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26 फ़रवरी 2022

क्रांतिधाम सेलुलर जेल और वीर सावरकर के दर्शन

घूमने का, फोटोग्राफी का शौक बचपन से रहा है. ये और बात है कि देशकाल, परिस्थिति के कारण बहुत सारी जगहों पर बहुत घूमना न हुआ मगर आसपास की जगहों पर खूब घूमना होता रहा. तमाम सारी जगहों के बारे में पढ़ने-देखने के कारण बहुत सी जगहों को देखने का, वहाँ के बारे में जानने-लिखने का, उसकी फोटोग्राफी खुद करने का बहुत मन हुआ करता था. ऐसी ही जगहों में एक जगह सेलुलर जेल हुआ करती थी. बचपन से पढ़ाई के दौरान, परिवार से मिलती जानकारी के कारण से अंडमान निकोबार द्वीप समूह को काला पानी के नाम से ही पहचानते थे. उसमें भी उस काला पानी में सेलुलर जेल का नाम सुन रखा था. बचपन में तो नहीं मगर जैसे-जैसे समझ आती रही, बचपन की पकड़ से बाहर आते रहे, सेलुलर जेल को देखने की, वहाँ की मिट्टी को माथे लगाने की इच्छा बलबती होती रही. कालांतर में वीर सावरकर जी के बारे में पढ़ने को मिला तो न केवल सेलुलर जेल को बल्कि उस कोठरी को भी नमन करने का मन होने लगा जहाँ वीर सावरकर को कैद किया गया था. 


समय गुजरता रहा, मन में अंडमान निकोबार जाने की, सेलुलर जेल दर्शन की अभिलाषा और विकट रूप धारण करती रही. आखिरकार एक दिन ऐसा आ ही गया कि अंडमान निकोबार जाने का, पोर्ट ब्लेयर की धरती छूने का, सेलुलर जेल की मिट्टी को माथे लगाने का सुअवसर आ ही गया. दिल्ली से उड़े हवाई जहाज ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस एयरपोर्ट के दर्शन करवाते हुए वीर सावरकर एयरपोर्ट पर उतार दिया. हवाई जहाज से बाहर आने पर वीर सावरकर जी का नाम देखकर सिर स्वतः ही उनके प्रति श्रद्धा से झुक गया.


अपने छोटे भाई के घर पहुँचने के बाद सबसे पहले सेलुलर जेल के दर्शन किये गए. जेल की सभी जगहों को अपने हिसाब से देखा, उनका एहसास किया गया. सेलुलर जेल अपनी जिस मूल स्थिति में थी, अब वैसी नहीं है. मूल रूप में यह जेल सात शाखाओं में बनाई गई थी. बाद में इसकी चार शाखाएँ स्थानीय लोगों द्वारा ही नष्ट कर दी गईं. अब इस जेल की कुल सात शाखाओं में से केवल तीन शाखाएँ शेष बची हुई हैं.


सेलुलर जेल का मॉडल 

तीन मंजिल की इस जेल का नाम सेलुलर जेल रखने के पीछे का कारण इसका रूप-विन्यास भी है. इसमें प्रत्येक शाखा में कई-कई कोठरियाँ हैं. सभी कोठरी इस तरह से बनी हैं कि किसी कोठरी में कैद व्यक्ति दूसरी कोठरी को नहीं देख सकता था. एक सेल की तरह से बने होने के कारण इसे सेलुलर जेल कहा गया. इसी में एक मंजिल पर सीढ़ी के पास ही वीर सावरकर सेल की पट्टिका लगी हुई है. 


जानकारी करने के बाद मालूम हुआ कि इसी मंजिल पर वीर सावरकर को एक कोठरी में कैद करके रखा गया था. हम लोग पूरी श्रद्धाभाव से, तन-मन में सिरहन लिए, आँखों में पानी लिए सेलुलर जेल के कोने-कोने को जैसे आत्मसात करने के लिए घूम रहे थे. ऐसी स्थिति में जब उस कोठरी के सामने पहुँचे जहाँ वीर सावरकर को कैद में रखा गया था तो आँखों से आँसू स्वतः ही बह निकले. सभी कोठरियों में सामान्य एक गेट था मगर वीर सावरकर की कोठरी को दो फाटकों से बंद किया गया था. तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों को इतने से भी संतोष नहीं था, उन्होंने वीर सावरकर को डराने, भयभीत करने के लिए ऐसी कोठरी में रखा था जो फाँसीघर के सबसे नजदीक थी. उन अंग्रेजों का मानना था कि फाँसी लगाए जाने के दौरान आती चीखों से घबराकर किसी दिन वीर सावरकर भी टूट जायेंगे.


सावरकर कोठरी, इसे दो फाटकों से बंद किया गया था 

इसी शाखा में सबसे अंत में है कोठरी सावरकर जी जहाँ कैद रखे गए 

वीर तो वीर ही होता है और सावरकार तो वास्तविक में वीर थे, जिन्होंने सेलुलर जेल से भाग निकलने का दुस्साहस किया. भारतीय इतिहास में वे एकमात्र व्यक्ति हैं जिनको दो बार काला पानी की, सेलुलर जेल की सजा दी गई. ये भी तथ्य बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि इतिहास में वे ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिनके साथ उनके भाई को भी सेलुलर जेल में सजा काटने भेजा गया था. आश्चर्य देखिये कि एक ही जेल में बंद दो भाइयों को महीनों तक इसकी जानकारी ही नहीं हुई कि दो सगे भाई एकसाथ एक ही जेल में सजा काट रहे हैं.


वीर सावरकर जी की कोठरी में कुछ समय बिताने के बाद, उनकी फोटो के सामने अपनी मनोभावनाओं को प्रकट करने के बाद भी वहाँ से जाने का मन नहीं कर रहा था. दिल में, मन में अत्यंत श्रद्धाभाव लेकर, सावरकर जी के प्रति, तमाम वीर सेनानियों के प्रति कृतज्ञता भाव लेकर, उनका आशीष लेकर हम लोग वास्तविक धाम के, क्रांतिधाम के दर्शन करके घर लौट आये. हमारा अपना व्यक्तिगत विचार ये है कि देश भर के किसी व्यक्ति को अपने जीवन में भले ही अपने धार्मिक स्थल के दर्शन का अवसर न मिले मगर एक बार सेलुलर जेल के, इस क्रांतिधाम के दर्शन अवश्य करने चाहिए.


वीर सावरकर जी को उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन. 


सावरकर कोठरी में 

सेलुलर जेल के सामने बने पार्क में 



29 मई 2021

एकांत में कहानी सुनाते सेलुलर जेल और रॉस आइलैंड

पोर्ट ब्लेयर से लगभग तीन-चार किमी की दूरी पर रॉस आइलैंड स्थित है. किसी समय में अंग्रेज अधिकारियों के निवास स्थान एवं अन्य प्रशासनिक कार्यों के लिए उपयोग होने वाला यह द्वीप आज एकदम निर्जन है. पहले यहाँ अंग्रेजों का राज रहा फिर द्वितीय विश्व युद्ध के समय जापानियों ने इस पर कब्जाकर इसे उजाड़कर रख दिया. बनने-उजड़ने की प्रक्रिया से जूझता यह द्वीप आज अपनी भव्य इमारतों के खंडहर संभाले निर्जन, अकेला, सुनसान खड़ा है. इसकी ख़ामोशी, अकेलेपन को यहाँ आने वाले पर्यटकों की चहल-पहल ही दूर करती है. चारों तरफ से समुद्र से घिरा होने के कारण यह द्वीप अंग्रेजों के लिए अत्यंत सुरक्षित जगह थी. सन 1859 में अबरडीन का युद्ध और फिर सन 1872 में शेरअली पठान द्वारा अंग्रेजी वायसराय लार्ड मेयो की हत्या ऐसी घटनाएँ थीं जिन्होंने अंग्रेज अधिकारियों के दिल में भय पैदा कर रखा था. इसी कारण से कालांतर में भले ही क्रांतिकारियों को वाइपर द्वीप की जेल से पोर्ट ब्लेयर में बनाई सेलुलर जेल में स्थानांतरित कर दिया गया हो मगर अंग्रेजों ने अपने रहने के ठिकाने को नहीं बदला. वे रॉस आइलैंड पर ही जमे रहे. बाद में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानियों ने इसे अपने कब्जे में लेकर पूरी तरह से उजाड़ दिया था.


रॉस आइलैंड में लाइट एंड साउंड शो 


आज इस द्वीप पर तत्कालीन सभ्यता के भग्नावशेष देखे जा सकते हैं. यहाँ बने मकान, चर्च, चिकित्सालय, पोस्ट ऑफिस, दुकानों आदि के खंडहरों पर वृक्ष उग आये हैं. इसके अलावा जापानियों द्वारा बनाये बंकर भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं. पोर्ट ब्लेयर से फैरी के द्वारा चंद मिनट की समुद्री यात्रा के बाद रॉस आइलैंड उतरना होता है. यह द्वीप पूरी तरह से भारतीय सेना के हवाले है, जिसके चलते सुरक्षा औपचारिकताओं के साथ प्रवेश करते ही एक तरफ जापानी बंकर से सामना होता है तो दूसरी तरफ हिरन, मोर, खरगोश अपनी मासूमियत से पर्यटकों के साथ खेलते-कूदते नजर आते हैं. रॉस आइलैंड पर इमारतों के भव्य खंडहर अपनी कहानी खुद कहते नजर आये मगर समूचे इतिहास को यहाँ होने वाले लाइट एंड साउंड कार्यक्रम ने सामने रखा. गुलज़ार के सम्मोहित करते अंदाज़ ने रॉस आइलैंड के बनने-उजड़ने के साथ-साथ इससे जुड़े अनेक तथ्यों को अत्यंत ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया. 


वाइपर द्वीप जेल से क्रांतिकारियों का भागना, आदिवासियों के बीच रहकर एक क्रांतिकारी दूधनाथ तिवारी का उनका विश्वासपात्र बन जाना, अबरडीन का युद्ध, दूधनाथ का विश्वासघात, शेरअली द्वारा लार्ड मेयो की हत्या, क्रांतिकारी कैदियों से सेलुलर जेल का बनवाया जाना, जापानियों का रॉस आइलैंड पर हमला, नेता जी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा जिमखाना ग्राउंड पर तिरंगा फहराना आदि घटनाओं को इस तरह प्रस्तुत किया गया, लगा कि हम खुद उसी समय में जी रहे हैं. लगभग एक घंटे के उस लाइट एंड साउंड प्रोग्राम को देखने के बाद महसूस हुआ कि अंडमान-निकोबार भ्रमण का यह अनिवार्य अंग होना चाहिए, किसी भी पर्यटक के लिए.


सेलुलर जेल में लाइट एंड साउंड शो 


रॉस आइलैंड के लाइट एंड साउंड की तरह ही सेलुलर जेल में भी लाइट एंड साउंड प्रोग्राम की व्यवस्था है. एक तरफ रॉस आइलैंड में एक शो ही होता है वहीं दूसरी तरफ पोर्ट ब्लेयर में ही होने के कारण सेलुलर जेल में लाइट एंड साउंड के दो शो होते हैं. हिन्दी भाषा के साथ-साथ एक शो अंग्रेजी भाषा में भी होता है. सेलुलर जेल के इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से जेल के बारे में, यहाँ के क्रांतिकारियों के बारे में, उन पर किये गए अमानवीय अत्याचारों के बारे में बताया जाता है. रॉस आइलैंड का लाइट एंड साउंड प्रोग्राम जानकारी देता है, कहीं-कहीं भावनात्मकता पैदा करता है किन्तु सेलुलर जेल का प्रोग्राम जानकारी देने के साथ-साथ लगातार आँखों को नम किये रहता है. ओमपुरी की गंभीर आवाज़ में वहाँ स्थित पीपल के पेड़ के द्वारा कही जा रही कहानी, बेहतरीन ध्वनि प्रभाव के चलते क्रांतिकारियों पर होते ज़ुल्मों का शोर, उनकी चीखें, वन्देमातरम, भारत माता की जय का घोष अन्दर तक हिलाकर रख देता है. सेलुलर जेल में लगभग एक घंटे के इस कार्यक्रम को देखते हुए तत्कालीन स्थितियों के साथ इतना अन्तर्सम्बंध बन गया था कि इसके समापन के बाद भारत माता की जय का घोष लगाये बिना मन न माना. ख़ुशी इस बात की हुई कि तीन बार के घोष में वहाँ उपस्थित जनसमुदाय की सैकड़ों आवाजें साथ दे रही थी.


अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में भले ही अनेक द्वीपों की सुन्दरता के वशीभूत आने वाले पर्यटकों की संख्या यहाँ बढ़ने लगी हो किन्तु व्यतिगत रूप से हमारा विचार है कि यहाँ आकर मुख्य रूप से सेलुलर जेल, यहाँ का लाइट एंड साउंड प्रोग्राम देखने के साथ-साथ रॉस आइलैंड का लाइट एंड साउंड अनिवार्य रूप से देखना चाहिए. सेलुलर जेल तो वैसे भी राष्ट्रीय स्मारक के रूप में प्रसिद्द है जो गवाह है कि कैसे हमारे वीर क्रांतिकारियों ने हमारी आज़ादी के लिए ज़ुल्म सहे, कष्ट सहे, यातनाएं सहीं. इसे देखना अपने आपमें सुकून देता है, इसके साथ ही यहाँ और रॉस आइलैंड के लाइट एंड साउंड प्रोग्राम इतिहास से परिचित करवाते हुए तत्कालीन काला पानी का वास्तविक चित्र सामने रखते हैं.


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30 दिसंबर 2018

पहली अंतरिम सरकार के मुखिया द्वारा राष्ट्र ध्वज फहराना


व्यावहारिक रूप से हमने भले ही आज़ादी सन 1947 में पाई हो मगर हम एक तरह से  30 दिसंबर 1943 को ही आजाद हो गए थे. यह दिन शायद बहुत से देशवासियों को स्मरण भी न हो मगर सत्य यही है कि इसी दिन इस देश के एक क्रांतिकारी बेटे ने स्वतंत्र भारत के रूप में राष्ट्र ध्वज फहराया था. देश के जन-जन में बसे महान स्वतंत्रता सेनानी और आजाद हिंद फौज के संस्थापक नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने सबसे पहले अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के पोर्ट ब्लेयर में राष्ट्र ध्वज फहराया था. नेताजी देश की तत्कालीन पहली अंतरिम सरकार के मुखिया के रूप में राष्ट्रध्वज के वाहक बने थे.


इसके बाद कतिपय स्थितियाँ ऐसी बनी कि नेताजी की सेना अपने उद्देश्य में पूरी तरह से सफल न हो सकी. खुद नेता जी के अस्तित्व को लेकर सवाल अभी तक खड़े होते रहे. ऐसे ही अनेक कारणों-कारकों के बीच 15 अगस्त 1947 को भारत से अंग्रेजी शासन का अंत हुआ. देश की बागडोर हमारे राजनेताओं के हाथों में आ गई. हम सभी देशवासी इस दिन को पूरी श्रद्धा और देशभक्ति के साथ मनाते हैं.  अपने उन अनेकानेक वीर सपूतों को याद करते हैं जिनकी कुर्बानी से हमें आजादी मिली. इसके बाद भी कहीं न कहीं हम सभी नेता जी के योगदान को विस्मृत कर देते हैं. अंग्रेजों की कैद से निकल कर विदेश जाना और वहाँ पहुँच कर तमाम देशों के सहयोग से आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन करना अपने आपमें अभूतपूर्व कार्य था. एक-दो नहीं वरन एशिया के अनेक देशों के सहयोग से नेताजी ने आजाद हिंद फौज का गठन किया. सन 1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजी सेना के साथ जापानी सेना का युद्ध चल रहा था. जापानी पूरे उत्साह के साथ नेताजी की आजाद हिंद सेना का सहयोग कर रहे थे. अंग्रेजों से लड़ते हुए जापानी सेना 1942 में अंडमान-निकोबार द्वीप समूह तक आ पहुंची और 23 मार्च 1942 को जापानी सेना ने अंडमान के द्वीपों पर कब्जा कर वहां से अंग्रेजी सेना को खदेड़ दिया. 25 अक्टूबर 1943 को नेताजी ने भी अंग्रेजी सरकार के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी थी. तब तक नेताजी सुभाषचंद्र बोस अंतरिम आजाद हिंद सरकार का गठन कर चुके थे. जापानियों के साथ नेताजी के संबंध बहुत ही घनिष्ठ बन चुके थे. अंडमान-निकोबार पर जापानियों का कब्जा हो चुका था. ऐसा सन्देश मिलते ही नेताजी ने अंडमान-निकोबार द्वीपों का दौरा करने का निश्चय किया. 

नेताजी से प्रभावित होकर तत्कालीन जापानी प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो ने 07 नवंबर 1943 को अंडमान-निकोबार द्वीपों को नेताजी की अंतरिम सरकार को सौंप दिया. इसके बाद नेताजी ने 30 दिसंबर 1943 को पहली बार अंडमान-निकोबार की धरती पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया. उन्होंने ने केवल राष्ट्रीय ध्वज फहराया बल्कि इन द्वीपों का नाम शहीद और स्वराज रखा. आज भी पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना मैदान को अब नेताजी स्टेडियम के नाम से जाना जाता है, यहाँ पर तिरंगा फहराने के बाद नेताजी ने वहां के क्रांतिकारियों, आजाद हिंद फौज के सिपाहियों तथा जनता को संबोधित करते हुए कहा था कि हिंदुस्तान की आजादी की जो गाथा अंडमान की भूमि से शुरू हुई है वह दिल्ली में वायसराय के घर पर तिरंगा फहराने के बाद ही रुकेगी.  वर्तमान में भारत सरकार द्वारा एक स्मारक का निर्माण उसी जगह पर किया गया है जहाँ कि नेताजी ने तिरंगा फहराया था. इस स्थान पर प्रतिवर्ष 30 दिसंबर को स्थानीय प्रशासन द्वारा अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. पोर्ट ब्लेयर जैसे छोटे से शहर में इस मौके पर हजारों की भीड़ का जुटना इसका परिचायक है कि अंडमान-निकोबार के निवासी सारे नेताजी को बहुत आदर के साथ याद करते हैं.

30 मार्च 2017

पहली हवाई-यात्रा से पहुँचे पोर्ट ब्लेयर : अंडमान-निकोबार यात्रा

कोई काम पहली बार किया जा रहा हो तो उसमें उत्साह, उमंग, रोमांच जैसी अनुभूति होती है. कुछ ऐसा ही हमारे साथ हो रहा था. पहली बार अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की यात्रा और पहली बार ही हवाई-यात्रा करने का अवसर हाथ आने वाला था. टिकट की बुकिंग से लेकर उसकी अन्य औपचारिकताओं के बारे में समुचित जानकारी इकठ्ठा कर मारी थी. कई वर्षों की हाँ-ना के बाद अंडमान-निकोबार जाने का कार्यक्रम बन पाया था, सो उसमें कोई अड़ंगा नहीं चाह रहे थे, किसी भी तरह का. इधर कुछ वर्षों से हमारी यात्राओं के साथ एक अजीब सा संयोग जुड़ता रहा है. कहीं भी जाने का कार्यक्रम बनाया तो उसमें किसी न किसी तरह का व्यवधान आ गया. दो बार जम्मू-कश्मीर का प्रोग्राम बनाया तो वहाँ बाढ़ के चलते नहीं जा पाए. नेपाल जाने का फ़ाइनल हो गया था तो वहाँ भूकंप ने तबाही मचा दी. इसी तरह एक साल अपनी छोटी बहिन दिव्या के पास जाने को बड़ोदा के लिए ट्रेन में बैठ भी गए तो बीच रास्ते उतरना पड़ा, वहाँ चालू हो गए हार्दिक पटेल के उत्पात के कारण. हाल ही में पहली बार अंडमान-निकोबार की यात्रा जब प्लान कर रहे थे तो उस समय भी अड़ंगा लगने जैसा माहौल बन गया था. समाचारों से पता चला कि हैवलॉक में तूफ़ान आने से बहुत सारे लोग वहाँ फँस गए हैं. तब उस कार्यक्रम को आगे बढ़ाना पड़ा. इस बार यात्रा फ़ाइनल हो गई थी. चुनावी मौसम होने के कारण बसों का चलना लगभग बंद सा था, सो झाँसी से ट्रेन पकड़ने की सुविधा के लिए कार बुक कर ली थी. इस यात्रा के लिए आरंभिक अड़ंगे रात में ही लगते दिखे, जब सोते समय अचानक गर्दन की नस खिंच गई और उसका हिलना-डुलना बंद सा हो गया. लगभग एक घंटे की मालिश, कसरत, मशक्कत के बाद गर्दन नार्मल हुई. दूसरा अड़ंगा लगता सुबह समझ आया जबकि कार ड्राईवर ने फोन पर बताया कि उसकी कार चुनाव ड्यूटी के लिए पुलिस प्रशासन ने पकड़ ली है. कोई घंटे भर बाद उसी ने अपने परिचित की निजी कार की व्यवस्था करवाई और हम लोग झाँसी के लिए निकल सके.


पहली हवाई-यात्रा का रोमांच तो हम तीनों लोगों को महसूस हो रहा था क्योंकि हम तीनों (हमारी, पत्नी निशा और बेटी परी) की ये पहली हवाई-यात्रा थी. सामान का वजन, सारे आवश्यक कागजात, पहचान-पत्र आदि सँभालकर झाँसी से दिल्ली पहुँचे. घर वालों के लिए देर रात दिल्ली उतरना चिंता का कारण बना हुआ था. इस कारण नॉएडा में रह रही छोटी बहिन रिमझिम और लखनऊ में रह रहा छोटा भाई हर्षेन्द्र फोन से लगातार संपर्क में रहे. रिमझिम ट्रेन यात्रा से ही उबेर कैब बुक करने, फिर टैक्सी से एअरपोर्ट रूट, टैक्सी किराये आदि की जानकारी देती रही. दिल्ली में कैब सम्बन्धी आरंभिक अड़ंगे से निपटते हुए देर रात लगभग दो बजे एअरपोर्ट पहुँच गए. फ्लाइट सुबह सवा सात बजे थी जिस कारण एअरपोर्ट पर सुरक्षा, चेक-इन, बोर्डिंग पास आदि औपचारिकतायें सुबह पाँच बजे के आसपास से शुरू हो जानी थी. जरा से आराम के चक्कर में सोते रह जाने के अनजान डर के कारण होटल में रुकने के बजाय एअरपोर्ट पर रुकना ज्यादा सही लगा. वहाँ पहुँचकर लाउन्ज में पड़ी तमाम कुर्सियों में से अपनी मनपसंद जगह छाँटकर उन्हीं पर पसर लिए.


सोना तो हुआ नहीं पर आराम जैसा कुछ हो गया था. बिटिया रानी भी नई जगह के उत्साह में कभी इधर-उधर टहलने लगती, कभी लेट जाती. समय होते ही हम लोग आवश्यक औपचारिकताओं को निपटाने में लग गए. सुरक्षा जाँच के समय कृत्रिम पैर के चलते अधिकारी ने हमें अलग रूम में ले जाकर जाँच की अनुमति अपने अधिकारी से माँगी. कृत्रिम पैर को अलग स्कैन मशीन से जाँचने के बाद संतुष्ट अधिकारी ने अन्दर जाने की अनुमति दे दी. उसी अधिकारी से जब हमने फोटोग्राफी करने सम्बन्धी जानकारी चाही तो उसने हँसते हुए जवाब दिया कि आप हमारी सुरक्षा व्यवस्था को छोड़कर कहीं भी फोटोग्राफी कर सकते हैं. गेट नंबर 49 से टाटा विस्तारा की फ्लाइट हम लोगों को पकड़नी थी. वहाँ बने मार्गदर्शक चिन्हों के सहारे आगे बढ़ते चले. उस समय आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता और गर्वानुभूति हुई जब अन्दर सूर्य नमस्कार मुद्राओं को दर्शाता स्मारक दिखाई दिया. सुबह की पहली किरण फूट कर बाहर उजियारा करने वाली थी और अन्दर हम लोग सूर्य नमस्कार मुद्राओं के साथ फोटोग्राफी करते हुए आलोकित हो रहे थे. गेट तक पहुँचने के लिए जगह-जगह मोबाइल प्लेटफ़ॉर्म बने हुए थे, जिन पर बिटियारानी उछल-कूद करते हुए, मस्ती करती चली जा रही थी. 



निश्चित समय पर संकेत होते ही हम लोग प्लेन में सवार हुए. क्रू मेम्बर्स के द्वारा स्वागत, समय-समय पर आवश्यक खाद्य-पदार्थों का वितरण, फ्लाइट सम्बन्धी अन्य जानकारियों का दिया जाना आदि सबकुछ व्यवस्थित, नियंत्रित सा संचालित हो रहा था. खिड़की के बाहर बादलों का रुई के फाहों की तरह कभी साथ-साथ उड़ना, कभी प्लेन के नीचे आ जाना, कभी एकदम साफ़ आसमान अद्भुत अनुभव का एहसास करा रहा था. दिल्ली से पोर्ट ब्लेयर को चली फ्लाइट को कोलकाता में थोड़ी देर रुकना था. प्लेन के उतरने के पूर्व कोलकाता की बड़ी-बड़ी ऊंची इमारतों का खिलौनों के जैसे दिखना, सड़कों, नदी आदि का किसी मानचित्र सा दिखाई देना आँखों को लुभा रहा था. कोलकाता एअरपोर्ट का नाम नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के नाम पर है. वहाँ लगे बड़े से बोर्ड पर चमकते वास्तविक नेता का नाम देखकर मन ही मन नेताजी को नमन किया. लगभग चालीस मिनट रुकने के बाद हम लोगों को लेकर प्लेन दोबारा उड़ चला. 







पोर्ट ब्लेयर उतरने के लगभग बीस-पच्चीस मिनट पहले क्रू मेम्बर्स की तरफ से ख़राब मौसम होने के संकेत देते हुए सीट बेल्ट बाँधने के निर्देश दिए गए. सामान्य स्थिति में बना हुआ प्लेन हलके-हलके से हिचकोले खाता हुआ समझ आया. उस समय प्लेन घनघोर बादलों के बीच से गुजर रहा था. आसमान में उड़ते बादलों को खिड़की के एकदम करीब महसूस करना अद्भुत था. अंडमान-निकोबार की सीमा में घुसते ही खिड़की से टापुओं की हरियाली, समुद्र का नीला-हरा रंग आँखों को आकर्षित कर रहा था. धीरे-धीरे प्लेन ने उतरना शुरू किया. बस्ती नजर आ रही थी. पोर्ट ब्लेयर की नैसर्गिक सुन्दरता अपना बखान खुद कर रही थी. लगभग साढ़े बारह बजे दोपहर में जब पोर्ट ब्लेयर में कदम रखा तो सबसे पहले उस वीर पुरुष को नमन किया जिसके नाम से पोर्ट ब्लेयर के एअरपोर्ट का नामकरण किया गया है; जिसके नाम से सेलुलर जेल के अंग्रेज अधिकारी तक भयभीत रहते थे; जिसको भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन में दो बार काला पानी की सजा सुनाई गई थी. जी हाँ, वीर सावरकर (विनायक दामोदरदास सावरकर) को प्रणाम करते हुए हम लोग एअरपोर्ट के बाहर जाने वाले गेट पर आ पहुँचे.




 छोटा भाई नीरज, बिटिया आशी के साथ प्रसन्नचित्त मुद्रा में पहले से ही मौजूद था. एअरपोर्ट पर मोबाइल ऑन करते ही सबसे पहले उसके वहाँ आ जाने सम्बन्धी कॉल मिल गई थी. छह घंटे प्लेन की (दिल्ली से पोर्ट ब्लेयर), लगभग छह घंटे ट्रेन की (झाँसी से दिल्ली), दो घंटे कार की (उरई से झाँसी) की यात्रा के साथ-साथ लगभग ढाई घंटे झाँसी रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के इंतज़ार का समय और लगभग साढ़े पाँच घंटे दिल्ली एअरपोर्ट पर रुकने का समय आदि मिलाकर लगभग बाईस घंटे की यात्रा के बाद घर पहुँचकर सुकून मिला. बहू नेहा के हाथ की बनी चाय की चुस्की संग सबके हालचाल का आदान-प्रदान करते हुए, बतियाते हुए अंडमान-निकोबार आने का वर्षों से लटका कार्यक्रम पूरा हुआ. आप लोगों को लग रहा होगा कि इतने लम्बे सफ़र के बाद भी थकान जैसी कोई बात हमने नहीं की. अरे, इतने लम्बे सफ़र की थकान को तो बिटियारानी आशी ने अपनी मीठी-मीठी, रोचक बातों से कार में ही दूर कर दिया था. 

22 मार्च 2017

समुद्र का किनारा, रोशन जहाज और पार्टी : अंडमान-निकोबार यात्रा

कार से उतरते ही सबसे पहले आँखों के आगे चार पानी के जहाज सजे हुए नजर आये. एक समुद्री तट के ठीक किनारे और बाकी तीन किनारे से थोड़ा दूर. चारों ओर अँधेरा और उस अँधेरे को चीरते जहाजों की रौशनी समुद्री लहरों के साथ अजब-अजब सी आकृतियाँ बना रही थी. दिन में नीला दिखाई देने वाला विशाल समुद्र रात के अंधकार में दूर-दूर तक काला नजर आ रहा था. आँखों में सामने सजे, समुद्र के सीने पर स्थिर जहाजों की मनमोहक रौशन छवि को कैद करते हुए उस जगह के लिए बढ़े जहाँ उस रात छोटी बेटी आशी का जन्मदिन मनाया जाना था. 



सीढ़ियाँ चढ़कर जब ऊपर पहुँचे तो अद्भुत नजारा दिखाई दे रहा था. एक तरफ रंग-बिरंगे गुब्बारों, सजावटी झालरों, रंगीन रौशनी से झिलमिलाता हॉल और दूसरी तरफ विशाल लहराता समुद्र. हाथों में कैद कर लेने भर की दूरी पर समुद्री किनारा और उस पर पर कोस्टगार्ड के जहाजों की उतराती रौशनी. ठंडी-ठंडी हवा को साथ लेकर समुद्री लहरें रौशनी के साथ ऐसे भागदौड़ करने में लगी थी मानो वे भी आशी के जन्मदिन में बच्चों के साथ खेलकूद रही हों. 



कुछ समय बाद समुद्री किनारे से थोड़ा दूर स्थिर तीनों जहाजों से आसमानी आतिशबाजी के नज़ारे दिखाई देने लगे. इधर जन्मदिन पर बिटिया रानी केक काट चुकी थी और उधर तीनों जहाजों से होती आतिशबाजी ऐसा मालूम पड़ती थी जैसे इसी ख़ुशी में हो रही हो. लाल, नीले, हरे, पीले रंग खिलकर बिखरते तो पूरा समुद्र उसी रंग में सराबोर दिखाई देने लगता.  




समुद्र से मीलों दूर रहने वाले हम लोगों के लिए सामने का नजारा अद्भुत ही कहा जायेगा जबकि हमारे छोटे भाई और जन्मदिन पर आमंत्रित लोगों के लिए ऐसे नज़ारे सामान्य सी बात थी. पोर्टब्लेयर में नेवी अधिकारी होने के नाते उसका समुद्र से याराना ही कहा जायेगा. उसी ने बताया कि कोस्टगार्ड का दिन विशेष होने के कारण इन जहाजों को सजाया जाता है. संभवतः उस दिन भी कोई विशेष आयोजन हो रहा था. एक तरफ जन्मदिन के लिए सजी हुई जगह रौशनी की जगमगाहट थी तो सामने कोस्टगार्ड के जहाजों पर भी रौशनी खिल रही थी. 




एक तरफ यहाँ भी मधुर संगीत जन्मदिन के उल्लास में झूम रहा था तो दूसरी तरफ कोस्टगार्ड ऑफिस से भी संगीत की लहरियां रह-रह कर कानों में टकरा जाती थीं. छोटे भाई के दोस्तों, उसके सहयोगियों, सीनियर्स का आना शुरू हुआ. बच्चे अपनी मस्ती में मगन थे और बड़े अपनी ही मस्ती में. खुले आसमान के नीचे पार्टी अपने यौवन पर थी. नाच-गाना, जाम टकराना, हंसी-मजाक, बच्चों का उछलना-कूदना सबकुछ आनंदित करने वाला था. सेना के अनुशासन के साथ-साथ उसकी मस्ती को सुना करते थे मगर यहाँ खुद अपनी आँखों से देख भी रहे थे. छोटे भाई के सहयोगी, मित्र, उसके सीनियर्स आदि बहुत ही आत्मीयता से मिले.  अंडमान-निकोबार की यात्रा का मन कई वर्षों से था और दिल में एक ही अभिलाषा थी सेलुलर जेल दर्शन की. इस बार जब कार्यक्रम निर्धारित हुआ तो फिर उसको ऐसे बनाया कि सबके साथ आशी का जन्मदिन मनाने का अवसर निकल आये. यहाँ सबके बीच आकर, एक अद्भुत और हम लोगों के लिए दुर्लभ नज़ारे के बीच जन्मदिन का उल्लास यात्रा की एक विशेष उपलब्धि कही जा सकती है. अपने परिवार के साथ किसी भी आयोजन का अपना आनंद है और वो आनंद तब और बढ़ जाता है जबकि सबकी तरफ से भरपूर सम्मान-आदर मिले. एक पल को लगा नहीं कि हम उन सबके बीच अजनबी से हैं. सबसे पहली मुलाकात और चंद पल की मुलाकात में ही अपनापन. सबकी अपनी मस्ती, अपना ही अलग अंदाज. बहुत-बहुत मजा आया समुद्र के किनारे की उस विशेष पार्टी का. 




बड़े भाई होने का एक तरह का ये फायदा भी रहता है कि छोटे भाई के सभी मित्र भरपूर सम्मान-आदर देते हैं. यहाँ छोटे भाई के मित्र, सहयोगी तो आदर-सम्मान दे ही रहे थे, उसके बॉस भी बड़ी गर्मजोशी से मिले. उनकी आत्मीयता देखकर एहसास ही नहीं हो रहा था कि कोई बॉस जसा व्यक्तित्व बात कर रहा है. बातचीत में, व्यवहार में अत्यंत सहज, अत्यंत मधुर. अंडमान-निकोबार को बहुत अच्छे से घूमने का बारम्बार आग्रह सा करना, भले ही एक औपचारिकता सी हो किन्तु ऐसा लगा नहीं कि वे महज औपचारिकता कर रहे हैं. वापसी में मिलते हुए विदा लेना दर्शाता है कि उनको संबंधों का निर्वहन करना बखूबी आता है. रात काफी हो चली थी. लोगों के वापस जाने का क्रम भी शुरू हो गया था. अगले दिन हम लोगों को भी हैवलॉक की यात्रा पर निकलना था सो घर वापसी की मजबूरी थी. पार्टी के सुरूर को, समुद्र के नशे को, जगमगाती रौशनी की मदहोशी को अधूरे मन से अलविदा कहते हुए वापस घर जाने को कार में बैठ लिए. अब आँखों में रंगीन समुद्र, झिलमिलाती लहरें, रोशन जहाज और पार्टी की मस्ती कैद थी, जो अगली सुबह हमारे साथ हैवलॉक चलने वाली थी. 

18 मार्च 2017

जरावा जनजाति और मड वोलकेनो : अंडमान-निकोबार यात्रा













 









अंडमान-निकोबार की नीले समुद्री जल और नैसर्गिक प्राकृतिक सुन्दरता को दिल-दिमाग में अभी पूरी तरह बसा भी नहीं पाए थे कि वहाँ से वापसी का दिन दिखाई देने लगा. लौटने से पहले उस जगह को देखने का कार्यक्रम बना जिस जगह के बारे में पहले दिन से सुनते आ रहे थे. वो जगह थी बाराटांग द्वीप, जो पोर्टब्लेयर से सौ-सवा सौ किमी से अधिक की दूरी पर है. अंडमान-निकोबार द्वीप समूह अनेक तरह की विशेषताओं से संपन्न है. बाराटांग भी अपने आपमें विशेष है. एक तो यहाँ जाने के लिए अंडमान-निकोबार की एक जनजाति जरावा के लिए आरक्षित वनक्षेत्र से गुजरना होता है, दूसरा बाराटांग में लाइम स्टोन गुफा, मड वोलकेनो (मिट्टी वाला ज्वालामुखी) जो सक्रिय अवस्था में हैं, स्पाइक द्वीप और पैरट द्वीप आदि अद्वितीय प्राकृतिक स्थल हैं. 

पोर्टब्लेयर से बाराटांग के रास्ते में जरावा जनजाति आरक्षित वनक्षेत्र होने के कारण वहाँ प्रशासनिक नियमों के अनुसार ही यात्रा करनी पड़ती है. दरअसल एकाधिक बार पर्यटकों द्वारा जरावा जनजाति के लोगों के साथ दुर्व्यवहार किये जाने और कभी-कभी जरावा जनजाति के लोगों द्वारा उन पर आक्रमण कर दिए जाने के कारण उस आरक्षित वनक्षेत्र की यात्रा को सुरक्षा निगरानी में पूरा किया जाता है. यह यात्रा दिन में केवल चार बार – सुबह छह बजे, नौ बजे, दोपहर बारह बजे और फिर तीन बजे संपन्न होती है. बाराटांग से वापसी की यात्रा इस समय के आधे घंटे बाद आरम्भ होती है. आरक्षित वनक्षेत्र की यात्रा लगभग सत्तर किमी से अधिक की है. जिसमें आज भी जरावा जनजाति के महिला-पुरुष नग्नावस्था में या फिर अल्प वस्त्रों में दिखाई दे जाते हैं. 

पोर्टब्लेयर से चिरकाटांग नामक स्थान पर पहुँच सभी गाड़ियों को एक फॉर्म में अपनी जानकारी भरकर वहाँ स्थित पुलिस चौकी में जमा करना होता है. इसके बाद ही नियत समय पर कारों, बसों का लम्बा काफिला बाराटांग को चल देता है. आरक्षित वनक्षेत्र में किसी भी गाड़ी को रुकने की अनुमति नहीं होती है और न ही किसी तरह की फोटोग्राफी करने की अनुमति है. चिरकाटांग से चला काफिला मिडिल स्ट्रेट में आकर रुकता है, जहाँ से छोटे शिप द्वारा बीस-पच्चीस मिनट की समुद्री यात्रा के द्वारा बाराटांग पहुंचा जाता है. 

हम लोग भी सुबह-सुबह चिरकाटांग पहुँच गए. बिटिया रानी अपनी आदत के अनुसार कार-यात्रा में ऊँघने की शुरुआत करते हुए नींद मारने लगती है. चिरकाटांग पहुंचकर उसे जब उठाना चाहा तो पहले तो वो अनमनी सी दिखी. उसे बताया कि हो सकता है कि जनजाति के लोग दिखें, तब भी उसे कोई फर्क महसूस न हुआ पर उसके पूछने पर जैसे ही उसे बताया कि जनजाति मतलब अर्ली मैन तो वह चैतन्य होकर बैठ गई. अपनी पाठ्यपुस्तकों में पढ़े अर्ली मैन को देखने की लालसा उसे भी जाग उठी. 

बहू द्वारा थर्मस में रख दी गई चाय का आनंद लेते हुए हमने फॉर्म में जानकारी भरने की औपचारिकताओं को निपटाया. इसके बाद हमारी कार लगभग दो सौ गाड़ियों के काफिले संग ठीक नौ बजे मिडिल स्ट्रेट के लिए चल दी. उतार-चढ़ाव भरे रास्तों में घनघोर जंगलों के बीच भागती कारों के अलावा और कुछ दिखाई नहीं देता था. दोनों तरफ घने पेड़, कभी-कभी एक तरफ गहरी खाई दिखाई देती तो कभी घना जंगल. बेटी हमारी गोद में पूरे कौतूहल के साथ जरावा जनजाति के लोगों को देखने के लिए बैठी हुई थी. चूँकि नियमानुसार कैमरा चलाना प्रतिबंधित था, सो हमने भी नियम का पालन करते हुए कैमरा, मोबाइल सब एक कोने में लगा दिए थे. 

आरक्षित वनक्षेत्र में सबसे सुखद स्थिति ये रही कि बाराटांग जाते और आते समय जरावा जनजाति के लोगों के दर्शन हो गए. जाते समय मात्र तीन व्यक्ति ही मिले जो दो अलग-अलग स्थानों पर बैठे हुए थे. चूँकि सरकारी स्तर पर तथा गैर-स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से जरावा जनजाति के लोगों को मुख्यधारा में शामिल किये जाने के प्रयास चल रहे हैं. इसके चलते उनको वस्त्र, भोजन आदि मुहैया कराया जाता है. जाते समय मिले तीन लोगों में दो पुरुष और एक महिला रहे, जो नग्नावस्था में तो नहीं मगर अल्पवस्त्रों में थे. बाराटांग से वापसी में एक दर्जन से अधिक की संख्या में जरावा लोग दिखाई दिए, जिनमें बहुतायत में नग्नावस्था में ही थे. एक हल्का इशारा करने पर ड्राईवर ने कार की गति को थोड़ा सा कम तो किया मगर रुकने की अनुमति न होने के कारण रोका जाना संभव नहीं हुआ. एकबारगी सोचा कि मोबाइल के द्वारा उनकी फोटो निकाल ली जाये किन्तु ड्राईवर के भयग्रस्त दिखाई देने के चलते ऐसा करना उचित न लगा. 

घने जंगल का आनंद लेते, खोजी निगाहों से जरावा जनजाति के लोगों को खोजते, टेढ़े-मेढ़े रास्तों से गुजरते हुए हम लोग कोई दो घंटे से अधिक की यात्रा के बाद मिडिल स्ट्रेट पहुँचे. वहाँ से छोटे शिप के द्वारा बाराटांग जाना था. मिडिल स्ट्रेट और बाराटांग के बीच शिप नियमित रूप से आवाजाही करता रहता है. हम लोगों के पहुँचने पर शिप किनारे पर लगा हुआ था. जल्दी से उसमें सवार होकर आगे की यात्रा के लिए चल दिए. मिडिल स्ट्रेट से बाराटांग की छोटी सी समुद्री यात्रा में किनारे-किनारे मैंग्रो ट्री के दृश्य मन को लुभा रहे थे. शिप पर बस का चढ़ा होना पूछा तो पता चला कि बस वहाँ से लगभग दो सौ किमी दूर मायाबंदर और डिगलीपुर तक जाती है. 

बाराटांग पहुँचकर हमारे कार ड्राईवर ने अपने परिचित एक कार वाले को पकड़ा और हम सब किनारे से लगभग पाँच-छह किमी दूर मड वोलकेनो पहुँच गए. पूरे अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में कुल ग्यारह मड वोलकेनो पाए गए हैं, जिनमें से आठ बाराटांग और मिडिल अंडमान द्वीप में हैं. जिस मड वोलकेनो को देखने हम लोग जा रहे थे वो सक्रिय है और वहाँ के लोग बताते हैं कि सुनामी के समय में उसमें भयंकर विस्फोट हुआ था. जिससे बहुत सी जगहों पर छोटे-छोटे वोलकेनो जैसे स्थल निर्मित हो गए हैं. वहाँ के कार ड्राईवर ने हम लोगों को ऐसी दो-तीन जगहें रास्ते में दिखाई. 

निर्धारित जगह पर कार से उतरने के बाद सौ मीटर से अधिक की दूरी पैदल तय करनी थी. बाँस, खजूर सहित अन्य जंगली वृक्षों की सघनता के बीच लगभग चार फुट चौड़े गलियारे में बनी मिट्टी की करीब डेढ़ सौ छोटी-छोटी सीढियाँ हमें मड वोलकेनो की तरफ ले जा रही थी. संकरे से रास्ते के दोनों तरफ लकड़ी की रेलिंग सुरक्षा की दृष्टि से लगी हुई थी. इसी रेलिंग के बाहर कई जगह बाँस की बनी कुर्सियाँ भी लगी हुई थीं. जिन पर बैठकर कुछ लोग अपनी थकान दूर करते नजर आये. संकरे रास्ते को धीरे-धीरे तय कर एक बड़े से मैदान जैसी जगह पर जब खुद को खड़े पाया तो सामने लकड़ी की बाढ़ से घिरा मड वोलकेनो क्षेत्र दिखाई दिया. 

वोलकेनो के नाम पर जैसी आकृति दिमाग में बनती है उससे इतर दृश्य वहाँ दिख रहा था. जगह-जगह छोटे-बड़े छेदों से कीचड़ निकल रहा था. कहीं-कहीं लगातार बुलबुले फूट रहे थे. बहता हुआ कीचड़, मिट्टी उसके सक्रिय और जागृत होने का प्रमाण था. तेज धूप के चलते वहाँ ज्यादा देर रुकना संभव नहीं हुआ और हम लोग वापस नीचे उतर आये. 

मड वोलकेनो के अलावा बाराटांग में लाइम स्टोन गुफा, पैरेट द्वीप आदि दर्शनीय स्थल हैं किन्तु उसके लिए कम से कम एक दिन बाराटांग में रुका जाए. चूँकि अगले दिन हमारी पोर्ट ब्लेयर से वापसी निर्धारित थी, ऐसे में बाराटांग में मड वोलकेनो के अलावा कहीं और जाना नहीं हो सका. समय की कमी न होती तो अवश्य ही बाराटांग रुककर वहाँ की नैसर्गिक सुन्दरता को आत्मसात किया जाता. 

बहुत छोटी सी जगह पर निवास कर रहे लोगों के लिए सरकारी स्तर पर पर्याप्त ख्याल रखा गया है. सरकारी परिवहन का डिपो होने के साथ-साथ माध्यमिक विद्यालय, दूरसंचार विभाग का होना इसका प्रमाण है. दोपहर का भोजन करते समय वहाँ के लोगों से बातचीत के दौरान पता चला कि वहाँ भोजन में मछली और चावल ही मुख्य रूप से खाया जाता है. 

एक साफ़-सुथरे से ढाबे पर भोजन के लिए बैठे तो हम और ड्राईवर माँसाहारी वाली निर्धारित जगह पर और पत्नी तथा बिटिया शाकाहारी वाली निर्धारित जगह पर बैठ गए. चार लोगों के लिए निर्धारित मेज पर पहले से दो लोग बैठे हुए थे. किसी और मेज पर जगह न देखकर हम दोनों लोग उसी एकमात्र खाली मेज पर जम गए. भोजन सम्बन्धी बिना किसी तरह के आर्डर के एक लड़की ने आकर हम दोनों के सामने एक-एक थाली रख दी. मेज पर पहले से ही चार कटोरे भरे हुए रखे थे, जिनमें एक में दाल, दो में सूखी सब्जी और एक में मछली रखी थी. कुछ कहते उससे पहले ही उसी लड़की ने आकर थाली में ढेर सारा चावल डाल दिया. हमने अपने ड्राईवर की तरफ देखा तो वो समझ गया और लड़की की तरफ देखकर बोला चिकन. अगले ही क्षण लड़की एक कटोरी में चिकन दे गई. ड्राईवर ने बताया कि यहाँ रोटी नहीं मिलेगी. यदि रोटी खानी होती है तो लगभग दो-तीन घंटे पहले आर्डर करना होता है. चावल, चिकन, मछली सहित अन्य भोज्यपदार्थ कितना भी लिया जा सकता है, उसका मूल्य निर्धारित है. 

धन चुकाने वाली स्थिति होने के बाद भी ढाबे पर अत्यंत विनम्रता और आतिथ्य भाव से भोजन करवाया गया. अभी तक के जीवन में हमने पहली बार वहीं चावल में चिकन या मछली के साथ दाल, आलू-गोभी आदि कि की सूखी सब्जी को मिलाकर खाते देखा. ढाबे पर भोजन करने वाले यात्रियों को किनारे तक छोड़ने की निःशुल्क सुविधा भी उपलब्ध थी. यकीनन यह कार ड्राईवर और ढाबे मालिक के बीच का कोई अनुबंध होता होगा. 

फ़िलहाल स्वादिष्ट भोजन का लुफ्त उठाने के बाद, उस ढाबे की मालकिन जिसका मायका और ससुराल दोनों ही उत्तर प्रदेश में ही थे, से बातचीत कर, उसके परिवार की, बाराटांग में बसने की जानकारी के साथ-साथ वहाँ आसपास की, वहाँ के लोगों की, रहन-सहन की कुछ और जानकारी लेते हुए हम लोग बाराटांग से वापसी करने को मिडिल स्ट्रेट, चिरकाटांग होते हुए घर के लिए पोर्ट ब्लेयर को निकल पड़े. जहाँ प्यारी सी भतीजी आशी, बहू नेहा और छोटा भाई नीरज हम लोगों का इंतज़ार कर रहे थे. 























सभी चित्र लेखक द्वारा लिए गए हैं.