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19 जनवरी 2018

हिंसक होता बचपन

कुछ समय पहले एक आलेख प्रकाशित हुआ था, जिसमें हमने ये बताने का प्रयास किया था कि इन्सान की मूल प्रवृत्ति हिंसक है. आदिमानव से लेकर वर्तमान महामानव बनने तक के सफ़र में इन्सान ने बहुत कुछ छोड़ा, बहुत कुछ अपनाया मगर वो अपनी हिंसक प्रवृत्ति को नहीं छोड़ सका. विकास की अवस्थाओं की नित नई परिकल्पनाओं के बाद भी उसे जब भी अवसर मिला उसने हिंसात्मक आचरण अपनाया है. इसे इस रूप में भी समझा जा सकता है कि किसी भी इन्सान को जन्म से लेकर मृत्यु तक किसी भी तरह के पाठ्यक्रम में हिंसा करना नहीं सिखाया जाता है जबकि प्रत्येक कालखंड में, उम्र के अलग-अलग पड़ाव पर उसे प्यार, स्नेह, अपनत्व, अहिंसा, शांति आदि के पाठ बराबर पढ़ाये, रटाये जाते हैं. आवश्यक नहीं कि कोई इन्सान किसी की हत्या करके ही अपनी हिंसात्मक मनोवृत्ति को दर्शाए, आवश्यक नहीं कि कोई इन्सान किसी के साथ मारपीट करके ही अपनी हिंसात्मक प्रवृत्ति को सामने लाये. उसके हावभाव, उसके बोलचाल, उसकी क्रियाविधि आदि से भी उसके हिंसक होने के प्रमाण मिलते हैं. सड़क चलते किसी वस्तु में पैर की जबरदस्त ठोकर मार देना, बगीचे, पार्क आदि में टहलते समय अनावश्यक रूप से किसी छड़ी, डंडी आदि के द्वारा पेड़ों-पौधों की पत्तियों-फूलों को गिरा देना आदि भी इसी तरह की मनोवृत्ति का परिचायक है.


बहुतायत में इन्सान की हिंसक गतिविधि कुछ समय पूर्व तक एक उम्र विशेष के बाद देखने को मिलती थी. किशोर अवस्था के बाद से लेकर एक लम्बे समय तक किसी भी इन्सान की गतिविधियाँ हिंसात्मक रूप से घटती-बढ़ती देखी जा सकती हैं. इधर वर्तमान परिदृश्य में ऐसा बहुतायत में देखने को मिलने लगा है कि बच्चे भी हिंसात्मक प्रवृत्ति को अपनाते देखे जाने लगे हैं. ऐसा नहीं है कि बच्चों में पहले हिंसात्मक प्रवृत्ति नहीं दिखाई देती थी या फिर वे हिंसात्मक तरीकों को नहीं अपनाते थे मगर अब जिस तरह की हिंसा बच्चों द्वारा दिखाई जा रही है, वह चिंताजनक है. पहले खेलकूद के दौरान, स्कूल में आपसी प्रतिद्वंद्विता के दौरान, किसी भी बात पर खुद को आगे रखने की चेष्टा में एक-दूसरे से झगड़ जाना, एक-दूसरे से लड़ जाना बचपने की आम प्रवृत्ति होती थी. ऐसा न केवल दोस्तों में वरन सगे भाई-बहिनों के बीच भी देखने को मिलता था. ऐसा कभी सुनाई भी नहीं देता था कि कोई बच्चा किस दूसरे बच्चे की हत्या महज इसलिए कर देता है कि उसकी मृत्यु से स्कूल में छुट्टी हो जाएगी. गुड़गाँव के रेयान इंटरनेश्नल स्कूल की यह घटना अभी मन-मष्तिष्क से धूमिल भी न हो सकी थी कि कुछ इसी तरह की वारदात लखनऊ में अंजाम दी गई. यहाँ के एक स्कूल में कक्षा सात में पढ़ने वाली एक छात्रा ने कक्षा एक में पढ़ने वाले एक बच्चे पर इसलिए प्राणघातक हमला किया कि उसकी मृत्यु से स्कूल में छुट्टी हो जाएगी.
ये सिर्फ चिंताजनक स्थिति नहीं है वरन बालमन-मष्तिष्क के शोध करने की स्थिति है कि आखिर उनके दिमाग में इस तरह की हत्यारी हिंसात्मक प्रवृत्ति का जन्म कैसे, कब, क्यों होने लगा है? इस तरह न केवल मनोविज्ञानियों को वरन समाजशास्त्रियों को भी सजग होने की आवश्यकता है. यदि इस तरह की मनोवृत्ति बच्चों में पनपने लगी तो समाज में अपराधियों का जन्म बचपन से ही होने लगेगा, जिसे एकबारगी भले ही शिक्षा या फिर किसी तरह के अनुशासन के द्वारा बढ़ने न दिया जाये पर वो कभी न कभी अपना स्वरूप दिखा ही देगा. वर्तमान में ऐसी घटनाओं के लिए तुरत-फुरत में प्रथम दृष्टया आरोप सोशल मीडिया पर लगा दिया जाता है, इंटरनेट पर लगा दिया जाता है, माता-पिता की व्यस्तता पर लगा दिया जाता है, आधुनिकीकरण पर लगा दिया जाता है. देखा जाये तो ये सब अवस्थाएं मात्र हैं न कि मूल जड़. वर्तमान में जिस तरह से तकनीक का विकास होने के साथ-साथ आमजनमानस की आवश्यकता बन गया है, उस दौर में टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट आदि को समाप्त कर पाना, नकार देना संभव ही नहीं है. तो क्या माना जाये कि इनके माध्यम से हिंसात्मक प्रवृत्ति बच्चों में पनपने दी जाये?
इन सबसे अलग एकबारगी बच्चों की परवरिश, उनके आसपास का माहौल, परिवार में उनकी सहभागिता, उनके साथ सामान्यरूप में होने वाले व्यवहार, उनके साथ होने वाली बातचीत, बच्चों की दैनिक गतिविधियों, उनकी क्रियाशीलता आदि को भी गौर किया जाना आवश्यक है. वर्तमान जीवनशैली को देखा जाये तो वह कंक्रीट के जंगल में सिमट कर रह गई है. इस जीवनशैली में न तो खेलकूद के मैदान बचे हैं, न ही रिश्तों की बुनियाद. ऐसे में बचपन फुट और मीटर की नाप में सिमट कर रह गया है. खेलने के लिए उसके सामने गैजेट्स हैं, रिश्तों के नाम पर उसके सामने या तो कार्टून्स हैं या फिर कोई पालतू जानवर. आपसी सामंजस्य बनाने से ज्यादा उसे सिखाया जाता है कि उसे उसके साथी से अधिक अंक कैसे लाना है. सहयोग करने की बजाय उसे समझाया जाता है कि उसका समय सबसे ज्यादा कीमती है, जिसे बर्बाद न किया जाये. रिश्तों के प्रति संवेदित होने के बजाय उसे समझाया जाता है कि सारे सम्बन्ध-नाते मतलब के हैं. इस अकेलेपन और गैजेट्स के सहारे अपने बचपन को घुटते देखते बच्चों के भीतर इंसानी मूल प्रवृत्ति पनपने लगती है. यह प्रतिकूल स्थिति और उसकी आक्रामकता लोगों का ध्यान अपने प्रति खींचने के लिए बच्चों से आपराधिक कृत्य करवा बैठती है.

आवश्यकता आज इसकी है कि बच्चों को कमरे से बाहर खेलने-कूदने के लिए भेजा जाये. खेलने-कूदने से उन बच्चों के भीतर पनप रहे आक्रोश, हिंसा, अराजकता को बाहर निकल जाने का अवसर मिलेगा. उनके शैक्षणिक बोझ को कम करके उनके मानसिक विकास की तरफ गौर किया जाये. इससे न केवल वे अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकेंगे वरन अपने आसपास के वातावरण को, मानसिकता को समझने में परिपक्व हो सकेंगे. माता-पिता का अंधाधुंध धन कमाने की दौड़ से बाहर निकल कर अपने नौनिहालों की तरफ ध्यान दिया जाना चाहिए. अभिभावकों को समझना होगा कि उनके बच्चे ही उनकी अनमोल निधि हैं, जिसका विकास पारिवारिक संरचना में सम्मिलित रहकर ही किया जा सकता है. इसके अलावा सहज, सरल जीवनशैली को अपनाकर भी बच्चों को हिंसा से, हिंसात्मक वृत्ति से बचाया जा सकता है. 

23 जून 2009

हाँ, मैं दुआ करता हूँ कि मेरी माँ मर जाये

‘‘हाँ, मैं दुआ करता हूँ कि मेरी माँ मर जाये।’’ आपको सुन कर कुछ अजीब सा नहीं लगा? सम्भवतः लगा होगा। लगना भी चाहिए क्योंकि आज के जमाने में शायद ही कोई पुत्र या पुत्री ऐसे होगे जो अपनी माता के मरने की दुआ करते होंगे।
इसके बाद भी कुछ ऐसा सुनने को मिला। सुन कर हमें भी बड़ा ही अचम्भा हुआ। उस व्यक्ति से पूछा कि ऐसा क्यों? जवाब मिला तो और भी चैंकाने वाला। उसने बताया कि वह एक प्राइवेट कम्पनी में काम करता है, शादीशुदा है। घर में पिता न होने के कारण घर की जिम्मेवारियों का बोझ उसी के सिर पर है।
काम के बाद जब घर लौटता है तो लगभग रोज का नियम है कि उसकी माँ और पत्नी की खटपट का तनाव घर पर दिखाई पड़ता है। पत्नी को समझाते-समझाते थक चुका है पर वह मानती नहीं। माँ को जिस प्रकार से समझा सकता था समझा चुका, उन पर अब बुढ़ापे का साया है, किसी बात को मानती नहीं। खुद समझ नहीं आता कि क्या किया जाये?
उसके परिवार के अन्य सदस्यों के बारे में पता किया तो मालूम हुआ कि वह, उसकी पत्नी, माँ और उसका एक छोटा सा बेटा है। छोटे से परिवार में वह नहीं चाहता कि उसकी पत्नी और माँ की खटपट का असर उसके बच्चे पर पड़े। माँ को छोड़ कर अलग नहीं रह सकता। पत्नी को अब और समझाया नहीं जा सकता। रोज-रोज की खटपट से वह तनाव में रहता है और इसका असर उसके काम पर भी पड़ रहा है।
क्या करे, कुछ कह भी नहीं सकता, कुछ कर भी नहीं सकता। माँ का अनादर होते भी नहीं देख सकता, माँ को दुखी भी नहीं देख सकता। इसलिए दुआ करता हूँ कि माँ को भगवान उठा ले।
पूरा दिन सोचते रहे कि क्या सही है और क्या गलत? सोच को अपने से दूर करने के लिए आप लोगों पर यह पोस्ट थोप दी। सह लीजिए इसे भी अन्य पोस्ट की तरह।

17 मई 2009

भाजपा की हार - कारण और निवारण

वर्तमान चुनाव परिणामों ने मीडिया की, चुनाव सर्वे करवाने वाली संस्थाओं की, राजनेताओं की साथ ही साथ आम मतदाता की एक प्रकार से सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी है। आज भले ही ‘सिंह इज किंग’ का नारा ठोंक कर कांग्रेस विजयी मुद्रा में ‘जय हो’ की जयकार कर रही हो पर सत्यता तो यह है कि उन्हें स्वयं इन परिणामों की अपेक्षा ही नहीं थी।
भाजपा भी स्वयं को शायद इस स्थिति में खड़ा नहीं देख रही थी। सत्ता के आसपास आने की चाह रखने से इस परिणाम को स्वीकार कर पाना ही उसके लिए कठिन साबित हो रहा है। भाजपा के लिए हार के कुछ कारण रहे और उन कारणों के कुछ परिणाम भी हैं। ये कारण और परिणाम अपना कर भाजपा आने वाले चुनावों में अपने आपको पुनः स्थापित कर सकती है।

कारण एक-भाजपा द्वारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संकल्पना का निर्धारण करना।
निवारण-इस देश में जहाँ कि चारण-भाट परम्परा अभी तक कायम है, हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं, सांस्कृतिक वातावरण को पिछड़े और दकियानूसी होने की निशानी माना जाता हो वहाँ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को लोग कैसे पचा सकते हैं? भाजपा को आगे सफल होना है तो इस संकल्पना को छोड़ना होगा।

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कारण दो-भाजपा के साथ राम का नाम जुड़ा है।
निवारण-भाजपा स्वयं सवाल करे कि राम हैं या थे कौन?
एक ऐसा काल्पनिक पात्र जो तुलसी दास द्वारा महिमामंडित किया गया। कांग्रेस द्वारा इस बात का हलफनामा अदालत में दिया भी गया था। एक ऐसा व्यक्ति जो अपनी पत्नी सीता का ही भाई था (ऐसा कांग्रेस के कम बोलने वाले बुजुर्ग नेता ने सहमत संस्था के द्वारा लोगों को समझाया था) एक ऐसा राजा जिसने शंबूक का वध किया और इस कारण से कि वह उस समय, कालखण्ड के अनुसार गलत कार्य कर रहा था। एक ऐसा पति जिसने बारबार अपनी पत्नी को किसी न किसी रूप में प्रताड़ित किया। एक ऐसा भाई जिसने अपने छोटे भाई को उकसा कर दूसरे भाई (रावण) की बहिन की नाक-कान कटवा दिये।
आखिर इस प्रकार के पात्र और वो भी काल्पनिक के लिए क्यों पूरे देश में उत्पात मचा रखा है।
भाजपा यदि वोट चाहती है तो राम नाम को सिरे से खारिज करना होगा।

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कारण तीन-भाजपा ने हिन्दुओं की बात भी भारत देश में रखी।
निवारण-हिन्दुओं की बात करने के पहले भाजपा को हिन्दुओं के इतिहास को खंगालना चाहिए था। बर्बर जाति, कट्टर धर्म, आक्रांता, बात-बात पर अपने धर्म का बखान करने वाले, वर्षों तक अपनी संस्कृति के नाम पर सोने वाले की बात करना कहाँ की राजनीति है? एक ऐसा धर्म जो साम्प्रदायिक हो, जो कहता है कि हमें अपने हिन्दू होने पर गर्व है, जो बिना किसी भेदभाव के सभी धर्मों को मानता हो फिर भी वह मुसलमानों, ईसाइयों को डराता-धमकाता रहता हो.........और भी बहुत बुराइयाँ हैं हिन्दू होने में। तब इस प्रकार के लोगों की बात करके भाजपा ने देश में डर का वातावरण तैयार कर दिया है।
यदि भाजपा चाहती है कि वह भी निष्कंटक बड़े दल की तरह सत्ता में रहे तो उसके लिए आवश्यक है कि हिन्दू क्या है, कौन है बिलकुल ही भूल जाये।

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कारण चार-भाजपा के पास देश के लिए शहीद होने वाला परिवार नहीं।
निवारण-देश में जब सदा से ही राजनीति एक परिवार को केन्द्र में रखकर होती रही हो वहाँ कैसे सम्भव है कि बिना परिवार के सत्ता प्राप्त कर ली जाये? चाटुकारिता के नाम पर भाजपा के पास ऐसा कोई परिवार नहीं जिसके सदस्यों ने शहीद होना सीखा हो, भले ही वे आतंकवादी घटनाओं का शिकार हुए हों। आखिर जब परिवार के नाम पर चापलूसी इस देश में कायम है, गुलामी की आदत अभी भी हमारे खून से निकली नहीं है तब बिना परिवार के सत्ता पाना लोहे के चने चबाना है।
यदि भाजपा अपने आसपास निगाह दौड़ाये तो उसको संजीवनी मिल सकती है। वरुण और मेनका के रूप में एक परिवार एसके पास भी है जिसके नाम पर देशवासियों की आँखों को नम किया जा सकता है, गरीबी के बाद भी वोट को पाया जा सकता है।

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आज के लिए यही चार कारण पर्याप्त हैं क्योंकि वर्तमान परिदृश्य में यही चार मायने भी रखते हैं।