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12 मई 2026

सोशल मीडिया और फोटो का चस्का

सोशल मीडिया और फोटो का चस्का.

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बहुतेरे लोगों को इस 'चस्का' शब्द पर आपत्ति होगी और वे ज्ञान ठेलने चले आयेंगे. इससे पहले कि ऐसे लोग अपना ज्ञान ठेलें, उनमें इस चस्का की असलियत पेल देते हैं.

 

हम सब लगभग रोज ही देखते हैं कि किसी न किसी दुखद समाचार पर पीड़ित परिवार से मिलने नेता बिरादरी पहुँचती है. सांसद-विधायक टाइप लोग भी होते हैं तो पदाधिकारी और कार्यकर्त्ता टाइप भी. दुखद समाचार कभी किसी के निधन का होता है, कभी त्रयोदशी का, कभी किसी दुर्घटना का..... ऐसे किसी भी दुखद समाचार के सन्दर्भ में अपनी संवेदना प्रकट करने वाले लोगों के चेहरे पर मुस्कान तैरती ही रहती है.

 

इन संवेदनात्मक रूप से भरे बैठे लोगों को कोई ये समझाए कि किसी के निधन पर, किसी की त्रयोदशी पर शोक-संवेदना प्रकट की जाती है. ऐसे में पहले तो फोटो सेशन से बचना चाहिए और यदि फोटो खिंचवाने का, सोशल मीडिया में अपलोड करने का लोभ संवरण नहीं हो पा रहा है तो कम से कम अपनी हँसी-मुस्कान को अपने काबू में रख लिया करें. हर जगह फोटो खिंचवाने पर हँसना अनिवार्य नहीं होता है.


01 सितंबर 2021

सकारात्मक, सार्थक कार्यों का आकलन समाज करता ही है


 

कभी-कभी अपने बारे में लिखा हुआ पढ़ना सुखद लगता है. वैसे तो शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे अपनी तारीफ सुनना पसंद नहीं होगा मगर जब खुद के सकारात्मक कामों के बारे में, वास्तविक कार्यों के बारे में, धरातल पर किये गए कामों के बारे में चर्चा की जाये, उनकी तारीफ की जाये तो ख़ुशी वाकई बहुत ज्यादा होती है. 


अक्सर हम सभी लोग अपने किये जा रहे कामों की प्रशंसा न मिलने पर, उसका कोई तत्काल प्रतिफल निकलता न देखकर निराशा जैसी स्थिति में पहुँच जाते हैं. ऐसा होना नहीं चाहिए. संभवतः ऐसा मानव स्वभाव होने के कारण होता होगा किन्तु हमें ध्यान रखना चाहिए कि यदि हम लोग ईमानदारी के साथ काम कर रहे हैं, निस्वार्थ रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं तो समाज हम सबके कामों का प्रतिफल सकारात्मक रूप से देता ही देता है. ऐसा इसलिए क्योंकि हम सभी कोई भी काम करें, समाज की निगाह उस पर रहती है. समाज अपनी तरह से उन कामों का आकलन करता रहता है. ये और बात है कि हमें लगता रहे कि समाज हमारे कामों को देख-समझ नहीं रहा है. 


इसलिए निस्वार्थ भाव से, ईमानदारी के साथ सकारात्मक, सार्थक कार्य किये जाते रहने चाहिए. समाज किसी न किसी दिन, किसी न किसी रूप में उसका सकारात्मक प्रतिफल देता ही देता है. 


दैनिक जागरण, कानपुर के जालौन संस्करण में प्रकाशित 


21 जुलाई 2014

इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता और पत्रकारों को संभलने की आवश्यकता



संसाधनों के विकसित होते जाने से प्रसार माध्यमों ने भी लगातार विकास किया है. सूचनाओं के आदान-प्रदान में सहजता हुई है और पल भर में सुदूर देश की खबर हमारे सामने होती है. तकनीक के इस क्रांतिकारी विकास ने समूचे विश्व को एक गाँव में बदल कर रख दिया है. आज धरातलीय दूरियों का एहसास उस समय होता है जबकि हम व्यक्तिगत रूप से प्रत्यक्ष में एक-दूसरे से मिलने की आकांक्षा रखते हैं अन्यथा की स्थिति में लाखों-लाख किमी की दूरी भी कम महसूस होने लगी है. संचार माध्यमों की विकसित अवस्था ने जहाँ हमें प्रचार-प्रसार का उन्नत साधन उपलब्ध करवाया है वहीं इसके साये में काम कर रहे कुत्सित मानसिकता वालों ने इसे नकारात्मकता के साथ प्रयोग कर इसकी उपयोगिता पर ही सवाल उठा दिया है. संचार के इन माध्यमों में आज इलेक्ट्रॉनिक माध्यम को, इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता को प्रमुखता के साथ देखा जा सकता है.
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इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता ने पत्र माध्यम की और रेडिओ की पत्रकारिता से कई कदम आगे आकर अपने श्रोताओं को खबरों के साथ, घटनाओं के साथ साक्षात् जुड़ने का मंच प्रदान किया. पत्रकारिता के माध्यमों में एकाएक उत्कर्ष प्राप्त कर लेने से इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता के लिए कार्य कर रहे चैनलों, व्यक्तियों ने मुखरता से भी एक कदम आगे जाकर स्वयंभू ठेकेदार बनने का काम करना शुरू कर दिया. अपनी अहमियत को जानकर, समझकर इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता से जुड़े लोगों ने खुद को ही अंतिम सत्य, अंतिम निष्कर्ष के रूप में पेश करना शुरू कर दिया. आज भी शायद ही कोई नागरिक होगा जो आरुषि हत्याकांड के समय इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों, चैनलों, पत्रकारों द्वारा की जा रही रिपोर्टिंग को भुला पाया हो. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से जुड़े पत्रकार खुद को पत्रकार से ऊपर ले जाकर किसी जांच एजेंसी की तरह व्यवहार करने लगे थे. ग्राफिक्स की मदद से बनाये जाते आकलन, निकाले जाते निष्कर्ष से समूचे केस को एक झटके में ही हल कर दिया था जबकि साक्ष्यों की कहानी कुछ और कह रही है. इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता का विद्रूप भरा चेहरा उस समय भी सामने आया जबकि इनके पत्रकार मुम्बई पर आतंकी हमले और किसी समय सीमा पर चल रही गोलाबारी की लाइव रिपोर्टिंग कर दुश्मनों को हमारे सैनिकों की स्थिति की पल-पल की खबर (भले ही अनजाने में ही सही) भेजते रहे.
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अब इलेक्ट्रॉनिक चैनलों के ये पत्रकार, एंकर इससे भी आगे बढ़कर खुद ही अंतिम निष्कर्ष निकालने वाले बन गए हैं. किसी भी विषय पर बहस, चर्चा के दौरान; किसी घटना की लाइव कवरेज के दौरान; किसी खबर के प्रसारण के समय इनके द्वारा की जा रही रिपोर्टिंग महज खबर सुनाने वाली, जानकारी देने वाली नहीं होती बल्कि सामने वाले के मुँह में अपने शब्द ठूँसने की, सिर्फ अपनी ही बात कहने की, बात-बात पर झल्लाने की होती है. संभवतः जिस तरह की पत्रकारिता के बारे में आजतक पढ़ा-सुना है, ये वैसी तो नहीं है. पत्रकारिता जगत में आते हैं एक सामान्य से व्यक्ति में एक अजब तरह का गुरूर अपने आप जन्म ले लेता है, जो इलेक्ट्रॉनिक चैनलों, माध्यमों के पत्रकारों में और भी तीव्रतम रूप से प्रकट होता है. ये समझ से परे है कि आखिर पत्रकारिता जो समाज-शासन-प्रशासन के मध्य एक तरह के पुल का काम करती है उसमें कार्य करते पत्रकारों में अहंकार का भाव किसके लिए और क्यों पैदा हो जाता है? टीवी पर दिखाई देने के कारण एक अतिरिक्त भाव से लोगों से प्रश्नों का पूछना, अपनी बात को ही अंतिम सत्य बताकर दूसरे के विचारों पर थोपना, किसी भी दल, व्यक्ति, विचार के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित होना किसी भी रूप में पत्रकारिता के अंतर्गत नहीं आता है. इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों की निरंतर बढ़ती जा  ये निरंकुशता जहाँ एक तरह पत्रकारिता के मूल्यों को नुकसान पहुँचा रही है वहीं दूसरी तरफ समाज के लिए भी घातक है. संभवतः हमारे पाठक-श्रोता और खुद मीडिया से जुड़े लोग विगत दिनों एक इलेक्ट्रॉनिक चैनल के पत्रकारों की करतूत को भूले नहीं होंगे. इलेक्ट्रॉनिक चैनल को, पत्रकारों को, इनके मालिकों को संभलने की आवश्यकता है; प्रेस कौंसिल जो जागरूक होने की जरूरत है; मंत्रालय को सचेत होने की जरूरत है.  
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22 नवंबर 2011

कोख में बेटियों को मारने का सौदा


पत्रिका के भोपाल संस्करण दिनांक २२ नवम्बर २०११ में प्रकाशित स्टिंग ऑपरेशन से पता चला है कि मध्य प्रदेश में डॉक्टर कोख में बच्चियों को मारने का सौदा कर रहे हैं...ये सब पांच हजार रुपये तक में संभव है...

आपको शायद ज्ञात हो कि मध्य प्रदेश सरकार ने बेटी बचाओ अभियान छेड़ रखा है..इसके बाद भी ये हाल है...

विस्तार से जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें...
http://epaper.patrika.com/17326/patrika-bhopal/22-11-2011#p=page:n=11:z=2


03 नवंबर 2009

प्रकृति पर विजय करने की चाह में

कल रात को टी0वी0 पर समाचार देखते समय एक समाचार निगाह के सामने से गुजरा कि चीन में बर्फबारी हो रही है। समाचार के हिसाब से कोई विशेष बात तो नहीं थी किन्तु प्राकृतिक दृष्टि से बहुत ही विशेष बात लगी।
ज्ञात हुआ कि चीन ने कृत्रिम बारिश करवाने के लिए बादलों का निर्माण किया था। किसी केमिकल की अधिकता (मुन्ना भाई के शब्दों में केमिकल लोचा) के कारण बारिश तो नहीं हुई, बर्फबारी जरूर होने लगी।
अब ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि इस बर्फबारी से सूखा पड़ने की सम्भावना है। इसके साथ ही तापमान के शून्य से भी तीन से चार डिग्री तक नीचे जाने की सम्भाना है।
इसे कहते हैं प्रकृति पर विजय प्राप्त करने का दुष्परिणाम। धरती को संकट में डालकर मंगल और चन्द्रमा पर अपना अस्तित्व तलाशने की मारामारी करते मानव को अब भी शायद कुछ समझ न आयेगा?
चलो एक प्लाट हम भी चन्द्रमा पर खरीद ही डालें। आखिर धरती ऐसे ही मनुष्यों के कारण किसी दिन समाप्त हो जानी है।
अभी तो एक ही बात याद आ रही है कि यदि किसी काम में सफल हो गये तो मनुष्य की ताकत, मनुष्य की बुद्धि काम आ गई और यदि असफल हो गये तो भगवान को मंजूर नहीं था, प्रकृति ने साथ नहीं दिया। (बिलकुल भारतीय क्रिकेट टीम की तरह) वाह भई वाह!

29 अक्टूबर 2009

इनके प्रयास और मेहनत को भी सराहा जाए



आज शाम अपने मित्र डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव के साथ उनके घर पर बैठे हुए थे। बातें करने के दौरान ही पास पड़े हुए एक समाचार-पत्र के पन्ने पर नजर गई। समाचार का शीर्षक देखकर उसे पढ़े बिना नहीं रहा गया।
ज्यादा कुछ न कह कर आपके सामने उस समाचार की स्कैन कापी है। आप देखिये और समाज के इस वर्ग के दर्द का भी एहसास कीजिए।
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इसे भी ध्यान दें---आपको बतातें चलें कि शैक्षिक लोन सरकार द्वारा इस आश्वासन के साथ दिया जाता है कि देश में शिक्षा प्राप्त करने के लिए लिए जा रहे पाँच लाख रुपये तक के लोन पर किसी तरह की गारंटी की आवश्यकता नहीं है। इसके बाद भी सरकारी नौकर (बैंक कर्मचारी, अधिकारी, मैनेजर आदि) बिना गारंटी के किसी भी तरह से एजूकेशन लोन नहीं देते हैं।

05 सितंबर 2009

शिक्षक दिवस पर डॉo आदित्य का सम्मान


आज शिक्षक दिवस पर शहर की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था पहचान तथा एक विद्यालय एल डोरेडो पब्लिक स्कूल के संयुक्त तत्वावधान में एक सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। इस आयोजन में नगर के सबसे प्रतिष्ठित एवं पुराने महाविद्यालय दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय के राजनीति विज्ञान के विभागाध्यक्ष डाo आदित्य कुमार जी का सम्मान किया गया।
डाo आदित्य जी के बारे में विशेष बात यह रही कि वे इस महाविद्यालय के छात्र भी रहे और शिक्षक दिवस से ठीक एक दिन पूर्व यानि कि 04 सितम्बर को राजनीति विज्ञान विभाग में प्रवक्ता पद का कार्यभार ग्रहण किया था। कल उनको महाविद्यालय तथा विभाग को अपनी सेवाएँ देते हुए पूरे 35 वर्ष भी हो चुके हैं।
इस दौरान डाo आदित्य जी ने विभिन्न साहित्यिक, सांस्कृतिक, रंगमंचीय, समाजसेवी संस्थाओं के साथ काम भी किया। वर्तमान में वे नई दिल्ली की एक संस्था विकासशील समाज अध्ययन केन्द्र (सीएसडीएस) के उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड क्षेत्र के प्रभारी हैं।
वैसे यदि डाo आदित्य जी के बारे में बताने बैठें तो सम्भव है कि ये पोस्ट कभी समाप्त ही न हो और हो सकता है कि हम बस लिखते ही रहें। ऐसे लिखने का भी क्या फायदा जो आप लोगों तक भी न पहुँचे। आप उनके व्यक्तित्व की सरलता का आकलन ऐसे भी कर सकते हैं कि आज तक कहीं भी, किसी से भी उन्होंने अपने कार्यों, अपनी सफलताओं का बखान नहीं किया। अनेक पुस्तकों, पत्रिकाओं का सम्पादन कर चुके डाo आदित्य जी आप लोगों के लिए भी अब अनजान नहीं हैं। वर्तमान में एक ब्लाग के माध्यम से आप सबके बीच हैं और अपने विचारों को आप तक पहुँचा भी रहे हैं।
शीघ्र ही शब्दकार और पहला एहसास भी उनके विचारों से लाभान्वित होगा। उनके द्वारा एक अन्य ब्लाग प्रस्तावित है जिसके माध्यम से वे जनपद जालौन के दिवंगत और जीवित रचनाकारों की श्रेष्ठ रचनाओं को आपके सामने प्रस्तुत करेंगे।
चलिए आदित्य जी चूँकि हमारे पितातुल्य हैं, अभिभावक हैं तो हम तो उनके बारे में बताते ही रहेंगे। आप लोग आज के कार्यक्रम का संक्षिप्त में मजा लीजिए फोटो के द्वारा और उनके विचारों को जाने उनके ब्लाग के द्वारा।
माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पपण एवं दीप प्रज्ज्वलन करते अतिथिजन
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डाo आदित्य जी का सम्मान करते पूर्व प्राचार्य, दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, उरई डाo रामस्वरूप खरे तथा तपस्या के प्रसून खण्डकाव्य लिखने वाले वरिष्ठ साहित्यकार श्री यज्ञदत्त त्रिपाठी

बाएँ डॉo रामस्वरूप खरे तथा दायें श्री यज्ञदत्त त्रिपाठी
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शिक्षक दिवस पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करते तथा आयोजकों को धन्यवाद देते डाo आदित्य कुमार
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डाo आदित्य जी के बारे में प्रकाश डालते डाo वीरेन्द्र सिंह यादव, प्रवक्ता हिन्दी विभाग दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, उरई
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डाo आदित्य जी के बारे में प्रकाश डालते प्रतिष्ठित लोक कला विशेषज्ञ श्री अयोध्या प्रसाद गुप्त कुमुद
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समारोह में उपस्थित श्रोतागण
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कार्यक्रम का संचालन करते प्रतिष्ठित कवि श्री विनोद गौतम
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20 मई 2009

शान्ति चाहिए तो पत्नी की जी-हुजूरी करें

आज सुबह-सुबह समाचार-पत्र देखा तो चौंक से गये। एकबारगी लगा कि पहली अप्रैल तो निकले एक महीने से ऊपर हो चुका है फिर ऐसी खबर? सोचा शायद समाचार-पत्र वाले भी मजा लेने लग, चुनाव के परिणामों से हतप्रद होकर। .................पर सब गलत, समाचार एकदम सही था।
देश के सर्वोच्च न्यायालय ने साफ-साफ कहा है कि यदि सुखी जीवन व्यतीत करना हो तो पत्नी जो कहे उसे मानो। (यहाँ सम्भव है कि वही शब्द प्रयोग न हो सकें जो कहे गये पर उनका सार यही है) समाचार में आगे कहा गया कि उच्च्तम न्यायालय ने कहा कि यदि पत्नी कहे कि उधर मुँह फेर लो तो मुँह उधर ही फेर लो।
इस तरह का निर्णय न्यायालय ने एक तलाक के मामले में दिया। एकदम से विचार उन लोगों का आया जो महिलाओं को निरीह, अबला और शोषित बताते घूमते हैं। यदि यह बात किसी नेता, समाज सुधारक, साहित्यकार या फिर किसी अन्य ने कही होती तो अभी तक बवाल मच गया होता। (सम्भव है कि इस पर भी टीका-टिप्पणी हो क्योंकि पिछले दिनों एक न्यायाधीश के अपमान का मामला भी सामने आ चुका है)
सत्यता बहुत हद तक आज यह है भी। घरेलू हिंसा के रूप में महिलाओं के ऊपर होती हिंसा दिखती है, वह चाहे शाब्दिक हो, शारीरिक हो, मानसिक हो पर पुरुषों के ऊपर होती हिंसा कतई नहीं दिखती।
ऐसे एक दो नहीं कई घरों और पुरुषों को हम स्वयं व्यक्तिगत रूप से जानते हैं जो अपनी पत्नी और उसके मायके वालों से पीड़ित हैं। कई ऐसे निर्दोष परिवार भी हमारे सम्पर्क में हैं जो बिना किसी प्रकार की हिंसा करने के बाद भी दहेज प्रताड़ना के मुकदमे को झेल रहे हैं।
यह बात तो सौ फीसदी सही है कि समाज पुरुष प्रधान रहा और महिलाओं को दोयम दर्जे का समझा जाता रहा किन्तु अब भी यही बात लागू नहीं है। अब पुरुष महिलाओं को पूरा साथ दे रहे हैं। घर के कामों में भी हाथ बँटाया जा रहा है, बच्चों को भी सँभाला जा रहा है अन्य दूसरे कामों के द्वारा महिलाओं को सहयोग दिया जा रहा है।
अन्त में एक बात बस इसे विवाद न बनाइयेगा, आज महिला यदि तरक्की नहीं कर पाती है तो पुरुष को दोष देती है किन्तु यदि तरक्की कर जाती है तो उसके लिए पुरुष का बिलकुल भी सहयोग नहीं मानती।

क्या वाकई पुरुष बिलकुल सहयोग नहीं करते? एक पढ़ी-लिखी महिला को क्या उसके पिता ने शिक्षित होने में सहयोग नहीं किया? आज तमाम महिला ब्लागर हैं क्या वे सब बिना सहयोग के ऐसा कर रहीं हैं? आज तमाम सारी महिलायें अनेक क्षेत्रों में हैं क्या इसमें किसी भी पुरुष का बिलकुल भी सहयोग नहीं?
चलिए अब तो उच्चतम न्यायालय ने कह भी दिया नहीं भी कहा होता तो भी हम तो मान ही रहे थे कहना क्योंकि अभी शादी को बहुत वक्त नहीं हुआ और पुलिस से बड़ा डर लगता है। पता चलता लिया-दिया कुछ नहीं और डंडे पड़े सो अलग से.............
भइया मान भी जाओ...........जो कहे सो करो............समझे???

06 अप्रैल 2009

क्या कहेंगे प्रदेश की इस स्थिति पर?

हम आये दिन देखते हैं कि जब हम आपस में चर्चा करते हैं तो समाज की स्थिति पर अवश्य ही चर्चा करते हैं। समाज में क्या चल रहा है, राजनीति में क्या चल रहा है आदि पर चर्चा होती रहती है। हम भी इस तरह की चर्चाओं में अपनी भागीदारी करते रहते हैं।
समाचार पत्र भी सामाजिक स्थिति को बताने में बेहतर भूमिका का निर्वाह करते हैं। इधर चुनाव का मौसम आने से समाचार पत्रों में चुनाव पर चर्चा अधिक हो रही है। जैसा कि आदत में शुमार है सुबह की चाय और अखवार।
समाचार पत्र में चुनाव या फिर कुछ इधर उधर की और कुछ स्थानीय खबरों पर निगाह डाल कर समाचार पत्र पढ़ने की इतिश्री कर लेते हैं। (स्थानीय समाचारों में हमें भी स्थान मिल जाता है सो उनका पढ़ना तो अवश्य ही होता है।)
पिछले दो तीन दिनों से कुछ खास नहीं दिखा समाचारों में पर जैसा कि बाल में खाल निकालने की आदत सी है, मीडिया से भी जुड़ाव है, सामाजिक संस्थाओं से भी सम्पर्क बना है तो समाचारों को पोस्टमार्टम करने की दृष्टि से अधिक देखते हैं। इसी कारण लगा कि जो हमें विशेष लगा वो आपके सामने भी रखा जाये, जिससे पता लग सके कि हमारे समाज की वाकई यही स्थिति है या फिर मीडिया द्वारा इसे इस प्रकार का दिखाया जाता है।

उत्तर प्रदेश के एक प्रमुख समाचार पत्र ‘अमर उजाला’ में आज दिनांक 6 अप्रैल 2009 के बुन्देलखण्ड संस्करण में प्रदेश-आसपास के अन्तर्गत दो पृष्ठ समाचारों के हैं। इनमें प्रदेश के समाचारों से अवगत कराया जाता है, आज भी कराया गया।

आपके सामने पूरा समाचार न रखकर समाचार का शीर्षक ही रखेंगे, इसी से आप अंदाजा लगा लीजिएगा कि प्रदेश की क्या स्थिति है।

प्रदेश-आसपास पृष्ठ 10 में प्रकाशित समाचार-

1- एचटी लाइन का तार टूटकर गिरने से ताई-भतीजे की मौत
2- पीडब्ल्यूडी कर्मचारी से की टप्पेबाजी
3- पिहानी में आग से 60 बीघा फसल राख
4- कछौना में भी आग लगी
5- बंधक बनाकर छात्रा से तीन दिन तक दुराचार
6- दोस्त से ही मांग ली 25 लाख की रंगदारी
7- बस की टक्कर से बालक मरा, साथी घायल
8- मां की मौत के बाद पुत्र की भी मौत
9- संदिग्ध हालत में मौत, हत्या का आरोप
10- सोनभद्र में विस्फोटक संग महिला गिरफ्तार
11- किशोरी ने बलात्कारी को मार डाला
12- एक्सप्रेस से टकराने से बची मालगाड़ी
13- नाले में सुरंग बना कर उड़ाये शाप से जेवर
14- व्यापारी से मांगी तीन लाख की रंगदारी
15- आग से बालक जिंदा जला


(इसी पृष्ठ पर झलक शीर्षक से दिए गये कुछ समाचार)

1- पत्नी के दुपट्टे से फांसी लगा झूल गया
2- संदिग्ध दशा में महिला का शव फांसी पर लटका मिला
3- मधुमिता के घर से सुरक्षा गारद हटाई गई
4- सीतापुर में पुलिस टीम पर दागीं 10 राउण्ड गोलियां
5- जीप की टक्कर से बच्चे की जान गई


ये हैं पृष्ठ 10 के समाचार, अब एक झलक पृष्ठ 11 के समाचारों पर भी

1- प्रेम संबंध में बाधक बनने पर हुई थी बसपा नेता की हत्या
2- तीन मासूमों सहित छह लोग जिंदा जले
3- रफ्तार ने ली दो सगे भाइयों की जान
4- पलटने से बची केरला एक्सप्रेस
5- हादसा टला: क्रेक टेक से गुजर गई लिच्छवी एक्सप्रेस
6- बैटरी चोर गैंग पकड़ा गया
7- सफर दुश्वार: अब जनता एक्सप्रेस में लुटा यात्री
8- सरेशाम युवक का बाजार से अपहरण
9- संभलकर इस्तेमाल करें पराया एटीएम
10- ठेकेदार और उसकी मां की गोली मार कर हत्या
11- न्यायिक अधिकारी के घर की महिलाओं से लूट
12- स्कूली बस में उतरा करेंट, बाल-बाल बचे बच्चे
13- दो तांत्रिकों की गोली मारकर हत्या, एक घायल


ये हैं प्रदेश-आसपास की स्थिति, क्या कहेंगे आप?


चुनावी चकल्लस-

अपने पर विश्वास नहीं, गैरों की खिदमत करते हैं,
अपने कर्म नहीं देखें, दूजों पर ताने कसते हैं,
ऊँची गाड़ी, ऊँचे बँगले, वो राजा जैसे दिखते हैं, है लोकतांत्रिक देश मगर, वो तानाशाही करते हैं।