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04 मई 2009

ब्लॉग ने किया एक वर्ष का सफर पूरा

आज हमारे ब्लाग को पूरा एक वर्ष हो गया है। इस एक वर्ष की अवधि में बहुत कुछ सीखने-समझने को मिला। ब्लाग पर पहली पोस्ट ‘दलित चेतना’ पर लिखी थी। लेखन के शौक ने लगातार लिखवाया और आज एक वर्ष आसानी से पूरा कर लिया। अच्छे, बुरे दोनों तरह के अनुभव रहे। हमारी पोस्ट पर कुछ लोगों ने खुलकर अपने विचार रखे; कुछ लोगों ने बेनामी के रूप में अपनी बात कहने की हिम्मत दिखाई तो कुछ ऐसे भी बन्धु आये जिन्होंने खुलकर या बेनामी रूप में कुछ भी कहने की हिम्मत न दिखाई और वे ई-मेल के द्वारा ही अपनी बात को स्पष्ट करते दिखे। सबके अपने अपने तरीके हैं.....सबको साधुवाद कि वे किसी न किसी रूप में अपनी बात कहने तो आये।
ब्लाग की टहल के दौरान भी बहुत कुछ देखने-सीखने-सोचने को मिला। कई ब्लाग तो प्रेरणा देते दिखे तो कई ने मन को निराश किया। यह भी सबका अपना-अपना स्वभाव है। क्या करियेगा?
इसके अतिरिक्त ब्लाग पर एक अपना नितांत निजी कार्य, एक प्रकार का स्टिंग आपरेशन सा किया गया, अन्य ब्लाग की गतिविधियों को केन्द्रबिन्दु बना कर। उसके परिणाम भी बड़े चैंकाने वाले रहे (परिणाम कभी और दिन) बड़े-बड़े सूरमा इस आपरेशन के द्वारा हमारी पकड़ में आये। (इनके बारे में बतायेंगे पर बिना नाम लिये)
चलिए अपनी बात इतनी ही, सब अपनी-अपनी तरह से काम करते हैं, किसी को बुरा मानने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। हाँ, यह ध्यान अवश्य रखा जाये कि उसके काम से किसी अन्य की भावनायें आहत न हों।
हमारे ब्लाग की दीर्घायु के लिए आप सब प्रार्थना करियेगा, हम तो प्रार्थना, कार्य कर ही रहे हैं।



01 जनवरी 2009

नव-वर्ष की पहली पोस्ट - शुभकामना



नया वर्ष सभी को मंगलदायक हो.........



नए वर्ष की शुभकामनायें देने का बहुत मन है पर बीते साल की दर्द भरी घटनाएं मन को व्यथित कर देतीं हैं और उन परिवारों को याद karaa देती है जिन्हों ने अपना कोई न कोई इन दर्द भरी घटनाओं में खोया है. एक दृष्टि से देखा जाए तो खोना और पाना ही इस जिंदगी का सत्य है पर क्या हमारे साथ कुछ अप्रिय होने पर भी हम इसी तरह की बात करते हैं?


चलिए अपने लिए न सही उन लोगों के लिए जिन्हों ने वर्ष 2008 में अपना कुछ न कुछ खोया है, चाहे वो कोसी की बाढ़ रही हो, बुंदेलखंड का सूखा रहा हो, ट्रेन दुर्घटना रहीं हो या फ़िर कोई बम हादसा, मंदी की मार रही हो या मंहगाई का हमला, पड़ोसी मुल्कों की साजिश रही हो या फ़िर भीतरी अलगाववादियों की फितरत...........कुछ बी बुरा रहा हो उस बुरे को वर्ष 2008 के साथ ही बापस भेजने के लिए हम सबको एकजुट होना पड़ेगा. इसी एक जुटता के लिए हम सबको पूरी ताकत से उन सारी ताकतों को मुंह तोड़ जवाब देना होगा जे हमें अलग करने पर हमें कमजोर करने पर उतारू हैं।


इस अवसर पर जबकि नए वर्ष की शुरुआत हो चुकी है, सबने कोई न कोई संकल्प ले लिया होगा........ हम अपनी एक कविता के सहारे नए साल की पहली पोस्ट आपके सामने रख रहे हैं.................

आओ हम सब मिल-जुल कर,
----------भारत माँ को आज संवारें।
देखे हैं जो उसने हमसे,
---------उन सपनों को हम साकारें॥
सिरमौर ऊंचा खड़ा हिमालय,
---------मस्तक जिसका है कश्मीर।
नीचे चरणों को धोता सागर,
------------इठलाये इसकी तकदीर॥
सूबे इसके दिल की धड़कन,
----------हर भाषा इसकी वाणी है।
जीवन बन कर बहतीं नदियाँ,
------------नहीं साधारण पानी है॥
वस्त्र सुशोभित सुंदर जिसके,
-----------खेतों और खलिहानों से।
हस्ती ऊंची इसकी जग में,
------------इसके वीर जवानों से॥
देश-प्रेम की तीव्र भावना,
--------भरी है इसके जन-जन में।
प्रेम-प्यार की बसी है खुशबू,
------इसके हर एक कण-कण में॥
इसकी इज्जत हमको प्यारी,
--------किसी कीमत न खोने देंगे।
तिरछी नजरों से जो देखेगा,
-------उसे मिटा के हम रख देंगे॥
देश की इज्जत, आजादी पर,
-----------हमें बहुत अभिमान है।
जाए जान इसी की खातिर,
----------दिल का ये अरमान है॥

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आइये संकल्प करें कि नए वर्ष 2009 को हम रक्त-रंजित नहीं होने देंगे, उसको आंसुओं में न खोने देंगे, उसमें चीखों का नहीं हँसी का वास हो............

नया साल शुभ हो

04 मई 2008

दलित विमर्श को समझने की जरूरत है

साहित्य में समाज की तरह दलित विमर्श को विशेष महत्त्व दिया जा रहा है। देखा जाए तो दलित विमर्श को अभी भी सही अर्थों में समझा नहीं गया है। दलित विमर्श के नाम पर कुछ भी लिख देना विमर्श नहीं है। साहित्यकार को ये विचार करना होगा की उसके द्वारा लिखा गया सारा समाज देखता है। दलित साहित्यकार दलित विमर्श को स्वानुभूती सहानुभूति के नाम देकर विमर्श की वास्तविक धार को मोथरा कर रहे हैं। अपने समाज का मसीहा मानने वाले महात्मा बुद्ध को क्या वे स्वानुभूती या समनुभुती अथवा सहानुभूति के द्वारा अपना रहे हैं? महात्मा बुद्ध तो एक राजपरिवार के सदस्य थे उनहोंने न तो दुःख देखा था न ही किसी तरह का कष्ट सहा था फ़िर दलितों के लिए निकली उनकी आह को दलित अपना क्यों मानते हैं? दलित विमर्श के बारे में यदि गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो यह अपनी धार खो देगा।