसले हैं.


शास्त्री की मौत हमारे दिलो-दिमाग में आज भी कुछ ऐसे बसी है कि जब भी उनका जिक्र होता है, चर्चा खुद-ब-खुद जनवरी 1966 के उस घटनाक्रम तक पहुँच जाती है. आखिर उस दिन ताशकंद में क्या हुआ था? शास्त्री जी जैसे महान व्यक्तित्व को किसी किस्म के प्रचार की जरूरत नहीं है. उनकी सादगी और ईमानदारी हमारे जेहन में हमेशा के लिए दर्ज है. लेकिन ये सवाल आज भी चुभता है कि आखिर हमारे प्रधानमंत्री की किसी विदेशी जमीन में संदिग्ध मौत पर कभी कोई जाँच क्यों नहीं की गई? जबकि यह हमारे अब तक के इतिहास का इकलौता ऐसा मामला है.


ऐसा भी नहीं है कि ये मामला कभी देश के सामने नहीं लाया गया हो. संसद में शास्त्री के लिए शोक सन्देश पढ़े जाने के फ़ौरन बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने पूछा था: “ताशकंद में क्या हुआ? क्या उनकी मृत्यु को टाला नहीं जा सकता था? क्या यह संभव नहीं था कि बिस्तर से बिना उठे ही वह अपने डॉक्टर को और नौकर को बुला सकते? क्या यह संभव नहीं था कि वहाँ ऑक्सीजन की व्यवस्था होती? जो पाँच या सात मिनट मिले थे, उसमें अगर उचित प्रबंध होता, तो शायद हम उन्हें बचा पाते?”


लेकिन भला कौन था-जो शास्त्री जी को मृत देखना चाहता था? उनके बचपन के दोस्त टीएन सिंह के मुताबिक वो ‘अजातशत्रु’ (जिसका कोई शत्रु न हो) थे. अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए भी मानती थी कि 40 साल के सियासी सफ़र में शास्त्री के न के बराबर ही दुश्मन थे. ऐसे में कौन था जिसको शास्त्री की मौत से फायदा होता? आखिर भारत के खिलाफ ऐसे खतरनाक अपराध की सोच के पीछे भी भला क्या मकसद हो सकता था?




उनकी मौत पर कभी कोई जाँच नहीं हुई, क्योंकि सरकार हमेशा यही कहती रही कि शास्त्री की मृत्यु हार्ट अटैक से ही हुई है. उनके अनुसार शक की कोई गुंजाइश ही नहीं थी. कुछ लोगों ने ‘दाल में कुछ काला’ होने के आरोप भी लगाये, लेकिन सरकार ने इस मामले में अपने आधिकारिक स्टैंड को बदलना दूर उस पर दोबारा गौर करना भी मुनासिब नहीं समझा. जाँच को लेकर उठी आवाजें धीरे-धीरे खामोश हो गईं. बीच-बीच में सुभाष चन्द्र बोस के लापता होने के विवाद के साथ ये मामला भी उठाया जाता रहा. कुछ वक्त बाद दोनों ही मसले एक ही चश्मे से देखे जाने लगे. 1970 में जब समर्थकों के दवाब में सरकार बोस के मामले की न्यायिक जाँच कराने को तैयार हो गई, तब शास्त्री के समर्थकों ने भी (इनमें से ज्यादातर लोगों ने बोस के मामले में भी आवाज़ उठाई थी) उनके केस की जाँच के लिए भरसक कोशिशें की, लेकिन सरकार पर उसका कोई असर नहीं हुआ. उसी साल से यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया.


तो फिर हम आज साल 2019 में इस मामले को लेकर इतना गंभीर क्यों हैं? शास्त्री के निधन के 54 सालों बाद उस घटना को कुरेदने से भला क्या हासिल होगा? दरअसल मेरा मकसद है कि इस मुद्दे पर पूर्णतः विराम लगना चाहिए, जो कि आज तक नहीं हो पाया है. ऐसा तभी संभव होगा जब इस घटना की तह तक पहुँचने की कोशिश की जाये, ताकि उस रात की एक मुकम्मल तस्वीर सामने आ सके. आज भी कई लोग हैं जो उस घटना की पूरी सच्चाई जानना चाहते हैं. खासकर शास्त्री जी के परिजन, जो आज भी उस हादसे से उबर नहीं सके हैं. उस भयावह रात के बारे में सोचकर अभी भी उनके दोनों बेटों की आँखें डबडबा आती हैं. उस रात फोन पर शास्त्री जी की हालत नाजुक होने का संदेशा मिलने के बाद उनके परिवार के लोग अगले आधे घंटे तक भगवान के आगे प्रार्थना करते रहे, लेकिन...


सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु से जुड़े विवाद पर एक मशहूर किताब लिखने के बाद मुझे ‘शास्त्री’ की संदिग्ध मौत पर लिखने के लिए भी कई सुझाव दिए गए. मैं उन सुझावों को टालता रहा. दरअसल मेरे पास ऐसा न करने की दो वजहें थीं. एक तो यह कि ‘बोस’ के मामले के उलट शास्त्री की मौत के केस में आधिकारिक तौर पर कुछ जानकारियाँ नहीं थीं. इसको लेकर दाखिल की गई मेरी आरटीआई (शास्त्री की मौत से जुड़े मामले में दाखिल की गई ये पहली RTI थी) से भी बस कुछ खबरों और लेखों के लायक जानकरी ही हासिल हो सकी थी. भले ही दोनों मामलों में चर्चा एक साथ की जाती हो लेकिन नेता जी और शास्त्री जी के मृत्यु के मामले एक लिहाज में बिलकुल अलग हैं – एक तबके का मानना रहा है कि नेताजी अपनी मृत्यु की अधिकारिक तारीख के बहुत बाद भी जिन्दा थे, जबकि शास्त्री जी की मृत्यु यकीनन ताशकंद में ही हो गई थी. लिहाजा नेताजी के मामले में खोजबीन के लिए भी काफी कुछ था. जबकि शास्त्री के केस में सिर्फ यही तय करना था, कि क्या उनकी मौत प्राकृतिक थी या नहीं? बिना पर्याप्त जानकारी और तथ्यों के इस घटना को लेकर एक ठोस, सटीक और संवेदनशील कहानी बुनना किसी पहाड़ पर चढ़ने से कम मुश्किल नहीं था.


इस किताब को न लिखने के पीछे मेरा दूसरा तर्क था कि कहीं मेरी पहचान राष्ट्रीय नेताओं की मौत पर लिखते रहने वाले लेखक के तौर पर न बन जाए! हालाँकि मेरा मकसद ऐसी गुत्थियों को सुलझाने का है. इसलिए शास्त्री केस पर कई बेहद चर्चित और सराहे गए लेखों को लिखने के बाद भी मैं इस मुद्दे पर किताब लिखने को लेकर इच्छुक नहीं था.


लेकिन कुछ महीनों पहले मैं दिल्ली में फिल्म निर्माता विवेक अग्निहोत्री के साथ खाने की मेज पर बैठा था. इसी दौरान पहली बार मेरे दिमाग में इस किताब को लिखने का ख्याल आया. अग्निहोत्री इसी मामले को लेकर ‘द ताशकंद फाइल्स’ के नाम से एक फिल्म ला रहे हैं. उनकी इस फिल्म के लिए जरूरी तथ्य जुटाने के बाद कुछ सार्थक और बेहतर करने की चाह में मैंने अपनी हिचकिचाहट को दरकिनार कर इस किताब पर काम शुरू किया, ताकि फिल्म के साथ बने माहौल के बीच राष्ट्रीय महत्त्व के मसले को एक अंतिम निष्कर्ष तक पहुँचाया जा सके.



(अनुज धर जी की प्रसिद्द पुस्तक शास्त्री के साथ क्या हुआ था? का प्राक्थन, साभार, लाल बहादुर शास्त्री जी की पुण्यतिथि पर)
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वंदेमातरम्

28 नवंबर 2020

रिश्ते अनमोल हैं, उनका कोई नाम नहीं

भारतीय राजनीति में राजमाता के रूप में सम्मानजनक रिश्ता बनाने वालीं विजयाराजे सिंधिया जी की आत्मकथा आज हमें आशीर्वाद देने को प्राप्त हुई. उनके यथार्थ का प्रतिबिम्ब बनती राजपथ से लोकपथ पर को देखकर बहुत सी यादें ताजा हो गईं. जनमानस के लिए राजमाता हमारे लिए बुआ जी रहीं. यह रिश्ता भी ऐसा रहा जो किसी सम्बोधन से मुक्त समझा-माना जा सकता है. एक पल को सोचिए कि जिनको हम बुआ पुकारते हों, उनके भाई-भाभी को हम मामा-मामी कहते हों, कैसा महसूस होगा आपको? कुछ इसी तरह का रिश्ता बना हुआ है उस परिवार से.




आपकी राजमाता, हमारी बुआ जी जनपद जालौन से सम्बन्ध रखती हैं. उनका मायका यहीं है और परिजन उरई में निवास करते हैं. इस परिवार से हमारे परिवार का बहुत पुराना रिश्ता आजतक बना हुआ है. चलिए, पारिवारिक इतिहास-भूगोल के स्थान पर वो बात जो हम कहने यहाँ आये हैं. बुआ जी के भाई श्री सुरेन्द्र सिंह मोना उरई में ही सपरिवार रह रहे हैं. हम बचपन से उनका अपने घर आना-जाना देख रहे हैं. उनका आना हम छोटे बच्चों के लिए इसलिए भी सुखद होता था क्योंकि वे पिताजी से मुलाकात करने के बाद जब चलने को होते तो हम भाइयों सहित मोहल्ले के बच्चों को अपनी जीप में बिठाकर एक चक्कर लगवाते थे. पिताजी को वे अपने छोटे भाई की तरह मानते रहे और हम लोग तब उनको कभी मोना अंकल, कभी मोना ताऊजी कहते थे.


जब हम छोटे थे तो एकाधिक बार पिताजी के साथ अंकल के घर जाना हुआ, उस समय की बहुत याद नहीं है मगर एक बार उस समय जबकि हम इंटरमीडिएट में थे, किसी काम से घर गए. अंकल से अपनी धर्मपत्नी से हमारा परिचय करवाया. हमने अपने पारिवारिक रिश्तों के चलते मोना अंकल के चरण स्पर्श किये और आगे बढ़कर जैसे ही आंटी के पैर छूने चाहे तो उन्होंने मना कर दिया. पहले तो हमारी समझ में नहीं आया कि ऐसा क्या हो गया हमसे कि आंटी ने पैर छूने से रोक दिया मगर अगले ही पल सारी बात समझ आ गई. असल में मोना अंकल हमारे ननिहाल के पास के गाँव के हैं, साथ ही हमारे एक मामाजी के अभिन्न मित्रों में रहे हैं. वे हमारे मामा लोगों को अपने सगे भाइयों तरह मानते रहे हैं. यह रिश्ता आंटी को ज्ञात था ऐसे में उन्होंने मोना अंकल से उस दिन साफ़-साफ़ कहा कि वे भले ही हमसे पैर छुवाएँ, अंकल कहलवाएं मगर वे न पैर छूने की, न आंटी कहने की अनुमति देंगीं. उस दिन से हम उनको मामी सम्बोधित करते रहे.


बचपन में जब भी पिताजी के साथ राजमाता से मिलना हुआ तो पिताजी उनको जिज्जी कहते थे और हम बुआ जी. वही सम्बोधन बराबर बना रहा. बुआ जी से स्वतंत्र रूप से मिलना उस समय हुआ जबकि हम ग्वालियर से बी०एससी० कर रहे थे. हमारे हॉस्टल वार्डन चंदेल साहब ने उनसे मिलवाया, पिताजी का परिचय दिया उसके बाद उनके ग्वालियर आने पर बुआ जी हमें बुलवा लेतीं. बहुत स्नेह के साथ मिलतीं, उरई की जानकारी लेतीं, अपने परिचित सभी लोगों के हालचाल लेतीं. उन्होंने कभी हमारे बुआ कहने पर कुछ नहीं कहा सो उनको बुआ ह कहते रहे. मोना अंकल ने भी अंकल कहने पर कोई आपत्ति न की तो उनको आजतक अंकल ही कहते हैं. उनकी धर्मपत्नी ने आंटी कहने पर अपनी असहमति व्यक्त की तो वे हमारे लिए आज भी मामी जी के रूप में स्मृतियों में बसी हैं.


आज उस घर में मोना अंकल की तीसरी पीढ़ी युवावस्था में है मगर हमें पहले जैसा ही स्नेह भाइयों, भाभियों, बच्चों से मिलता है. यह संबंधों, रिश्तों की पावनता, विश्वास और संस्कारों की बात होती है कि जहाँ खून का रिश्ता न हो वहाँ रक्त-सम्बन्धियों से अधिक मजबूत रिश्ता तीन-तीन पीढ़ियों तक चलता रहे. सच ही है कि रिश्तों का नाम सिर्फ पहचान के लिए होता है अन्यथा रिश्ते अनमोल हैं, उनका कोई नाम नहीं, कोई सीमांकन नहीं.


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01 नवंबर 2020

तपती दुपहरी की शाम - नई प्रकाशित पुस्तक

तपती दुपहरी की शाम

ये नया काव्य संग्रह है जो श्वेतवर्णा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है. यह प्रकाशन की वेबसाइट पर ही बिक्री हेतु उपलब्ध है.

इस लिंक के द्वारा आप अपना स्नेह पुस्तक के प्रति प्रदर्शित कर सकते हैं.

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पुस्तक को व्हाट्सएप्प के द्वारा भी मँगवाया जा सकता है. इसके लिए निम्न व्हाट्सएप्प नंबर पर संपर्क कर सकते हैं.

8447540078

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वर्ष 2020 की पहली प्रकाशित पुस्तक. कुल मिलाकर इस वर्ष चार पुस्तकों का अभी तक प्रकाशन हो चुका है, इसमें तीन पुस्तकें किंडल संस्करण वाली शामिल हैं.







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