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12 सितंबर 2023

हिन्दी शब्दों का अप्रचलित होते जाना सुखद नहीं

हिन्दी से सम्बन्धित दिवस, सप्ताह आदि का आयोजन शुरू होते ही सभी जगह हिन्दी की बात होने लगती है. हिन्दी को लेकर हिन्दी भाषियों और अहिन्दी भाषियों के द्वारा हिन्दी विकास के लिए अपने स्तर पर चर्चा आरम्भ हो जाती है. आज हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी के विकास, उसकी उन्नति, राष्ट्रभाषा बनने की राह में आते अवरोध, वैश्विक भाषा बनने की राह, हिन्दी उपन्यास को बुकर मिलने, हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ में भाषाई मान्यता मिलने आदि पर चर्चा न करके कुछ ऐसे बिन्दुओं पर चर्चा करते हैं, जिन पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता है. आज बहुत से हिन्दी शब्द सामान्य प्रयोग से बाहर होते जा रहे हैं या कहें कि बाहर किये जा रहे हैं. इनकी जगह पर अंग्रेजी शब्दों को सहजता से इस्तेमाल किया जा रहा है. ऐसी स्थिति के लगातार स्वीकार्यता मिलने से बहुत सारे हिन्दी शब्दों का विलोपन देखना पड़ सकता है. 




देखा जाये तो शब्दों की अपनी ही निराली दुनिया है. इस शाब्दिक दुनिया में ऐसे बहुत से शब्द हैं जिनका कोई विशेष अर्थ नहीं हैं मगर वे बहुतायत में बोले जाते हैं, आपसी वार्तालाप में प्रयोग किये जाते हैं. ऐसे शब्दों के अर्थ व्यक्तियों की बातचीत के सन्दर्भ में स्वतः निर्धारित हो जाते हैं. ग्रामीण अंचल में सहज रूप से बोलचाल में आने वाला शब्द ‘ठलुआ’ राजनीति में उस समय खूब चर्चा में रहा जबकि एक राजनैतिक महाशय ने इसे चर्चा के केन्द्र में ला दिया था. शब्दों के ऐसे प्रयोग के साथ-साथ शब्द-संकुचन, शब्द-विस्तार जैसी अवधारणा सहज देखने को मिलती है. हमारे आसपास बहुत से शब्द ऐसे हैं जो अपने मूल अर्थ से अधिक विस्तार पा गए. ‘डालडा’‘टुल्लू’‘ऑटो’‘तेल’ आदि ऐसे ही शब्द हैं जिनका अपना विशेष सन्दर्भ है किन्तु आज ये व्यापकता के साथ प्रयुक्त किये जा रहे हैं. वनस्पति घी के एक ब्रांड के रूप में सामने आये डालडा को आज ब्रांड नहीं वरन उत्पाद के रूप में देखा जाता है. इसी तरह तेल शब्द का अभिप्राय उस उत्पाद से है जो तिल से निकलता है. आज इसका विस्तार होकर अनेक तरह के पदार्थों के लिए प्रयोग में लाया जाने लगा. शब्दों की इसी व्यापकता के सन्दर्भ में आज एक शब्द ‘निर्भया’ भी चर्चा में है. दिल्ली में दिल दहलाने वाली घटना के बाद निर्भया शब्द चलन में आया और आज इसे अन्य दूसरी घटनाओं के साथ भी जुड़ा हुआ पाते हैं. बिना उसका मर्म जाने, बिना शब्दों का मूल भाव जाने उसे व्यापक सन्दर्भों में प्रयुक्त किया जाना भाषाई विसंगति ही है. 


शब्द-विस्तार की तरह शब्द-संकुचन की स्थिति भी देखने में आती है. इसके उदाहरण के रूप में ‘कमल’ को लिया जा सकता है. कमल के विविध पर्यायों के अलग-अलग सन्दर्भ, अलग-अलग अर्थ हैं वो चाहे ‘सरोज’ हो, ‘पंकज’ हो या फिर ‘नीरज’ आदि हो. इसके बाद भी किसी भी स्थान विशेष पर खिले हुए कमल-पुष्प को सिर्फ कमल से ही पुकारा जाता है. दरअसल शब्द-संकुचन अथवा शब्द-विस्तार की स्थिति व्यक्ति की उस मानसिकता के कारण उपजती है जहाँ वो किसी भी शब्द अथवा स्थिति के मूल में जाना पसंद नहीं करता. किसी शब्द के मूल अर्थ की जानकारी लेने का प्रयास नहीं करता है, वहाँ भी ऐसी स्थिति देखने को मिलती है. इनके अलावा भाषाई स्तर पर शब्दों के विलुप्त होने की स्थिति भी अब आम हो चली है.


शब्दों का विलुप्त होना उनके चलन में न रहने के कारणशब्द विशेष के कार्यों, वस्तुओं आदि के चलन में न रहने के कारणउनसे गँवईपन का बोध होने के चलते उनको किनारे किये जाने के कारण से होता है. बहुत सारे ऐसे शब्द हमारे बीच से इस कारण गायब हुए क्योंकि उनसे सम्बंधित सेवाओं का, वस्तुओं का प्रचलन ही समाज में नहीं हो रहा है. इनमें ‘भिश्ती’, ‘मसक’, ‘ठठेरा’, ‘सिल-बट्टा’, ‘मूसल’ आदि शब्दों को लिया जा सकता है. किसी समय ग्रामीण अंचलों में धड़ल्ले से बोले जाने वाला ‘फटफटिया’ शब्द ‘मोटरसाईकिल’ से होता हुआ ‘बाइक’ पर आकर रुक गया. इसी तरह से सामान्य बोलचाल में हिन्दी शब्दों की उपलब्धता के बाद भी अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग से भी बहुत से शब्द या तो चलन से बाहर हो गए हैं या फिर उसी राह पर हैं. घर में काम आने वाली ‘तश्तरी’ अब ‘प्लेट’ में बदल चुकी है. ‘प्याले’ भी ‘कप’ में बदल गए हैं. ‘फीवर’, ‘वीकनेस’, ‘डॉगी’, ‘केयर’, ‘टेस्टी’, ‘वीसी’, ‘रजिस्ट्रार’, ‘एडमीशन’, ‘लिस्ट’ आदि सहित ऐसे अनेक शब्द हैं जो बहुत तेजी से आम बोलचाल में शामिल होकर मूल हिन्दी शब्दों ‘बुखार’, ‘कमजोरी’, ‘कुत्ता’, ‘स्वादिष्ट’, ‘कुलपति’, ‘कुलसचिव’, ‘प्रवेश’, ‘सूची’ आदि को चलन से बाहर करने में लगे हैं.


भाषाई स्तर पर ये स्थिति चिंताजनक हैहोनी भी चाहिए क्योंकि ऐसे अनेक मूल हिन्दी शब्द अपने अस्तित्व में होने के बाद भी धीरे-धीरे चलन से बाहर होते जा रहे हैं. अपने अस्तित्व में होने के बाद भी शिक्षा क्षेत्र से ‘भौतिकी’, ‘रसायन विज्ञान’ आदि जैसे कुछ शब्द अब चलन से बाहर ही हैं. इनकी जगह पर सहजता से ‘फिजिक्स’,’ केमिस्ट्री’ का प्रयोग होने लगा है. कई बार लगता है कि जब इन्सान ने अपने रिश्तोंसंबंधोंपरिवार तक को विलुप्त होने की स्थिति में पहुँचा दिया है तो फिर शब्दों की बिसात ही क्या है. तकनीकी के बढ़ते जा रहे प्रभाव के चलते एक अबोल स्थिति इंसानों के मध्य पनपती जा रही है. सूचना तकनीकी क्रांति ने बातचीत को भी लगभग समाप्त कर दिया है. संदेशों का आदान-प्रदान करके कर्तव्यों की इतिश्री की जाने लगी है. ऐसी अबोल स्थिति में जबकि संवाद विलुप्त हैंबातचीत में ही शब्द विलुप्त हैं तो फिर भाषाई विलुप्तता से घबराहट किसलिए? 






 

14 सितंबर 2021

अपनी भाषा का सम्मान रहे

हिन्दी दिवस का आयोजन बहुत से लोगों के लिए महज एक औपचारिकता सी है. इस औपचारिकता में लोग भूल जाते हैं कि यह दिवस हिन्दी के लिए है न कि हिन्दी साहित्य के लिए. आज सुबह-सुबह ही एक सज्जन मिल गए. उन्होंने हिन्दी दिवस की शुभकामनायें दी तो हमने भी जवाब में उनको शुभकामना बोल दिया. इस पर वे बड़े ही आत्ममुग्ध भाव से बोले कि न, ये हमारा दिन नहीं बल्कि आपका दिन है. हम तो साइंस वाले आदमी हैं. हमारा हिन्दी से क्या काम?


उनको ये बताते हुए कि हम भी साइंस वाले आदमी हैं, समझाया कि आपने अभी जो गर्वोक्ति की है वो किस भाषा में की? बस इसी भाषा को बोलने वालों का दिन है ये.


इस पर उनको ऐसा अनुभव हुआ जैसे कि किसी बहुत बुरी स्थिति में ला खड़ा कर दिया हो. उनके चेहरे की भाव-भंगिमा से लगा कि वे अपने आपको हिन्दी वाला आदमी बताये जाने पर अपमानित महसूस कर रहे हैं.


जब भी हिन्दी भाषी व्यक्तियों के साथ में इस तरह की मानसिकता जन्म लेगी, हिन्दी का विकास नहीं हो सकता. हिन्दी ही क्या किसी भी भाषा को बोलने, लिखने, पढ़ने वाले जब निम्न स्तर की मानसिकता लेकर समाज में कार्य करेंगे, उस भाषा का विकास होना कठिन है.


बहरहाल, हिन्दी दिवस पर हमारे कुछ विचार अपने मित्रों सहित प्रकाशित हैं. उनको पढ़िए और प्रयास करिए कि हिन्दी के विकास में अपना कुछ योगदान कर सकें.




16 सितंबर 2020

देवनागरी और मानकीकृत वर्णमाला

हिन्दी दिवस के बाद अब फिर सबकुछ सामान्य सा दिखाई दे रहा है. मानकीकृत देवनागरी के सम्बन्ध में एक दिन पर्याप्त चर्चा होने के बाद अब शांति है. देवनागरी मूलतः संस्कृत भाषा की लिपि है और अब इसे अनेक भाषाओं ने अपनाया है. हिन्दी को राष्ट्रभाषा का स्थान तो नहीं मिल सका है, हाँ वह राजभाषा अवश्य है और इसकी लिपि देवनागरी है. वर्तमान में हिन्दी देश-विदेश में व्यापक रूप से प्रयुक्त हो रही है. ऐसे में यह स्वीकारा गया कि यदि इसका मानकीकृत रूप शिक्षण और लेखन में न अपनाया गया तो वैश्विक स्तर पर इसके समझने में समस्या उत्पन्न हो सकती है. इसी के चलते वर्ष 1961 में वर्तनी आयोग का गठन किया गया. केन्द्र सरकार की निगरानी में यह कार्य हुआ और वर्ष 1980 में अंतिम सुझाव के साथ ही देवनागरी लिपि का मानकीकृत रूप जारी किया गया. इसमें सिफ़ारिश की गई कि भाषाई एकरूपता के लिए इनका ही अनुसरण किया जाए.


आइये देश में मानकीकृत देवनागरी के सम्बन्ध में, इसके लेखन के मानक तरीकों पर कुछ कदम अपनाये जाने की सिफारिश की गई है, उनको देखें. इसमें मानक वर्णमाला को इस प्रकार से अपनाया गया है.


1. मूल स्‍वर

अ इ उ ऋ


2. संयुक्‍त स्‍वर

अ + इ = ए

अ + उ = ओ


3. दीर्घ स्‍वर

आ ई ऐ औ


4. अनुस्‍वार

अं


5. विसर्ग

अः


6. नया जुड़ा स्वर


7. नुक़्ता

उत्क्षिप्त और अरबी फ़ारसी अंग्रेज़ी मूल की ध्वनियों के लिए


8. व्यंजन

क ख ग घ ङ

च छ ज झ ञ

ट ठ ड ढ ण

त थ द ध न

प फ ब भ म


9. अंतःस्थ

य र ल व


10. ऊष्म

श ष स ह


11. उत्क्षिप्त ध्वनियाँ

ड़ ढ़


12. विशेष संयुक्त व्यंजन

क्ष त्र ज्ञ


13. नासिक्य व्यंजन (व्यंजनों वर्गों के पंचम वर्ण)

ङ ञ ण न म


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

14 सितंबर 2020

हिन्दी लिख दो चाहे हिंदी, अब सब चलता है

हिन्दी दिवस का स्वयंभू आयोजन किया जाये और हिन्दी पर ही लोगों द्वारा ज्ञान न दिया जाये, ऐसा संभव नहीं. आज इस दिवस पर सोशल मीडिया पर बुरी तरह से संदेशों की, ज्ञान की बरसात हो रही है. हिन्दी सही है या हिंदी, सितम्बर सही है या सितंबर, शुभकामनाएँ सही है या शुभकामनाएं जैसा एक सवाल उठाया था, जिस पर देशकाल, वातावरण के अनुसार सबके अपने-अपने मत मिले. तकनीक के आज के दौर में जबकि सभी लोग ज्ञानवान हैं, अथाह प्रतिभासंपन्न हैं ऐसे में किसी को सुझाव देना भी खतरे से खाली नहीं होता है. हिन्दी में सम्बन्ध में इसे और भी गम्भीरता से लिया जा सकता है.


सोशल मीडिया के अतिशय उपयोग ने हिन्दी का उपयोग भी बढ़ा दिया है. इस अत्यधिक उपयोग ने जहाँ एक तरफ कुछ सुगमता प्रदान की है वहीं कुछ सीमाबंदी के कारण गलतियों को स्वीकारने को भी विवश किया है. सम्भव है कि आज जबकि राजभाषा आयोग के तमाम सुझावों को लगातार अपनाया जा रहा है, तब ऐसे बिन्दुओं को गलती कहना भी बहुत से लिख्खाड़जनों को पसंद नहीं आएगा. फिलहाल तो कुछ बिन्दु व्याकरण सम्मत और कुछ वर्तनी आयोग आपके समक्ष.




यदि हिन्दी सही या हिंदी पर ही विचार करें तो इसे समझने के लिए पञ्चम वर्ण के व्याकरणिक नियम पर ध्यान देना होगा. व्याकरण नियमों के अनुसार ऐसे शब्द में सम्बन्धित वर्ग के पञ्चम वर्ण का आधा लगाया जाना चाहिए. वर्णमाला के अनुसार निम्न वर्ग हैं.


क ख ग घ ङ (क वर्ग)

च छ ज झ ञ (च वर्ग)

ट ठ ड़ ढ ण (ट वर्ग)

त थ द ध न (त वर्ग)

प फ़ ब भ म (प वर्ग)


व्याकरण नियम के अनुसार हिन्दी शब्द लिखे जाने में के पूर्व पञ्चम वर्ण को आधा करने लगाया जाना है. यहाँ वर्ण त वर्ग में है. अतः इस वर्ग का पञ्चम वर्ण आधा होकर द के पूर्व आएगा. इसीलिए हिन्दी शब्द सही है. इसी तरह यदि लिखना हो सितम्बर तो सितंबर लिखना व्याकरण नियम के अनुसार शुद्ध नहीं है. आप स्वयं बोलकर देखिये तो आपको ज्ञात होगा कि वर्ण के पूर्व पञ्चम वर्ण आधा होकर लगेगा. वर्ण ब शामिल है प वर्ग में. इसलिए इस वर्ग का पञ्चम वर्ण आधा होकर के पूर्व लगेगा. इसीलिए सितम्बर सही है न कि सितंबर.


ये तो हुआ व्याकरणिक ज्ञान. इधर भाषाई विकास के लिए लगातार सरकारी प्रयास होते रहे हैं. इनमें अनेक आयोग के माध्यम से भाषा को सरल से सरल बनाये जाने के लिए नियम भी बनाये गए. इसके साथ-साथ कम्प्यूटर के आने के बाद से और हिन्दी भाषा के वैश्विक रूप से प्रयोग किये जाने एक बाद से भी इसके सरलीकरण करने का वैश्विक दवाब भी देखने को मिलता रहा है. इसी के चलते वर्तनी आयोग ने पञ्चम वर्ण के प्रयोग को सरल बना दिया. उसके अनुसार व्याकरणिक कठिनाई को दूर करते हुए सीधे-सीधे अनुस्वार को मान्यता दे दी. उसके अनुसार पञ्चम वर्ण को आधा करके लगाने, सम्बंधित वर्ग को पहचानने की समस्या को दूर करते हुए सम्बंधित वर्ण के ऊपर बिंदी (ध्यान दें बिन्दी नहीं, जिसे अनुस्वार कहते हैं) लगाने को मान्यता दी.


कम्प्यूटर के प्रयोग के चलते भी पञ्चम वर्णों के प्रयोग में दिक्कत सामने आ रही थी. ऐसे में वर्तनी आयोग की इस सिफारिश को सहज भाव से स्वीकार करने के बजाय कम्प्यूटर की सुविधा ने इस परिवर्तन को स्वीकार लिया. यही कारण है कि अब हिंदी भी सही है, सितंबर भी सही है, शुभकामनाएं भी सही है. वर्तनी आयोग की अनुस्वार और अनुनासिक को लेकर भी एक सिफारिश है, जिसके अनुसार वह अनुस्वार यानि कि बिन्दु में और अनुनासिक अर्थात चन्द्रबिन्दु में भेद नहीं करता है. उसका मानना है कि इसके उपयोग को सम्बन्धित शब्द के प्रयोग के अनुसार समझ लिया जाए. हंस और हँस शब्द की व्याख्या करते हुए उसका कहना है कि इन दो शब्दों का जहाँ, जिस सन्दर्भ में प्रयोग हो रहा हो वहाँ इसके भाव को समझते हुए उसका अर्थ निश्चित कर लिया जाए.


फिलहाल, आज हिन्दी दिवस पर इतना ही ज्ञान पर्याप्त है. आप सभी को शुभकामनाएँ, १४ सितम्बर २०२०, हिन्दी दिवस की. खुश रहें, हिन्दी को समृद्ध करने के लिए लगातार प्रयत्नशील रहें.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

15 सितंबर 2019

हिन्दी है तो हम हैं


हिन्दी दिवस के बाद हिन्दी की बात करना चर्चा करना कुछ लोगों को ऐसे महसूस होता है जैसे जन्मदिन गुजर जाने के बाद जन्मदिन की बधाई देना. जन्मदिन पर बधाई देना और लेना हमें व्यक्तिगत रूप से कभी पसंद नहीं आया. अब इसे एक तरह की सामाजिक परंपरा कहें या फिर अपने लोगों के बीच होने वाली एक तरह की औपचारिकता कि जन्मदिन की बधाई दे देते हैं. इसके बाद भी बधाई लेना आज भी पसंद न आया. ठीक इसी तरह से कभी भी हिन्दी दिवस पर शुभकामनायें देना, बधाई देना, कार्यक्रमों का आयोजन करना भी कभी रास न आया. आखिर हिन्दीभाषियों को इस एक दिन की आवश्यकता क्यों महसूस हुई? क्या इस दिन को मनाने का कारण संवैधानिक दर्जा दिलाने जैसी स्थिति का होना रहा है? यदि यही एक कारण है तब तो ऐसे आयोजन करना और भी नहीं होना चाहिए. आखिर अभी हम ही हमारी हिन्दी को उसका असल स्थान उपलब्ध नहीं करवा सके हैं. अभी भी महज पंद्रह वर्ष की छूट बढ़ती ही चली आई है और कब तक बढ़ेगी कुछ कहा नहीं जा सकता.


यह सोचकर प्रसन्न होते रहना कि हिन्दी आज वैश्विक स्तर पर लगातार उन्नति कर रही है, विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा में चौथे स्थान पर है तो उसका एक कारण हमारे देश का वैश्विक जगत में बहुत बड़े बाजार की उपलब्धता करवाना है. बाजार की सहज उपलब्धता के कारण सम्पूर्ण विश्व हिन्दी सीखने को मजबूर है. ऐसा सुना है कि किसी कालखंड में चंद्रकांता संतति को पढ़ने के लिए अंग्रेजों ने भी हिन्दी सीखी थी. उस समय अंग्रेजों के हिन्दी सीखने का कारण हिन्दी के प्रति उंनका प्रेम, स्नेह नहीं था. कुछ ऐसा ही आज हो रहा है. यदि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ, उनके कर्मचारी यदि हिन्दी सीख रहे हैं, अपने उत्पाद का प्रचार हिन्दी में कर रहे हैं तो उसके पीछे बाजार की शक्ति है, न कि हम हिन्दी भाषियों की शक्ति. सही अर्थों में देखा जाये तो हम हिन्दी-भाषी ही हिन्दी को कमजोर करने का काम करने में लगे हुए हैं. हिन्दी पट्टी के लोगों ने अपनी-अपनी बोलियों को भाषा के रूप में स्वीकार्यता देने-दिलाने की मुहीम छेड़ रखी है. इससे भले ही एक पल को गर्व महसूस हो कि हमारी बोली अब एक भाषा के रूप में मान्य हो रही है मगर उसका नुकसान यह हुआ कि हिन्दी भाषाई लोगों की संख्या में कमी आ गई. यही कमी वैश्विक स्तर पर हिन्दी के लोगों की कम संख्या का प्रदर्शन करती है. यह तो भला हो इंटरनेट का, मुफ्त में मिलते सोशल मीडिया मंचों का, जहाँ हिन्दी भाषी लोगों द्वारा लगातार कुछ न कुछ शेयर पोस्ट किया जा रहा है जो हिन्दी को सशक्त बना रहा है. 

हिन्दी-भाषियों को ध्यान रखना होगा कि उनकी भाषा उनके जन्म से उनको मिली है. उसे सीखने की कोशिश उनके द्वारा नहीं की गई है. यही वह भाषा है जिसके द्वारा वे सोचने का काम करते हैं. इसी भाषा में वे सपने देखने का काम करते हैं. इसी में वे कल्पना के सितारे जड़ते हैं. इसके के द्वारा वे कहानियों का निर्माण करते हैं. ऐसे में जबकि वैचारिक रूप से और काल्पनिक रूप से हिन्दी को उनके द्वारा उपयोग किया जाता रहता है तो फिर एक दिन की वैधानिकता क्यों? गर्व से चौबीस घंटे बोली जाने, महसूस की जाने वाली भाषा के प्रति विश्व रहे, सम्मान रहे, आदर रहे. यही भाव स्वतः ही हिन्दी भाषा को सशक्त, समृद्ध करेगा.