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27 अप्रैल 2023

नक्सली हमले में जवान शहीद

नक्सलियों ने एक बार फिर देश को जबरदस्त क्षति पहुँचाई है. अबकी उनके हमले में 11 जवान शहीद हुए हैं. छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में 26 अप्रैल नक्सलियों ने डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी) के जवानों को ले जा रहे एक वाहन पर हमला कर दिया. आईईडी से किये गए इस हमले में 11 जवान शहीद हो गए. डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड यानि डीआरजी छत्तीसगढ़ पुलिस के वे स्पेशल जवान हैं, जिनको केवल नक्सलियों से लड़ने के लिये भर्ती किया जाता है. इसमें सरेंडर करने वाले नक्सली और वहीं के वातावरण में पले-बढ़े लोग शामिल होते हैं. नक्सलियों के खिलाफ सबसे बड़ी सफलता अब तक इन्हीं जवानों को मिली है. इनका शहीद होना बहुत बड़ी क्षति है.  


उच्चाधिकारियों द्वारा हमेशा की तरह रटा-रटाया बयान दिया गया है. नक्सलियों पर क्या कार्यवाही होगी, ये समय बताएगा. 








 

14 अगस्त 2022

तिरंगे को सच्ची सलामी कब?

स्वतंत्र भारत की पहली आधी रात को जब लाल किले से सबका प्रिय तिरंगा फहराया थातब हवा हमारी थीपानी हमारा थाजमीं हमारी थीआसमान हमारा था. सब कुछ हमारा था पर वहाँ उपस्थित जन-जन की आँखों में नमी थी. पहली बार स्वतन्त्र हवा में लहराते हुए अपने प्यारे तिरंगे को सलामी देने के लिए उठे हाथों में एक कम्पन अवश्य था मगर उन सभी की आत्मा में दृढ़ता थी. स्वभाव में अभिमान था. स्वर में प्रसन्नता थी. सिर गर्व से ऊँचा उठा था. समय बदलता गयापरिदृश्य बदलते रहे किन्तु तिरंगा हमेशा फहरता रहाहर वर्ष फहराया जाता रहा. सलामी हर बार दी जाती रही किन्तु अहम् हर बार मरता रहा. गर्व से भरा सिर हर बार झुकता रहा. आत्मा की दृढ़ता हर बार कम होती रही. यह एहसास साल दर साल कम होता रहा. सलामी को उठते हाथों का कम्पन हर बार बढ़ता रहा. आँखों की नमी आँसुओं में बदल गई.


आज समूचा देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है. हर देशवासी आज हर घर तिरंगा के माध्यम से अपने राष्ट्रीय ध्वज को सम्मान और आदर से देख रहा है. इसके बाद भी कई बार लगता है कि कुछ न कुछ कमी सी हम सबके आसपास है. पहली बार जब हाथ काँपे थे तो वे हमारे स्वाभिमान का परिचायक बने थे. अब यही कम्पन हमारे नैतिक चरित्रचारित्रिक पतन को दिखा रहा है. पहली बार आँखों से बहते आँसू खुशी के थे मगर अब लाचारीबेबसीहताशाभयआतंकअविश्वास आदि के हैं. सामने लहराता हमारा प्यारा तिरंगा हमसे हमारी स्वतन्त्रता का अर्थ पूछता है. हमसे हमारे शहीदों के सपनों का मर्म पूछता है.


शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेलेवतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां होगा कुछ ऐसा सोचकर ही हमारे वीर-बाँकुरों ने आजादी के लिए हँसते-हँसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिये थे. इस महान सोच के बाद ही हमें प्राप्त हुई खुलकर हँसने की स्वतन्त्रताखुलकर घूमने की आजादीअपना स्वरूप तय करने की आजादी. हम आजाद तो हुए किन्तु विचारों की खोखली दुनिया को लेकर. राष्ट्रवाद जैसी अवधारणा अब हमें प्रभावित नहीं करती वरन् इसमें भी हमें साम्प्रदायिकता का बोध होने लगा है. ये सब एकाएक नहीं हो गया हैदरअसल स्वतन्त्र भारत के वक्ष पर एक ऐसी पीढ़ी ने जन्म ले लियाजिसके लिए गुलामी एक कथा की भाँति हैशहीदों की शहादत उसके लिए गल्प की तरह हैआजादी के मतवालों की कुर्बानियाँ महज एक इत्तेफाक है. ऐसी पीढ़ी के लिए आजादी का अर्थ स्वच्छन्दताउच्शृंखलता आदि बना हुआ हैआजादी के गीतराष्ट्रगीतवन्देमातरम् इनके लिए आउटडेटेड हो गये हैं.




इक्कीसवीं सदी में खड़े हमारे आजाद देश के पास आज भी स्थिरता का अभाव सा दिखाई देता है. कभी हम अपने पड़ोसी देशों की कृत्सित नीतियों का शिकार बनते हैंकभी हमें सीमापार से हो रहे आतंकी हमलों से बचना पड़ता है तो कभी यह आग हमारे ही घरों में लगी दिखाई देती है. हम मंगल ग्रह पर पानी और जीवन की आशा में करोड़ों रुपये का अभियान चलाकर वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के सामने सीना ठोंकते हैं तो शिक्षा के नाम पर वैश्विक जगत में अभी भी बहुत पीछे होने के कारण शर्मिन्दा होते हैं. हमारी गुरुकुल परम्परा एकदम से विलुप्त ही हो गई है. गुरु-शिष्य के संबंधों में भी लगातार गिरावट देखने को मिलने लगी. ये किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए.


अपनी संस्कृति के साथ विश्व की तमाम संस्कृतियों का समावेश कर हम सांस्कृतिक प्रचारक-विचारक के रूप में विख्यात होते हैं तो अपने देश की महिलाओं की गरिमाउनकी जान की सुरक्षा न कर पाने के चलते शर्म से सिर झुका बैठते हैं. हमें अभी भी बालिका शिक्षा के लिए लोगों को जागरूक करना पड़ रहा है. अभी भी बेटियों को बचाने की गुहार लगानी पड़ रही है उसके बाद भी बालिका संरक्षण गृहों से यातनाओं कीदुष्कर्म की खबरें आ रही हैं. हमने औद्योगीकरणउपभोक्तावादी संस्कृति के नाम पर हाथों में मोबाइल तो थमा दिये किन्तु शिक्षा के लिए हर हाथ को पुस्तकेंपेन्सिलें नहीं पकड़ा पाये. बच्चे अभी भी किताबों की जगह कूड़ा बीनने वाले झोले पकड़े दिखाई पड़ते हैं. मजदूरी करते दिखाई पड़ते हैं. हाथों में औजार थामे नजर आते . अभिजात्य वर्ग एवं पश्चिमीकरण की नकल में हमने हर हाथ को सस्ते दरों पर बीयर तो उपलब्ध करवा दी किन्तु बहुतायत में अपनी जनता को पीने का स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं करवा पाये.


देखा जाये तो विकास के बाद भी हम विकास की खोखली अवधारणा को पोषित करते जा रहे हैं. मॉलजगमगाते शहरमैट्रोमल्टीस्टोरीजशॉपिंग कॉम्प्लेक्स आदि हमारी विकास की सफलता नहीं हैं. जब तक एक भी बच्चा भूखा हैएक भी बच्चा अशिक्षित हैएक भी बच्चा रोगग्रस्त है तब तक हम अपने को विकसित और आजाद कहने योग्य नहीं. हमें आजादी की परिभाषा को समझाने-समझने की जरूरत है. जब तक देश का युवा भटकता हुआ आतंक की शरण में जाता रहेगाजब तक विदेशी ताकतों के द्वारा हम संचालित रहेंगेजब तक राजनीति में तुष्टिकरण हावी रहेगाजब तक लोकतन्त्र के स्थान पर राजशाही को स्थापित करने के प्रयास होते रहेंगेजब तक गाँवों की उपेक्षा कर औद्योगीकरण किया जाता रहेगाजब तक कृषि के स्थान पर मशीनों को प्राथमिकता प्रदान की जाती रहेगीजब तक इंसान उपभोग की वस्तु के तौर पर देखा जाता रहेगाजब तक हमारी जाति हमारी पहचान का साधन बनी रहेगी तब तक हम अपने को वास्तविक रूप में आजाद कहने के हकदार नहीं.


ऐसे में सवाल उठता है कि क्या फिर कोई हल नहीं इस समस्या काइन सबका हल हैमगर उसके लिए सत्ताधारियों के इंतजार के बजाय नागरिकों को ही आगे आना होगा. आपसी विभेद को समाप्त करना होगा. वैमनष्यता के चलते व्यक्ति अपना ही विकास नहीं कर सकता है तो वह समाज काअपने परिवार का विकास कैसे करेगाबच्चे हमारे भविष्य का आधार हैंयदि वे ही अशिक्षितभूखेअस्वस्थ रहेंगे तो विकास की अवधारणा बेमानी है. याद रखना होगा कि जिन्हें सत्ता चाहिए वो हमारा ही उपयोग करके सत्ता प्राप्त कर लेते हैं तो क्या हम स्वयं के लिए अपना उपयोग कर अपना और अपने राष्ट्र का विकास नहीं कर सकते हैंनागरिक किसी भी धर्म के होंकिसी भी जाति के होंकिसी भी क्षेत्र के हों किन्तु देश हमारा है और हम देश केइस सोच के द्वारा हम विकास कीएकता की राह पर आगे बढ़ सकते हैं. यदि ऐसा हम कर पाते हैं तो हम अपने प्यारे तिरंगे को सच्ची सलामी दे सकेंगे और एक बार फिर हमारा सिर उसके सामने गर्व से भरा होगादृढ़ता से हमारे हाथ उठे होंगेजयहिन्दवन्देमातरम् का घोष हमारे कंठों से निकलकर समूचे आसमान में गूँज उठेगा.

 




 

19 दिसंबर 2021

काकोरी काण्ड के स्वतंत्रता सेनानियों का 94 वां बलिदान दिवस

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में काकोरी कांड एक ऐसी घटना है जिसने अंग्रेजों की नींव झकझोर कर रख दी थी। अंग्रेजों ने आजादी के दीवानों द्वारा अंजाम दी गई इस घटना को काकोरी डकैती का नाम दिया और इसके लिए कई स्वतंत्रता सेनानियों को 19 दिसंबर 1927 को फांसी के फंदे पर लटका दिया।




अशफाक उल्ला खां

फांसी की सजा से आजादी के दीवाने जरा भी विचलित नहीं हुए और वे हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए। बात नौ अगस्त 1925 की है जब चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह सहित 10 क्रांतिकारियों ने मिलकर लखनऊ से 14 मील दूर काकोरी और आलमनगर के बीच ट्रेन में ले जाए जा रहे सरकारी खजाने को लूट लिया।

दरअसल क्रांतिकारियों ने जो खजाना लूटा उसे जालिम अंग्रेजों ने हिंदुस्तान के लोगों से ही छीना था। लूटे गए धन का इस्तेमाल क्रांतिकारी हथियार खरीदने और आजादी के आंदोलन को जारी रखने में करना चाहते थे। इतिहास में यह घटना काकोरी कांड के नाम से जानी गई, जिससे गोरी हुकूमत बुरी तरह तिलमिला उठी। उसने अपना दमन चक्र और भी तेज कर दिया।

अपनों की ही गद्दारी के चलते काकोरी की घटना में शामिल सभी क्रांतिकारी पकडे़ गए, सिर्फ चंद्रशेखर आजाद अंग्रेजों के हाथ नहीं आए। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के 45 सदस्यों पर मुकदमा चलाया गया जिनमें से राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई।

 

राजेंद्र लाहिड़ी

ब्रिटिश हुकूमत ने पक्षपातपूर्ण ढंग से मुकदमा चलाया जिसकी बड़े पैमाने पर निंदा हुई क्योंकि डकैती जैसे मामले में फांसी की सजा सुनाना अपने आप में एक अनोखी घटना थी। फांसी की सजा के लिए 19 दिसंबर 1927 की तारीख मुकर्रर की गई लेकिन राजेंद्र लाहिड़ी को इससे दो दिन पहले 17 दिसंबर को ही गोंडा जेल में फांसी पर लटका दिया गया। ठाकुर रोशन सिंह को इलाहाबाद, पंडित राम प्रसाद बिस्मिल को 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल और अशफाक उल्ला खान को इसी दिन फैजाबाद जेल में फांसी की सजा दी गई।

फांसी पर चढ़ते समय इन क्रांतिकारियों के चेहरे पर डर की कोई लकीर तक मौजूद नहीं थी और वे हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर चढ़ गए।

 

ठाकुर रोशन सिंह

काकोरी की घटना को अंजाम देने वाले आजादी के सभी दीवाने उच्च शिक्षित थे। राम प्रसाद बिस्मिल प्रसिद्ध कवि होने के साथ ही भाषायी ज्ञान में भी निपुण थे। उन्हें अंग्रेजी, हिंदुस्तानी, उर्दू और बांग्ला भाषा का अच्छा ज्ञान था।

अशफाक उल्ला खान इंजीनियर थे। काकोरी की घटना को क्रांतिकारियों ने काफी चतुराई से अंजाम दिया था। इसके लिए उन्होंने अपने नाम तक बदल लिए। राम प्रसाद बिस्मिल ने अपने चार अलग-अलग नाम रखे और अशफाक उल्ला ने अपना नाम कुमार जी रख लिया।

खजाने को लूटते समय क्रांतिकारियों को ट्रेन में एक जान पहचान वाला रेलवे का भारतीय कर्मचारी मिल गया। क्रांतिकारी यदि चाहते तो सबूत मिटाने के लिए उसे मार सकते थे लेकिन उन्होंने किसी की हत्या करना उचित नहीं समझा। उस रेलवे कर्मचारी ने भी वायदा किया था कि वह किसी को कुछ नहीं बताएगा लेकिन बाद में इनाम के लालच में उसने ही पुलिस को सब कुछ बता दिया। इस तरह अपने ही देश के एक गद्दार की वजह से काकोरी की घटना में शामिल सभी जांबाज स्वतंत्रता सेनानी पकड़े गए लेकिन चंद्रशेखर आजाद जीते जी कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आए।

 

आज जब रोज़ रोज़ देश के हालात बद से बदतर होते जा रहे है ... दिल से यही दुआ निकलती है कि ... काश यह सब अमर क्रांतिकारी दोबारा लौट आयें और देश को सही रास्ते पर ले जाने के लिए इस समाज का मार्ग दर्शन करें!

इन अमर शहीदों के बलिदान दिवस पर उनको शत शत नमन!

इंकलाब ज़िंदाबाद!!


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पोस्ट शिवम मिश्रा की पोस्ट से साभार. 

08 दिसंबर 2021

दुर्घटना या साजिश : देश ने खोया बहुत कुछ है


ये चित्र अपने आपमें बहुत कुछ कहता है. भारत के पहले रक्षा प्रमुख या चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) बिपिन रावत जी का एक हैलीकॉप्टर दुर्घटना में निधन हो गया. उनके साथ उनकी धर्मपत्नी सहित कुल तेरह लोगों का इस दुर्घटना में निधन हुआ. यह चित्र रावत जी सहित उन सभी लोगों के प्रति श्रद्धा-सुमन है जो उस दुर्घटना में शहीद हो गए.


8 दिसम्बर 2021 को जनरल रावत, उनकी पत्नी और उनके निजी स्टाफ़ के अन्य सदस्यों समेत कुल 10 यात्री और चालक दल के 4 सदस्य भारतीय वायुसेना के मिल एमआई-17 हैलिकॉप्टर पर सवार थे. यह हैलीकॉप्टर इन सभी को लेकर सुलुरु वायुसेना हवाई अड्डे से वेलिंगटन स्थित रक्षा सेवा स्टाफ़ कॉलेज जा रहा था, जहाँ जनरल रावत को व्याख्यान देना था. स्थानीय समय अनुसार अपराह्न 12:10 बजे के आसपासनीलगिरि जिले के कुन्नूर तालुके के बांदीशोला ग्राम पंचायत में स्थित एक निजी चाय बागान की आवासीय कॉलोनी के समीप यह हैलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया. दुर्घटना का स्थान उस जगह से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर था जहाँ हेलिकॉप्टर को उतरना था. जनरल रावत  और उनकी पत्नी समेत अन्य 11 के निधन की पुष्टि बाद में भारतीय वायुसेना द्वारा की गयी. भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह इस दुर्घटना में एकमात्र जीवित बचने वाले व्यक्ति हैं. हैलीकॉप्टर एक सामान्य दुर्घटना का शिकार हुआ अथवा यह एक साजिश थी, इस बारे में तो बाद में ही पता चल सकेगा किन्तु इस दुर्घटना से देश को अवश्य ही अपूरणीय क्षति हुई है.


सभी दिवंगत सदस्यों को नमन. 

 

13 दिसंबर 2020

संसद हमले में शहीदों को नमन

संसद पर वर्ष 2001 में हुए आतंकी हमले को विफल करने के दौरान हुए संघर्ष में शहीद हुए सुरक्षा-कर्मियों को नमन. 



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वंदेमातरम्

29 जनवरी 2020

शहीदों का सम्मान बचाये रहना भी है श्रद्धांजलि


गणतंत्र दिवस हो या फिर स्वतंत्रता दिवस, इन राष्ट्रीय पर्वों पर दिल-दिमाग पर एक अजब तरह की खुमारी चढ़ी रहती है. ऐसे माहौल में, जबकि देह का रोम-रोम देशभक्ति के एहसास में डूबा रहता है किसी भी देशभक्त के प्रति अनादर जैसी स्थिति देख मन विचलित हो जाता है. कुछ ऐसा ही हमारे साथ भी उस समय हुआ जबकि अपनी नियमित संध्या घुमक्कड़ी में बाजार में टहलना हो रहा था. गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर शहर को तिरंगे से सजाया जा रहा था. कहीं कपड़ों के द्वारा सजावट हो रही थी तो कहीं गुब्बारों के द्वारा तो कहीं बिजली की झालरें तीन रंग बिखेरने में लगी थीं. आज़ादी के मतवालों को याद करते हुए, मन ही मन में देशभक्ति के तराने गुनगुनाते हुए जैसे ही रानी लक्ष्मीबाई चौराहे के नजदीक पहुँचना हुआ तो दिमाग एकदम से झनझना उठा.


रानी लक्ष्मीबाई की मूर्ति जी घेरे के भीतर लगी हुई थी, उसे तिरंगे कपड़ों से सजाया गया था. चारों तरफ से झालरनुमा सजावट करने के प्रयास में तिरंगे कपड़ों को रानी लक्ष्मीबाई के बांये हाथ पर आकर तमाम कपड़े बाँध दिए गए थे. अपनी कतिपय शारीरिक दिक्कतों के चलते वहाँ तक पहुँच कर उन गाँठों को खोल पाना हमारे लिए संभव नहीं हो पा रहा था. उरई नगर पालिका परिषद् की ओर से ये सजावट करवाई जा रही थी. रात के लगभग नौ बजने को आये थे. कुछ जिम्मेवार लोगों को फोन करके उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत कराते हुए कहा कि आवश्यक नहीं कि इन क्रांतिकारियों की तरह कोई क्रांति ही करो मगर कम से कम इनका सम्मान तो करते रहो. गुस्सा इसलिए भी था क्योंकि कुछ दिनों पहले ऐसे ही एक सजावट के क्रम में रानी झाँसी के घोड़े की पूँछ को किसी खूंटे की तरह इस्तेमाल कर लिया गया था, अबकी ऐसा बर्ताव रानी झाँसी के हाथ के साथ किया गया.


फिलहाल, कुछ फोन, सोशल मीडिया पर फोटो के लगाने और थोड़ी सी भागदौड़ के बाद उस विचित्र सी स्थिति को सुधार दिया गया. आज़ादी के लिए अपनी जान की परवाह न करने वाले इन शहीदों का सम्मान बचा रहे,यही इनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.



05 सितंबर 2019

छोटी सी ज़िन्दगी ने बचाईं सैकड़ों ज़िंदगियाँ


नीरजा भनोत, ये नाम संभवतः अब लोगों के लिए अनजाना नहीं होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि उनके साहसिक कार्य और बलिदान को याद रखने के लिये राम माधवानी के निर्देशन में नीरजा फ़िल्म का निर्माण किया जा चुका है. इस फ़िल्म में नीरजा का किरदार अभिनेत्री सोनम कपूर ने निभाया. इस फिल्म को 19 फ़रवरी 2016 को रिलीज किया गया था. इस फिल्म के आने के पहले कम लोग थे जो इनके बारे में जानकारी रखते थे. ऐसे लोगो संभवतः आज भी होंगे. आज जिस दिन पूरा देश शिक्षक दिवस मना रहा है उसी दिन इस साहसी महिला की पुण्यतिथि है. नीरजा ने बहुत कम उम्र में वह साहसिक कारनामा कर दिखाया था जिसके बारे में सोचा जाना भी कठिन समझ आता है. उसी कार्य के चलते भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान अशोक चक्र से सम्मानित किया था. वे इस सम्मान को प्राप्त करने वाली पहली महिला हैं. इसके साथ-साथ पाकिस्तान सरकार ने भी नीरजा को तमगा-ए-इन्सानियत प्रदान किया. भारत सरकार ने सन 2004 में नीरजा के सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीरजा का नाम हीरोइन ऑफ हाईजैक के रूप में मशहूर है. वर्ष 2005 में अमेरिका ने उन्हें जस्टिस फॉर क्राइम अवार्ड दिया. उनकी स्मृति में मुम्बई के घाटकोपर इलाके में एक चौराहे का नामकरण किया गया, जिसका उद्घाटन अमिताभ बच्चन ने किया.


जो लोग उनके बारे में नहीं जानते होंगे निश्चय ही उन्हें आश्चर्य हो रहा होगा और कौतूहल भी कि आखिर ये महिला है कौन और इसने ऐसा कौन सा साहसिक कार्य किया था. नीरजा ने आज ही के दिन पैन एम 73 विमान लगभग 400 यात्रियों को आतंकवादियों से बचाया था. अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए नीरजा 5 सितम्बर 1986 को मात्र 23 वर्ष की उम्र में शहीद हो गईं. 5 सितम्बर को पैन एम 73 विमान लगभग 400 यात्रियों को लिए पाकिस्तान के कराची एयरपोर्ट पर अपने पायलट के इंतजार में खड़ा था. तभी 4 आतंकवादियों ने पूरे विमान को गन प्वांइट पर ले लिया. उन्होंने पाकिस्तानी सरकार पर दबाव बनाया कि विमान में पायलट को जल्दी भेजा जाये. पाकिस्तानी सरकार ने ऐसा करने से मना कर दिया. तब आतंकियों ने नीरजा और उसकी सहयोगियों को सभी यात्रियों के पासपोर्ट एकत्रित करने का आदेश दिया ताकि वह किसी अमरीकी नागरिक को मारने की धमकी से पाकिस्तान पर दबाव बना सकें. नीरजा ने विमान में बैठे 5 अमेरिकी यात्रियों के पासपोर्ट छुपाकर बाकी सभी पासपोर्ट आतंकियों को सौंप दिये. फिर आतंकियों ने एक ब्रिटिश को मारने की धमकी दी किन्तु नीरजा ने उस आतंकी से सूझबूझ से बात करके ब्रिटिश नागरिक को बचा लिया. धीरे-धीरे 16 घंटे बीत गये. अचानक नीरजा को ध्यान आया कि विमान में ईंधन किसी भी समय समाप्त हो सकता है और उसके बाद अंधेरा हो जायेगा, तब यात्रियों को बचाना आसान होगा. ऐसा विचार आते ही उन्होंने अपनी सहपरिचायिकाओं को यात्रियों को खाना और साथ में विमान के आपातकालीन द्वारों के बारे में समझाने वाला कार्ड भी देने को कहा.

नीरजा ने जैसा सोचा था वैसा ही हुआ. विमान का ईंधन समाप्त होते ही चारों ओर अंधेरा छा गया. नीरजा ने विमान के सारे आपातकालीन द्वार खोल दिये. सभी यात्री भी आपातकालीन द्वार पहचान चुके थे. योजना के अनुसार सारे यात्री उन द्वारों से नीचे कूदने लगे. यह देख आतंकियों ने अंधेरे में ही फायरिंग शुरू कर दी. नीरजा के सावधानी भरे कदम से कोई यात्री मारा नहीं गया. हां, कुछ घायल अवश्य हो गये थे. इस बीच पाकिस्तानी सेना के कमांडो विमान में आ गए थे. उन्होंने तीन आतंकियों को मार गिराया. सबसे अंत में नीरजा निकलने को हुई तभी उन्हें बच्चों के रोने की आवाज सुनाई दी. वे उन बच्चों को खोज कर आपातकालीन द्वार की ओर बढीं तभी बचे हुए चौथे आतंकवादी ने गोलीबारी शुरू कर दी. नीरजा बच्चों को आपातकालीन द्वार की ओर धकेल कर उस आतंकी से भिड़ गईं. यद्यपि उस चौथे आतंकी को पाकिस्तानी कमांडों ने मार गिराया तथापि वे नीरजा को न बचा सके. अपने कर्तव्य निर्वहन में नीरजा शहीद हो गईं. 

इस साहसी महिला, नीरजा भनोत का जन्म 7 सितंबर 1963 को चंडीगढ़ पंजाब में हुआ था. इनके पिता हरीश भनोत मुंबई में पत्रकारिता क्षेत्र में थे. नीरजा की प्रारंभिक शिक्षा अपने गृहनगर चंडीगढ़ में हुई, इसके बाद की शिक्षा मुम्बई में हुई. वर्ष 1985 में उनका विवाह संपन्न हुआ किन्तु रिश्ते में स्नेह-प्रेम न होने के चलते वे विवाह के दो महीने बाद ही मुंबई आ गयीं. इसके बाद उन्होंने पैन एम एयरलाइंस में नौकरी के लिये आवेदन किया और ट्रेनिंग पश्चात् एयर होस्टेज के रूप में काम करने लगीं थीं. महज 23 वर्ष की उम्र में अपनी जान की परवाह किये बिना यात्रियों की जान बचाने जैसा अदम्य साहस का कार्य करने वाली नीरजा को उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन.



13 जून 2019

मेजर मनोज तलवार की वीरता को नमन


भारतीय सेना हमेशा अपने जांबाजों से सुशोभित रही है. ऐसे ही एक जांबाज मेजर मनोज तलवार की आज, 13 जून को पुण्यतिथि है. उनका जन्म 29 अगस्त 1969 को मुज़फ़्फ़रनगर में हुआ था. मूल रूप से पंजाब के निवासी कैप्टन पी०एल० तलवार उनके पिता हैं. कानपुर में अपने पिता की नियुक्ति के समय उनकी उम्र महज दस साल थी. उस समय वे पिता की वर्दी पहनकर जवानों की तरह जंग करने के सीन बनाते थे. वे जवानों को देखकर कहते भी थे कि मैं बड़ा होकर सेना में जाऊंगा. 


मनोज तलवार एनडीए में चयन पश्चात् वर्ष 1992 में कमीशन प्राप्त कर महार रेजीमेंट में लेफ्टीनेंट पद पर नियुक्त हुए. उनकी पहली तैनाती जम्मू-कश्मीर में हुई. बचपन से ही वीरतापूर्ण स्वभाव के चलते वे कुछ अलग करना चाहते थे. इसी कारण वे कमांडो की विशेष ट्रेनिंग लेकर असम में उल्फा उग्रवादियों का सफाया करने के लिए निकल गए. वर्ष 1999 में उन्होंने सियाचिन में नियुक्ति की मांग की. सियाचिन जाने से पहले वे घर आए जहाँ उन्होंने अपने विवाह सम्बन्धी प्रस्ताव को यह कहकर नकार दिया कि मेरा समर्पण तो देश के साथ जुड़ चुका है. अभी तो उसकी हिफाजत के लिए वचनबद्ध हूँ. पता नहीं क्या हो, मैं किसी लड़की का जीवन बर्बाद नहीं करूंगा. इसके बाद वे कारगिल चले गए.

कारगिल में घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए मेजर मनोज तलवार कारगिल के टुरटक सेंटर की शून्य से 60 डिग्री नीचे तापमान की 19 हजार फीट ऊंची खड़ी चोटी पर अपनी टुकड़ी लेकर बढ़ चले. 13 जून 1999 की शाम उन्होंने ऊंची चोटी पर तिरंगा फहरा दिया. लेकिन तभी दुश्मनों की तोप के गोले का शिकार होकर वे शहीद हो गए. मेजर मनोज तलवार को मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया. देश के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वाले 9 महार के शहीद मेजर मनोज तलवार के नाम पर सियाचिन में ग्लेशियर नंबर-3 पर सैन्य पोस्ट का नाम रखा गया है जो कि महार की वीरता का प्रतीक है.

18 फ़रवरी 2019

वीर सैनिकों के परिवार का हिस्सा बनें हम भी


पुलवामा में आतंकी हमले के बाद से पूरे देश में सेना के प्रति, सैनिकों के प्रति संवेदनात्मक माहौल बना हुआ है. युद्ध की बात भी हो रही है मगर उसके साथ-साथ सैनिकों के हितार्थ बात भी हो रही है. शहीद सैनिकों के सम्मान में नागरिकों में जागरूकता दिख रही है. देश में भले ही लोगों में आपस में कितने भी विभेद क्यों न रहे हों, लोगों में आपस में कितने भी राजनैतिक विरोधाभास भले ही दिखाई देते हों किन्तु सेना के नाम पर, सैनिकों के नाम पर एकजुटता देखने को मिलती है. इसी एकजुटता, सम्मान की भावना का ही परिणाम है कि सैनिकों की मदद के लिए सरकार द्वारा संचालित एक वेबसाइट लगातार हैंग कर जा रही है.


ये संवेदना, ये एकजुटता, सैनिकों के प्रति सम्मान भाव ऐसे समय और तेजी से उभर कर सामने आता है जबकि उनके साथ कोई न कोई हादसा हो जाता है. इस हादसे में हमारे वीर सैनिकों के शहीद होने के बाद उनके परिजनों की तरफ मीडिया का, राजनीतिज्ञों का, समाज सेवा करने वालों का, आम नागरिकों का ध्यान भी जाता है. ऐसा होना अच्छा है मगर यह अच्छा काम लगातार बना नहीं रह पाता है. इन वीर शहीदों के परिजनों के प्रति चंद दिनों तक तो लोगों की संवेदना बनी रहती है और कुछ दिनों, महीनों बाद उस शहीद के परिजन अकेले से पड़ जाते हैं. चंद दिनों के बाद वे जीवन की वास्तविक कठिनाइयों से जूझने लगते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि बहुतायत सैनिकों के परिवार मध्यम अथवा निम्न मध्यम आय वर्ग से आते हैं. किसी-किसी परिवार में वही सैनिक एकमात्र कमाऊ पूत होता है. कहीं-कहीं वही एक सैनिक समूचे परिवार का आधार होता है. किसी-किसी घर में वही एक सैनिक अपने छोटे भाई-बहिन के भविष्य का ख्याल रखने वाला होता है. किसी-किसी परिवार में कोई शहीद सैनिक नव-विवाहित होते हैं, कहीं-कहीं वे नवजात शिशु के पिता बने होते हैं. ऐसे में स्पष्ट है कि शहीद हुए उस जवान के घर पर चंद दिनों के बाद वास्तविक कठिनाइयाँ सिर उठाना शुरू कर देती हैं. वर्ष भर के पर्व-त्यौहार, आस-पड़ोस के आयोजन आदि के समय भी उन परिवारों को अपने खोये हुए सदस्य की याद बहुत गहराई से आती होगी. 

यही वह बिंदु होता है, यही वो स्थिति होती है जहाँ शहीद जवानों के परिजनों को वास्तविक रूप से हमारे साथ की आवश्यकता होती है. हम नागरिक जो किसी जवान की शहादत के समय संवेदित होकर एकजुट होना शुरू कर देते हैं उनको सतत एकजुट और संवेदित बने रहने की आवश्यकता है. हमें याद रखना चाहिए कि कोई सैनिक जो सेना में भर्ती होकर देश-सेवा कर रहा है, कोई सैनिक शहीद हो जाता है वे सभी किसी न किसी रूप में हमारे लिए ही सुखद माहौल बना रहे होते हैं. ऐसे में हमें उनका भी ख्याल रखने की आवश्यकता है. उनके परिजनों के अकेले होने की स्थिति में, जबकि सैनिक सेना में अपनी ड्यूटी निभा रहा है, या फिर कोई जवान शहीद हो गया होता है, हमें उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए उनका साथ देने की आवश्यकता होती है. इसके लिए हम पूरे देश भर में ऐसा करने के बजाय अपने-अपने जिले में, अपने-अपने क्षेत्र के सैनिकों की जानकारी कर सकते हैं और उनके परिजनों से समय-समय पर मिल सकते हैं. उनके साथ पर्व-त्यौहार को मना सकते हैं. उनकी किसी भी तरह की समस्या का समाधान बन सकते हैं. शहीद सैनिकों के बच्चों की शिक्षा से सम्बंधित, उनके माता-पिता के स्वास्थ्य, चिकित्सा से सम्बंधित समस्याओं का निराकरण कर सकते हैं. उनके अन्य परिजनों की परेशानियों का समाधान भी कर सकते हैं. हमारे एक कदम इस तरह से उठाने पर उन परिजनों को भी गर्व की अनुभूति होगी और वे अपने आपको कभी भी अकेला महसूस नहीं करेंगे. ये आवश्यक नहीं कि हर मदद आर्थिक रूप से हो, यह भी जरूरी नहीं कि हर शहादत के बाद ही संवेदित हुआ जाये, हम सभी ऐसा कभी भी, कहीं भी कर सकते हैं और अपने वीर सैनिकों के परिजनों का हिस्सा बन सकते हैं.

14 फ़रवरी 2019

दुखद क्षण में संयम और सरकारी कार्यवाही की प्रतीक्षा


फिर एक आतंकी आत्मघाती हमला. इसे भले ही आतंकियों की कायराना हरकत कहा जाये, घटना की निंदा की जाए मगर सत्य यही है कि सरकार को आतंकियों के ठिकानों पर ताबड़तोड़ हमले करने ही होंगे. ये ठिकाने देश के बाहर के हो सकते हैं, देश के भीतर के भी हो सकते हैं. यदि ऐसे आतंकी हमलों का विश्लेषण किया जाये तो साफ़-साफ़ दिखाई देता है कि कहीं न कहीं इन आतंकियों को देश के भीतर से भी मदद मिलती है. ये जरूरी नहीं कि देश के भीतर से मिलने वाली मदद इन आतंकियों को किसी आर्थिक रूप में हो, किसी तरह से अस्त्र-शस्त्र के रूप में हो, किसी तरह के संरक्षण के रूप में हो. इनकी मदद के कई और रूप भी हो सकते हैं. आतंकवाद विरोधी गतिविधियों पर, सेना, सैनिकों के खिलाफ कदम उठाने वालों पर कार्यवाही करने सम्बन्धी कदमों पर देश में जिस तरह से राजनैतिक बयानबाजी होने लगती है, उसे देखकर भी इन आतंकियों के हौसले बढ़ जाते होंगे. इस तरह के राजनैतिक बयानबाजी से देश में जनसाधारण के बीच भी एक तरह से कई-कई गुट बन जाया करते हैं. इन्हीं गुटों का फायदा उठाकर ये आतंकी तत्त्व समाज के बीच ही आम नागरिक बनकर रहने लगते हैं. कहीं न कहीं ये नागरिक गुट ही अनजाने ही इन आतंकियों के मददगार साबित होने लगते हैं.


पुलवामा में हुए आज के आतंकी हमले के बाद ही राजनैतिक बयानबाजी आरम्भ हो गई है. ऐसे मौके पर जबकि सम्पूर्ण देश सैनिकों की शहादत पर दुःख व्यक्त कर रहा है तब राजनैतिक बयानबाजी आपसी कटुता दर्शाने के लिए नहीं होनी चाहिए. इस तरह से शोक के, दुःख के संवेदनशील अवसर पर न केवल राजनैतिक दलों को वरन मीडिया, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक चैनल्स को भी संयम बरतने की आवश्यकता होनी चाहिए. जहाँ एक तरफ राजनैतिक बयानबाजी से देश-विरोधी ताकतें अंदाज लगा लेती हैं कि कौन देश के साथ है और कौन देश के विरोध में. ऐसे बयानों से उनको आकलन करने में आसानी होती है कि सरकार किस स्तर तक की कार्यवाही कर सकती है. ऐसे ही बयानों के कारण आतंकियों के सरगना अपने कदमों के सम्बन्ध में अति-आत्मविश्वास से भर उठते हैं. और ये सब बयानबाजियाँ आतंकियों के पास तक पहुँचाने का काम बड़ी आसानी से इलेक्ट्रॉनिक चैनल्स द्वारा हो जाता है.

ऐसा नहीं है कि सरकार की नाकामी की चर्चा नहीं होनी चाहिए. ऐसा भी नहीं कि देश के ख़ुफ़िया तंत्र की असफलता की चर्चा न होनी चाहिए मगर इनका समय कम से कम वह तो नहीं होता है जबकि समूचा देश सैनिकों की शहादत पर स्तब्ध है. यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि क्या वाकई सरकार या ख़ुफ़िया तंत्र पूरी तरह से असफल ही हुआ है? यहाँ जिस तरह से नोटबंदी को आतंकी हमले से जोड़कर इस बार अनावश्यक बयान दिए जाने का काम होने लगा है क्या वे बताएँगे कि नोटबंदी के बाद किस तरह की आतंकी घटनाएँ सामने आई हैं? कितनी आतंकी घटनाएँ सामने आई हैं? असल में देश के अन्दर इस तरह का माहौल बन चुका है जहाँ सिर्फ दो धड़े ही दिखाई देते हैं. एक धड़े में सरकार या कहें कि भाजपा के समर्थक हैं दूसरे धड़े में वे लोग हैं जो किसी न किसी रूप में भाजपा सरकार को गिराना चाहते हैं, किसी भी घटना का दोष वर्तमान केंद्र सरकार पर थोपना चाहते हैं.

इस आतंकी हमले के बाद जोर-शोर से आतंकी ठिकानों को नष्ट करने की बात होने लगी है. यहाँ ध्यान रखने की आवश्यकता है कि इस देश में वही लोग भी हैं जो सरकार की सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत माँगते हैं. इसी देश में वे लोग भी हैं जो सेना को गाली देते हैं. इस देश में वे लोग भी हैं जो किसी सैनिक की शहादत पर भी अनर्गल बोल बोलने से नहीं चूकते हैं. इस देश में वे लोग भी साँस ले रहे हैं जो भारत के टुकड़े होने के नारे लगाते हैं. इसी देश में वे लोग भी हैं जो घर-घर से अफज़ल निकलने की बात करते हैं. वे भी इसी देश के नागरिक हैं जो हमारे दुश्मन पड़ोसी देश में जाकर देश की सरकार गिराए जाने की बात करते हैं. इसी देश में ऐसे लोग भी हैं जिन्हें हमारे सैनिकों के हत्यारे प्रमुख से गले मिलने में शर्म महसूस नहीं होती है. ऐसे में सोचने की आवश्यकता है कि ये लोग सरकार की आतंकी विरोधी कार्यवाही का किस स्तर तक समर्थन कर सकेंगे? ये भी सोचा-विचार जाना चाहिए कि सरकार की आतंकी कार्यवाही के शुरू होने पर ये लोग देश के भीतर किसी तरह की अशांति नहीं फैलायेंगे? इस पर भी विचार करने की जरूरत है कि देश की सेना बाहरी ताकतों से लड़ने का, उन्हें मिटाने का काम करने लगेगी ऐसे में देश की अंदरूनी ताकतों को हवा देने वाले देश-विरोधी कदम नहीं उठाएंगे? 

सैनिकों की शहादत पर किसी भी सच्चे देशभक्त का नाराज होना, आक्रोशित होना स्वाभाविक है. ऐसे मौके पर वह सरकार से कठोर से कठोर कार्यवाही किये जाने की माँग करता है, करनी भी चाहिए. यही वह क्षण होता है जहाँ शांत भाव से सरकार के कदम की प्रतीक्षा करनी चाहिए. यह शांति इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि वर्तमान में वह केंद्र सरकार है जिसके शासनकाल में आतंकी हमलों में जबरदस्त गिरावट आई है. यह भी एक तरह की खीझ है जो देश की बाहरी और अंदरूनी ताकतों में उत्पन्न हो चुकी है. देशवासियों को, राजनैतिक दलों को, मीडिया को ऐसे समय में संयम से काम लेते हुए सरकार के कदम की प्रतीक्षा करनी चाहिए. बाकी सरकार पर चिल्लाने के लिए आने वाला समय है ही फिर.


31 जनवरी 2019

प्रथम परमवीर चक्र से सम्मानित वीर को सादर नमन


आज, 31 जनवरी पहले परमवीर चक्र से सम्मानित होने वाले मेजर सोमनाथ शर्मा का जन्मदिन है. वे भारतीय सेना की कुमाऊँ रेजिमेंट की चौथी बटालियन की डेल्टा कंपनी के कमांडर थे. सन 1947 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उन्होंने अपनी वीरता से शत्रु के छक्के छुड़ा दिये थे. इसके लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरान्त परमवीर चक्र से सम्मानित किया था. उनका जन्म 31 जनवरी 1923 को जम्मू में हुआ था. इनके पिता मेजर अमरनाथ शर्मा भी सेना में डॉक्टर थे. इसके साथ-साथ उनके मामा लैफ्टिनेंट किशनदत्त वासुदेव 4/19 हैदराबादी बटालियन में थे तथा 1942 में मलाया में जापानियों से लड़ते शहीद हुए थे. अपने पिता और मामा के प्रभाववश वे भी सेना में भरती हुए. 


मेजर सोमनाथ ने अपना सैनिक जीवन 22 फरवरी 1942 से शुरू किया. तब उन्हें चौथी कुमायूं रेजिमेंट में बतौर कमीशंड ऑफिसर प्रवेश मिला. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्हें मलाया के पास के रण में भेजा गया जहाँ इन्होंने अपने पराक्रम के तेवर दिखाए. इसके चलते वे एक विशिष्ट सैनिक के रूप में पहचाने जाने लगे. सन 1947 के भारत पाकिस्तान युद्ध के समय मेजर सोमनाथ शर्मा की टुकड़ी को कश्मीर घाटी के बदगाम मोर्चे पर जाने का हुकुम मिला. 3 नवम्बर को मेजर सोमनाथ बदगाम जा पहुँचे और उत्तरी दिशा में उन्होंने अपनी टुकड़ी तैनात कर दी. तभी दुश्मन की सेना ने उनकी टुकड़ी को तीन तरफ से घेरकर हमला किया. भारी गोलाबारी में उनके सैनिक हताहत होने लगे. अपनी दक्षता का परिचय देते हुए मेजर सोमनाथ ने अपने सैनिकों के साथ गोलियां बरसाते हुए दुश्मन को बढ़ने से रोके रखा.

इस दौरान बहुत से भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हो चुके थे. सैनिकों की कमी को मेजर महसूस कर रहे थे. ऐसे समय में एक मोर्टार का निशाना ठीक वहीं पर लगा जहाँ वे खुद मौजूद थे. दुश्मन सेना की तरफ से किये गए इस विस्फोट में मेजर सोमनाथ शहीद हो गये. उन्होंने प्राण त्यागने से ठीक पहले अपने वीर सैनिकों को प्रोत्साहित करते हुए कहा था कि, दुश्मन हमसे केवल पचास गज की दूरी पर है. हमारी गिनती बहुत कम रह गई है. हम भयंकर गोली बारी का सामना कर रहे हैं फिर भी मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा और अपनी आखिरी गोली और आखिरी सैनिक तक डटा रहूँगा.

उनकी वीरता और भारतीय सैनिकों के जोश के चलते श्रीनगर विमानक्षेत्र से पाकिस्तानी घुसपैठियों को बेदख़ल करते हुए मेजर 3 नवम्बर 1947 को वीरगति को प्राप्त हुए. इसके लिए उन्हें पहले परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. इसे संयोग ही कहा जायेगा कि परमवीर चक्र का डिजाइन मेजर शर्मा के भाई की पत्नी सावित्री बाई खानोलकर ने तैयार किया था.

आज उनकी जन्मतिथि पर उन्हें श्रद्धा-सुमन अर्पित हैं. 


07 दिसंबर 2018

सैनिकों के सम्मान में एक कदम


प्रतिवर्ष 7 दिसंबर को देश सशस्त्र सेना झंडा दिवस (Armed Forces Flag Day) मनाता है. इसके मनाये जाने की शुरुआत 7 दिसंबर 1949 से हुई थी. तत्कालीन केंद्रीय मंत्रिमंडल की रक्षा समिति ने युद्ध दिग्गजों और उनके परिजनों के कल्याण के लिए सात दिसंबर को सशस्त्र सेना झंडा दिवस मनाने का फैसला लिया था. उसी के बाद से प्रतिवर्ष इस दिवस को सम्पूर्ण देश सम्मान सहित मनाता है. इस दिन देश के नागरिकों से सैन्यकर्मियों के लिए धन संग्रह किया जाता है. इस धन का उपयोग सैनिकों के परिवारों की भलाई के लिए किया जाता है. धन एकत्र करने के लिए इस दिन सशस्त्र सेना के प्रतीक चिन्ह झंडे को नागरिकों को प्रदान किया जाता है. इस झंडे में तीनों सेनाओं को प्रदर्शित करते हुए तीन रंग (लाल, गहरा नीला और हल्का नीला) होते हैं. यह एक स्टिकर के रूप में होता है. जिसे नागरिक एक राशि प्रदान करते हुए लेते हैं और शहीदों के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए इसे लगाते हैं.


सशस्त्र सेना झंडा दिवस पर धन संग्रह के तीन मुख्य उद्देश्य हैं. पहला युद्ध के समय हुई जनहानि में सहयोग, दूसरा सेना में कार्यरत कर्मियों, उनके परिवार के कल्याण और सहयोग तथा तीसरा सेवानिवृत्त कर्मियों और उनके परिवार का कल्याण. इस दिन थल सेना, वायु सेना और नौसेना तरह-तरह के कार्यक्रम आयोजित करती है. कार्यक्रम से संग्रह किये गए धन को आर्म्ड फोर्सेज फ्लैग डे फंड में डाल दिया जाता है. सशस्त्र झंडा दिवस पर जांबाज सैनिकों व उनके परिजनों के प्रति नागरिक एकजुटता प्रदर्शित करने का दिन है, अत: प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वे इस दिन सैनिकों के सम्मान तथा उनके कल्याण में अपना योगदान दें.


04 दिसंबर 2018

भारतीय नौसेना दिवस पर शुभकामनायें


हमारा देश प्रतिवर्ष 4 दिसम्बर को भारतीय नौसेना दिवस (Indian Navy Day) मनाता है. इस दिन को मनाये जाने का अत्यंत महत्त्वपूर्ण कारण है. आज ही के दिन भारतीय जल सेना ने ऑपरेशन ट्राइडेंट के अंतर्गत कराची नौसैनिक अड्डे पर हमला बोला था. तब से यह दिन उस युद्ध में भारतीय नौसेना की पाकिस्तानी नौसेना पर जीत की याद में मनाया जाता है. दरअसल सन 1971 के युद्ध के दौरान 3 दिसंबर को भारतीय सेना पूर्वी पाकिस्तान, जो अब बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है, में पाकिस्तानी सेना के विरुद्ध युद्ध छेड़ चुकी थी. इस यु्द्ध में पहली बार जहाज पर मार करने वाली एंटी शिप मिसाइल से हमला किया गया. इसमें भारतीय नौसेना का पोत आई०एन०एस० खुकरी डूब गया. इस जहाज में 18 अधिकारियों सहित लगभग 176 नौसैनिक सवार थे. नौसेना ने पाकिस्तान के तीन जहाज नष्ट कर दिए थे। इसका बदला लेने के लिए नौसेना प्रमुख एडमिरल एस०एम० नंदा के नेतृत्व में ऑपरेशन ट्राइडेंट चलाया गया. इस अभियान की जिम्मेदारी 25वीं स्क्वॉर्डन कमांडर बबरू भान यादव को दी गई. 


4 दिसंबर 1971 को नौसेना ने कराची स्थित पाकिस्तान नौसेना हेडक्वार्टर पर पहला हमला किया. ऑपरेशन ट्राइडेंट के तहत हमला निपट, निर्घट और वीर मिसाइल नावों ने किया. सभी नावें चार-चार मिसाइलों से युक्त थीं. बबरू भान यादव खुद निपट नाव पर उपस्थित थे. इस हमले में पाकिस्तानी सेना के अनेक जहाजों को नेस्‍तनाबूद कर दिया गया. इसके साथ-साथ पी०एन०एस० खैबर, पी०एन०एस० चैलेंजर और पी०एन०एस० मुहाफिज को मिसाइलों के हमले में बर्बाद कर डुबो दिया गया. पाकिस्तान के ऑयल टैंकर भी तबाह किये गए. सूत्र बताते हैं कि कराची तेल डिपो में लगी आग की लपटों को 60 किलोमीटर की दूरी से भी देखा जा सकता था. इस आग को अगले सात दिनों तक नहीं बुझाया जा सका. ऑपरेशन खत्म होते ही भारतीय नौसैनिक अधिकारी विजय जेरथ ने संदेश भेजा फॉर पीजन्स हैप्पी इन द नेस्ट. रीज्वाइनिंग. इस पर उनको जवाब मिला एफ 15 से विनाश के लिए; इससे अच्छी दिवाली हमने आज तक नहीं देखी. 

सन 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में ऑपरेशन ट्राइडेंट के अंतर्गत जीत हासिल करने वाली भारतीय नौसेना की शक्ति और बहादुरी को याद करते हुए नौसेना दिवस मनाया जाता है. सभी वीर सैनिकों को शुभकामनायें, शहीदों को नमन.


13 सितंबर 2018

अमर शहीद जतीन्द्रनाथ की पुण्यतिथि


आज, 13 सितम्बर अमर शहीद जतीन्द्रनाथ दास की पुण्यतिथि है. उनका जन्म 27 अक्टूबर, 1904 को कोलकाता में एक बंगाली परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम बंकिम बिहारी दास और माता का नाम सुहासिनी देवी था. जब उनकी उम्र नौ वर्ष की थी तभी उनकी माता का निधन हो गया. सन 1920 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और वे महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन में सक्रिय रूप से जुड़ गए. इस आन्दोलन में वे गिरफ़्तार किये गए और उन्हें छह माह की सज़ा सुनाई गई. इसके बाद जब चौरी-चौरा की घटना के बाद गाँधीजी ने आन्दोलन वापस लिया तो निराश जतीन्द्रनाथ आगे की पढ़ाई के लिए कॉलेज में भर्ती हो गए. यहाँ उनकी मुलाकात प्रसिद्ध क्रान्तिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल से हुई और वे क्रान्तिकारी संस्था हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य बन गये.


सन 1925 में जतीन्द्रनाथ को दक्षिणेश्वर बम कांड और काकोरी कांड के आरोप में गिरफ़्तार कर नज़रबन्द कर दिया गया. जेल में दुर्व्यवहार के विरोध में उन्होंने 21 दिन तक भूख हड़ताल की तो उनके बिगड़ते स्वास्थ्य को देखकर सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया. जेल से बाहर आकर उन्होंने अपने अध्ययन और राजनीति को जारी रखा. बाद में कांग्रेस सेवादल में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के सहायक बनने के दौरान उनकी भेंट सरदार भगत सिंह से हुई. 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जो बम केन्द्रीय असेम्बली में फेंके वे इन्हीं के द्वारा बनाये गए थे. 14 जून 1929 को जतीन्द्र गिरफ़्तार कर लिये गए और उन पर लाहौर षड़यंत्र केस में मुकदमा चला. जेल में क्रान्तिकारियों के साथ राजबन्दियों के समान व्यवहार न होने के कारण क्रान्तिकारियों ने 13 जुलाई 1929 से अनशन शुरू कर दिया. जतीन्द्रनाथ भी इसमें शामिल हो गए. जेल अधिकारियों द्वारा इनका अनशन तुड़वाने के लिए जबरदस्ती इनकी नाक में नली डालकर पेट में दूध डालना शुरू किया. इसी जबरदस्ती में नली उनके फेफड़ों में चली गई. उनकी घुटती सांस की परवाह किए बिना एक डॉक्टर ने दूध उनके फेफड़ों में भर दिया. इससे उन्हें निमोनिया हो गया.

इस अनशन के 63वें दिन 13 सितम्बर 1929 को जतीन्द्रनाथ दास का देहान्त हो गया. कोलकाता में उनके अंतिम संस्कार में लाखों लोग उपस्थित हुए. 

उनको हार्दिक नमन.

15 अगस्त 2018

सच्ची सलामी के इंतजार में है तिरंगा


स्वतंत्र भारत की पहली आधी रात को जब लाल किले से सबका प्रिय तिरंगा फहराया था, तब हवा हमारी थी, पानी हमारा था, जमीं हमारी थी, आसमान हमारा था। सब कुछ हमारा था पर वहाँ उपस्थित जन-जन की आँखों में नमी थी। पहली बार स्वतन्त्र हवा में लहराते हुए अपने प्यारे तिरंगे को सलामी देने के लिए उठे हाथों में एक कम्पन अवश्य था मगर उन सभी की आत्मा में दृढ़ता थी। स्वभाव में अभिमान था। स्वर में प्रसन्नता थी। सिर गर्व से ऊँचा उठा था। समय बदलता गया, परिदृश्य बदलते रहे किन्तु तिरंगा हमेशा फहरता रहा, हर वर्ष फहराया जाता रहा। सलामी हर बार दी जाती रही किन्तु अहम् हर बार मरता रहा। गर्व से भरा सिर हर बार झुकता रहा। आत्मा की दृढ़ता हर बार कम होती रही। यह एहसास साल दर साल कम होता रहा। सलामी को उठते हाथों का कम्पन हर बार बढ़ता रहा। आँखों की नमी आँसुओं में बदल गई। पहली बार जब हाथ काँपे थे तो वे हमारे स्वाभिमान का परिचायक बने थे। अब यही कम्पन हमारे नैतिक चरित्र, चारित्रिक पतन को दिखा रहा है। पहली बार आँखों से बहते आँसू खुशी के थे मगर अब लाचारी, बेबसी, हताशा, भय, आतंक, अविश्वास आदि के हैं। सामने लहराता हमारा प्यारा तिरंगा हमसे हमारी स्वतन्त्रता का अर्थ पूछता है। हमसे हमारे शहीदों के सपनों का मर्म पूछता है।


शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां होगा कुछ ऐसा सोचकर ही हमारे वीर-बाँकुरों ने आजादी के लिए हँसते-हँसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिये थे। इस महान सोच के बाद ही हमें प्राप्त हुई खुलकर हँसने की स्वतन्त्रता, खुलकर घूमने की आजादी, अपना स्वरूप तय करने की आजादी। हम आजाद तो हुए किन्तु विचारों की खोखली दुनिया को लेकर। राष्ट्रवाद जैसी अवधारणा अब हमें प्रभावित नहीं करती वरन् इसमें भी हमें साम्प्रदायिकता का बोध होने लगा है। ये सब एकाएक नहीं हो गया है, दरअसल स्वतन्त्र भारत के वक्ष पर एक ऐसी पीढ़ी ने जन्म ले लिया, जिसके लिए गुलामी एक कथा की भाँति है, शहीदों की शहादत उसके लिए गल्प की तरह है, आजादी के मतवालों की कुर्बानियाँ महज एक इत्तेफाक। ऐसी पीढ़ी के लिए आजादी का अर्थ स्वच्छन्दता, उच्शृंखलता आदि बना हुआ है; आजादी के गीत, राष्ट्रगीत, वन्देमातरम् इनके लिए आउटडेटेड हो गये हैं। इक्कीसवीं सदी में खड़े हमारे आजाद देश के पास आज भी स्थिरता का अभाव सा दिखाई देता है। कभी हम अपने पड़ोसी देशों की कृत्सित नीतियों का शिकार बनते हैं, कभी हमें सीमापार से हो रहे आतंकी हमलों से बचना पड़ता है तो कभी यह आग हमारे ही घरों में लगी दिखाई देती है। हम मंगल ग्रह पर पानी और जीवन की आशा में करोड़ों रुपये का अभियान चलाकर वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के सामने सीना ठोंकते हैं तो शिक्षा के नाम पर वैश्विक जगत में अभी भी बहुत पीछे होने के कारण शर्मिन्दा होते हैं। 

अपनी संस्कृति के साथ विश्व की तमाम संस्कृतियों का समावेश कर हम सांस्कृतिक प्रचारक-विचारक के रूप में विख्यात होते हैं तो अपने देश की महिलाओं की गरिमा, उनकी जान की सुरक्षा न कर पाने के चलते शर्म से सिर झुका बैठते हैं। हमें अभी भी बालिका शिक्षा के लिए लोगों को जागरूक करना पड़ रहा है। अभी भी बेटियों को बचाने की गुहार लगानी पड़ रही है उसके बाद भी बालिका संरक्षण गृहों से यातनाओं की, दुष्कर्म की खबरें आ रही हैं। महिला सशक्तिकरण के आँकड़े दिखाए जा रहे हैं किन्तु एक लड़ाई तीन तलाक और हलाला के लिए भी लड़ी जा रही है। हमने औद्योगीकरण, उपभोक्तावादी संस्कृति के नाम पर हाथों में मोबाइल तो थमा दिये किन्तु शिक्षा के लिए हर हाथ को पुस्तकें, पेन्सिलें नहीं पकड़ा पाये। बच्चे अभी भी किताबों की जगह कूड़ा बीनने वाले झोले पकड़े दिखाई पड़ते हैं। मजदूरी करते दिखाई पड़ते हैं। हाथों में औजार थामे नजर आते । अभिजात्य वर्ग एवं पश्चिमीकरण की नकल में हमने हर हाथ को सस्ते दरों पर बीयर तो उपलब्ध करवा दी किन्तु बहुतायत में अपनी जनता को पीने का स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं करवा पाये।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या फिर कोई हल नहीं इस समस्या का? है, मगर उसके लिए सत्ताधारियों के इंतजार के बजाय नागरिकों को ही आगे आना होगा। आपसी विभेद को समाप्त करना होगा। वैमनष्यता के चलते व्यक्ति अपना ही विकास नहीं कर सकता है तो वह समाज का, अपने परिवार का विकास कैसे करेगा? बच्चे हमारे भविष्य का आधार हैं, यदि वे ही अशिक्षित, भूखे, अस्वस्थ रहेंगे तो विकास की अवधारणा बेमानी है। याद रखना होगा कि जिन्हें सत्ता चाहिए वो हमारा ही उपयोग करके सत्ता प्राप्त कर लेते हैं तो क्या हम स्वयं के लिए अपना उपयोग कर अपना और अपने राष्ट्र का विकास नहीं कर सकते हैं? नागरिक किसी भी धर्म के हों, किसी भी जाति के हों, किसी भी क्षेत्र के हों किन्तु देश हमारा है और हम देश के, इस सोच के द्वारा हम विकास की, एकता की राह पर आगे बढ़ सकते हैं। यदि ऐसा हम कर पाते हैं तो हम अपने प्यारे तिरंगे को सच्ची सलामी दे सकेंगे और एक बार फिर हमारा सिर उसके सामने गर्व से भरा होगा, दृढ़ता से हमारे हाथ उठे होंगे, जयहिन्द, वन्देमातरम् का घोष हमारे कंठों से निकलकर समूचे आसमान में गूँज उठेगा।

09 अगस्त 2018

काकोरी कांड की स्मृति

आज, अगस्त काकोरी काण्ड दिवस के रूप में याद किया जाता है. भारतीय स्वाधीनता संग्राम में काकोरी कांड ऐसी घटना है जिसने अंग्रेजी शासन को हिला कर रख दिया था. यह घटना भारत के वीर क्रांतिकारियों द्वारा अंग्रेजी सरकार के खिलाफ युद्ध जैसा विगुल था जिसे खिसियाये अंग्रेजों ने काकोरी डकैती का नाम दे दिया था. आज़ादी के मस्तानों - आजादबिस्मिलअशफाकराजेंद्र लाहिड़ीरोशन सिंह सहित दस क्रांतिकारियों द्वारा 9 अगस्त 1925 को लखनऊ से कुछ दूर स्थित काकोरी में ट्रेन से जा रहे अंग्रेजी खजाने को लूट लिया. क्रांतिकारी इस धन का उपयोग हथियार खरीदने तथा आजादी के आंदोलन के लिए करना चाहते थे. काकोरी कांड से अंग्रेजी सरकार बुरी तरह तिलमिला उठी और उसने क्रांतिकारियों के खिलाफ अपनी बर्बरता को और तेज कर दिया. 


क्रांतिकारियों के बीच रह रहे कुछ गद्दारों के चलते चंद्रशेखर आजाद को छोड़कर इस घटना में शामिल शेष सभी क्रांतिकारी पकडे़ गए. रामप्रसाद बिस्मिलअशफाक उल्लाराजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई. अंग्रेजों में क्रांतिकारियों को फाँसी की सजा सुना देने के बाद भी इतना खौफ था कि राजेंद्र लाहिड़ी की फांसी की सजा 19 दिसंबर 1927 को निर्धारित की गई थी लेकिन उनको इससे दो दिन पहले 17 दिसंबर को ही गोंडा जेल में फांसी दे दी गई. 19 दिसंबर 1927 को रामप्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल में तथा अशफाक उल्ला को फैजाबाद जेल में फांसी दी गई. आज़ादी के परवाने वीर क्रांतिकारियों के चेहरे पर किसी तरह का डरभय नहीं था. वे हंसते-हंसतेभारत माता की जय-जयकार करते हुए फांसी के फंदे को चूम गए. अंग्रेजी सरकार ने क्रांतिकारियों को फाँसी की सजा सुनाकर भले ही उनको मौत की नींद सुला दिया था किन्तु उनके इस निर्णय की बहुत निंदा हुई. इसके पीछे कारण यह था कि डकैती जैसे मामले में फांसी की सजा सुनाना अपने आप में एक अनोखी घटना थी. 

सभी जांबाज क्रांतिकारियों को सादर नमन

23 मार्च 2018

परिचय के मोहताज न रहें हमारे वीर शहीद


देश की आज़ादी के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले असंख्य वीर क्रांतिकारियों में अनेकानेक युवा भी रहे. उन्हीं युवाओं में से तीन युवाओं ने, जिनकी उम्र २३-२४ वर्ष रही थी, आज ही के दिन आज़ादी के हवनकुंड में अपने प्राणों की आहुति दी थी. भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के क्रांतिकारी कदम की देशवासियों को जानकारी होगी, ऐसी अपेक्षा की जा सकती है. क्रांति की अलख में युवा शक्ति के द्योतक बन चुके इन तीन नामों के सन्दर्भ में आज दशकों बाद भी एक सामान्य जानकारी ही सबके बीच है. असेम्बली में बम फेंकना, गिरफ़्तारी के भय से मुक्त रहते हुए वहाँ गिरफ़्तारी देना, मुक़दमे में भारत माता की आज़ादी के लिए अपने आपको कर्तव्यनिष्ठ दिखाना, इनकी फांसी की सजा रुकवाने के सम्बन्ध में महात्मा गाँधी का इंकार करना, सजा के पूर्व भगत सिंह का लेनिन की जीवनी पढ़ना, शहीद होने के पूर्व अपने परिजनों, मित्रों को पत्रों द्वारा देश की आज़ादी के लिए संघर्षरत रहने की बात समझाना, अंग्रेजी सरकार द्वारा नियत समय से पहले ही इनको फांसी की सजा दे देना आदि-आदि जानकारियाँ ही हम सबके बीच बराबर तैरती रहती हैं. इन तमाम सारी बातों के बीच ये तीनों युवा या कहें कि विशेष रूप से भगत सिंह को बम, बन्दूक, रिवाल्वर का पर्याय बना दिया गया है. उनके विचारों को विशेष-विचारधारा की चादर ओढ़ाकर भगत सिंह को कभी कामरेड, कभी मार्क्सवादी, कभी समाजवादी बनाया जाने लगता है. उनके आलेख विशेष का सन्दर्भ लेते हुए उन्हें ईश्वरीय-सत्ता विरोधी, नास्तिक बताये जाने की कवायद चलती रहती है. ऐसे लोगों के लिए आज का दिन सर्वाधिक उपयुक्त होता है, जबकि वे इन तीनों क्रांतिकारियों को याद करते हुए अपनी विचारधारा से इतर लोगों को कोसने का काम करने लग जाते हैं.


कई बार मन में विचार आता है कि आखिर ऐसा क्या चला होगा उस समय के युवाओं के मन में जो वे सब अपने प्राणों की परवाह न करते हुए तत्कालीन सरकार के खिलाफ खड़े हो गए थे? ऐसे ही युवाओं में ये तीनों युवा भी शामिल हैं. क्या इनके मन में कभी भी एक पल को अपनी मौत का, अंग्रेजी शासन के अत्याचारों का खौफ नहीं जागा होगा? ऐसा विचार इसलिए भी आता है कि आखिर २३-२४ वर्ष की उम्र होती ही कितनी है. आज इतने वर्ष का युवा अपने कैरियर के बारे में सोच रहा होता है. उसे न तो अपने परिवार की समस्याओं को दूर करने की फ़िक्र होती है और न ही उसे समाज की समस्याओं की तरफ ध्यान देने की फुर्सत होती है. क्या उस समय उन युवाओं के मन में या इन तीनों युवाओं के मन में अपने कैरियर, अपने परिवार, अपने भविष्य के प्रति कोई मोह नहीं जागा होगा? ऐसी कौन सी शक्ति इनके अन्दर उत्पन्न हो गई होगी जिससे ये शासन के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंकने की हिम्मत जुटा सके थे? ऐसी कौन सी शिक्षा इनको मिली थी जो महज दो दशक के जीवन में वैचारिकी का उत्कृष्ट उदाहरण सम्पूर्ण देश के लिए ये लोग छोड़ गए? युवा तो आज भी हैं. शिक्षा-व्यवस्था तो आज तत्कालीन समाज से बेहतर है. अव्यवस्थाएँ तो आज भी बनी हुई हैं. प्रशासनिक निरंकुशता, सरकारी अव्यवस्था तो आज भी दिखाई देती है. फिर आज का युवा इनके खिलाफ विद्रोह का बिगुल क्यों नहीं फूंक पाती है? आज का युवा अपने कैरियर का मोह त्याग कर क्यों नहीं सरकार के खिलाफ आन्दोलन खड़ा करता है?

जब-जब भी इन सवालों के जवाब भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु आदि के इंकलाब के सापेक्ष खोजने का काम किया जाता है तो लगता है कि इनकी वैचारिकी के प्रचार के स्थान पर इनके उस बम को ज्यादा प्रचारित किया गया है जिसे फेंकने के समय उछाले गए पर्चों का पहला ही वाक्य था कि बहरों को सुनाने के लिये विस्फोट के बहुत ऊँचे शब्द की आवश्यकता होती है. आज भी भगत सिंह और उनके साथियों को आज़ादी के संघर्ष में हिंसात्मक गतिविधियों का सहारा लेने वाला बताया जाता है. उनकी क्रांति को सीधे-सीधे बन्दूक से, हत्या से, धमाके से जोड़ दिया गया है. उनके इंकलाब जिंदाबाद को भी विशुद्ध रूप से अराजकता का द्योतक बताया जाने लगा है. किसी समय यह उद्घोष अंग्रेजी शासन के विरुद्ध लोगों को एकजुट करने का प्रतीक माना जाता था तो आज इसके द्वारा हिंसात्मक गतिविधि का सञ्चालन करना माना जाने लगा है. ऐसे में जबकि हमारे ही देश में हमारे देश के इन क्रांतिकारी युवाओं के बारे में संकुचित मानसिकता के साथ जानकारी दी जा रही हो, भावी पीढ़ी को इनके बारे में कम से कम या कहें कि अत्यल्प रूप से पढ़ाया जा रहा हो तो कैसे अपेक्षा की जाये कि आज का युवा किसी अव्यवस्था के खिलाफ, किसी अराजकता के विरुद्ध उठ खड़ा होगा. देखा जाये तो आज भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, आतंकवाद, नक्सलवाद, सामाजिक अपराध, राजनैतिक अपराध, लूटमार, हत्याएँ, हिंसा, जातिगत विभेग, लिंगभेद आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जो भले ही देशवासियों को गुलाम न बनाये हों मगर गुलामों जैसा व्यवहार करती दिखती हैं. इसके बाद भी आज का समाज, विशेष रूप से युवा इनके प्रति अनभिज्ञ बना हुआ बस अपने आपमें ही खोया हुआ है. उसके लिए उसके आसपास की दुनिया ही उसका अपना देश है. उसके लिए अपना कैरियर ही उसकी आज़ादी है. उसके लिए स्वार्थपूर्ति के लिए उठाया गया कोई भी कदम राष्ट्रहित में उठाया गया कदम है.

ऐसी विद्रूप स्थितियों में हम शहीदी दिवस मनाने की औपचारिकता का निर्वहन कर लेते हैं. भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव की प्रतिमाओं, चित्रों पर माल्यार्पण कर लेते हैं. उनके बारे में चलन में बनी सामान्य सी जानकारी को चंद लोगों के बीच गोष्ठी रूप में बार-बार प्रसारित करते रहते हैं. भगत सिंह को केंद्र में रखकर, उनको कामरेड, मार्क्सवादी, समाजवादी बनाकर दक्षिणपंथी विचारधारा वालों को गरियाने का काम कर लेते हैं. भगवा और लाल रंग का विभेद कर देश के लिए प्राण न्योछावर कर देने वाले युवाओं का भी बंटवारा कर लेते हैं. इन सबके बीच कभी किसी ने विचार करने का प्रयास किया है कि उस दिन असेम्बली में बम फेंकने की घटना के समय भगत सिंह के साथ राजगुरु, सुखदेव तो थे नहीं फिर इन दोनों वीरों को भगत सिंह के साथ फाँसी क्यों? उस दिन भगत सिंह के साथ एक अन्य युवक जो साथ था, उन बटुकेश्वर दत्त को आज कौन याद कर रहा है? उस वीर नौजवान के साथ क्या हुआ? आज भले ही शहीद भगत सिंह अपने अन्य साथियों के सापेक्ष बहुत बड़े कद के दिखाई देते हों पर हम सभी का कर्तव्य है कि देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर देने वालों के चित्र यदि एकसाथ रखे हों तो हम सबको पहचान सकें. इनके विचारों को किसी विचारधारा विशेष के खाँचे में बाँधकर प्रसारित न करें. आने वाली पीढ़ी को समझाएं कि आज वे जिस आज़ाद हवा-पानी में अपना जीवन गुजार रहे हैं वह ऐसे युवाओं के कारण संभव है. आज की पीढ़ी को बताना होगा कि भगत सिंह सहित अन्य युवा क्रांतिकारी हिंसा का, बन्दूक का, बम का पर्याय नहीं हैं. ऐसे वीर युवकों के विचारों की सान पर आज की पीढ़ी को तैयार करना होगा ताकि वह भी आज के समस्यारुपी शासकों के खिलाफ बिगुल फूंक सके.

यदि हम सब मिलकर खुद जाग सकें, आज की पीढ़ी को जगा सकें, आने वाली पीढ़ी को इन वीरों के बारे में समझा सकें, इन सबकी पहचान करवा सकें तो भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु सहित अनेकानेक ज्ञात-अज्ञात वीरों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

05 मार्च 2017

आँखों में नमी, गर्व है दिल में - सेलुलर जेल दर्शन : अंडमान-निकोबार यात्रा

सेलुलर जेल, जहाँ एक तरफ अंग्रेजी शासन में अमानवीय यातनाओं का केंद्र रहा वहीं दूसरी तरफ आज आज़ाद भारत में क्रांतिकारियों के तीर्थस्थल के रूप में पहचाना जा रहा है. ऐसे किसी भी व्यक्ति के लिए, जो देश की आज़ादी में न्योछावर हो चुके क्रांतिकारियों के प्रति आदर-सम्मान का भाव रखता है, सेलुलर जेल किसी भी तीर्थ से कम नहीं है. कभी सोचा नहीं था कि देश की मुख्यभूमि से हजारों किमी दूर समुद्र के बीच स्थित पोर्ट ब्लेयर में इस जगह के दर्शनार्थ लोगों का हुजूम पहुँचता होगा. सेलुलर जेल के सामने जब खुद को साक्षात् खड़ा पाया और अपने साथ क्रांतिकारियों के प्रति सम्मान-आदर का भाव लिए भीड़ को देखा तो लगा कि भूमंडलीकरण के दौर में दुनिया कितनी भी स्वार्थी क्यों न हो गई हो मगर उसने अपने वीर शहीदों को विस्मृत नहीं किया है. ऐसे लोग भी दिखे जो महज घूमने के लिए वहाँ आये हुए थे किन्तु सेलुलर जेल की अमानवीयता से किसी न किसी रूप में परिचित थे या वहाँ के गाइड के माध्यम से परिचित हो रहे थे, वे सब उन क्रांतिकारियों के प्रति सम्मान भाव तथा तत्कालीन अंग्रेजी शासन के प्रति घृणा का भाव प्रदर्शित कर रहे थे.


बाहर से साधारण सी इमारत दिखने वाली सेलुलर जेल की विशालता का अनुभव मुख्य द्वार को पार करने के बाद होता है. लगभग बीस-पच्चीस फुट की गैलरी को पार करते ही जेल की वे कोठरियाँ नजर आती हैं जो किसी समय अमानवीयता का परिचायक रही थीं. यद्यपि गैलरी पार करने के पूर्व गैलरी के दांये-बांये बने दो विशाल हॉल में प्रदर्शित चित्र एवं अन्य सामग्री जेल की भयावहता का परिचय वहाँ आये सैलानियों को दे देती है. जेल में बंद क्रांतिकारियों के भोजन हेतु दिए जाने वाले बर्तन, उनको पहनने के लिए दिए जाने वाले कपड़े, उनके साथ हुई अमानवीयता की कहानियाँ आँखों को नम करती हैं.



गैलरी से होते हुए अन्दर जेल प्रांगण में दाखिल होते ही सामने कोठरियों से बनी दो बड़ी-बड़ी कतारें (विंग्स) दिखाई देती हैं. बांये तरफ की विंग से कोठरियों के पीछे भाग के दर्शन और दाहिने तरफ की विंग से कोठरियों के सामने के भाग दिख रहे थे. तीन मंजिला इमारत विशालता और उसकी बनावट अपने आपमें ये समझाने को पर्याप्त थी कि एक साथ बंद होने के बावजूद वहाँ क्रांतिकारी किस कदर खुद को अकेला महसूस करते होंगे. तमाम सारे सर्वेक्षण पश्चात् जब अंग्रेजी शासन द्वारा देश के क्रांतिकारियों का मनोबल तोड़ने के लिए सेलुलर जेल का निर्माण शुरू किया गया तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि देश के क्रांतिकारियों को यातना देने के लिए ऐसी भयावह जेल का निर्माण करवाया जायेगा. सेलुलर जेल से वर्षों पूर्व 10 मार्च 1858 को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 200 बंदी पहले जत्थे के रूप में अंडमान-निकोबार के विभिन्न द्वीपों पर लाये गए. इसके बाद तीन अन्य जहाजों- रोमन एम्पायर में 171, डलहौजी में 140, एडवर्ड में 130 राजनैतिक बंदियों को और लेकर आया गया. इस तरह भारतीय क्रांतिकारियों के साथ आजीवन कारावास या कहें कि काला पानी की सजा के यातना-अमानवीयता के पृष्ठ जुड़ने लगे.


सेलुलर जेल का निर्माण कार्य सन 1896 को इन्हीं बंदियों के द्वारा करवाना शुरू हुआ जो सन 1906 में पूरा हुआ. अंग्रेजी सरकार ने क्रांतिकारियों का मनोबल तोड़ने, उन्हें अमानवीय यातनाएं देने की दृष्टि से ही इस जेल का निर्माण करवाया था. इस कारण इसकी बनावट भी ऐसी रखी गई जो अपने आपमें अमानवीयता का परिचायक बनी. पूरी जेल सात कतारों (विंग्स) में बनाई गई. इसमें एक विंग के सामने दूसरी विंग का पीछे का भाग पड़ता है. सातों विंग्स को एक मुख्य इमारत से जोड़ा गया था, जिस पर से एकसाथ सातों विंग्स की निगरानी की जा सकती थी. सातों विंग्स में कुल मिलाकर 689 कोठरियाँ (सेल्स) थीं. इसमें पहली विंग में 105, दूसरी में 102, तीसरी में 150, चौथी में 53, पांचवीं में 93, छठीं में 60 और सातवीं में 126 कोठरी थीं. प्रत्येक कोठरी 13.5 फुट लम्बी, 7 फुट चौड़ी, 10 फुट ऊँची है. प्रत्येक कोठरी में जमीन से 9 फुट ऊपर एक 3 फुट और 1 फुट लम्बाई-चौड़ाई वाली खिड़की बनी हुई है. प्रत्येक कोठरी लोहे के मजबूत फाटक के सहारे बंद होती थी और जिसका हैंडल दीवार में इस तरह बनाया गया था कि कोठरी के अन्दर के लाख कोशिश के बाद भी उस तक अपना हाथ नहीं पहुँचाया जा सकता था. यहाँ बंद सेनानियों को दैनिक क्रियाओं के लिए भी छूट नहीं मिलती थी. एक निश्चित समयावधि के बाद उनको अपनी दैनिक क्रियाएँ उसी कोठरी में संपन्न करनी पड़ती थीं. शाम को पाँच बजे बंद किये गए वीर सेनानी अगले दिन सुबह छह बजे तक बाहर आने को तरस जाते थे. यातना की इतनी इन्तिहाँ शायद ही हममें से किसी ने सोची हो.




वर्तमान में जेल की सात विंग्स में से केवल तीन विंग्स शेष हैं. बाकी चार विंग्स जापानियों द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध के समय किये गए हमले में तथा तत्कालीन स्थानीय नागरिकों के तोड़-फोड़ में पूरी तरह मिट चुकी हैं. वहाँ अब एक चिकित्सालय, बाजार स्थित है. ये तो भलमानसता कहिये भूतपूर्व प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई की जिन्होंने सेलुलर जेल के रिहा किये गए राजनैतिक बंदियों और उनके परिजनों के आग्रह को स्वीकार करते हुए 11 फरवरी 1979 को सेलुलर जेल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया.


बहरहाल, हम लोगों ने मुख्य गैलरी से प्रांगण में प्रवेश किया तो सामने स्थित दो विंग्स के साथ दांयें-बांयें दो स्मारक और भी दिखाई दिए. एक स्मारक ने जहाँ गर्व की अनुभूति कराई वहीं दूसरे स्मारक को देखकर शरीर में झुनझुनी फ़ैल गई. बांयी तरफ अमर शहीदों की स्मृति में प्रज्ज्वलित स्वतंत्रता ज्योति और एक स्तम्भ के दर्शन हुए जबकि दाहिनी तरफ वीर क्रांतिकारियों को मौत की नींद सुलाने के लिए बनाया गया फाँसी घर दिख रहा था. फाँसी घर में एकसाथ तीन क्रांतिकारियों को फाँसी देने की व्यवस्था अंग्रेजी सरकार ने कर रखी थी. ज़ुल्म और यातनाओं के बाद भी अंग्रेजी शासन का मन नहीं भरता था शायद इसी कारण से फाँसी घर के ठीक बगल में तिरष्कृत कोठरियों का निर्माण करवाया गया था. यहाँ उन राजनैतिक बंदियों को रखा जाता था जिन्हें फाँसी की सजा दी जा चुकी है किन्तु उसकी पुष्टि गवर्नर जरनल से नहीं हो सकी है. स्पष्ट है कि ऐसे वीरों के मन में मौत के लिए दहशत पैदा करना उन अंग्रेजों का मकसद था किन्तु आज़ादी के वीर मतवाले इससे भय खाने वालों में से नहीं थे. इसी फाँसीघर के बगल में बना हुआ रसोईघर आज भी स्थित है. यहाँ हिन्दू और मुसलमानों के लिए अलग-अलग रसोई घरों की व्यवस्था अंग्रेजों द्वारा की गई थी. इसके द्वारा वे उन क्रांतिकारियों में आपस में फूट डालना चाहते थे.



इन्हीं तिरष्कृत कोठरियों के ठीक ऊपर दूसरी मंजिल पर वीर सावरकर को कैद किया गया था. जिस कोठरी में उनको कैद किया गया था वो आज सावरकर कोठरी के नाम से जानी जाती है, जो वहाँ आये दर्शनार्थियों के लिए पूज्य है. ये अपने आपमें गर्व का विषय है कि देश के क्रांति इतिहास में वीर सावरकर एकमात्र ऐसे क्रांतिकारी हैं जिन्हें दो बार काला पानी की सजा हुई. वे अकेले क्रांतिकारी हैं जो अपने भाई के साथ सेलुलर जेल में कैद थे और पूरे एक साल तक उनके भाई को खबर नहीं हो सकी कि वीर सावरकर भी वहाँ कैद हैं. वीर सावरकर अथाह सागर की चिंता किये वगैर एक बार जेल को तोड़कर भाग चुके थे ऐसे में दोबारा उनके आने पर जेल प्रशासन अत्यंत चौकन्ना और भयभीत था. एकमात्र उन्हीं को उनकी कोठरी में एक अतिरिक्त फाटक के द्वारा कैद किया गया था.




इसी प्रांगण में दाहिने हाथ पर ही उस तेल मील के चिन्ह उपस्थित हैं जिसका आधार लेकर वहाँ के बंदियों पर अत्याचार किये जाते थे. एक राजनैतिक बंदी को प्रतिदिन तीस पौंड नारियल का तेल या फिर दस पौंड सरसों का तेल निकालना होता था. जो किसी भी सामान्य व्यक्ति की क्षमता से परे था. इसके अलावा जूट की रस्सी बनाने का काम भी इनके जिम्मे आता था. ये काम न हो पाने की दशा में उन बंदियों को लोहे की बनी एक तिपाही पर बांधकर नग्नावस्था में बेंत मारने की सजा दी जाती थी. जेल प्रांगण में स्थित वे उपकरण, लोहे की बनी तिपाही देखकर बरबस ही आँखें नम हो गईं, देह में सिरहन दौड़ गई. एहसास हुआ कि वाकई किस तरह के अमानुषिक अत्याचार सहकर हमारे वीर सेनानियों ने हमारे लिए आज़ाद हवा-पानी का इन्तेजाम किया.



सातों विंग्स, वर्तमान में तीन को एकसाथ जोड़ती केन्द्रीय मीनार के सहारे इन विंग्स की छत पर खुली हवा में आज साँस ली जा सकती है. किसी समय कोठरी के बाहर स्थित चार फुट के बरामदे में भी साँस लेना दुर्लभ था. इसी केन्द्रीय मीनार में यहाँ के राजनैतिक बंदियों के नामों का उल्लेख करते हुए शिलालेख स्थित हैं. ऊपर आकर तीन तरफ विशाल समुद्र दिखाई देता है. एक तरफ सामने अवश्य ही रॉस आयलैंड दिखाई देता है, जहाँ आज तिरंगा फहराता है पर कभी यूनियन जैक लहराया करता था. इस आयलैंड को अंग्रेजी अधिकारी के निवास के तौर पर प्रयोग में लाया जाता था. वे देश के क्रांतिकारियों से इतने भयभीत रहते थे कि रहने के लिए पोर्ट ब्लेयर से दूर समुद्र के बीच रॉस आयलैंड में आये.




सेलुलर जेल का अपना इतिहास है. कई कैदी यहाँ की अमानवीय यातनाओं को सहते हुए वीरगति को प्राप्त हुए. कई क्रांतिकारियों को फाँसी के द्वारा मौत की नींद सुला दिया गया. वहाँ के क्रांतिकारियों की भूख हड़ताल से, उनके संघर्ष से सभी राजनैतिक बंदियों को मुख्यभूमि की जेलों में स्थानांतरित कर दिया गया. हालाँकि सेलुलर जेल में आतंक का दौर इसके बाद भी जारी रहा. अंग्रेजों के बाद जापानियों ने दूसरे विश्व युद्ध में यहाँ कब्ज़ा करके अपना आतंक फैलाया. बहरहाल, देश की आज़ादी के बाद सभी राजनैतिक बंदियों को यहाँ से मुक्ति मिली. इसी सेलुलर जेल के ठीक सामने बने वीर सावरकर पार्क में सावरकर जी की प्रतिमा के साथ-साथ भूषण रॉय, बाबा भानसिंह, मोहित मोइत्रा, पंडित रामरक्षा बाली, महावीर सिंह, मोहन किशोर नामदास की मूर्तियाँ स्थापित हैं, जिन्होंने अमानवीय यातनाएं सहते हुए इसी जेल में अंतिम साँस ली.



आँखों में नमी, दिल में श्रद्धा-भाव, मन में गर्व की अनुभूति करते हुए वास्तविक तीर्थस्थान से जब बाहर निकले तो किसी लेखक की ये पंक्तियाँ मन सहज ही कह उठा कि
मत कहो इसे कालापानी, यह तीरथ वीर जवानों का,

आज़ादी के परवानों का, भारत माँ की संतानों का.