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07 फ़रवरी 2026

जेन ज़ी की बुद्धिमत्ता पर प्रश्नचिन्ह

शिक्षक रह चुके न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. जेरेड कूनी होर्वाथ ने अपनी रिसर्च के माध्यम से बताया कि जेन ज़ी के रूप में पहचानी जाने वाली पीढ़ी की बुद्धिमत्ता में अपनी पिछली पीढ़ी की तुलना में गिरावट आई है. ऐसा तब हुआ है जबकि ये पीढ़ी पिछली सदी के बच्चों की तुलना में अपना अधिक समय शिक्षण संस्थानों में व्यतीत कर रहे हैं. इस पीढ़ी के आईक्यू को कम बताने पर चौंकना स्वाभाविक है क्योंकि सामान्य रूप में ऐसा माना जाता है कि हर पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी से अधिक बुद्धिमता वाली होती है. सोशल मीडिया के माध्यम से हमेशा चर्चा में रहने वाली जेन ज़ी पीढ़ी का पिछली पीढ़ी से कम बुद्धिमत्ता वाला होना प्रथम दृष्टया आश्चर्य में डालता है किन्तु जब डॉ. होर्वाथ के द्वारा बताये गए कारणों पर गौर करते हैं तो ऐसा होना सच भी लगता है. उन्होंने ऐसा होने के पीछे इस पीढ़ी का तकनीक और मशीनों पर अधिक से अधिक निर्भर होना बताया है. जेन ज़ी के द्वारा बहुतायत में 'एजुकेशनल टेक्नोलॉजी' अर्थात पढ़ाई में तकनीक और स्क्रीन्स का उपयोग किया जाता है. इसके चलते एक तरफ उनकी एकाग्रता में कमी आई है वहीं समस्याओं को सुलझाने की क्षमता भी घटी है.

 



किसी रिसर्च के आधार पर जेन ज़ी की क्षमताओं को आँकने के साथ-साथ यदि इनकी जीवन-चर्या, कार्य-शैली आदि का अध्ययन किया जाये तो इनकी क्षमताओं में कमी का अकेला कारण तकनीक अथवा स्क्रीन पर अधिकाधिक समय बिताना ही नहीं है. बचपन से लेकर इनकी युवावस्था तक की समयावधि पर गौर किया जाये तो स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है कि इस पीढ़ी की सामाजिकता, समन्वय, सहयोग आदि को आरंभिक दौर से ही कम से कमतर किया जाता रहता है. इनके खेलने-कूदने, मैदानों में जाने, पारम्परिक खेलों में भाग लेने, शारीरिक श्रम करने में लगातार कमी आते-आते एक तरह की शून्यता आ गई है. शिक्षा के नाम पर अधिक से अधिक अंक लाने का दबाव, ज्ञान के बजाय तकनीकी रोजगार पाने की आकांक्षा ने बच्चों को मशीन में परिवर्तित कर दिया है. किसी समय गर्मियों की छुट्टियाँ खेलकूद, यात्राओं, रिश्तेदारों से मेलजोल, कार्य-निपुणता आदि के द्वारा बच्चों का न केवल मनोरंजन करती थीं बल्कि उनको सामाजिकता का, पारिवारिकता का, सहयोग का पाठ भी सिखाती थीं. इसके उलट आज इन छुट्टियों में ये पीढ़ी अपने संस्थानों के प्रोजेक्ट को पूरा करने में, किसी प्रतियोगी परीक्षा को पास करने में, किसी तकनीक को सीखने में ही उलझे रहते हैं.

 

अध्ययन की समयावधि के साथ-साथ अपने फुर्सत के कुछ पलों को भी लैपटॉप, मोबाइल आदि के साथ गुजारने के कारण ये पीढ़ी खुद को सामाजिक रूप से लगभग अलग कर चुकी होती है. ऐसे में इनकी पारंपरिक बुद्धिमत्ता जैसे तार्किकता, एकाग्रता, याददाश्त, कल्पनाशीलता आदि में कमी आना स्वाभाविक है. गैजेट्स के सहारे छोटे-छोटे से काम करने, पुस्तकों से खुद को दूर कर लेने, रील्स जैसी अत्यधिक तीव्र दुनिया के रोमांच में खोने, खुद को डिजिटल डिवाइस में कैद कर देने के कारण इस पीढ़ी में निर्णय लेने की त्वरित क्षमता में कमी आना, संकटकालीन स्थिति में अवसाद में चले जाना, जरा सी असफलता पर घनघोर नैराश्य को अपना लेना आदि भी सहज रूप में नजर आता है.

 

सामान्य रूप में ऐसा वैज्ञानिक तर्क है कि किसी भी व्यक्ति के लिए बातचीत के, पुस्तकों को पढ़ने के माध्यम से सीखना सहज होता है. यही कारण है कि आज भी तकनीक के बदलते दौर में भी शिक्षण संस्थानों का महत्त्व बना हुआ है, शिक्षकों को वरीयता प्रदान की जा रही है. ऐसा माना भी जाता है कि इस तरह की कार्यविधि के माध्यम से किसी सामग्री को, किसी ज्ञान को मष्तिष्क जल्द से जल्द स्वीकारता है. आज की पीढ़ी में आमने-सामने बात करने, पुस्तकों को पढ़ते हुए कल्पनाशीलता का विकास करने के स्थान पर स्क्रीन को जल्दी-जल्दी स्क्रॉल करने, मुख्य-मुख्य बिन्दुओं को पढ़कर सीखने में विश्वास करने लगी है. यही कारण है कि उसकी सीखने की क्षमता कम हुई है. यह स्थिति किसी एक देश की नहीं बल्कि लगभग सभी देशों की इस पीढ़ी की है.

 

डॉ. होर्वाथ की खोज से निकले निष्कर्ष को किसी प्रयोग का अंतिम निष्कर्ष भले न माना जाये किन्तु यह तो अवश्य ही माना जा सकता है कि जेन ज़ी पीढ़ी ने खुद को तकनीकी के हाथों की कठपुतली बना दिया है. ऐसे में अब जबकि खोज बता रही है कि उनकी पिछली पीढ़ी उनसे अधिक बुद्धिमत्ता वाली है तो पिछली पीढ़ी का दायित्व बनता है कि इस पीढ़ी को मशीनी खिलौना बनने से बचाया जाये. तकनीकी विकास और भौतिकतावादी युग में आज भले ही धनोपार्जन मुख्य मुद्दा बनता जा रहा हो किन्तु कुछ शारीरिक श्रम, खेलकूद, मेल-जोल, सामाजिकता, पारिवारिकता आदि के लिए समय निकालना ही होगा. परिवारों को एक निश्चित समय गैजेट्स, मशीनों, मोबाइल आदि के बिना रहते हुए सदस्यों के बीच बातचीत करते हुए, आपसी चुहल करते हुए बिताना शुरू करना होगा. अपने बच्चों को मशीनी खेल से बाहर निकाल कर मैदानों में भेजना होगा. हार-जीत के रूप में सफलता-असफलता का स्वाद चखने के लिए उनको तैयार करना होगा. हमें ही ध्यान रखना होगा कि जेन ज़ी भी अपनी पिछली पीढ़ी की तरह एक इन्सान है न कि कोई मशीन या रोबोट. इस पीढ़ी को भी संवेदनात्मक रूप से, भावनात्मक रूप से परिपक्व बनाने की आवश्यकता है. ऐसा नहीं कि जेन ज़ी सक्षम अथवा समर्थ नहीं है, बस उसने खुद को तकनीक में, मशीनों में उलझा दिया है और हम सबको उसे इसी उलझन से बाहर निकालना है.

 


01 जनवरी 2026

मोबाइल से इतर भी है ज़िन्दगी

नववर्ष 2026 का आगमन हो गया है. हम सभी ने उसके स्वागत में अपनी पर्याप्त ऊर्जा और शक्ति को लगा दिया. इस आते वर्ष के साथ क्या हमने अपने उन वायदों की तरफ ध्यान दिया जिनको वर्ष 2025 के शुरू में खुद से किया था? शायद नववर्ष के स्वागत के उत्साह में ऐसा करने की याद नहीं रही. चलिए कोई बात नहीं, जब जागो तभी सबेरा वाली बात के द्वारा नए वर्ष 2026 के साथ अभी-अभी गए वर्ष 2025 के एक घटनाक्रम को याद कर लेते हैं. मैनेजमेंट गुरु के रूप में प्रसिद्ध एन. रघुराजन ने कहा कि 2025 एक स्लोगन के साथ विदा हो रहा है- मोबाइल फोन के परे भी ज़िन्दगी है. उन्होंने अपने कॉलम में एक कार्यक्रम का जिक्र करते हुए लिखा कि प्रवेश द्वार पर एक बड़े बोर्ड पर लिखा था कि अपना मोबाइल फोन निकालें और मेरी तस्वीर लें. जैसे ही आप प्रवेश द्वार पर अभिवादन कर रहे महिला या पुरुष की तस्वीर लेते हैं तो वे बेहद शालीनता से आपके फोन के कैमरा लेंस पर एक छोटा सा आयताकार स्टिकर चिपका देते हैं. किसी मेहमान ने इसका विरोध नहीं किया. वहीं दूसरे बोर्ड पर लिखा था कि हर बीस मेहमानों पर एक फोटोग्राफर है, उनसे जितनी चाहें तस्वीरें खिंचवाइए.

 

यह आईडिया कोई नया-नवेला नहीं है. इसे बर्लिन, लंदन और न्यूयॉर्क के मशहूर क्लबों से लिया गया है. यहाँ पर लम्बे समय से जोर दिया जाता रहा है कि वहाँ आने वाले मेहमान फोन से तस्वीरें लेना छोड़ संगीत की धुनों पर नाचें. पहले इन क्लबों में फोन प्रतिबंधित थे लेकिन अब उन पर स्टिकर लगाया जाता है. एक पल को अपने मोबाइल को जेब में डालकर सोचिए इन दोनों निवेदनों के बारे में. सोचा आपने? आप किसी कार्यक्रम का हिस्सा हैं, उसमें सहभागिता कर रहे हैं और आपका बहुत सारा समय कार्यक्रम का आनंद उठाने के बजाय फोटोग्राफी में खर्च होता है. ये समय कभी सेल्फी के नाम पर, कभी कार्यक्रम के फोटो-वीडियो बनाने के नाम पर, कभी मित्रों-परिचितों-परिजनों के साथ फोटोसेशन करवाने के नाम पर खर्च होता है. क्या कभी आपने-हमने एक पल को रुककर ये सोचा है कि उस कार्यक्रम में हमारी उपस्थिति किसलिए हुई है? हम वहाँ कार्यक्रम का आनंद उठाने के लिए उपस्थित हुए हैं अथवा फोटोग्राफी करने के लिए?

 



वर्तमान दौर में यह बहुत बड़ी समस्या बनती जा रही है कि हम सभी सामने उपस्थित पलों का आनंद उठाने के बजाय इधर-उधर के कार्यों में अपना समय बर्बाद कर देते हैं. इस समय बर्बादी में मोबाइल को सबसे आगे रखा जा सकता है. सिर्फ फोटोग्राफी की ही बात न करें, सिर्फ किसी कार्यक्रम की बात न करें तो भी यदि गौर करें तो लगभग प्रत्येक नागरिक का एक दिन का बहुतायत समय मोबाइल पर व्यतीत हो रहा है. हम सभी किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल हों अथवा किसी पारिवारिक कार्यक्रम में, कहीं नितांत फुर्सत के पलों में हों या फिर व्यस्तता भरे किसी दौर में मोबाइल से खुद को दूर नहीं कर पाते हैं. भीड़ के बीच में भी हम सब मोबाइल के कारण अकेले होते हैं.

 

मैनेजमेंट गुरु द्वारा बताया गया तरीका चूँकि अब निजी और हाई-प्रोफाइल पार्टियों में अपनाया जा रहा है और इसका मुख्य उद्देश्य यही है कि उन पार्टियों में, कार्यक्रमों में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति वहाँ के पलों का आनंद ले सके. ऐसा बहुतायत में देखने में आता है और लेखक का अपना नितांत व्यक्तिगत अनुभव है कि कार्यक्रमों के दौरान फोटो-वीडियो निकालने वाले बहुतायत लोग शायद ही दोबारा उनको देखते हों. उनमें से बहुसंख्यक लोग ऐसे होते हैं जो कार्यक्रम के बाद ही फोटो और वीडियो डिलीट करते देखे गए. ऐसा इसलिए क्योंकि उनके मोबाइल में स्टोरेज की समस्या उत्पन्न होने लगती है. कोरोनाकाल के दौरान लॉकडाउन में मोबाइल का उपयोग बढ़ने से भले ही कुछ लोगों की दिनचर्या में इसका उपयोग शामिल हो गया हो किन्तु समय के साथ लोग महसूस करने लगे कि पूरी तरह स्क्रीन पर टिकी ज़िन्दगी ही असल में जीवन नहीं है. एक शोध के आँकड़े बताते हैं कि सोशल मीडिया पर बिताया जाने वाला समय वर्ष 2022 में चरम पर था और वर्ष 2024 में इसमें दस प्रतिशत की गिरावट दिखाई दी.

 

मोबाइल उपयोग के प्रति जिस तरह की ललक लोगों में देखी गई थी, उसी तरह की वितृष्णा भी अनेक लोगों में देखने को मिल रही है. यहाँ अनेकानेक अनुभवों को सामने रखने का मंतव्य कदापि यह नहीं कि मोबाइल को पूरी तरह से नकार दिया जाये. यहाँ उद्देश्य मात्र इतना ही है कि मोबाइल के उपयोग के साथ-साथ यह भी ध्यान रखा जाये कि परिवार की अहमियत हमारे लिए क्या है? बच्चों का मैदान पर जाकर खेलना-कूदना कितना महत्त्वपूर्ण है? सामाजिकता के निर्वहन के लिए आज सहभागिता आवश्यक है अथवा मोबाइल का उपयोग? परिवार के साथ समय का बिताना किसी स्वप्न की तरह से हो गया है. मित्रों के साथ शाम की महफ़िलें किसी गुजरे दौर की बातें हो गईं हैं. बच्चों की हँसी, खिलखिलाहट से गुलजार रहने वाले पार्क अब बुजुर्गों के अकेलेपन के साक्षी बन रहे हैं. यह अपने आपमें कितना विद्रूपता भरा होगा कि आने वाली पीढ़ी के लिए हम इस तरह के अकेलेपन के, सुनसान के, तन्हाई के अनुभव इकट्ठे करने में लगे हैं.

 

नववर्ष की आज की इस पहली सर्द सुबह में चाय की चुस्की लेते हुए अपने मोबाइल को देखिएगा कि आपने ऐसे कितने फोटो-वीडियो हैं जो अब तक अनदेखे और बेमतलब ही मोबाइल में जगह घेरे हैं. निश्चित ही इनकी बहुत बड़ी संख्या होगी. यदि आप हमारी बात से सहमत हैं तो चाय की चुस्की के साथ नववर्ष में वादा करिए मोबाइल के बजाय अपने लोगों के साथ अधिक से अधिक समय बिताने का. आभासी अनुभवों को एकत्र करने के स्थान पर वास्तविक अनुभवों को संजोने का. याद रखिये केवल एक ही बात कि मोबाइल फोन से परे अनुभवों से भरी एक शानदार ज़िन्दगी है.

 


28 अगस्त 2025

कहीं और से नियंत्रित होता मोबाइल

एंड्रॉयड मोबाइल फ़ोन के कॉल डायलिंग सम्बन्धी कुछ बदलाव के बाद अधिकतम लोग ऐसे बिलबिला रहे जैसे कोई अचम्भा हो गया. स्मार्ट फ़ोन की नज़र में आप जैसे बिलबिलाने लोग ही बेवकूफ हैं. आज से नहीं बल्कि स्मार्ट फ़ोन, इंटरनेट के गठबंधन के समय से ही समझाया जा रहा है कि आपके हाथ में सिर्फ़ मोबाइल पकड़ना और स्क्रॉल करना है. बाक़ी सभी कंट्रोल तो उसके पास हैं जो आपको ये मुफ्त सुविधाएँ दे रहा है.


सोचिए, आप कोई एक विज्ञापन देख लें फिर वैसे ही आपकी स्क्रीन पर आने लगते हैं. आप कुछ सर्च कर लें वही आपको दिखने लगता है. कोई रील देख लें फिर उसी तरह की रील आपके सामने से गुजरने लगती हैं. अभी ये बदलाव बहुत छोटा सा बदलाव है. आपकी लोकेशन उनके पास है, आपका बैंक खाता उनके पास है, आपका एटीएम, उसका पिन उनको पता है, आपका आधार-पैन-पासवर्ड आदि सब उनके पास है. सबकुछ तो इंटरनेट से जुड़ा है और वही सबकुछ मोबाइल से लिंक करवाया जा रहा है. यही मोबाइल आपके हाथ में होने के बाद भी दूसरे के नियन्त्रण में है. 


एक जरा से बदलाव के बाद भी आप सजग न हुए, संगठित हो इस लिंक-लिंक खेल के विरोध में न उतरे, अपने तमाम खातों पर मजबूत पासवर्ड न बनाये, हैशटैग खेल और मुफ्तखोरी से बाहर न निकले तो अगला बदलाव हमारे-आपके खातों में, दस्तावेज़ों में, जानकारियों में होगा.

 

18 जनवरी 2025

मीडिया की आड़ में महाकुम्भ की नौटंकी

मीडिया में जिस तरह से असंवेदनशील लोग घुस चुके हैं, उससे विषयों का लगातार क्षरण हो रहा है. हर हाथ में स्मार्ट फोन का कैमरा, इंटरनेट, सोशल मीडिया का मंच होने से सभी को किसी न किसी मीडिया मंच का मालिक बना रखा है. जहाँ मन हुआ मुँह उठाकर घुस गए. इसी मुँह उठाकर घुसने की प्रवृत्ति के कारण विषयों का गाम्भीर्य गायब होता जा रहा है. इसका उदाहरण प्रयागराज में चल रहा पावन महाकुम्भ है. जिसे देखो वो मुँह उठाये खुद को स्वयंभू मीडिया चैनल घोषित करके गम्भीरता से इतर बस दो कौड़ी की रील बना-बना ठेलने में लगा है. किसी को माला बेचती युवती की आँखें दिख रही हैं, किसी को IIT वाला बाबा दिख रहा है, किसी को स्त्री-सौन्दर्य आकर्षित करने में लगा है.

 



मोबाइल के सहारे क्रांति करते कथित मीडिया व्यक्तियों को शायद जानकारी नहीं होगी कि महाकुम्भ किसे कहते हैं? नागा बाबा कौन हैं? अखाड़ों का वास्तविक अर्थ क्या है? पूरे महाकुम्भ में मात्र कुछ दिन ही विशेष स्नान क्यों होते हैं? त्रिवेणी में तीसरी नदी कहाँ है? और भी बहुत सी महत्त्वपूर्ण जानकारी इन कम-दिमाग वालों के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं. इनको बस ये पता करना है कि किस युवती की आँखें ज्यादा मोहक हैं? कौन सी युवती सर्वाधिक मोहक साध्वी है? देह के आकर्षण में खोये ये बददिमाग कथित मीडियामैन महाकुम्भ में भी सिर्फ रील बनाने का 'माल' खोज रहे हैं. इनको महाकुम्भ की गहराई से कोई मतलब नहीं. महाकुम्भ के भावार्थ से कोई लेना-देना नहीं. प्रयागराज की गम्भीरता का कोई मोल नहीं? त्रिवेणी के अलौकिक सौन्दर्य का कोई महत्त्व नहीं.

 


17 सितंबर 2024

रियल लाइफ के लिए जानलेवा बनती रील लाइफ

मोबाइल को किसी भी सदी का सबसे बड़ा अविष्कार माना जा सकता है. इसने ही एक साधेसब सधे की अवधारणा को पूरा किया है. बातचीत के लिए बनाये गए इस यंत्र ने अपने तंत्र में इतना कुछ समेट लिया है कि कई बार तो समझ ही नहीं आता है कि इसका उपयोग किसके लिए प्रमुखता से किया जाता हैखुद मोबाइल कम्पनियाँ भी अब बातचीत को प्राथमिकता में रखने के बजाय कैमरे को प्राथमिकता में रख रही हैं. पहले ऐसा नहीं था क्योंकि तब मोबाइल का नशा न था. मोबाइल से रील बनाने का फैशन न था. जरा-जरा सी बात पर सेल्फी लेने का चलन न था. किसी समय आपस में बातचीत करने का माध्यम बना मोबाइल अब बातचीत करने से ज्यादा सेल्फी लेने के लिए, रील्स बनाने के लिए प्रयोग होने लगा है. बाजारवाद से घिरे समाज में अब ऐसा लगता है जैसे सबकुछ विज्ञापनमय होता जा रहा है. व्यावसायिक दुनिया तो पहले से ही विज्ञापन के सहारे चल रही थी, अब व्यक्ति की निजी ज़िन्दगी भी विज्ञापन जैसी होती जा रही है. ऐसा होने के पीछे हरसमय सेल्फी लेने की मानसिकता, बिना आगा-पीछा सोचे रील बनाने की सनक का सवार होना है. 

 



सेल्फी ने, रील्स ने मोबाइलयुक्त व्यक्तियों का चाल-चलन एकदम ही बदल दिया. लोगों का सेल्फी-प्रेम किसी से भी छिपा नहीं है. हालत ये है कि कहीं भी, कुछ भी किया जा रहा हो तो पहले सेल्फी बना लो, रील बना लो. किसी पर्यटन स्थल पर घूमने गए हो तो रील डाल दो. बस मेंट्रेन मेंहवाई जहाज मेंसाइकिल मेंपैदल कहीं भी किसी रूप में हो प्राथमिकता में रील बनाकर उसे अपलोड करना है, उसके बाद ही आगे बढ़ना है. सेल्फी लेना अथवा रील बनाकर उसे सोशल मीडिया पर अपलोड करना गलत नहीं है मगर जैसा कि कहा जाता है कि अति हर चीज की बुरी होती है, बस उसी अति ने आज सेल्फी लेने के चलन को, रील बनाने, अपलोड करने के कदम को जानलेवा स्थिति तक पहुँचा दिया है. इस शौक के नशे ने बहुतों के दिमाग को विक्षिप्त सा कर दिया. मोबाइल हाथ में हो तो कई बार ऐसे दिमागी असंतुलन वाले लोग भूल जाते हैं कि कहाँ सेल्फी लेनी है कहाँ नहीं. कहाँ वीडियो बनाना सुरक्षित है, कहाँ नहीं. उनको ध्यान भी नहीं रहता है कि अपने इस नशे के चक्कर में वे अपनी और अपने साथ के लोगों की जान तो खतरे में नहीं डाल रहे. ये शौक अब जानलेवा साबित हो रहा है. रोमांचकहैरानी में डालने वाली एवं विस्मयकारी सेल्फी लेने के चक्कर में अपनी जान की भी परवाह नहीं कर रहा है. कभी ऊँची पहाड़ी की चोटी परकभी बीच नदी की धार मेंकभी बाइक पर स्टंट करते हुएकभी ट्रेन से होड़ करते हुए, कभी खतरनाक जीव-जंतुओं के साथ ऐसे लोग रील बनाते नजर आते हैं. सोशल मीडिया, स्मार्टफोन, सेल्फी, रील के इस नशे में लोग आये दिन अपनी जान गँवा रहे हैं. आजकल तो लगभग रोज ही ऐसी ख़बरों से दो-चार हुआ जा रहा है.

 

दरअसल बाजार के बढ़ते प्रभाव ने ज़िन्दगी को विज्ञापन की तरह से चकाचौंध से भरा हुआ साबित करने का प्रयास किया है. एक तरह की होड़ को ही, भीड़ से अलग दिखने की मानसिकता ने, किसी भी क्षेत्र में सबसे ऊपर रहने की दौड़ ने, सोशल मीडिया के आभासी लाइक-शेयर के नंबर-गेम ने व्यक्तियों को एक तरह की मशीन बना दिया है. पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से सफलता की परिभाषा बदली गई है, जिस तरह से व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया बदली गई है, प्रसिद्ध होने के रास्ते बदले गए हैं उसके बाद प्रत्येक कदम, प्रत्येक कार्य को सही ही ठहराया गया है. सोशल मीडिया की आभासी दुनिया ने इस मनोदशा को मीठे जहर के रूप में व्यक्तियों में प्रवेश कराया है. देखा जाये तो यह भी एक तरह से मानसिक विकार है, एक रोग है. दो-चार रील के द्वारा, कुछ हजार-लाख लाइक, शेयर की चाह में एक झटके में प्रसिद्धि पाने की तृष्णा आखिर किसलिए? आखिर खतरनाक रील्स के द्वारा लोग खुद को किसलिएकिसके लिए सबसे अलग दिखाने की कोशिश करते हैंक्यों खतरनाक जगहों पर जाकर स्टंट करते हुए रील बनाने की कोशिश की जाती हैक्यों तेज रफ़्तार बाइक परतेज गति से भागती ट्रेन पर सेल्फी लेकर क्या सिद्ध किया जाता हैइस मनोविकार के चलते रियल लाइफ पर रील लाइफ हावी होकर लोगों की जान लेती जा रही है.

 

इस तरह की जानलेवा हरकतों को सिवाय पागलपन के कुछ नहीं कहा जा सकता है. इस पागलपन को नियंत्रित किये जाने की आवश्यकता है. मोबाइल जिस काम के लिए बना है उसके लिए ही अधिकाधिक उपयोग किये जाने की आवश्यकता है. अन्यथा की स्थिति में यह पागलपन लगातार घरों के चिरागों को बुझाता रहेगा. मोबाइल के आने ने क्रांति की नई परिभाषा लिखीयह तो समझ आया मगर उसके साथ आये कैमरे और उस कैमरे से पैदा सेल्फी नामक नशा संवेदनहीनताबेशरमाईअशालीनता भी लिख देगासोचा नहीं था. 

05 जुलाई 2024

बीएसएनएल से भावनात्मक लगाव

बीएसएनएल के अलावा बाक़ी कम्पनियों द्वारा रिचार्ज शुल्क बढ़ा देने के बाद सोशल मीडिया पर सिम पोर्ट करवाने की क्रांति दिखने लगी. (व्यावहारिक रूप में ऐसा नहीं दिख रहा)

 

बहरहाल, जुलाई 2003 से बीएसएनएल का नम्बर हमारे पास नियमित रूप से बना हुआ है. इन 21 वर्षों में नेटवर्क ने जी भर कर छकाया है, हड़ाया है. इंटरनेट के आने के बाद भी इसके नेटवर्क में कोई सुधार नहीं आया. उरई हो या शहर से बाहर किसी भी राज्य, किसी भी शहर में, नेटवर्क की हालत ‘भगवान से न लगे’ वाली रही. अनेक मित्रों ने इस नम्बर को दूसरी कम्पनी में पोर्ट करवाने की सलाह दी, दबाव भी डाला पर हमने ऐसा नहीं किया. हाँ, मोबाइल पर नेट चलाने के लिए अवश्य ही एयरटेल, जियो आदि की सिम लेते रहे, बदलते रहे. बीएसएनएल को पोर्ट न करवाने के पीछे बस एक भावनात्मक सोच ये है कि जब उरई में कोई और सर्विस न थी तब इसी बीएसएनएल ने हमें हमारे अपनों से, ग़ैरों से जोड़े रखा था.

 

आज सोशल मीडिया में सिम पोर्ट की जो क्रांति चल रही है, उसका तब तक कोई मतलब नहीं जब तक कि बीएसएनएल अपने नेटवर्क को नहीं सुधारता है. नम्बर पोर्ट करवा लेना समस्या का समाधान नहीं है.


03 अक्टूबर 2023

साइबर अपराध की खामोश दस्तक

वर्तमान में कम्प्यूटर और इंटरनेट के माध्यम से काम बहुत आसान हुआ है. सूचना प्रौद्योगिकी के विकास के साथ-साथ साइबर अपराधों में वृद्धि से इनकार नहीं किया जा सकता है. सामान्य भाषा में इंटरनेट के ज़रिए किए जाने वाले अपराधों को साइबर अपराध अथवा साइबर क्राइम कहते हैं. कोई भी ऐसा आपराधिक, अवैध, अवांछनीय कार्य जो कम्प्यूटर, इंटरनेट अथवा संचार माध्यम से सम्बद्ध है, वह साइबर अपराध है. उदाहरणार्थ यदि कम्प्यूटर, इंटरनेट के माध्यम से वित्तीय धोखाधड़ी, बैंक खाते से धन चुराना, हैकिंग, अश्लीलता का प्रसार, वायरस का फैलाव, सॉफ़्टवेयर की चोरी, दोषपूर्ण सॉफ़्टवेयर भेजकर कम्प्यूटर को ख़राब करना, किसी अन्य कम्प्यूटर नेटवर्क पर हमला, पोर्नोग्राफी को बढ़ावा, आंतरिक सूचनाओं और बौद्धिक संपदा की चोरी आदि को साइबर अपराध कहा जाता है. 


इनके अलावा कुछ साइबर अपराध ऐसे हैं जिनका प्रभाव सरकारों पर, राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पड़ता है. इनमें साइबर जासूसी, साइबर युद्ध, साइबर आतंकवाद आदि आते हैं. साइबर युद्ध अथवा साइबर वारफेयर अन्य देशों के खिलाफ युद्ध के कार्यों को संचालित करने के लिए साइबरस्पेस का उपयोग है. भूमि, महासागर, वायु और अंतरिक्ष के बाद साइबरस्पेस को युद्ध का पाँचवाँ आयाम माना जाता है. आजकल साइबर आतंकवाद को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए उपयोग में लाया जाता है. इसके द्वारा आतंकवादी कंप्यूटर नेटवर्क पर हमला कर जनता के बीच बड़े पैमाने पर विनाश या भय को पैदा करके सरकार को निशाना बनाते हैं. इसका उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा पर आक्रमण करना और रणनीतिक महत्व की जानकारी को नष्ट करना है. यह किसी भी देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक है. 




राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2021 में भारत में साइबर अपराध के 52,974 मामले दर्ज किये गए जो वर्ष 2020 (50,035 मामले) की तुलना में 5 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्शाते हैं. सीईआरटीइन (इंडियन कम्प्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम) के आँकड़ों के अनुसार 2022 में भारत में सबसे अधिक साइबर क्राइम के मामले दर्ज किए गए हैं. सीईआरटी साइबर सुरक्षा हमलों से निपटने के लिए केन्द्र सरकार की एक नोडल एजेंसी है जो सूचना प्रौद्यौगिकी मंत्रालय के तहत काम करती है. आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 में ऑनलाइन बैंकिंग धोखाधड़ी के 4047 मामले, ओटीपी जालसाजी के 1093 केस, डेबिट क्रेडिट कार्ड से ठगी की 1194 घटनाएँ और एटीएम से सम्बन्धित 2160 मामले दर्ज किए गए. रिपोर्ट में बताया गया कि सोशल मीड़िया पर फर्जी सूचना के 578 केस, ऑनलाइन परेशान करने या महिलाओं और बच्चों को साइबर धमकी से जुड़े 972 मामले, फर्जी प्रोफाइल के 149 और आँकड़ों की चोरी के 98 मामले जारी किए गए हैं.


भारत सरकार ने साइबर अपराधों से निपटने के लिए सूचना प्रौद्यौगिकी अधिनियम 2000 पारित किया था, साथ ही आईपीसी की धाराओं में भी कुछ प्रावधान किए गए हैं. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 की कुछ धाराओं में संशोधन भी किया गया है ताकि अपराधियों के विरुद्ध और सहजतापूर्वक कार्यवाही की जा सके. धारा 69ए के तहत पुलिस को अधिकार है कि किसी भी वेबसाइट को ब्लॉक कर सकती है. वर्तमान दौर में प्रत्येक हाथ में मोबाइल है, इंटरनेट है और उसका उपयोग भी बहुत तेजी से हो रहा है, ऐसे में आम जनसामान्य को बहुत अधिक सतर्क, समझदार होने की आवश्यकता है. सामान्य व्यक्ति की एक लापरवाही, एक गलती से साइबर अपराधी को अवसर मिल जाता है और वह किसी भी स्तर का संकट पैदा कर देता है, किसी भी तरह का नुकसान कर देता है. 


व्यक्तियों को अपने सिस्टम को लगातार अपडेट करते रहने की आवश्यकता है. इसके लिए अपने सॉफ्टवेयर और ऑपरेटिंग सिस्टम को नवीनतम स्थिति में बनाये रखा जाना चाहिए. इसके साथ-साथ कंप्यूटर अथवा मोबाइल में एंटी-वायरस का भी उपयोग करना चाहिए. इसके द्वारा अवांछित रूप से वायरस के हमले को रोका जा सकता है. व्यक्ति की जिम्मेवारी बनती है कि वह अपने खातों, सेवाओं से सम्बंधित पासवर्ड मजबूत बनायें. इसके अलावा अपने पासवर्ड को समय-समय पर बदलते भी रहना चाहिए. किसी अनजान ई-मेल को, स्पैम ई-मेल को खोलने से बचना चाहिए. 


नागरिकों के साथ-साथ प्रशासन को भी आवश्यक कदम उठाये जाने चाहिए, जिससे कि नागरिकों के हितों की सुरक्षा हो सके और साइबर अपराधियों के हौसले पस्त हों. इसके लिए ई-वाणिज्य और ई-प्रशासन को बढ़ाने देने के लिए पुलिस एवं उपकरणों को प्रशिक्षित करके इस योग्य बनाया जाये कि वे साइबर अपराध की जाँच कर सकें. पुलिस में कम्प्यूटर के क्षेत्र अधिकारियों एवं कर्मचारियों को प्रशिक्षित करके इस अपराध से निपटने के योग्य बनाना चाहिए. उनको शोषित व्यक्ति के प्रति सहानुभूति दर्शाते हुए दोस्ताना एवं मधुर वार्तालाप बनाये जाने को भी प्रेरित किया जाना चाहिए.


इंटरनेट हमारे दैनिक जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया है. यह भी एक तरह का समाज बन गया है जहाँ प्रत्येक मानसिकता के लोग रह रहे हैं. यहाँ भले लोग भी हैं तो आपराधिक प्रवृत्ति के लोग भी हैं. ऐसे में साइबर अपराधियों से बचने के हम सबको ही सतर्क रहने की आवश्यकता है. लापरवाही से बचने की जरूरत है. कुछ सुरक्षात्मक उपायों को अपनाये जाने की आवश्यकता है. यदि प्रशासन एवं आम जनता इस सन्दर्भ में दिए जाते सुझावों पर अमल करती है तो निश्चित ही इन अपराधों और समस्याओं से बचा जा सकेगा.


25 मई 2023

मोबाइल के बिना भी ज़िन्दगी सम्भव है

कुछ दिनों तक मोबाइल बंद रखने वाले कदम पर बहुत से मित्रों, परिचितों के विचार जानने को मिले. बहुत से मित्रों ने आज के दौर में इसे बहुत कठिन कार्य बताया. हो सकता है कि बहुत से लोगों के लिए ये कठिन काम हो; बिना मोबाइल के उनका गुजारा न होता हो मगर ऐसा नहीं कि बिना मोबाइल के कोई काम नहीं हो सकता है.




बाक़ी लोगों के बारे में तो नहीं कहा जा सकता है कि उनका रुख क्या रहता है मगर अपने बारे में कुछ स्पष्ट सी बातें......

=>> मोबाइल ज़िन्दगी भर के लिए बंद नहीं किया जा रहा है. कुछ समय बस खुद के साथ रहने की कोशिश है.

=>> हम कोई मंत्री, सांसद, विधायक तो हैं नहीं... कोई प्रशासनिक अधिकारी भी नहीं हैं कि लाइसेंस, ठेके, जमानत, थाना, कोतवाली आदि मामलों में सहायक होंगे.

=>> अत्यावश्यक कार्य (वैसे तो होगा नहीं, फिर भी यदि हुआ तो) होने पर जिसे आवश्यकता होगी, वो हमारा पता करके हमसे मिल लेगा.

=>> आजकल फोन से बातचीत लोग वैसे भी न के बराबर कर रहे हैं. ज्यादातर बातचीत चैट के माध्यम से हो रही है, तो उसके लिए ये सोशल मीडिया जिन्दा रहेगा. एक-दूसरे तक खबर पहुँचती रहेगी.

=>> एक सबसे विशेष बात कि मोबाइल ज़िन्दगी नहीं है, मित्र, परिजन, सहयोगी आदि ही ज़िन्दगी हैं. मोबाइल के बिना ज़िन्दगी पहले भी थी, अभी भी बहुत से लोगों की है.

=>> पहले भी लगभग दो साल के लिए हम मोबाइल पूरी तरह से बंद किये रहे थे. अभी 2018-19 में लगभग साल भर whatsapp भी बंद रहा. ऐसा कोई काम नहीं जो आप विचार करें और वो हो न सके.

=>> मोबाइल के बिना भी हम सब जीवित रहेंगे, मिलते रहेंगे. इसलिए परेशान न हों. हमारे सहयोगी बनें और प्रयास करें मेलजोल बढ़ाने का.


25 मार्च 2023

भावनात्मकता से दूर होता समाज

आये दिन खबरें आ रही हैं युवाओं की मौत की. बहुत बड़ी संख्या में मौत का शिकार बन रहे युवाओं में बहुत कम ऐसे हैं जो सामान्य जीवन व्यतीत करते हुए मौत की नींद सो गए. समाचारों, जानकारियों के अनुसार बहुत बड़ी संख्या में अवसाद के कारण, किसी बीमारी के कारण, हार्ट अटैक के कारण, आत्महत्या करके युवा मौत का शिकार बन रहे हैं. इन युवाओं की उम्र बहुत अधिक नहीं है. इनमें से बहुत तो किशोरावस्था के होंगे. बहरहाल, इन युवाओं की उम्र कुछ भी रही हो, वह चिंता का विषय हो उससे बड़ी चिंता का विषय उनका असमय चले जाना होना चाहिए. किसी भी युवा की मौत पर कुछ दिन का मातम मना लिया जाता है, उसके कामों के कारण उसे याद कर लिया जाता है और फिर सभी अपने-अपने काम पर लग जाते हैं. इस तरफ ध्यान देने की कोई आवश्यकता महसूस नहीं की जा रही कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में युवाओं की मौत क्यों हो रही है? सभी युवा आत्महत्या नहीं कर रहे हैं मगर बहुत बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की है हो हार्ट अटैक का शिकार बने हैं. ये भी सोचने का विषय होना चाहिए कि आखिर ऐसी किस तरह की जीवन शैली समाज में चलन में आती जा रही है कि तीस से चालीस वर्ष तक के युवा भी हृदयाघात का शिकार होने लगे हैं?




वैसे यदि हम सकारात्मकता के साथ अपने आसपास निगाह डालें, अपनी ही दिनचर्या पर विचार करें, अपने संपर्क और लोगों से मेल-मुलाक़ात पर ध्यान दें तो हमें खुद एहसास होगा कि किस तरह से हम सभी लगातार एकाकी जीवन जीने की तरफ बढ़ रहे हैं. दिन-दिन भर सोशल मीडिया पर आभासी संपर्क भले बना रहे मगर व्यक्तिगत रूप से हम लोग आपस में बहुत कम मिल रहे हैं. बातचीत तो लगभग बंद सी ही है. अब बातचीत का सहारा सोशल मीडिया के तमाम मंच बन गए हैं. सुबह-शाम के सन्देश पर उसी के अनुसार स्माइली भेजकर सामने वाले को जवाब भी दे दिया जाता है. जिस औपचारिकता से सन्देश भेजा गया होता है, उसी औपचारिकता से भेजी गई स्माइली को भी स्वीकार कर लिया जाता है. एक पल रुक कर यह भी विचार नहीं किया जाता है कि कम से कम एक बार सामने वाले को फोन लगाकर बात कर ली जाये, उसके हालचाल ले लिए जाएँ.


यह एक सार्वभौम सत्य है कि किसी भी व्यक्ति के मन का, उसकी मानसिकता का, हावभाव का पता मोबाइल पर भेजे जाने वाले, पाए जाने वाले संदेशों से, स्माइली से कदापि नहीं हो सकता है. सन्देश, फोटो, वीडियो या स्माइली आदि किसी भी तरह से व्यक्ति के तात्कालिक मनोभावों को नहीं बता सकते. इसका अंदाजा तो बस आपस में बातचीत के द्वारा हो सकता है. बात करने के लहजे से, सामने वाले के बोलने के अंदाज से समझ में आसानी से आता है कि वह खुश है या दुखी है. बातचीत को हम सभी लोग जैसे समाप्त ही कर चुके हैं. मोबाइल के युग में, इंटरनेट के युग में आज एक ही घर में आपस में बातचीत न के बराबर हो रही है. ऐसे में जाहिर है कोई युवा, किशोर यदि किसी भी तरह की समस्या में घिरा है तो इसकी जानकारी नहीं हो पाती है. वर्तमान दौर में प्रत्येक व्यक्ति को अनेक तरह की समस्याओं से सामना करना पड़ता है. किसी को पढ़ाई की समस्या है तो किसी के सामने कैरियर की दिक्कत है. कोई पारिवारिक समस्याओं से दो-चार हो रहा है तो कोई आर्थिक रूप से तंगहाली से गुजर रहा है. ऐसे में भावनात्मक सहारा, संबल न मिल पाने के कारण युवा, किशोर या तो अवसाद में ग्रसित हो जाते हैं या फिर वे हताशा में कोई गलत कदम उठा लेते हैं.


जीवन सिर्फ जिन्दा रहने के लिए नहीं है वरन खुलकर आनंद लेने के लिए है. हताशा, निराशा, असफलता के दौर तो सबके साथ आते जाते हैं मगर यदि उसको भावनात्मक संबल मिल जाये तो वह इन सबसे सहजता से उबर आता है. अपने युवाओं को, किशोरों को असमय मौत के मुँह में जाने से रोकने के लिए आइये हम सब फिर से उसी दुनिया को बनाने का प्रयास करें जहाँ मोबाइल, इंटरनेट ने हमारे रिश्तों को, संबंधों को, भावनात्मकता को नहीं खाया था. 







 

07 अक्टूबर 2022

क्या मोबाइल वाकई समस्या बन गया है?

क्या मोबाइल वाकई हम सबके जीवन में एक समस्या बनता जा रहा है? यह एक ऐसा सवाल है जो हम लगभग रोज ही अपने से करते हैं और इसका जवाब स्वयं देने के बाद फिर इसी समस्या से घिर जाते हैं. यह सबके लिए किस हद तक सच है, ये उसके उपयोग की स्थिति पर निर्भर करता है किन्तु सत्य यही है कि आज जिस तरह से लोगों को मोबाइल की लत लग गई है, वह एक समस्या ही बन गया है. संचार के एक साधन के रूप में, आपसी संपर्क, बातचीत का माध्यम बना मोबाइल अब संचार के साथ-साथ मनोरंजन का साधन भी बन गया है. इंटरनेट और स्मार्टफोन के आने के बाद से मोबाइल ने जैसे अपने स्वरूप को विकराल कर लिया है. अब इसका उपयोग जानकारियों के आदान-प्रदान से अधिक मनोरंजन के लिए किया जाता है. सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों, रील्स, शॉर्ट वीडियो आदि की अधिकता जिस तरह से बाढ़ आई हुई है, उसके चलते मोबाइल अब एक समस्या ही बनता जा रहा है. 


यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि मोबाइल एक नशे की तरह लोगों के जीवन में प्रवेश कर चुका है. अब मोबाइल का उपयोग उसकी सुविधा के चलते कम व्यक्ति की अपनी लत के कारण ज्यादा हो रहा है. यह किसी से भी छिपा नहीं है कि व्यक्ति चाहे अकेले बैठा हो या किसी भीड़ का हिस्सा हो, उसके लिए जैसे वरीयता वाला काम मोबाइल देखना है. मिनट-दो-मिनट में बार-बार मोबाइल को देखना, उसकी स्क्रीन को निहारना, बार-बार सोशल मीडिया के मंचों को खोलकर उनकी पोस्ट, फोटो, वीडियो आदि को देखना एक तरह का रोग बनता जा रहा है. अपने अनेक कामों के बीच में भी मोबाइल को खोलकर देखना, दिन का उजियारा हो या फिर रात का अंधकार, लोगों के लिए जैसे मोबाइल ही एकमात्र सहारा बना होता है. यह भी एक तरह की बीमारी कही जा सकती है कि जब लगने लगे कि इंटरनेट के माध्यम से उसके मोबाइल में कुछ नया सन्देश, फोटो, वीडियो आदि आने वाला है. सोशल मीडिया पर उसके द्वारा पोस्ट की गई सामग्री पर बार-बार लाइक, कमेंट आदि को देखने की आदत भी किसी नशे से कम नहीं.




विडम्बना यह है कि इस रोग का शिकार, इस नशे का आदी हर उम्र का व्यक्ति बना हुआ है. बच्चों में यह समस्या और तीव्रता से देखने को मिल रही है. एकल परिवार होने के कारण, माता-पिता के नौकरीपेशा होने की स्थिति में बच्चों का सबसे अच्छा साथी मोबाइल बना हुआ है. उनको कुछ खिलाना-पिलाना हो, उनकी किसी जिद को पूरा करना हो, खेलने में व्यस्त रखना हो तो बस मोबाइल पकड़ा कर माता-पिता खुद को जिम्मेवारी से मुक्त कर लेते हैं. अब बच्चों को घरों में परियों की कहानियाँ नहीं सुनाई जातीं बल्कि उनको मोबाइल पकड़ा कर रंगीन स्क्रीन में व्यस्त कर दिया जाता है. यह बच्चों के कोमल मन-मष्तिष्क पर नकारात्मक रूप से अपना प्रभाव छोड़ रहा है. देखने में आ रहा है कि अब बच्चे चिड़चिड़े होते जा रहे हैं. उनकी माँग के अनुसार यदि उनको मोबाइल न दिया जाये तो वे चिल्लाने का, सामान फेंकने का, खुद को हानि पहुँचाने का काम करने लगते हैं.   


कुछ ऐसा ही हाल युवाओं का है. वे किसी भी कार्य में व्यस्त हों किन्तु उनके हाथों से मोबाइल नहीं छूटता है. कभी किसी ऑनलाइन गेम में व्यस्त होने के कारण, कभी रील्स बनाने या फिर उनको देखने के क्रम में उनकी उंगलियाँ लगातार मोबाइल स्क्रीन पर टहलती ही रहती हैं. इसके चलते ऐसे बहुत से केस देखने को मिल रहे हैं जहाँ लोगों में आँखों की बीमारी, गर्दन का दर्द, रीढ़ की हड्डी में दिक्कत, उँगलियों की अपनी बीमारी की समस्या उत्पन्न हो रही है. इन बीमारियों के साथ-साथ लोगों की याददाश्त भी कमजोर हो रही है. छोटे से छोटे काम के लिए बच्चों, युवाओं की मोबाइल पर निर्भरता ने उनके मष्तिष्क की कार्यक्षमता को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है. अब वे किसी जानकारी के लिए कहीं खोजबीन करने का, अपना अनुभव जुटाने का, खुद का विश्लेषण करने का जोखिम नहीं उठाते हैं. उनके लिए एकमात्र समाधान अब उनके हाथ में दिखता मोबाइल है.


इस सुविधाजनक समस्या से बाहर निकलने के प्रयास उन्हीं लोगों को करने होंगे, जो इसके आदी बने हुए हैं. उनको समझना होगा कि मोबाइल की ऐसी लत किसी भी नशे की तरह बुरी है. देखने में भले यह किसी तरह की बाहरी बीमारी को नहीं दिखा रहा है किन्तु शरीर को, मन को, दिमाग को भीतर ही भीतर खोखला कर रहा है. अनिद्रा, तनाव, अवसाद, निराशा, गुस्सा, चिड़चिड़ापन आदि की समस्याएँ इसी मोबाइल की अधिकता के कारण उत्पन्न होने लगी हैं. आइए, इस समस्या को दूर हुए मोबाइल को अपनी सुविधा का ही साधन बना दिया जाये.

 




 

25 सितंबर 2022

पुस्तकों से दूर होता युवा

इंसानों ने अपने विकास के विभिन्न चरणों में खुद को और अधिक विकसित करने के लिए तकनीक का चयन किया, उसके द्वारा विभिन्न उपकरणों का निर्माण किया. निश्चित ही ऐसा करने के पीछे उसका उद्देश्य जीवन-शैली को सहज ढंग से चलाना रहा होगा. इसी सहज जीवन की संकल्पना में मोबाइल भी बनाया गया होगा. मोबाइल ने इंसानों की ज़िन्दगी को कितना आसान किया या कितना कठिन किया, इस बारे में सबकी अलग-अलग राय है. इसके बाद भी एक बात से शायद ही कोई इंकार करेगा कि मोबाइल के आने ने, मोबाइल के अत्यधिक उपयोग ने प्रत्येक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से, समाज से जैसे अलग कर दिया है. प्रत्येक व्यक्ति अपने मोबाइल के साथ अपने ही बने-बनाए एक खाँचे में बंद नजर आ रहा है. कहीं भी निकल जाइए, किसी भी जगह नजर दौड़ाइए, हर कोई मोबाइल में तल्लीन दिखाई दे रहा है. बड़े हों या बच्चे, युवा हों या वृद्ध, स्त्री हो या पुरुष, अधिकारी हो या व्यापारी सभी के सभी मोबाइल में ऐसे मग्न समझ आते हैं जैसे बिना मोबाइल के उनका एक पल काटना मुश्किल है.


मोबाइल किसके लिए कितना उपयोगी है, कितना नहीं यह उसकी स्थिति और उसके कार्य पर निर्भर करता है. इधर देखने में आ रहा है कि विद्यालयों, महाविद्यालयों के विद्यार्थी भी मोबाइल का बुरी तरह से इस्तेमाल कर रहे हैं. इनमें से शायद ही इक्का-दुक्का होंगे जो अपने पाठ्यक्रम से सम्बंधित जानकारियों को मोबाइल पर खोजते होंगे. महाविद्यालय में घुसते ही चारों तरफ हरियाली मन प्रसन्न कर देती है और उसी हरियाली के बीच जगह-जगह लड़के-लड़कियों के छोटे-छोटे झुण्ड सेल्फी लेने में तल्लीन दिखाई देते हैं. अध्ययन संस्थाओं के अलावा भी बाजार में, टैम्पो में, बस में, ट्रेन में, रिक्शे आदि में भी लड़के, लड़कियों का मोबाइल से चिपके रहना दिखाई देता है. अब सफ़र के दौरान या फिर कहीं फुर्सत के समय में युवाओं का किताबों से दोस्ती करते दिखाई पड़ना लगभग विलुप्त सा हो गया है.




सफ़र के दौरान, ट्रेन या बस का इंतजार करने के समय, खाली समय में पहले की तरफ अब इक्का-दुक्का लड़के-लड़कियाँ दिखाई देते हैं जो किसी पुस्तक के साथ हैं. युवा वर्ग बहुतायत में अपने मोबाइल में ही मगन है. तकनीकी ने ही पुस्तकों का विकल्प किंडल संस्करण के रूप में उतारा था. इसके प्रति भी युवाओं का रुझान बहुत ज्यादा देखने को नहीं मिलता है. समझ नहीं आता है कि आखिर कोई युवा बिना पढ़े कैसे अपने आपको भविष्य के लिए तैयार कर रहा है? इस आश्चर्य से ज्यादा आश्चर्य की बात यह लगती है कि अध्यापन से जुड़े हुए बहुतेरे लोग भी किताबों से दूरी बनाये हुए हैं. अपने आसपास के लोगों में, अपनी मित्र-मंडली में बहुत कम ही मित्र ऐसे मिलते हैं जो पुस्तक पाठन के प्रति आकर्षण बनाये हुए हैं. आये दिन प्रकाशित होने वाली पुस्तकों के सम्बन्ध में चर्चा करने पर जानकारी मिलती है कि न तो युवा वर्ग के लोग पुस्तक पढ़ना चाहते हैं और न ही बच्चों को पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित किया जा रहा है. 


असल में पठन-पाठन के प्रति रुचि को जागृत करना पड़ता है. समाज में जिस तरह से मोबाइल के अथवा अन्य आधुनिक उपकरणों के आने से व्यक्तियों ने अपने आपको उसी में व्यस्त रखना शुरू कर दिया है, उससे भी पुस्तकों के प्रति लोगों की अरुचि देखने को मिलती है. मोबाइल और इंटरनेट की सहज उपलब्धता में युवा वर्ग तेजी से सोशल मीडिया की तरफ मुड़ा है. उसका बहुतायत समय इसी पर गुजरने लगा है. सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर उसकी लेखकीय सक्रियता देखने को मिलती है किन्तु यह भी सीमित शब्दों में बनी हुई है. इन सीमित शब्दों की लेखकीय यात्रा में भी ज्यादातर युवा कॉपी-पेस्ट की तकनीक के सहारे अपना काम चला रहे हैं. यह सोचने वाली बात है कि जब पढ़ा ही नहीं जा रहा है तो लिखा कैसे जा सकता है? लिखने के पहले बहुत सारा पढ़ने की आवश्यकता होती है. सच तो यह है कि अब घरों से ही धीरे-धीरे पढ़ने की, पुस्तकें-पत्रिकाएं लाने की प्रक्रिया ही समाप्त होती जा रही है.


चूँकि एक धारणा लगभग सभी ने बना रखी है कि मोबाइल के, तकनीक के इस दौर में आज सबकुछ इंटरनेट पर उपलब्ध है. इसने भी पढ़ने के प्रति सक्रियता को कम किया है. किसी भी जानकारी के लिए, तथ्यात्मक खोज के लिए बजाय पुस्तकों के युवा वर्ग अब मोबाइल की तरफ जाना पसंद करने लगे हैं. यही कारण है किंडल संस्करण एकसाथ, एक जगह पर हजारों-हजार पुस्तकों को उपलब्ध करवाने के बाद भी युवा वर्ग में पुस्तक पाठन के प्रति शौक पैदा नहीं कर पा रहा है. इसका एक बहुत बड़ा कारण बचपन से ही बच्चों में किताबों को पढ़ने के लिए प्रेरित न कर पाना रहा है. आज बच्चे जिस शौक के साथ मोबाइल को अपना साथी बना रहे हैं, यदि उन्हें किताबों का महत्त्व समझाएं, उसकी उपयोगिता के बारे में बताते हुए किताबें पढ़ने को प्रोत्साहित करें तो संभव है कि वे इस ओर आगे बढ़ें. बच्चों को समझाना होगा कि अपने देश की संस्कृति, सभ्यता, इतिहास, महापुरुषों आदि के बारे में जानने-समझने के लिए किताबों से अच्छा कोई साथी नहीं. वास्तव में यदि समझ आ जाये तो पुस्तकों से बेहतर कोई मित्र नहीं. सफ़र हो, घर को, भीड़ हो, अकेलापन हो या कहीं, कैसी भी स्थिति सभी में किताबें मित्रवत साथ निभाती हैं.




 

21 जुलाई 2022

मोबाइल का उपयोग और व्यक्ति का अकेलापन

आज लगभग हर हाथ मोबाइल से और सभी मोबाइल इंटरनेट सुविधा से सुसज्जित हैं. हम सभी अपने आसपास ऐसे लोगों को अवश्य ही देखते होंगे जो लगातार मोबाइल को ही निहारते रहते हैं. मोबाइल की स्क्रीन पर अपनी उंगलियाँ घुमाते रहते हैं. जबरदस्त व्यस्तता से भरे दिखाई पड़ने वाले ऐसे लोग वास्तविकता में अन्दर से किस कदर अकेलेपन से घिर चुके होते हैं, न उनको इसका भान होता है और न ही हम सब उसे समझ पाते हैं. इस अकेलेपन को न समझ पाने का एक बहुत बड़ा कारण यह भी होता है क्योंकि हम सब भी कहीं न कहीं इसी तरह की स्थिति का शिकार होते हैं.


निश्चित ही तकनीकी दौर में बिना तकनीक के आगे बढ़ना संभव नहीं है. इंटरनेट और स्मार्ट फोन ने यकीकन काम को गति दी है, सुविधाजनक बनाया है मगर इस गति और सुविधा ने व्यक्तियों को अकेला कर दिया है या कहें कि उनमें अकेलापन भर दिया है. ये चौंकने वाली बात नहीं है, बस इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है, अपने आसपास जो घटनाएँ हो रही हैं उनका विश्लेषण करने की आवश्यकता है. हम सभी को वो दौर याद होगा जबकि हमें डाटा की बहुत अधिक कीमत चुकानी पड़ती थी. उन दिनों में भी काम हुआ करते थे, नेट का उपयोग हुआ करता था मगर उसमें एक तरह की सीमितता थी. उस समय डाटा के उपयोग में मन-मष्तिष्क में एक तरह की किफ़ायत करने का भी भान हुआ करता था. उन दिनों के उलट आज देखें तो असीमित रूप में हम सबको डाटा मिला हुआ है मगर इसका कितना सदुपयोग किया जा रहा है या कहें कि हो रहा है ये सोचने वाली बात है.


लगभग मुफ्त के भाव मिलते डाटा ने और इंटरनेट की दुनिया में उपलब्ध अनेकानेक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ने जैसे हम सबके आसपास एक तरह का कल्पनालोक बना दिया है. सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म की जबरदस्त उपलब्धता से व्यक्ति अपने आसपास की वास्तविक दुनिया से दूर होता गया और स्क्रीन पर दिखाई पड़ती दुनिया के करीब आता गया. इसी का दुष्परिणाम व्यक्तियों के अकेले होने के रूप में सामने आ रहा है. इसकी परिणति अवसाद, निराशा, कुंठा, अपराध, नशे की प्रवृत्ति आदि के रूप में दिखती हुई आत्महत्या तक जा पहुँची है. इसे कोई बनाई हुई आभासी स्थिति न कहिये बल्कि महसूस कीजिये.




हम, आप सभी सुबह-सुबह मोबाइल पर आते अनेकानेक सुप्रभात अथवा दार्शनिक संदेशों से दो-चार होते हैं. अक्सर इन संदेशों के प्रत्युत्तर में या तो सन्देश ही भेज दिया जाता है अथवा किसी इमोजी को भेज दिया जाता है. सन्देश भेजने वाले ने अपने दायित्व का निर्वहन कर लिया और उस सन्देश के प्रत्युत्तर में हम, आप ने अपने कर्तव्य का निर्वाह कर लिया. ये क्रम सामान्य दिनों में ही नहीं अपितु विशेष दिनों, अवसरों पर भी बना रहता है. जन्मदिन, वर्षगाँठ, पर, त्यौहार अथवा किसी भी ख़ुशी या ग़म के अवसर पर अब फोन करके बात करने जैसी स्थिति न के बराबर दिखाई पड़ती है. अब घनिष्ट यार-दोस्तों में भी देर-देर रात तक चैट करने की प्रवृत्ति पनप चुकी है. परिजनों के बीच, मित्रों के बीच, सहयोगियों के बीच, शहर-मोहल्ले के परिचितों के बीच आज एक तरह का अबोलापन सा बना हुआ है. कहने को पूरे दिन चैट होती है मगर बातचीत हुए महीनों बीत जाते हैं.


इस स्थिति को सहज समझना ही नादानी है और समाज में अकेलापन भर रही है. कोई भी व्यक्ति हो वह अपनी लगातार की दिनचर्या में कभी परेशान भी होता है, कभी खुश भी रहता है. कभी उसे अपने कार्यक्षेत्र में कोई उलझन आती है तो कभी वह पारिवारिक समस्या से जूझता है. किसी समय में आपस में बातचीत से ऐसी समस्याओं, परेशानियों का हल निकल आया करता था, यदि हल न भी निकलता था तो अपनी बात कह लेने से, सामने वाले से सांत्वना के दो बोल मिल जाने से भी मन हल्का हो जाया करता था. अब मैसेज के द्वारा न तो सामने वाले की मनोस्थिति समझ आ रही है और न ही उसकी ख़ुशी, ग़म के बारे में समझना हो पा रहा है.


अपने आसपास भीड़ होने, देखने के बाद भी व्यक्ति नितांत अकेला अपने मोबाइल की स्क्रीन में ही केन्द्रित है. सोशल मीडिया, इंटरनेट के अनकहे से सम्मोहन में व्यक्ति सबकुछ भुला बैठा है. होना यह चाहिए कि जिस तरह से आये दिन युवाओं में, किशोरों में अवसाद, हताशा, निराशा, नाराजगी, चिडचिडापन, आक्रोश आदि देखने को मिलने लगा है, उसके समाधान के लिए प्रयास किये जाएँ. परिवार में, सहयोगियों में आपस में बातचीत के पुराने दौर वापस लाये जाएँ. संपर्क बनाये रखने से ज्यादा आवश्यक है कि आपस में सम्बन्ध बनाये जाएँ. शाम को निश्चित रूप से सभी को मोबाइल, सोशल मीडिया, इंटरनेट से बाहर निकल एक-दूसरे से मिलने-जुलने को अनिवार्य बनायें. युवाओं और किशोरों को इंटरनेट की आभासी रील वाली दुनिया से वास्तविक संबंधों, रिश्तों वाली दुनिया की सैर करवाएं. मोबाइल का उपयोग अत्यंत आवश्यक होने की दशा में ही करने के प्रयास किये जाने चाहिए.


यह सत्य है कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में तकनीकी बहाव को रोका नहीं जा सकता है, उससे बचा भी नहीं जा सकता है मगर अपने व्यवहार से, मानसिकता से उस पर नियंत्रण अवश्य लगाया जा सकता है. जिस तरह प्राकृतिक रूप से सर्दी, गर्मी, बरसात को रोका नहीं जा सकता परन्तु उनसे बचने के उपाय अवश्य किये जा सकते हैं, कुछ ऐसा ही हम सबको मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया के उपयोग को लेकर करना होगा. स्क्रीन की भीड़ भरी आभासी दुनिया में अकेलेपन का शिकार होने से बचने के लिए अपने आसपास की वास्तविक दुनिया से पहले की तरह सम्बन्ध बनाने होंगे.


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11 जुलाई 2022

परेशानी का कारण बनता मोबाइल : 2200वीं पोस्ट

कई महीनों से हमारा अपने साथ एक तरह का द्वंद्व चल रहा है. ये द्वंद्व मोबाइल के उपयोग को लेकर मचा हुआ है. बहुत बार मोबाइल सुविधाजनक से ज्यादा असुविधाजनक महसूस होता है. दूसरी तरफ वाले को न समय की चिंता करनी है न ही स्थान की. उसे बस अपने काम से मतलब होता है. आप कितने व्यस्त हैं, कहाँ हैं, किसके साथ हैं, किस स्थिति में हैं उसे कोई मतलब नहीं. इधर मोबाइल के उपयोग को लेकर अपने आपमें उथल-पुथल कुछ ज्यादा ही मची हुई है. इसी में आज एक चित्र हाथ लग गया, जिसमें एक समाचार प्रकाशित था. उसे देखकर विचार आया कि आज की ये पोस्ट उसी पर लिखी जाये.

 

पोस्ट लिखने के बारे में बताने का एक विशेष कारण ये है कि आज की ये पोस्ट हमारे इस ब्लॉग की 2200वीं पोस्ट है. मई 2008 से शुरू ब्लॉगिंग की यात्रा धीरे-धीरे चलते हुए यहाँ तक पहुँच गई. बहरहाल, ब्लॉगिंग की यात्रा पर फिर कभी, आज ऊहापोह में डालते मोबाइल पर चर्चा कर ली जाये.

 

आज लगभग हर हाथ में मोबाइल है, न केवल मोबाइल है बल्कि स्मार्ट फोन कहे जाने वाले मोबाइल हैं. उन्हीं हाथों में इंटरनेट भी सुसज्जित है. ऐसा तो नहीं कहेंगे कि जितने हाथों में स्मार्ट फोन है, इंटरनेट है वे सभी लोग अत्यधिक व्यस्त हैं मगर बहुतायत में ऐसे लोग हैं जो चौबीस घंटे के हिसाब से अपने इसी स्मार्ट फोन में व्यस्त हैं. हर दो-चार मिनट में उनकी जेब से, बैग से मोबाइल निकलता है, चमकता है और फिर इधर-उधर कुछ उँगलियों का सहारा लेकर वापस अपनी जगह चला जाता है. कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके आसपास कितने लोग भी क्यों न हों, कितने भी ख़ास क्यों न हों, कितने आम क्यों न हों उनका मोबाइल न बंद होता है और न ही जेब-बैग के हवाले होता है. संभवतः नहाते समय ही ऐसे लोगों का मोबाइल उनके हाथ से छूटता हो.

 

हमारा व्यक्तिगत रूप से ऐसा मानना है कि मोबाइल और इंटरनेट की जुगलबंदी ने इंसान का जीना मुश्किल किया है. उसकी सामाजिकता को प्रभावित किया है. उसकी जीवनशैली को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है. इस बात को हम अपने व्यक्तिगत अनुभवों से कह रहे हैं. आज देखने में आ रहा है कि मोबाइल के, इंटरनेट के, सोशल मीडिया के अतिशय उपयोग ने लोगों को घनघोर भीड़ में भी अकेले कर दिया है. किसी समय बातचीत को सहजता, सरलता, गतिशीलता देने के लिए मोबाइल को बनाया गया था. आज स्थिति ये है कि बातचीत को छोड़कर बाकी सबकुछ मोबाइल पर होता है. मोबाइल अपने आपमें आपकी व्यक्तिगत संपत्ति जैसा है. किसी समय घर में लगे बेसिक फोन को परिवार का फोन कहा जाता था. एक ही फोन पर समूचा परिवार बात करता था. मोबाइल के द्वारा व्यक्तिगत भाव पैदा कर देने से कुछ लाभ हुए हैं तो उनके सापेक्ष नुकसान बहुत ज्यादा हुए हैं. किसी समय तक मोबाइल से बातचीत हो जाया करती थी मगर सोशल मीडिया के आने के बाद तो जैसे आपस में बातचीत करना बंद सा ही हो गया है. अब सुबह-सुबह एक मैसेज छोड़कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जाती है. अब इसकी चिंता नहीं कि जिसे हम अपना मित्र कहते हैं, जिसे अपने साथी-सहयोगी बताते नहीं थकते, उससे बातचीत करके उसके हालचाल भी नहीं लेते.

 

मोबाइल के द्वारा इस तरह का अकेलापन पैदा कर दिए जाने को लेकर हमेशा एक तरह का भय हमारे भीतर रहता है. इस भय के अलावा समय-असमय आने वाली अनावश्यक कॉल्स के कारण भी मोबाइल सिरदर्द समझ आने लगा है. कुछ इसी तरह की अन्य दूसरी समस्याओं के कारण हमने वर्ष 2011 में मोबाइल का उपयोग पूरी तरह से बंद कर दिया था. पूरे दो साल किसी भी तरह से मोबाइल का उपयोग हमने नहीं किया था. बैंकों ने जिस तरह से जबरिया अनिवार्यता सी बना दी है, मोबाइल की उसके चलते बस उतनी देर को मैसेज देखने के लिए, ओटीपी देखने के लिए मोबाइल का उपयोग किया जाता था. हमारे उस निर्णय पर लोगों को आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा था कि इससे लोगों को दिक्कत होगी. हमें तब भी समझ न आया था, आज भी समझ नहीं आया है कि मोबाइल हम अपनी सुविधा के लिए रखते हैं अथवा दूसरों की सुविधा के लिए? लोगों के काम, संपर्क, मेल-मिलाप उस समय भी हुआ करते थे, जबकि मोबाइल का चलन नहीं था या कि मोबाइल सबके पास नहीं हुआ करता था. अपने भीतर की उथल-पुथल से, अपने अन्दर के द्वंद्व से निपट लेने के बाद मोबाइल को बंद करना है. कतिपय तानाशात्मक सरकारी, गैर-सरकारी रवैये के चलते पूरी तरह से बंद कर पाना संभव न हुआ तो नगण्य उपयोग की सम्भावना निर्मित की जाएगी.

 

इन तमाम समस्याओं के साथ-साथ एक बहुत बड़ा संकट मोबाइल उपयोग को लेकर सबके साथ है मगर उसे लोग सामान्य ही समझ रहे हैं. आज सरकारी, गैर-सरकारी कार्यों, संस्थानों की स्थिति यह हो गई है कि आपको किसी भी तरह का काम करना है तो उसमें अनिवार्य रूप से मोबाइल की उपलब्धता माँगी जाती है. इस पर भी एक तानाशाही और हावी है कि मोबाइल फोन अब सादा न होकर स्मार्ट फोन हो, जिसमें अनेक एप डाउनलोड हो जाएँ, वेबसाइट चल जाएँ. यहाँ सोचना-समझना होगा कि जिस देश में बहुतायत जनसंख्या मूलभूत आवश्यकताओं को पाने के लिए जद्दोजहद कर रही हो वहाँ हर हाथ में स्मार्ट फोन की अनिवार्यता सी बना देना क्रूर मजाक है. शैक्षिक संस्थानों में विद्यार्थी अपने प्रवेश के लिए फॉर्म बाद में भरता है, पहले उसे मोबाइल नंबर उपलब्ध कराना होता है. बैंक में आपका खाता बाद में खुलेगा, पहले आपको स्मार्ट फोन से ओटीपी बताना पड़ता है. रेल-हवाई जहाज में आपकी यात्रा बाद में होती है पहले आपको अपने स्मार्ट फोन में एक एप डाउनलोड करके खुद को सुरक्षित बताना होता है.

 

एक तरह की यह मोबाइल अनिवार्यता तानाशाही जैसा नहीं है? क्या ये अनिवार्य रूप से लागू नहीं कर दिया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति मोबाइल का उपयोग करे? क्या इस बात के लिए कदम नहीं बढ़ा दिए गए हैं कि हर व्यक्ति स्मार्ट फोन ले और उसमें इंटरनेट की सुविधा हो? क्या यह एक तरह से बहुत बड़े जनमानस को पंगु बनाने जैसा नहीं है? फिलहाल तो हमारी ऐसी बातें लोगों को मजाकिया लगती हैं, ऐसा इसलिए भी क्योंकि मोबाइल के, इंटरनेट के, सोशल मीडिया के अभी लोग मजे ही ले रहे हैं. यद्यपि वे अपने कष्ट को बताते भी हैं तथापि मोबाइल के नशे के आदी हो जाने के कारण उसे छोड़ पाने में कठिनता महसूस करते हैं. जिस चित्र की बात पोस्ट के आरम्भ में ही की थी, यदि उसमें दर्शाया गया समाचार सही है तो यह समझने वाली और चिंतन करने वाली बात है कि जिस व्यक्ति ने मोबाइल फोन का अविष्कार किया वही अब सामान्य ज़िन्दगी में जीने की बात कर रहा है, मोबाइल छोड़ने की बात कर रहा है.




05 जुलाई 2022

फोटोग्राफी एक शक्ति है सामाजिक सन्देश हेतु

मोबाइल फोन या कहें कि स्मार्ट फोन आने के बाद से लोगों के लिए फोटोग्राफी करना सामान्य सी बात हो गई है. कहीं भी, कभी भी व्यक्ति अपना स्मार्ट फोन निकाल फोटो खींचने में लग जाता है. कोई अपने सामने दिखाई दे रहे ऑब्जेक्ट की फोटो लेता है तो कोई खुद को ही ऑब्जेक्ट बना कर सेल्फी लेने में व्यस्त रहता है. इतनी सहज-सुलभ-सामान्य फोटोग्राफी होने के बाद भी यदि पूछा जाये कि फोटोग्राफी क्या है तो एक सामान्य सा जवाब आएगा कि कैमरे से फोटो खींचना फोटोग्राफी है. यह सही भी है. तो आज बस एक सामान्य सा परिचय इसी कैमरे से फोटो खींचने वाली फोटोग्राफी का.

 

असल में फोटोग्राफी कोई एक शब्द नहीं है. यह दो शब्दों से मिलकर बना है. ये दोनों शब्द ग्रीक भाषा के हैं. इन दो ग्रीक शब्दों में एक है फोटो (photo) और दूसरा शब्द है ग्राफ (graph). इन दो शब्दों से बने फोटोग्राफी का सामान्य रूप में अर्थ होता है फोटो अर्थात प्रकाश की सहायता से ग्राफ यानि कि चित्र बनाना. आपको बताते चलें कि यहाँ फोटो का अर्थ प्रकाश (light) से है. इस फोटो या लाइट का तात्पर्य ऐसे भी समझना होगा कि कैमरे के सामने वाली किसी भी वस्तु, जिसे फोटोग्राफी की भाषा में ऑब्जेक्ट कहते हैं, से प्रकाश टकरा कर कैमरे के लेंस से गुजरता हुआ भीतर लगी रील तक पहुँचकर सम्बंधित वस्तु का चित्र बनाता है. रील में एक विशेष प्रकार के केमिकल का लेप हुआ करता था. इसी रासायनिक लेप के कारण कैमरे के लेंस से गुजरने वाली प्रकाश किरण से पहले निगेटिव बनता था, उसको साफ़ करके, डेवलप करने पर चित्र का निर्माण किया जाता था.  आजकल तो डिजिटल कैमरे चलने लगे हैं, जिनमें किसी रील का कोई काम नहीं होता है. अब इन डिजिटल कैमरों में सेंसर लगा होता है, जो इलेक्ट्रॉनिक विधि से फोटो खींचता, बनाता है.

 



किसी के लिए भी यह एक सामान्य समस्या होती है कि अच्छी फोटो कैसे खींची जाए? फोटो में चमक, गहरे रंग, आकर्षक वस्तु का दिखाई देना ही एक अच्छी फोटो की पहचान नहीं है. असल में एक बेहतरीन फोटो वही कही जा सकती है जो देखने वाले को आकर्षित करे, उसके मन-मष्तिष्क पर गहरा प्रभाव डाले. यहाँ इसी बिंदु के सन्दर्भ में समझना चाहिए कि किसी वस्तु की, इंसान की, प्राकृतिक दृश्य की फोटो खींच लेना मात्र ही फोटोग्राफी नहीं है. शौकिया फोटोग्राफी एक अलग बात है किन्तु मूल रूप में किसी फोटो के द्वारा कोई बात कही जाये, किसी तरह का सन्देश दिया जाये तो उसे अच्छी फोटोग्राफी कहा जा सकता है. फोटोग्राफी के द्वारा लोग अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं. किसी घटना, आयोजन को संजोया जा सकता है. यदि कहा जाये कि फोटोग्राफी एक तरह की कला है, आर्ट है तो कोई अतिश्योक्ति न होगी.


अमेरिकी फोटोग्राफर बेरेनिस अबोट का कहना है कि फोटोग्राफी लोगों को देखने में मदद करती है अर्थात वह देखना सिखाती है. यह बहुत बड़ी और गम्भीर टिप्पणी कही जाती है, फोटोग्राफी क्षेत्र में. ऐसा माना जाता है कि मँहगे कैमरों से खींची जाने वाली फोटो ही बेहतरीन फोटोग्राफी का उदाहरण है. असल में किसी भी फोटो में विषय का, उसके द्वारा दिए जा रहे सन्देश का बहुत महत्व है. इसलिए कई बार सामान्य से कैमरे यहाँ तक कि स्मार्ट फोन के द्वारा भी बेहतरीन फोटो निकाली जा सकती है, जो समाज को एक सन्देश दे.


फोटोग्राफी सीखने वालों के लिए, शौकिया फोटो खींचने वालों के लिए ये समझने की बात है कि कैमरा या स्मार्ट फोन में कैमरे का होना महज क्लिक करने के लिए नहीं है. कैमरे को, अपनी फोटोग्राफी के द्वारा बहुत कुछ ऐसा किया जा सकता है, जिसे याद रखा जाये. समाज, शिक्षा, युवाओं, पर्यटन, पर्यावरण, चिकित्सा, स्वास्थ्य आदि-आदि ऐसे अनेक क्षेत्र हैं जिनमें फोटोग्राफी के द्वारा न केवल रोजगार प्राप्त किया जा सकता है बल्कि लोगों को सकारात्मक सन्देश भी दिया जा सकता है. यह बात सभी लोगों को ध्यान में रखनी चाहिए कि फोटोग्राफी बहुत बड़ी शक्ति है जो समाज को एक सार्थक संदेश दे सकती है.


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31 मार्च 2022

आखिर सस्ता डाटा, कॉल का फायदा क्या?

आज बहुत ज्यादा लिखने का मन नहीं है. इस मन न होने के कारण कोई विशेष नहीं है, बस मन ही नहीं है. इधर देखने में आ रहा है कि इंटरनेट पर बहुतायत लोग बहुत बड़ा लिखा हुआ पढ़ने के मूड में रहते नहीं हैं. मोबाइल पर हों या फिर कम्प्यूटर पर, ऐसे लोग जल्दी-जल्दी स्क्रॉल करते हुए आगे बढ़ने में ज्यादा विश्वास करते हैं. ऐसी स्थिति तब है जबकि एक तरह से डाटा फ्री है. न भी फ्री कहें तो बहुत अधिक सस्ता है.


यहाँ यही बात समझ नहीं आती कि आखिर सस्ता या फ्री समान डाटा देने का क्या उद्देश्य है. फ्री के जैसी कॉल देने के पीछे मानसिकता क्या है? अब लोगों को मोबाइल पर ही चिपके देखा जाता है. अनावश्यक बातचीत में व्यस्त बने रहना दिखता है. ऐसे समय में वे दिन याद आते हैं जबकि कॉल चार्ज बहुत मंहगा हुआ करते था. कम से कम लोग अनर्गल बातचीत में व्यस्त तो नहीं रहते थे. अब घंटों के हिसाब से आपस में बातचीत हुआ करती है. इस अनावश्यक वार्तालाप ने संबंधों को मजबूत करने की बजाय कमजोर ही किया है.


आप सबको आश्चर्य हो रहा होगा, इस अंतिम लाइन को पढ़कर मगर सत्यता यही है. आज बस इतना ही, इस पर जल्द ही कुछ विस्तार से.


02 जनवरी 2022

साइबर क्राइम से बचा जा सकता है

साइबर अपराध या साइबर क्राइम आज एक प्रचलित शब्द है. आखिर ये साइबर अपराध क्या है? सहज शब्दों में कहें तो इंटरनेट का उपयोग करके कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल के द्वारा किया गया कोई भी गैर-कानूनी कार्य साइबर अपराध है. इसके द्वारा एक व्यक्ति मोबाइल, कंप्यूटर आदि के द्वारा इंटरनेट का उपयोग करके किसी दूसरे व्यक्ति के साथ धोखाधड़ी करके गैर कानूनी तरीके से किसी भी कार्य को करता है तो उस व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य साइबर अपराध कहलाता है. ऐसे कार्य करने वाले व्यक्ति को साइबर अपराधी कहते हैं.


इस तरह के अपराध में साइबर अपराधी कोई ना कोई गैर कानूनी तरीके से ऑनलाइन मोड में किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत जानकारी जैसे उसके लेनदेन करने के खाते का, व्यापारिक गतिविधि के खाते का, सोशल मीडिया खाते का लॉग इन आईडी, उसका पासवर्ड, उसकी निजी जानकारी, उसके बैंक से सम्बंधित जानकारी, केडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, आदि की जानकारी लेने अथवा चुराने का प्रयास किया जाता है या फिर चुरा लिया जाता है. ऐसा करने के बाद साइबर अपराधी आर्थिक नुकसान पहुँचाता है.




आर्थिक अपराध के अलावा इंटरनेट पर अब बिना सम्बंधित व्यक्ति की जानकारी के, बिना उसकी अनुमति के उसकी सामग्री का चोरी किया जाना भी आम बात होती जा रही है. ऐसे में यह भी एक तरह का अपराध है.


इसके साथ-साथ किसी व्यक्ति की निजी जानकारी के लिए किसी भी अवैध तरीके से उसके लैपटॉप, कंप्यूटर, मोबाइल आदि में प्रवेश करके सामग्री, जानकारी का चोरी करना भी साइबर अपराध है.


साइबर अपराध में किसी भी अपराधी को कंप्यूटर, मोबाइल के साथ-साथ एक इंटरनेट कनेक्शन की आवश्यकता होती है. उसी के द्वारा वह किसी व्यक्तिगत या सरकार की आर्थिक संपत्ति अथवा अन्य तरह के अपराध करता है.


साइबर अपराध में केवल किसी दूसरे की जानकारी को चोरी करना, आर्थिक चोरी करना ही अपराध नहीं है बल्कि किसी दूसरे की किसी भी तरह की डिवाइस में किसी ऐसे वायरस को पहुँचाना भी अपराध है जिससे उस सम्बंधित कंप्यूटर, मोबाइल आदि को नुकसान पहुँचाया जा सके. इसी तरह किसी भी व्यक्ति की निजी अथवा किसी सार्वजनिक जानकारी का उपयोग बिना उसकी जानकारी, अनुमति के करना भी साइबर अपराध है. किसी दूसरे व्यक्ति की मेल आईडी का गैर-कानूनी इस्तेमाल करना अथवा उसकी क्लोनिंग करके किसी दूसरे से ठगी, धोखाधड़ी करना आदि भी साइबर अपराध की श्रेणी में आता है.


इधर सोशल मीडिया का उपयोग भी बहुतायत हो रहा है. इंटरनेट की मदद से सोशल साइट्स पर गैर कानूनी फोटो, वीडियो, सामग्री, जानकारी को फैलाना से भी साइबर अपराध माना गया है. इसमें इस तरह की जानकारी, सामग्री भी अपराध की श्रेणी में शामिल है जिसके द्वारा सांप्रदायिक तनाव बढे, राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो, देश हित से सम्बंधित किसी भी जानकारी का गैर-कानूनी इस्तेमाल हो.


इसके अलावा तमाम सोशल साइट्स एप्स जैसे Watsaap, Facebook, Twitter, Teligram, Instagram आदि पर फर्जी नाम या फर्जी आईडी बना कर गैर कानूनी तरीके से किया गया कोई भी कार्य साइबर अपराध कहलाता है.


साइबर अपराधियों से खुद को बचाए रखने के लिए आवश्यक है कि हम सभी अपने सुरक्षा कदमों को मजबूत रखें. अपने खातों से सम्बंधित जानकारियों को सार्वजनिक न करें.


किसी भी तरह की व्यावसायिक गतिविधि में उपयोग होने वाले प्लेटफोर्म में उपयोग किये जाने वाले किसी भी गुप्त कोड को किसी के साथ भी शेयर न करें.


समय-समय पर अपनी आईडी का पासवर्ड बदलते रहें. अनजान मैसेज लिंक या मोबाइल पर आए नोटिफिकेशन पर तब तक क्लिक न करें जब तक कि उसके बारे में पुख्ता जानकारी हासिल न हो.


यदि मनी ट्रांसफर करने वाले तमाम एप्प्स, जैसे SBI नेटबैंकिंग, Phone Pay, Google Pay आदि का यदि उपयोग करते हों तो उनकी टू स्टेप सुरक्षा व्यवस्था करें. साथ ही उसमें काम करने के बाद तुरंत Logout कर दें.


ऐसे अनेक छोटे-छोटे कदम हैं, जिनके उठाये जाने के बाद साइबर अपराधियों के क़दमों को रोका जा सकता है. यह हम सबकी सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है.


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