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31 मई 2026

आवश्यकता नीयत सुधारने की है

देश की सुरक्षा के लिए तत्पर रहने वाली वायु सेना को अब परीक्षार्थियों के भविष्य को सुरक्षित रखने का जिम्मा भी सौंपा गया है. नीट परीक्षा प्रश्न-पत्र के लीक हो जाने के बाद पुनः आयोजित होने वाली नीट परीक्षा को पूर्णतः सुरक्षित बनाने के लिए सरकार भारतीय वायु सेना की मदद लेने पर विचार कर रही है. इस बार परीक्षा प्रश्नपत्रों को सामान्य परिवहन के स्थान पर वायु सेना के विमानों से केन्द्रों तक सुरक्षित ढंग से एयरलिफ्ट करने का प्रस्ताव रखा गया है. इसे कुछ लोग भले ही परीक्षा के प्रति गम्भीरता के रूप में देखें किन्तु प्रथम दृष्टया यह हास्यास्पद प्रस्ताव ही कहा जाना चाहिए. समूची प्रशासनिक व्यवस्था, सरकारी तंत्र, नागरिकों के लिए यह एक तरह का शर्मनाक बिन्दु है जबकि देश की सुरक्षा करने वाली सेना अब परीक्षा प्रश्नपत्रों को इधर-उधर ले जाने का काम करेगी.

 

पिछले कुछ वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं के, शिक्षा सम्बन्धी प्रवेश परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों का सार्वजनिक हो जाना, उनकी गोपनीयता उजागर हो जाना एक आम चलन के रूप में उभर कर सामने आया है. किसी संक्रामक बीमारी की तरह यह एक परीक्षा से होते हुए दूसरी परीक्षा के लिए, एक राज्य से दूसरे राज्य के लिए बढ़ती दिखने लगी है. परीक्षा प्रश्नपत्रों को सार्वजनिक करने का कार्य दो-चार व्यक्तियों द्वारा नहीं होता है बल्कि इसके पीछे एक तरह का सिंडिकेट काम करता है. भले ही किसी परीक्षा प्रश्नपत्र के सार्वजनिक होने की घटना को प्रशासनिक व्यवस्था की नाकामी कहा जाये मगर सोचने वाली बात ये है कि क्या इस तरह के काम बिना किसी संरक्षण के संभव हो सकते हैं? प्रश्नपत्रों के बनने से लेकर उनके प्रकाशन तक, उनको व्यवस्थित करने से लेकर परीक्षा केन्द्रों तक पहुँचाने तक का कार्य नितांत गोपनीयता के साथ पूरा किया जाता है. ऐसे में कैसे सम्भव है कि किसी बड़े रसूखदार के संरक्षण बिना प्रश्नपत्र बाजार में बिकते दिखाई देने लगें. प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर परीक्षा आयोजन तक की लम्बी प्रक्रिया में जरा सी चूक से परीक्षा आयोजित कराने वाली बड़ी-बड़ी एजेंसियों की गोपनीयता पर भले ही सवाल उठ रहे हों किन्तु ऐसा कार्य तंत्र के भीतर बैठे लोगों की सहायता के बिना हो ही नहीं सकता है. इस तरह के कृत्य करने वाले माफियाओं को विभिन्न प्रकार का राजनीतिक-प्रशासनिक संरक्षण मिलता है.

 



इस पूरे संकट के उभरने के बाद कुछ निश्चित से कदम उठाये जाने लगते हैं. व्यवस्थागत सुधार के बजाय राजनीतिक खेल शुरू हो जाता है. सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलने लगता है. विपक्ष इसे सरकार की नाकामी और भ्रष्टाचार बताता है तो सत्तापक्ष इसे विरोधियों की साजिश कहकर अपना पल्ला झाड़ लेता है. सत्तापक्ष इसके साथ-साथ धरपकड़ करने की अपनी कार्यवाहियों को भी अंजाम देता रहता है. चार-छह छोटी मछली कहे जाने वाले व्यक्ति गिरफ्तार कर लिए जाते हैं, पूछताछ का प्रक्रम शुरू हो जाता है और फिर सालों-साल चलने वाली कानूनी प्रक्रिया की आड़ में लोग असली मुद्दा ही भूल जाते हैं. इन सबके बीच राजनीतिक असंवेदनशीलता यह होती है कि ऐसे मामलों को चुनावी रैलियों में, भाषणों में अपने प्रचार का माध्यम बना लिया जाता है मगर इस समस्या के स्थायी समाधान पर कोई भी चर्चा नहीं करता है.

 

इस तरह के घटनाक्रमों में यदि सबसे ज्यादा नुकसान में कोई रहता है तो वह आम परीक्षार्थी होता है, उसका परिवार होता है. दिन-रात की तैयारी के बाद पेपर लीक होना, पुनः पेपर देने के दौरान आशंकित बने रहना परीक्षार्थियों के भविष्य को भी धुंधलके में रखता है. एक आम परिवार अपने बच्चे को पढ़ाने के लिए अपना पेट काटकर उसे तैयारी करवाता है. कई परिवार तो अपनी जमीन गिरवी रख कर्ज लेते हैं. प्रश्नपत्र सार्वजनिक होने के कारण परीक्षा रद्द होने का अर्थ समय की बर्बादी मात्र नहीं बल्कि परिवार पर आर्थिक और मानसिक बोझ का पड़ना होता है. अनेक परीक्षार्थी मानसिक तनाव में आत्मघाती कदम तक उठा लेते हैं. आज इक्कीसवीं सदी में पहुँच जाने के बाद भी, तकनीक के लगातार विकास करने के बाद भी, उपग्रहों के द्वारा पल-पल की खबर रखने के बाद भी आज के युवाओं को सुरक्षित और पारदर्शी माहौल देने में नाकामी हाथ लग रही है.

 

तकनीक के इस दौर में किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र सुरक्षित न रख पाना हमारी तकनीकी और प्रशासनिक तंत्र  की बड़ी विफलता तो है ही साथ ही नागरिक अनुशासन की भी असफलता है. सोचने वाली बात ये है कि प्रश्नपत्र सार्वजनिक करने वाला सिंडिकेट ऐसा काम किसके लिए करता है? क्या ऐसा काम किसी राजनेता को चुनाव जिताने के लिए किया जाता है? क्या प्रश्नपत्र लीक किये जाने के पश्चात् अर्थव्यवस्था में तेजी आ जाती है? क्या इससे विदेश-नीति में किसी तरह का लाभ हो जाता है? प्रश्नपत्र सार्वजनिक करके का कार्य उन्हीं परीक्षार्थियों के लिए किया जाता है जिनको परीक्षा देनी होती है. प्रश्नपत्र भी उन्हीं के हिस्से में आता है जिनके अभिभावकों द्वारा भारी-भरकम धनराशि सम्बंधित सिंडिकेट तक पहुँचाई गई होती है. ऐसे में यदि राजनीतिक, प्रशासनिक व्यवस्था को दोषी माना जाता है तो नागरिकों को भी पूर्णतः दोष-मुक्त नहीं रखा जा सकता है. ऐसे में बाहरी आवरण को मजबूत और तकनीकयुक्त बनाने से कहीं ज्यादा कारगर होगा तंत्र के भीतर की व्यवस्था को मजबूत करना, उस पर सशक्त-सजग निगाह रखना. देखा जाये तो जितनी बड़ी समस्या परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों के सार्वजनिक होने की है, परीक्षाओं की गोपनीयता भंग होने की है उससे बड़ी समस्या उस नीयत की कमी का होना है जो भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करना चाहती है. राजनीतिक, प्रशासनिक, सामाजिक रूप से कहीं से भी अब जिम्मेदारी भरा ऐसा प्रयास नहीं दिखता जो भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करना चाहता हो.

 

अब केवल कड़े बयानों, कुछ छोटी-छोटी गिरफ्तारियों से काम नहीं चलने वाला. अब राजनैतिक-प्रशासनिक-सामाजिक तंत्र में बैठे ऐसे लोगों को चिन्हित किये जाने की, कड़ी सजा देने की आवश्यकता है जो परीक्षाओं की गोपनीयता के साथ-साथ परीक्षार्थियों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं.


30 मई 2026

शांत दिमाग से सोचना और विचार करना

शांत दिमाग से सोचना और विचार करना....

 

क्या कभी आपके घर कोई डॉक्टर आया, जिसने कहा हो कि आपके घर में कोई गर्भवती महिला है, जिसका अल्ट्रासाउंड करके वो बता देगा कि गर्भ में लड़का है या लड़की?

 

क्या कभी आपके घर में किसी परीक्षा से सबंधित कोई कर्मचारी आया है जिसने कहा हो कि सम्बंधित परीक्षा का पेपर इतने रुपये में मिल रहा है?

 

क्या आपके घर कभी यूनिवर्सिटी से कोई व्यक्ति आया है जिसने कहा हो कि वो आपकी संतानों के नंबर बढ़वा देगा?

 

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पिछले दो दशकों से अधिक के अध्यापन अनुभव में एक बात स्पष्ट रूप से देखने को मिली कि लगभग हर साल कुछ न कुछ अभिभावक आते हैं अपने बच्चों की सिफारिश लेकर. कुछ परीक्षा के दौरान ही 'कुछ देख लेने' का इरादा लेकर आते हैं; कुछ आते हैं जो परीक्षाओं बाद 'कुछ हो सकता है क्या?' के विचार के साथ आते हैं; कुछ वायवा-प्रैक्टिकल के समय अपने मंतव्य के साथ आते हैं.  ठीक ऐसी ही स्थिति प्रतियोगी परीक्षाओं के दौरान भी देखने को मिलती है. परीक्षा तिथि के पहले ही सब सेट कर लेने की मानसिकता में अभिभावक भटकने लगते हैं. लाखों रुपये में जो पेपर बेचे जा रहे हैं, उनके सन्दर्भ में विचार करिए कि कितने परीक्षार्थी सीधे तौर पर लाखों रुपये का सौदा करते हैं? बहुतायत के अभिभावक ही सामने आते हैं.

 

किसी भी सरकार को, किसी भी व्यवस्था को दोष देने के पहले हम सबको अपने ही गिरेबान में झाँकना चाहिए. कोई सीधे हमारे पास नहीं आता, हम भी भ्रष्ट बनने को आतुर रहते हैं और उस तरफ जाते हैं. सिस्टम में लगे लोगों को न इस व्यवस्था से मतलब होता है और न ही किसी परीक्षार्थी के भविष्य से. वे भौतिकतावाद के बाजार में उत्पाद लेकर खड़े हैं, जहाँ अभिभावक ग्राहक  के रूप में उपलब्ध हैं. कल को यही ग्राहक समाप्त हो जाएँ तो ये भ्रष्ट व्यवस्था किसे अपने पेपर बेचेगी? यहाँ वही बात सामने आती है कि हम सब चाहते हैं कि क्रांति हो, आन्दोलन हो, व्यवस्था बदले किन्तु इनके लिए कोई शहीद, कोई बलिदानी पैदा हो तो पड़ोस में हो. हमारी संतान कुछ बने, कहीं से उच्च शिक्षा ले मगर व्यवस्था बदलने के लिए, भ्रष्टाचार रोकने के लिए कोई संतान आगे बढे तो वो पड़ोस की हो.

 

अपनी सोच बदलिए साहब, बिना सोच बदले आप बस अपने मन की भड़ास निकालते रहेंगे और अगले ही पल अवसर मिलते ही अपने बच्चे के लिए गुहार लगायेंगे 'कुछ हो सकता है क्या?'


22 मार्च 2024

राजनैतिक गलियारे के व्यवस्था परिवर्तक

आखिरकार कई-कई समन को अस्वीकार करने वाले अरविन्द केजरीवाल को ईडी ने अपने चंगुल में ले ही लिया. आबकारी नीति मामले में दिल्ली के मुख्यमंत्री को गिरफ्तार कर लिया गया. आम आदमी पार्टी के इससे पहले कई जनप्रतिनिधि जेल में हैं. मनीष सिसौदिया, संजय सिंह, सतेन्द्र जैन आदि पहले से गिरफ्तार होकर जेल में हैं. अब अरविन्द केजरीवाल गिरफ्तार कर लिए गए हैं और छह दिन की रिमांड पर हैं. संभव है कि वे भी अपने साथियों के बीच जल्द ही दिखाई देंगे. 


अरविन्द केजरीवाल की गिरफ़्तारी ने भी एक तरह का अलग रिकॉर्ड बना दिया है. देश में यह पहला मामला है जबकि किसी मुख्यमंत्री को उसके पद पर रहते हुए गिरफ्तार किया गया है. यहाँ उनकी गिरफ़्तारी से सम्बंधित सवाल-जवाब अथवा विमर्श की तरफ इस पोस्ट को कतई नहीं ले जाना है. आज इस विषय पर पोस्ट लिखने का सन्दर्भ महज इतना है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध शुरू हुए आन्दोलन से, लोकपाल को लाने के संकल्प के साथ जन्मे एक दल ने और उसके नेताओं ने आम आदमी के विश्वास को न केवल तोडा है बल्कि घनघोर तरीके से चकनाचूर भी कर दिया है.




अन्ना आन्दोलन के दौरान जिस तरह से इन नेताओं द्वारा बड़ी-बड़ी बातें की गईं, खुद को ईमानदारी का एकमात्र प्रतिनिधि बताया गया, दूसरे दलों के नेताओं के सैकड़ों-सैकड़ों कागजों में भ्रष्टाचार के सबूत दिखाए गए, खुद को राजनीति की, सत्ता की चकाचौंध से बाहर रखने के जुमले फेंके गए, बच्चों तक की कसमें खाई गईं और अंततः सबके सब ही एक ही रंग में रँगे नजर आये. दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री के खिलाफ खुले मंचों से लहराए जाने वाले कागजात सत्ता में आने के बाद न जाने कहाँ गायब हो गए? जिस कांग्रेस के खिलाफ पूरा आन्दोलन चलाया गया, उसी के साथ मिलकर सरकार बनाई गई. इसके बाद भी इन सबका खुद को व्यवस्था बदलने वाला, नई तरह की राजनीति करने का ढोल पीटना बंद नहीं किया गया.


जो सारे कार्य इन लोगों ने अपने लिए निषिद्ध मान रखे थे, कह रखे थे, वे सारे के सारे अपनाए गए. आम जनमानस को इससे समस्या पैदा होने वाली नहीं थी और न है. आखिर राजनीति के गलियारों में यह कोई नई या अनोखी बात नहीं है. कोई भी दल हो आज बात भले सिद्धांतों की, शुचिता की, ईमानदारी की करता हो मगर काम स्वार्थपरक ही करेगा, सत्तालोलुप रहेगा. आम आदमी पार्टी के कृत्यों से, इनके नेताओं के रंग बदलने से नकारात्मक प्रभाव उन छोटे-छोटे सामाजिक संगठनों पर पड़ा जो वाकई में छोटे से क्षेत्र में ईमानदारी से, कुशलता के साथ कार्य कर रहे थे. आम आदमी पार्टी के कृत्यों से सबसे निचले स्तर के व्यक्ति की ईमानदारी, शुचिता पर, उसके कार्यों पर संदेह किया जाने लगा है. आम जनमानस में एक धारणा गहरे तक बैठ गई कि किसी भी रूप में समाज से भ्रष्टाचार को दूर नहीं किया जा सकता है. कोई कितना भी आन्दोलन करे, कसमें खाए, खुद को ईमानदार बताता घूमे लेकिन यह सब सिर्फ और सिर्फ सत्ता प्राप्ति के लिए, स्वार्थ-पूर्ति के लिए ही किया जाता है.


आन्दोलन से लेकर अद्यतन इनके कृत्यों को देखने के बाद बचपन में किसी कक्षा में पढ़ी डाकू खड्ग सिंह और बाबा भारती की कहानी याद आ गई. 





 

03 फ़रवरी 2024

सैन्य हाथों में पाकिस्तानी लोकतंत्र

भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान में इसी आठ फरवरी को आम चुनाव होने हैं. इमरान खान जेल में बंद होने के कारण भले ही चुनाव मैदान से बाहर हैं मगर चुनावी लड़ाई उनके और नवाज़ शरीफ़ के बीच ही है. वैश्विक स्तर पर अनेक देशों की नजरें इस चुनाव पर लगी हैं. अमेरिका के विदेश विभाग ने बयान जारी करते हुए कहा है कि वे पाकिस्तान में अभिव्यक्ति की आजादी, विधायी अधिकारों के उल्लंघन को लेकर चिंतित हैं. पाकिस्तानी जनता को अपने मौलिक अधिकारों का इस्तेमाल कर भविष्य के नेता को चुनने का अधिकार होना चाहिए. यह बयान ऐसे समय में आया है जबकि पाकिस्तानी सेना पर आरोप लगाया जा रहा है कि वह पाकिस्तानी लोकतंत्र को निरंकुश तरीके से प्रभावित कर रही है. पाकिस्तान की एक वरिष्ठ पत्रकार मलीहा लोधी, जो राजनयिक भी रह चुकी हैं, ने एक रिपोर्ट में लिखा है कि पाकिस्तान के वर्तमान सैन्य प्रतिष्ठान का मुख्य ध्येय यह सुनिश्चित करना है कि इमरान खान प्रधानमंत्री न बनने पाएँ. इसी तरह की बात अमेरिकी समाचार-पत्र द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में है. उसका कहना है कि पाकिस्तान में राजनेताओं पर हो रही कार्रवाई साफ दिखाई दे रही है और इन्हीं वजहों से पाकिस्तान के चुनाव की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में है. पाकिस्तानी सेना का चुनाव में दखल है और पीटीआई के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है.

 



किसी न किसी रूप में सेना के नियंत्रण में चलता 2024 का चुनाव वैसा ही नजर आ रहा है जैसा कि 2018 का आम चुनाव था, बस राजनीतिज्ञों की स्थिति बदल गई है. 2018 का चुनाव नवाज़ शरीफ़ के बगैर हुआ था और 2024 का चुनाव इमरान खान के बिना हो रहा है. उस चुनाव में नवाज़ शरीफ़ भ्रष्टाचार के मामले में सजा मिलने के कारण जेल में थे और चुनाव नहीं लड़ सके थे. इस बार ऐसी स्थिति में इमरान खान हैं. उनको और उनकी पत्नी भ्रष्टाचार के एक मामले में चौदह साल की सजा मिलने पर जेल में हैं. इसी तरह सरकारी गुप्त भेद जाहिर करने के एक अन्य मामले में इमरान खान को पहले ही दस वर्ष की कैद सुनाई जा चुकी है. ऐसा आरोप लगातार लगता रहा है कि 2018 में नवाज़ शरीफ़ के और अब 2024 में इमरान खान के जेल जाने में पाकिस्तानी सेना का हाथ रहा है. 1999 में नवाज़ शरीफ़ के कार्यकाल में सैन्य तख़्तापलट हुआ था. उनके तीसरे कार्यकाल, वर्ष 2013 में भी उनके और सेना के बीच मतभेद खुलकर सामने आये थे, जिसके परिणामस्वरूप नवाज़ शरीफ़ सत्ता से बाहर हो गए थे. अभी कुछ महीने पहले ही उनको सभी आरोपों से बरी कर दिया गया और उनके चुनाव लड़ने पर लगी आजीवन रोक को भी असंवैधानिक बताया गया.

 

कुछ इसी तरह की कहानी इमरान खान की भी है. 2018 में उनकी छवि पाकिस्तान का भविष्य बदलने वाले नेता के रूप में बन रही थी. इमरान खान अपने भाषणों में वंशवाद की राजनीति को ख़त्म करने, भ्रष्ट नेताओं को जेल में डालने, न्यायपालिका में बदलाव करने और युवाओं को नौकरी देने की बात कर रहे थे. उस समय उनके विरोधियों द्वारा आरोप लगाया जा रहा था कि वे सेना के हाथों की कठपुतली बने हुए है. ऐसा माना भी जाता है कि सेना के प्रभाव और हस्तक्षेप के चलते इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन सके थे. कालांतर में इमरान के कार्यकाल में पाकिस्तान में आर्थिक हालात ख़राब हुए, मँहगाई बढ़ी, दैनिक उपभोग की वस्तुओं की कमी होने लगी, मीडिया पर पाबंदी लगाई गई, कई विपक्षी नेता जेल भेजे गए. इन घटनाओं ने जहाँ इमरान खान की लोकप्रियता में कमी की वहीं सेना के साथ भी उनके सम्बन्धों में कड़वाहट पैदा की.

 

नवम्बर 2022 में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा द्वारा अपने चहेते लेफ्टिनेंट जनरल असीम मुनीर को नया सेनाध्यक्ष बनवाया गया. नए सेनाध्यक्ष का पद सँभालने के बाद जनरल मुनीर ने लगातार यही प्रयास किया कि सबसे पहले उन व्यक्तियों पर कार्यवाही का चाबुक चलाया जाए जो किसी भी रूप में इमरान खान का नज़दीकी रहा हो अथवा उनकी सरकार का सक्रिय मददगार रहा हो. इसके पीछे इमरान खान और जनरल मुनीर के बीच की व्यक्तिगत दुश्मनी मानी जा रही है. ऐसा इसलिए क्योंकि प्रधानमंत्री रहते हुए इमरान खान ने ही अड़ंगा लगाते हुए मुनीर की नियुक्ति आईएसआई महानिदेशक के रूप में नहीं होने दी थी. इसका बदला मुनीर ने इस रूप में लिया कि इमरान खान को हटाये जाने के बाद वे पहले आईएसआई मुखिया बने उसके बाद सेनाध्यक्ष भी बने. व्यक्तिगत खुन्नस के चलते ही इमरान खान अनेक मुक़दमे झेलते हुए जेल में बंद हैं.

 

यह पाकिस्तानी लोकतंत्र की विडम्बना है कि वहाँ की राजनीति, सत्ता कभी भी सेना से मुक्त होकर अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं बना सकी है. इन चुनावों में वहाँ की आंतरिक समस्याओं, राजनीतिक पार्टियों के अपने विरोधाभासों के कारण भले ही भारत विरोधी बयान सामने न आये हों; भले ही इमरान खान ने प्रधानमंत्री के रूप में कई बार भारत के साथ बातचीत से मुद्दे सुलझाने पर जोर दिया; भले ही नवाज़ शरीफ़ भारत के साथ अच्छे सम्बन्ध बनाने का वादा करते आये हैं मगर अंतिम कदम वहाँ की सेना के मंशानुरूप ही उठाना पड़ता है. ऐसे में पाकिस्तान के इन चुनावों में परिणाम कुछ भी रहें, सत्ता में कोई भी पार्टी आये, प्रधानमंत्री कोई भी बने मगर भारत के साथ सम्बन्ध वही चिर-परिचित रूप में ही रहेंगे क्योंकि जनरल मुनीर की मानसिकता भारत से इत्तेफाक रखने वाली नहीं है. 





 

07 जुलाई 2023

डिवाइडर का खेल

विगत कई वर्षों से उरई नगर पालिका की राजनीति में उतार-चढ़ाव जैसी स्थिति बनी रही. न तो राजनैतिक दल समझ सके कि ये हो क्या रहा है और न ही मतदाताओं की समझ में आया कि वे करते क्या हैं? मतदाताओं ने मूड बनाया तो किसी एक दल को जिता दिया और अगली ही बार दूसरे दल के हाथ में अध्यक्ष पद को सौंप दिया. नामांकन, मतदान से लेकर मतगणना तक के शोर-शराबे के बाद मतदाता एक आवाज़ नहीं उठाते कि क्या सही हो रहा, क्या गलत हो रहा.




वर्तमान नगर पालिका अध्यक्ष के कार्यकाल को शुरू हुए अभी एक-दो महीने ही बीते हैं कि उठापटक शुरू हो गई है. पिछले अध्यक्ष द्वारा शहर की बहुत सी सड़कों पर डिवाइडर का निर्माण करवाया गया था. इन सड़कों में विशेष रूप से कालपी रोड था, जहाँ पहले तो अपनी मनमर्जी से सड़क पर गड्ढे खुदवा कर डिवाइडर बनवाने का विचार था. बाद में ऊपर से हथौड़ा चला तो अध्यक्ष जी अपना हथौड़ा भूल गए. बावजूद इसके न्यायालय को छोड़कर शेष सड़क पर डिवाइडर का निर्माण करवा दिया गया. आज देखने को मिला कि वे सारे के सारे डिवाइडर उखड़े पड़े हुए हैं. सड़क के किनारे टूटे-उखाड़े हुए डिवाइडर का पड़ा होना अपने आपमें कहानी है.


इस समय शहर में सुन्दरीकरण के नाम पर तोड़-फोड़ मची हुई है. कहीं प्रशासन द्वारा पिछले बजट को ठिकाने लगाया जा रहा है, कहीं वर्तमान नगर पालिका अध्यक्ष द्वारा नए बजट की जुगाड़ की जा रही है. इस पूरे प्रकरण में, पूरी प्रक्रिया में कोई नहीं पूछ रहा कि आखिर बने-बनाए उचित निर्माण को क्यों तोड़ा जा रहा है? यदि इन्हीं डिवाइडर की बात करें तो कहीं से कोई सवाल नहीं उछला कि ये क्यों तोड़े जा रहे? यदि पिछले अध्यक्ष द्वारा बनवाए गए डिवाइडर गलत थे तो तत्कालीन जिलाधिकारी अथवा उच्चाधिकारियों ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? इसका अर्थ यही लगाया जाये कि उनका निर्माण सही था. यदि निर्माण सही था तो अब तोड़े जाने का किसी उच्चाधिकारी द्वारा विरोध क्यों नहीं किया गया? क्या माना जाये कि बजट को ठिकाने लगाने में ऊपर से नीचे तक सब मिले हुए हैं?




वैसे देखा जाये तो उरई में डिवाइडर का खेल कोई नया नहीं है. सबसे पहले लोहे के डिवाइडर लाये गए थे, जो अस्थायी थे और उनको उपयोगिता के अनुसार कहीं भी लगाया जा सकता था. सैकड़ों की संख्या में बने वे डिवाइडर कब कबाड़ में बदल गए पता ही नहीं चला. उनकी जगह पत्थर के डिवाइडर बनवाए गए, जो छोटे-छोटे हिस्सों में थे. वे भी लोहे वालों की तरह की टूट-फूट का शिकार होते हुए कबाड़ का हिस्सा बनते रहे. अभी कुछ पत्थर के डिवाइडर कोंच रोड पर अंतिम साँसें भरते देखे जा सकते हैं. लोहे के बने डिवाइडर में से कुछ अपनी अंतिम साँसें गिनते हुए कभी मेडिकल पर, कभी किसी चौराहे पर अपने अस्तित्व को दिखाते मिल जाते हैं.




बहरहाल, नगर पालिका अध्यक्ष हों या फिर प्रशासनिक उच्चाधिकारी, सभी अपने आपमें प्रशासन हैं. इसलिए जो हो रहा वो सही. हम जैसे लोग तो वैसे भी अडंगा लगाने वाले, उँगली करने वाले कहे जाते हैं. आगे भी कहे जाते रहेंगे मगर खामोश नहीं बैठेंगे.

 






 

31 दिसंबर 2022

भ्रष्टाचार रोकने को सभी हो जाएँ भ्रष्ट

हम सभी लगभग रोज ही भ्रष्टाचार की बातें करते हैं, उसके समाप्त होने की कामना भी करते हैं मगर भ्रष्टाचार है कि समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा है. यह विडम्बना ही है कि जिसके खात्मे के लिए लगातार प्रयास हो रहे हैं वह बजाय समाप्त होने के और भी तेजी से बढ़ रहा है. आखिर ऐसी क्या बात है कि समाज से भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं किया जा पा रहा है?


बहुत ज्यादा बड़ी-बड़ी बातें, बड़े-बड़े प्रयास करने के बजाय यदि एक छोटे रूप में इस तरफ काम करने का प्रयास किया जाये तो शायद बात बने. कहने को तो बात बहुत अजीब लगे, बहुतों को तो हास्यास्पद भी लग सकती है मगर यदि इसे वैज्ञानिक रूप से देखा जाये तो यह बात सत्य हो सकती है. समाज से भ्रष्टाचार समाप्त होने के मात्र दो ही तरीके हैं. पहला तो यह कि समाज में सभी लोग ईमानदार हो जाएँ, भ्रष्टाचार-रहित व्यवहार करने लगें. दूसरा यह कि समाज के सभी लोग ही भ्रष्ट हो जाएँ, भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाएँ. पहला कदम बहुत कठिन समझ आता है मगर दूसरा कदम उठाया जाना सरल भले न हो पर सबके हाथ में है.




इस कदम में लोगों को भले यहीं से हास्यास्पद स्थिति दिखाई पड़े मगर अंतिम सच यही है. इसे विज्ञान की दृष्टि से देखने की जरूरत है. यदि दो बर्तन में, जो आपस में एक नली के द्वारा जुड़े हुए हैं, कोई द्रव भरा हुआ है. एक बर्तन में कम द्रव है, दूसरे में ज्यादा द्रव है. ऐसे में जाहिर है कि जिस बर्तन में ज्यादा द्रव है, उससे कम मात्रा वाले द्रव बर्तन की तरफ प्रवाह बनेगा. यह प्रवाह तब तक बना रहेगा जब तक कि कम मात्रा में द्रव वाला बर्तन भर न जाये. जब दोनों बर्तनों में द्रव की समान मात्रा हो जाएगी तो द्रव का प्रवाह रुक जायेगा. भ्रष्टाचार के मामले में भी ऐसा होने की आवश्यकता है.


अभी हो ये रहा है कि जो व्यक्ति भ्रष्ट है, वह अपनी कमाई को बढ़ाता जा रहा है. जिस मात्रा में उसकी आमदनी बढ़ रही है, उसी मात्रा में उसके खर्च नहीं हो रहे हैं. उस भ्रष्ट व्यक्ति को बहुत सी जगहों पर बिना किसी भ्रष्टाचार के लाभ मिल रहा है. उदाहरण के लिए मान लीजिये कि सब्जी मंडी में सभी सब्जी वाले सब्जी को सही दाम पर देने की बात करें मगर देने के बदले हजारों रुपये रिश्वत के माँगें, ऑटो वाला, रिक्शे वाला किसी सवारी को उचित किराये पर भले ले जाये मगर आवागमन हेतु हजारों रुपये रिश्वत में माँगे, ऐसे अनेक उदाहरण हो सकते हैं. जब समाज में ऐसी स्थिति बन जाएगी कि भ्रष्ट व्यक्ति को छोटे से छोटा काम करवाने में, बड़े से बड़ी सहायता लेने में भ्रष्टाचार से कमाया रुपया गँवाना पड़ेगा तो संभव है कि भ्रष्टाचार का प्रवाह रुके.


देखने, कहने में ये बात अतार्किक भले लगे मगर इसे विज्ञान की दृष्टि से देखने, समझने की आवश्यकता है. सोचियेगा, इस बारे में, यह भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाला कदम नहीं बल्कि उसके एकतरफा प्रवाह को रोकने का कदम समझ आएगा. 






 

25 अप्रैल 2019

राजनीति को स्वच्छ करना है तो जागना होगा


आजकल लोगों की समझ में नहीं आ रहा है कि क्या किया जाये और क्या न किया जाये? यह स्थिति किसी आम आदमी की अकेले नहीं है, यह समस्या हर वर्ग के साथ है। जो सम्पन्न हैं उनके साथ समस्या है कि अपनी सम्पन्नता को और कैसे बढ़ाया जाये। कैसे अपनी सम्पन्नता और वैभव के दम पर चारों ओर अपनी हनक को जमाया जाये। किस तरह अपनी इस हनक के सहारे से सत्ता को प्राप्त किया जाये। इसी तरह जो सम्पन्न नहीं हैं और सम्पन्नता को पाना चाहते हैं वे भी कोई न कोई जुगत भिड़ाने में लगे रहते हैं। रोजी-रोटी की जुगाड़ में लगे रहते हैं। सम्पन्नता और अभाव से अलग एक और वर्ग है जिसे पिछले कुछ समय से देश में सर्वाधिक रूप से प्रतिष्ठित किया गया है। इस वर्ग में राजनीतिक लोगों को रखा जा सकता है, ऐसे राजनीतिज्ञों को जो किसी न किसी रूप से सत्ता के आसपास मंडराते रहते हैं। यह वह वर्ग है जो किसी न किसी रूप से सत्ता का दुरुपयोग करके स्वार्थ पूर्ति में लगा रहता है। यही वह वर्ग है जो देशहित की बात बड़े-बड़े मंचों से करता है किन्तु मौका आने पर देश विरोधी कार्यों में संलिप्त हो जाता है। ऐसे वर्ग के लिए किसी उदाहरण की आवश्यकता नहीं है।


भ्रष्टाचार और घोटालों की दुनिया में किससे साफगोई की उम्मीद की जाये। एक अपने कॉलर को खड़ा करके दूसरे को दोष देना शुरू करता ही है कि अगले ही क्षण उसके कॉलर में भी कालिख दिखनी शुरू हो जाती है। कालिख को पोते एकदूसरे को गाली देने, दोष लगाने के बीच देश के आम आदमी का कितना धन बर्बाद हो रहा है इस बात की कोई फिक्र किसी को भी नहीं रही। राजनीतिक केंद्र के चारों तरफ घूमा-फिरी करने वाला ऐसा वर्ग खुद किसी न किसी तरह इसी केंद्र में शामिल होना चाहता है। उसके लिए राजनीति करना देशहित के लिए नहीं, नागरिकों के लिए, जनता के लिए नहीं, समाजहित के लिए नहीं वरन राजनीति के द्वारा मिलने वाले लाभों की प्राप्ति के लिए है। इसके लिए वह कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहता है। यही कुछ कर गुजरने की स्थिति ही राजनीति में नकारात्मकता पैदा कर रही है। जिनका किसी भी रूप में सामाजिक कार्यों से लेना-देना नहीं है वे खुद को वरिष्ठ समाजसेवी बताते हुए राजनीति में घुसने का रास्ता तलाशते हैं। इसी रास्ते के द्वारा वे कालांतर में अपना उल्लू सीधा करने की जुगाड़ में लग जाते हैं। 

राजनीति में निरन्तर आ रही गिरावट का कारण राजनीति नहीं वरन उसमें शामिल होने वाले लोग हैं। इनके कुकृत्य ही राजनीति को कलंकित कर रहे हैं। राजनीति में से यदि धन को निकाल दिया जाये तो संभव है कि राजनीति में वह संख्या आधी से भी कम रह जाए जो आज राजनीति के नाम पर इधर-उधर से धन-उगाही करती घूमती है। इसके लिए सबसे पहले तो सांसद निधि, विधायक निधि को समाप्त किये जाने की आवश्यकता है। सोचना चाहिए कि ये जनप्रतिनिधि नीतियाँ बनाने के लिए हैं, नीति-निर्धारण के लिए हैं आखिर इनको कार्यों के संपादन के लिए क्यों लगाया जाता है? प्रशासन इसी कार्य के लिए पहले से दत्तचित्त होता है। विधायकों का, सांसदों का काम सदन में बैठकर नीतियां बनाना है साथ ही अपने क्षेत्र की जनता की समस्याओं को सुनकर उसके लिए लाभार्थ योजनाओं का निर्धारण करना है। इसके बजाय आज के जनप्रतिनिधि हैण्डपम्प, नालियां, सड़कें, खडंजा आदि के निर्माण के लिए निधियों की संस्तुति करते घूम रहे हैं। ऐसी स्थितियों के बीच वे लोग फायदा उठा ले जाते हैं जो राजनीति के नाम पर बस धन-उगाही में लगे हुए हैं।

राजनीति का स्तर, कलेवर अब बहुत बदला है। तकनीक ने, सोशल मीडिया ने किसी भी घटना को, किसी भी घटनाक्रम को एक व्यक्ति या एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहने दिया है। अब वह वैश्विक स्तर तक अपनी पहुँच बना चुकी है। ऐसे में यदि जनप्रतिनिधि और उनके आसपास डोलने वाले लोग अपने पर संयम न रखकर इसी तरह राजनीति करते रहेंगे तो आने वाले समय में ऐसे लोगों का ही जमावड़ा राजनीति में दिखाई देगा जो बस स्वार्थ-पूर्ति में यहाँ आये हुए हैं। ऐसे लोगों से किसी भी प्रकार से देशहित की उम्मीद नहीं की जा सकती है। स्पष्ट है कि तब भी बात को समझे बिना राजनीति को ही दोष दिया जायेगा, जैसे कि आज दिया जा रहा है।

09 दिसंबर 2018

भ्रष्ट बन रोको भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार भरे समाज में सभी लोग परेशान हैं कि देश में भ्रष्टाचार नहीं रुक रहा है. इसको रोकने के उपाय खोजे जा रहे हैं पर सबके सब नाकाम से दिखाई दे रहे हैं. नाकामी इसलिए भी है क्योंकि भ्रष्टाचार को लेकर, भ्रष्टाचार करने वालों को लेकर सवाल उठता है कि किसे भ्रष्ट कहेंगे और किसे नहीं? एक छोटा सा उदाहरण कि आपका कोई काम है और वह मात्र इस कारण से टल रहा है कि आपने उसको करने वाले को मात्र 500 रुपये नहीं दिये. अब आप परेशान हैं कि काम नहीं हो रहा है और दूसरे आपको टोकेगे कि आप बड़े मूर्ख हैं जो मात्र 500 रुपये में अपने काम को लटकाये पड़े हैं. इसी तरह कोई अपना बड़े से बड़ा काम भी कुछ पैसों की दम पर करवा लेता है तो ऐसे ताल ठोंकता है जैसे उसने बहुत बड़ा तीर मार लिया हो. वैसे आज के जमाने में पैसे देकर भी अपना काम करवा लेना तीर मारने से कम नहीं है. अब ऐसे में उसकी तारीफ हो रही है जो पैसे देकर काम करवा लाया और पैसे ने दे पाने के कारण काम रुकवाए व्यक्ति को बेवकूफ बताया जा रहा है. 


ऐसे में कोई भ्रष्टाचार को कहाँ और कैसे रोकेगा? कभी-कभी समाचार सुनने को मिलता है कि फलां व्यक्ति रिश्वत लेते पकड़ गया. इस पर एक पल को सभी की राय बनती है कि अपने अधिकारियों को नहीं खिला रहा होगा. आज हालत ये है कि पग-पग पर भ्रष्टाचार है. समस्या इसके समाप्त करने को लेकर है. इसके बाद भी देखा जाये तो हम लोग ही इसको रोकने के लिए काम नहीं कर रहे हैं. हमारा जहाँ जैसा हाथ चलता है हम भी भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाते हैं. भ्रष्टाचार-इसका सीधा सा तात्पर्य है कि भ्रष्ट आचरण करने वाला. हम छोटे स्तर पर सक्षम होते हैं तो वहाँ भ्रष्टाचार कर लेते हैं. रेलवे का साधारण श्रेणी का टिकट लिया और जा बैठे स्लीपर में, एसी में. अब टिकट चेकर के आने पर कुछ छोटी सा मुद्रा उसके हाथ में थमा दी, और आराम से पैर फैला कर यात्रा शुरू. क्या ये भ्रष्टाचार नहीं है?

भ्रष्टाचार को समाप्त करने में सबसे बड़ी बाधा है समाज के कुछ लोगों का पूरी तरह से भ्रष्ट न हो पाना. जी हाँ, आपको ये बात बड़ी अजीब लग रही होगी पर सत्य यही है. जब तक समाज में एक आदमी भी भ्रष्टाचार से मुक्त है तब तक भ्रष्टाचार को रोक पाना सम्भव नहीं. असल में यह एक प्रक्रिया है और इसमें सभी का शामिल होना जरूरी है. मान लीजिए कि सभी लोग भ्रष्ट हो गये हैं तब....? तब आपने कोई करवाने का कुछ पैसा लिया, अब आप किसी काम को करवाने गये और उसने भी पैसा लिया. वह अपने किसी काम से कहीं जाये और उसे भी पैसा देना पड़े. यह क्रम सभी के साथ चलता रहे. सब पैसा कमा भी पा रहे हैं किन्तु देना भी पड़ रहा है. कहीं कम कहीं ज्यादा, परिणामतः किसी के भ्रष्ट होने से मात्र उसे ही लाभ नहीं हो पा रहा है. इससे सम्भावना है कि भ्रष्टाचार रुके क्योंकि तब उसके द्वारा कमाया गया भ्रष्ट या ऊपरी धन भ्रष्टाचार में, ऊपरी धन के रूप में ही खर्च होए लगेगा.

वैसे भी यह सब आपसी सहमति का मामला बनता है तो इसे भी समलैंगिकता की तरह से कानूनी स्वरूप दे दिया जाये? आपसी सहमति! जब तक नहीं रुक रहा तब तक इसे भी राष्ट्रीय सम्पदा मान कर पोषित, पल्लवित करते रहिये. खुद भी नोंचिये और दूसरों को भी नोचते रहिये. साथ में बोलिये जय भ्रष्टाचार.

10 अक्टूबर 2018

धार्मिक रिश्वत

कई वर्ष हो गए थे जंगलों की, बीहड़ों की धूल फांकते हुए. ग्रामीण अंचलों में जीवन गुजारते हुए. सीधा-साधा सा जीवन, साधारण से शौक, सामान्य सा रहन-सहन. न कभी कोई तड़क-भड़क पसंद की, न कभी अपनाई. अध्यापन कार्य से जुड़े थे तो पूरी ईमानदारी, मर्यादा से अपने दायित्वों का, कार्य का निर्वहन करते रहे. अब अगली पीढ़ी को संवारने की भी महती जिम्मेवारी उनके कंधों पर थी. अपनी संतति के भविष्य की चिंता उन्हें सताने लगी. खुद को बीहड़ों से, ग्रामीण अंचल से निकाल कर किसी शहर, कस्बे के नजदीक लगाये जाने की जुगत में लग गए. 

कई-कई महीनों की दौड़-भाग के बाद काम बनता न दिखाई दिया. अपने स्तर पर तमाम प्रयासों के बाद अंततः उन्होंने अपने विभाग की राजनीति के द्वार खटखटाए. आदर्शों, सिद्धांतों, संस्कारों ने अपना रूप ज्यों का त्यों बनाये रखा. रिश्वत, दलाली, चंदा जैसी किसी भी स्वीकार्य-अस्वीकार्य स्थिति से वे बचते रहे. बचते ही नहीं रहे बल्कि अपने स्तर पर अपने साथियों को रोकते भी रहे. शिक्षा जगत को परम आदर्श मानकर उसमें मानक स्थापित करने के प्रयास करते रहे.

आखिरकार, उनका स्वभाव, उनकी प्रकृति, उनकी सदाचारिता उनके काम आई. उनके अधिकारियों के साथ उठने-बैठने वाले कमीशनबाज मित्रों ने उनके बारे में सकारात्मक सन्देश का प्रसार किया. बिना धन-उगाही साँस न लेने वाले अधिकारी ने अपने गैंग की बात पर विश्वास किया. बिना किसी रिश्वत, बिना किसी चंदे, बिना किसी कमीशन के वे मनमाफिक जगह खुद का स्थानांतरण करवाने में सफल रहे.

बिना जेब गर्म किये आगे न सरकने वाले तंत्र को यह कदम रास न आया. आखिरकार तंत्र प्रभावी भूमिका में दिखाई दिया और 'चोर चोरी से जाये, हेरा-फेरी से न जाये' वाले स्वरूप में नजर आया. ईश्वर के प्रति बारम्बार धन्यवाद देने वाले वे धार्मिक प्रवृत्ति के शिक्षक महाशय अब अपने अधिकारियों के घरों में नियमित निःशुल्क धार्मिक कृत्य करवाते देखे जाने लगे हैं.


08 अगस्त 2018

पंद्रह अगस्त का इंतजार है अंध-विद्यालय को

नया अधूरा भवन, जिसमें दो-दो विधायकों की निधि लगी है 

पुराना भवन, जिसमें अंध-विद्यालय संचालित था, अब बंद है 

अधूरे नए भवन की अंदरूनी अपूर्ण स्थिति 

अधूरे नए भवन की अंदरूनी अपूर्ण स्थिति 

अधूरे नए भवन की अंदरूनी अपूर्ण स्थिति 


आज, 08 अगस्त 2018, शांतिनगर, उरई में पूर्व में संचालित अंध-विद्यालय का भवन. 
इसके साथ ही वह भवन और उसके अन्दर के चित्र, जिसके निर्माण में दो-दो विधायकों की निधि का उपयोग किया गया है. निधि उपयोग के बाद भी भवन अधूरा है. 

गत माह, जुलाई में अंध-विद्यालय के प्रबंधक और उसके कार्यकारिणी सदस्य ने ADM साहब के सामने अंध-विद्यालय विवाद को निपटाने के समय नए भवन को पंद्रह अगस्त तक पूर्ण करवाने तथा स्वतंत्रता दिवस पर ADM साहब से ही ध्वज फहराने का वादा किया था. 

अंध-विद्यालय के दोनों शिक्षक भी इसी शर्त पर वहां से हटाये गए थे कि नए शिक्षक तत्काल लाये जायेंगे. इसके बाद भी पुराने भवन में ताला लगा हुआ पाया गया. 

पंद्रह अगस्त का इंतजार है.... उसके बाद प्रशासन के कदम को देखना है... (दोनों नेत्रहीन शिक्षक तो हटा दिए गए.... क्या भ्रष्ट प्रबंध-तंत्र पर प्रशासन कोई कार्यवाही करेगा?)

26 फ़रवरी 2018

भ्रष्टाचार-मुक्ति के लिए नैतिकता चाहिए


शिक्षा समाप्ति के बाद दिमाग में प्रशासनिक सेवा में जाने का कीड़ा कुलबुला रहा था. उसके साथ-साथ खुद को आर्थिक आधार पर खड़ा करने की सोच भी काम कर रही थी. नब्बे के दशक में बहुत सारी स्थितियाँ सहायक सिद्ध होती थीं तो बहुत सी स्थितियाँ विपरीत दिशा में काम करती थीं. उनकी सहायक और असहायक स्थितियों से जूझते हुए प्रशासनिक परीक्षाओं की तैयारी के साथ-साथ अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियाँ चलती रहतीं. उरई जैसे छोटे शहर में प्रतियोगी परीक्षाओं का माहौल जिस तरह का था उसके अनुसार खुद को सक्षम बनाते हुए आगे बढ़ने की कोशिश चलती रहती. इसी कोशिश के कई प्रतियोगी परीक्षाओं में साक्षात्कार देने की स्थिति भी बनी, ये और बात है कि अंतिम रूप से सफलता उनमें किसी में भी न हाथ लगी.


ऐसी ही एक स्थिति उस समय बनी जबकि बैंकिंग भर्ती बोर्ड के अंतर्गत भारतीय स्टेट बैंक में सेवाएँ देने के लिए साक्षात्कार से सामना करना पड़ा. कई सारे सवालों-जवाबों के आदान-प्रदान के बीच उस साक्षात्कार लेने वाले बोर्ड के अध्यक्ष ने किसी बात पर कहा कि बैंक में कोई अवसर ही नहीं, कोई भ्रष्टाचार करेगा कैसे? उस समय उनकी बात पर सहमति भी व्यक्त की. बैंक को तत्कालीन स्थितियों में इस कारण भी हमको बहुत सहज नौकरी दिखती थी क्योंकि हमारे तीनों चाचा लोग भारतीय स्टेट बैंक में अपनी सेवाएँ दे रहे थे. उनका सहज तरीके से अपनी नौकरी करना, परिवार को समय देना और बाकी के उत्तरदायित्वों का निर्वहन भी सहजता से होता दिखता था. ये और बात है कि समय के साथ-साथ बैंक की नौकरी भी कष्टप्रद साबित होने लगी. बहरहाल, नब्बे के दशक के उस दौर में बैंक में किसी तरह के घोटाले की, भ्रष्टाचार की बात कोई सोचता नहीं था. हालाँकि इसी दौर में देश का सबसे बड़ा शेयर घोटाला हुआ था, जिसे बैंक के नियमों का फायदा उठाकर अंजाम दिया गया था तथापि इसमें भी बैंकों की कार्यप्रणाली पर संदेह नहीं किया गया था.

अभी पिछले दिनों पंजाब नेशनल बैंक और अब ओरिएंटल बैंक और कॉमर्स में 390 करोड़ रुपये का घोटाला सामने आया है. कहा जा रहा है कि इसकी शिकायत लगभग छह महीने पहले ही की जा चुकी है मगर मामला अब दर्ज किया गया. फ़िलहाल इन घोटालों के पूर्व भी जबकि देश नोटबंदी जैसे कड़े सरकारी कदम से खुद को आगे बढ़ाने में लगा था तब कुछ बैंकों की कार्यप्रणाली ने, उनके अधिकारियों के रवैये ने ऐसा माहौल बनाया जिससे आम आदमी को विश्वास हो चला था कि बैंक भी घोटाले कर सकती हैं. नोटबंदी में जिस तरह से बैंकों और उनके अधिकारियों ने मिलीभगत से धन की अदला-बदली की उससे बैंक की निष्पक्ष कार्यप्रणाली पर से भरोसा उठने लगा था. इस उठते भरोसे को उस समय भी हवा मिली जबकि विजय माल्या करोड़ों का कर्ज लेकर देश से फरार हो गया. इसके बाद जैसे ही ये दो घोटाले सामने आये, आम जनमानस में धारणा बन गई कि बैंक और उनके अधिकारियों के सारे नियम-कानून आम आदमी के लिए हैं, सामान्यजन के लिए ही हैं. प्रभावशाली लोगों के लिए, रसूखदार लोगों के लिए बैंकों में भी किसी नियम का कोई मतलब नहीं है.

एक बात स्पष्ट है कि किसी भी संस्थान में तब तक कोई घोटाला, किसी भी तरह का भ्रष्टाचार नहीं हो सकता है जबकि उस सिस्टम में बैठा कोई जिम्मेवार स्वयं ही उसके लिए कोई कार्य न करे. बैंक से लोन का निकलना किसी विजय माल्या, किसी नीरव मोदी की हैसियत से बहुत बाहर की बात है. सरकारी नियमों, कायदों में कमियाँ निकालकर उसी कमी का फायदा दिलाने का काम वही व्यक्ति कर सकता है जो उस सम्बंधित सिस्टम से जुड़ा हुआ है. ऐसे में बैंक हों या फिर कोई भी संस्थान सभी में नियमों-कानूनों की अपनी स्थिति है मगर उसके बीच से सुराख़ खोजने का काम उसी के वर्तमान या पूर्व अधिकारी करते हैं. ऐसे में अपने उसी साक्षात्कार की घटना याद आती है तो लगता है कि संभव है कि नब्बे के दशक में जबकि औद्योगीकरण का दौर आरम्भ हुआ था, नई आर्थिक नीतियां अपना स्वरूप गढ़ने में लगी थीं, वैश्वीकरण की परिभाषा को नया लिबास पहनाया जा रहा था तब व्यक्ति में संस्कार, नैतिक मूल्य किसी न किसी रूप में जीवित बचे थे. आज पूर्ण रूप से खुद को आधुनिक और भौतिकवादी बनाने के साथ-साथ व्यक्तियों ने अपने-अपने नैतिक मूल्यों को तिलांजलि देने का काम भी किया है. यही कारण है कि आज हमारे बीच के लोग ही हमको नकली खाद्य-सामग्री बेचते हैं, जहरीला दूध बच्चों को पिलाते हैं, बिना गुणों की औषधि से इलाज किया जा रहा है, हर तरफ नकली, मिलावटी सामानों की भरमार है.

ये अवगुण अचानक नहीं जन्मे हैं. इनके जन्मने में हमारे आसपास का वातावरण बहुत प्रभावी रहा है. पड़ोसी को आये दिन आर्थिक तरक्की करते देखकर, उसके मकान को बढ़ता देखकर, उसकी कारों का काफिला लम्बा होता देखकर दूसरा इन्सान भी उसी दिशा में कार्य करने लगता है. इसके लिए वो किसी भी कदम को उठाने से नहीं चूकता है. इसी भागमभाग में वह कब घोटालों, रिश्वत, भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने लगता है उसे खुद पता नहीं चलता है. सीधी सी बात है, जब तक कि व्यक्ति स्वयं में नैतिक मूल्यों का विकास नहीं करता है तब तक समाज से किसी भी तरह के घोटाले, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी को दूर करना असंभव ही है. आने वाले समय में शायद ही कोई संस्था ऐसी शेष रहे जो भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, घोटालों की चपेट में न आये. वैसे समाज के हित में यही है भी. आखिर जब तक भ्रष्टाचार का पैमाना पूरी तरह से नहीं भरेगा, जब तक एक-एक आदमी भ्रष्ट नहीं हो जायेगा तब तक समाज से भ्रष्टाचार का खात्मा करना सहज, संभव नहीं.

17 फ़रवरी 2018

बैंक भी घोटाला करने की राह पर


पंजाब नैशनल बैंक में 11 हज़ार करोड़ रुपए से अधिक का घोटाला सामने आया है. ये घोटाला मुंबई की एक ब्रांच में हुआ. यह बैंक की मार्केट वैल्यू का क़रीब एक-तिहाई और साल 2017 की आख़िरी तिमाही के मुनाफ़े का 50 गुना है. इस घोटाले में हीरा कारोबारी नीरव मोदी और उसके साथी दोषी पाए गए हैं साथ ही पंजाब नेशनल बैंक के कुछ अधिकारियों की भी मिलीभगत सामने आई है. नीरव मोदी और उनके साथियों ने सन 2011 में बिना तराशे हुए हीरे आयात करने के लिए पंजाब नेशनल बैंक की मुंबई स्थित एक ब्रांच से संपर्क किया. सम्बंधित शाखा से गारंटी पत्र या लेटर ऑफ़ अंडरटेकिंग (LoU) जारी किये गए.  


कोई बैंक विदेश से आयात को लेकर होने वाले भुगतान के लिए गारंटी पत्र या लेटर ऑफ़ अंडरटेकिंग (LoU) जारी करता है. इसका ये मतलब होता है कि बैंक किसी कंपनी के विदेश में मौजूद सप्लायर को 90 दिन के लिए भुगतान करने को राज़ी हो जाता है और बाद में पैसा कंपनी को चुकाना होता है. कुछ इसी तरह का काम नीरव मोदी और उसके दोस्तों की कंपनियों के लिए किया गया. पंजाब नेशनल बैंक के कुछ कर्मचारियों ने कथित तौर पर नीरव मोदी की कंपनियों को फ़र्ज़ी LoU जारी किए और ऐसा करते वक़्त उन्होंने बैंक मैनेजमेंट को अंधेरे में रखा. इन्हीं फ़र्ज़ी LoU के आधार पर भारतीय बैंकों की विदेशी शाखाओं ने पंजाब नेशनल बैंक को लोन देने का फ़ैसला किया. रिपोर्ट्स के मुताबिक बैंक अधिकारी गोकुलनाथ शेट्टी और सिंगल विंडो ऑपरेटर खरात ने कंपनियों द्वारा जारी किये LoU की जानबूझकर कोर बैंकिंग सिस्टम में एंट्री नहीं की गई ताकि बैंक उच्च अधिकारियों को इसके बारे में जानकारी ही ना हो पाए.
इस तरह का फर्जीवाड़ा करने वालों ने एक क़दम आगे जाकर सोसाइटी फ़ॉर वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फ़ाइनेंशियल टेलीकम्युनिकेशन या स्विफ़्ट (SWIFT) का नाजायज़ फ़ायदा उठाना शुरू किया. स्विफ्ट एक तरह का इंटर-बैंकिंग मैसेजिंग सिस्टम है जो विदेशी बैंक पैसा जारी करने से पहले लोन ब्योरा पता लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इसमें एक तरह का पासवर्ड या कोड इस्तेमाल किया जाता है. इस सिस्टम से यह पता चलता है कि जो संदेश बैंकों के पास आ रहे हैं वे आधिकारिक संदेश हैं. इसके इस्तेमाल से दोनों बैंक शाखाओं में आपस में विश्वास बना रहता है. जिससे वे बिना किसी अविश्वास के लेन-देन का कार्य करते रहते हैं. बैंक के कुछ अधिकारियों ने अपने उच्च अधिकारियों से बिना कोई इजाज़त लिए स्विफ़्ट तक अपनी पहुंच का फ़ायदा उठाया. शाखा प्रबंधक द्वारा लेनदेन के लिए वैश्विक वित्तीय संदेश सेवा स्विफ्ट का इस्तेमाल किया. स्विफ्ट एकाउंट का उपयोग किये जाने के चलते भारतीय बैंकों की विदेशी शाखाओं को कोई शक़ नहीं हुआ और उन्होंने नीरव मोदी की कंपनियों को फ़ॉरेक्स क्रेडिट जारी कर दिया.
नीरव मोदी और उसके सहयोगियों की कम्पनियाँ बीती पांच जनवरी तक इसी विधि से पीएनबी के साथ लेनदेन करती रही. चूँकि हर नए लैटर ऑफ़ अंडरटेकिंग को पिछले से ज्यादा बनाकर बैंक से ऋण लिया जाता. इससे पिछले ऋण को चुकता कर नए ऋण का उपयोग किया जाने लगता. इससे दूसरे बैंक भी कंपनियों से संतुष्ट दिखे. इस फर्जीवाड़े का खुलासा तब हुआ जब पीएनबी के शाखा प्रबंधक गोकुलना‌थ शेट्टी सात साल तक एक ही पद पर रहने के बाद रिटायर हुए. यह बैंकिग गाइडलाइन सीवीसी का उल्लंघन करता है क्योंकि नियमानुसार बैंकों को नियमित रूप से दो या तीन साल पर तबादला करना होता है. जबकि पीएनबी की यह कोर ब्रांच और संवदेनशील ब्रांच होने के बाद भी यहां के मैनेजर का ट्रांसफर होने के बाद भी रोका जाता रहा.
इसी वर्ष 16 जनवरी को नीरव मोदी से जुड़ी कंपनियों डायमंड्स आर यूएस, सोलर एक्सपोर्ट्स, स्टेलर डायमंड्स ने बैंक को संपर्क कर बायर्स क्रेडिट की मांग की जिससे वे अपने विदेश के कारोबारियों को भुगतान कर सकें. नये ब्रांच मैनेजर ने इसके उनसे उतनी ही नकदी की मांग की तो कंपनियों के अधिकारियों ने जवाब दिया कि वे सन 2010 से इस तरह की सुविधा पाते आये हैं. उन्होंने इसके लिए कभी नकद भुगतान नहीं किए. इसके बाद ही सारा मामला पकड़ में आया. जानकारी से पता चला कि इस मामले में सं‌लिप्त एक एलओयू (LoU) की कीमत 9.539.3 करोड़ रुपये है. इसी के साथ 1799.3 करोड़ रुपये का एक फॉरेन लेटर ऑफ क्रेडिट भी जारी किया गया. इसमें सोलर एक्सपोर्ट्स 2152.8 करोड़, स्टेलर डायमंड्स 2134.7 करोड़, डायमंड्स आर यूएस 2110.6 करोड़, गीतांजलि गेम्स 2144.3 करोड़, गिली इंडिया 566.6 करोड़ व नक्षत्र व चांदरी को 321.1 व 9.1 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं. ये रकम एक विदेशी बैंक के साथ पंजाब नेशनल बैंक के खाते में दी गई थी जिसे नोस्ट्रो एकाउंट कहते हैं. पैसा इस एकाउंट से नीरव मोदी के विदेश में मौजूद उन सप्लायर्स को भेजा गया जो बिना तराशे हुए हीरे सप्लाई करने का काम करते हैं. जब ये फ़र्ज़ी LoU मैच्योर होने लगे तो पंजाब नेशनल बैंक के भ्रष्ट कर्मचारियों ने सात साल तक दूसरे बैंकों की रकम का इस्तेमाल इस लोन को रिसाइकिल करने के लिए किया. इस सारी धोखाधड़ी से तब पर्दा हटा जब पंजाब नेशनल बैंक के भ्रष्ट कर्मचारी-अधिकारी रिटायर हो गए और नीरव मोदी की कंपनी के अफ़सरों ने जनवरी में दोबारा इसी तरह की सुविधा शुरू करने की गुज़ारिश की. नए अधिकारियों ने ये ग़लती पकड़ ली और स्कैम से पर्दा हटाने के लिए आंतरिक जांच शुरू कर दी. पंजाब नेशनल बैंक ने खुलासा किया कि उसने 1.77 अरब डॉलर (करीब 11,400 करोड़ रुपये) के घोटाले को पकड़ा है. इस मामले में अरबपति हीरा कारोबारी नीरव मोदी ने कथित रूप से बैंक की मुंबई शाखा से फ़र्ज़ी गारंटी पत्र (LoU) हासिल कर अन्य भारतीय ऋणदाताओं से विदेशी ऋण हासिल किया. इस संबंध में बैंक ने अपने 10 कर्मचारियों को निलंबित कर दिया है और इस मामले की शिकायत केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) से की है.

03 फ़रवरी 2015

राजनीति या अराजकनीति



राजनीति या अराजकनीति
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

भ्रष्टाचार मिटाने की मुहिम पर निकले अन्ना आन्दोलन के पार्श्व से अन्ना टीम के मुख्य सदस्य अरविन्द केजरीवाल ने भारतीय राजनीति को कलंकित करते कतिपय नेताओं-मंत्रियों का विकल्प खड़ा करने के उद्देश्य से राजनीति में उतरने का फैसला लिया था. आम आदमी की राजनीति करने के अपने फैसले को सही ठहराने के लिए ‘आम आदमी पार्टी’ नाम से अपना राजनैतिक आगाज़ दिल्ली से कर दिया. उनके इस फैसले को जिस तरह से समर्थन मिला, उसी तरह से इसके विरोध में भी स्वर उठे. खुद अन्ना की तरफ से भी राजनैतिक कदम का समर्थन नहीं किया गया. इस कारण से केजरीवाल द्वारा अपनी राजनैतिक स्थिति को स्पष्ट करने के लिए किये जा रहे विभिन्न क़दमों में अन्ना नहीं दिखे, जनलोकपाल गायब रहा, टोपी बदली हुई लगी, मुद्दे भी बदले-बदले से मिले यहाँ तक कि केजरीवाल के तेवर भी बदले-बदले से लगे. अन्ना आन्दोलन की सहानुभूतिपरक लहर ने केजरीवाल और उसके राजनैतिक महत्त्वाकांक्षी सदस्यों को दिल्ली में निर्वाचित भी करवा दिया. अन्ना लहर, कांग्रेस-केंद्र सरकार की नीतियों के विरोध के चलते आम आदमी पार्टी को अपने पहले प्रयास में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई किन्तु वे सत्ता से चंद कदम दूर रह गए.

इसके बाद जो हुआ वो भी अप्रत्याशित रहा, जिस कांग्रेस को समूची केजरीवाल टीम ने पानी पी-पीकर कोसने का काम किया था, कई-कई पेज के सबूत दिखा-दिखाकर वोट मांगने का काम किया था अंततः सत्ता के लिए उसी कांग्रेस से हाथ मिला बैठे. जैसा कि राजनीति में कहा जाता है कि कोई भी स्थायी रूप से न तो मित्र होता है और न ही शत्रु होता है, कुछ ऐसा ही यहाँ दिखाई दिया. बहरहाल केजरीवाल समर्थकों ने इसे भी दिल्ली के भविष्य को ध्यान में रखते हुए स्वीकार कर लिया. तत्कालीन परिस्थितियों में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आम आदमी पार्टी ने आम आदमी से जुड़े हुए मुद्दों को सामने रखा, उसकी समस्याओं को उठाया. इन सबके बावजूद आम आदमी पार्टी अथवा केजरीवाल कुछ सकारात्मक करने से चूक गए. विरोधियों से सहयोग से मिली सत्ता को अपने हितार्थ और दिल्ली के भविष्य के लिए उपयोग करने से पीछे हट गए. महज उनचास दिनों की अपनी सत्ता के दौरान केजरीवाल ऐसा कुछ भी दिखा पाने में अक्षम सिद्ध हुए जिससे कहा जाता कि वे कुछ नया और अलग करने के लिए विरोधियों के सहयोग से सरकार चला रहे हैं. एक पुलिसवाले के लिए स्वयं मुख्यमंत्री का धरने पर बैठ जाना, उन्हीं के एक सिपहसालार का धरना समाप्त करवाने के लिए मिलने-मिलाने की जोड़-तोड़ करना, राज्य का मुख्यमंत्री बनने के लिए खाप-पंचायतों का समर्थन कर बैठना, मुस्लिम मतों के लिए तुष्टिकरण की नीति को अपना लेना और इसी की आड़ में आतंकी-समर्थकों का समर्थन करने लगना आदि-आदि कुछ ऐसा रहा जो सहजता से ग्राह्य नहीं होता है.

केजरीवाल का महत्त्वाकांक्षी राजनीतिक कदम इतने पर ही शांत नहीं हुआ. दिल्ली के अप्रत्याशित चुनाव परिणामों ने आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं और खुद केजरीवाल टीम को चकाचौंध कर दिया था. इसी चकाचौंध में केजरीवाल लोकसभा चुनाव में समूचे देश से आम आदमी पार्टी का प्रतिनिधत्व करने की गरज से दिल्ली की सत्ता छोड़कर चुनाव मैदान में उतर आये. अति-आत्मविश्वास मोदी लहर के सामने ढेर हुआ और जिस हनक के साथ शीला दीक्षित को हराने का दम केजरीवाल ने भरा था वो हनक बनारस में मोदी के सामने टिक न सकी. आम आदमी पार्टी के भविष्य पर लोकसभा हार का क्या असर होता ये अलग विषय हो सकता है किन्तु दिल्ली मतदाताओं के साथ ये कहीं न कहीं खिलवाड़ ही था. देश की संसद और संविधान के साथ एक मजाक ही था. वर्तमान में जिस तरह से राजनीति का अपराधीकरण और अपराधियों का राजनीतिकरण हो रहा है वो अपने आपमें चिंता का विषय है किन्तु जिस तरह से आम आदमी पार्टी कुछ नया करने की चाहत में कर रही है वो भी कम चिंता का विषय नहीं है. जिस तरह का विश्वास आम आदमी ने केजरीवाल टीम पर दर्शाया था उसके अनुसार इस टीम को युवाओं में राजनीति के प्रति, संसद के प्रति, संविधान के प्रति सकारात्मक सोच पैदा करने की महती जिम्मेवारी निभानी चाहिए थी. बजाय ऐसा कुछ करने के इस पार्टी और इस टीम द्वारा भी वही सब किया गया जो शेष राजनैतिक दल कर रहे हैं, करते आ रहे हैं. दागियों को यहाँ भी टिकट दिए गए, दारू, रुपये का लालच यहाँ भी दिया गया, अपराधी यहाँ भी देखने को मिले, मुस्लिम तुष्टिकरण यहाँ भी सामने आया, धार्मिक भेदभाव दर्शाने के लिए टोपी भी सामने उछलकर आई, शहीदों के नाम का मजाक बनाया गया, विदेशी फंडिंग का खुलकर सहारा लिया गया, देश के उन मुद्दों का समर्थन किया गया जिन्हें संवेदनशील माना जाता है, सब्सिडी, मुफ्तखोरी का हवाला यहाँ भी दिया गया, उद्योगपतियों को गरियाने के बाद भी उद्योगपतियों का सहारा लिया गया. शायद ही ऐसा कोई काम शेष रहा हो जो आम आदमी पार्टी को शेष दलों से अलग करता हो या फिर ऐसा दर्शाता हो कि अन्ना आन्दोलन के पार्श्व से जिस उद्देश्य के लिए इस पार्टी का जन्म हुआ था वो यहाँ दिखाई दिए. 

राजनैतिक विकल्प बनने के नाम पर जन्मी पार्टी द्वारा अब राजनैतिक विकल्प के अलावा सब कुछ हो रहा है. उनकी पार्टी के बहुत से ऐसे लोग इस राजनीति से अपने को दूर करने में लग गए हैं, यहाँ तक कि आम आदमी पार्टी के गठन में सहयोगी रहे अनेक लोग इसका साथ छोड़ चुके हैं. दरअसल वे खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं. लगभग असफलता के साथ समाप्त हुए अन्ना-आन्दोलन के पीछे भी कोई सांगठनिक ढांचा नहीं था और अब केजरीवाल-राजनीति भी बिना किसी सांगठनिक ढांचे के हो रही है, ऐसे में सफलता संदिग्ध ही लगती है. अब जबकि दिल्ली दोबारा चुनाव के लिए तैयार है. मीडिया, सोशल मीडिया और दूसरे तमाम सूत्र दिल्ली चुनाव को भले ही मोदी बनाम केजरीवाल सिद्ध करने में लगे हों किन्तु जिस तरह से वर्तमान निर्वाचन में आम आदमी पार्टी के लोगों की भूमिका दिखाई दी है, स्वयं केजरीवाल और उनके सहयोगियों का व्यवहार दिखाई दिया है वो राजनीति की अवसरवादिता और विध्वंसक राह का संकेत देता है. सब्सिडी और मुफ्तखोरी का वादा ये भी करते दिखाई दे रहे हैं, शराब इनके कार्यकर्ताओं के पास से भी पकड़ी जा रही है, पैसे लेने की बात खुद केजरीवाल खुलेआम मंच से करते दिख रहे हैं, टिकट का बिकना इन लोगों के बीच भी हो रहा है, बाकी दलों के नेताओं की तरह बदजुबानी आम आदमी पार्टी के नेताओं में भी दिख रही है, ऐसे में कहाँ और किस तरह से अपने को ईमानदारी के साथ प्रस्तुत कर रही है ये पार्टी? खुलेआम और छिप कर लूटपाट करते, झूठ बोलते, सिर्फ और सिर्फ वादा करते शेष दलों की तरह ही आम आदमी पार्टी द्वारा बर्ताव किया जा रहा है, ऐसे में किसी सार्थकता की उम्मीद तो नहीं ही की जा सकती है. बिजली के बिलों की कटौती करवा देना, कटी हुई बिजली के तारों को जोड़ देना, मेट्रो से शपथ ग्रहण करने पहुँचना, बात-बात पर धरना देने लगना, अपनी किसी भी मजबूरी के लिए केंद्र सरकार को दोषी ठहराने लगना, चुनाव की स्थिति-परिस्थिति के अनुसार विरोधी बदल देना, सत्ता-प्राप्ति के पश्चात् मुख्य विरोधी को भूल जाना, मतदाताओं के विश्वास को ठेस पहुँचाकर अति-महत्त्वाकांक्षा में प्रधानमंत्री की दौड़ में शामिल हो जाना, संविधान को गलत साबित करना, संसद को अपराधियों का अड्डा बताना, समूची राजनीति को भ्रष्ट बता देना, देशभर के तंत्र को मिलीभगत का आरोप लगाना और स्वयं को एकमात्र ईमानदार सिद्ध करना ही राजनीति नहीं होती. इसी सबको व्यवस्था परिवर्तन करना नहीं कहते हैं. इससे भविष्य में राजनैतिक सुधार हो या न हो किन्तु राजनीति के अराजक होने के संकेत अवश्य ही मिलते हैं.

ये आलेख आज दिनांक-03-02-2015 के जनसंदेश टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है. 
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