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17 मार्च 2026

बारूद के ढेर पर खड़ी दुनिया की ख़ामोशी

इस वर्ष का आरम्भ पश्चिम एशिया को एक ऐसे दोराहे पर ले आया है, जहाँ से वापसी का रास्ता हाल-फ़िलहाल युद्ध के मैदानों से गुजरता दिख रहा है. ईरान, इज़राइल-अमेरिका के बीच का छद्म युद्ध अब एक सीधे युद्ध में बदल चुका है. यह संघर्ष केवल तीन देशों की सीमाओं तक सीमित नहीं है बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, परमाणु अप्रसार और नई विश्व व्यवस्था के भविष्य को निर्धारित करने वाला है. इस युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से शामिल तीनों देशों- ईरान, इजरायल और अमेरिका के अपने-अपने निहितार्थ हैं. ईरान एक तरह से प्रतिरोधात्मक नेतृत्व का परिचायक बना हुआ है. वह इजरायल के खिलाफ कभी परदे के पीछे से लड़ता है तो कभी मिसाइलों के द्वारा सीधी चुनौती देता है. यह ईरान की बदलती सैन्य मानसिकता को दर्शाता है. यदि इस युद्ध को इजरायल के सन्दर्भ में देखा जाये तो उसके लिए यह युद्ध केवल सैन्य अभियान नहीं बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है. उसका रणनीतिक उद्देश्य अपनी सीमाओं की रक्षा करना मात्र नहीं है बल्कि ईरान के आतंकी ढाँचे- हमास, हिजबुल्लाह और हुथी को जड़ से मिटा देना है. यदि अमेरिका की बात करें तो वह इस त्रिकोण का सबसे जटिल सिरा है. अमेरिका एक तरफ इज़राइल को पूर्ण समर्थन देने की नीति अपनाना चाहता है साथ ही वह किसी भी तरह के पूर्ण क्षेत्रीय युद्ध से बचना भी चाहता है. उसका उद्देश्य कतई यह नहीं कि वह ऐसे किसी युद्ध के द्वारा मध्य-पूर्व में लम्बे समय तक उलझा रहे.

 



इन तीनों देशों की स्थितियाँ कुछ भी क्यों न रही हों, वर्तमान में कुछ भी क्यों न बनी हो किन्तु सत्य तो यही है कि ये तीनों देश आज प्रत्यक्ष युद्ध में उतर चुके हैं. इस तरह की स्थितियों से साफ़-साफ़ समझ आ रहा है कि किसी समय विश्व पटल पर बनी एकध्रुवीय व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है. अब विश्व जहाँ बहुध्रुवीय व्यवस्था की बात तो करता है साथ ही शांति के बजाय शक्ति प्रदर्शन को तैयार रहता है. एक अकेले इसी युद्ध की बात नहीं है, वर्तमान में वैश्विक स्तर पर चल रहे अनेक युद्ध, संघर्ष इसी का परिचायक हैं. लम्बे समय से चल रहे रूस-यूक्रेन संघर्ष ने साफ़ कर दिया है कि यूरोपीय सुरक्षा संरचना ताश के पत्तों की तरह बिखर चुकी है. ऐसा ही कुछ मध्य-पूर्व क्षेत्र में नजर आ रहा है. देखा जाये तो अब मध्य-पूर्व का यह तनाव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, इस युद्ध ने खाड़ी देशों को भी अपनी चपेट में ले लिया है.

 

यहाँ सर्वाधिक चिंता का विषय यह है कि अब युद्ध केवल टैंकों और मिसाइलों तक सीमित नहीं रह गए हैं. समाज के अन्य क्षेत्रों की तरह युद्ध भी अब हाइब्रिड दौर में हैं. यहाँ सीधा हमला करने के बजाय साइबर हमला किया जा सकता है. साइबर हमला करके किसी भी देश की आंतरिक मूलभूत व्यवस्था को ध्वस्त किया जा सकता है, न केवल दैनिक जीवन वाले क्षेत्रों में सेंध लगाई जा सकती है बल्कि आर्थिक सञ्चालन को भी प्रभावित किया जा सकता है. युद्ध अब केवल दो देशों के मध्य ही नहीं लड़ा जाता है बल्कि सम्बंधित देशों से कहीं दूर जमीन पर भी यह युद्ध चलता दिखता है. यदि वर्तमान ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध की बात करें तो होर्मुज जलडमरूमध्य को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है. ईरान के कब्जे में होने के कारण यहाँ से गुजरने वाले जहाजों को उसकी अनुमति की आवश्यकता है. ऐसा न होने की दशा में समूचे विश्व में तेल की, गैस की कमी दिख रही है. कहा जा सकता है कि अब युद्ध में केवल सैनिक नहीं मरते बल्कि आर्थिक मंदी और रसद की कमी के कारण दूर देशों के आम नागरिक भी इसकी कीमत चुकाते हैं. इसे ड्रोन, मिसाइल, बम आदि के साथ-साथ युद्ध में आर्थिक हथियार का प्रयोग करना कहा जा सकता है. होर्मुज से जहाजों का निकलना प्रतिबंधित करना, अन्य देशों पर अनेक तरह के प्रतिबंधों का लगाया जाना एक तरह का हथियार ही है, जिसमें उन देशों की आम जनता पिसती है जिनका युद्ध से कोई लेना-देना नहीं है. इसे ऐसे समझा जा सकता है कि ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध के चलते भारत सहित अनेक देशों में पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति बाधित होने से परेशानी उत्पन्न हुई जबकि ऐसे देशों का इस युद्ध से कोई सीधे-सीधे सम्बन्ध नहीं है.

 

ऐसे समय में विश्व की महाशक्तियों को समझना होगा कि शेष विश्व के लिए क्या सही है? विश्व जनसमुदाय की अपेक्षाएँ क्या हैं? अपनी शक्ति के अनावश्यक प्रदर्शन के स्थान पर महाशक्तियों को समझना होगा कि उनकी श्रेष्ठता सैन्य शक्ति से ज्यादा शांति बनाए रखने की क्षमता से तय होगी. यदि समय रहते हथियारों की होड़ को न रोका गया, विकास की दौड़ में शामिल न हुआ गया तो आने वाली पीढ़ियाँ बारूद की राख के भीतर ही अपना अस्तित्व खोजती रहेगी. विश्व भर में चल रहे बड़े-छोटे युद्धों, संघर्षों के परिप्रेक्ष्य में समझना होगा कि अब समय आ गया है कि विश्व समुदाय केवल सीमाओं की रक्षा न करे, केवल विस्तारवाद की नीति पर काम न करे बल्कि उस साझा मानवता की रक्षा करे जो युद्ध की भेंट चढ़ रही है. सत्यता यही है कि शांति कोई विकल्प नहीं बल्कि अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है.


14 मार्च 2026

सहयोग, प्रेम-भाव में कमी भी एक समस्या है

इसे वही समझ सकते हैं जो संयुक्त परिवार में रहते हैं या रहे हैं... या फिर जिनके घर में पर्व-त्यौहार-किसी आयोजन में समूचे नाते-रिश्तेदार जुटते हैं... एकसाथ एक ही घर में रहते हैं....

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सोचिए एक पल को कि घर-परिवार के सब लोग, नाते-रिश्तेदार एकसाथ किसी आयोजन में मिले. पंद्रह-बीस लोगों से घर में चहल-पहल मची है, हल्ला-गुल्ला मचा हुआ है. ऐसे में भोजन के समय चार-चार, पाँच-पाँच लोग सहजता से खाना खाते जा रहे हैं. रसोई में घर की महिलाएँ हँसी-मजाक के साथ सभी को सहजता के साथ भोजन उपलब्ध कराती जा रहीं हैं.

 

किसी दिन इस हँसी-मजाक में, हल्ला-गुल्ला में परिवार में जुटे सभी लोग एकसाथ भोजन करने बैठ जाते हैं, एक-दूसरे के साथ भोजन करने की ललक में. ऐसा होता है बिना किसी पूर्व सूचना के, बिना किसी पूर्व जानकारी के... अचानक से ही. चार-छह लगी थालियों में ही परिवार के कई लोग एकसाथ बैठकर मिलजुल कर भोजन करने लगते हैं. किसी की थाली से सब्जी, किसी की थाली से दाल, किसी की थाली से अचार, किसी की थाली से रोटी, किसी की थाली से रायता.... अब फिर सोचिए कि क्या स्थिति उत्पन्न होगी? भोजन करने वाले तो हँसी-मजाक करते हुए बिना कुछ परवाह किये खाना खाने में लगे हैं तभी अचानक से रसोई से रोटियाँ आने की गति रुक जाती है या कहें कि रोटियों का आना रुक सा जाता है. 

 

ऐसा नहीं है कि रसोई में घर की महिलाएँ रोटियाँ नहीं बना रहीं. ऐसा भी नहीं कि आटा समाप्त हो गया हो. ऐसा भी नहीं कि किसी तरह की कोई समस्या उत्पन्न हो गई हो. इसके बाद भी रोटियों के आने की गति थम गई, रोटियाँ एक-दो, एक-दो करके आने लगीं, बाहर खाने के लिए जुटे सभी लोगों को रोटियों की उपलब्धता सहजता से नहीं हो पा रही. किसी को आधी रोटी मिल रही, किसी को उसी में से एक कौर मिल  रहा, कोई किसी की थाली में आने के पहले ही रोटी का कौर उसके हाथ से खींच ले रहा. इन सबके बीच कोई रोष नहीं, कोई गुस्सा नहीं, कोई गाली-गलौज नहीं बल्कि हँसी-मजाक और बढ़ने लगता है, आपसी प्रेम और नजर आने लगता है.

 

क्यों नहीं कोई व्यक्ति बाहर सड़क पर जाकर कूड़े के ढेर में रोटी तलाशने लगता है? क्यों नहीं रोटी का एक कौर भी न हासिल कर पाने वाला व्यक्ति घर की महिलाओं की बुराई करने लगता है? क्यों नहीं घर का कोई सदस्य नाली से गंदगी निकाल कर रोटी की जगह खाने लगता है? और भी बहुत कुछ क्यों नहीं होता है? फिर सोचिए, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि परिवार के सभी सदस्यों में आपस में प्रेम-भाव है, एक-दूसरे के प्रति सम्मान है, एक-दूसरे की स्थिति का भान है. यही नहीं है हम सबमें. समाज में व्यक्तिगत रूप से जो है वो पहले हमारे लिए है. समाज में जो है वो पहले हमें मिले. इस तरह की मानसिकता से न समाज का भला होता है और न ही देश का. कुछ ऐसा ही इस समय दिख रहा है. घर में एक सिलेंडर भरा रखा है मगर एक और मिल जाए. बाकी का क्या ही लिखें. जो युद्ध की माँग करते हैं, सीमा पर जान देने का दम भरते हैं, वे दो-चार रोज की स्थिति में अपनी ही गैस निकाल बैठे.


10 जून 2023

मनोभाव आपस में बाँटते रहें

पिछले दिनों एक कहानी सोशल मीडिया पर लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है. इसमें एक तैराक को उसके कोच द्वारा बचा लेने का चित्रण किया गया है. पोस्ट को आगे लिखने-पढ़ने के पहले उस कहानी पर निगाह डाल ली जाये. कहानी कुछ इस तरह से है कि


अनीता अल्वारेज, जो अमेरिका की एक पेशेवर तैराक हैं, ने वर्ल्ड चैंपियनशिप के दौरान परफॉर्म करने के लिए स्विमिंग पूल में जैसे ही छलांग लगाई, वो छलांग लगाते ही पानी के अंदर बेहोश हो गई. जहाँ पूरी भीड़ सिर्फ़ जीत और हार के बारे में सोच रही थी वहीं उसकी कोच एंड्रिया ने देखा कि अनीता एक नियत समय से ज़्यादा देर तक पानी के अंदर है. एंड्रिया पल भर के लिए भूल गई कि वर्ल्ड चैंपियनशिप प्रतियोगिता चल रही है. एक पल भी व्यर्थ ना करते हुए एंड्रिया ने प्रतियोगिता के बीच में ही स्विमिंग पूल में छलांग लगा दी.


वहाँ मौजूद हज़ारों लोग कुछ समझ पाते तब तक एंड्रिया पानी के अंदर अनीता के पास थी. एंड्रिया ने देखा कि अनीता स्विमिंग पूल में बेहोश पड़ी है. ऐसी हालत में वो ना हाथ पैर चला सकती ना मदद माँग सकती. एंड्रिया ने अनीता को जैसे बाहर निकाला, मौजूद हज़ारों लोग सन्न रह गए. एंड्रिया ने अनीता को तो बचा लिया.




इस कहानी के बाद इससे जुड़ी दार्शनिकता को, सामाजिकता को सबके बीच चर्चा के लिए छोड़ दिया गया. कहा गया कि एंड्रिया ने अनीता को बचा लिया और हम सबकी ज़िंदगी में बहुत बड़ा सवाल छोड़ दिया! सवाल यह कि हम में से बहुत सारे लोग किसी न किसी रूप में परेशान होकर एक तरह से डूब ही रहे हैं. विशेष बात यह है कि कौन हमारा कोच है जो हमारे बिना बताये, बोले हमें बचाने के लिए आ जाता है.


देखा जाये तो वाकई सवाल बहुत बड़ा है किन्तु इसी सवाल के पीछे एक सवाल और छिपा है कि हम में से कितने लोग ऐसे हैं जो अपने मिलने वालों से, अपने माता, पिता, भाई, बहिन, दोस्त से कुछ भी नहीं छिपाते हैं? उनके साथ सारी बातें बाँटते हैं? जिस कहानी को सोशल मीडिया में एक आदर्श की तरह रखकर किसी कोच को बनाने की बात कही जा रही, उसी कहानी के आलोक में यह भी समझना होगा कि उस कोच और खिलाड़ी के बीच समन्वय, सामंजस्य के बीच किसी तरह का कोई संशय नहीं होगा. पल-पल की स्थिति, उसके आगे की परिस्थिति का आकलन वे दोनों एकसाथ कितनी बार किये होंगे. सामाजिक, पारिवारिक वातावरण में अब ऐसी स्थिति देखने को बहुत कम मिल रही है जहाँ कि लोग अपनी बात को, अपनी परेशानी को, अपनी समस्या को अपने अभिन्न कहे जाने वाले के साथ बाँट रहे हों. आखिर जब तक दो लोगों के बीच आपस में समन्वय नहीं है, वैचारिक सामंजस्य नहीं है, एक-दूसरे की भावनाओं को समझने की मानसिकता नहीं है तब तक कहानी के कोच और खिलाड़ी जैसा सम्बन्ध मिलना मुश्किल है. 





 

19 मई 2023

ज़िन्दगी इक सफ़र, दोस्तों संग है सुहाना

ज़िन्दगी इक सफ़र है सुहाना, यहाँ कल क्या हो किसने जाना, इस गीत को कितनी ही बार सुना है, गुनगुनाया है. इस गाने-गुनगुनाने के क्रम में बहुत बार मन ही मन ज़िन्दगी के बारे में विचार भी किया, उसके गुजरते चले जाने के बारे में भी सोचा. इस सफ़र में अनेक बार ऐसे मौके आये जिसने हँसने के अवसर दिए और ऐसे भी पल आये जिन्होंने आँसू भी दिए. सुख-दुःख, हँसना-रोना, मिलना-बिछड़ना आदि इस ज़िन्दगी के सफ़र के बहुत बड़ा सत्य है. इस सत्य को जानते-समझते हुए भी बहुत बार मन उदास हो जाता है, विचलित हो जाता है. बहुत सी बातें, बहुत सी घटनाएँ ऐसी हो जाती हैं जिनके कारण दिल न चाहते हुए भी टूट सा जाता है, आत्मविश्वास डगमगा सा जाता है. ऐसी स्थिति में ज़िन्दगी का ये सफ़र उदास, बेरंग सा, बेमकसद सा समझ आने लगता है. लगता है जैसे कि आसपास सबकुछ खाली-खाली है, लगता है जैसे चारों तरफ एक तरह का सन्नाटा है. 


चारों तरफ के चीखते सन्नाटों में, दिल के बिना आवाज़ टूटते जाने के बीच जब ऐसा लगता है कि सबकुछ समाप्त होने वाला है, कुछ भी अपने मन का नहीं है तब दोस्त ही होते हैं जो दिल को संगीतमय बनाते हैं, मन को गुलज़ार करते हैं. यदि व्यक्तिगत रूप से अपनी बात करें तो ज़िन्दगी में बहुत से पल ऐसे आये जबकि लगा कि सबकुछ समाप्त हो गया है, लगा कि मुठ्ठी खाली की खाली रह गई है उन नाजुक से क्षणों में दोस्तों ने कंधे पर अपने साथ की मजबूती भरा हाथ रखा. हमारे खाली होते जा रहे, काँपते हाथों को अपनी हथेली में थामकर उनमें शक्ति का संचार किया है. हम साथ हैं की भाव-भंगिमा के सहारे दिल में, मन में विश्वास का भाव जगाया है. इधर कई दिनों से किसी काम में मन नहीं लग रहा था. किसी भी तरह का नैराश्य न होने के बाद भी एक निराशा जैसी स्थिति बनी हुई थी. सबकुछ ठीक-ठाक होने के बाद भी लगता था जैसे कुछ सही नहीं हो रहा. खुद के कार्यों से असंतुष्टि का भाव न होने के बाद भी खुद से अजब सी नाराजगी जैसी बनी हुई थी. सारे काम नियमित रूप से करने के बाद भी लगता था जैसे कोई काम पूरा नहीं हो रहा.




ऐसे अनकहे से, अनसुलझे से माहौल में एक वाक्य ‘आजकल बहुत निगेटिव हो रहे हो से भीतर ही भीतर ही लगा कि क्या वाकई ऐसा हो रहा है? नकारात्मकता जैसी कोई बात न होने के बाद भी यदि बातों-बातों में कोई दोस्त मानसिक स्थिति को, मनोदशा को इस रूप में देख रहा हो तो लगा कि अब खुद के सजग होने की स्थिति है. एक काम बचपन से करते आ रहे हैं, रोज रात को सोने के पहले दिन भर के कामों का आकलन, खुद अपना विश्लेषण. वही काम दिन में किया, खुद के कामों को लेकर, खुद की सक्रियता को लेकर, खुद के आसपास की स्थिति को लेकर, खुद की मनःस्थिति को लेकर. लगा कि भले ही नकारात्मकता हावी न हो रही हो मगर काम में वैसी सकारात्मकता भी नहीं है. ऐसा भी महसूस हुआ कि निष्क्रियता भी नहीं मगर पहले जैसी सक्रियता भी नहीं दिखी. सारे काम हो रहे हैं, फोटोग्राफी भी हो रही, पेंटिंग, स्केचिंग भी हो रही, नियमित लेखन भी हो रहा, पत्र-पत्रिकाओं के लिए भी नियमित लिखा जा रहा फिर भी ऐसा लगता कि कुछ न किया जाये. सबकुछ करने के बाद भी करने का मन नहीं होता.


दोस्त के एक शब्द निगेटिव होने ने जैसे सोते से उठा दिया. लगा कि वाकई यदि सारे काम करने के साथ-साथ यही एहसास साथ चलता रहा कि कुछ भी नहीं हो रहा है, यदि काम करने के दौरान भी मन में यही भाव बना रहा कि कुछ भी करने का मन नहीं है तो आज नहीं तो कल नकारात्मकता हावी हो ही जाएगी, निगेटिव हो ही जाएँगे. वैसे अपने बहुत सारे मित्रों से, परिचितों से कहा भी है कि हमें अपनी काउंसलिंग करवानी है मगर वे सब इस बात को हँस कर टाल जाते हैं. हमें लगता है कि वाकई हमें अपनी काउंसलिंग करवाने की आवश्यकता है. न होगा तो हम खुद ही अपनी काउंसलिंग करेंगे. अपने उसी दोस्त के कहने के हिसाब से कि सबको कूल कर लेते हो तो खुद को भी कूल कर लो. बहरहाल, ज़िन्दगी इक सफ़र है सुहाना, बस उसमें दोस्तों की उपस्थिति का भी रहे होना. 





 

30 जनवरी 2023

पाकिस्तान के आर्थिक संकट पर भारत को सजग रहने की आवश्यकता

भारत का पड़ोसी देश पाकिस्तान वर्तमान में अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है. वहाँ की आर्थिक स्थिति एकदम खस्ताहाल हो चुकी है. बढ़ते कर्ज, बढ़ती मँहगाई, घटता विदेशी मुद्रा भंडार, घटती जीडीपी आदि के चलते पिछले एक साल में पाकिस्तान की हालत बदतर हुई है. रोजमर्रा की वस्तुओं के दामों में जबरदस्त वृद्धि देखने को मिल रही है. लोगों के लिए आटा-दाल की व्यवस्था करना भी दुष्कर हो रहा है. दूध, प्याज, नमक आदि जैसे जरूरी सामान भी इतने मँहगे हो गए हैं कि लोगों के लिए इनको खरीदना कठिन हो रहा है.


पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार में 6.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर की गिरावट आई है, जो फरवरी 2014 के बाद सबसे निचले स्तर पर है. इसमें मात्र 4.3 अरब डॉलर बचे हैं जबकि वाणिज्यिक बैंकों के पास 5.8 अरब डॉलर हैं. इस प्रकार पाकिस्तान के पास कुल 10.1 अरब डॉलर ही हैं, जो आयात बिल के भुगतान हेतु पर्याप्त नहीं हैं. ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि उसके पास केवल तीन सप्ताह के भुगतान हेतु ही विदेशी मुद्रा शेष है. इस कमी के चलते पाकिस्तान खाना पकाने के तेल जैसे जरूरी सामानों का आयात भी नहीं कर पा रहा है. विदेशी मुद्रा की कमी के कारण भुगतान न होने से बंदरगाहों पर बहुत सारा आवश्यक सामान अटका पड़ा है.


पाकिस्तान की आंतरिक दशाएँ भी उसके बिगड़ते हालात के लिए उत्तरदायी हैं. वहाँ की राजनैतिक स्थितियाँ किसी से छिपी नहीं हैं, रही सही कसर वर्ष 2022 में आई भीषण बाढ़ ने पूरी कर दी. वर्ष 2022 में जून से अक्टूबर के बीच एक तिहाई पाकिस्तान बाढ़ की चपेट में था. इससे करीब साढ़े तीन करोड़ लोग प्रभावित हुए थे. अभी भी 80 लाख लोग विस्थापित स्थिति में हैं, 1700 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, 22 लाख से ज्यादा घर तबाह हो गए हैं, स्वास्थ्य सेवाएँ चरमरा गई हैं, इसके साथ-साथ दूसरी बुनियादी सेवाएँ भी ध्वस्त हो गई हैं.




आर्थिक स्थितियों की नकारात्मकता का असर केवल पाकिस्तान पर ही नहीं हो रहा है बल्कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इसका असर भारत पर भी पड़ रहा है. आर्थिक तंगहाली का, मुद्रा अवमूल्यन का, बढ़ती मँहगाई का असर पाकिस्तान की तमाम कम्पनियों पर तो पड़ा ही है, उसके साथ-साथ वे कम्पनियाँ भी नकारात्मकता का शिकार हुई हैं जो भारत से सम्बंधित हैं. बहुतायत कम्पनियाँ घाटे में चल रही है. जिंदल और टाटा पर भी इसका सर्वाधिक प्रभाव देखने को मिल रहा है. पीटीआई के अनुसार जिंदल ग्रुप का पाकिस्तान में अच्छा खासा व्यापार है. यह ग्रुप स्टील इंडस्ट्री के अलावा एनर्जी सेक्टर में भी सक्रिय है. यदि पाकिस्तान की आर्थिक गतिविधि के कारण वहाँ के व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर संकट आता है तो इस कंपनी पर भी वैसा ही असर पड़ेगा. इसी तरह पाकिस्तान के आर्थिक विकास में टाटा ग्रुप टेक्सटाइल मिल्स लिमिटेड का बहुत ज्यादा योगदान है. वहाँ की नकारात्मकता का असर इस कम्पनी पर भी देखने को मिल सकता है.


पाकिस्तान में भारतीय कम्पनियों पर होने वाले नकारात्मक प्रभाव के अलावा वहाँ के आर्थिक संकट का असर भारत से पाकिस्तान भेजे जाने वाले सामानों पर भी हो रहा है. ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स की रिपोर्ट के अनुसार कर्ज में डूबे पाकिस्तान ने साल 2021 में भारत से लगभग 503 मिलियन डॉलर का आयात किया था. इस दौरान भारत से फार्मास्यूटिकल प्रोडक्ट्स, ऑर्गेनिक केमिकल्स, चीनी, कॉफी-चाय, एल्युमिनियम, प्लास्टिक के सामान पाकिस्तान भेजे गए. यदि इस वर्ष के आँकड़े देखें तो पाकिस्तान में करीब 8 मिलियन डॉलर की कॉफी-चाय, लगभग 190 मिलियन डॉलर के फार्मास्यूटिकल प्रोडक्ट्स, 141 मिलियन डॉलर के ऑर्गेनिक केमिकल्स, 119 मिलियन डॉलर की चीनी सहित अनेक दूसरे सामान भेजे गए. पाकिस्तान की बिगडती आर्थिक दशा से इन सामानों से जुड़ी भारतीय कम्पनियों का कारोबार भी प्रभावित होगा और इनको वित्तीय घाटा उठाना पड़ सकता है. शत्रु संपत्ति विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 577 ऐसी कम्पनियाँ हैं जिनमें पाकिस्तानियों का धन लगा है. इसमें से 266 कम्पनियाँ इंडियन स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हैं, वहीं 318 कम्पनी सूचीबद्ध नहीं हैं. ऐसा अनुमान है कि भारत की इन कम्पनियों में पाकिस्तानी नागरिकों के लगभग 400 मिलियन डॉलर की हिस्सेदारी है. इनमें बिरला, टाटा, फार्मा कंपनी सिप्ला, विप्रो, डालमिया समेत कई प्रमुख व्यापारिक प्रतिष्ठान शामिल हैं. ऐसे में अगर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था दीवालिया होने की स्थिति में पहुँचती है तो इन कम्पनियों पर भी उसका सीधा असर देखने को मिल सकता है. 


भारत को पाकिस्तान के आर्थिक संकट को लेकर सावधान होने की आवश्यकता है. एशियाई देशों में बांग्लादेश, श्रीलंका के बाद पाकिस्तान तीसरा देश है जहाँ आर्थिक संकट देखने को मिल रहा है. मँहगाई का असर भारत में भी देखने को मिल रहा है किन्तु यहाँ स्थिति नियंत्रण में है. इसके बाद भी पडोसी देश होने के नाते, एशियाई क्षेत्र में सक्षम देश होने के नाते भारत को एक जिम्मेवार देश के रूप में भी देखा जाता है. ऐसे में उसी तरफ से सहायता की उम्मीद भी रहेगी. इस सहायता की उम्मीद के बीच भारत को अपनी स्थिति को मजबूत बनाये रखना होगा. संभव है कि आर्थिक रूप से कमजोर पाकिस्तान में चीन की घुसपैठ बढ़े. नेपाल की सरकार को प्रो-चीन माना ही जा रहा है, ऐसे में पाकिस्तान को सहायता की आड़ में भारत के लिए चीन और नेपाल चुनौती खड़ी कर सकते हैं. पाकिस्तान को मदद के नाम पर चीन भारत के खिलाफ रणनीति बना सकता है. अपने व्यापारिक और सामरिक लाभ के लिए वह पाकिस्तानी क्षेत्र का उपयोग भी कर सकता है. भारत के एक और पड़ोसी देश अफगानिस्तान में इस समय नागरिक अधिकार हनन करने वाली सरकार है. यदि पाकिस्तान को उसकी तरफ से मदद मिलती है तो संभव है कि सीमा पार से संचालित आतंकवाद भारत के लिए मुसीबत बन जाए.


निश्चित ही पाकिस्तान का आर्थिक संकट हाल फ़िलहाल समाप्त होता नहीं दिख रहा है. ऐसे में भारत को उसकी दशा पर और उसके कदमों पर सजग निगाह रखने की आवश्यकता है. पाकिस्तान को मदद के नाम पर भारत विरोधी मानसिकता वाले देशों द्वारा यदि वहाँ अपने कदम जमा लिए गए तो निकट भविष्य में यह भारत के लिए कष्टकारी हो सकता है.

 





 

16 अक्टूबर 2022

दिल और दिमाग के द्वंद्व में...

दिल और दिमाग की अपनी ही अलग कहानी है. बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जिनके लिए दिल और दिमाग में तालमेल नहीं बैठता है. अक्सर जिस बात के लिए दिल तैयार होता है, दिमाग उसके लिए अपनी सहमति नहीं देता है. कई बार इसका उल्टा भी होता है. ऐसा नहीं है कि हर बार दिल ही सही होता है और दिमाग गलत. बहुत बार ऐसा होता है कि दिल सही होता है, तो बहुत बार दिमाग का कहना भी सही होता है. बावजूद इसके व्यक्तिगत अनुभव किया है कि दिल और दिमाग के आपसी सम्बन्ध चाहे जैसे हों मगर उनका सबसे ज्यादा शिकार इन्सान ही बनता है और वही सर्वाधिक कष्ट का सामना करता है.


देखा जाये तो दिल का सम्बन्ध भावनात्मकता से और दिमाग का सम्बन्ध व्यावहारिकता से है. इसके पीछे किस तरह का सिद्धांत काम करता है या नहीं, इसके बारे में तो विस्तृत अध्ययन के बाद ही ज्ञात हो सकता है. यहाँ जो भी कहा जा रहा है, वह हमारा नितांत व्यक्तिगत अनुभव है. दिल के मामले में ज्यादातर मामलों में भावनात्मकता को ही सर्वोपरि देखा है. दिमाग के द्वारा लाख विश्लेषण करने के बाद भी यदि दिल को संवेदनात्मक रूप से कोई बात सही लगती है तो इन्सान उसी को करने के प्रति संवेदित होता है. इसके उलट दिमाग के द्वारा किसी भी बात के होने या न होने, करने या न करने के पीछे पूरी गणित बैठा ली जाती है, उससे सम्बंधित लाभ-हानि का आकलन कर लिया जाता है. ऐसा करने के बाद ही उस स्थिति को विचारणीय मानकर आगे बढ़ना होता है.




आजकल हम स्वयं दिल और दिमाग के झंझावात में झूल रहे हैं. बहुत सी बातें इस तरह से सामने आ रही हैं कि उनके लिए समझ नहीं पाते हैं कि दिल की सुनें या दिमाग की? बहुत सी बातों में लगता है कि दिल सही कह रहा है मगर दिमाग के आकलन पर जाते हैं तो वह भी गलत प्रतीत नहीं होता है. इसी तरह बहुत सी बातों में दिमाग का विश्लेषण एकदम सटीक दिखाई देता है मगर भावनात्मक रूप से दिल की बात भी गलत नहीं लगती है. दिल और दिमाग के बनाये इस तरह के द्वंद्व के बीच हम खुद को घिरा हुआ पाते हैं. बहुत सी स्थितियों में दोनों के बीच का रास्ता निकाल लिया जाता है मगर बहुत बार ऐसा होता है कि खुद को उस घिरी हुई स्थिति से बाहर निकालना मुश्किल मालूम होता है. ऐसी स्थिति अत्यंत जटिल होती है क्योंकि न तो दिल गलत होता है और न ही दिमाग. ऐसी स्थिति में हम व्यक्तिगत रूप से जो काम करते हैं वो ये कि दिल की बात मान लेते हैं. हमारा अपना मानना है कि दिल और दिमाग के द्वंद्व में बात दिल की ही मान लेनी चाहिए क्योंकि एक वही है जो भावनाओं की, एहसासों की परवाह करता है, बिना किसी गणित के, बिना किसी विश्लेषण के अपनी बात कहता है.


ऐसा करना हमारे व्यक्तिगत स्तर की बात है. आप किसकी बात मानते हैं, किसकी बात मानेंगे ये आप अपने आकलन से करियेगा. कहा जा सकता है कि दिमाग लगाइयेगा कि किसकी बात मानी जाये, दिल की या दिमाग की. 





 

07 अक्टूबर 2022

क्या मोबाइल वाकई समस्या बन गया है?

क्या मोबाइल वाकई हम सबके जीवन में एक समस्या बनता जा रहा है? यह एक ऐसा सवाल है जो हम लगभग रोज ही अपने से करते हैं और इसका जवाब स्वयं देने के बाद फिर इसी समस्या से घिर जाते हैं. यह सबके लिए किस हद तक सच है, ये उसके उपयोग की स्थिति पर निर्भर करता है किन्तु सत्य यही है कि आज जिस तरह से लोगों को मोबाइल की लत लग गई है, वह एक समस्या ही बन गया है. संचार के एक साधन के रूप में, आपसी संपर्क, बातचीत का माध्यम बना मोबाइल अब संचार के साथ-साथ मनोरंजन का साधन भी बन गया है. इंटरनेट और स्मार्टफोन के आने के बाद से मोबाइल ने जैसे अपने स्वरूप को विकराल कर लिया है. अब इसका उपयोग जानकारियों के आदान-प्रदान से अधिक मनोरंजन के लिए किया जाता है. सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों, रील्स, शॉर्ट वीडियो आदि की अधिकता जिस तरह से बाढ़ आई हुई है, उसके चलते मोबाइल अब एक समस्या ही बनता जा रहा है. 


यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि मोबाइल एक नशे की तरह लोगों के जीवन में प्रवेश कर चुका है. अब मोबाइल का उपयोग उसकी सुविधा के चलते कम व्यक्ति की अपनी लत के कारण ज्यादा हो रहा है. यह किसी से भी छिपा नहीं है कि व्यक्ति चाहे अकेले बैठा हो या किसी भीड़ का हिस्सा हो, उसके लिए जैसे वरीयता वाला काम मोबाइल देखना है. मिनट-दो-मिनट में बार-बार मोबाइल को देखना, उसकी स्क्रीन को निहारना, बार-बार सोशल मीडिया के मंचों को खोलकर उनकी पोस्ट, फोटो, वीडियो आदि को देखना एक तरह का रोग बनता जा रहा है. अपने अनेक कामों के बीच में भी मोबाइल को खोलकर देखना, दिन का उजियारा हो या फिर रात का अंधकार, लोगों के लिए जैसे मोबाइल ही एकमात्र सहारा बना होता है. यह भी एक तरह की बीमारी कही जा सकती है कि जब लगने लगे कि इंटरनेट के माध्यम से उसके मोबाइल में कुछ नया सन्देश, फोटो, वीडियो आदि आने वाला है. सोशल मीडिया पर उसके द्वारा पोस्ट की गई सामग्री पर बार-बार लाइक, कमेंट आदि को देखने की आदत भी किसी नशे से कम नहीं.




विडम्बना यह है कि इस रोग का शिकार, इस नशे का आदी हर उम्र का व्यक्ति बना हुआ है. बच्चों में यह समस्या और तीव्रता से देखने को मिल रही है. एकल परिवार होने के कारण, माता-पिता के नौकरीपेशा होने की स्थिति में बच्चों का सबसे अच्छा साथी मोबाइल बना हुआ है. उनको कुछ खिलाना-पिलाना हो, उनकी किसी जिद को पूरा करना हो, खेलने में व्यस्त रखना हो तो बस मोबाइल पकड़ा कर माता-पिता खुद को जिम्मेवारी से मुक्त कर लेते हैं. अब बच्चों को घरों में परियों की कहानियाँ नहीं सुनाई जातीं बल्कि उनको मोबाइल पकड़ा कर रंगीन स्क्रीन में व्यस्त कर दिया जाता है. यह बच्चों के कोमल मन-मष्तिष्क पर नकारात्मक रूप से अपना प्रभाव छोड़ रहा है. देखने में आ रहा है कि अब बच्चे चिड़चिड़े होते जा रहे हैं. उनकी माँग के अनुसार यदि उनको मोबाइल न दिया जाये तो वे चिल्लाने का, सामान फेंकने का, खुद को हानि पहुँचाने का काम करने लगते हैं.   


कुछ ऐसा ही हाल युवाओं का है. वे किसी भी कार्य में व्यस्त हों किन्तु उनके हाथों से मोबाइल नहीं छूटता है. कभी किसी ऑनलाइन गेम में व्यस्त होने के कारण, कभी रील्स बनाने या फिर उनको देखने के क्रम में उनकी उंगलियाँ लगातार मोबाइल स्क्रीन पर टहलती ही रहती हैं. इसके चलते ऐसे बहुत से केस देखने को मिल रहे हैं जहाँ लोगों में आँखों की बीमारी, गर्दन का दर्द, रीढ़ की हड्डी में दिक्कत, उँगलियों की अपनी बीमारी की समस्या उत्पन्न हो रही है. इन बीमारियों के साथ-साथ लोगों की याददाश्त भी कमजोर हो रही है. छोटे से छोटे काम के लिए बच्चों, युवाओं की मोबाइल पर निर्भरता ने उनके मष्तिष्क की कार्यक्षमता को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है. अब वे किसी जानकारी के लिए कहीं खोजबीन करने का, अपना अनुभव जुटाने का, खुद का विश्लेषण करने का जोखिम नहीं उठाते हैं. उनके लिए एकमात्र समाधान अब उनके हाथ में दिखता मोबाइल है.


इस सुविधाजनक समस्या से बाहर निकलने के प्रयास उन्हीं लोगों को करने होंगे, जो इसके आदी बने हुए हैं. उनको समझना होगा कि मोबाइल की ऐसी लत किसी भी नशे की तरह बुरी है. देखने में भले यह किसी तरह की बाहरी बीमारी को नहीं दिखा रहा है किन्तु शरीर को, मन को, दिमाग को भीतर ही भीतर खोखला कर रहा है. अनिद्रा, तनाव, अवसाद, निराशा, गुस्सा, चिड़चिड़ापन आदि की समस्याएँ इसी मोबाइल की अधिकता के कारण उत्पन्न होने लगी हैं. आइए, इस समस्या को दूर हुए मोबाइल को अपनी सुविधा का ही साधन बना दिया जाये.

 




 

22 सितंबर 2022

हम खुद पैदा करते हैं दुःख, कष्ट

प्रसन्न रहना भी दूसरे लोगों के लिए परेशानी का कारण बनता है. उनको इसी बात पर समस्या हो जाती है कि अगला व्यक्ति खुश कैसे है? किस तरह हँस लेता है? ऐसा नहीं होता कि जो व्यक्ति खुश दिख रहा है, हँस रहा है उसके पास समस्याएँ नहीं अथवा वह किसी बात पर दुखी नहीं. हँसते-मुस्कुराते व्यक्ति के पास भी उसी तरह की समस्याएँ हो सकती हैं जैसी कि अन्य व्यक्ति के पास हो सकती हैं. समस्याओं का होना और समस्याओं के होने के बाद भी हँसते-मुस्कुराते हुए कार्य को करते रहना दो अलग-अलग बातें हैं. ऐसा नहीं है कि हमारे पास कष्ट नहीं हैं, हमारे पास समस्याएँ नहीं हैं मगर बचपन से एक आदत रही है, किसी भी परेशानी में अपना धैर्य न खोने की, अपना विश्वास न खोने की. इसी के चलते बड़ी सहजता से किसी भी तरह की परेशानी, किसी भी तरह के कष्ट से बाहर निकलने का रास्ता निकल आता है.


लोग अक्सर कुछ निश्चित से सवाल हमसे पूछते रहते हैं. उन सवालों में हमें कभी टेंशन में न देखने की बात होती है. उनके सवालों में हमेशा हमारे चेहरे पर हँसी के भाव बने रहने का कारण होता है. उनके प्रश्न हमारी समस्याओं, कष्टों आदि से सम्बंधित होते हैं. यदि हम ये कहें कि हमें किसी तरह का कष्ट नहीं या फिर हम दुखी नहीं होते तो यह नितांत झूठ होगा. हम भी एक साधारण से इन्सान हैं, हमारी भी भावनाएँ हैं, हमारी भी इच्छाएँ हैं और उन्हीं के चलते हमें भी किसी आम आदमी की तरह कष्ट होता है, हम भी दुखी होते हैं. जैसी कि आदत रही है, उसके अनुसार अपने कष्टों, अपने दुखों, अपनी समस्याओं को अपने तक सीमित रखते हुए उनको दूर करने का प्रयास करते हैं.




यहाँ दुखों, कष्टों, समस्याओं को दूर करने, उनसे मुकाबला करने की बात से पहले यह समझना आवश्यक है कि हम सबके दुःख का, कष्ट का कारण क्या रहता है? बहुत से कष्ट और समस्याएँ ऐसे होते हैं जो हम स्वतः बना लेते हैं या कहें कि खुद ही उनको जन्म देते हैं. इसके पीछे दूसरे लोगों से हमारी अपनी अपेक्षा का बना होना होता है. हम सभी किसी न किसी रूप में दूसरों से अपेक्षाएँ पाले होते हैं. चूँकि सभी व्यक्तियों की अपनी-अपनी सीमायें हैं, अपने-अपने अधिकार हैं, ऐसे में अक्सर अपेक्षाओं का पूरा न हो पाना हम सबके लिए कष्ट का विषय बनता है. इसी तरह बहुत बार हम आने वाले समय में होने वाली किसी भी घटना की कल्पना करके भी परेशान होते हैं. अभी जो घटना हुई नहीं होती है, उसके बारे में काल्पनिक बातें सोचते-सोचते खुद को कष्ट में डाल देते हैं. कई बार किसी भी समस्या के सामने आ जाने के बाद लोग धैर्य खो देते हैं, ऐसे में वे उस स्थिति को और भी अधिक परेशानी भरा बना देते हैं. इसके चलते भी व्यक्ति अक्सर दुःख का, कष्ट का शिकार हो जाता है. ऐसी घटनाओं के अलावा बहुत सी घटनाएँ ऐसी होती हैं जो आकस्मिक रूप से होती हैं. अक्सर हम सभी ऐसी घटनाओं-दुर्घटनाओं के लिए किसी देवीय शक्ति को जिम्मेवार मान लेते हैं. कई बार कुछ घटनाओं के लिए प्राकृतिक आपदा भी जिम्मेवार होती है. ऐसी घटनाओं से उत्पन्न दुःख और कष्ट आदि को भी मनुष्य सहता है.


किसी भी तरह की समस्या, दुःख, कष्ट आदि के सम्बन्ध में एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि जो बात हम सबके हाथ में है, उसके लिए किसी भी तरह से परेशान नहीं होना चाहिए क्योंकि वह हमारे हाथ में है, उसका करना हमारे हाथ में है. इसके उलट ऐसी कोई बात जिसका किया जाना हमारे हाथ में नहीं है तो उसके बारे में सोचा-विचारी नहीं करनी चाहिए, उसके बारे में परेशान नहीं होना चाहिए क्योंकि उसका नियंत्रण हमारे हाथ में नहीं है. लगभग सभी लोगों की आदत होती है कि लोग ऐसी बातों के लिए भी परेशान होते हैं जो उनके हाथ में होते हैं और कुछ लोग उन बातों को अपने लिए समस्या बनाये रखते हैं, जो उनके नियंत्रण में नहीं होते हैं.


इन सबके अलावा एक बात विशेष रूप से याद रखनी चाहिए कि हम सभी को अपेक्षाओं के दायरे से बाहर रहना चाहिए. कोशिश करनी चाहिए कि हम अपने दोस्त, अपने रिश्तेदार, अपने सहकर्मी अथवा अन्य किसी भी परिचित से बहुत ज्यादा अपेक्षाएँ न करें. उनके ऊपर अपनी विचारधारा को, अपने निर्णयों को थोपने का प्रयास भी न करें. सभी की अपनी जीवन-शैली है, सभी के अपने विचार हैं. ऐसे में उन पर अपने विचारों का थोपा जाना अथवा उसका प्रयास करना भी आपस में मनमुटाव का, आपसी तनाव का कारण बनता है. इससे भी व्यक्ति कष्टों, दुखों का सामना करता है. यह ध्यान रखते हुए कि सभी का जीवन, सभी की जीवन-शैली उसकी अपनी व्यक्तिगत है. उसकी रुचियाँ, उसकी कार्यप्रणाली, उसका स्वभाव उसका अपना है. जिस तरह हम स्वयं को किसी दूसरे के लिए नहीं बदल सकते, ऐसे ही हमें भी किसी दूसरे को अपनी तरह से बदलने का प्रयास नहीं करना चाहिए.


धैर्य, विश्वास, संयम के साथ हँसते-मुस्कुराते हुए जीवन में आगे बढ़ा जायेगा तो किसी भी तरह की समस्या, दुःख, कष्ट, परेशानी भले पास आ जाये मगर हताश, निराश नहीं कर सकेगी. 






 

08 अगस्त 2022

बांग्लादेश के संकट पर भारत का रुख

वर्तमान दौर भारत के पड़ोसी देशों के लिए सुखद नहीं है. श्रीलंका का आर्थिक और राजनैतिक संकट कुछ दिनों पहले ही वैश्विक पटल पर उभर कर सामने आया था. पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है. अब बांग्लादेश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति सबके सामने आ रही है. इन तीनों पड़ोसी देशों में जनसामान्य को रोजमर्रा की वस्तुओं का मिलना दुष्कर होता जा रहा है. मँहगाई का स्तर बढ़ता जा रहा है. विदेशी मुद्रा कोष में लगातार गिरावट आती जा रही है. इन सभी देशों की मुद्रा की कीमत भी डॉलर के मुकाबले लगातार गिर रही है. बांग्लादेश सरकार ने अपने निर्माण के बाद पहली बार तेल कीमतों में अतिशय वृद्धि करके डाँवाडोल होती अपनी आर्थिक स्थिति से निपटने को एक अजब सा कदम उठाया है.   


बांग्लादेश की सरकार भले कहे कि उसके देश में हालात सामान्य हैं किन्तु यह अंतिम सत्य नहीं है. तेल कीमतों के बढाए जाने के बाद जिस तरह से नागरिकों ने सड़क पर उतर कर विरोध, विद्रोह किया है वह वहाँ के हालात बताने को पर्याप्त है. बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति के खराब होने की एक बड़ी वजह वहाँ आयात के बढ़ना और निर्यात का घटना रहा है. आयात बढ़ने के का सीधा असर वहाँ के खजाने पर हुआ. एक रिपोर्ट के अनुसार जुलाई 2021 से लेकर मई 2022 के बीच 81.5 अरब डॉलर का आयात किया गया. पिछले साल की तुलना में यह 39 प्रतिशत अधिक है. जाहिर सी बात है कि ऐसा होने के कारण वहाँ के मुद्रा कोष पर नकारात्मक प्रभाव पड़ना ही था. बांग्लादेश का विदेशी मुद्रा भंडार वर्ष 2021 जुलाई तक 45 अरब डॉलर था, जो जुलाई 2022 को यह घटकर 39 अरब डॉलर रह गया. अनुमान है कि इस स्थिति में बांग्लादेश के पास पाँच महीने आयात करने की क्षमता बची है. इन स्थितियों से निपटने के लिए बांग्लादेश के वित्त मंत्री ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 4.5 अरब डॉलर का कर्ज माँगा है. इसका उद्देश्य एक प्रकार से देश के विदेशी मुद्रा भंडार को कुछ ताकत प्रदान करना है.




बांग्लादेश के ऐसे आर्थिक हालातों पर प्रश्न अवश्य ही उठता है कि भारत का नजरिया क्या होना चाहिए? भारत उसकी सहायता के लिए क्या कदम उठाता है यह एक राजनयिक बिंदु है मगर भारत को वहाँ की बिगड़ती स्थिति से मुँह फेर कर नहीं बैठना चाहिए. बांग्लादेश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति भारत के लिए भी चिंता का कारण होनी चाहिए. इसके पीछे का कारण बांग्लादेश का पड़ोसी होना मात्र नहीं है वरन अन्य दूसरी स्थितियाँ भी हैं. बांग्लादेश वर्ष 1971 में बनने के साथ ही भारत का पड़ोसी देश कहलाया अन्यथा की स्थिति में वह पहले अविभाज्य भारत का ही हिस्सा था. वहाँ की संस्कृति, वातावरण आदि में बहुत हद तक समानता देखने को मिलती है. अविभाजित भारत का भाग होने के कारण दोनों तरफ के बहुतेरे नागरिकों में दो देशों जैसा भाव का एहसास नहीं जन्मा है. रोजगार की तलाश में आज भी बांग्लादेश से हजारों की संख्या में नागरिक भारत में घुसपैठ करते हैं. अवैध तरीके से होने वाली घुसपैठ ही भारत-बांग्लादेश संबंधों में कटुता का कारण भी बनी है.


बांग्लादेश की तरफ से होने वाली अवैध घुसपैठ के चलते भारत में तनाव बना रहता है. इस घुसपैठ ने न केवल भारतीय संसाधनों, आर्थिक स्थितियों पर बोझ डाला है बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी ध्वस्त किया है. बांग्लादेशी घुसपैठियों के यहाँ अनेक तरह के अपराधों में लिप्त होने के प्रमाण मिले हैं. ऐसे में यदि बांग्लादेश का आर्थिक संकट लम्बा चलता है, वहाँ के नागरिकों में इसी तरह विरोध की मानसिकता बनी रही, रोजगार के अवसरों में कमी आती रही तो निश्चित ही वहाँ से घुसपैठ करने वालों की संख्या बढ़ेगी. रोजगार की तलाश में हजारों की संख्या में नागरिकों का भारत में आना होगा. यह स्थिति कतई सुखद नहीं होगी. इससे न केवल दोनों देशों के राजनयिक, कूटनीतिक संबंधों पर नकारात्मक असर होगा, भारत के सामाजिक ढाँचे और आर्थिक संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा.


इसके अलावा दोनों देशों की सीमा अत्यंत विस्तीर्ण है, जहाँ की भौगौलिक स्थिति के कारण पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था कर पाना दुष्कर होता है. इसका लाभ उठाते हुए नकली नोटों, हथियारों, नशीले पदार्थों आदि की तस्करी की घटनाएँ नियमित रूप से अंजाम दी जाती हैं. बांग्लादेश का आर्थिक संकट इस तरह की अवैध गतिविधियों को और बढ़ावा देगा. जाहिर सी बात है कि बांग्लादेश में वस्तुओं की कमी को पूरा करने के लिए भारत से तस्करी करके, अवैध रूप से वस्तुओं को बांग्लादेश पहुँचाया जायेगा. निश्चित ही यह भारत के लिए आर्थिक समस्या ही उत्पन्न करेगा. बांग्लादेश आर्थिक संकट के दौरान भारत की तरफ से उसे खाद्यान्न सहायता प्रदान की गई है. अन्य आवश्यक संसाधनों की सहायता प्रदान करने की दृष्टि से उच्चस्तरीय कदम उठाये जा रहे हैं.


चूँकि बांग्लादेश कपड़ा निर्यातकों में अपना एक विशेष स्थान रखता है. वैश्विक बाजार में यहाँ के कपड़े की जबरदस्त माँग रहती है. रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण यहाँ के कपड़ा निर्यात की माँग पर नकारात्मक असर पड़ा. बिगड़ते आर्थिक हालातों में खाने-पीने की चीजों और ईंधन के बढ़े दाम से नागरिकों को परेशानी पैदा हुई. नागरिकों के सड़कों पर उतरने से वहाँ भी श्रीलंका जैसे हालात दिखाई दे रहे हैं. ऐसे में बांग्लादेश चीन के कर्ज जाल में फँस जाये तो कोई आश्चर्य की बात नहीं. चीन पहले भी चटगाँव को लेकर बहुत ज्यादा रुचि दिखाता रहा है, ऐसे में उसके द्वारा आर्थिक सहायता की बड़ी पहल करना कोई नई बात नहीं होगी. यदि बांग्लादेश चीन के आर्थिक चंगुल में फँसता है तो यह भारत के दृष्टिकोण से भी उचित नहीं होगा. इसलिए भारत को बांग्लादेश के आर्थिक संकट को जल्द से जल्द दूर करने हेतु यथासंभव कदम उठाने की आवश्यकता है.


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11 जुलाई 2022

परेशानी का कारण बनता मोबाइल : 2200वीं पोस्ट

कई महीनों से हमारा अपने साथ एक तरह का द्वंद्व चल रहा है. ये द्वंद्व मोबाइल के उपयोग को लेकर मचा हुआ है. बहुत बार मोबाइल सुविधाजनक से ज्यादा असुविधाजनक महसूस होता है. दूसरी तरफ वाले को न समय की चिंता करनी है न ही स्थान की. उसे बस अपने काम से मतलब होता है. आप कितने व्यस्त हैं, कहाँ हैं, किसके साथ हैं, किस स्थिति में हैं उसे कोई मतलब नहीं. इधर मोबाइल के उपयोग को लेकर अपने आपमें उथल-पुथल कुछ ज्यादा ही मची हुई है. इसी में आज एक चित्र हाथ लग गया, जिसमें एक समाचार प्रकाशित था. उसे देखकर विचार आया कि आज की ये पोस्ट उसी पर लिखी जाये.

 

पोस्ट लिखने के बारे में बताने का एक विशेष कारण ये है कि आज की ये पोस्ट हमारे इस ब्लॉग की 2200वीं पोस्ट है. मई 2008 से शुरू ब्लॉगिंग की यात्रा धीरे-धीरे चलते हुए यहाँ तक पहुँच गई. बहरहाल, ब्लॉगिंग की यात्रा पर फिर कभी, आज ऊहापोह में डालते मोबाइल पर चर्चा कर ली जाये.

 

आज लगभग हर हाथ में मोबाइल है, न केवल मोबाइल है बल्कि स्मार्ट फोन कहे जाने वाले मोबाइल हैं. उन्हीं हाथों में इंटरनेट भी सुसज्जित है. ऐसा तो नहीं कहेंगे कि जितने हाथों में स्मार्ट फोन है, इंटरनेट है वे सभी लोग अत्यधिक व्यस्त हैं मगर बहुतायत में ऐसे लोग हैं जो चौबीस घंटे के हिसाब से अपने इसी स्मार्ट फोन में व्यस्त हैं. हर दो-चार मिनट में उनकी जेब से, बैग से मोबाइल निकलता है, चमकता है और फिर इधर-उधर कुछ उँगलियों का सहारा लेकर वापस अपनी जगह चला जाता है. कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके आसपास कितने लोग भी क्यों न हों, कितने भी ख़ास क्यों न हों, कितने आम क्यों न हों उनका मोबाइल न बंद होता है और न ही जेब-बैग के हवाले होता है. संभवतः नहाते समय ही ऐसे लोगों का मोबाइल उनके हाथ से छूटता हो.

 

हमारा व्यक्तिगत रूप से ऐसा मानना है कि मोबाइल और इंटरनेट की जुगलबंदी ने इंसान का जीना मुश्किल किया है. उसकी सामाजिकता को प्रभावित किया है. उसकी जीवनशैली को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है. इस बात को हम अपने व्यक्तिगत अनुभवों से कह रहे हैं. आज देखने में आ रहा है कि मोबाइल के, इंटरनेट के, सोशल मीडिया के अतिशय उपयोग ने लोगों को घनघोर भीड़ में भी अकेले कर दिया है. किसी समय बातचीत को सहजता, सरलता, गतिशीलता देने के लिए मोबाइल को बनाया गया था. आज स्थिति ये है कि बातचीत को छोड़कर बाकी सबकुछ मोबाइल पर होता है. मोबाइल अपने आपमें आपकी व्यक्तिगत संपत्ति जैसा है. किसी समय घर में लगे बेसिक फोन को परिवार का फोन कहा जाता था. एक ही फोन पर समूचा परिवार बात करता था. मोबाइल के द्वारा व्यक्तिगत भाव पैदा कर देने से कुछ लाभ हुए हैं तो उनके सापेक्ष नुकसान बहुत ज्यादा हुए हैं. किसी समय तक मोबाइल से बातचीत हो जाया करती थी मगर सोशल मीडिया के आने के बाद तो जैसे आपस में बातचीत करना बंद सा ही हो गया है. अब सुबह-सुबह एक मैसेज छोड़कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जाती है. अब इसकी चिंता नहीं कि जिसे हम अपना मित्र कहते हैं, जिसे अपने साथी-सहयोगी बताते नहीं थकते, उससे बातचीत करके उसके हालचाल भी नहीं लेते.

 

मोबाइल के द्वारा इस तरह का अकेलापन पैदा कर दिए जाने को लेकर हमेशा एक तरह का भय हमारे भीतर रहता है. इस भय के अलावा समय-असमय आने वाली अनावश्यक कॉल्स के कारण भी मोबाइल सिरदर्द समझ आने लगा है. कुछ इसी तरह की अन्य दूसरी समस्याओं के कारण हमने वर्ष 2011 में मोबाइल का उपयोग पूरी तरह से बंद कर दिया था. पूरे दो साल किसी भी तरह से मोबाइल का उपयोग हमने नहीं किया था. बैंकों ने जिस तरह से जबरिया अनिवार्यता सी बना दी है, मोबाइल की उसके चलते बस उतनी देर को मैसेज देखने के लिए, ओटीपी देखने के लिए मोबाइल का उपयोग किया जाता था. हमारे उस निर्णय पर लोगों को आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा था कि इससे लोगों को दिक्कत होगी. हमें तब भी समझ न आया था, आज भी समझ नहीं आया है कि मोबाइल हम अपनी सुविधा के लिए रखते हैं अथवा दूसरों की सुविधा के लिए? लोगों के काम, संपर्क, मेल-मिलाप उस समय भी हुआ करते थे, जबकि मोबाइल का चलन नहीं था या कि मोबाइल सबके पास नहीं हुआ करता था. अपने भीतर की उथल-पुथल से, अपने अन्दर के द्वंद्व से निपट लेने के बाद मोबाइल को बंद करना है. कतिपय तानाशात्मक सरकारी, गैर-सरकारी रवैये के चलते पूरी तरह से बंद कर पाना संभव न हुआ तो नगण्य उपयोग की सम्भावना निर्मित की जाएगी.

 

इन तमाम समस्याओं के साथ-साथ एक बहुत बड़ा संकट मोबाइल उपयोग को लेकर सबके साथ है मगर उसे लोग सामान्य ही समझ रहे हैं. आज सरकारी, गैर-सरकारी कार्यों, संस्थानों की स्थिति यह हो गई है कि आपको किसी भी तरह का काम करना है तो उसमें अनिवार्य रूप से मोबाइल की उपलब्धता माँगी जाती है. इस पर भी एक तानाशाही और हावी है कि मोबाइल फोन अब सादा न होकर स्मार्ट फोन हो, जिसमें अनेक एप डाउनलोड हो जाएँ, वेबसाइट चल जाएँ. यहाँ सोचना-समझना होगा कि जिस देश में बहुतायत जनसंख्या मूलभूत आवश्यकताओं को पाने के लिए जद्दोजहद कर रही हो वहाँ हर हाथ में स्मार्ट फोन की अनिवार्यता सी बना देना क्रूर मजाक है. शैक्षिक संस्थानों में विद्यार्थी अपने प्रवेश के लिए फॉर्म बाद में भरता है, पहले उसे मोबाइल नंबर उपलब्ध कराना होता है. बैंक में आपका खाता बाद में खुलेगा, पहले आपको स्मार्ट फोन से ओटीपी बताना पड़ता है. रेल-हवाई जहाज में आपकी यात्रा बाद में होती है पहले आपको अपने स्मार्ट फोन में एक एप डाउनलोड करके खुद को सुरक्षित बताना होता है.

 

एक तरह की यह मोबाइल अनिवार्यता तानाशाही जैसा नहीं है? क्या ये अनिवार्य रूप से लागू नहीं कर दिया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति मोबाइल का उपयोग करे? क्या इस बात के लिए कदम नहीं बढ़ा दिए गए हैं कि हर व्यक्ति स्मार्ट फोन ले और उसमें इंटरनेट की सुविधा हो? क्या यह एक तरह से बहुत बड़े जनमानस को पंगु बनाने जैसा नहीं है? फिलहाल तो हमारी ऐसी बातें लोगों को मजाकिया लगती हैं, ऐसा इसलिए भी क्योंकि मोबाइल के, इंटरनेट के, सोशल मीडिया के अभी लोग मजे ही ले रहे हैं. यद्यपि वे अपने कष्ट को बताते भी हैं तथापि मोबाइल के नशे के आदी हो जाने के कारण उसे छोड़ पाने में कठिनता महसूस करते हैं. जिस चित्र की बात पोस्ट के आरम्भ में ही की थी, यदि उसमें दर्शाया गया समाचार सही है तो यह समझने वाली और चिंतन करने वाली बात है कि जिस व्यक्ति ने मोबाइल फोन का अविष्कार किया वही अब सामान्य ज़िन्दगी में जीने की बात कर रहा है, मोबाइल छोड़ने की बात कर रहा है.




04 जून 2022

पर्यावरण के लिए घातक है ई-कचरा

पर्यावरण के प्रति सामाजिक रूप से सभी चिंतित दिखाई देते हैं. बचपन से पर्यावरण की एक रटी-रटाई परिभाषा ‘परि+आवरण’ के साथ आगे बढ़ते रहने के कारण जल, वायु, ध्वनि, मृदा प्रदूषणों पर सबकी चिंता देखने को मिलती है मगर अपना विकराल रूप धारण कर चुके इलेक्ट्रॉनिक कचरे की तरफ अभी समाज बहुत गम्भीर नहीं दिखता है. आज भी बहुत बड़े जनमानस की तरफ से समझने की कोशिश न हो रही कि इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट भी भयानक तरीके से पर्यावरण के लिए, मानव के लिए खतरा बन गया है.


इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट को सामान्य बोलचाल में ई-कचरा के रूप में जाना जाता है. इस शब्द का प्रयोग चलन से बाहर हो चुके पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिये किया जाता है. ई-कचरा सूचना प्रौद्योगिकी और संचार उपकरण तथा उपभोक्ता इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स के रूप में निकलता है. इसमें मूलतः सेलफोन, स्मार्टफोन, कम्प्यूटर, कम्प्यूटर से सम्बंधित उपकरण, माइक्रोवेव, रिमोट कंट्रोल, बिजली के तार, स्मार्ट लाइट, स्मार्टवॉच आदि शामिल हैं.


सामाजिक रूप से यह बहुत बड़ी समस्या है क्योंकि समाज का जिस तेजी से डिजिटाइजेशन हो रहा है, उसी तेजी से ई-कचरा उत्पन्न हो रहा है. आधुनिक तकनीक और मानव जीवन शैली में आने वाले बदलाव के कारण ऐसे उपकरणों का उपयोग दिन-प्रति-दिन बढ़ता जा रहा है जो विषैले, हानिकारक पदार्थों के जनक बनते हैं. ट्यूबलाइट, सीएफएल जैसी रोज़मर्रा वाली वस्तुओं में पारे जैसे कई प्रकार के विषैले पदार्थ पाए जाते हैं, जो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं.




ऐसा अनुमान है कि पूरी दुनिया में लगभग 488 लाख टन ई-कचरा उत्पन्न हो रहा है. संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक ई-कचरा मॉनिटर 2020 के अनुसार दुनिया भर में वर्ष 2019 53.6 मिलियन मीट्रिक टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ. संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 में एशिया में ई-कचरे की सर्वाधिक मात्रा लगभग 24.9 मीट्रिक टन उत्पन्न हुई. रिपोर्ट के अनुसार कुल ई-कचरे में स्क्रीन और मॉनिटर 6.7 मीट्रिक टन, लैंप 4.7 मीट्रिक टन, आईटी और दूरसंचार उपकरण 0.9 मीट्रिक टन शामिल हैं. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार भारत ने 2019-20 में 10 लाख टन से अधिक ई-कचरा उत्पन्न किया जो 2017-18 के 7 लाख टन से काफी अधिक है. इसके विपरीत 2017-18 से ई-कचरा निपटान क्षमता 7.82 लाख टन से नहीं बढ़ाई गई है. एक रिपोर्ट कहती है कि ई-कचरा उत्पादक देशों अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी के बाद भारत का स्थान है.


ई-कचरे में मरकरी, कैडमियम और क्रोमियम जैसे कई विषैले तत्त्व शामिल होते हैं. इनके निस्तारण के असुरक्षित तौर-तरीकों से मानव स्वास्थ्य पर असर पड़ता है. इससे अनेक तरह की बीमारियाँ होने की आशंका रहती है. भूमि में दबाने से ई-कचरा मिट्टी और भूजल को दूषित करता है. जब मिट्टी भारी धातुओं से दूषित हो जाती है तो उस क्षेत्र की फसलें विषाक्त हो जाती हैं, जो अनेक बीमारियों का कारण बन सकती हैं. भविष्य में कृषियोग्य भूमि को भी अनुपजाऊ हो सकती है. मिट्टी के दूषित होने के बाद ई-कचरे में शामिल पारा, लिथियम, लेड, बेरियम आदि भूजल तक पहुँचती हैं. धीरे-धीरे तालाबों, नालों, नदियों, झीलों आदि का पानी अम्लीय और विषाक्त हो जाता है. यह स्थिति मानवों, जानवरों, पौधों आदि के लिए घातक हो सकती है. ई-कचरा में शामिल विषाक्त पदार्थों का नकारात्मक प्रभाव मस्तिष्क, हृदय, यकृत, गुर्दे आदि पर बहुत तेजी से दिखाई देता है. इसके साथ-साथ मनुष्य के तंत्रिका तंत्र और प्रजनन प्रणाली को भी यह प्रभावित कर सकता है.


ई-कचरा के निपटान की अपनी स्थितियाँ, अपनी चुनौतियाँ हैं. इस कारण सबसे ज्यादा जोर इसके पुनर्नवीनीकरण पर दिया जा रहा है. पुनर्नवीनीकरण के द्वारा प्लास्टिक, धातु, काँच आदि को अलग-अलग करके उसको पुनरुपयोग योग्य बनाया जाता है. संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक ई-कचरा मॉनिटर 2020 रिपोर्ट में कहा गया है कि अब वैश्विक स्तर पर उन देशों की संख्या 61 से बढ़कर 78 हो गई है जिन्होंने ई-कचरे से संबंधित कोई नीति, कानून या विनियमन अपनाया है. इसमें भारत भी शामिल है किन्तु इसके बाद भी भारत में ई-अपशिष्ट के प्रबंधन से सम्बंधित अनेक चुनौतियाँ हैं. सबसे बड़ी चुनौती जन भागीदारी का बहुत कम होना है. इसके पीछे उपभोक्ताओं की एक तरह की अनिच्छा है जो इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की रीसाइक्लिंग के लिये बनी रहती है. इसके अलावा हाल के वर्षों में एक और चुनौती इस रूप में सामने आई है कि देश में बहुत से घरों में ई-कचरे का निस्तारण बड़े पैमाने पर होने लगा है. यह स्थिति तब है जबकि भारत में ई-कचरे के प्रबंधन के लिये वर्ष 2011 से कानून लागू है जो यह अनिवार्य करता है कि अधिकृत विघटनकर्त्ता और पुनर्चक्रणकर्त्ता द्वारा ही ई-कचरा एकत्र किया जाए. इसके लिये वर्ष 2017 में ई-कचरा (प्रबंधन) नियम 2016 अधिनियमित किया गया है.


उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार भारत में ई-कचरे का पुनर्नवीनीकरण करने वाली कुल 312 अधिकृत कंपनियाँ हैं जो प्रतिवर्ष लगभग 800 किलो टन ई-कचरे का पुनर्नवीनीकरण कर सकती हैं. हालाँकि अभी भी भारत में औपचारिक क्षेत्र की पुनर्चक्रण क्षमता का सही उपयोग संभव नहीं हो पाया है क्योंकि ई-कचरे का बहुत बड़ा भाग अभी भी अनौपचारिक क्षेत्र द्वारा नियंत्रित किया जाता है. ऐसा माना जाता है कि देश का लगभग नब्बे प्रतिशत ई-कचरे का पुनर्नवीनीकरण अनौपचारिक क्षेत्र में किया जाता है.


तकनीक, आधुनिक जीवनशैली, आवश्यकता आदि की आड़ लेकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग भले ही अंधाधुंध तरीके से किया जाने लगा हो मगर यह स्वीकारना होगा ई-कचरा भविष्य के लिए खतरा बनता जा रहा है. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, गैजेट्स का जीवन बहुत लम्बा नहीं होता है और बहुतायत समाज का इन्हीं पर निर्भर होते जाना खतरे का सूचक है. आज की युवा पीढ़ी के लिए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को सुविधा के लिए कम, पैशन के लिए ज्यादा उपयोग किया जा रहा है. ऐसे में उनके द्वारा उपकरणों को जल्दी-जल्दी बदल दिया जाता है. नवीन तकनीक के कारण भी बहुतेरे उपकरण आउटडेटेड हो जाते हैं. यह भी ई-कचरा की मात्रा को बढ़ाने का काम कर रहा है.


पर्यावरण की, मानव, जीवों की सुरक्षा की खातिर लोगों को केवल हवा, पानी, भूमि, पेड़-पौधों को बचाने के बारे में ही सजग नहीं होना है बल्कि ई-कचरा के प्रति भी सावधान होने की आवश्यकता है. बेहतर हो कि जीवनशैली को संयमित, नियंत्रित किया जाये. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का अत्यावश्यक होने पर ही उपयोग किया जाये. उनके निस्तारण के लिए औपचारिक क्षेत्र की सहायता ली जाये. संभव है कि मानव समाज कुछ हद तक आने वाले खतरे को टाल सके.  

 

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23 अप्रैल 2022

लिखने-पढ़ने से हो रही ऊबन

अक्सर ऐसा होता है कि पढ़ने-लिखने का मन नहीं करता है. बचपन से ही पढ़ने-लिखने का शौक तो रहा ही, एक आदत सी बनी हुई है. दिन भर चाहे जैसी व्यस्तता रही हो मगर रात को सोने के पहले किसी न किसी किताब के कुछ पन्नों को पढ़े बिना चैन नहीं मिलता है. कुछ ऐसा हाल लिखने को लेकर है. आज जबकि बहुतायत में लेखन कार्य लैपटॉप पर ही होता है फिर भी कुछ पेज अपने हाथों से फाउंटेन पेन के द्वारा रंगे ही जाते हैं. ऐसी आदत या कहें कि शौक होने के बाद भी विगत कुछ समय से पढ़ने-लिखने से एक तरह की वितृष्णा सी होने लगी है. इसका कारण बहुत खोजने के बाद भी समझ नहीं आ रहा है. जो थोड़ा-बहुत समझ में आया, उसके बाद तो यही समझ आया कि ज़िन्दगी तो पहले से ही जबरदस्त अनिश्चय भरी हुई थी, ऐसे में कोरोना के आने ने और भी उथल-पुथल मचा दी. इसके चलते किसी भी काम को बहुत अधिक मन से करने का, बहुत अधिक उत्साह से करने का मन नहीं करता है. ऐसा ही कुछ लिखने-पढ़ने को लेकर भी हुआ है.


वैसे देखा जाये तो जिस तरह की सामाजिक गति बनी हुई है, उसे देखते हुए लगता भी है कि कोई फायदा नहीं किसी तरह से कुछ लिखने-पढ़ने का. समाज का एक-एक आदमी अपनी चाल चलने में लगा हुआ है, अपने में मगन बना हुआ है. बहुतों को तो समाज की समस्याओं से, लोगों की परेशानियों से कोई मतलब नहीं. लगभग सभी लोग किसी न किसी दायरे में सिमटे हुए हैं. सभी लोग किसी न किसी खाँचे में फिट हैं. ऐसे में उनके लिए अपने दायरे, अपने खाँचे अधिक महत्त्वपूर्ण हैं. वे न तो उससे बाहर आना चाह रहे हैं और न ही उसके बाहर देखना चाह रहे हैं. ऐसे लोगों के कारण सामाजिक गतिशीलता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. यही प्रभाव अन्य लोगों को भी नकारात्मकता की तरफ ले जाता है. कोरोना के समय ऐसी ही नकारात्मकता बहुत तेजी से सबके बीच फैली थी. संभव है उसी नकारात्मकता ने हमारे दिल-दिमाग पर भी अपना असर छोड़ा हो.


फ़िलहाल तो यह एक आशंका है, इस पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है. जल्द ही लिखने-पढ़ने से होने वाली ऊबन को दूर करने की कोशिश की जाएगी. यद्यपि लिखना-पढ़ना आज, अभी भी बना हुआ है मगर जिस तेजी से, जिस नियमितता से यह पहले थी, वैसे नहीं है. खैर, जल्द ही सब सही होगा.


14 अप्रैल 2022

राष्ट्रीय शिक्षा नीति और महाविद्यालयों की समस्याएँ

इस समय बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी की वार्षिक परीक्षाएँ संचालित हो रही हैं. इन्हीं परीक्षाओं के साथ-साथ सेमेस्टर परीक्षाएँ भी हो रही हैं. विश्वविद्यालय के अनेक महाविद्यालयों के लिए यह पहला अवसर है जबकि उनको सेमेस्टर परीक्षाएँ आयोजित करनी पड़ रही हैं. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के लागू किये जाने के कारण से स्नातक प्रथम वर्ष की परीक्षाओं का आयोजन सेमेस्टर रूप में होना है. प्रदेश के, देश के अन्य भागों में विद्यार्थियों की क्या स्थिति होगी, ये तो वहाँ के लोग अच्छे से बता सकते हैं किन्तु जिस तरह से बुन्देलखण्ड क्षेत्र में विद्यार्थी सेमेस्टर परीक्षाओं को लेकर अनभिज्ञ हैं, उससे कोई आश्चर्य नहीं.


राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मूल विषयों के साथ-साथ तीन माइनर विषयों को शामिल करना विद्यार्थियों के लिए भी और महाविद्यालय प्रशासन के लिए एक तरह की परेशानी का कारण बनता दिख रहा है. जल्दी-जल्दी में राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू तो कर दिया गया मगर उन महाविद्यालयों का ध्यान नहीं रखा गया जहाँ संकाय की कमी है, प्राध्यापकों की कमी है, मूलभूत संसाधनों की कमी है. इसमें कहीं कोई दोराय नहीं कि वर्तमान शिक्षा नीति में विषयों को लेकर, विद्यार्थियों के भविष्य को लेकर एक सकारात्मक सोच प्रदर्शित की गई है मगर इसके फलीभूत होने में अभी समय लगेगा.




बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय के अंतर्गत बहुतायत महाविद्यालयों में संकायों की कमी है. किसी-किसी महाविद्यालय में अकेले कला संकाय है, ऐसे में यहाँ शिक्षा नीति के माइनर विषयों को लेकर समस्या हो सकती है. कला, विज्ञान, वाणिज्य को लेकर जिस तरह की योजना शिक्षा नीति में रखी गई है वह निश्चित ही प्रशंसनीय है मगर महाविद्यालयों में अभी स्थिति ऐसी नहीं है कि इसका अध्यापन कार्य पूरी तरह से करवाया जा सके. इसके साथ-साथ कौशल विकास कोर्स (Vocational/Skill Development Course) सह-विषय कोर्स (Co-Curricular Course) को भी नई शिक्षा नीति में शामिल किया गया है. इन विषयों को पढ़ाये जाने की कोई व्यवस्था महाविद्यालयों में नहीं है. ऐसे में समस्या न केवल विद्यार्थियों के सामने है बल्कि प्राध्यापकों के सामने भी है. समस्या यह भी है कि केवल सेमेस्टर परीक्षाओं को करवा लेना ही एकमात्र काम नहीं बल्कि महाविद्यालय को मिड-टर्म परीक्षाओं को सम्पन्न करवाना होगा. ये परीक्षाएँ सेमेस्टर परीक्षाओं के पहले सम्पन्न करवानी होंगी. ऐसे में ये बहुत बड़ा सवाल है कि मिड-टर्म परीक्षाओं के लिए प्रश्न-पत्र कौन बनाएगा, उनका मूल्यांकन कौन करेगा?


इन समस्याओं के कारण उत्पन्न होने वाली परेशानी परीक्षाओं में देखने को मिल रही है. महाविद्यालयों को समवेत रूप में अपनी इन परेशानियों से विश्वविद्यालयों को, प्रदेश सरकार को अवगत कराना चाहिए. इनके सम्बन्ध में एक स्पष्ट नीति सरकार की तरह से बनाई जानी चाहिए ताकि उस पर एकसमान रूप से अमल किया जा सके. यहाँ ध्यान रखना होगा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को देश के भविष्य के लिए बनाया गया है. ऐसे में यदि यह भविष्य ही समस्या के साथ आगे बढ़ेगा तो देश का भविष्य कैसे उज्ज्वल होगा?


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04 अप्रैल 2022

बढ़ते अवसाद का कारण है अकेलापन

भारतीय समाज में मानवीय आधार पर निर्मित अनेकानेक मान्यताओं, परम्पराओं का अपना वैज्ञानिक आधार रहा है. उसके अनुपालन के पीछे संस्कारों का निर्माण, संस्कृति का संवर्धन, सहयोग की भावना का विस्तारण करना रहा है. वसुधैव कुटुम्बकम महज एक विचार नहीं, चंद शब्द नहीं वरन अपने आपमें एक समृद्ध अवधारणा है, जिसके द्वारा इंसान को न केवल इंसान से बल्कि इंसान को प्रकृति के अंग-अंग से समन्विति बनाये रखने को बल मिलता है. आधुनिकता के वशीभूत हमने न केवल वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा को छिन्न-भिन्न किया वरन अपने आपको नितांत अकेलेपन का शिकार बना लिया. तकनीकी, ज्ञान, कार्य की असीमित व्यस्तता के बीच भी इंसान किस कदर अकेला पड़ गया है इसे महानगरों के साथ-साथ छोटे-छोटे नगरों, कस्बों में भी सहजता से देखा जा सकता है.

 

आधुनिकता का आलम ये है कि उत्सव, त्यौहार, आयोजन अब हर्ष-उल्लास का विषय नहीं वरन विवाद का विषय बनने लगे हैं, ऐसे में इंसान को भरे-पूरे होने का एहसास कैसे हो? दोस्तों की महफ़िल कहीं दूर हो गई है, सांझ ढलने से देर रात चलने वाली हँसी-मस्ती की आवारगी अब देखने को नहीं मिलती है. बच्चों के लिए खेल के मैदानों को बड़ी-बड़ी इमारतों ने निगल लिया है, अब वे मैदान में मस्ती करने के स्थान पर मोबाइल, टीवी, वीडियो गेम के सामने अकेले-अकेले अपनी सक्रियता प्रदर्शित करते हैं. इस स्थिति के दुष्प्रभाव का हाल ये है कि आज एक घर में कई-कई घर देखने को मिल रहे हैं. अपने-अपने कमरे की चहारदीवारी में अपना-अपना एक अलग संसार बनाकर लोग उसी में ख़ुशी तलाश रहे हैं. अपने आपसे घिरे नितांत अकेले अपने में ही अपने को खोज रहे हैं.

 



इक्कीसवीं सदी को औद्योगीकरण की, भूमंडलीकरण की, वैश्वीकरण की, तकनीक की सदी घोषित कर दिया गया. इसके चलते लोगों के लिए एकमात्र उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ धनोपार्जन करना बन गया है. इसके लिए जीवन को यंत्रवत सा बना लिया गया है. धनोपार्जन की आपाधापी में अभिभावकों का संलिप्त रहना, युवाओं का भागमभाग में जुट जाना, अपनी आँखों के सपनों को जिंदा बनाये रखने के लिए संवेदना को मारकर आगे बढ़ते जाना आदि ऐसा कुछ हुआ जिसने समूचे समाज को उल्टा खड़ा कर दिया. अनियमित होती जीवनशैली, परिवार से दूर रहने की मजबूरी, अधिकाधिक भौतिक संसाधनों की प्राप्ति करना, चकाचौंध भरी जिंदगी को जीने की लालसा ने इंसान को इंसान की जगह मशीन बना दिया. रिश्ते, नातों, परिवार, बच्चों, दोस्तों आदि को उसने सिर्फ बाज़ार की दृष्टि से देखा, सब जगह उसने हानि-लाभ का समीकरण लगाया और उसी के अनुसार अपने आपको संबंधों-रिश्तों के साँचे में उतारा. इस यांत्रिक जीवन का दुष्परिणाम यह हुआ कि सारे रिश्ते समाप्त से होते दिखे. बच्चों के लिए माता-पिता और माता-पिता के लिए बच्चे नोट छापने की मशीन मात्र बनकर रह गए. रिश्तों का मोल महज संबोधन के लिए होता दिखने लगा.

 

ये यांत्रिक ज़िन्दगी न केवल धनोपार्जन के लिए वरन बचपन, शिक्षा, घर-परिवार आदि में भी दिखने लगी है. किसी समय मौज-मस्ती, शैतानियों, शरारतों आदि के लिए बचपन को याद किया जाता था किन्तु अब ऐसा लगता है जैसे बचपन की भ्रूण हत्या कर दी गई है. हँसते-खेलते बच्चों की जगह बस्तों का बोझ लादे, थके-हारे से, मुरझाये से बच्चे दिखाई देते हैं. शरारतों, शैतानियों की जगह उनके चेहरों पर बड़ों-बुजुर्गों जैसी भाव-भंगिमा, सोच-विचार दिखाई देता है. नीले आकाश के नीचे उन्मुक्त खेलते, तितली बनकर उड़ते बच्चों को अब कमरों में बंद कर दिया गया है. किसी समय में दादा-दादी, नाना-नानी के आँचल में छिपकर परियों, वीरों के किस्से-कहानियाँ सुन-सुनकर बड़े होने वाले बच्चे टीवी सीरियल्स के कथित लाइव शो को देखकर बड़े हो रहे हैं, स्मार्टफोन की इंटरनेट दुनिया के कारण समय से पहले ही स्मार्ट हो रहे हैं. ऐसी स्थिति में अकेलापन बढ़ना स्वाभाविक ही है और वैसा हुआ भी. धन, भौतिक संसाधन, आधुनिकतम उपकरण, तकनीक की भरमार हो गई और इंसान एकदम अकेला हो गया.

 

इस अकेलेपन को दूर करने के लिए तनहा इंसान ने सबक न लिया; अपनी तन्हाई को दूर करने के लिए अपनों का सहारा नहीं लिया; अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए इंसानों का सहयोग नहीं लिया क्योंकि विडम्बना ये है कि आधुनिकता के बाज़ार में इंसान दिख ही नहीं रहे हैं. चारों तरफ सिर्फ मशीन ही मशीन हैं, यंत्र ही यंत्र हैं. इससे अकेलापन कम होने की बजाय बढ़ता जा रहा है. इंसान के भीतर एक तरह का खोखलापन बढ़ता जा रहा है. ऐसी स्थिति में अंत नितांत दुखद होता है. जब आँख खुलती है तो व्यक्ति को सबकुछ पीछे छूट जाने के दुःख होता है, अपनों के कहीं दूर चले जाने का भाव जगता है. यही सबकुछ व्यक्ति में और अधिक दुःख, हताशा, निराशा का संचार कर देता है. यही वे हालात हैं जिसका शिकार न केवल वयस्क हो रहे हैं वरन बच्चों को, किशोरों को भी इसका शिकार होते देखा जा रहा है. संयुक्त परिवार की संकल्पना का ध्वंस करके एकल परिवार अस्तित्व में लाये गए किन्तु उनमें भी आज एक-दूसरे के लिए समय का अभाव दिख रहा है. अकेलेपन की इस त्रासदी के चलते बच्चे, किशोर, युवा, वयस्क आदि, वो चाहे पुरुष हो या स्त्री, किसी अनजाने की खोज में लगे रहते हैं. ये अकेलापन उनको एहसास कराता है कि कोई उनको पसंद नहीं करता है, कोई उनको समझने का प्रयास नहीं करता है, उनके लिए किसी के पास समय नहीं. ये स्थिति ऐसे लोगों को चिड़चिड़ा बना देती है, बात-बात में आक्रोशित होना, अकारण किसी से झगड़ा कर बैठना ऐसे लोगों का स्वभाव बन जाता है.

 

ऐसे में व्यक्ति या तो अवसाद की अवस्था में चला जाता है या फिर आत्महत्या जैसा जघन्य कृत्य कर बैठता है. ज़ाहिर है कि अकेलेपन का इलाज मशीन नहीं, बाज़ार नहीं, तकनीक नहीं वरन अपने लोग हैं, घर-परिवार है. आवश्यकता इस सत्य को समझने की है. यदि ऐसा नहीं होता है तो कारण कुछ भी बताये जाएँ, लोगों में अकेलापन हावी रहेगा, लोगों का मौत के आगोश में चलते चले जाना जारी रहेगा.