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27 जनवरी 2017

संवैधानिक स्वतंत्रता का दुरुपयोग न होने दें

आज हम सभी के लिए गौरव का दिन है. आज ही के दिन सन 1950 में हमारे संविधान को सम्पूर्ण देश में लागू किया गया. इसके लागू होते ही हमारा देश लोकतान्त्रिक व्यवस्था के साथ-साथ एक गणराज्य के रूप में भी जाना जाने लगा. ये अपने आपमें अद्भुत है कि हमारे देश में केन्द्रीय सत्ता की प्रभुता के साथ-साथ राज्यों की प्रभुता को भी बराबर से स्वीकारा गया है. संविधान निर्माताओं ने केंद्र के साथ-साथ राज्यों को भी पर्याप्त अधिकार दिए. नागरिकों को व्यापक अधिकार प्रदान किये. कर्तव्यों का निर्वहन, मौलिक अधिकारों की रक्षा आदि का सूत्रपात इसी संविधान के द्वारा होना आरम्भ हुआ. संविधान निर्माताओं ने अपने पास असीमित अधिकार होने के बाद भी केंद्र और राज्य के साथ-साथ सामान्य नागरिक को भी पर्याप्त अधिकार, पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान किये जाने की वकालत की थी. वे चाहते तो अधिकारों को सामाजिक रूप से लोकतान्त्रिक न बनाकर उसे भी वंशानुगत अथवा परिवार तक सीमित कर सकते थे. यकीनन उनका उद्देश्य देश के विकास में सभी की भूमिका, सभी नागरिकों की स्वतंत्र भागेदारी करना रहा होगा. इसी कारण से नागरिकों को स्वतंत्रता के साथ जीवन-यापन करने के पर्याप्त अधिकार संविधान निर्माताओं ने संविधान के माध्यम से उपलब्ध कराये हैं.

इधर देखने में आने लगा है कि वर्तमान समय में स्वतन्त्रता, संविधान के नाम पर बहुतेरे नागरिकों द्वारा अपने अधिकारों का दुरुपयोग होने लगा है. इसके पीछे बहुत से लोग समाज को दोष देना शुरू कर देते हैं. देखा जाये तो समाज समस्याओं से हमेशा से ग्रस्त रहा है. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि हम खुद व्यवस्थाओं के सुचारू रूप से चलने में अपना कितना योगदान दे रहे हैं. गणतन्त्र दिवस के इस अवसर पर बजाय इस बात के कि किसने क्या किया, किसने क्या नहीं किया हम इस बात पर विचार करें कि हमने क्या किया? हम आज जितने अधिक साक्षर हुए हैं, जितने अधिक शक्तिशाली बने हैं उतने ही अधिक वर्ग हमारे आसपास दिख रहे हैं. आज सहज रूप में देखने में आता है कि कोई गाँधी वर्ग में खुद को खड़ा किये हैं, कोई नेहरू वर्ग में, कोई अम्बेडकर वर्ग में. इन वर्गों के द्वारा बजाय सामाजिक चेतना लाने के एक-दूसरे को नीचा दिखाने के प्रयास किये जा रहे हैं. यही कारण है कि आज किसी के लिए हेडगेवार देश तोडने वाले हैं तो किसी को सरदार पटेल की देश भक्ति पर संदेह दिखता है. कोई सरदार भगत सिंह को अपने पाले में शामिल करने की फिराक में दिखता है तो कोई अशफाक को अपने ग्रुप का बताता है. ये स्थिति क्षणिक रूप में किसी को प्रचार भले ही दिला दे किन्तु देश के लिए घातक है. देशवासियों के अलग-अलग गुटों में बंटने का फायदा विरोधियों द्वारा, देश के दुश्मनों द्वारा उठाये जाने की आशंका नजर आती है.


ऐसी स्थिति में हम सभी को विचार करना होगा कि क्या ऐसी स्थिति में वाकई हम संविधान का सम्मान करने की दशा में दिखते हैं? क्या ये स्थितियाँ हमें गणतन्त्र दिवस मनाने की अनुमति देतीं हैं? क्या इस तरह से हम अपनी आजादी दिलाने वाले शहीदों के प्रति सच्ची श्रृद्धांजलि अर्पित कर पाने के अधिकारी हैं? सवाल बहुत से हैं. उनको खोजने के लिए समूचे देश को एक होना पड़ेगा. सभी को वर्ग, जाति, धर्म के तमाम खांचों से बाहर निकल कर देशहित में काम करना होगा. इत्तेफाक से हमारा प्रदेश इस समय चुनावी दौर से गुजर रहा है. किसी भी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के सफल होने के पीछे उसके नागरिकों का, उसके मतदाताओं का बहुत बड़ा योगदान होता है. आइये हम सब मिलजुलकर सकारात्मक रूप से मतदान करने निकलें. लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को मजबूत बनाने के लिए, गणतंत्र को सशक्त बनाने के लिए, संविधान के प्रति आस्था को और गहरा करने के लिए स्वच्छ मतदान प्रक्रिया को अपनाएं. एकजुट होकर गणतन्त्र दिवस मनायें. देश को सशक्त बनायें. देशवासियों को सफल बनायें. 

19 जून 2015

आपातकाल की आशंका वाले बयान पर बवाल नहीं चिंतन हो


लाल कृष्ण आडवाणी के आपातकाल की आशंका लगाये जाने सम्बन्धी बयान के बाद सुस्त से पड़े विपक्षी दलों में जान सी आ गई है. सबने उनके एक बयान के बहाने से मोदी सरकार को निशाना बनाना शुरू कर दिया है. त्वरित प्रतिक्रिया देने की आदत के चलते और राजनैतिक मजबूरियों के चलते राजनैतिक दलों के विभिन्न नेताओं ने तो बयान देने आरम्भ कर दिए हैं. दिए जाने वाले बयानों का मंतव्य सिर्फ और सिर्फ मोदी सरकार को निशाना बनाया जाना है और ऐसा बिना आगा-पीछा सोचे किया जा रहा है. सोचने-समझने वाली बात है कि जिन आडवाणी जी ने इंदिरा गाँधी द्वारा लगाये गए आपातकाल में उन्नीस माह जेल में बिताये थे, आखिर उन्होंने किन हालातों को देख-परख लिया कि आपातकाल लगाये जाने जैसी आशंका व्यक्त की. इस बात को समझे बिना बस बयानों की बाढ़ सी आ गई है. अभी तक सहज रूप में चल रही केंद्र सरकार निरंकुश सी दिखने लगी है. अभी तक नागरिक सुविधाओं को देने वाली केंद्र सरकार आपातकाल लाने वाली लगने लगी है. सुरक्षित समझने वाला आम आदमी एकाएक खुद को असुरक्षित मानने लगा है. बयानबाजियों के खेल में ये चिंता नहीं की जा रही कि वाकई सत्य क्या है.
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मोदी सरकार ने विगत एक वर्ष में नागरिक कानूनों का, नागरिक अधिकारों का, मानवाधिकारों का, न्यायालयीन व्यवस्था आदि का किसी भी तरह से कोई हनन नहीं किया है. ऐसा भी नहीं है कि पूर्व सरकारों द्वारा जनहित में चलाई जा रही किसी भी योजना को मोदी सरकार द्वारा अवरुद्ध किया गया हो या फिर बंद किया गया हो. इसके उलट मोदी सरकार द्वारा आम जानता के हितार्थ, मजदूर, शोषित, कमजोर के लाभार्थ नई-नई अनेक योजनाओं को लागू किया गया है. लगातार आशंका जताए जाने के बाद भी किसी भी तरह की सब्सिडी को पूर्णतः समाप्त नहीं किया गया है. अल्पसंख्यक समाज में लगातार भय दिखाया गया था किन्तु आज भी अल्पसंख्यक उतने ही सुरक्षित हैं जितने की पूर्ववर्ती सरकारों में थे. यदि महंगाई, पेट्रो-कीमतों आदि को आपातकाल लगाये जाने की आहट मान लिया जाये तो फिर आपातकाल पूर्व के सरकारों में लगाये जाने की आशंका वर्तमान से अधिक प्रबल थी. इसके बाद भी न तो पूर्व में आपातकाल लगा और न ही अभी लगाया गया है.
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यदि आडवाणी जी के बयान को गंभीरता से समझा जाये तो उन्हों ने वर्तमान राजनैतिक परिपक्वता पर सवाल उठाते हुए अपनी आशंका व्यक्त की है. इस आशंका के साथ-साथ उन्हों ने अन्ना आन्दोलन पर भी सवालिया निशान लगाये हैं. यहाँ समझा जाना चाहिए कि वर्तमान हालातों में राजनीति को लोगों ने बाजारू स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है. ऐसा लगता है जैसे राजनीति देश, समाज की सबसे निकृष्टतम व्यवस्थाओं में एक है. जबकि वास्तविकता ये है कि देश, समाज, व्यक्ति, संस्थाएं एक पल को बिना राजनीति के, बिना राजनैतिक व्यवस्थाओं के चल नहीं सकती हैं. यहाँ आडवाणी जी की आशंका को हलके में नहीं लिया जाना चाहिए. उन सभी लोगों को, जो राजनैतिक शुचिता की बात करते हैं सजगता से ध्यान देना चाहिए. स्वार्थपरकता में बनते गठबंधन, महाविलय जैसी स्वार्थमयी स्थितियाँ, तुष्टिकरण के नाम पर धार्मिक उन्माद फैलाया जाना, वोट-बैंक के लिए आतंकवाद का भी समर्थन कर देना आदि वे स्थितियां हैं जिनके चलते गृह युद्ध हो जाये तो आश्चर्य नहीं. और ऐसे हालातों में यदि आपातकाल लगता है तो क्या गलत होगा. लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर, राजनीति के स्थान पर व्यवस्था परिवर्तन करने आये लोगों की नजर में संविधान का, संसद का, लोकतंत्र का कोई मोल नहीं; मुफ्त के सब्जबाग दिखाकर अफरातफरी पैदा करना एकमात्र उद्देश्य हो तो आपातकाल की आशंका से कोई भी इनकार नहीं कर सकता, आडवाणी जी तो जाने-माने राजनीतिज्ञ हैं, बौद्धिक राजनीतिज्ञ हैं, चिंतनशील राजनीतिज्ञ हैं. उनके इस बयान पर बवाल नहीं बल्कि चिंतन करने की आवश्यकता है.

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05 जनवरी 2015

देश की शांति-सुरक्षा खतरे में



देश में राजनीतिक संज्ञा-शून्यता इस तरह हावी हो जाएगी, संभवतः किसी ने भी नहीं सोचा होगा. कराची से चली विस्फोटक भरी नाव के पोरबंदर पहुँचने से पूर्व पकड़ में आना, फिर उन आतंकियों का खुद को उड़ा लेना एक बहुत बड़े आतंकी हमले से देश को सुरक्षित कर गया किन्तु इसके बाद जिस तरह से राजनैतिक दलों की बयानबाजियाँ आनी शुरू हुई हैं वे तो संभावित आतंकी हमले से कहीं ज्यादा घातक लग रही हैं. ये अब किसी से भी छिपा नहीं रह गया है कि पाकिस्तान की तरफ से लगातार आतंकी गतिविधियाँ संचालित हो रही हैं; ये भी सामने आ चुका है कि देश में आतंकी कार्यवाहियां करने वाले आतंकी पाकिस्तान में खुलेआम घुमते नज़र आ रहे हैं, इसके बाद भी देश के तमाम राजनैतिक दल और व्यक्तित्व सत्ता पक्ष को घेरने में लगे हुए हैं.
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इस बात से किसी को इंकार नहीं होना चाहिए कि मुस्लिम भी इसी देश का हिस्सा हैं और समय-समय पर उन्हों ने देश के विकास में अपना योगदान दिया है. भाजपा की वर्तमान विजय के पश्चात् और नरेन्द्र मोदी की भारतीय मुस्लिम जनमानस में बनती सकारात्मक छवि से वे सभी दल घबरा से गए हैं जिनकी राजनैतिक रोटियाँ आज भी मुस्लिम तुष्टिकरण के नाम पर चल रही हैं. ऐसे दलों में अपने अस्तित्व को लेकर भय बनता जा रहा है और इसी कारण से समवेत रूप से सबके द्वारा इस नाव-काण्ड के बाद से भाजपा को घेरने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है. सभी दलों को कम से कम इस बात को समझने का प्रयास अवश्य करना चाहिए कि जहाँ बात विशुद्ध राजनीति की हो वहाँ किसी भी रूप में विपक्षी दलों को घेरने का काम होना चाहिए किन्तु जहाँ बात राष्ट्रीय सुरक्षा की हो, जहाँ बात आतंकवाद से लड़ने की हो वहाँ सभी को एकजुट होकर ऐसी घटनाओं का विरोध करना चाहिए. इसके उलट मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए, उनके वोटों के लालच में इस्लामिक आतंकवाद जैसी वैश्वक अवधारणा के विरुद्ध कपोल-कल्पित भगवा आतंकवाद जैसी शब्दावली रच दी गई है.
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राजनैतिक दलों द्वारा किसी भी घटना पर सिर्फ और सिर्फ स्वार्थमय राजनीति करने का मौका तलाशे जाने की आदत को त्यागना होगा. समस्त गैर-भाजपाई दलों द्वारा किसी भी कदम पर भाजपा को घेरने की कोशिश करने का कार्य बंद करना होगा. इससे न केवल देश को कमजोर करने वाली ताकतों के हौसले बुलंद होते हैं वरन वैश्विक स्तर पर देश की छवि भी धूमिल होती है. इसके अलावा न केवल देश के बाहर के आतंकी वरन देश के भीतर भी छिपे फिरकापरस्त अपने आपको और मजबूती से सामने लाते हैं. इन सबका खामियाजा न तो राजनैतिक दलों को भुगतना पड़ता है, न ही राजनेताओं को वरन इसके लिए देश का आम नागरिक ही कष्ट उठाता है. सभी दलों को आपसी मतभेद भुलाकर, सत्ता का लोभ-लालच बिसरा कर राष्ट्रीय सुरक्षा सम्बन्धी मुद्दों पर तो एकजुट होना ही पड़ेगा. यदि अतिशीघ्र ऐसा नहीं किया जाता है तो देश का राजनैतिक वातावरण तो बिगड़ेगा ही देश की शांति-सुरक्षा व्यवस्था, आम जनजीवन पर भी इसका नकारात्मक असर देखने को मिलेगा.  

28 दिसंबर 2014

दीर्घकालिक लाभ के लिए जिद न करे भाजपा



जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाये जाने की कवायद जारी है साथ ही राजनीतिक तिकड़में भी चलती दिख रही हैं. जिस तरह से वहाँ के मतदाताओं ने भाजपा के पक्ष में और विपक्ष में अपना रुख दर्शाया है, वो भाजपा को सचेत करने के साथ-साथ समूचे राजनैतिक परिदृश्य पर नज़र रखने वालों के लिए भी सचेतक का काम करेगा. विगत आम चुनाव से इतर वर्तमान चुनावों में मतदाताओं ने जहाँ भाजपा को स्वीकार भी किया है वहीं उसको नकारने का काम भी किया है. घाटी से भाजपा को विजय श्री न मिलना भी बहुत कुछ स्पष्ट करता है. जम्मू-कश्मीर के मतदाताओं के इस राजनैतिक दृश्य और चिंतन में पिछले दिनों वहाँ पर आई बाढ़ के समय वहाँ के पुलिसकर्मियों द्वारा उत्तर भारतीयों से किये गए व्यवहार की ही झलक देखने को मिलती है. इस बात को सुनकर-पढ़कर शायद उन लोगों को अवश्य ही बुरा लगेगा जो आज भी किसी न किसी रूप में तुष्टिकरण हेतु पाकिस्तान की, कश्मीरी मुसलमानों की वकालत करते दिखते हैं.
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हाल ही में आई बाढ़ में समय हमारे व्यक्तिगत परिचित कई परिवार वहाँ फँस गए थे. वहाँ से वापस आने पर उनकी जुबानी वहाँ की पुलिस का जो हाल सुना, उसे सुनकर लगा नहीं कि जम्मू-कश्मीर इसी देश का हिस्सा है. जब तक सेना ने अपने नियंत्रण में वहाँ की स्थिति को नहीं ले लिया, तब तक पुलिस स्टेशनों में शरणार्थी बने गैर-कश्मीरियों को एक-एक ब्रेड स्लाइस के लिए, एक-एक ढक्कन पानी के लिए पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने को मजबूर किया जाता था. नारे न लगाने पर अथवा एक स्लाइस, एक ढक्कन पानी से ज्यादा मांगने पर पुलिस की मार भी सहनी पड़ती थी. (इसे व्यक्तिगत रूप से हमने स्वयं भुक्तभोगियों से मिलकर महसूस किया है) ऐसी स्थिति में जबकि राज्य से बाहर के नागरिक परेशानी की हालत में हों, मुश्किल में हों, परिवार बिछड़ गए हों, उनका सामान बाढ़ में बह गया हो, खाने-पीने का संकट हो गया हो तब भी वहाँ की पुलिस को वे लोग सिर्फ इंडियन समझ आ रहे थे, विदेशी दिख रहे थे. ऐसी स्थिति में उस राज्य में यदि भाजपा की सरकार बन जाये या फिर कोई हिन्दू व्यक्ति मुख्यमंत्री बन जाए तो अराजकता की स्थिति सोची जा सकती है. एक वरिष्ठ राजनीतिज्ञ अपना मंतव्य भी इस पर व्यक्त कर चुके हैं.
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देखा जाये तो भाजपा को मिली सीटों और उसको मिले समर्थन के बाद मामला सरकार बनाने से ज्यादा इस बात का है कि जम्मू-कश्मीर के लोगों के साथ-साथ गैर-कश्मीरियों में भाजपा के सरकार बनाने के प्रयासों को लेकर किस तरह उथल-पुथल मची हुई है. जो राज्य अपने आपको पाकिस्तान का अंग समझता हो, जहाँ के लोगों के लिए हिन्दू मुख्यमंत्री बनना अभिशाप जैसा हो, जहाँ मुश्किल में फँसे लोगों से पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगवाए जाते हों, जिनके लिए भाजपा हिन्दूवादी पार्टी हो, जिस पार्टी को समूची घाटी से एक सीट न मिली हो उन नागरिकों की क्रिया-प्रतिक्रिया को समझा जा सकता है किन्तु जिस तरह से गैर-कश्मीरी सिर्फ इस बात पर भाजपा के सरकार बनाये जाने का विरोध कर रहा है कि उसे भाजपा का सरकार बनाना पसंद नहीं तो भविष्य की भयावहता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है. जिस राज्य की पुलिस ने बाढ़ में फँसे उन नागरिकों से (जो उस राज्य से बाहर के थे). एक ब्रेड की स्लाइस के लिए, एक ढक्कन पानी के लिए पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगवा लिए हों, पिटाई भी की हो उस राज्य में भाजपा की सरकार बन जाना या फिर हिन्दू मुख्यमंत्री बन जाना कपोलकल्पना ही है. राज्य को उथल-पुथल से बचाने के लिए, हिंसा-मुक्त रखने के लिए भाजपा अपनी जिद को त्यागे. सरकार में भले ही शामिल हो जाए किन्तु मख्यमंत्री सामने वाले का बनवा दे. भाजपा ने यदि अड़-अड़ कर अपना मुख्यमंत्री बनवा भी लिया तो राज्य से इतर नागरिकों को 'इंडियन' कहने वाले लोग राज्य में शांति-विकास नहीं होने देंगे. दीर्घकालिक लाभों के लिए अल्पकालिक लाभ त्याग देने चाहिए.

11 अप्रैल 2014

बदलती राजनैतिक दिशा भविष्य के लिए दुश्वारियाँ




राजनीति किसी भी देश की व्यवस्था सञ्चालन के लिए अनिवार्य है, बिना इसके एक पल भी राष्ट्र-राज्य की व्यवस्था का खड़े रह पाना संभव नहीं है. इस तथ्य को वे सभी भली-भांति जानते-समझते हैं, जो राजनीति करने की मंशा से राजनैतिक क्षेत्र में उतरे हैं और वे भी इसे समझते हैं जो स्वार्थपरक राजनीति करने की लालसा लेकर यहाँ आये हैं. स्पष्ट है जहाँ राजनीति करने का उद्देश्य देशहित, समाजहित, जनहित हो वहाँ सोच व्यापक होती है और जब राजनीति में स्वार्थ जुड़ जाए, लिप्सा जुड़ जाए तो वहाँ सोच सीमित ही हो जाती है. इधर राजनैतिक चरित्रों में लगातार गिरावट आती दिख रही है और ऐसा लगने लगा है जैसे सभी का एकमात्र उद्देश्य स्वार्थपरक राजनीति करना रह गया हो. आज भले ही किसी भी व्यक्ति में अपने नेतृत्व द्वारा दिए गए किसी बयान से; उसके द्वारा उठाये गए किसी कदम से उत्साह जग जाता हो किन्तु भविष्य की दृष्टि से परिणामों की गंभीरता पर विचार नहीं किया जा रहा है.
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आज़ादी के छह दशक से ज्यादा की समयावधि के बाद भी देश का मतदाता कुछ स्वप्नों के आधार पर अपने मत का निर्धारण करता है; आज भी चंद मुफ्त मिलने वाली सुविधाओं के बदले में सरकारें बनवा दी जाती हैं; आज भी बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, रोटी, कपड़ा जैसे मूलभूत आवश्यकताओं के लिए व्यक्ति जूझ रहा है. ये विडंबना नहीं तो और क्या है कि एक तरफ राजनीति में प्रवेश करने वाले व्यक्तियों की संपत्ति में लगातार उछाल आता रहता है और वहीं दूसरी ओर एक सामान्य नागरिक अभी भी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए भटक रहा है. हम मंगल पर अभियान चलाने के लिए यान भेज सकते हैं किन्तु यहाँ सड़क पर सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था नहीं कर पा रहे; लाखों टन अनाज खुले में सड़ता रहता है किन्तु हम किसी गरीब की भूख को शांत नहीं करवा पाते; तकनीक को हम हर हाथ में उतार देने का दम भरते हैं किन्तु किसी महिला को सुरक्षित उसके घर तक पहुँचाने का दावा नहीं कर पाते; उन्नत शिक्षा के लिए हम अपनी पीठ खुद ठोंक लेते हैं किन्तु सड़क पर कूड़ा बीनते, कहीं ढाबों पर काम करते बच्चों को स्कूल भेजने की जहमत नहीं उठा पाते. इन सबके बाद भी हम राजनीति करना चाहते हैं, खुद को राजनेता कहलवाना चाहते हैं किन्तु राजनीति के मूल से कहीं दूर खड़े नजर आते हैं.
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राजनीति सिर्फ सफ़ेद कुरता-पजामा पहन लेना नहीं है, राजनीति सिर्फ मंच पर चिल्ला-चिल्ला कर भाषण दे देना नहीं है, राजनीति सिर्फ विपक्षियों को गाली दे देना भर नहीं है, राजनीति सिर्फ मंहगी-मंहगी गाड़ियों में घूम लेना भर नहीं है, राजनीति सिर्फ चुनाव लड़ लेना भर नहीं है, राजनीति सिर्फ जनप्रतिनिधि बन जाना भर नहीं है, इसके लिए समाजसेवा का, राष्ट्रहित का ज़ज्बा चाहिए होता है. वर्तमान में जिस तरह से सिर्फ सत्ता के लिए लगभग अंधे से होकर हमारे राजनेता काम कर रहे हैं वो दुखद है और उन्हीं का अनुसरण करते हुए जिस तरह से युवा वर्ग राजनीति को प्रेरित हो रहा है वो चिन्तनीय है. भड़काऊ भाषण देकर, नफरत की आग लगा कर, धर्म-जाति के नाम पर लोगों की भावनाओं को भड़का कर, तुष्टिकरण की नीति अपना कर राजनीति नहीं की जा सकती है.

26 जनवरी 2014

भारतीय ध्वज की विकास-यात्रा और भारतीय ध्वज संहिता




भारतीय आन-बान-शान का प्रतीक राष्ट्रीय ध्वज तीन रंगों से बना हुआ है इसी कारण इसे हम तिरंगा कह कर भी पुकारते हैं। ध्वज में सबसे ऊपर केसरिया रंग, बीच में सफ़ेद और सबसे नीचे गहरा हरा रंग समानुपातिक रूप में होता है। सफ़ेद पट्टी में बीचों-बीच गहरे नीले रंग का एक चक्र भी बना होता है, जिसको सारनाथ में स्थापित सिंह के शीर्षफलक के चक्र में दिखने वाले चक्र के रूप में परिभाषित किया गया है। इस चक्र में 24 तीलियाँ होती हैं। ध्‍वज को साधारण भाषा में झंडा भी कहा जाता है। झंडे की लम्‍बाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2 होता है। राष्‍ट्रीय ध्‍वज को 22 जुलाई 1947 को भारत के संविधान द्वारा अपनाया गया था।
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राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के संभी रंगों का अपना विशेष महत्त्व है. केसरिया रंग वैराग्य का रंग है। आज़ादी के दीवानों ने इसको अपने ध्वज में सबसे ऊपर इसी सोच के कारण स्थान दिया कि आने वाले दिनों में देश के नेता स्वार्थ छोड़ कर देश के विकास में खुद को समर्पित कर दें। तिरंगे का सफ़ेद रंग प्रकाश और शांति के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया जाता है। हरे रंग को प्रकृति से सम्बंधित करके इसके माध्यम से संपन्नता को दर्शाया गया है। तिरंगे के केंद्र में स्थित चक्र गतिशीलता के साथ-साथ  अशोक चक्र धर्म के 24 नियमों की याद दिलाता है।
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पहला भारतीय ध्वज –   सन 1906 में पहली बार भारत का गैर आधिकारिक ध्‍वज फ़हराया गया। इसे सन 1904 में स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा बनाया गया था। तत्पश्चात 7 अगस्त 1906 को बंगाल के विभाजन के विरोध में कलकत्ता में इसे कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था। हमारा पहला ध्वज लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बना हुआ था। सबसे ऊपर की हरी पट्टी रखी गई थी जिसमें 8 आधे खिले हुए कमल के फूल थे। झंडे में सबसे नीचे लाल पट्टी में सूरज और चाँद बनाए गए थे। बीच की पीली पट्टी पर वन्दे मातरम् लिखा हुआ था।

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दूसरा भारतीय ध्वज-- दूसरा ध्वज भीकाजी कामा और उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा सन 1907 में फहराया गया था। कुछ लोगों मानना है कि ऐसा कार्य सन  1905 में हुआ था। बताया जाता है कि सुबह साढ़े आठ बजे इंडिया गेट पर लोगों की भीड़ ने  करतल ध्वनि के बीच यूनियन जैक को उतारकर इसी भारतीय राष्ट्रीय झंडे को फहराया था। इस दूसरे ध्वज में कुछ बदलाव भी किये गए, जिनमें सबसे ऊपर की हरी पट्टी का रंग हरे से केसरिया कर दिया गया और उसमें कमल के फूलों का स्थान सात तारों, जिन्हें सप्तऋषि के समकक्ष माना गया, ने ले लिया। सबसे नीचे की पट्टी का रंग भी लाल से परिवर्तित करके हरे में बदल दिया गया. शेष ध्वज पहले की तरह ही रहा। इस ध्‍वज को बर्लिन में हुए समाजवादी सम्‍मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था।
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तीसरा भारतीय ध्वज -- भारतीय राजनीतिक संघर्ष सन 1917 तक आते-आते एक निश्चित मोड़ लिया। एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने अपने आंदोलन के दौरान इसे फहराया था। इस ध्‍वज में 5 लाल और 4 हरी क्षैतिज पट्टियाँ एक के बाद बनी हुई थीं और सप्‍तऋषि आकृति में इस पर सात सितारे बने हुए थे। बांये हिस्से में ऊपरी किनारे पर यूनियन जैक और दूसरे दायें कोने में सफ़ेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।




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चौथा भारतीय ध्वज -- सन 1916 में एक ऐसे ध्वज की कल्पना की गई जो सभी भारतवासियों को एकसूत्र में बाँध सके। इस पहल को देखते हुए एक नेशनल फ़्लैग मिशन का गठन किया गया। सन 1921 में बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान आंध्र प्रदेश के एक युवक ने एक झंडा बना कर महात्मा गांधी को दिया। इसमें दो रंगों को शामिल किया गया था। लाल और हरे रंग को दो प्रमुख समुदायों अर्थात हिन्‍दू और मुस्लिम के प्रतिनिधित्‍व के रूप में प्रदर्शित किया गया था। गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्‍व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्‍ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए। इसी के चलते ध्वज का यह चौथा रूप सामने आया।
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पाँचवाँ भारतीय ध्वज -- वर्ष 1931 को ध्‍वज के इतिहास में एक यादगार वर्ष कहा जा सकता है। राष्ट्रीय ध्वज में रंग को लेकर तरह-तरह के वाद-विवाद चलते रहे। काफ़ी तर्क वितर्क के बाद भी जब सब एकमत नहीं हो पाए तो सन 1931 में अखिल भारतीय कांग्रेस के ध्वज को मूर्त रूप देने के लिए 7 सदस्यों की एक कमेटी बनाई गई। तिरंगे ध्‍वज को हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्‍ताव पारित किया गया। इस ध्‍वज का स्‍वरूप वर्तमान ध्वज की तरह ही (तीन रंगों – केसरिया, सफ़ेद और हरा को शामिल किया गया) रखा गया और मध्‍य में गांधी जी के चलते हुए चरखे को दर्शाया गया था। यह स्‍पष्‍ट रूप से बताया गया था कि इसका कोई साम्‍प्रदायिक महत्‍व नहीं है। 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इसे मुक्‍त भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया। स्‍वतंत्रता मिलने के बाद इसके रंग और उनका महत्‍व बना रहा।
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वर्तमान भारतीय ध्वज -- आज़ादी के परवानों ने इसी ध्वज के तले अनेक आंदोलन किए और 1947 में अंग्रेज़ों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया। आज़ादी की घोषणा से कुछ दिन पहले राष्ट्रीय ध्वज को नया रूप देने के लिए डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई गई और तीन सप्ताह के भीतर ही 14 अगस्त को इस कमेटी ने अखिल भारतीय कांग्रेस के ध्वज को ही राष्ट्रीय ध्वज के रूप में मान्यता देने की सिफ़ारिश की। इसमें सिर्फ इतना परिवर्तन किया गया कि बीच की सफ़ेद पट्टी में चरखे के स्थान पर चक्र को प्रतिस्थापित किया गया। 15 अगस्त 1947 को यही तिरंगा हमारी आज़ादी और हमारे देश की आज़ादी का प्रतीक बन गया।
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तिरंगे का सम्मान : ध्वज के सम्मान की बात भी स्पष्ट कर दी गई कि ध्वज फहराने के समय किस आचरण संहिता का ध्यान रखा जाना चाहिए। राष्ट्रीय ध्वज कभी भूमि पर नहीं गिरना चाहिए और ना ही धरातल के संपर्क में आना चाहिए। सन 2005 के पहले तक इसे वर्दियों और परिधानों में उपयोग में नहीं लाया जा सकता था, लेकिन सन 2005 में फिर एक संशोधन के साथ भारतीय नागरिकों को इसका अधिकार दिया गया लेकिन इसमें ध्यान रखने वाली बात ये है ये किसी भी वस्त्र पर कमर के नीचे नहीं होना चाहिए। राष्ट्रीय ध्वज कभी अधोवस्त्र के रूप में नहीं पहना जा सकता है।
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भारत का राष्ट्रीय झंडा, भारत के लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं का प्रतिरूप है। यह हमारे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। सभी के मार्गदर्शन और हित के लिए भारतीय ध्वज संहिता-2002 में सभी नियमों, रिवाजों, औपचारिकताओं और निर्देशों को एक साथ लाने का प्रयास किया गया है। ध्वज संहिता-भारत के स्थान पर भारतीय ध्वज संहिता-2002 को 26 जनवरी 2002 से लागू किया गया है।
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झंडा फहराने का सही तरीका
* जब भी झंडा फहराया जाए तो उसे सम्मानपूर्ण स्थान दिया जाए। उसे ऐसी जगह लगाया जाए, जहाँ से वह स्पष्ट रूप से दिखाई दे।

* सरकारी भवन पर झंडा रविवार और अन्य छुट्टियों के दिनों में भी सूर्योदय से सूर्यास्त तक फहराया जाता है, विशेष अवसरों पर इसे रात को भी फहराया जा सकता है, जिसके अलग से प्रावधान किये गए हैं।

* झंडे को सदा स्फूर्ति से फहराया जाए और धीरे-धीरे आदर के साथ उतारा जाए। फहराते और उतारते समय बिगुल बजाया जाता है तो इस बात का ध्यान रखा जाए कि झंडे को बिगुल की आवाज के साथ ही फहराया और उतारा जाए।

* जब झंडा किसी भवन की खिड़की, बालकनी या अगले हिस्से से आड़ा या तिरछा फहराया जाए तो झंडे को बिगुल की आवाज के साथ ही फहराया और उतारा जाए।

* झंडे का प्रदर्शन सभा मंच पर किया जाता है तो उसे इस प्रकार फहराया जाएगा कि जब वक्ता का मुँह श्रोताओं की ओर हो तो झंडा उनके दाहिने ओर हो।

* झंडा किसी अधिकारी की गाड़ी पर लगाया जाए तो उसे सामने की ओर बीचोंबीच या कार के दाईं ओर लगाया जाए।

* फटा या मैला झंडा नहीं फहराया जाता है।

* झंडा केवल राष्ट्रीय शोक के अवसर पर ही आधा झुका रहता है।

* किसी दूसरे झंडे या पताका को राष्ट्रीय झंडे से ऊँचा या ऊपर नहीं लगाया जाएगा, न ही बराबर में रखा जाएगा।

* झंडे पर कुछ भी लिखा या छपा नहीं होना चाहिए।

* जब झंडा फट जाए या मैला हो जाए तो उसे एकांत में पूरा नष्ट किया जाए।
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आइये हम सब अपने राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को सम्मान दें और देश की आज़ादी के लिए अपनी जान न्योछावर कर देने वाले शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि प्रदान करें। जय हिन्द....