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21 जुलाई 2023

सोशल मीडिया और मौत का जश्न

शायद शीर्षक पढ़कर आपको आश्चर्य के साथ-साथ अजीब सी अनुभूति हुई हो? आश्चर्य किये बिना एक पल को अपने आसपास फैलाते सोशल मीडिया जाल के बारे में विचार करिए तो आपको ये सच लगने लगेगा. क्या ऐसा नहीं हो रहा है कि हम लोग मौत की खबरों का, किसी की मृत्यु से पूर्व उसकी शारीरिक अवस्था कादुर्घटनाओं के वीभत्स दृश्यों आदि का प्रसारण करने से खुद को नहीं रोक पा रहे हैं? मौत की खबरों का बिना सोचे-समझे शेयर करना बताता है कि अब किसी की मौत हमें परेशान नहीं करती. किसी की मौत हमें संवेदित नहीं करती. संवेदनहीनता की हद से आगे जाकर कुछ लोगों को मौतों पर कार्टून, मीम्सजोक्स बनाकर मस्ती करते तक देखा जा सकता है. क्या ये सोशल मीडिया पर मौत का जश्न नहीं है?  




इस तरह की मानसिकता अचानक से उत्पन्न नहीं हुई है बल्कि सोशल मीडिया को नशे की तरह से इस्तेमाल करने से ऐसा होने लगा है. देखा जाये तो ये पंक्ति वो तड़प कर अपनी जान से गयाखेल का सामान हमारे लिए बन गया सोशल मीडिया पर चरितार्थ हो रही है. अब घटना सुखद हो या फिर दुखदविषय हास्य का हो या फिर विषाद का कार्यक्रम का आयोजन हो या फिर दुर्घटना की भयावहतासबकुछ सोशल मीडिया पर शेयर करने का चलन हो गया. दरअसल हर हाथ में मोबाइलहर हाथ में इंटरनेटहर हाथ में तकनीक ने यदि जीवन को विविध पहलुओं के सन्दर्भ में सहज-सरल बनाया है तो उसके साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं का गला भी घोंट दिया है.


अब ये जानकारी ही नहीं कि प्रसारित करने वाली किस खबर से समाज परसमाज के व्यक्तियों पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है. लोगों को इसका भी भान नहीं है कि उनके द्वारा जाने-अनजाने में प्रसारित की जाने वाली खबरों सेप्रसारित किये जाने वाले चित्रों से लोगों के मन-मष्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ रहा है. हम रोज ही सोशल मीडिया के माध्यम से हिंसाबलात्कारहत्यादुर्घटना सम्बन्धी वीभत्स दृश्यों को देख रहे हैं. रक्तरंजित शवफंदे पर लटकती देहदुर्घटना में क्षत-विक्षत शरीर सहित न जाने कितनी तरह के ह्रदयविदारक चित्र हमारे सामने एक क्लिक पर गुजर जाते हैं. यहाँ इन चित्रों को भेजने वालों की मंशा किसी भी रूप में किसी शरीर काकिसी देह काकिसी की नग्नता का प्रदर्शन करना नहीं होता होगाकिसी भी रूप से उसका मकसद नग्न देह को देखने-दिखाने का भी नहीं होता होगा किन्तु ऐसे लोग अनजाने में एक ऐसी प्रवृत्ति का विकास कर रहे होते हैं जो भविष्य में मानवीय संवेदनाओं को समूल नष्ट कर देगी.


सबसे पहले सूचना देने के लोभ में ऐसे-ऐसे चित्रों कावीडियो का प्रसारण होने लगता है जिसे नैतिक नहीं कहा जा सकता है. वैसे ऐसे दौर में जबकि रिश्तों कासंबंधों कासंस्कारों का मोल न रह गया हो वहाँ नैतिकता की बात करना स्वयं को कटघरे में खड़ा करना है किन्तु समझना होगा कि जाने-अनजाने समाज को किस दिशा में मोड़ा जा रहा है. कभी ऐसे चित्रों का प्रकाशन-प्रसारण निषिद्ध माना जाता थाऐसे चित्रों को उजागर करने का अर्थ मृत व्यक्ति के साथ अन्याय करना समझा जाता थाक्षत-विक्षत देह को सार्वजानिक रूप से प्रदर्शित करना नृशंस माना जाता था किन्तु आज तकनीकी के चलते इसे जागरूकता फ़ैलाने वाला समझा जाने लगा है. तकनीक के प्रचार-प्रसार को रोक पाना अब किसी के लिए संभव नहीं है. ऐसे में स्वयं नागरिकों कोसोशल मीडिया का अतिशय उपयोग करने वालों को सजग होना पड़ेगा कि उनके द्वारा क्या पोस्ट किया जायेक्या प्रतिबंधित रखा जाये. ये सत्य है कि वर्तमान में सोशल मीडिया की उपयोगिता को भुलाया नहीं जा सकता है पर इसके साथ-साथ आते एक अप्रत्यक्ष सा संकट को भी विस्मृत नहीं किया जा सकता है.


नज़रों के सामने से गुजरती ऐसी तस्वीरेंवीडियो शुरू में मन-मष्तिष्क को विचलित करती हैंसंवेदित करती हैं किन्तु नज़रों के सामने से लगातार इनका गुजरते रहना इसका अभ्यस्त बना देता है. मन-मष्तिष्क का ऐसे दृश्यों का अभ्यस्त होना संवेदनाओं समाप्त होना है. घटना के प्रतिदुर्घटना के प्रतिमरने वाले के प्रतिशोषित के प्रतिमृत देह के प्रति ऐसा व्यक्ति संवेदना के स्तर पर जुड़ने में असहज महसूस करता है या कहें कि जुड़ नहीं पाता है. यही कारण है कि आज हत्याबलात्कारआत्महत्याहिंसादुर्घटना आदि की खबरेंदृश्य हमें संज्ञा-शून्य बनाये रखते हैं. हमारे लिए ऐसी खबरें मात्र खबर बनकर रह जाती हैंसूचनाएँ बनकर समाप्त हो जाती हैं.


दरअसल हम सभी की संवेदनाएं मर चुकी हैं. रोज हम हत्याबलात्कारदुर्घटनामृत्यु की सजीव फोटो देखते रहते हैं. दो-चार दिन की संवेदना के बाद हम सभी वही चिर-परिचित पाषाण ह्रदय बन जाते हैं. कब हम इंसान से जानवर बन जाते हैंकब इन दृश्यों को महज जानकारी आदान-प्रदान करने का माध्यम बना देते हैं हमें स्वयं ही पता ही नहीं चल पाता है. उसके बाद सामने वाला हमारे लिए महज एक देह बन जाता है. आखिर हम सबको उस मौत पर जश्न मनाना ही है क्योंकि वो मरने वाला हमारा अपना नहीं. अब वो मरने वाला कोई नामचीन है या फिर सामान्य व्यक्तिइससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हमें तो बस इससे मतलब है कि उसमें ऐसा क्या है जो उसकी मौत पर हम जश्न कर सकें. काश कि हम सभी अपनी भावी पीढ़ी को नृशंसता कावीभत्सता काविकृतता का अर्थ समझा सकें. कहीं ऐसा न हो कि कल को ऐसे दृश्य इनके लिए मनोरंजन का साधन बन जाएँ.

 







 

10 फ़रवरी 2022

हम मौत को एन्जॉय करने लगे हैं

आप में से बहुतों को शीर्षक पढ़कर आश्चर्य हुआ होगा. यदि ये कहें कि आश्चर्य से ज्यादा कुछ अजीब सी अनुभूति आई होगीतो इसमें आश्चर्य न होगा. यह सच है कि हम लोग मौत की खबरों का, किसी की मृत्यु से पूर्व की शारीरिक अवस्था का, कहीं भी हुई दुर्घटनाओं के वीभत्स दृश्यों आदि का प्रसारण करने से खुद को नहीं रोक पा रहे हैं. यदि हम मौत की खबरों का इधर-उधर भेजना नहीं रोक पा रहे हैं तो स्पष्ट है कि अब किसी की मौत हमें परेशान नहीं करती. किसी की मौत हमें संवेदित नहीं करती. किसी की मृत्यु हमें विचलित नहीं करती. कुछ लोग संवेदनहीनता की हद से आगे जाकर मौतों पर कार्टून बनाने लगेमीम्स, जोक्स बनाकर मस्ती करने लगे. इसे क्या कहा जायेगाक्या ये किसी कि मौत को एन्जॉय करना नहींकिसी सड़क दुर्घटना के वीभत्स दृश्यचिकित्सालयों में मृतकों और उनसे जुड़े लोगों की स्थिति आदि को संवेदनहीनता के स्तर से दिखाया जाना यही साबित करता है. इसके अलावा किसी सेलिब्रिटी की मृत्यु पर उसकी शारीरिक अवस्था की दुर्बलता, उसकी बीमारी से उपजी मनोदशा आदि का प्रसारण, किसी ख्यातिलब्ध व्यक्ति की मृत्यु की भ्रामक, गलत खबर का लगातार प्रसारित किया जाना भी संवेदनहीनता की, मृत्यु का आनंद लेने जैसी ही अवस्था है. 


ऐसा सोशल मीडिया के नशे की तरह से इस्तेमाल करने, सबसे पहले हमारे द्वारा की मानसिकता, पल दो पल में अनेक वीभत्स चित्रों, वीडियो के आते रहने के कारण होने लगा है. देखा जाये तो सोशल मीडिया पर ये पंक्ति वो तड़प कर अपनी जान से गयाखेल का सामान हमारे लिए बन गया लगातार चरितार्थ होती दिख रही है. कहीं सुखद घटना हो या फिर दुखदहास्य का विषय हो या फिर विषाद काकिसी कार्यक्रम का आयोजन है या फिर कोई दुर्घटना की भयावहतासबकुछ आनन-फानन सोशल मीडिया पर शेयर करने का चलन हो गया. दरअसल हर हाथ में मोबाइलहर हाथ में इंटरनेटहर हाथ में तकनीक ने यदि जीवन को विविध पहलुओं के सन्दर्भ में सहज-सरल बनाया है तो उसके साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं का गला भी घोंट दिया है.


आजकल सोशल मीडिया की जन-जन तक पहुँच ने भी संवेदनशीलता को समाप्त किया है. हर हाथ में मोबाइल और हर हाथ में इंटरनेट ने सभी को पत्रकार बना दिया है. एक ऐसा पत्रकार जो संवेदनहीन हैसमाज की वास्तविकता से परे है. उसे पता नहीं है कि उसके द्वारा प्रसारित करने वाली किस खबर से समाज परसमाज के व्यक्तियों पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है. उसे इसका भी भान नहीं है कि उसके द्वारा जाने-अनजाने में प्रसारित की जाने वाली खबरों सेप्रसारित किये जाने वाले चित्रों से लोगों के मन-मष्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ रहा है. सबसे पहले हमारे द्वारा की अनावश्यक कोशिश के चलते बहुधा दुर्घटनाओं की फोटो लोगों के मोबाइल पर सहज पहुँच में हैं. ऐसी फोटो देखने के बाद जहाँ एक तरफ संवेदना उपजनी चाहिए मगर ऐसा होता नहीं है. तकनीक का वर्तमान दौर भयावह सा लगने लगा है. यहाँ हर कोई अपने आपको तकनीक का पुरोधा समझ कर उसका दुरुपयोग करने में लगा है. इस दुरुपयोग से मानवीय मूल्यों का ह्रास हुआ हैसंवेदनाओं को नष्ट किया है.


यदि संजीदगी से विचार किया जाये तो हम लगभग रोज ही सोशल मीडिया के किसी न किसी माध्यम से हिंसाबलात्कारहत्यादुर्घटना सम्बन्धी वीभत्स तस्वीरों को देख रहे हैं. रक्तरंजित शवफंदे पर लटकता किसी का शवदुर्घटना में क्षत-विक्षत देहशारीरिक दुराचार का शिकार किसी महिला की नग्न देह सहित न जाने कितनी तरह के ह्रदयविदारक चित्र हमारे सामने एक क्लिक पर भेज दिए जाते हैं. यहाँ इन चित्रों को भेजने वालों की मंशा किसी भी रूप में किसी शरीर काकिसी देह काकिसी की नग्नता का प्रदर्शन करना नहीं होता हैकिसी भी रूप से उसका मकसद नग्न देह को देखने-दिखाने का भी नहीं होता है किन्तु ऐसे लोग अनजाने में एक ऐसी प्रवृत्ति का विकास कर रहे होते हैं जो भविष्य में मानवीय संवेदनाओं को समूल नष्ट कर देगी.


तकनीक से जुड़े रहने के क्रम मेंसबसे पहले सूचना देने के लोभ मेंबहुतायत लोगों तक सूचना-सम्प्रेषण के चलते वर्तमान में ऐसे-ऐसे चित्रों कावीडियो का प्रसारण किया जा रहा है जो किसी भी रूप में नैतिक नहीं कहा जा सकता है. वैसे आज के दौर में जबकि रिश्तों कासंबंधों कासंस्कारों का मोल न रह गया हो वहाँ नैतिकता की बात करना स्वयं को कटघरे में खड़ा करना होता है किन्तु समझना होगा कि जाने-अनजाने समाज को किस दिशा में मोड़ा जा रहा है. किसी समय में पत्रकारिता में ऐसे चित्रों का प्रकाशनप्रसारण निषिद्ध माना जाता थाऐसे चित्रों को उजागर करने का अर्थ मृत व्यक्ति के साथ अन्याय करने जैसा समझा जाता थाशारीरिक दुराचार का शिकार किसी महिला की पहचान को किसी भी रूप में उजागर करना सामाजिक रूप से प्रतिबंधित माना गया थाक्षत-विक्षत देह को सार्वजानिक रूप से प्रदर्शित करना नृशंस समझा जाता था किन्तु आज तकनीकी के चलते इसे अपराध उजागर करने के लिए अनिवार्य माना जाने लगा हैजागरूकता फ़ैलाने वाला समझा जाने लगा है.


तकनीक के प्रचार-प्रसार को रोक पाना अब किसी के लिए संभव नहीं है. कई बार सरकारों की तरफ से सोशल मीडिया को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया किन्तु उसमें वो सफल नहीं हुई. आश्चर्य तो इसका हुआ कि पोर्न साइट्स पर प्रतिबन्ध लगाने का विरोध अति-जागरूक जनता ने करके सरकार को अपने कदम वापस लेने को विवश कर दिया. ऐसे में स्वयं नागरिकों कोसोशल मीडिया का अतिशय उपयोग करने वालों को सजग होना पड़ेगा कि उनके द्वारा क्या-क्या पोस्ट किया जायेक्या-क्या प्रतिबंधित रखा जाये. जिस तरह से क्षत-विक्षत शवों कीदर्दनाक हादसों कीदेह की नग्नता कीहत्याओं-आत्महत्याओं की तस्वीरेंवीडियो सोशल मीडिया के विविध माध्यमों के द्वारा एक पल में हजारों-हजार लोगों तक प्रेषित कर दिए जाते हैं वो चिंतनीय है. ये सत्य है कि वर्तमान में सोशल मीडिया की उपयोगिता को भुलाया नहीं जा सकता है पर इसके साथ-साथ आते एक अप्रत्यक्ष सा संकट को भी विस्मृत नहीं किया जा सकता है.


अपराधों के प्रति जागरूकता लाने के नाम पर ऐसी स्थिति को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए. नज़रों के सामने से गुजरती ऐसी तस्वीरेंवीडियो अपने आरंभिक दौर में मन-मष्तिष्क को विचलित करती हैंसंवेदित करती हैं किन्तु नज़रों के सामने से लगातार इनका गुजरते रहना इसका अभ्यस्त बना देती हैं. मन-मष्तिष्क का ऐसे दृश्यों के लिए अभ्यस्त हो जाना संवेदनाओं को समाप्त करता है. घटना के प्रतिदुर्घटना के प्रतिमरने वाले के प्रतिशोषित के प्रतिमृत देह के प्रति ऐसा व्यक्ति संवेदना के स्तर पर जुड़ने में असहज महसूस करता है या कहें कि जुड़ नहीं पाता है. यही कारण है कि आज हत्याबलात्कारआत्महत्याहिंसादुर्घटना आदि की खबरेंदृश्य हमें संज्ञा-शून्य बनाये रखते हैं. हमारे लिए ऐसी खबरें मात्र खबर बनकर रह जाती हैंसूचनाएँ बनकर समाप्त हो जाती हैं.


दरअसल हम सभी की संवेदनाएं मर चुकी हैं. रोज हम हत्याबलात्कारदुर्घटनामृत्यु की सजीव फोटो देखते रहते हैं. दो-चार दिन की संवेदना के बाद हम सभी वही चिर-परिचित पाषाण ह्रदय बन जाते हैं. कब हम इंसान से जानवर बन जाते हैंकब इन दृश्यों को महज जानकारी आदान-प्रदान करने का माध्यम बना देते हैं हमें स्वयं ही पता ही नहीं चल पाता है. उसके बाद सामने वाला हमारे लिए महज एक देह बन जाता है. आखिर हम सबको उस मौत पर एन्जॉय तो करना ही है क्योंकि वो मरने वाला हमारा अपना नहीं. अब वो मरने वाला कोई नामचीन है या फिर सामान्य व्यक्तिइससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हमें तो बस इससे मतलब है कि उसमें ऐसा क्या है जो उसकी मौत भी हमारा एन्जॉय कर सके. काश कि हम सभी अपनी भावी पीढ़ी को नृशंसता कावीभत्सता काविकृतता का अर्थ समझा सकें. कहीं ऐसा न हो कि कल को ऐसे दृश्य इनके लिए मनोरंजन का साधन बन जाएँ.


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(उक्त आलेख को जयपुर से प्रकाशित होने वाले समाचार-पत्र सच बेधड़क, दिनांक 10-02-2022, के अंक में प्रकाशित किया गया है.)

01 जून 2021

संवेदनहीन होकर हम मौत को एन्जॉय करने लगे हैं

आप में से बहुतों को शीर्षक पढ़कर आश्चर्य हुआ होगा. यदि ये कहें कि आश्चर्य से ज्यादा कुछ अजीब सी अनुभूति आई होगी, हमारे प्रति एक अलग तरह की ही सोच बनी होगी तो इसमें आश्चर्य न होगा. हमने खुद इस शीर्षक को लिखने के पहले बहुत सोचा मगर सच यही लगा कि हम सबने अब मौत को ‘एन्जॉय’ करना शुरू कर दिया है. ऐसा इसलिए भी कह सकते हैं क्योंकि इस कोरोना के विषम समय में भी लोग मौत की खबरों का प्रसारण करने से खुद को नहीं रोक पा रहे हैं. मौतों का होना एक तरह की घटना है जो उससे सम्बंधित व्यक्ति को जोड़ती है तो बहुत से लोगों को परेशान भी करती है. ऐसा समझने के बाद भी यदि हम मौत की खबरों का इधर-उधर भेजना नहीं रोक पा रहे हैं तो स्पष्ट है कि अब किसी की मौत हमें परेशान नहीं करती. किसी की मौत हमें संवेदित नहीं करती. किसी की मृत्यु हमें विचलित नहीं करती.


हाँ, ऐसा तब गलत हो जाता है जबकि ऐसा किसी हमारे अपने के साथ हुआ हो. किसी अपने की मृत्यु पर हम विचलित भी होते हैं, संवेदित भी होते हैं, भावनाओं में भी बहते हैं. अपने परिजनों से इतर, अपने ख़ास लोगों से अलग किसी भी मृत्यु को हम सभी आजकल एन्जॉय करने लगे हैं. ऐसा गलत न लगे तो खुद देखिये आजकल सोशल मीडिया पर मौतों की खबरों को. ऐसे-ऐसे लोगों के बारे में लोग खबरें लगाने में लगे हैं जिनसे उनका सीधे-सीधे कोई लेना-देना नहीं है. बात यहाँ तक कुछ ठीक भी मान ली जाये मगर कुछ लोग इससे आगे जाकर मौतों पर कार्टून बनाने लगे, मीम्स, जोक्स बनाकर मस्ती करने लगे. इसे क्या कहा जायेगा? क्या ये किसी कि मौत को एन्जॉय करना नहीं? कोरोना से होने वाली मौतों, श्मशान घाट के चित्र, वीडियो, चिकित्सालयों में मृतकों और उनसे जुड़े लोगों की स्थिति आदि को संवेदनहीनता के स्तर से दिखाया जाना यही साबित करता है.




इधर ऐसा समझ आ रहा है कि आजकल सोशल मीडिया की जन-जन तक पहुँच ने भी संवेदनशीलता को समाप्त किया है. हर हाथ में मोबाइल और हर हाथ में इंटरनेट ने सभी को पत्रकार बना दिया है. एक ऐसा पत्रकार जो संवेदनहीन है, समाज की वास्तविकता से परे है. उसे पता नहीं है कि उसके द्वारा प्रसारित करने वाली किस खबर से समाज पर, समाज के व्यक्तियों पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है. उसे इसका भी भान नहीं है कि उसके द्वारा जाने-अनजाने में प्रसारित की जाने वाली खबरों से, प्रसारित किये जाने वाले चित्रों से लोगों के मन-मष्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ रहा है. सबसे पहले हम की अनावश्यक कोशिश के चलते बहुधा दुर्घटनाओं की फोटो लोगों के मोबाइल पर सहज पहुँच में हैं. ऐसी फोटो देखने के बाद जहाँ एक तरफ संवेदना उपजनी चाहिए मगर ऐसा होता नहीं है.


दरअसल हम सभी की संवेदनाएं मर चुकी हैं. रोज हम हत्या, बलात्कार, दुर्घटना, मृत्यु की सजीव फोटो देखते रहते हैं. दो-चार दिन की संवेदना के बाद हम सभी वही चिर-परिचित पाषाण ह्रदय बन जाते हैं. उसके बाद सामने वाला हमारे लिए महज एक देह बन जाता है. देखने वाला उसे अपनी आँखों से देखता है. कोई उस मृत देह की मांसलता देखता है, कोई उस मृत देह में जेवरात खोजता है, कोई उसके परिधान देखता है. किसी के लिए भी वह संवेदनशीलता का मसला नहीं होता है. एक पल में सम्बंधित चित्र को देखने के बाद, सम्बंधित खबर को पढ़ने के बाद उससे सम्बंधित कार्टून, चुटकुले दिमाग में उभरने लगते हैं. इसके बाद वही होता है जो आजकल हम सभी करने में लगे हैं. एक चित्र और उसके साथ कई-कई चुटकुले, कार्टूनों का प्रसारण, शेयर कई-कई लोगों तक होने लगता है. आखिर हम सबको उस मौत पर एन्जॉय तो करना ही है क्योंकि वो मरने वाला हमारा अपना नहीं. अब वो मरने वाला कोई नामचीन है या फिर सामान्य व्यक्ति, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हमें तो बस इससे मतलब है कि उसमें ऐसा क्या है जो उसकी मौत भी हमारा एन्जॉय कर सके.

 

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25 मई 2019

बच्चों का ऊँची इमारत से कूदने को भी तुमने इवेंट बना दिया


सूरत की बिल्डिंग में लगी आग सिर्फ वहाँ की अव्यवस्था की निशानी नहीं है बल्कि वहाँ तमाशबीन बने नागरिकों के संवेदनहीन होने की तथा सरकारी तंत्र की नाकामी की भी निशानी है. आग लगने के बाद जिस तरह से उस इमारत की चौथी मंजिल से बच्चे कूदते दिखाई दे रहे थे, वह घबराहट पैदा करने वाला है. उन बच्चों को निश्चित ही यह मालूम होगा कि इतनी ऊँचाई से कूदने के बाद उनके बचने की उम्मीद बहुत कम होगी. इसके बाद भी उनका कूदना कहीं न कहीं यही आशा लिए होगा कि शायद बच जाएँ. संभव है कि आग लगने के दौरान मची भड़भड़ के दौरान उन बच्चों को पहले तो आग से अपनी जान बचाना समझ आया होगा, वे यह भूल ही गए होंगे कि ऊंची इमारत से कूदना भी सुरक्षित नहीं है. वे बच्चे तो अग्निकांड से, बढ़ते धुँए से परेशान रहे होंगे, अपनी जान बचाने की कोई न कोई राह तलाश रहे होंगे, किसी न किसी तरह बस बचना चाह रहे होंगे. उस समय उनके सोचने-समझने की क्षमता पर ग्रहण लगना स्वाभाविक सा है मगर उसी इमारत के नीचे इकट्ठी भीड़ तो संज्ञा-शून्य नहीं थी. उसके पास किसी तरह से बचने की, अपनी जान बचाने की कोशिश करने की कोई हड़बड़ी नहीं थी. उसके सामने उसकी जान का संकट भी नहीं था. इसके बाद भी तमाशबीन भीड़ बस एक संवेदनहीन भीड़ ही बनी रही. अपने परिचितों के उन लोगों को जो वहां नहीं थे, उनके लिए, सूरत से दूर बैठे उनके परिचितों के लिए, सोशल मीडिया के मित्रों के लिए वे वीडियो बनाने में लगे हुए थे.


एक पल को सोचिये, चौथी मंजिल से कूदते बच्चे, सड़क पर खड़ी भीड़, वीडियो बनाते लोग, चिल्लाते-सिर पकड़ते नागरिक, मुँह ताकती फायर ब्रिगेड की फ़ौज. यह सब दिल दहलाने वाला है. सोचकर ही दिल डूबने सा लगता है. मन उदास नहीं होता वरन उस भीड़ पर गुस्सा करता है. वीडियो बनाती भीड़ ने, आग बुझाने आये दमकलकर्मियों ने उस समय अपना दिमाग क्यों नहीं दौड़ाया? क्यों उन्होंने कूदते बच्चों को बचाने के प्रयास नहीं किये? सोचिये, क्या उस बिल्डिंग के आसपास की दुकानों में चादरें न रही होंगी, परदे न रहे होंगेक्या भीड़ बनकर ताकते, रिकॉर्डिंग करते लोग मिलकर एक सघन घेरा नहीं बना सकते थेक्या फायर ब्रिगेड के पास कूदते लोगों को बचाने के लिए कोई जाल वगैरह नहीं होता? या फिर इन सब सवालों से बड़ा सवाल कि क्या हम सब संवेदनहीन हो चुके हैं? हम वाकई संवेदनहीन हो चुके हैं. जितनी भीड़ वहाँ दिख रही है उसके द्वारा उसी तरह से मानव इमारत बनाया जा सकता था जैसा कि दही-हांडी फोड़ने के समय बनाया जाता है. ऐसा यदि उस भीड़ के द्वारा नहीं किया जा सकता था तो कम से कम भीड़ मिलकर सघन घेरा बना सकती थी.  चादरों, पर्दों के द्वारा, नागरिकों के बनाये सघन घेरे से गिरते बच्चों के फ़ोर्स को कम तो किया ही जा सकता था. ऐसा कुछ नहीं किया जा सका. न तो भीड़ जिम्मेवार दिखी और न ही अग्निशमन वाले. क्या उस विभाग के पास इतने इंतजाम नहीं कि ऊंची इमारत तक पहुँचा जा सके? क्या उसके पास किसी ऊंची इमारत से कूदते-गिरते लोगों को बचाने के लिए एक जाल नहीं. यह उस विभाग की, सरकारी तंत्र की अक्षमता को ही दर्शाता है. 


अब सारा ठीकरा कोचिंग सेंटर पर, उसकी अनुमति देने वाले पर, उस इमारत के मालिक पर फोड़ा जायेगा. उनको दोष देते हुए सारे मामले को दबाने की कोशिश की जाएगी. तमाम सारे अनर्गल कदम उठाये जाने के बाद भी कोई सार्थक कदम नहीं उठाया जायेगा. किसी को जिम्मेवार न बनाते हुए बस उस हादसे को भुला दिया जायेगा. समझ नहीं आता कि इस तरह की बड़ी-बड़ी इमारतों में बाहर निकलने के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किये जाते? क्यों इस तरह की व्यापारिक, व्यावसायिक जगहों पर सुरक्षा के इंतजाम सशक्त नहीं किये जाते? क्यों प्रशासन द्वारा नागरिकों को ऐसी किसी विभीषिका से निपटने के तरीके नहीं बताये जाते? बाकी कोचिंग सेंटर्स या फिर ऐसी ऊँची-ऊँची इमारतों में संचालित अनेक संस्थाओं, रेस्टोरेंट, दुकानों आदि की सुरक्षा व्यवस्था के बारे में कहना ही क्या. हम सभी लोग, सबकुछ जानने के बाद भी अनजान बने रहते हैं. आँखों पर पट्टी बांधे रहते हैं. होंठों को सिले रहते हैं. अब बोलेंगे भी, लिखेंगे भी, आँसू भी बहाए जायेंगे, मोमबत्तियां भी जलाई जाएँगी, जुलूस निकाले जायेंगे मगर ध्यान रखियेगा, जो बच्चे चले गए, वे वापस न आयेंगे. और हाँ, हम इसके बाद भी आगे के लिए सचेत न हो पाएंगे.