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02 अक्टूबर 2024

इजरायल-ईरान संघर्ष के भारतीय सन्दर्भ

हिजबुल्लाह प्रमुख हसन नसरल्लाह की मौत के बाद भी इजराइल ने लेबनान में चरमपंथी समूह के ठिकानों पर बमबारी जारी रखी. उसने साफ कहा था कि वह हमले बंद नहीं करेगा और इजराइल के हितों पर हमला करने वाले किसी भी देश को नष्ट कर देगा. इजरायल द्वारा हिजबुल्लाह पर ताबड़तोड़ हमलों के बाद आशंका व्यक्त की जा रही थी कि कहीं इसकी परिणति ईरान द्वारा इजरायल पर हमला करने के रूप में न हो. यह आशंका मंगलवार शाम को सच साबित भी हुई जबकि ईरानी सेना ने इजरायल पर बैलिस्टिक मिसाइलों की बौछार कर दी. उसकी सेना द्वारा हमले में मुख्‍य रूप से सेना और सुरक्षा एजेंसी को निशाना बनाया गया. हमले के बाद इजरायली मीडिया ने बताया कि ईरान ने इजरायल पर 180 के आसपास बैलिस्टिक मिसाइलें दागी हैं. इस हमले के तुरंत बाद इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि ईरान ने उस पर हमला करके बहुत बड़ी गलती की है. उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. नेतन्याहू के इस बयान के बाद दोनों देशों के मध्य सीधे युद्ध की आशंका तीव्र हो गई है. माना जा रहा है कि इजरायल किसी भी वक्त ईरान पर सीधा हमला कर सकता है.  

 

पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के साथ ही इजराइल और हिजबुल्लाह के बीच संघर्ष का वर्तमान दौर के चलते सम्पूर्ण अंतरराष्ट्रीय समुदाय महत्वपूर्ण मोड़ पर है क्योंकि इस संघर्ष में अब ईरान के शामिल हो जाने से भू-राजनीतिक चुनौतियाँ बढ़ गई हैं. ईरान की यौद्धिक स्थिति पर विचार करते समय सावधानी बरतना जरूरी है. इजराइल के पास बड़ी सैन्य शक्ति है और उसे अमेरिका से समर्थन प्राप्त है. ईरान के साथ इजरायल की युद्ध स्थिति यदि बढ़ती है तो इसके परिणाम को और वर्तमान को भारतीय हितों के सन्दर्भ में समझने की आवश्यकता है. जहाँ तक भारत के हितों का सवाल है, पश्चिम एशिया, विशेष रूप में खाड़ी देशों में भारतीय नागरिकों के लिए यह संघर्ष एक तरह का जोखिम पैदा कर ही सकता है.

 



यदि भारतीय सन्दर्भों में इजरायल और ईरान को देखें तो किसी समय भारत की नीति फिलिस्तीन को समर्थन देने की रही है मगर पिछले दो दशकों से अधिक समय से भारत और इजरायल के बीच सम्बन्ध प्रगाढ़ हुए हैं. सैन्य सम्बन्धों, उपकरणों, तकनीकी, ख़ुफ़िया तंत्र आदि के विकसित स्वरूप के लिए इजरायल बराबर भारत का साथ दे रहा है. पिछले दशक में 2.9 अरब डॉलर मूल्य की मिसाइलें, रडार, निगरानी और लड़ाकू ड्रोन का निर्यात इजरायल से किया गया है. इजरायल के साथ-साथ भारत के सम्बन्ध ईरान के साथ भी महत्त्वपूर्ण समझे जाते हैं. देश का चाहबार पोर्ट उन्हीं के क्षेत्र में हैं, जिसके माध्यम से यूरोप को जोड़ने की कल्पना को साकार किया जा सका है. भारत ने 2016 में चाबहार को विकसित करने के लिए 8.5 करोड़ डॉलर का निवेश किया था और तेहरान को 15 करोड़ डॉलर की क्रेडिट लाइन भी दी थी. इसके साथ-साथ ईरानी तेल-गैस भी भारत के लिए हाइड्रोकार्बन के निकटतम स्रोत हैं. अमेरिकी प्रतिबंधों से पहले भारत ईरानी तेल का बड़ा खरीदार था. ऐसे में इजरायल और ईरान का संघर्ष बढ़ने पर भारत के सामने नई चुनौती आएगी.

 

ईरान युद्ध में शामिल होने के बाद ऐसा माना जा रहा है कि वह तेल की आपूर्ति को बाधित कर सकता है या फिर यह बाधा युद्ध के कारण स्वतः बन सकती है. दोनों ही स्थितियों में तेल की कीमतों का बढ़ना तय है. भारत कच्चे तेल के क्षेत्र में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है और उसे अपनी ऊर्जा-आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ता है. ऐसे में तेल कीमतों की वृद्धि से भारतीय आर्थिक विकास दर के नकारात्मक स्थिति में जाने की आशंका भी बनती है. यह देश के आर्थिक विकास की दृष्टि से उचित नहीं. इसके अलावा खाड़ी देशों में काम करते भारतीयों पर भी इस युद्ध का नकारात्मक असर पड़ने की सम्भावना है. एक अनुमान के अनुसार नब्बे लाख के आसपास भारतीय नागरिक खाड़ी देशों में काम करते हैं. ईरान के हमले के बाद यदि इजरायल सीधे-सीधे युद्ध की स्थिति में उतर आया तो ऐसी स्थिति में ये भारतीय खाड़ी देशों से वापस अपने देश को आने लगेंगे. इससे भी मध्य पूर्व क्षेत्र में भारत के लगभग 195 बिलियन डॉलर के बाईलेटरल व्यापार पर भी असर पड़ेगा.

 

यद्यपि भारत द्वारा इजरायल-हमास संघर्ष के आरंभिक दौर से ही इस संघर्ष को शांत करने के प्रयास किये जाते रहे तथापि उसे इसमें सफलता नहीं मिली. इजराइल पर हमास के आतंकवादी हमले के बाद से ही भारत ने मध्य-पूर्व क्षेत्र के सऊदी अरब, ईरान, मिस्र, फिलिस्तीन सहित अनेक यूरोपीय नेताओं से वार्ता की. लगातार चर्चाओं, वार्ताओं के बाद भी संघर्ष बढ़ता ही गया और अब वह एक युद्ध के रूप में नजर आ रहा है. भारत के ईरान के साथ लम्बे समय से रणनीतिक संबंध हैं, वहीं मोदी सरकार ने इजराइल के साथ भी गहरे सम्बन्ध विकसित किए हैं. ऐसे में भारत को आतंकी संगठनों, आतंकवादियों के समूल नाश किये जाने के प्रति दृढ़प्रतिज्ञ रहते हुए भविष्य और तमाम आशंकाओं के सन्दर्भ में दोनों देशों के साथ कूटनीतिक स्तर पर कदम बढ़ाते हुए युद्ध जैसी स्थिति को न बनने देने के प्रयास करने चाहिए.


18 जुलाई 2014

गाजा-संकट पर चर्चा की माँग, असंवेदनशील विपक्ष की पहचान

संसद में बैठे विपक्षी अत्यंत चिंतित हैं इजराइल-फिलिस्तीन संकट को लेकर। वे इस पर सदन में बहस करवाकर कोई प्रस्ताव पारित करवाने की माँग पर अड़े हैं और सत्ता पक्ष इसके लिए कतई तैयार नहीं दिखता है। विपक्षियों का अपने तरीके से सोचना शायद जायज हो सकता है, आखिर  हमारी सरकार और हमारे विपक्ष ने देश की सभी समस्याओं को सुलझा लिया है। देश में किसी तरह की, कोई भी समस्या अब दिख नहीं रही है। राष्ट्रीय स्तर की बड़ी से बड़ी समस्याएँ एकाएक सुलझ गई हैं; पड़ोसी देशों के साथ आये दिन होने वाली समस्यायों का निदान भी हो चुका है। अब पाकिस्तान की तरफ से किसी भी तरह की आतंकी घटना नहीं होती है, कश्मीर को अत्यंत सहज रूप में उसने भारत का हिस्सा मानकर अपने हिस्से वाला कश्मीर खाली कर दिया है। कुछ इसी तरह का हाल चीन का है, उसने अरुणाचल प्रदेश सहित तमाम भारतीय भूमि पर अपने कब्जे को छोड़ दिया है; घुसपैठ जैसी कोई हरकत उसने करनी बंद कर दी है। देश की अंदरूनी समस्याओं से भी निजात मिल चुकी है, महिलाएं-बेटियाँ सुरक्षित हैं; मंहगाई पूर्ण नियंत्रण में है; बिजली-संकट जैसी कोई चीज नहीं; सबको रोटी-कपड़ा-मकान-रोजगार-शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताएं सहज उपलब्ध हैं। ऐसे में अब संसद करे तो क्या करे, ये बहुत बड़ा सवाल है विपक्षियों के सामने। तो फिर उन्होंने केंद्र सरकार का ध्यान राष्ट्रीय मुद्दों के समाधान के बाद अंतर्राष्ट्रीय संकटों को सुलझाने पर लगाया है।
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विपक्षी कहीं संसद को संयुक्त राष्ट्र संघ का कार्यालय तो नहीं समझने लगे हैं? कहीं वे ये तो मान नहीं बैठे हैं कि इजराइल-फिलिस्तीन के साथ दोस्ताना संबंधों के चलते भारतीय संसद कोई प्रस्ताव पारित कर देगी तो दोनों देश उसे मानने पर मजबूर हो जायेंगे? कहीं विपक्षियों, विशेष रूप से कांग्रेसियों को ये भ्रम तो नहीं पैदा हो गया है कि वे अभी भी सत्ता में हैं और इंदिरा-राजीव नाम के रूप में इजराइल या फिलिस्तीन को समझा लेंगे? ऐसे अवसर पर जबकि दोनों देशों के साथ भारत के सम्बन्ध दोस्ताना रहे हैं, किसी एक देश के पक्ष में समर्थन दिखाने का या प्रस्ताव पारित करने का विदेशी राजनयिक संबंधों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसके अलावा बजाय इस संकट पर बहस के वहाँ फंसे भारतीयों, यदि हैं, को निकालने सम्बन्धी कोशिशों पर चर्चा हो; ऐसे ही किसी संकट के अपने आसपास उत्पन्न हो जाने की दशा में उससे निपटने के तरीकों पर चर्चा हो; ऐसे संकट के चलते पेट्रोलियम पदार्थों की अनुपलब्धता होने की दशा में उसके समाधान के उपायों पर चर्चा हो किन्तु ऐसा कुछ नहीं हो रहा है।
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यदि विपक्ष विदेशी संकटों के मामलों में बहस का इतना ही इच्छुक है, विदेशी राजनयिक संबंधों को लेकर इतना ही सजग रहता है तो उसने ऐसी पहल ईरान संकट के समय क्यों नहीं की? उसके लिए युक्रेन की समस्या सामने आने पर ऐसा कदम क्यों नहीं उठाया गया? चीन-पाकिस्तान के कुकृत्यों का जवाब देने के लिए विपक्ष आगे क्यों नहीं आया? दरअसल वर्तमान में विपक्ष का मूल एजेंडा किसी भी रूप में केंद्र सरकार को अस्थिर बनाये रख कर कार्यों में व्यवधान उत्पन्न कराना है; केंद्र सरकार को किसी भी रूप में गलत साबित करना है। विपक्षी यदि सदन में चर्चा के इतने ही शौक़ीन हैं तो घरेलू मुद्दों पर बहस करें क्योंकि सदन तो बहस के लिए, चर्चा के लिए ही बना हुआ मंच है। अभी हमारा देश अपनी मूलभूत समस्याओं से निजात नहीं पा सका है; अभी बिजली-संकट जबरदस्त रूप से गहराया है; पिछली सरकार के घोटालों के भूत सिर पर मंडरा रहे हैं; बेटियाँ रोज ही शारीरिक शोषण-हत्या का शिकार हो रही हैं; माननीय आये दिन किसी न किसी अपराध में लिप्त होते दिख रहे हैं; अपराधी जेलों में रहकर भी माननीय बनते जा रहे हैं; नौनिहाल शिक्षा-स्वास्थ्य-रोटी के लिए आज भी भटक रहे हैं; मूलभूत आवश्यकताओं का रोना आज भी लगा हुआ है। इजराइल-फिलिस्तीन संकट के मद्देनजर सदन में चर्चा को व्याकुल विपक्षी जन-हित, देश-हित मुद्दों पर बहस के लिए केंद्र सरकार को घेरें तो उनकी भी कुछ सार्थकता है अन्यथा की स्थिति में वातानुकूलित सदन में अपनी-अपनी जीभ की खलिश मिटाने के अलावा और कुछ नहीं किया जा सकता है। विपक्ष का ये रवैया संवेदनशील विपक्ष की नहीं वरन केंद्र सरकार के कार्यों में रोड़े अटकाने वाले और जन-हित, देश-हित के कार्यों से मुँह चुराने वाले विपक्ष की पहचान है।
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02 सितंबर 2013

धार्मिक आडम्बरों की अंध-दौड़ के चलते जागरूकता संभव नहीं




पिछले कुछ दिनों से देश की मीडिया द्वारा यौन शोषण के आरोपी आसाराम की पल-पल की गतिविधि को इस तरह से प्रस्तुत किया जा रहा है जैसे देश के सामने वर्तमान में एकमात्र समस्या यही रह गई हो. इधर आसाराम के समर्थक और विरोधी सीधे-सीधे निष्कर्ष देने में लगे हुए हैं. सत्यता क्या है ये तो जाँच के आधार पर ही ज्ञात हो सकेगा किन्तु जिस तरह से इसे हाईप्रोफाइल ड्रामा बना दिया गया वो नागरिकों के मानसिक स्तर को समझने के लिए पर्याप्त है. बलात्कार, यौन शोषण के अनेक मामलों में एकाध पर जबरदस्त प्रतिक्रिया होना, मीडिया का एकाएक सरगर्मी के बाद चुप हो जाना, संवेदनशीलता का नेपथ्य में चले जाना आदि हमारी क्षणिक जागरूकता प्रदर्शित करता है. इसके ठीक उलट आसाराम प्रकरण लगातार मीडिया में, सोशल मीडिया में, जनमानस में अपनी सुगबुगाहट बनाये रहा, जो अपनी अलग ही कहानी कहता है.
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इक्कीसवीं सदी में पदार्पण कर जाने के, विज्ञान के ज्ञान के बाद भी भारतीय जनमानस खुद को धर्म से, धार्मिक कर्मकांडों से, धार्मिक व्यक्तित्वों से अलग नहीं कर सका है. धर्मगुरु पर लगने वाला कोई भी आरोप उसके समर्थकों के विश्वास को खंडित करता है, भावनाओं को चोट पहुँचाता है, भक्तों की भक्ति पर उँगली उठाता है. ऐसा किसी एक धर्म मजहब के साथ नहीं बल्कि ये स्थिति सभी धर्मों के सन्दर्भ में एक जैसी ही है. किसी भी धर्मगुरु के प्रति उसके भक्तों की अगाध श्रद्धा को सभी धर्मगुरु जानते-समझते हैं और गाहे-बगाहे इसका अनुचित लाभ भी उठाते रहते हैं. भारतीय समाज में बचपन से ही धर्म के प्रति जिस तरह से एक अलग किस्म की घुट्टी पिलाई जाती है उसके बाद धर्म के विरुद्ध जा पाना प्रत्येक व्यक्ति के लिए संभव नहीं हो पाता है. इसी के चलते लाभ-हानि, अर्थ-अनर्थ, स्वर्ग-नरक, मंगल-अमंगल आदि अवधारणाओं ने मन-मष्तिष्क को कुंद कर दिया है.
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तथाकथित धर्मगुरुओं के अनगिनत और रसूखदार अनुयायी होने के कारण जहाँ ये बाबा अकूत संपत्ति के मालिक बन बैठते हैं वहीं धर्म की आड़ में आपराधिक गतिविधियों का सञ्चालन भी करने लगते हैं. एक आसाराम प्रकरण ने ही नहीं बल्कि देश के विभिन्न धर्मों के विभिन्न तथाकथित गुरुओं ने अपने क्रियाकलापों से धार्मिक विश्वास को खंडित किया है. धार्मिक उपदेश देते, प्रवचन करते इन तथाकथित बाबाओं को अपने अनुयायियों का विश्वास खंडित करने से, धार्मिक पाखण्ड फ़ैलाने से भले ही कोई न रोक पाए किन्तु इनकी अंध-भक्ति में लीन इनके अनुयायियों को समझाना होगा कि वास्तविकता क्या है...उनके धर्म-गुरुओं की असलियत क्या है. हालाँकि धार्मिक आडम्बरों की अंध-दौड़ में शामिल समाज से ऐसी जागरूकता दिख पाना हाल-फ़िलहाल तो संभव नहीं लगता.

23 अगस्त 2013

देश की साख सम्पूर्ण विश्व में बद से बदतर स्थिति में पहुँच जाएगी




भारत निर्माण के स्वप्न के बीच फाइलों का गायब हो जाना, अतिथि देवो भवः की संकल्पना के साथ ही विदेशी महिला पर्यटकों के साथ बलात्कार की घटनाएँ, सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश का दंभ और घनघोर अलोकतांत्रिक हरकतें, विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने के आँकड़े और देश की अर्थव्यवस्था का ही धड़ाम सा होते दिखना, आतंकवाद को कड़े से कड़ा सबक सिखाने की भभकी और देश का आतंकवाद में भभकना, पड़ोसी देशों के साथ मैत्री बनाये रखने को बारम्बार शुरुआत फिर भी पड़ोसियों के हाथों पिटते रहने की विवशता आदि को सिर्फ हम ही नहीं देख रहे हैं बल्कि सम्पूर्ण विश्व देख रहा है. इन तमाम स्थितियों के अलावा और भी ऐसी स्थितियाँ हैं जो हमारे देश को शर्मसार करती हैं. इन घटनाओं को रोकने के लिए, इनके समाधान के लिए सरकार, शासन, प्रशासन से सकारात्मक कदम उठाये जाने के स्थान पर आपसी वाद-विवाद, तर्क-कुतर्क, आरोप-प्रत्यारोप आदि के काम किया जा रहे हैं. जहाँ एक तरफ सत्ता पक्ष तानाशाह के रूप में काम कर रहा है वहीं विपक्ष सिर्फ विरोध के लिए विरोध करने की नीति अपनाये हुए है.
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तमाम सारी विसंगतियों को, अव्यवस्थाओं को सुधारने के स्थान पर, समस्याओं का कोई हल निकालने के स्थान पर तिकड़मबाज़ी के दौर चलाये जा रहे हैं. बेतुके और ऊलजलूल बयान दिए जा रहे हैं. ऐसा करते समय ये सब के सब यह भूल जाते हैं कि आज मीडिया, सोशल मीडिया, विदेशी मीडिया, इंटरनेट आदि के कारण से एक पल में समूचा घटनाचक्र सम्पूर्ण विश्व में प्रसारित-प्रचारित हो जाता है. ये अपने में दुखद है कि बजाय देश की मान-मर्यादा को जानने-समझने के सबके सब अपनी-अपनी इज्जत, मान, सम्मान के लिए उठापटक मचाने में लगे हैं. देश में अपराधी अपराध करते हैं तो तुष्टिकरण के नाम पर उनको भी धर्म-जाति में बांटकर देखना शुरू कर दिया जाता है. पड़ोसी देश आतंकी हमला करता है तो वहां भी वोट-बैंक की राजनीति दिखाई जाने लगती है. चीन सीमा में घुसपैठ करता है तो भी शीर्षस्थ जन खामोश रहते हैं. महिलाओं-बच्चियों के साथ दुष्कर्म की घटनाएँ होती रहती हैं और सरकार मात्र बिल बनाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है. नित नए घोटाले सामने आते रहते हैं और जांच के नाम पर महज खानापूरी होते दिखती है. कभी कोई जांच या मामला तेजी पकड़ता दीखता है तो कभी कार्यालयों में आग लग जाती है तो कभी फाइल की फाइल गायब हो जाती हैं, वो भी सैकड़ों की संख्या में.
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सत्ता सुख के लालच में, धन-बल के मद में चूर शासनाधारियों को समझना चाहिए कि उनकी एक-एक हरकत को पूरा विश्व देख रहा है. सम्पूर्ण विश्व में देश की साख जहाँ सामाजिक स्तर पर कम हुई है वहां उसने आर्थिक क्षेत्र में भी नुकसान उठाया है. राजनीतिक रूप से भी हम कमजोर साबित हुए हैं तो हमारी विदेशनीति, कूटनीति को भी जबरदस्त तरीके से कमजोर साबित हुई है. आये दिन शीर्सस्थ लोगों द्वारा होती बेढंगी बयानबाज़ी न केवल देश में अस्थिरता का, संघर्ष का वातावरण बना रही है वरन विदेश में भी तमाम भारतीयों की छवि को धूमिल कर रही है. वर्तमान दौर तकनीकी का दौर है, इसे वो दौर न समझा जाये जहाँ किसी भी खबर को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचने में महीनों लग जाया करते थे. सूचना-संचार के इस क्रांतिकारी दौर में सम्पूर्ण परिदृश्य एक क्लिक पर सामने आ जाता है. ऐसे में हमारे रणनीतिकार, सत्ताधारी, विपक्षी, राजनीतिज्ञ, मीडिया, प्रशासन आदि की हवाई बयानबाज़ी, अनर्गल प्रलाप करने से इस देश की समस्याओं का, विषमताओं का, अव्यवस्थाओं का समाधान होने वाला नहीं अपितु इससे देश की साख सम्पूर्ण विश्व में बद से बदतर स्थिति में पहुँच जाएगी.

26 जुलाई 2013

अंतर्राष्ट्रीय मंच पर देश की धूमिल होती छवि



देश की राजनैतिक स्थिति लगातार पतन की ओर जाती दिख रही है. राजनैतिक दलों के, राजनीतिज्ञों के कारनामों को देखकर कई बार आशंका होती है कि क्या इस देश की राजनीति को अब सकारात्मक दिशा प्राप्त होगी भी या नहीं? तमाम सारी नकारात्मक बातों के साथ-साथ विगत दिनों दो-तीन बातों ने दर्शा दिया कि हमारे देश के राजनेताओं को किसी भी रूप में देश के नागरिकों की चिंता नहीं है, देश के सम्मान की चिंता नहीं है, देश की अंतर्राष्ट्रीय पहचान की कोई फ़िक्र नहीं है. विरोध की राजनीति क्षुद्रता की पराकाष्ठा तक पहुँचकर सांसदों को विदेशी देश से निवेदन करने तक ले जाती है. मोदी को वीजा न दिए जाने के लिए देश के सांसदों का अमेरिका को पत्र लिखना और उसमें भी हस्ताक्षर का फर्जीबाड़ा दर्शाता है कि देश का सम्मान इन राजनीतिज्ञों ने ताक पर रख दिया है. किसी भी व्यक्ति से, किसी भी दल से, उसकी विचारधारा से विरोध होना लोकतंत्र की पहचान है किन्तु जब विरोध की राजनीति कटुता पर आ जाये, क्षुद्रता पर आ जाये तो पतनकारी होती है. मोदी से, भाजपा से विरोध होना स्वाभाविक हो सकता है किन्तु मोदी के वीजा देने न देने के सम्बन्ध में देश के सांसदों का अमेरिका को पत्र लिखना हमारी लचर विदेश नीति का परिचायक है. उस पर कुछ सांसदों के फर्जी हस्ताक्षर होना विरोधियों के मानसिक दीवालियेपन की पहचान है. क्या अमेरिका या ओबामा हमारे नीति-नियंता हैं, जिनके सामने हमारे सांसद गुहार सी लगाते दिख रहे हैं. विरोध और वोट-बैंक की क्षुद्र राजनीति में हमारे सांसदों ने फर्जी हस्ताक्षर कर, अमेरिका को पत्र लिखकर देश के सम्मान से खिलवाड़ ही किया है.
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देश के सम्मान से खेलने के अतिरिक्त हमारी सरकार और कुछ राजनीतिज्ञ देश के नागरिकों की, गरीबों की भावनाओं से खिलवाड़ करने में लगे हैं. योजना आयोग के हालिया आंकड़ों ने गरीबों की संख्या, उनके गुजर-बसर के नए मानक तय किये, जो हास्यास्पद नहीं गरीबों की हालत का मखौल उड़ाते हैं. आज मंहगाई की, खाद्य-पदार्थों की, आम जरूरत की वस्तुओं की कीमतें जहाँ हैं वहां योजना आयोग के निर्धारित मानकों से पहुंचना तो दूर, वहां पहुँचने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है. योजना आयोग के मजाकिया लहजे को, हास्यास्पद बनाते आंकड़ों को कुछ नेताओं के बयान विद्रूप बनाते हैं. एक महाशय को दिल्ली में पाँच रुपये में भरपेट भोजन मिल जाता है तो एक महानुभाव बारह रुपये में मुम्बई में पूरा भोजन आज भी कर लेते हैं. ये बयानबाज़ी सिर्फ सरकारी आंकड़ों को सही सिद्ध करने की बाजीगिरी ही नहीं वरन चापलूसी की इन्तिहाँ होने के साथ-साथ गरीबों-गरीबी का मजाक उड़ाने की जिद भी है. ये नेता दर्शा रहे हैं कि उनके आका जैसा चाहते हैं वही सत्य है. उनके द्वारा दिया गया झूठ का पुलिंदा भी सत्य का पिटारा है. समझने की बात है जहाँ एक-एक रोटी की कीमत आसमान छू रही है, सिर्फ नमक पाने को पाँच रुपये अत्यल्प हो वहां भरपेट भोजन की बात कहना चापलूसी की हद ही कही जाएगी.
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बेशक ये सारी बयानबाजियां आगामी लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखकर सरकारी लीपापोती करने के लिए की जा रही हों पर इससे अंतर्राष्ट्रीय मंच पर देश की छवि पर कालिख ही मली जा रही है. अनेकानेक घोटालों, भ्रष्टाचार, कांडों के कारण अंतर्राष्ट्रीय पटल पर असहाय सा महसूस कर रहे देश में इस तरह की क्षुद्र बयानबाज़ी गिरावट के नए आयाम विकसित करेगी. वैसे भी आज के चापलूसी, तुष्टिकरण, पतनकारी, चरित्रहीनता, राजनैतिक अपराधीकरण के इस दौर में शुचिता की, चारित्रिकता की, संयम की, ईमानदारी की, नागरिकों के प्रति जिम्मेवारी की कल्पना करना निरर्थक ही है.

17 मई 2013

नपुंसक जातियां क्रांति नहीं किया करती



हालात दिन प्रतिदिन बिगड़ते ही दिख रहे हैं, जनप्रतिनिधि हर पल निरंकुश नज़र आ रहे हैं, सत्ताधारी निर्लज्ज से समझ आते हैं, विपक्ष गुमसुम सा दिखाई देता है, जनता बदहाल-परेशान-विक्षिप्त लगती है.....ये किसी एक नगर के, किसी एक राज्य के हालात नहीं वरन समूचे देश के हैं. किसी एक क्षेत्र में नहीं, किसी एक व्यक्ति के द्वारा नहीं, किसी एक संस्था-संगठन के द्वारा नहीं बल्कि प्रत्येक जिम्मेवार पद के द्वारा ऐसा किया जा रहा है. देश के हालात का आज जो अव्यवस्थित रूप है, वर्तमान सरकार-विपक्ष का आज जो स्वरूप है, जनप्रतिनिधियों के जो रंग-ढंग हैं, सरकारी पदासीन लोगों का जो रवैया है वो सिर्फ और सिर्फ बदतर हालात की तरफ इशारा करता है. आज़ादी के पहले का तो नहीं किन्तु शायद आज़ादी के बाद का ये सबसे बदहाल दौर चल रहा है, जिसमें कोई भी अपनी जिम्मेवारी के प्रति सचेत नहीं दीखता है. जो स्थिति आज है उसको देखकर ऐसा लगता है जैसे सभी के लिए भ्रष्टाचार करना अनिवार्य हो गया है, घोटाले करना जन्मसिद्ध अधिकार बन गया है, किसी के हक़ को मार जाना कर्तव्य हो गया है.
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गली-मोहल्ले में, नुक्कड़ों पर, पान-चाय की दुकानों पर बहुतायत में लोग देश के ऐसे हालातों पर चर्चा करते मिल जायेंगे. घूम फिर कर नेताओं-मंत्रियों-अधिकारीयों के कुकृत्यों की निंदा की जाएगी, उनके कार्यों की भर्त्सना की जाएगी और कहीं न कहीं देश में एक क्रांति की सम्भावना व्यक्त की जाएगी. सिर्फ और सिर्फ बातों के बताशे फोड़ने वाले ऐसे लोग क्रांति के, परिवर्तन के, गृह-युद्ध जैसे हालातों की पूरी रूपरेखा तैयार कर देते हैं..उसके क्रियान्वयन की आधारशिला रख लेते हैं और वापस अपने-अपने घरों में लौट जाते हैं. हो सकता है जो हालात देश के हैं वे किसी न किसी क्रांति की सम्भावना को पैदा करते हों..किसी रूप में गृह-युद्ध के हालातों को बनाते हों किन्तु इसके बाद भी पूरे विश्वास से कहा जा सकता है कि देश में न तो कोई क्रांति होनी है...न ही किसी तरह के गृह-युद्ध की सम्भावना है. इसका कारण ये है कि क्रांतियाँ, परिवर्तन, गृह-युद्ध जैसी स्थितियों का सूत्रपात कभी भी, किसी भी कालखंड में नपुंसकों द्वारा नहीं हुआ है, सुसुप्त जातियों द्वारा नहीं हुआ है, स्वार्थ में लिपटे लोगों द्वारा नहीं हुआ है, क्षुद्र मानसिकता वालों ने ऐसा नहीं किया है.
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हो सकता है कि सोशल साइट्स पर, पान-चाय की दुकानों पर, बुद्धिभोगियों की गोष्ठी में, किसी किटी पार्टी में, किसी कॉकटेल पार्टी में अपनी विद्वता झाड़ते लोगों को ये बुरा लगे, नागवार गुजरे किन्तु ये सत्य है..आज का यही सत्य है. किस आधार पर हम क्रांति की बात करते हैं, परिवर्तन की बात करते हैं? चंद मोमबत्तियां जलाकर....जुलूस निकाल कर....मंत्रियों-सांसदों का घेराव कर....सड़क जाम कर....संपत्ति को आग लगाकर....? ये कुछ सांकेतिक स्वरूप हैं और इनके आधार पर परिवर्तन संभव ही नहीं. जिस देश में बच्चियां यौन शोषण का शिकार हो रही हैं, जहाँ वर्दीधारी खुलेआम लाठी भांजने से नहीं चूकते हैं, जहाँ रिश्तों में मर्यादा नाम की कोई चीज नहीं रह गई हो, जहाँ सरकार निर्लज्जता पर पूरी तरह उतारू हो, जहाँ विपक्ष सिर्फ अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग वाले रूप में हो, जहाँ स्वयंभू लोकतान्त्रिक चौथा खम्बा ‘पत्रकारिता’ संज्ञाशून्य हो.......उफ़!!! जहाँ सिर्फ अव्यवस्था ही अव्यवस्था हो वहां जनता चंद दिनों का आक्रोश दिखाकर, कुछ दिनों का विरोध जताकर खामोश हो जाये....जहाँ जनता के छोटे रूप में जागने के बाद भी भ्रष्टाचारियों में डर न जागे, जनता के क्षणिक आक्रोश के बाद भी अत्याचारियों में भय व्याप्त न हो, जनता की जलाई मोमबत्तियों से अँधेरा न मिटे तो समझ लेना चाहिए कि अभी क्रांति बहुत दूर है...अभी परिवर्तन बहुत दूर है. साथ ही ये भी स्मरण रहना चाहिए कि समूचे विश्व में क्रांति कभी भी नपुंसक जातियों-प्रजातियों ने नहीं की है. 
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