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26 जनवरी 2024

हमारी शान, हमारी ताकत, हमारा गर्व : हमारा प्यारा तिरंगा


तिरंगा हम सबकी शान है. उन्मुक्त गगन में लहराते तिरंगे को नमन करने के साथ ही याद आया अपना लेखकीय तिरंगा. ये वो तिरंगा है जो हमें ताकत देता है, सच कहने की, असत्य के खिलाफ लिखने की, अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने की. 

इस तिरंगे को भी नमन. 

हमारी शान, हमारी ताकत, हमारा गर्व
हमारा प्यारा तिरंगा.... 
❤ ❤ ❤
26 जनवरी 2024


29 जनवरी 2020

शहीदों का सम्मान बचाये रहना भी है श्रद्धांजलि


गणतंत्र दिवस हो या फिर स्वतंत्रता दिवस, इन राष्ट्रीय पर्वों पर दिल-दिमाग पर एक अजब तरह की खुमारी चढ़ी रहती है. ऐसे माहौल में, जबकि देह का रोम-रोम देशभक्ति के एहसास में डूबा रहता है किसी भी देशभक्त के प्रति अनादर जैसी स्थिति देख मन विचलित हो जाता है. कुछ ऐसा ही हमारे साथ भी उस समय हुआ जबकि अपनी नियमित संध्या घुमक्कड़ी में बाजार में टहलना हो रहा था. गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर शहर को तिरंगे से सजाया जा रहा था. कहीं कपड़ों के द्वारा सजावट हो रही थी तो कहीं गुब्बारों के द्वारा तो कहीं बिजली की झालरें तीन रंग बिखेरने में लगी थीं. आज़ादी के मतवालों को याद करते हुए, मन ही मन में देशभक्ति के तराने गुनगुनाते हुए जैसे ही रानी लक्ष्मीबाई चौराहे के नजदीक पहुँचना हुआ तो दिमाग एकदम से झनझना उठा.


रानी लक्ष्मीबाई की मूर्ति जी घेरे के भीतर लगी हुई थी, उसे तिरंगे कपड़ों से सजाया गया था. चारों तरफ से झालरनुमा सजावट करने के प्रयास में तिरंगे कपड़ों को रानी लक्ष्मीबाई के बांये हाथ पर आकर तमाम कपड़े बाँध दिए गए थे. अपनी कतिपय शारीरिक दिक्कतों के चलते वहाँ तक पहुँच कर उन गाँठों को खोल पाना हमारे लिए संभव नहीं हो पा रहा था. उरई नगर पालिका परिषद् की ओर से ये सजावट करवाई जा रही थी. रात के लगभग नौ बजने को आये थे. कुछ जिम्मेवार लोगों को फोन करके उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत कराते हुए कहा कि आवश्यक नहीं कि इन क्रांतिकारियों की तरह कोई क्रांति ही करो मगर कम से कम इनका सम्मान तो करते रहो. गुस्सा इसलिए भी था क्योंकि कुछ दिनों पहले ऐसे ही एक सजावट के क्रम में रानी झाँसी के घोड़े की पूँछ को किसी खूंटे की तरह इस्तेमाल कर लिया गया था, अबकी ऐसा बर्ताव रानी झाँसी के हाथ के साथ किया गया.


फिलहाल, कुछ फोन, सोशल मीडिया पर फोटो के लगाने और थोड़ी सी भागदौड़ के बाद उस विचित्र सी स्थिति को सुधार दिया गया. आज़ादी के लिए अपनी जान की परवाह न करने वाले इन शहीदों का सम्मान बचा रहे,यही इनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.



25 जनवरी 2020

संविधान, स्वतंत्रता, गणतंत्र को समझ न सके हैं अभी हम

राष्ट्रीय दिवसों से सम्बंधित आयोजन किसी भी व्यक्ति के अन्दर देशभक्ति की भावना का संचार करने में सक्षम होते हैं. गणतंत्र दिवस हो अथवा स्वाधीनता दिवस, सभी में बच्चों से लेकर वृद्धजनों तक उत्साह दिखाई देता है. हर तरफ देशभक्ति की बयार बहती नजर आती है. एक तरह का जूनून सबके ऊपर नशे की तरह चढ़ा होता है. समाज का कोना-कोना देशभक्ति से ओतप्रोत समझ आने लगता है. क्या समाज, क्या घर, क्या कार्यालय, क्या आभासी दुनिया, क्या सोशल मीडिया सभी जगह देशभक्ति के विचारों का गुणगान होता रहता है. एक सामान्य नागरिक भी खुद को तिरंगे में सराबोर कर देता है. गणतंत्र की बातें, संविधान की रक्षा, उसके अनुपालन की बातें लोगों के मुँह से गली, मोहल्ले, चौराहे पर सुनाई देने लगती हैं. इसके बाद भी कहीं न कहीं अंतस इसका आनंद पूर्णतः ले नहीं पाता है. कहीं न कहीं वह ऐसे आयोजनों को महज एक दिन की औपचारिकता मानकर खारिज करना चाहता है. 


संभव है कि बहुत से देशभक्ति में सजे-धजे लोगों को ये बात हजम न हो मगर आज का अंतिम सत्य यही है. एक पल को तिरंगे को सलामी देने के ठीक पहले, उसके फहराने-लहराने पर मर-मिटने की सौगंध खाने के ठीक पहले विचार करिए कि आज देश की सड़कों पर, देश की राजधानी की सड़कों पर, राजधानी के शाहीन बाग़ में अथवा अन्य राज्यों के मुख्य-मुख्य स्थलों पर जो हो रहा है, चल रहा है उसे गणतांत्रिक व्यवस्था के सशक्तिकरण के रूप में स्वीकार किया जा सकता है? यह व्यवस्था की नहीं वरन नीति-नियंताओं की, व्यवस्था बनाने वालों की, सत्ता-निर्धारकों की असफलता ही कही जाएगी कि आज़ादी के एक लम्बे अरसे के गुजार देने के बाद, गणतंत्र को स्वीकार कर देने के सात दशकों के बाद भी एक सामान्य नागरिक सही और गलत को परिभाषित कर पाने में अक्षम है. वह इसके लिए अभी भी अपने कथित अगुआ प्रतिनिधि का मुँह ताकता है. ऐसा क्यों? क्या कभी ये सवाल किसी ने खुद से किया है? क्या कभी कोई भी सवाल किसी ने नीति-निर्धारकों से, सत्ताधीशों से पूछने की हिम्मत जुटाई है?

ऐसा न हो पाने का ही दुष्परिणाम आज देश भुगत रहा है. चंद फिरकापरस्त ताकतें उस कानून की मुखालफत करने पर आमादा हैं, देश में आग लगवाने को आतुर हैं जो किसी भी दृष्टि से असंवैधानिक नहीं है. ये गणतांत्रिक असफलता ही है कि एक आम नागरिक अपना बुद्धि, विवेक, कौशल लगाने के बजाय किसी और के हाथ की कठपुतली बना हुआ है. सोचने की आवश्यकता है कि एक ऐसे कानून का विरोध, जिसका इस देश के नागरिकों की नागरिकता से कोई लेना-देना नहीं है, देश के उन सम्बंधित नागरिकों की किस मानसिकता का परिचय देता है. ये हास्यास्पद ही नहीं वरन विचारणीय स्थिति है कि एक तरफ हम खुद को विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश कहते हैं, खुद को विश्व गुरु की राह का अगुआ कहते हैं तब ऐसे बिंदु पर समाज को बंधक बनाने की कोशिश की जा रही है जो किसी भी तरह से असंवैधानिक नहीं है.

यही स्थिति है कि हम पर, हमारे देश पर, हमारी प्रक्रिया पर, लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर, गणतांत्रिक स्थिति पर सवाल उठाये जाने लगते हैं. सवाल कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में क्या महज एक दिन के लिए ही संवैधानिक महत्त्व है? क्या महज एक दिन ही गणतंत्र की स्वीकार्यता होती है? क्या बस इसी एक दिन के लिए गणतंत्र को, संविधान को आदर दिया जाता है? क्यों इस एक दिन की लोकतान्त्रिक शैली अपनाये जाने के बाद हम नागरिकों के व्यवहार में तानाशाही दिखाई देने लगती है? क्यों इसी एक दिन संविधान को सर्वोच्च मानने के बाद उसमें खामियां दिखाई देने लगती हैं? क्यों एक दिन के गणतंत्र के बाद फिर इसी गणतांत्रिक व्यवस्था को दोयम दर्जे का बताया जाने लगता है? जिन संवैधानिक मूल्यों की लगातार चर्चा होती है, जिन संवैधानिक अधिकारों की बात की जाती है, जिन संवैधानिक दायित्वों पर प्रकाश डाला जाता है वे क्यों यह दिन समाप्त होते ही पुरातन बातें हो जाती हैं?

आज जबकि विरोध का कारण एक व्यक्ति, एक दल, एक विचारधारा हो तब ये आवश्यक हो जाता है कि असलियत है क्या. अब ऐसे समय में जबकि कतिपय वोटबैंक के कारण, कतिपय तुष्टिकरण के कारण समाज को बरगलाया जाने लगा है, उसे हिंसात्मक, विध्वंसक गतिविधियों में लगाया जाने लगा है तब आवश्यक है कि देश की भावी पीढ़ी को लोकतंत्र का, गणतंत्र का, स्वाधीनता का उचित अर्थ और सन्दर्भ ज्ञात हो. गणतंत्र को अथवा संविधान को समझना इसलिए और भी आवश्यक हो गया है क्योंकि देश के एक-एक व्यक्ति अब राजनैतिक पूर्वाग्रहों से घिर गया है. उसकी अपनी सोच, मानसिकता पर किसी न किसी वाद का, किसी न किसी विचारधारा का कब्ज़ा सा समझ आने लगा है. ऐसा महसूस होता है जैसे सोचने-समझने की क्षमता को कहीं तिलांजलि देकर वह किसी न किसी विचारधारा की कठपुतली बना हुआ है. क्या करना है, क्यों करना है, कैसे करना है के बारे में कोई विचार किये बिना वह स्वार्थपूर्ति में संलिप्त है. अपने मनोनुकूल विचारधारा को पोषित करने में लिप्त है.


यह स्थिति वर्तमान समाज के लिए खतरनाक बनी हुई है. ऐसे में व्यक्ति स्वेच्छा से सोच-विचार करने के बजाय अपनी पुष्ट विचारधारा के अनुसार संचालित होता है. उसी के अनुसार खुद को आगे बढ़ाता हुआ कार्य करता है. इस बिंदु पर आकर वह खुद को और अपनी विचारधारा को ही एकमात्र सत्य स्वीकारता हुआ शेष सभी को ख़ारिज करता जाता है. यह स्थिति जहाँ एक तरफ तानाशाही को जन्म देती है वहीं मानसिक विकृति भी पैदा करती है, जो समाज के लिए किसी भी कीमत पर सुखद नहीं है. ऐसा आज लगातार हो रहा है. खुद को, खुद की विचारधारा को स्थापित करने के लिए व्यक्ति किसी भी हद तक जाने को बेताब सा है. इसी बेताबी, तीव्रता ने व्यक्ति व्यक्ति के मध्य आपस में तनाव को जन्म दिया है. आपसी कटुता, वैमनष्यता को बढ़ावा दिया है. अपराध, हिंसा, दुराचार, अराजकता के मूल में यही वैमनष्यता है, यही विभेद है.

इस तरह की सोच दूसरों पर कब्ज़ा करने की भावना का विकास करती है. इस बारे में प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से अध्ययन करते हुए बहुतायत लोगों को उनके विचारों, उनकी मानसिकता के अनुसार ही वातावरण का निर्माण करने की कोशिश की जा रही है. सामाजिकता को किनारे रखते हुए तथ्यों को, आँकड़ों को भी विचारधारा के अनुसार प्रदर्शित करने का कार्य किया जा रहा है. इसके लिए कभी धर्म को, मजहब को साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, कभी जाति को इसका आधार बनाया जाता है तो कभी क्षेत्र की भावना को उछालते हुए वैमनष्यता को बढ़ाया जाता है. ऐसा करने वाली ताकतें और उन ताकतों के हाथों में खेलते लोग भूल जाते हैं कि ऐसा कोई भी कदम उठाने की अनुमति न तो हमारा संविधान देता है और न ही ऐसा करना गणतांत्रिक दृष्टि से उचित है. इसके बाद भी समूचे समाज में ऐसा होते दिख रहा है. संसद द्वारा किये जा रहे संविधान संशोधनों को भले ही किसी वर्ग, क्षेत्र, राज्य आदि के हितार्थ किया जाता रहा हो मगर समाज में संविधान संशोधनों की अपनी ही परिभाषाएं निकाली जाती हैं. संविधान के अपने ही स्वरूप दिखाए जाते हैं. गणतंत्र को अपने हिसाब से परिभाषित किया जा रहा है.

समझने वाली बात है कि गणतंत्र या फिर आज़ादी महज एक दिन का समारोह नहीं, एक दिन का आयोजन मात्र नहीं. गणतंत्र हमारे देश के, हम नागरिकों के जीने का आधार है. यह महज एक दिन का वो कृत्य नहीं जो तिरंगे के फहराने के साथ शुरू किया जाता है और उसके शाम को ससम्मान उतारने के बाद समाप्त हो जाता है. किसी दिन विशेष के साथ-साथ प्रत्येक दिन सम्पूर्ण देश के लिए गणतंत्र दिवस होना चाहिए, स्वतंत्रता दिवस होना चाहिए. ऐसा न होने का ही परिणाम है कि यहाँ दूसरों के लोकतान्त्रिक मूल्यों का हनन किया जा रहा है. दूसरों की आज़ादी में जबरन दखलंदाजी की जा रही है. गणतंत्र दिवस या फिर स्वतंत्रता दिवस मनाये जाने के पहले, अपने को तिरंगे या फिर भारत माता की जय के द्वारा देशभक्त बताने से पहले संविधान का, गणतंत्र का अर्थ समझना होगा. इनके मूल्यों को समझना होगा. इनके महत्त्व को समझना होगा. यदि ऐसा नहीं किया जा सकता है तो ऐसे किसी भी दिन विशेष का आयोजन खुद के प्रचार-प्रसार का तरीका भर है और कुछ नहीं.

30 जनवरी 2019

एक दिन का आयोजन नहीं है गणतंत्र


गणतंत्र दिवस आते ही हर तरफ देशभक्ति का जूनून दिखाई देने लगा. समाज का एक-एक कोन देशभक्ति से ओतप्रोत समझ आने लगा. सोशल मीडिया पर लोगों की प्रोफाइल और विचार देशभक्ति का गुणगान करने लगे. नागरिक भी अपने घर, कार्यालय, वाहन आदि के साथ-साथ खुद को तिरंगे रँगे से सराबोर करने लगे. गणतंत्र की बातें, संविधान की रक्षा, उसके अनुपालन की बातें लोगों के मुँह से गली, मोहल्ले, चौराहे पर सुनाई दे रही थीं. उस एक दिन के गणतांत्रिक स्वरूप के बाद फिर सब वैसे का वैसा दिखाई देने लगा. सवाल उठे कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में क्या महज एक दिन के लिए ही संवैधानिक महत्त्व है? क्या महज एक दिन ही गणतंत्र की स्वीकार्यता होती है? क्या बस इसी एक दिन के लिए गणतंत्र को, संविधान को आदर दिया जाता है? क्यों इस एक दिन की लोकतान्त्रिक शैली अपनाये जाने के बाद हम नागरिकों के व्यवहार में तानाशाही दिखाई देने लगती है? क्यों इसी एक दिन संविधान को सर्वोच्च मानने के बाद उसमें खामियां दिखाई देने लगती हैं? क्यों एक दिन के गणतंत्र के बाद फिर इसी गणतांत्रिक व्यवस्था को दोयम दर्जे का बताया जाने लगता है? जिन संवैधानिक मूल्यों की लगातार चर्चा होती है, जिन संवैधानिक अधिकारों की बात की जाती है, जिन संवैधानिक दायित्वों पर प्रकाश डाला जाता है वे क्यों यह दिन समाप्त होते ही पुरातन बातें हो जाती हैं?

आज गणतंत्र को अथवा संविधान को समझना इसलिए और भी आवश्यक हो गया है क्योंकि देश के एक-एक व्यक्ति अब राजनैतिक पूर्वाग्रहों से घिर गया है. उसकी अपनी सोच, मानसिकता पर किसी न किसी वाद का, किसी न किसी विचारधारा का कब्ज़ा सा समझ आने लगा है. ऐसा महसूस होता है जैसे सोचने-समझने की क्षमता को कहीं तिलांजलि देकर वह किसी न किसी विचारधारा की कठपुतली बना हुआ है. क्या करना है, क्यों करना है, कैसे करना है के बारे में कोई विचार किये बिना वह स्वार्थपूर्ति में संलिप्त है. अपने मनोनुकूल विचारधारा को पोषित करने में लिप्त है.

यह स्थिति वर्तमान समाज के लिए खतरनाक बनी हुई है. ऐसे में व्यक्ति स्वेच्छा से सोच-विचार करने के बजाय अपनी पुष्ट विचारधारा के अनुसार संचालित होता है. उसी के अनुसार खुद को आगे बढ़ाता हुआ कार्य करता है. इस बिंदु पर आकर वह खुद को और अपनी विचारधारा को ही एकमात्र सत्य स्वीकारता हुआ शेष सभी को ख़ारिज करता जाता है. यह स्थिति जहाँ एक तरफ तानाशाही को जन्म देती है वहीं मानसिक विकृति भी पैदा करती है, जो समाज के लिए किसी भी कीमत पर सुखद नहीं है. ऐसा आज लगातार हो रहा है. खुद को, खुद की विचारधारा को स्थापित करने के लिए व्यक्ति किसी भी हद तक जाने को बेताब सा है. इसी बेताबी, तीव्रता ने व्यक्ति व्यक्ति के मध्य आपस में तनाव को जन्म दिया है. आपसी कटुता, वैमनष्यता को बढ़ावा दिया है. अपराध, हिंसा, दुराचार, अराजकता के मूल में यही वैमनष्यता है, यही विभेद है.

सिर्फ और सिर्फ अपनी स्थापना वाली मानसिकता कैसे गणतंत्र का, संविधान का सम्मान करेगी यह समझ से परे है. इस तरह की सोच दूसरों पर कब्ज़ा करने की भावना का विकास करती है. किसी समय संपत्ति पर कब्ज़ा ज़माने की नीयत अब अधिकारों पर, दिमाग पर, सोच पर कब्जा करने में परिवर्तित होती जा रही है. इस बारे में प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से अध्ययन करते हुए बहुतायत लोगों को उनके विचारों, उनकी मानसिकता के अनुसार ही वातावरण का निर्माण करने की कोशिश की जा रही है. सामाजिकता को किनारे रखते हुए तथ्यों को, आँकड़ों को भी विचारधारा के अनुसार प्रदर्शित करने का कार्य किया जा रहा है. इसके लिए कभी धर्म को, मजहब को साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, कभी जाति को इसका आधार बनाया जाता है तो कभी क्षेत्र की भावना को उछालते हुए वैमनष्यता को बढ़ाया जाता है.

ऐसा करने वाली ताकतें और उन ताकतों के हाथों में खेलते लोग भूल जाते हैं कि ऐसा कोई भी कदम उठाने की अनुमति न तो हमारा संविधान देता है और न ही ऐसा करना गणतांत्रिक दृष्टि से उचित है. इसके बाद भी समूचे समाज में ऐसा होते दिख रहा है. संसद द्वारा किये जा रहे संविधान संशोधनों को भले ही किसी वर्ग, क्षेत्र, राज्य आदि के हितार्थ किया जाता रहा हो मगर समाज में संविधान संशोधनों की अपनी ही परिभाषाएं निकाली जाती हैं. संविधान के अपने ही स्वरूप दिखाए जाते हैं. गणतंत्र को अपने हिसाब से परिभाषित किया जा रहा है.

समझने वाली बात है कि गणतंत्र या फिर आज़ादी महज एक दिन का समारोह नहीं, एक दिन का आयोजन मात्र नहीं. गणतंत्र हमारे देश के, हम नागरिकों के जीने का आधार है. यह महज एक दिन का वो कृत्य नहीं जो तिरंगे के फहराने के साथ शुरू किया जाता है और उसके शाम को ससम्मान उतारने के बाद समाप्त हो जाता है. किसी दिन विशेष के साथ-साथ प्रत्येक दिन सम्पूर्ण देश के लिए गणतंत्र दिवस होना चाहिए, स्वतंत्रता दिवस होना चाहिए. ऐसा न होने का ही परिणाम है कि यहाँ दूसरों के लोकतान्त्रिक मूल्यों का हनन किया जा रहा है. दूसरों की आज़ादी में जबरन दखलंदाजी की जा रही है. गणतंत्र दिवस या फिर स्वतंत्रता दिवस मनाये जाने के पहले, अपने को तिरंगे या फिर भारत माता की जय के द्वारा देशभक्त बताने से पहले संविधान का, गणतंत्र का अर्थ समझना होगा. इनके मूल्यों को समझना होगा. इनके महत्त्व को समझना होगा. यदि ऐसा नहीं किया जा सकता है तो ऐसे किसी भी दिन विशेष का आयोजन खुद के प्रचार-प्रसार का तरीका भर है और कुछ नहीं. 

यदि संवैधानिक मूल्यों का अनुपालन, गणतांत्रिक व्यवस्था का उपयोग, स्वतंत्र जीवन की कार्यशैली को महज एक दिन का मानकर शेष सभी दिनों में उसे तिरोहित कर देंगे तो ऐसा करके हम सभी लोग अपने समाज का, अपने देश का ही अहित करेंगे. हम सबको समझना होगा कि गणतंत्र दिवस का उल्लास, उसके सहारे उमड़ती देशभक्ति का ज्वार महज एक दिन के लिए नहीं बल्कि जीवन-पर्यंत के लिए है.



उक्त आलेख दिनांक 30-01-2019 दैनिक जागरण, राष्ट्रीय संस्करण के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है.

26 जनवरी 2018

आओ मिलकर गणतंत्र सशक्त बनायें

आप सभी को गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें.

हम सभी के लिए आज का दिन गौरव का दिन है. सन 1950 में आज ही के दिन हमारे संविधान को सम्पूर्ण देश में लागू किया गया. इसके लागू होते ही हमारा देश लोकतान्त्रिक व्यवस्था के साथ-साथ एक गणराज्य के रूप में भी जाना जाने लगा. विश्व के किसी और देश में ऐसी अद्भुत व्यवस्था शायद ही देखने को मिलती हो कि वहाँ केन्द्रीय सत्ता की प्रभुता के साथ-साथ राज्यों की प्रभुता को भी समान रूप से स्वीकारा गया है. संविधान निर्माताओं ने केंद्र के साथ-साथ राज्यों को भी पर्याप्त अधिकार दिए. नागरिकों को व्यापक अधिकार प्रदान किये. कर्तव्यों का निर्वहन, मौलिक अधिकारों की रक्षा आदि का सूत्रपात इसी संविधान के द्वारा होना आरम्भ हुआ. संविधान निर्माताओं ने अपने पास असीमित अधिकार होने के बाद भी केंद्र और राज्य के साथ-साथ सामान्य नागरिक को भी पर्याप्त अधिकार, पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान किये जाने की वकालत की थी. वे चाहते तो अधिकारों को सामाजिक रूप से लोकतान्त्रिक न बनाकर उसे भी वंशानुगत अथवा परिवार तक सीमित कर सकते थे. यकीनन उनका उद्देश्य देश के विकास में सभी की भूमिका, सभी नागरिकों की स्वतंत्र भागेदारी करना रहा होगा. इसी कारण से नागरिकों को स्वतंत्रता के साथ जीवन-यापन करने के पर्याप्त अधिकार संविधान निर्माताओं ने संविधान के माध्यम से उपलब्ध कराये हैं.


वैश्वीकरण, आधुनिकता, औद्योगीकरण के चलते इधर देखने में आ रहा है कि वर्तमान समय में बहुतेरे नागरिकों द्वारा स्वतन्त्रता, संविधान के नाम पर अपने अधिकारों का दुरुपयोग होने लगा है. बहुत से लोग कर्तव्यों के स्थान पर अधिकारों की ही चर्चा को प्रमुखता देने लगे हैं. गणतन्त्र दिवस के इस शुभ अवसर पर बजाय इस बात के कि दूसरे ने क्या किया, दूसरे ने क्या नहीं किया हम इस बात पर विचार करें कि खुद हमने क्या किया है? यदि हम सामाजिक ताने-बाने पर नजर डालें तो स्थिति सुखद दिखाई देने के साथ-साथ दुखद भी दिख रही है. समाज में आज़ादी का, गणतंत्र का दुरुपयोग सा होने लगा है. अभी हाल की कुछ घटनाएँ विचलित कर देने वाली सामने आई हैं जिनमें कि हमारे नौनिहाल, हमारे बच्चे आक्रामकता का शिकार दिखाई दिए. गुडगांव के एक स्कूल में एक बच्चे की महज इसलिए हत्या कर दी जाती है कि उसकी मौत के बाद स्कूल में छुट्टी हो जाएगी. इसी तरह की वारदात लखनऊ के एक स्कूल में देखने को मिली. इसके साथ ही हरियाणा के यमुनानगर में एक छात्र ने अपनी प्रधानाचार्य की गोली मार कर इसलिए हत्या कर दी क्योंकि उस छात्र को कुछ दिन के लिए स्कूल न आने की सजा दी गई थी. समझ से परे है कि आज़ादी के नाम पर हम सब किस तरह का समाज बनाते जा रहे हैं?

ऐसी स्थिति में हम सभी को विचार करना होगा कि क्या ऐसी स्थिति में वाकई हम संविधान का सम्मान करने की दशा में दिखते हैं? क्या ये स्थितियाँ हमें गणतन्त्र दिवस मनाने की अनुमति देतीं हैं? क्या इस तरह से हम अपनी आजादी दिलाने वाले शहीदों के प्रति सच्ची श्रृद्धांजलि अर्पित कर पाने के अधिकारी हैं? सवाल बहुत से हैं. उनको खोजने के लिए समूचे देश को एक होना पड़ेगा. सभी को वर्ग, जाति, धर्म के तमाम खांचों से बाहर निकल कर देशहित में काम करना होगा. आइये एकबार मिलकर विचार करें कि लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को कैसे मजबूत बनाया जाये? कैसे अपने गणतंत्र को सशक्त बनाया जाये? संविधान के प्रति आस्था को और गहरा करने के लिए स्वच्छ वातावरण को बनायें और अपनाएं. एकजुट होकर गणतन्त्र दिवस मनायें. देश को सशक्त बनायें. देशवासियों को सफल बनायें.

आप सभी को पुनः गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें... जयहिन्द  

27 जनवरी 2017

संवैधानिक स्वतंत्रता का दुरुपयोग न होने दें

आज हम सभी के लिए गौरव का दिन है. आज ही के दिन सन 1950 में हमारे संविधान को सम्पूर्ण देश में लागू किया गया. इसके लागू होते ही हमारा देश लोकतान्त्रिक व्यवस्था के साथ-साथ एक गणराज्य के रूप में भी जाना जाने लगा. ये अपने आपमें अद्भुत है कि हमारे देश में केन्द्रीय सत्ता की प्रभुता के साथ-साथ राज्यों की प्रभुता को भी बराबर से स्वीकारा गया है. संविधान निर्माताओं ने केंद्र के साथ-साथ राज्यों को भी पर्याप्त अधिकार दिए. नागरिकों को व्यापक अधिकार प्रदान किये. कर्तव्यों का निर्वहन, मौलिक अधिकारों की रक्षा आदि का सूत्रपात इसी संविधान के द्वारा होना आरम्भ हुआ. संविधान निर्माताओं ने अपने पास असीमित अधिकार होने के बाद भी केंद्र और राज्य के साथ-साथ सामान्य नागरिक को भी पर्याप्त अधिकार, पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान किये जाने की वकालत की थी. वे चाहते तो अधिकारों को सामाजिक रूप से लोकतान्त्रिक न बनाकर उसे भी वंशानुगत अथवा परिवार तक सीमित कर सकते थे. यकीनन उनका उद्देश्य देश के विकास में सभी की भूमिका, सभी नागरिकों की स्वतंत्र भागेदारी करना रहा होगा. इसी कारण से नागरिकों को स्वतंत्रता के साथ जीवन-यापन करने के पर्याप्त अधिकार संविधान निर्माताओं ने संविधान के माध्यम से उपलब्ध कराये हैं.

इधर देखने में आने लगा है कि वर्तमान समय में स्वतन्त्रता, संविधान के नाम पर बहुतेरे नागरिकों द्वारा अपने अधिकारों का दुरुपयोग होने लगा है. इसके पीछे बहुत से लोग समाज को दोष देना शुरू कर देते हैं. देखा जाये तो समाज समस्याओं से हमेशा से ग्रस्त रहा है. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि हम खुद व्यवस्थाओं के सुचारू रूप से चलने में अपना कितना योगदान दे रहे हैं. गणतन्त्र दिवस के इस अवसर पर बजाय इस बात के कि किसने क्या किया, किसने क्या नहीं किया हम इस बात पर विचार करें कि हमने क्या किया? हम आज जितने अधिक साक्षर हुए हैं, जितने अधिक शक्तिशाली बने हैं उतने ही अधिक वर्ग हमारे आसपास दिख रहे हैं. आज सहज रूप में देखने में आता है कि कोई गाँधी वर्ग में खुद को खड़ा किये हैं, कोई नेहरू वर्ग में, कोई अम्बेडकर वर्ग में. इन वर्गों के द्वारा बजाय सामाजिक चेतना लाने के एक-दूसरे को नीचा दिखाने के प्रयास किये जा रहे हैं. यही कारण है कि आज किसी के लिए हेडगेवार देश तोडने वाले हैं तो किसी को सरदार पटेल की देश भक्ति पर संदेह दिखता है. कोई सरदार भगत सिंह को अपने पाले में शामिल करने की फिराक में दिखता है तो कोई अशफाक को अपने ग्रुप का बताता है. ये स्थिति क्षणिक रूप में किसी को प्रचार भले ही दिला दे किन्तु देश के लिए घातक है. देशवासियों के अलग-अलग गुटों में बंटने का फायदा विरोधियों द्वारा, देश के दुश्मनों द्वारा उठाये जाने की आशंका नजर आती है.


ऐसी स्थिति में हम सभी को विचार करना होगा कि क्या ऐसी स्थिति में वाकई हम संविधान का सम्मान करने की दशा में दिखते हैं? क्या ये स्थितियाँ हमें गणतन्त्र दिवस मनाने की अनुमति देतीं हैं? क्या इस तरह से हम अपनी आजादी दिलाने वाले शहीदों के प्रति सच्ची श्रृद्धांजलि अर्पित कर पाने के अधिकारी हैं? सवाल बहुत से हैं. उनको खोजने के लिए समूचे देश को एक होना पड़ेगा. सभी को वर्ग, जाति, धर्म के तमाम खांचों से बाहर निकल कर देशहित में काम करना होगा. इत्तेफाक से हमारा प्रदेश इस समय चुनावी दौर से गुजर रहा है. किसी भी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के सफल होने के पीछे उसके नागरिकों का, उसके मतदाताओं का बहुत बड़ा योगदान होता है. आइये हम सब मिलजुलकर सकारात्मक रूप से मतदान करने निकलें. लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को मजबूत बनाने के लिए, गणतंत्र को सशक्त बनाने के लिए, संविधान के प्रति आस्था को और गहरा करने के लिए स्वच्छ मतदान प्रक्रिया को अपनाएं. एकजुट होकर गणतन्त्र दिवस मनायें. देश को सशक्त बनायें. देशवासियों को सफल बनायें.