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10 फ़रवरी 2024

मित्रों की ताकत से चलती उठापटक

आज एक बहुत पुराने मित्र से मुलाक़ात हुई. यहाँ उनसे मिलना विशेष नहीं क्योंकि हम लोग एक ही शहर में हैं, एक ही कार्यक्षेत्र में हैं, इसके अलावा विशेष बात ये है कि हम दोनों मित्र हैं, इस कारण मुलाकात होती ही रहती है. आज मुलाकात में और भी तमाम बातों के साथ-साथ अपने-अपने कार्यक्षेत्र के बारे में चर्चा चल पड़ी. जनपद के विभिन्न शैक्षिक संस्थानों में आलम ये है कि कहीं-कहीं प्रबंधकों की मनमर्जी है तो कहीं प्राचार्यों की. कहीं-कहीं तो अतिशय स्थिति है, वहाँ चपरासियों, बाबुओं का बोलबाला है. बहरहाल, हम मित्रों की बातचीत में अनायास ही परीक्षाओं, ड्यूटी, शिक्षा, महाविद्यालय, विद्यार्थियों की उपस्थिति, प्राचार्यों के क्रियाकलापों, एनईपी 2020, माइनर विषयों आदि-आदि का जिक्र चल गया.

 

अपने-अपने कॉलेज के अपने-अपने कार्यों की चर्चा हुई. चूँकि वे हमारे मित्र हैं बहुत पुराने, इसलिए हमारी आदतों, स्वभाव से परिचित हैं. हमारी स्थिति ये है कि गलत बात, निर्णय बर्दाश्त नहीं होते और यही कारण है कि आये दिन न केवल अपने संस्थान में बल्कि समाज में भी कई जगह पर तनातनी की स्थिति आ जाती है. हमारे संस्थान में भी पिछले कुछ समय से बड़ी उठापटक मची हुई है, जिसके चलते विद्रोही तेवरों के साथ काम करना हो रहा है. हमारे अनेक कांडों, कदमों, बर्ताव, व्यवहार आदि को सुनने-समझने के बाद बोले कि कुमारेन्द्र, अपनी नौकरी बचा के चलो. उस मित्र की इसी बात पर हमने ठहाका लगाया तो अगले ने भी उसमें साथ दिया और बोला कि तुम न सुधरोगे. वैसे आज की स्थिति में तुम जैसे कुछ लोगों की जरूरत है. हमने कहा, बस यही विश्वास बनाए रहना. नौकरी ही ज़िन्दगी नहीं. एक जाएगी तो अनेक आएँगी मगर किसी की गुलामी बर्दाश्त नहीं.

 

उस मित्र ने पूर्ववत मित्रवत व्यवहार दिखाया. ऐसे ही मित्र हमारी ताकत हैं. गुलामी नहीं हो सकती, नौकरी कल जाती हो तो आज-अभी हाल चली जाए मगर नकारात्मकता फैलाने वाले को सबक सिखाया ही जायेगा. समय के फेर में कुछ दिन तो ख़ामोशी अपनाई जा सकती है, दया का भाव दिखाया जा सकता है किन्तु लगातार अन्याय को सहते रहना खुद को आरोपी बनाता है, खुद को खुद की निगाह में अपराधी बनाता है, अपराध-बोध जगाता है.


30 मार्च 2019

न फोटो खींचने से रुकेंगे, न अपनी बात कहने से


शहर के किसी कोने में होने वाली किसी भी तरह की गड़बड़ी को जैसे ही कैमरे में लेने की कोशिश की जाती है वैसे ही आसपास वालों की निगाह में पत्रकारिता से जुड़ा होने का भाव जाग जाता है. जो चंद लोग जानते-पहचानते हैं वे तो मुस्कुराते हुए किनारे से, अगल-बगल से निकल जाते हैं और जो नहीं पहचानते हैं उनके लिए कैमरे से की जाने वाली कारीगरी सिवाय पत्रकारिता के कुछ और नहीं होती है. ये एक सजग सोच कही जा सकती है किसी भी व्यक्ति की कि वह समाज में हो रही किसी भी तरह की अव्यवस्था, अनियमितता को उजागर करने के लिए पत्रकारिता को, पत्रकार को सक्षम समझता है. इस सजग, सकारात्मक सोच के साथ-साथ एक नकारात्मकता भी चिपकी होती है और वह होती है उस फोटो से की जाने वाली कमाई को लेकर. ऐसा हमारा स्वयं का व्यक्तिगत अनुभव रहा है, एक बार का नहीं अनेक बार का, जबकि ऐसी किसी भी स्थिति की फोटो निकालते समय आसपास के लोगों के कई सवालों से जूझना पड़ा, कई तरह के विचारों को जानने-सुनने का मौका मिला. ऐसा एक हमारे शहर का हाल नहीं है वरन बहुतायत में ऐसा होते दिख जाता है. ट्रेन में, बस में, बाजार में, कार्यालय में, स्कूल में, विश्वविद्यालय में ऐसे मंजर आसानी से आपके साथ खड़े हो जाते हैं. 


अभी इसी माह ऐसे कई बिंदु आँखों के सामने से गुजरे. हर हाथ में चिपके मोबाइल के कारण ऐसी किसी भी स्थिति का फोटो निकालना आसान हो जाता है. कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया के whatsapp ग्रुप से जुड़ना हुआ जो हमारे इंटरमीडिएट के साथियों द्वारा बनाया गया. उरई के राजकीय इंटर कॉलेज में पढ़े साथियों का एकसाथ आना सुखद अनुभूति सा महसूस हुआ. दिमाग में आया कि सन 1990 के बाद से कॉलेज को छोड़कर जा चुके साथियों के लिए अपने कॉलेज के आज के चित्र भेजे जाएँ. ऐसा सोचकर कॉलेज की पुरानी इमारत की तरफ जाना हुआ. अंग्रेजों के समय की बनी इस इमारत के साथ-साथ उससे लगी हुई दूसरी इमारत में भी हम लोगों को पढ़ने का अवसर मिला था. दूसरी इमारत सन 1990 से कुछ समय पहले ही बनाई गई थी. इस समय पुरानी इमारत पूरी तरह से परित्यक्त है. उसका बहुत बड़ा भाग गिर चुका है और बहुत सा हिस्सा गिरने की स्थिति में है. इस इमारत के मुख्य द्वार से लगी बगिया भी उजड़ चुकी है. पुरानी जर्जर इमारत और उजड़ी हुई बगिया अब नशेबाजों की शरणगाह बने हुए हैं. उस दिन फोटो खींचने के उद्देश्य से अन्दर जाने पर दो-चार नशेबाजों से सामना हुआ. मोबाइल से फोटो निकालते देख उनमें से कुछ तो चल दिए, एक-दो जो वहां जमे रहे उन्होंने अपनी शंका का समाधान किया और हमारे बताते ही कि हम मीडिया से नहीं हैं, वे निश्चिन्त भाव से अपने काम में लग गए.


कॉलेज कैंपस की जर्जरता का अपने लिए लाभ उठा रहे उन नशेबाजों ने तो कुछ नहीं कहा मगर उरई के पुराने भवन टाउन हॉल में लगे लैम्पों की दुर्दशा की, शहर भर में फुटपाथ पर पार्किंग बना दिए जाने की, बैंक, मॉल, तहसील आदि के सामने जबरन पार्किंग बना दिए जाने की, बाजार में रखे डिवाइडर्स के अस्त-व्यस्त बने रहने के फोटो के दौरान भी ऐसी स्थिति से गुजरना हुआ, जबकि लोगों की नकारात्मकता का आभास हुआ. आसपास वालों ने जानकारी लेनी चाही तो पार्किंग वालों ने भी आपत्ति दर्ज की. आम नागरिकों का मानना था कि इस तरह की फोटो खींचने के बाद सुधार तो कुछ होना नहीं है, मीडिया के नाम पर उगाही कर ली जाएगी. कुछ लोगों ने सीधे हमसे बात की और कुछ आपस में बतियाते रहे. उन सबका सार यही था कि कमीशन न मिला होगा, इस बार का हिस्सा न पहुँचा होगा, ठेकेदार से, नगर पालिका से कुछ अनबन हो गई होगी, कोई काम न बना होगा आदि-आदि. 


मीडिया के प्रति इस तरह की नकारात्मकता उभरने के पीछे के अपने कारण हैं, उन पर चर्चा फिर कभी. मूल बात ये कि समाज के लोग अव्यवस्थाओं से अनियमितताओं के इतने आदी हो चुके हैं कि वे स्वयं इसमें बदलाव के लिए आगे बढ़ना ही नहीं चाहते. जो है, जैसा है, सब चलता है, ठीक है आदि की मनोदशा में वे अपने आपको उन्हीं अव्यवस्थाओं, अनियमितताओं के सहारे आगे ले जा रहे हैं. यही कारण है कि अब किसी मुद्दे पर जन-आन्दोलन जैसी स्थिति नहीं दिखती है. इसी कारण से सम्बंधित पक्ष भी एकतरफा काम करते हुए कार्यवाही करता है. बहरहाल, सुधार होगा या नहीं, बदलाव आएगा या नहीं, लोग सुधरेंगे या नहीं ये बाद की बातें हैं पर हम तो न फोटो खींचने से रुकेंगे और न ही अपनी बात कहने से.

19 फ़रवरी 2019

बाजार में बदलती शिक्षा व्यवस्था


परीक्षाओं का मौसम आया हुआ है. हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के बच्चों की विभिन्न बोर्ड से सम्बंधित परीक्षाएं संचालित हैं. कुछ दिनों में यूनिवर्सिटी से सम्बंधित परीक्षाएं भी आरम्भ हो जाएँगी. इन तमाम सारी परीक्षाओं में कई विषय ऐसे होते हैं, जिनमें प्रयोगात्मक परीक्षाएं भी संपन्न होती हैं. विगत कई वर्षों से अध्यापन क्षेत्र से जुड़े होने के कारण परीक्षाओं के मौसम में आते जा रहे बदलाव को निरन्तर बहुत नजदीक से देखने का मौका मिला है. किसी समय में हमारे शहर में गिने-चुने विद्यालय हुआ करते थे. उनमें भी इक्का-दुक्का हुआ करते थे जिनकी अपनी प्रतिष्ठा थी. हाईस्कूल, इंटर की परीक्षाओं के लिए कुछ विद्यालय तो मानक रूप में सबके सामने थे. वहाँ की पढ़ाई, वहाँ परीक्षाओं के दौरान की पारदर्शिता, शुचिता का अपना ही स्वरूप था.


समय बदलता रहा. सरकारों की नीतियां बदलती रहीं. स्व-वित्त प्रणाली ने निजी विद्यालयों, महाविद्यालयों को जैसे कुकुरमुत्तों की तरह उगा दिया. गली-गली में विद्यालय खुल गए हैं, खेतों-खेतों में महाविद्यालय खुले हुए हैं. जहाँ पहले कम शैक्षिक संस्थानों के होने के बाद भी अध्ययन में गुणवत्ता देखने को मिलती थी वहीं अब इसी में सबसे ज्यादा गिरावट दिखाई दे रही है. और ऐसा तब हो रहा है जबकि इन संस्थानों की संख्या बहुत अधिक हो गई है. शैक्षिक संस्थानों की बाढ़ के बीच आती शैक्षिक गिरावट के साथ-साथ अब अभिभावकों में, शिक्षकों में, विद्यार्थियों में भी गिरावट देखने को मिली है. यदि कहें कि शिक्षा जगत के जितने भी अंग-प्रत्यंग हैं वे सबके सब गिरावट का शिकार हुए हैं तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. किसी भी संस्थान में प्रवेश के मानक अब वहाँ नक़ल करवाने-करने में मिलने वाली सुविधा बन गई है. प्रयोगात्मक परीक्षाओं में भी अधिकाधिक अंक दिलवाने को किसी भी संस्था का आदर्श रूप माना जाने लगा है. किसी समय में अभिभावकों द्वारा अपने पाल्यों के प्रति इस तरह का भाव देखने को नहीं मिलता था मगर अब उनमें भी इस तरह का भाव दिखाई देता है. परीक्षा आरम्भ होने से लेकर समापन तक कदम-कदम पर उसके लिए अधिकाधिक अंकों की जुगाड़ में लिप्त रहना साफतौर पर दिखाई देता है. परीक्षाओं के दौरान नक़ल की व्यवस्था, परीक्षा पश्चात् मूल्यांकन के दौरान भी अधिकाधिक अंक प्राप्त करने की जुगाड़ खोजना अब बहुतायत अभिभावकों का जैसे स्वभाव बनता जा रहा है. 

संभव है कि ऐसा सभी जगह न हो मगर आज अधिकाधिक जगहों पर ऐसा ही हो रहा है. ऐसे में सोचा जा सकता है कि किसी भी जगह पर वहाँ की शिक्षा व्यवस्था कैसे विकास करेगी? जहाँ अभिभावकों में, शिक्षकों में, विद्यार्थियों में इस तरह की मानसिकता पनप रही हो वहाँ वे शिक्षा के द्वारा, अध्ययन-अध्यापन के द्वारा खुद को सफलता के मार्ग पर कैसे ले जा सकते हैं? शायद यही कारण है कि अब शहरों में विज्ञापनों के बीच डिग्री के, शिक्षा संस्थानों के विज्ञापन दिखाई पड़ते हैं जो नौकरी देने की, रोजगार दिलवाने की बात करते हैं. कोई भी शैक्षिक संस्थान संस्कारों की, सभ्यता की, शिक्षा की बात नहीं करता है. रोजगारपरक शिक्षा आज की आवश्यकता भले ही हो गई हो मगर जब किसी भी शिक्षा का, किसी भी डिग्री का एकमात्र उद्देश्य सिर्फ नौकरी लेना ही हो जाये तो उसके लिए फिर बाजारवाद का सिद्धांत ही लागू होगा. वहाँ सिर्फ बाजार के नियम ही लागू होंगे.

09 जून 2018

नकारात्मकता का शिकार हो चुकी है राजनीति


प्रतिद्वंद्विता सदैव से समाज का हिस्सा रही है. दोस्तों में, परिजनों में, भाई-बहिनों में, आस-पड़ोस में, सहकर्मियों आदि में ऐसा होते हमेशा देखा गया है. कई बार प्रतिद्वंद्विता सकारात्मक रूप से सामने आती है और कई बार यह नकारात्मक रूप लिए होती है. सकारात्मक प्रतिद्वंद्विता से सबका ही भला होता है जबकि नकारात्मकता नुकसान करने के अलावा कुछ नहीं करती है. राजनीति में भी प्रतिद्वंद्विता लगातार देखने को मिलती रही है. ऐसा उस ज़माने में भी होता था जबकि राजनीतिज्ञों के बीच आपसी सम्बन्ध मधुर होते थे. बाद में ऐसा उनके बीच भी होते दिखाई दिया जबकि संबंधों की मधुरता में खटास आनी शुरू हो गई. आज स्थिति यह है कि राजनीति में न तो सम्बन्ध बचे और न ही मधुरता. अब इसमें आपस में कटुता, खटास, वैमनष्यता देखने को मिल रही है. समय के साथ-साथ जहाँ बहुत से क्षेत्रों में विकास हुआ है वहीं राजनीति के क्षेत्र में गिरावट देखने को मिली है. आये दिन खबरें आती हैं जबकि विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं की, नेताओं की हत्या तक करवा दी जाती है. विरोधी दलों के समर्थकों को प्रताड़ित करना, उनको परेशान करना, उनके साथ अभद्रता करना, कानूनी दाँव-पेंचों के सहारे उनको जेल भिजवा देना आज आम बात है. ऐसा भी राजनैतिक दलों के उन लोगों द्वारा किया जाता है जो पार्टी की अग्रिम पंक्ति में शामिल नहीं हैं. ऐसा उनके द्वारा करने की घटनाएँ मिली हैं जो कहीं, कभी भी किसी संवैधानिक पद पर नहीं रहे हैं. 


ऐसे में यदि खबर मिले कि कोई जिम्मेवार व्यक्ति, ऐसा व्यक्ति को संवैधानिक पद पर बैठे रहे व्यक्ति के परिवार से जुड़ा हुआ है, वह व्यक्ति स्वयं भी संवैधानिक पद पर आसीन रहा हो यदि उसके द्वारा कुछ ऐसा किया जाये जो रंजिश या प्रतिद्वंद्विता न सही मगर कुछ ऐसा ही हो तो क्या कहा जायेगा? कुछ ऐसा ही अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश में देखने को मिला. उच्चतम न्यायालय द्वारा सरकारी भवनों को खाली किये जाने संबंधी आदेश दिया गया. जिसमें बहुत से नेताओं को आवंटित किये गए सरकारी बंगलों को खाली करना था. कुछ नेताओं द्वारा इसके प्रयास किये गए कि उनको भवन खाली न करना पड़े. हास्यास्पद स्थिति तब लगी जबकि करोड़ों रुपये की संपत्ति के मालिक बताने वाले नेताओं का देश भर में एक मकान न दिखाई पड़ा. समझ नहीं आया कि अनाप-शनाप संपत्ति अर्जित करने के बाद भी इनके नाम पर एक मकान न होना कहीं मुफ्त के माल पर आजीवन कब्ज़ा किये रहने की मानसिकता तो नहीं. बहरहाल, उच्चतम न्यायालय के आदेश का पालन होना ही था, सो हुआ भी. इसी आदेश के क्रम में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा भी अपना सरकारी आवास खाली किया गया. उनके आवास खाली करने को मीडिया में ऐसे दिखाया गया जैसे कि वे अपनी संपत्ति को दान करने कहीं वनवास पर निकले हैं. दो-चार दिनों की मीडियाबाजी करने के बाद, खुद की गिरती टीआरपी को ऊपर उठाने की दृष्टि से सामान्य सा जीवन बिताये जाने की कवायद भी दिखी और उसी के साथ मीडिया ने दिखाया सरकारी आवास का अंदरूनी नजारा.


यह अपने आपमें हास्यास्पद भी कहा जा सकता है साथ ही क्षोभपरक भी कि एक ऐसा व्यक्ति जो स्वयं ने कभी मुख्यमंत्री रहा हो, विदेश से उच्च शिक्षा प्राप्त है, युवा है मगर राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता की नकारात्मकता का शिकार हो गया. मीडिया में उनके आवास की आई अंदरूनी तस्वीरों ने किसी भी व्यक्ति के या कहें कि विशुद्ध उनके ही व्यक्तित्त्व के मूल को सामने रख दिया है. जगह-जगह उखड़ा पड़ा भवन, अस्त-व्यस्त पड़े पौधे, महंगे पत्थर और अन्य सामानों की तोड़-फोड़ देखकर यही लगा मानो ये सब जानबूझ कर किया गया है. उच्चतम न्यायालय के आदेश को वे राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता में भाजपा का आदेश, मोदी या योगी का आदेश समझ बैठे. यही कारण रहा कि आवास छोड़ते-छोड़ते उन्होंने वो नुकसान किया जो उनको कतई शोभा नहीं देता है. आवास के नुकसान की भरपाई तो हो जाएगी किन्तु जनमानस में उनकी और ज्यादा गिरी छवि की भरपाई कैसे होगी, ये उनको सोचना चाहिए. किसी मंच पर स्वार्थपरक गठबंधन की क्षणिक विजय के बाद यदि मान लिया जाये कि एकमात्र यही स्वार्थपरक गठबंधन ही विजयी होगा तब भी सरकारी संपत्ति किसी न किसी सरकार के अंतर्गत ही आनी होती. ऐसे में सरकारी आवास को किया गया नुकसान दर्शाता है कि महज आवास छोड़ने की खीझ का ये दुष्परिणाम उस भवन ने, वहां की वस्तुओं ने, वहां के पौधों ने सहा तो सोचा जा सकता है कि प्रदेश की सत्ता हाथ से निकलने की खीझ में उन्होंने प्रदेश का कितना नुकसान किया होगा, प्रदेशवासियों को कितना नुकसान पहुँचाया होगा, यहाँ के विकास की संभावनाओं का कितना न नुकसान किया होगा.

19 अप्रैल 2018

खुद से लड़ता हुआ इंसान


आजकल तो अब अपने से ही लड़ते रहते हैं, ये किसी भी शायराना अंदाज में कही हुई पंक्तियां मालूम हो सकती हैं पर ऐसा आजकल लगभग उन सभी के साथ हो रहा है जो दिल से देशहित में विचार करते रहते हैं। ऐसा भी नहीं है कि देशहित में विचार करने वालों की संख्या में कमी आ गई है अथवा लोगों ने इस ओर विचार करना बन्द कर दिया है। दरअसल हुआ यह है कि देशहित से मुख्य आजकल स्वार्थ हो गया है। इस स्वार्थ के कारण लोगों ने देशहित के स्थान पर स्वहित को तवज्जो देना शुरू कर दिया है। अपने आपसे लड़ने की बात अनायास नहीं उभरी, समाज में चल रही विचित्र-विचित्र स्थितियों के बाद लगा कि व्यक्ति स्वयं से ही लड़ने में लगा हुआ है। इस तरह के हालात सरकारों के द्वारा पैदा किये गये हैं और इन हालातों का शिकार समाज का व्यक्ति ही हो रहा है। देश के विकास की बात करता है वह आदमी जो सारा दिन अपने कार्यालय में खटने के बाद शाम को घर के सदस्यों के खाने-पीने की व्यवस्था करता है। मंहगाई की मार, सामानों की अनुपलब्धता, हर एक कदम के साथ रिश्वतखोरी जैसे हालात उसे अपने से ही लड़ने को मजबूर करते हैं।


हो सकता है कि बहुत से लोगों को इसमें शायराना अंदाज के साथ एक प्रकार की फिलोसॉफी दिखाई पड़े पर यह किसी प्रकार का दर्शन नहीं वरन् आज की कटु सत्यता है। आदमी हर कदम पर प्रताड़ित हो रहा है और मुंह ताकने का काम करता है सरकार की ओर, सरकार के नुमाइंदों की ओर। इसके बाद उसे पता चलता है कि सरकार और उसके तमाम सारे अवयव सिर्फ और सिर्फ स्वहित में लगे हैं तो एक अम आदमी के पास हताशा और निराशा के अलावा कुछ बचता नहीं है। ऐसी हताशा और निराशा यदि नक्सलवाद को पैदा करता है तो व्यक्ति को व्यक्ति से लड़ाती है। व्यक्ति का व्यक्ति से लड़ने का यही रूप जब सामने नहीं आता है तो आदमी अपने से ही लड़ने लग जाता है। उसकी यह लड़ाई उस हताशा का ही परिणाम होती है जो उसे किसी न किसी रूप में आये दिन परेशान करती है। घर के अन्दर रोजमर्रा की वस्तुओं से लेकर भौतिकतावादी सामानों में गिने जाने वाली वस्तुओं को देखें तो लगता है कि ये सब अब उनके लिए ही हैं जिनके पास सत्ता है अथवा उनके लिए जो किसी न किसी रूप में सत्ता के आसपास मंडरा रहे हैं।

हमारे तमाम सारे समाजशास्त्री, राजनीतिक विश्लेषक, विदेशनीति के जानकार किसी भी घटना के लिए एशियाई देशों के हालातों की व्याख्या कर उसका भारतीय संदर्भों में विश्लेषण करने लगते हैं पर विश्व स्तर पर घटित हुईं स्थितियों का भारतीय संदर्भ में किसी ने अध्ययन करने की आवश्यता महसूस नहीं की। इसका कारण क्या समझा जाये, या तो भारतीय इस प्रकार के परिवर्तन को लाने की क्षमता नहीं रखते हैं अथवा हमारे तमाम विश्लेषक विश्व स्तर की इन घटनाओं को पढ़ने और समझने में नाकाम रहे हैं। यहाँ याद रखना होगा कि देश जिस प्रकार के हालातों से जूझ रहा है; आये दिन आरक्षण के नाम पर होते हिंसात्मक प्रदर्शन से, विध्वंसात्मक प्रदर्शन से दो-चार होता है; वर्ग-संघर्ष के नाम पर आये दिन हत्याओं को होते देखा जा रहा है; इज्जत के नाम पर महिलाओं की इज्जत से खेलकर उन्हें मौत की नींद सुला दिया जाता हो; मासूम बच्चियों को हवस का शिकार बनाया जा रहा हो; जनता के धन को मूर्तियों, पार्कों में खपा दिया जाता हो; ईमानदारी और मासूमियत के नाम पर करोड़ों के घोटालों का पता न चलता हो; बड़े से बड़ा भ्रष्टाचारी सिर्फ इस कारण से छूट जाता है कि उसके विरुद्ध पाये गये सबूत इंटरनेट पर भी उपलब्ध हैं; जहां दाल, चावल, रोटी, सब्जी मंहगी और सिम, कम्प्यूटर, मोबाइल सस्ते हों; सत्ता पाने के लिए तुष्टिकरण, हिंसा का सहारा लिया जा रहा हो वहां के हालातों के विस्फोटक होने को कौन टाल सकता है? यह और बात है कि संतोषम् परम् सुखम् की जो घुट्टी हम भारतीयों को बचपन से ही पिलाई जाती रही है, उसके असर को कम होने में अभी भी सालों लगेंगे। इसके साथ ही यह भी स्मरण रखना होगा कि जैसे ही इस घुट्टी ने असर दिखाना कम अथवा बन्द किया उस दिन............!!!!

शेष अभी बहुत कुछ समय के गर्भ में है, अब तो अपने से लड़ते हुए मन करता है कि छोड़ कर इस तरह की शब्दों की कारीगरी कुछ दूसरी तरह की कारीगरी शुरू कर दी जाये। शायद उसी से कुछ परिणाम निकलना शुरू हो क्योंकि समाज के दुश्मन अब शब्दों की तलवार से भयभीत नहीं होते और मरते भी नहीं; आखिर उनकी शर्म-लिहाज जो मर चुकी है।

17 अप्रैल 2018

लिक्खाड़ संघर्ष मोर्चा की हड़ताल


बड़े जोर-शोर से कई सारे लोगों की भीड़ ने जिन्दाबाद-मुर्दाबाद करते हुए शहर में हलचल मचा दी। दुकानदार अपनी-अपनी दुकान बंद कर इधर-उधर भागने लगे हैं। सड़कों पर टहलते लोग भी सिर छुपाने की जगह देखने लगे। लोगों को डर लग रहा था कि कहीं किसी तरह का बलवा न हो जाए। भीड़ पूरी ताकत के साथ चीखती हुई शहर को बंद करा रही थी, जो दुकान, स्कूल बंद नही करता उसके साथ मारपीट भी हो रही थी। एकाएक भीड़ के नेतानुमा इन्सान ने भीड़ का मुंह सरकारी संपत्ति की ओर मोड़ दिया। अब भीड़ सरकारी संपत्ति की ओर दौड़ पड़ी।


आगे क्या हुआ यह बताने के पहले आपको बताते चलें कि यह भीड़ किस बात के लिए है, क्यों हंगामा कर रही है, क्यों दुकानों आदि को बंद करा रही है, क्यों अब सरकारी संपत्ति की ओर मुड रही है? ये भीड़ है नए-नए सोशल मीडीय उपभोगकर्ताओं की जिन्होंने एक संगठन बना कर अपनी अनर्गल टाइप वाली पोस्ट पर भी लाइक न करने वालों, टिप्पणी न करने वालों, शेयर न करने वालों के विरुद्ध आन्दोलन खड़ा कर रखा है। इनकी मांग थी कि जितने लोग फ्रेंड-लिस्ट में हैं उन्हें हरहाल में प्रत्येक पोस्ट पर कम से कम दस टिप्पणी जरुर करनी चाहिए, उसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है तो सरकार इस तरह की व्यवस्था करे कि प्रत्येक पोस्ट पर दस टिप्पणियां प्रकाशित हों। सरकार से कोई आश्वासन तो मिला नहीं, हाँ डाटा चोरी की खबरें जरूर आने लगीं। कुछ लोगों ने खबर फैला दी कि सरकार इसे बंद करने वाली है, सदा-सदा के लिए। नव-सोशल लिक्खाड़ों को लगा जैसे उनकी दुनिया ही उजड़ जाएगी। बस फिर क्या था, इन लिक्खाड़ों के नव-नियुक्त संगठन "नव-सोशल मीडिया लिक्खाड़ संघर्ष मोर्चा" ने हड़ताल कर शहर में हंगामा शुरू कर दिया।

अब भीड़ की बात, भीड़ अपनी पूरी ताकत से अब कुछ अलग करने के विचार में आ गई। सरकारी संपत्ति होती ही ऐसी है कि उसमें चाहे आग लगाओ, चाहे तोडो , चाहे उसको चुरा ले जाओ, न तो अपना नुकसान होता है, न अपने रिश्तेदारों का, न अपने मित्रों का। कभी विचार किया आपने इस पर, कहीं कोई बस दुर्घटना होती है और भीड़ जाकर आग लगा देती है पोस्ट-ऑफिस में। अब कोई बताये कि उस बस दुर्घटना में पोस्ट-ऑफिस का क्या दोष? उसमें आग क्यों लगाई गई? सरकारी संपत्ति का नुकसान करने का बाद सीना तान कर, ताल ठोंक कर अपने कारनामों का बखान मीडिया के सामने करो कोई कुछ करने वाला तो है नही हाँ आपके नेता बनने के चांस बढ़ जाते हैं। इसी नेतागीरी के चक्कर में एक नव-नियुक्त सोशल मीडिया लिक्खाड़ जोश में सबसे आगे जाकर सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के लिए दौड़ पड़ा। सामने एक सरकारी बस, पोस्ट ऑफिस दिख रहा था, सोचा अब तो हीरो बन ही गए। इससे पहले कि किसी भी चीज को हाथ लगाया जाता, सामने से अचानक कई सारे पुलिस वाले प्रकट हो गए। घबरा कर कुछ समझ में नहीं आया, इससे पहले कि वे भाग पाते पुलिस वालों ने घेर लिया। भागने के सारे के सारे प्रयास धरे के धरे दिखने लगे। अब वे न तो भाग पा रहे थे न ही बचाव के लिए चिल्ला पा रहे थे। पुलिस वालों ने पकड़ कर हिलाना-डुलना शुरू कर दिया। इससे पहले कि पुलिस की लाठी स्वागत में देह से चिपकती, मेरी नींद खुल गई, देखा मेरा छोटा भाई मुझे जगा रहा है।

जागने पर ख़ुद को हक्का बक्का पाया। जब ख़ुद को सामान्य स्थिति में पाया तो सोचने लगा कि हमारे देश में हो भी तो यही रहा है। किसी भी बात पर कोई भी हड़ताल करना शुरू कर देता है। बिना यह देखे कि किसी तरह की तोड़-फोड़ समस्या का हल नहीं बल्कि समस्या को और बढ़ाना है। हम बिना इस बात की परवाह किए कि हमारे द्वारा नुकसान की जा रही संपत्ति हमारी ही है, हम तोड़-फोड़ करते रहते हैं। सर झटक कर बिस्तर से उठ बैठा और सोचने लगा कि कहीं ऐसा न हो कि फ़िर से सपने में "नव-सोशल मीडिया लिक्खाड़ संघर्ष मोर्चा" ट्रेन रोकने को निकल पड़े।

27 फ़रवरी 2018

विद्यालय में खुलेआम नींद लेते, धुआँ उड़ाते शिक्षक महाशय


कुछ दिनों पहले समाचार-पत्र पलटते हुए एक खबर पर निगाह ठहर गई. आमतौर पर खबरों पर सरसरी निगाह डालकर आगे बढ़ते जाते हैं. यदि कोई खबर महत्त्वपूर्ण लगी तब तो उसे पूरा पढ़ा जाता है अन्यथा शीर्षकों से परिचय करते हुए सम्पादकीय आलेखों को समाप्त कर कॉलेज के लिए निकल लेते हैं. उस दिन जिस खबर पर हमारी निगाह ठहरी उसमें किसी तरह का ग्लैमर नहीं था, किसी हीरो-हीरोइन से जुड़ी नहीं थी किन्तु वह खबर हमारे नौनिहालों के भविष्य से जुड़ी हुई थी. इस कारण उस खबर को पढ़े बिना न रहा गया. खबर के शीर्षक ‘गुरु जी नींद में हैं, उठते ही धूम्रपान’ के साथ-साथ लगी दो फोटो अपने आप ध्यान खींच रही थीं. चूँकि समाचार-पत्र का वो सम्बंधित पृष्ठ उरई-जालौन से सम्बंधित था इस कारण ये तो तय था कि खबर जनपद जालौन की है, पर कहाँ, किस क्षेत्र की है इसे जानने के लिए समाचार पढ़ा गया.


समाचार से ज्ञात हुआ कि चित्र में दिख रहे महाशय शिक्षक हैं एक पूर्व माध्यमिक विद्यालय में. यह विद्यालय उरई के पास स्थित नरछा गाँव में स्थित है. समाचार पढ़ने के बाद तमाम प्रतिक्रियाएं दिमाग में उठीं. बहुत सी बातों ने अपना सिर उठाया. उन सबमें सबसे बड़ी बात जो हमें इस खबर में नजर आई वो यह कि सम्बंधित शिक्षक का नाम कहीं भी नहीं दिया गया है जबकि उसी विद्यालय की प्रधानाचार्या का नाम समाचार में दो बार प्रकाशित किया गया है. यहाँ समझने वाली बात है कि जिस प्रकार से समाचार-पत्र हिंदुस्तान की खबर में प्रकाशित है कि विद्यालय की प्रधानाचार्या ने जिलाधिकारी को सम्बंधित शिक्षक के खिलाफ शिकायती-पत्र दिया था. ऐसे में समाचार-पत्र की, सम्बंधित संवाददाता की जिम्मेवारी बनती थी कि उनके द्वारा यदि दोषी शिक्षक का नाम प्रकाशित नहीं किया गया तो प्रधानाचार्या का नाम भी प्रकाशित नहीं करना था. और यदि जब नाम प्रकाशित करके समाचार को वैधानिकता प्रदान करने की मंशा थी तो शिक्षक का भी नाम सामने आना चाहिए था, जिससे कि जनपदवासियों को उस शिक्षक का नाम भी पता चल सकता.




बहरहाल, आज के हमारे आलेख की चिंता इसके साथ-साथ ये भी है कि जब ऐसे शिक्षक हमारे विद्यालयों में मौजूद हैं तो विकास की संभावनाएं शून्य दिखाई देती हैं. समाचार पढ़ने के बाद पहला काम उस खबर को सबके बीच प्रसारित-प्रचारित करने का किया ताकि उस शिक्षक के बारे में लोग जान सकें. सोशल मीडिया के विविध मंचों पर जैसे ही खबर का प्रकाशन-प्रसारण हुआ वैसे ही कई मित्रों ने हमसे संपर्क किया. हमारे बहुत से मित्र शिक्षा विभाग से सम्बद्ध हैं जिनके कारण वहाँ की खबरें सहजता से मिलती रहती हैं. जरा सी देर में सिगरेट-बीड़ी सुलगाते शिक्षक की जन्मकुंडली पास में आ गई, साथ में कुछ फोटो भी प्राप्त हुईं. अनुरुद्ध पटेल नामक इस शिक्षक के सम्बन्ध राजनैतिक स्तर पर हैं. जनपद के एक रसूखदार नेता जी के बहुत खास लोगों के प्रिय लोगों में इस शिक्षक का नाम शामिल है, जिसके चलते विभागीय स्तर पर लोग इसके सामने आने से बचते हैं. एक मामले की जाँच में जाँच टीम को भी खाली हाथ वापस आना पड़ा क्योंकि मामला किसी छात्रा से जुड़ा होने के साथ-साथ सम्बंधित रसूखदार शिक्षक से भी जुड़ा हुआ था. इसके अलावा वर्तमान में जातिगत रूप से कुछ जनप्रतिनिधि भी इनकी जाति से निर्वाचित हुए हैं, जिसके चलते इनका अहंकार और सिर चढ़ कर बोल रहा है. विद्यालय आना, सम्बंधित कर्मचारियों, अध्यापकों से अभद्रता करना, गाली-गलौज वाली भाषा-शैली का इस्तेमाल करना, खुलेआम बच्चों के सामने धूम्रपान करना, पढ़ने-पढ़ाने वाली बेंचों पर नींद लेना इनके रोजमर्रा के कार्यों में शामिल है.




सोचा जा सकता है कि यदि ऐसे शिक्षक हमारे शिक्षा के मंदिरों में बैठे होंगे तो कैसे शिक्षा का विकास होगा? कैसे बच्चों का भविष्य सुधरेगा? शिक्षा विभाग को समय-समय पर सम्बंधित गांवों के लोगों से, बच्चों से, अभिभावकों से, तमाम विद्यालयों के शिक्षकों आदि से वहां के शिक्षकों-कर्मियों के बारे में जानकारी एकत्रित करते रहना चाहिए. किसी भी तरह से मिलती अनियमितता के बारे में विभाग को अपने स्तर से जाँच भी करते रहनी चाहिए. स्पष्ट है, जब तक ऐसे किसी भी शिक्षक, कर्मचारी पर सख्त से सख्त कार्यवाही नहीं कि जाती तब तक न केवल शिक्षा विभाग में बल्कि ऐसे किसी भी विभाग में सुधार संभव नहीं.

22 अगस्त 2017

रेलवे प्रशासन यात्रियों की सुरक्षा को समझे

मुजफ्फरनगर में एक और ट्रेन हादसा हुआ. इसके बाद वही सरकारी लीपापोती, वही जाँच के आदेश. हर ट्रेन दुर्घटना के पीछे आतंकवादी कनेक्शन नहीं होता और हर ट्रेन हादसे के पीछे ऐसे ही कनेक्शन को तलाश करने का अर्थ है कि सरकारी तंत्र अपनी नाकामयाबी को छिपाने की कोशिश कर रहा है. मुजफ्फरनगर में हुए हालाँकि हालिया कलिंग-उत्कल ट्रेन हादसे में सरकारी तंत्र की तरफ से न तो आतंकी हाथ होने सम्बन्धी बयान आया और न ही उस दिशा में जाने जैसे कोई संकेत दिए गए. इस हादसे में प्रथम दृष्टया मानवीय चूक ही नजर आती है और हादसे के तुरंत बाद फौरी तौर पर कदम उठाते हुए सम्बंधित कर्मियों पर कार्यवाही भी कर दी गई है. इसके बाद भी कई सवाल हैं कि आखिर सम्बंधित रेलकर्मी अपनी जिम्मेवारी को समझते क्यों नहीं? आखिर हादसों के बाद निलम्बन, स्थानांतरण आदि के द्वारा कागजी खानापूरी कब तक की जाती रहेगी? रेलवे प्रशासन आखिर अपने यात्रियों की सुरक्षा के प्रति लापरवाह क्यों बना हुआ है?

ये ट्रेन दुर्घटना कोई पहली दुर्घटना नहीं है. अभी कुछ माह पूर्व उत्तर प्रदेश के पुखरायाँ रेलवे स्टेशन के पास हुए भीषण हादसे में सैकड़ों लोगों की जान गई थी. उसके चंद दिनों बाद कानपूर के नजदीक रूरा रेलवे स्टेशन के पास भी ट्रेन पटरी से उतर कर पलट गई थी. शुक्र था भगवान का कि रूरा ट्रेन हादसे में बहुत जान-माल की क्षति नहीं हुई थी. यहाँ पुखरायाँ हादसे की जाँच में आतंकी कनेक्शन मिलने के सूत्र हासिल हुए हैं. उसके बाद पकडे गए कुछ आतंकियों ने उस हादसे के बारे में सबूत भी दिए थे लेकिन सभी ट्रेन हादसे आतंकी गतिविधियों के कारण नहीं हो रहे हैं. वर्तमान कलिंग-उत्कल ट्रेन हादसे में स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि ट्रेन पटरी पर काम चल रहा था, जिसमें घनघोर दर्जे की लापरवाही की गई. जो कुछ घटनास्थल पर दिखाई दे रहा है उसको और उजागर करने का काम मुजफ्फरनगर ट्रेन हादसे के बाद सामने आई वो ऑडियो क्लिप है जिसमें दो रेलवे कर्मचारियों की टेलीफोन पर हुई बातचीत है. इस बातचीत में ट्रेन दुर्घटना में लापरवाही के संकेत मिले हैं. बातचीत के आधार पर जैसा कि एक रेलवे कर्मचारी दूसरे से कह रहा है कि रेलवे ट्रैक के एक भाग पर वेल्डिंग का काम चल रहा था. लेकिन मजदूरों ने ट्रैक के टुकड़े को जोड़ा नहीं और इसे ढीला छोड़ दिया. क्रासिंग के पास गेट बंद था. ट्रैक का एक टुकड़ा लगाया नहीं जा सका था और जब उत्कल एक्सप्रेस पहुंची तो इसके कई कोच पटरी से उतर गए. इसके साथ ही यह भी कहा गया कि जिस लाइन पर काम चल रहा था, न तो उसे ठीक किया गया और न ही कोई झंडा या ट्रेन रोकने को कोई साइनबोर्ड लगाया गया. यह दुर्घटना लापरवाही की वजह से हुई. ऐसा लगता है कि सभी लोग निलंबित होंगे.

हर हादसे के बाद और सतर्कता से काम करने के निर्देश जारी कर दिए जाते हैं. जनता को आश्वासन और हताहतों को मुआवजा दे दिया जाता है. इतनी सी कार्यवाही के बाद रेलवे प्रशासन अपनी जिम्मेवारी को पूर्ण मान लेता है. ऐसे में क्या ये समझ लिया जाये कि रेलवे प्रशासन मान बैठा है कि ट्रेन हादसों को रोका नहीं जा सकता? आखिर एक तरफ देश को बुलेट ट्रेन के सपने दिखाए जा रहे हैं. ट्वीट के जरिये यात्रियों को मदद दिए जाने के रेल मंत्री सुरेश प्रभु के सकारात्मक कार्यों का बखान किया जा रहा है. रेलवे को सर्वाधिक सक्षम, संवेदनशील, सक्रिय विभाग माना जा रहा है. तब मानवीय लापरवाही का दिखाई पड़ना किसी और बात के संकेत देता है. साफ़ सी बात है कि केन्द्रीय स्तर पर प्रशासनिक नियंत्रण कार्य नहीं कर रहा है. निचले स्तर के कर्मचारी भी कार्य करने में कोताही बरतने के साथ-साथ मनमानी करने में लगे हुए हैं. यदि ऐसा न होता तो विगत तीन वर्षों में हुए ट्रेन हादसों में बहुतायत में पटरी का टूटा मिलना बहुत बड़ा कारण रहा है. मुजफ्फरनगर दुर्घटना में तो टूटी पटरी के टुकड़े को बिना बैल्डिंग जोड़ देना घनघोर लापरवाही ही कही जाएगी. 


रेलवे की तरफ से आये दिन किसी न किसी रूप में यात्रियों पर किराये में भार ही डाला जा रहा है और इसके पीछे का उद्देश्य सुगम, सुरक्षित यात्रा का होना बताया जा रहा है. इसके बाद भी ट्रेनों में बादइन्तजामी ज्यों की त्यों है. खाने में गन्दगी, कपड़ों में गन्दगी, ट्रेनों का देरी से चलना, ट्रेनों में आपराधिक घटनाएँ होना आदि ज्यों का त्यों बना हुआ है. वर्तमान मोदी सरकार का रवैया भी वैसा ही है जैसा कि पूर्ववर्ती सरकारों का होता था. ऐसे में बदलाव की उम्मीद कैसे की जा सकती है? कैसे उम्मीद की जा सकती है कि एक दिन इस देश का नागरिक बुलेट ट्रेन में यात्रा करेगा? कैसे कोई यात्री ट्रेन में चढ़ने पर विश्वास के साथ यात्रा करेगा कि वह अपने गंतव्य पर सही-सलामत उतरेगा? किसी अधिकारी-कर्मचारी का निलम्बन अथवा अन्य कोई कार्यवाही दुर्घटनाओं से बचने का अंतिम विकल्प नहीं हैं. अब रेलवे के कर्मियों को अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा. स्वयं रेलमंत्री को अपने कर्तव्यों दायित्वों का एहसास करना होगा. उन्हें समझना होगा कि उनके ऊपर लाखों यात्रियों की जान-माल की सुरक्षा की जिम्मेवारी है. उनको भविष्य की कार्ययोजना और आगे की कार्रवाई को और बेहतर बनाने की आवश्यकता है. आखिर कोई ट्रेन यात्री इतनी अपेक्षा तो कर ही सकता है कि वह उचित किराया देकर ट्रेन में सफ़र कर रहा है तो अपनी मंजिल पर सुरक्षित पहुँच सके. इस तरह की दुर्घटनाओं से मुँह चुराने की नहीं वरन इनसे सबक लेते सीखने की आवश्यकता है ताकि भविष्य में ट्रेन हादसों को रोका जा सके.

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उक्त आलेख आज दिनांक 22-08-2017 के डेली न्यूज़ के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है.

12 अगस्त 2017

दोषियों पर तत्काल सख्त कार्यवाही हो

गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में दो दिन के भीतर तीस बच्चों की मृत्यु कोई सामान्य घटना नहीं है. ये सीधे-सीधे प्रशासनिक लापरवाही का मामला है. इस घटना का कारण बताया जा रहा है कि मेडिकल कॉलेज के इंसेफेलाइटिस पीड़ित बच्चों के वार्ड में लिक्विड ऑक्सीजन की सप्लाई बाधित हुई थी. ऐसा बताया गया कि ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी का लाखों रूपया बकाया होने के बाद उसके द्वारा सप्लाई रोकने की बात भी कही जा चुकी थी. ऐसी स्थिति के बाद भी मेडिकल कॉलेज प्रबंधन द्वारा उसके बकाया का भुगतान न करना, ऑक्सीजन की व्यवस्था करने के उपाय न करना आदि दर्शाता है कि वह किस स्तर तक लापरवाह बना हुआ है. इसी मामले में प्रबन्ध तंत्र की तरफ से विशुद्ध लीपापोती होती दिख रही है. उसके द्वारा जानकारी सार्वजनिक की जा रही है कि लिक्विड ऑक्सीजन की किसी भी तरह कमी नहीं थी. कोई भी मौत इसकी कमी से नहीं हुई. ये भी अपने आपमें विशुद्ध गैर-जिम्मेवाराना हरकत है. एक पल को मान भी लिया जाये कि मेडिकल कॉलेज में कोई भी मौत लिक्विड ऑक्सीजन की कमी से नहीं हुई पर इससे कैसे इंकार किया जायेगा कि वहाँ तीस बच्चों की मृत्यु हुई है.


इस घटना का संज्ञान बहुत ही संवेदनशीलता से इसलिए भी लिया जाना चाहिए क्योंकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं इस घटना के एक दिन पहले मेडिकल के दौरे पर थे. वैसे तो मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका अपने गृहनगर गोरखपुर में ये सातवाँ दौरा था किन्तु इस बार का दौरा उन्होंने विशेष रूप से मेडिकल कॉलेज के लिए ही किया था. खुद इंसेफेलाइटिस पीड़ित बच्चों और उनके परिजनों से घंटों मुलाकात करने के बाद उन्होंने इसके इलाज से सम्बंधित सभी पक्षों, सुविधाओं, दवाइयों आदि की जानकारी लेने के लिए एक लम्बी मीटिंग भी की थी. इसके बावजूद इस तरह की घटना बताती है कि अकर्मण्य और गैर-जिम्मेवार अधिकारीयों, प्रशासन पर अपने मुख्यमंत्री का भी असर नहीं है. प्रथम दृष्टया ये मामला भले ही चिकित्सकीय सेवाओं, सुविधाओं में लापरवाही का दिखाई देता हो मगर यदि जरा सी गंभीरता से विचार किया जाये तो आसानी से समझ आ जायेगा कि इसके पीछे कितनी बड़ी प्रशासनिक लापरवाही है. दरअसल भाजपा द्वारा प्रशासनिक कार्यप्रणाली को सुचारू बनाने, उसे पारदर्शी बनाने, अधिकारियों को निर्भय होकर काम करने देने की एक प्रणाली विक्सित करने का प्रयास किया गया. इसी क्रम में प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद से शीर्ष नेतृत्व की तरफ से प्रशासन को, अधिकारियों को स्वतंत्रता से कार्य करने को कहा जा रहा है. भाजपा द्वारा अपने विधायकों, पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं को भी रोका गया है कि वे प्रशासनिक अधिकारियों पर किसी तरह का दबाव न बनायें. इस तरह के निर्देशों से प्रशासनिक अधिकारियों में कार्य के प्रति जवाबदेही आणि चाहिए थी वो न आने के बजाय निरंकुशता आ रही है. अभी भी बहुतायत में वे अधिकारी काम कर रहे हैं जो पिछली सरकार के प्रिय बने हुए थे. ऐसे में उनके द्वारा न केवल भाजपा पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं की अवहेलना की जा रही है वरन जनता के हितों को भी अनदेखा किया जा रहा है.


देखा जाये तो गोरखपुर की ये ह्रदयविदारक घटना इसी स्वतंत्रता का दुष्परिणाम है. सोचने वाली बात है कि प्रशासनिक अधिकारी इस कदर स्वतंत्र हो गए हैं कि महज एक दिन पहले मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए निर्देशों का अनुपालन करना भी उनको उचित न लगा. यदि ऑक्सीजन की सप्लाई किसी कारण से बाधित होने की आशंका थी तो इसके लिए पहले से समुचित प्रबन्ध क्यों नहीं किये गए थे? वे भी तब जबकि इस बीमारी से भर्ती होने वालों में बच्चों की संख्या ज्यादा था. गोरखपुर के प्रशासनिक अधिकारियों ने मेडिकल कॉलेज प्रबंधन द्वारा जानकारी देने के बाद भी बकाया चुकता करवाने, लिक्विड ऑक्सीजन की सप्लाई सुचारू करवाने की तरह क्यों नहीं ध्यान दिया? बच्चों की मृत्यु के बाद जिस तरह की सजगता वहाँ का प्रशासन दिखाने में लगा है यदि उसका शतांश भी पूर्व में दिखा लिया होता तो संभवतः बच्चों को बचा लिया गया होता. अब भले ही चिकित्सालय प्रबंधन अपने आपको सही सिद्ध करने के लिए किसी भी तरह की लीपापोती करे; सरकार अपने बचाव के लिए चाहे कुछ कहती रहे मगर कटुसत्य यही है कि बच्चों को वापस नहीं आना है. इस मामले में स्वयं मुख्यमंत्री योगी जी को विशेष रूप से संज्ञान लेते हुए न केवल चिकित्सकीय लापरवाही के बल्कि अन्य दूसरे पक्षों की भी जाँच करवानी चाहिए. जिस तरह से देश-प्रदेश में भाजपा-विरोधी माहौल उसके विरोधियों द्वारा बनाया जा रहा है; जिस तरह से असहिष्णुता जैसे शब्द के द्वारा लोगों में डर-भय का वातावरण बनाया जा रहा है; जिस तरह से शीर्ष पद पर बैठा व्यक्ति भी गैर-जिम्मेवाराना बयान देने लगता है उससे इस घटना के पीछे किसी तरह की साजिश से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. इसलिए स्वयं योगी जी द्वारा सम्पूर्ण घटनाक्रम का गंभीरतापुर्वक संज्ञान लेते हुए सभी गैर-जिम्मेवार लोगों पर सख्त कार्यवाही करनी चाहिए. अन्यथा की स्थिति में न केवल उनकी कार्यप्रणाली पर धब्बा लगेगा बल्कि विपक्षियों को इस संवेदनशील मुद्दे पर भी राजनीति करने का अवसर हाथ लगेगा, जो कम से कम इस समय कदापि उचित नहीं होगा.  

मासूम न्याय चाहते हैं - योगी जी के नाम खुला ख़त

माननीय योगी जी,
सादर प्रणाम,
आपके अपने क्षेत्र गोरखपुर के मेडिकल कॉलेज में दो दिन के भीतर तीस बच्चों की मृत्यु कोई सामान्य घटना नहीं है. यह उस समय और भी असामान्य हो जाती है जबकि आपका दौरा ऐसी ह्रदयविदारक घटना के ठीक पहले हुआ हो. ये सभी को भली-भांति विदित है कि उस दिन का आपका दौरा विशेष रूप से मेडिकल कॉलेज के लिए ही था. लगभग पूरा ही दिन आपने मेडिकल कॉलेज में इंसेफलाइटिस के मरीज बच्चों के बीच गुजारा था. आपने ICU और CCU में काफी देर तक इंसेफेलाइटिस से पीड़ित बच्चों और उनके परिजनों से मुलाकात भी की थी. इसके साथ ही आपने इसी सम्बन्ध में एक मीटिंग भी ली थी, जिसमें इस बीमारी से जुड़े चिकित्सकों, विशेषज्ञों आदि से सुरक्षा सम्बन्धी तमाम बिन्दुओं पर संतोषजनक जानकारी ली थी. इसके बाद ऐसा क्या हुआ कि बच्चों की एक-एक करके मृत्यु होने लगी.

प्रथम दृष्टया इसे ऑक्सीजन की सप्लाई बंद होना बताया गया वहीं इसके उलट बयान ये भी आया कि मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी से किसी रोगी की मृत्यु नहीं हुई. चलिए एक बारगी मान भी लिया जाये कि मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की सप्लाई बाधित नहीं हुई थी पर क्या इससे इंकार किया जा सकता है कि वहां तीस बच्चों की म्रत्यु नहीं हुई? क्या इससे इंकार किया जा सकता है कि किसी न किसी स्तर पर प्रशासनिक लापरवाही के चलते ये हादसा हुआ? क्या इससे इंकार किया जा सकता है कि बच्चों की सुरक्षा, उनके इलाज को लेकर किसी न किसी रूप में असंवेदनशीलता का परिचय दिया गया? आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्यों नहीं प्रशासन में सरकार का भय है? क्यों नहीं समाज के किसी भी क्षेत्र में प्रशासनिक सजगता देखने को मिल रही है? क्यों नहीं अपराधियों में, निष्क्रिय लोगों में, कर्तव्यहीन लोगों में, गैर-जिम्मेवार लोगों में सरकारी तंत्र का, उन पर सख्त कार्यवाही होने का डर दिख रहा है? आखिर क्यों? ये सवाल एक हमारे नहीं, बल्कि उन सबके हैं जिन्होंने बड़ी आशा-विश्वास से प्रदेश की अव्यवस्था को व्यवस्था में बदलना चाहा था. प्रदेश के बहुत बड़े तबके को अभी भी आपके सख्त कदम की अपेक्षा है क्योंकि विगत के तीन-चार माह में उन्हें सकारात्मक परिवर्तन देखने को नहीं मिला है. आज भी सड़क चलते अपराध हो रहे हैं. आज भी हत्याएं, डकैती, हिंसा पूर्व की भांति हो रही हैं. आज भी अराजक तत्त्वों से लोगों में भय बना हुआ है. आज भी प्रशासन पूरी तरह निष्क्रियता दिखा रहा है.

इतना सबकुछ होने के बाद भी प्रदेश के बहुतायत नागरिकों में आपके प्रति विश्वास, आस्था है कि आप यथाशीघ्र कोई ठोस कदम उठाकर प्रदेश को अराजकता से बाहर निकाल लेंगे. इस विश्वास के बीच गोरखपुर मेडिकल कॉलेज की ये घटना ठेस पहुँचाने का काम करती है. आपकी ईमानदारी, आपकी सत्यनिष्ठा, आपकी कार्यशैली, आपकी जीवनशैली, आपकी साफगोई की तरफ अब लोग निगाह लगाये बैठे हैं कि मासूमों को इंसाफ मिले. मृत्यु के अन्य कारणों की जाँच होती रहेगी किन्तु प्रथम दृष्टया बच्चों की मृत्यु होना सामने आया है. इससे सम्बंधित सभी जिम्मेवार लोगों को तत्काल सजा देने का काम करके आप निराश लोगों में आशा का संचार कर सकते हैं. इसके बाद आप सम्पुर्ण प्रदेश के प्रशासनिक ढाँचे में सख्ती लाने का कार्य करिए. प्रशासन को स्वतंत्रता से कार्य करने देना चाहिए पर इतना भी स्वतंत्र नहीं कर देना चाहिए कि उसमें सरकार के प्रति ही डर-भय न रह जाये.

यदि किसी मुख्यमंत्री के स्थल विशेष के दौरे और बीमारी विशेष से सम्बंधित मीटिंग लेने के बाद भी हीलाहवाली का ये आलम रहे कि तीस बच्चों की मृत्यु हो जाये तो समझा जा सकता है कि प्रशासनिक मशीनरी किस तरह से लापरवाह, अक्षम, असंवेदनशील है. ऐसे गैर-जिम्मेवार लोगों पर यथाशीघ्र सख्त कार्यवाही होनी चाहिए. कार्यवाही, सजा इस तरह की हो कि आने वाले समय में इस तरह की लापरवाही करने की, अपने दायित्व से खिलवाड़ करने की गलती कोई न करे.

आपसे आशा है कि आप इस संवेदनशील, ह्रदयविदारक घटना पर किसी भी तरह की राजनीति नहीं होने देंगे तथा सख्त और सकारात्मक कदम उठाते हुए प्रदेश की जनता को सार्थक सन्देश देने का कार्य करेंगे.


आपका ही.. 

10 फ़रवरी 2017

आत्महत्याओं के पीछे

फिर एक आत्महत्या, फिर एक युवा का चले जाना. दुःख भी होता है, क्षोभ भी होता है मगर बहुत सारे अनुत्तरित से सवाल सामने आ जाते हैं. तमाम तरह की अनिश्चितता सामने आ जाती है. संभावनाओं के इस दौर में भी युवा-शक्ति का अनिश्चय के साये में ज़िन्दगी बिताना और फिर हताशा में मौत के आगोश में चले जाना समझ से परे है. अनिश्चय हावी है, हताशा हावी है, निराशा जारी है, इंसान का मरना जारी है, युवाओं का मरना ज़ारी है. इस हावी रहने में, बहुत कुछ जारी रहने में सबसे बुरा है सपनों का मरते जाना, विश्वास का मिटते जाना. यांत्रिक रूप से गतिबद्ध ज़िन्दगी नितांत अकेलेपन के साथ आगे बढ़ती दिखती है किन्तु आगे बढ़ती सी लगती नहीं. इक्कीसवीं सदी को औद्योगीकरण की, भूमंडलीकरण की, वैश्वीकरण की, तकनीक की सदी घोषित कर दिया गया. इसके चलते समाज में अर्थ को महत्त्वपूर्ण माना जाने लगा. लोगों के लिए एकमात्र उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ धनोपार्जन करना बन गया है. इसके लिए जीवन को यंत्रवत सा बना लिया गया है. अब विद्रूपता ये की ये यांत्रिक ज़िन्दगी न केवल धनोपार्जन के लिए वरन बचपन, शिक्षा, घर-परिवार आदि में भी दिखने लगी है. किसी समय मौज-मस्ती, शैतानियों, शरारतों आदि के लिए बचपन को याद किया जाता था किन्तु अब ऐसा लगता है जैसे बचपन की भ्रूण हत्या कर दी गई है. हँसते-खेलते बच्चों की जगह बस्तों का बोझ लादे, थके-हारे से, मुरझाये से बच्चे दिखाई देते हैं. शरारतों, शैतानियों की जगह उनके चेहरों पर बड़ों-बुजुर्गों जैसी भाव-भंगिमा, सोच-विचार दिखाई देता है. नीले आकाश के नीचे उन्मुक्त खेलते, तितली बनकर उड़ते बच्चों को अब कमरों में बंद कर दिया गया है, उड़ान के लिए उनके हाथों में लैपटॉप, मोबाइल थमा दिए गए हैं. किसी समय में दादा-दादी, नाना-नानी के आँचल में छिपकर परियों, वीरों के किस्से-कहानियाँ सुन-सुनकर बड़े होने वाले बच्चे टीवी सीरियल्स के कथित लाइव शो को देखकर बड़े हो रहे हैं, स्मार्टफोन की इंटरनेट दुनिया के कारण समय से पहले ही स्मार्ट हो रहे हैं. 



धनोपार्जन की आपाधापी में अभिभावकों का संलिप्त रहना, युवाओं का भागमभाग में जुट जाना, अपनी आँखों के सपनों को जिंदा बनाये रखने के लिए संवेदना को मारकर आगे बढ़ते जाना आदि ऐसा कुछ हुआ जिसने समूचे समाज को उल्टा खड़ा कर दिया. अनियमित होती जीवनशैली, परिवार से दूर रहने की मजबूरी, अधिकाधिक भौतिक संसाधनों की प्राप्ति करना, चकाचौंध भरी जिंदगी को जीने की लालसा ने इंसान को इंसान की जगह मशीन बना दिया. मशीन बनते इस इंसान ने मशीन बनते ही सबसे पहले अपने भीतर की संवेदना को समाप्त कर उसकी जगह एक बाज़ार को जन्म दिया. रिश्ते, नातों, परिवार, बच्चों, दोस्तों आदि को उसने सिर्फ बाज़ार की दृष्टि से देखा. सब जगह उसने हानि-लाभ का समीकरण लगाया और उसी के अनुसार अपने आपको संबंधों-रिश्तों के साँचे में उतारा. इस यांत्रिक जीवन का दुष्परिणाम यह हुआ कि सारे रिश्ते समाप्त से होते दिखे. बच्चों के लिए माता-पिता और माता-पिता के लिए बच्चे नोट छापने की मशीन मात्र बनकर रह गए. रिश्तों का मोल महज संबोधन के लिए होता दिखने लगा. ऐसी स्थिति में अकेलापन बढ़ना स्वाभाविक ही है और वैसा हुआ भी. धन, भौतिक संसाधन, आधुनिकतम उपकरण, तकनीक की भरमार हो गई और इंसान एकदम अकेला हो गया.


इस अकेलेपन को दूर करने के लिए तनहा इंसान ने सबक न लिया; अपनी तन्हाई को दूर करने के लिए अपनों का सहारा नहीं लिया; अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए इंसानों का सहयोग नहीं लिया क्योंकि विडम्बना ये है कि आधुनिकता के बाज़ार में इंसान दिख ही नहीं रहे हैं. चारों तरफ सिर्फ मशीन ही मशीन हैं, यंत्र ही यंत्र हैं. अकेलेपन का उपाय मोबाइल में, लैपटॉप में, छलकते जाम में, सिगरेट के छल्लों में, नशे के बादलों में, दैहिक आकर्षण में, बिस्तर की सिलवटों में खोजा जा रहा है. सेल्युलाइड के परदे की चकाचौंध को ही अपने जीवन की वास्तविकता मान लिया जा रहा है. आभासी दुनिया के नकलीपन को ही अपने जीवन का असलीपन बना लिया जा रहा है. इससे अकेलापन कम होने की बजे और बढ़ता जा रहा है. इंसान के भीतर एक तरह का खोखलापन बढ़ता जा रहा है. यही कारण है कि पिता अपनी ही बेटी से कुकृत्य करने में लगा है. भाई-बहिन के बीच शारीरिक सम्बन्ध बन रहे हैं. इंसानी देह महज भोग की वस्तु बनती जा रही है. यौनेच्छा पूर्ति के लिए हवसी बच्चियों, वृद्धाओं, शवों तक को नहीं बख्श रहे हैं. दैहिक संबंधों को मानसिक संबंधों पर वरीयता दी जाने लगी है. ऐसी स्थिति में अंत नितांत दुखद होता है. जब आँख खुलती है तो व्यक्ति को अपने चारों तरफ आभासी दुनिया का एहसास होता है, नितांत भ्रम का एहसास होता है, सबकुछ पीछे छूट जाने के दुःख होता है, अपनों के कहीं दूर चले जाने का भाव जगता है. यही सबकुछ व्यक्ति में और अधिक दुःख, हताशा, निराशा का संचार कर देता है. ऐसे में व्यक्ति या तो अवसाद की अवस्था में चला जाता है या फिर आत्महत्या जैसा जघन्य कृत्य कर बैठता है. ज़ाहिर है कि अकेलेपन का इलाज मशीन नहीं, बाज़ार नहीं, तकनीक नहीं वरन अपने लोग हैं, घर-परिवार है. आवश्यकता इस सत्य को समझने की है. यदि ऐसा नहीं होता है तो कारण कुछ भी बताये जाएँ, लोगों में अकेलापन हावी रहेगा, लोगों का मौत के आगोश में चलते चले जाना जारी रहेगा.

16 नवंबर 2016

भीड़तंत्र की भीड़भाड़

बड़े नोटों पर प्रतिबन्ध लगने के बाद बैंकों और डाकघरों के सामने लगातार लम्बी-लम्बी लाइन देखने को मिल रही हैं. इनमें लगे लोगों में बहुतायत वे लोग हैं जो चलन से बाहर कर दिए गए नोटों को जमा करने के बजाय बदलने के लिए खड़े हुए हैं. केंद्र सरकार द्वारा जाली नोट और काले धन पर अंकुश लगाने की दृष्टि से पाँच सौ और एक हजार रुपये के नोट पर प्रतिबन्ध लगा दिया. ऐसे में बाजार में अनावश्यक हड़बड़ी मच गई. लोगों में अनचाहे रूप से ये सन्देश चला गया कि नोट बंद हो गए हैं. ऐसे में लोगों ने अपने पास संग्रहीत पुराने बड़े नोटों को बजाय बैंक में जमा करने के उनको बदलना ज्यादा उपयुक्त समझा. चूँकि बंदी के बाद से लगातार एटीएम बंद अथवा नहीं के बराबर काम कर रहे हैं. इसके चलते आम जनमानस ने अपनी सोच से सही कदम ही उठाया. सरकार द्वारा नोट बदलने की सुविधा देने के पीछे उद्देश्य ये था कि नोटबंदी के चलते जनता के पास रोजमर्रा की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु धन की उपलब्धता बनी रहे. आवश्यकता की पूर्ति हेतु धन के बदलाव के साथ जहाँ जनता ने सौ-सौ रुपये के नोटों का संग्रह करना शुरू कर दिया वहीं आय से अधिक धन रखे लोग भी ऐसे कृत्य के लिए सक्रिय हो गए. बैंकों या डाकघरों के सामने बढ़ती जा रही भीड़ का कुछ और ही समाजशास्त्र, दूसरी तरह का मनोविज्ञान ही सामने आने लगा.


आम नागरिक के हितार्थ किसी भी बैंक से नोट बदलने की सुविधा का दुरुपयोग उन लोगों द्वारा किया जाने लगा जो अवैध रूप से धन का संचय किये हुए हैं. उनके द्वारा लाइन में लगने के बदले पारिश्रमिक देकर मजदूरों, गरीबों को इस काम में लगाया जाने लगा. एक दिन का अथवा कुछ घंटों का मेहनताना दो सौ रुपये से लेकर एक हजार रुपये तक दिए जाने से बैंकों/डाकघरों में भीड़ बढ़ती ही जा रही थी. अवैध धन का संचय किये हुए लोगों को ऐसे मजबूर लोगों की, मजदूर किस्म के लोगों की उपलब्धता भी सहजता से इस कारण हो गई क्योंकि नोटों के प्रतिबंधित होने और नए नोटों के सामान्य रूप में चलन में न आ पाने के कारण मजदूरों को, कामगारों को काम नहीं मिल रहा था. नोटों के प्रतिबन्ध और अवैध धन की उपलब्धता ने मजदूरों और धनिकों के मध्य माँग और आपूर्ति के सिद्धांत को जन्म दिया. काम न मिलने से परेशान व्यक्तियों को जहाँ काम, धन की जरूरत महसूस हुई वहीं धन खपाने वालों को व्यक्तियों की आवश्यकता थी. दोनों पक्षों के अपने-अपने हितों की खातिर बैंकों, डाकघरों के सामने की भीड़ दिनोंदिन कम होने के बजाय बढ़ती ही रही. इस किराये की भीड़ का दुष्परिणाम ये होने लगा कि वे व्यक्ति नाहक परेशानी का शिकार होने लगे जिन्हें वाकई धन की आवश्यकता है. जिनके लिए नोटों का बदला जाना वाकई अपरिहार्य है. लम्बी-लम्बी लाइन के कारण बुजुर्गों को, महिलाओं को अत्यधिक समस्या का सामना करना पड़ रहा है.


बैंकों, डाकघरों में भीड़ बढ़ने, लाइन बढ़ने का कारण सिर्फ नोट बदलना नहीं, सिर्फ मजदूरी पा लेना नहीं वरन भीड़ की मानसिकता भी है. बहुसंख्यक जनता भीड़ बढ़ाने, लाइन बढ़ाने की मानसिकता से ग्रसित होती है. अफवाहों का बाज़ार यहाँ जल्द गर्म होने लगता है. ऐसे में अंदरूनी रूप से ये अफवाह कि नोट बाज़ार में सभी सहजता से उपलब्ध नहीं होंगे, लोगों में संचय की प्रवृत्ति जाग गई. इसके साथ-साथ मुफ्त के सामान से लेकर आवश्यक वस्तुओं के संग्रह तक, ग्रीन कार्ड बनवाने से लेकर सिम लेने तक, आधार कार्ड बनवाने से लेकर राशनकार्ड बनवाने तक, मंदिर में जाने से लेकर राहत सामग्री लेने तक सब जगह भीड़ की मानसिकता अधिक से अधिक बटोर लेने की होती है, सबसे पहले प्राप्त कर लेने की होती है. इस मानसिकता ने भी बैंकों, डाकघरों में भीड़ को बढ़ाया है. ऐसे में लोगों का बैंक, डाकघर जाकर लाइन लगाना, भीड़ बढ़ाना कम होगा, कहा नहीं जा सकता. यद्यपि केंद्र सरकार ने अपने स्तर पर सही कदम उठाया था किन्तु जनता की हड़बड़ी के कारण और धनकुबेरों के चंद रुपये ठिकाने लगाये जाने की मानसिकता के कारण भीड़ में कमी नहीं आ रही है. इसके साथ-साथ कुछ बिन्दुओं पर सरकारी तैयारियाँ भी अपेक्षित प्रतीत नहीं हो रही. नए नोटों का बाज़ार में, बैंकों में समय से उपलब्ध न हो पाना, एटीएम में नए नोटों की निकासी सम्बन्धी सॉफ्टवेयर की अनुपलब्धता, मशीन में नए नोट के आकार के खाँचे का न होना भी भीड़ बढ़ने के कारण बने. सरकार को शुरूआती दौर में नोट बदलने के लिए दिन का निर्धारण कर देना चाहिए था. जिस बैंक में खाता हो उसी में नोटों का बदलाव हो जैसा प्रावधान किया जाना चाहिए था. इससे एक तो सप्ताह के सभी दिनों में बैंकों, डाकघरों में भीड़ नहीं रहती. इसके साथ-साथ सभी बैंकों, डाकघरों में भी भीड़ नहीं होती. असल में सभी बैंकों से नोटों को बदलने की सुविधा का दुरुपयोग उन्हीं लोगों द्वारा किया जाने लगा जो लाइन में खड़े होने का भुगतान कर रहे हैं, भुगतान ले रहे हैं. एक बार नोट बदल कर भाड़े के मजदूर किसी दूसरी बैंक की लाइन में जाकर वहाँ भीड़ बढ़ाने लगे. हालाँकि सरकार द्वारा अब नोट परिवर्तन के समय स्याही लगाने का फैसला किया है देखना ये है कि भीड़ बढ़ाने वाली, लाइन लगाने वाली मानसिकता से ग्रसित जनता पर इस फैसले का कितना प्रभाव पड़ता है. 

10 अप्रैल 2016

उड़ती धूल, बंद होती आँखें

सड़क की भीड़-भाड़ के बीच रिक्शा आहिस्ते-आहिस्ते आगे बढ़ता जा रहा है. रिक्शे पर कोई सवारी नहीं, उसे चलाने वाला कोई बड़ी उम्र का व्यक्ति नहीं वरन दो छोटे-छोटे मासूम से बच्चे हैं. उनकी उम्र बमुश्किल १२-१३ वर्ष की रही होगी. वे रिक्शा चला क्या रहे थे, एक प्रकार से उसे धकेल सा रहे थे, खींच सा रहे थे. अपनी उम्र और शारीरिक आकार से कहीं बड़ा रिक्शा लिए धीरे-धीरे आगे बढ़ते उन बच्चों को देखकर किसी को आश्चर्य भी नहीं होता है. सब निस्पृह भाव से अपने-अपने कामों में लगे हुए हैं. सब अपने-अपने गंतव्य की ओर चले जा रहे हैं. न केवल सड़क पर अपनी-अपनी गतिविधियाँ करने वाले वरन सड़क के किनारे दुकान लगाये लोग, रेहड़ी, हथठेला लगाये लोग भी अपनी-अपनी गतिविधियों में निमग्न हैं. जिस तरह ये सब लोग उन दोनों लड़कों की तरफ से अनजान बने हुए हैं, उसी तरह से वे दोनों बच्चे बाकी सबकी गतिविधियों पर किसी तरह का ध्यान नहीं दे रहे हैं. बहुत ही धीमी गति से, रुक-रुक कर आगे बढ़ते बच्चे अपने रिक्शे में सवारी की जगह दो बड़े-बड़े बोरे रखे हुए हैं. सड़क किनारे, दुकानों के सामने कूड़े के ढेर को देखकर, सड़क पर बिखरी पड़ी कबाड़ सामग्री देखकर उसमें से अपने मतलब का सामान उठा-उठाकर उसे अपने बोरे में भरते जाते. कबाड़ उठाना, उसमें से अपने मतलब का सामान छाँटना, उसे बोरे में भरना और फिर आगे बढ़ जाना. नितांत मशीनी प्रक्रिया से सबकुछ क्रमबद्ध रूप से चलता जा रहा है. उन बच्चों के चेहरे पर न कोई हावभाव, आँखों में न कोई चमक, होंठों पर कोई मुस्कान भी नहीं. नितांत प्रौढ़ता ओढ़े वे दोनों बच्चे अपने जीवन को संचारी भाव देने के लिए धनोपार्जन हेतु सड़क पर, सड़क किनारे बिखरे पड़े कबाड़ को उठाते, समेटते जा रहे हैं.

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ये नजारा किसी एक दिन नहीं, लगभग रोज ही दिखाई देता है. ये दृश्य किसी के शहर की कहानी नहीं वरन लगभग सभी शहरों की है. आधुनिकता से, तकनीक से, प्रौद्योगिकी से लबालब भरे समाज में आर्थिक असमानता की ये एक बानगी भर है. एक वर्ग वो है जहाँ जानवरों को सम्पूर्ण सुख-सुविधाएँ मुहैया हो जाती हैं. उनके खाने-पीने-रहने-घूमने की स्थितियाँ उन्नत रूप में विकसित हैं. उनकी देखभाल के लिए कई-कई नौकर-चाकर हाथ बाँधे चौबीसों घंटे तत्पर, मुस्तैद दिखाई देते हैं. इसके उलट एक वर्ग इसी समाज में ऐसा है जिसके पास मूलभूत सुविधाओं की घनघोर कमी है. उसके खाने-पीने-रहने की स्थितियाँ बद से बदतर हैं. ऐसे वर्ग के बच्चों के लिए न तो खेलने का समय है और न ही खेलने के साधन. पढ़ने की न तो सुविधा है और न ही पढ़ने लायक स्थितियाँ. खेलने, पढ़ने, शरारतें करने की उम्र में ऐसे बच्चे अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए कहीं कबाड़ बीनते नजर आते हैं, कहीं किसी होटल-ढाबे में काम करने दिखते हैं, कहीं भिक्षावृत्ति में लिप्त पाए जाते हैं.

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सड़क पर रेंगते-रेंगते चलता उन दोनों बच्चों का रिक्शा एक मंदिर के बाहर बने बरामदे के किनारे रुक जाता है. उनके पीछे-पीछे चलते-चलते हमारे कदम भी ठहर जाते हैं. कुछ बात की जाये या नहीं? कुछ मदद की जाये या नहीं? सोचते-सोचते उन बच्चों के पास पहुँच गए, जो अब वहीं किनारे लगे नल के पानी से मुँह धोते हुए, पानी पीते हुए आपस में हलकी-फुलकी सी चुहलबाजी करने लगते हैं. पिछले कई मिनटों की प्रौढ़ता उनके चेहरे से अब गायब दिखती है. उनके नल से हटते ही जो जानकारी ली, उससे उनकी दयनीय दशा का भान हुआ. उनकी पारिवारिक स्थिति के साथ-साथ उनके जैसे लगभग एक दर्जन बच्चों का ऐसे ही कबाड़ बीनने में लगे होने के बारे में पता चला. भयंकर गरीबी से जूझते उन परिवारों के स्त्री-पुरुषों के पास इस साल कोई काम नहीं. सूखे ने खेतों में मिलते काम को भी समाप्त कर दिया. किसी तरह का कोई तकनीकी हुनर न होने के कारण वे सब ऐसे ही अनुपयोगी कार्यों में लगे हुए हैं. दो-दो, तीन-तीन लोगों की दिन भर की मेहनत के बाद शाम को दस-दस, पंद्रह-पंद्रह रुपयों का जुगाड़ हो जाता है. जिससे फाकाकशी को कुछ हद तक टाल लिया जाता है.

बगल से तेज गति से निकलती मँहगी सी कार देखकर हमारी भी आँखें फटी रह जाती इससे पहले उड़ती धूल ने हम सबकी आँखें बंद करवा दी. लगा, कुछ ऐसा ही शासन-प्रशासन तंत्र में हो रहा है. अंतरिक्ष को जाती तकनीक की, धनिकों तक पहुँचते विकास की, बाज़ार से बढ़ती चकाचौंध की, छुटभैये नेताओं के हूटरों की, सत्ताधारियों की लाल-नीली बत्तियों की, बाहुबलियों की धमक की उड़ती धूल ने सभी की आँखें बंद करवा दी हैं.


(चित्र लेखक द्वारा निकाला गया है) इस ब्लॉग की ये 975वीं पोस्ट....

24 फ़रवरी 2016

सरकार नहीं देश कमजोर होगा ऐसे तो



केन्द्र में भाजपा सरकार के गठन और नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से लगातार कोई न कोई विवाद सामने आता रहा है. विडंबना विवादों के सामने आने की नहीं वरन इसके पीछे से विपक्षी दलों की मानसिकता के सामने आने की है. गुजरात के हार्दिक पटेल का मामला हो, हैदराबाद के छात्र की आत्महत्या का मसला हो, उत्तर प्रदेश के अख़लाक़ की हत्या हो, पश्चिम बंगाल का उपद्रव हो, जेएनयू का राष्ट्रविरोधी प्रदर्शन और छात्रों की गिरफ़्तारी हो, हरियाणा का आरक्षण उत्पात हो या फिर महिलाओं का मंदिरों में प्रवेश, देव-पूजन करने को लेकर किया गया हंगामा हो सभी में विपक्ष की भूमिका खुलकर सामने आई है. केंद्र में भाजपा सरकार के आते ही जिस तरह से देश में उथल-पुथल का माहौल बना या फिर बना दिया गया वो महज माहौल मात्र नहीं है बल्कि इसके पीछे एक सोची-समझी साजिश काम कर रही है. सरकार गठन के तुरंत बाद से ही नरेन्द्र मोदी की कट्टर हिंदुत्व-विचार वाली तस्वीर धूमिल होना शुरू हो गई. महात्मा गाँधी के जन्मदिन से ही स्वच्छता अभियान का आरम्भ करके जहाँ उन्होंने सरकार के गाँधी-विरोधी होने की छवि को तोड़ा वहीं अम्बेडकर के नाम रहने तक आरक्षण लागू रहने की बात कहकर उन्होंने दलितों, अल्पसंख्यकों के मन में भी विश्वास जमाया. इसी के साथ-साथ अनेकानेक योजनाओं के द्वारा उस युवा शक्ति के दिल में भी अपनी जगह बनाई, जिसे नरेन्द्र मोदी के विरोध में अनर्गल प्रचार कर भरमाया गया था. 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली से; अल्पसंख्यकों, दलितों आदि के लिए सकारात्मक नीतियाँ बनाये जाने से; सरदार पटेल के साथ-साथ गाँधी, अम्बेडकर के समर्थन में बात करने से; लगातार युवा शक्ति के आदर्शरूप में उभरते जाने से; वैदेशिक यात्राओं के चलते सशक्त होते जा रहे विदेशी संबंधों के कारण से विपक्षी दलों में खलबली मची हुई है. जाति, धर्म, आरक्षण, विकास, युवाओं आदि के नाम पर चलती-सजती अपनी राजनैतिक जमीन इन दलों को दरकती नजर आने लगी. कहीं  न कहीं इनके द्वारा अपने अस्तित्व पर खतरा महसूस किया जाने लगा. सरकार-विरोधी ताकतों ने एक-एक करके उन सभी बिन्दुओं पर चोट करने का प्रयास किया जो कदम-दर-कदम नरेन्द्र मोदी की ताकत बनते जा रहे थे या कहें कि उनकी विध्वंसका छवि को तोड़ने का कार्य कर रहे थे. अख़लाक़ की घटना से मुस्लिम समुदाय को, रोहित बेमुल्ला की आत्महत्या से दलित वर्ग को, जेएनयू प्रकरण से युवा शक्ति को, हरियाणा आरक्षण की आग से आरक्षण समर्थकों को केंद्र सरकार के विरोध में, नरेन्द्र मोदी के विरोध में करने की मानसिकता से कार्य किया गया. सोचने का बिंदु ये है कि आतंकी अफ़ज़ल की फाँसी का विरोध उसी समय जेएनयू के छात्रों ने क्यों नहीं किया था? उसको शहीद घोषित करने जैसा, देश-विरोधी प्रदर्शन करने का वक्त पिछली सरकार में क्यों नहीं किया गया था?

अब जबकि ताजातरीन हरियाणा के आरक्षण उपद्रव में कांग्रेस के हाथ होने का स्पष्ट संकेत मिल चुका है, तब देश के विभिन्न भागों में उपद्रव के, उत्पात के खेल में किसी न किसी रूप में विपक्ष की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है. वर्तमान में समस्त विपक्षी दलों का एकमात्र एजेंडा सरकार को कार्य न करने देना है; प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बनती सशक्त अंतर्राष्ट्रीय छवि को धूमिल करना है. यहाँ तमाम विपक्षी दलों को इसका भान होना चाहिए कि उनकी हरकतों से, ऐसी मानसिकता से, मोदी-विरोध के चलते किसी भी हद तक चले जाने की प्रवृत्ति से, अनर्गल बयानबाज़ी करके, देश-विरोधी प्रदर्शनों का समर्थन करके वे केंद्र सरकार को नहीं, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को नहीं वरन देश की संप्रभुता, अखंडता, एकता, सुरक्षा को अस्थिर करने में, कमजोर करने में लगे हैं. विपक्षी दलों द्वारा कट्टरपंथी ताकतों को, देश-विरोधी ताकतों को, फिरकापरस्त ताकतों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन आज दिया जा रहा है वो कल को न केवल उनके लिए वरन इस देश के लिए भी नासूर बन जायेगा. समझना होगा कहीं सरकार विरोध के नाम पर ये विपक्षी दल देश में कट्टर आतंकवाद की, समाज विखंडित करने वालों की जड़ों को तो मजबूत नहीं कर रहे हैं?