19 जनवरी 2018
हिंसक होता बचपन
23 जून 2009
हाँ, मैं दुआ करता हूँ कि मेरी माँ मर जाये
‘‘हाँ, मैं दुआ करता हूँ कि मेरी माँ मर जाये।’’ आपको सुन कर कुछ अजीब सा नहीं लगा? सम्भवतः लगा होगा। लगना भी चाहिए क्योंकि आज के जमाने में शायद ही कोई पुत्र या पुत्री ऐसे होगे जो अपनी माता के मरने की दुआ करते होंगे।
इसके बाद भी कुछ ऐसा सुनने को मिला। सुन कर हमें भी बड़ा ही अचम्भा हुआ। उस व्यक्ति से पूछा कि ऐसा क्यों? जवाब मिला तो और भी चैंकाने वाला। उसने बताया कि वह एक प्राइवेट कम्पनी में काम करता है, शादीशुदा है। घर में पिता न होने के कारण घर की जिम्मेवारियों का बोझ उसी के सिर पर है।
काम के बाद जब घर लौटता है तो लगभग रोज का नियम है कि उसकी माँ और पत्नी की खटपट का तनाव घर पर दिखाई पड़ता है। पत्नी को समझाते-समझाते थक चुका है पर वह मानती नहीं। माँ को जिस प्रकार से समझा सकता था समझा चुका, उन पर अब बुढ़ापे का साया है, किसी बात को मानती नहीं। खुद समझ नहीं आता कि क्या किया जाये?
उसके परिवार के अन्य सदस्यों के बारे में पता किया तो मालूम हुआ कि वह, उसकी पत्नी, माँ और उसका एक छोटा सा बेटा है। छोटे से परिवार में वह नहीं चाहता कि उसकी पत्नी और माँ की खटपट का असर उसके बच्चे पर पड़े। माँ को छोड़ कर अलग नहीं रह सकता। पत्नी को अब और समझाया नहीं जा सकता। रोज-रोज की खटपट से वह तनाव में रहता है और इसका असर उसके काम पर भी पड़ रहा है।
क्या करे, कुछ कह भी नहीं सकता, कुछ कर भी नहीं सकता। माँ का अनादर होते भी नहीं देख सकता, माँ को दुखी भी नहीं देख सकता। इसलिए दुआ करता हूँ कि माँ को भगवान उठा ले।
पूरा दिन सोचते रहे कि क्या सही है और क्या गलत? सोच को अपने से दूर करने के लिए आप लोगों पर यह पोस्ट थोप दी। सह लीजिए इसे भी अन्य पोस्ट की तरह।
17 मई 2009
भाजपा की हार - कारण और निवारण
वर्तमान चुनाव परिणामों ने मीडिया की, चुनाव सर्वे करवाने वाली संस्थाओं की, राजनेताओं की साथ ही साथ आम मतदाता की एक प्रकार से सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी है। आज भले ही ‘सिंह इज किंग’ का नारा ठोंक कर कांग्रेस विजयी मुद्रा में ‘जय हो’ की जयकार कर रही हो पर सत्यता तो यह है कि उन्हें स्वयं इन परिणामों की अपेक्षा ही नहीं थी।
भाजपा भी स्वयं को शायद इस स्थिति में खड़ा नहीं देख रही थी। सत्ता के आसपास आने की चाह रखने से इस परिणाम को स्वीकार कर पाना ही उसके लिए कठिन साबित हो रहा है। भाजपा के लिए हार के कुछ कारण रहे और उन कारणों के कुछ परिणाम भी हैं। ये कारण और परिणाम अपना कर भाजपा आने वाले चुनावों में अपने आपको पुनः स्थापित कर सकती है।कारण एक-भाजपा द्वारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संकल्पना का निर्धारण करना।
निवारण-इस देश में जहाँ कि चारण-भाट परम्परा अभी तक कायम है, हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं, सांस्कृतिक वातावरण को पिछड़े और दकियानूसी होने की निशानी माना जाता हो वहाँ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को लोग कैसे पचा सकते हैं? भाजपा को आगे सफल होना है तो इस संकल्पना को छोड़ना होगा।
---------------------कारण दो-भाजपा के साथ राम का नाम जुड़ा है।
निवारण-भाजपा स्वयं सवाल करे कि राम हैं या थे कौन?
एक ऐसा काल्पनिक पात्र जो तुलसी दास द्वारा महिमामंडित किया गया। कांग्रेस द्वारा इस बात का हलफनामा अदालत में दिया भी गया था। एक ऐसा व्यक्ति जो अपनी पत्नी सीता का ही भाई था (ऐसा कांग्रेस के कम बोलने वाले बुजुर्ग नेता ने सहमत संस्था के द्वारा लोगों को समझाया था) एक ऐसा राजा जिसने शंबूक का वध किया और इस कारण से कि वह उस समय, कालखण्ड के अनुसार गलत कार्य कर रहा था। एक ऐसा पति जिसने बारबार अपनी पत्नी को किसी न किसी रूप में प्रताड़ित किया। एक ऐसा भाई जिसने अपने छोटे भाई को उकसा कर दूसरे भाई (रावण) की बहिन की नाक-कान कटवा दिये।
आखिर इस प्रकार के पात्र और वो भी काल्पनिक के लिए क्यों पूरे देश में उत्पात मचा रखा है।
भाजपा यदि वोट चाहती है तो राम नाम को सिरे से खारिज करना होगा।
-----------------कारण तीन-भाजपा ने हिन्दुओं की बात भी भारत देश में रखी।
निवारण-हिन्दुओं की बात करने के पहले भाजपा को हिन्दुओं के इतिहास को खंगालना चाहिए था। बर्बर जाति, कट्टर धर्म, आक्रांता, बात-बात पर अपने धर्म का बखान करने वाले, वर्षों तक अपनी संस्कृति के नाम पर सोने वाले की बात करना कहाँ की राजनीति है? एक ऐसा धर्म जो साम्प्रदायिक हो, जो कहता है कि हमें अपने हिन्दू होने पर गर्व है, जो बिना किसी भेदभाव के सभी धर्मों को मानता हो फिर भी वह मुसलमानों, ईसाइयों को डराता-धमकाता रहता हो.........और भी बहुत बुराइयाँ हैं हिन्दू होने में। तब इस प्रकार के लोगों की बात करके भाजपा ने देश में डर का वातावरण तैयार कर दिया है।
यदि भाजपा चाहती है कि वह भी निष्कंटक बड़े दल की तरह सत्ता में रहे तो उसके लिए आवश्यक है कि हिन्दू क्या है, कौन है बिलकुल ही भूल जाये।
----------------कारण चार-भाजपा के पास देश के लिए शहीद होने वाला परिवार नहीं।
निवारण-देश में जब सदा से ही राजनीति एक परिवार को केन्द्र में रखकर होती रही हो वहाँ कैसे सम्भव है कि बिना परिवार के सत्ता प्राप्त कर ली जाये? चाटुकारिता के नाम पर भाजपा के पास ऐसा कोई परिवार नहीं जिसके सदस्यों ने शहीद होना सीखा हो, भले ही वे आतंकवादी घटनाओं का शिकार हुए हों। आखिर जब परिवार के नाम पर चापलूसी इस देश में कायम है, गुलामी की आदत अभी भी हमारे खून से निकली नहीं है तब बिना परिवार के सत्ता पाना लोहे के चने चबाना है।
यदि भाजपा अपने आसपास निगाह दौड़ाये तो उसको संजीवनी मिल सकती है। वरुण और मेनका के रूप में एक परिवार एसके पास भी है जिसके नाम पर देशवासियों की आँखों को नम किया जा सकता है, गरीबी के बाद भी वोट को पाया जा सकता है।
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आज के लिए यही चार कारण पर्याप्त हैं क्योंकि वर्तमान परिदृश्य में यही चार मायने भी रखते हैं।
