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19 नवंबर 2025

Men's Day पर महिलाओं की बधाई, शुभकामना??



Women's Day पर कूद-कूद कर बधाई शुभकामना देने वाले पुरुषो, सोशल मीडिया को रंग देने वाले पुरुषो, महिलाओं की प्रोफाइल में घुस-घुस कर बधाई देने वाले पुरुषो.....

आज Men's Day पर कितनी महिलाओं ने तुमको बधाई, शुभकामना दी हैं?

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ध्यान रखो... तुम कुछ भी करो, कुछ भी करते फिरो मगर बहुतायत महिलाओं की निगाह में तुम आज भी लम्पट, कामुक, शोषक, बलात्कारी, निर्लज्ज, हिंसक, अराजक आदि-आदि ही हो.....


30 अक्टूबर 2024

दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो

दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो, यह वाक्य सुन्दरसार्थक और मनोहारी प्रतीत होता है. चारों ओर दियों की जगमगमोमबत्तियों-झालरों का सतरंगी प्रकाशरंग-बिरंगी आतिशबाजीरोशनियों के साथ फूटते पटाखे आदि अद्भुत छटा का प्रदर्शन करते हैं. बच्चोंयुवाओंबुजुर्गोंपुरुषों-महिलाओं का स्वाभाविक रूप हर्षोल्लासित होना दिखाई देता है. सभी अपनी-अपनी उमंग और मस्ती में दीपावली का आनन्द उठाते नजर आते हैं. नये-नये परिधानों में सजे-संवरे लोग एकदूसरे से मिलजुल कर समाज में समरसता का वातावरण स्थापित करते हैं. दीपावली का पर्व सभी के अन्दर एक प्रकार की अद्भुत चेतना का संचार करता है. घरों की साफ-सफाईलोगों से मिलना-जुलनामिठाई-पकवान का बनना आदि-आदि घर-परिवार के सभी सदस्यों को समवेत रूप से सहयोगात्मक कदम उठाने में मदद करता है.

 

भारतीय संस्कृति में पर्वों, त्यौहारों का महत्व हमेशा से रहा है. यहाँ की अनुपम वैविध्यपूर्ण संस्कृति में प्रकृति के अन्तर्गत मनमोहक ऋतुओं की तरह से विविध पर्व-त्यौहार भी हैं. इन त्यौहारों की विशेषता यह है कि इन्हें धार्मिकता के साथ-साथ सामाजिकता से भी परिपूर्ण बनाया गया है. ये पर्व धार्मिक संदेशों के मध्य से सामाजिक सरोकारों की, सामाजिक संदर्भों की, समरसता की, सौहार्द्र की, भाईचारे की भी प्रतिस्थापना करते हैं. इसका उद्देश्य यही है कि इनके द्वारा सामाजिकता का विकास हो, सामाजिक सरोकारों की भी स्थापना होती रहे. दीपावली के संदर्भ में ही देखें तो इसके आने के कई-कई दिनों पूर्व से घर के कार्यों को आपसी सहयोग से सम्पन्न करना, उत्सव के दिन सभी से मिलने-जुलने का उपक्रम किसी भी रूप में असामाजिकता का संदेश देता नहीं दिखता है.

 



वर्तमान में स्थितियों में कुछ परिवर्तन हुआ है. सहजता और सरलता का प्रतीक पर्व अब चकाचौंध के वशीभूत होता जा रहा है. भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण, औद्योगीकरण जैसी भारी-भरकम वैश्विक शब्दावली के बीच दीपावली का उद्देश्य सेल्युलाइड दुनिया के पीछे संकुचित, भयभीत खड़ा दिखाई देता है. इस आभासी दुनिया का दुष्परिणाम है कि अब आकाश को छूने के लिए उड़ते रॉकेट को देखकर बच्चों की तालियाँ, खिलखिलाती हँसी नहीं दिखती वरन् मोबाइल के पीछे सेल्फी लेने वाले हाव-भाव दिखाई पड़ते हैं. कृत्रिम चकाचौंध और औपचारिकता में हमारे रिश्ते-नाते, हमारे सामाजिक सरोकार भी तिरोहित हुए हैं. मिठाई के पैकेट स्वयं को तुच्छ और गरिमाहीन सा महसूस करने लगते हैं जब किसी ब्रांडेड कम्पनी की चाकलेट का डिब्बा खुलकर मुँह चिढ़ाने लगता है. बच्चों के हाथों में झूमती रंगीन फुलझड़ी एकाएक मद्विम पड़ जाती है जैसे ही उसके सामने कोई विदेशी आतिशबाजी अपने अस्तित्व का विस्तार करने लगती है. मँहगे से मँहगे संसाधनों का उपयोग करके हम दीपावली नहीं मनाते हैं बल्कि अपने आसपास के वातावरण में अपनी सत्तात्मक स्थिति को स्थापित करने का कार्य करते हैं. इस तरह की सोच के कारण समाज से समरसता और भाईचारे जैसी स्थितियों का विलोपन होता जा रहा है. सौहार्द्र को भी बाजारीकरण का रंग चढ़ जाता है; सद्भावना भी झिलमिलाती पॉलीपैक में बिकने लगती है; भाईचारा भी किसी यूज एण्ड थ्रो जैसी बोतल मे चमकदार पेय पदार्थ सा चमकने लगता है. ऐसे में हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो?

 

नैराश्य के इस वातावरण के बाद भी; कृत्रिम चकाचौंध के बीच भी; दीपावली का एक ही दीपक अंधियारे को मिटाने हेतु संकल्पित रहता है. हमें भी उसी दीपक की तरह से स्वयं को इन विपरीत स्थितियों के बाद भी, सामाजिक सरोकारों के विध्वंसपरक हालातों के बाद भी दीपमालिके का स्वागत तो करना ही है. बाजारीकरण में गुम सी हो चुकी भारतीयता में भी प्रस्फुटन सा दिखता है जो हमें जागृत करता है कुछ करने को; एक प्रकार के आवरण को गिराने को; असामाजिकता को मिटाने को; सामाजिक सरोकारों की स्थापना को. इसके लिए हमें सर्वप्रथम स्वयं से ही आरम्भ करना होगा. भारीभरकम खर्चों के बीच, मँहगी से मँहगी आतिशबाजी को उड़ाते समय एकबारगी हम उन बच्चों के बारे में भी विचार कर लें जो कहीं दूर सिर्फ इनकी रोशनियाँ देखकर ही अपनी दीपावली मना रहे होंगे. उन बच्चों के बारे में भी एक पल को सोचें जो कहीं दूर किसी कचरे के ढेर से जूठन में अपना भोजन तलाशते हुए अपने पकवानों की आधारशिला का निर्माण कर रहे होंगे. यह नहीं कि हम दीपावली पर अपने उत्साह को, अपनी उमंग को व्यर्थ गुजर जाने दें पर कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि कल को एकान्त में, तन्हा बैठने पर हमें स्वयं के कृत्यों से शर्मिन्दा न होना पड़े; हमें अपने एक बहुत ही छोटे से कदम से हमेशा प्रसन्नता का एहसास होता रहे; अपनी खुशी से दूसरे बच्चों में, और लोगों की खुशी में वृद्धि का भाव जागृत होता रहे.

 

हमें दीपमालिके के स्वागत में एक-एक दीप प्रज्ज्वलित करते समय इस बात को ध्यान में रखना होगा कि इसका प्रकाश सिर्फ और सिर्फ हमारे घर-आँगन तक ही नहीं अपितु समाज के उस कोने-कोने को भी आलोकित कर दे जिस कोने में अंधेरा वर्षों से अपना कब्जा कायम रखे है. उजाले की एक सकारात्मक किरण ही भीषणतम अंधेरे को मिटाने की शक्ति से आड़ोलित रहती है, बस हम ही संकल्पित हों और पूरे उत्साह से, उमंग से परिवर्तन का, समरसता का दीपक प्रज्ज्वलित करने का विश्वास अपने में कर लें. आप स्वयं एहसास करेंगे कि आपका मन स्वतः स्फूर्त प्रेरणा से दीपमालिके का स्वागत करने को तत्पर हो उठेगा. 

31 दिसंबर 2023

वर्ष का दुखद अंत... कष्टकारी आरम्भ

दिसम्बर का अंतिम दिन पूरी तरह से समाप्त भी नहीं हो पाता है कि लोगों के द्वारा नए वर्ष के शुभकामना संदेशों का आना शुरू हो जाता है. इधर जबसे सोशल मीडिया मंचों की बाढ़ आई है, उस पर लोगों का अधिकाधिक समय गुजरना शुरू हुआ है तबसे फोन के द्वारा बधाई, शुभकामना देने का चलन कम से कमतर हो गया है. फोन आने भले कम हो गए हों मगर संदेशों का सैलाब आकर मोबाइल के अन्दर तबाही सी मचा जाता है. फोन के द्वारा और मैसेज के द्वारा बधाई संदेशों के आने में बहुत बड़ा अंतर होता है. इस अंतर का समझ में आना उस समय और भी गहराई से महसूस होता है जबकि यहाँ भी औपचारिक और अनौपचारिक संबंधों जैसी स्थिति बनी हो.




हर हाथ में मोबाइल की स्थिति में और सामाजिक क्षेत्र में सक्रियता की स्थिति ने सभी को एक-दूसरे से जोड़ रखा है. ये और बात है कि इस जुड़ाव को कौन कितना शिद्दत से महसूस कर रहा है.अक्सर ऐसे लोग, जिनसे कि बहुत आत्मीय सम्बन्ध भी नहीं होते हैं वे फोन के द्वारा बातचीत करके खुद को आपका सबसे ख़ास बताने को आतुर रहते हैं. इसी तरह वे लोग जिनको ये एहसास होता है कि आपके जीवन में उनका क्या महत्त्व है वे दो-चार शब्दों के साथ ही अपनी बात को समाप्त करते हुए रिश्तों की गंभीरता को बनाये रखते हैं.


इसी गंभीरता और अगम्भीरता के दर्शन कुछ वर्ष पहले हुए थे जबकि नए साल का स्वागत हम अपने परिजन को विदाई देते हुए कर रहे थे. यह अजब सी असामान्य सी स्थिति थी. एक तरफ रिश्ते की मर्यादा, गंभीरता तो दूसरी तरफ सामाजिकता का निर्वहन. अजब सी असमंजस वाली स्थिति थी. समझ में नहीं आ रहा था कि किस तरह से खुद में समन्वय बनाया जाये. असमय बारिश भरे मौसम में अपने आँसुओं को बारिश की बूँदों के साथ मिलाते-बहते हुए एक तरफ पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन किया जा रहा था, दूसरी तरफ औपचारिकता में बंधे रिश्ते के कारण अगले ही पल सामाजिकता का भी निर्वहन करना पड़ रहा था. प्रयागराज की पावन धरती पर श्वसुर साहब की अंतिम यात्रा से लेकर उनके अंतिम संस्कार तक खुद को संयमित रखते हुए परिवार को दिलासा देने का काम भी हो रहा था वहीं दूसरी तरफ नए वर्ष की शुभकामनाओं, बधाइयों को भी सहेजने का काम किया जा रहा था.


समय बहुत कुछ दिखाता है, सिखाता है बशर्ते हम लोग उससे सीखना चाहें. उस वर्ष के जाते हुए दिन ने और आने वाले दिन ने एकसाथ बहुत कुछ सिखाया. 

आदरणीय श्वसुर साहब को सादर श्रद्धांजलि..




 

25 अक्टूबर 2022

मिट जाएँ सबके अँधेरे




बहुत से काम औपचारिकता में करने पड़ते हैं. कुछ ऐसा ही काम अब त्योहारों-पर्वों पर शुभकामनायें देना लगने लगा है. अब बहुत कुछ होने के बाद भी एक खालीपन स्पष्ट दिखाई देता है. एक ऐसा इंतजार जो कभी समाप्त नहीं होना है मगर वह बना रहता है. इस खालीपन के साथ, एक इंतजार के साथ मन को, दिल को समझाया जाता है. दिल सब जानता है, मन सब समझता है इसके बाद भी इस सत्य को स्वीकारने की इच्छा नहीं होती है. 

सब कुछ जानने-समझने के बाद भी एक रिक्तता के साथ एक इंतजार. 

दीपावली सबके अँधेरे मिटाकर उनके जीवन में उजाला लाए. 



 

22 अक्टूबर 2022

दीपमालिके के स्वागत में एक दीप प्रज्ज्वलित करें

असतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतम् गमय यह वाक्य एक तरफ सत्य की तरफ जाने का सन्देश देता है वहीं साथ में अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रेरणा देता है. चारों ओर दीपों की कतारमोमबत्तियों-झालरों का सतरंगी प्रकाशरंग-बिरंगी आतिशबाजीविविध आवाजों-रोशनियों के साथ फूटते पटाखे, सभी अपने आप में अद्भुत छटा का प्रदर्शन करते हैं. बच्चों कायुवाओं काबुजुर्गों कापुरुषों-महिलाओं का हर्षोल्लासित होना स्वाभाविक सा दिखाई देता है. सभी अपनी-अपनी उमंग और मस्ती में दीपावली का आनन्द उठाते नजर आते हैं. नये-नये परिधानों में सजे-संवरे लोग एकदूसरे से मिलजुल कर समाज में समरसता का वातावरण स्थापित करते हैं. दीपावली का पर्व सभी के अन्दर एक प्रकार की अद्भुत चेतना का संचार करता है. घरों की साफ-सफाईलोगों से मिलना-जुलनामिठाई-पकवान का बनना आदि-आदि घर-परिवार के सभी सदस्यों को समवेत रूप से सहयोगात्मक कदम उठाने में मदद करता है.


भारतीय परम्परा मेंसंस्कृति में पर्वोंत्यौहारों का महत्व हमेशा से रहा है. यहां जितनी अनुपम वैविध्यपूर्ण प्रकृति में मनमोहक ऋतुएं हैंठीक उसी तरह से विविधता धारण किये पर्व-त्यौहार भी हैं. इन त्यौहारों की विशेष बात यह रही है कि इन्हें धार्मिकता से जोड़ने के साथ-साथ सामाजिकता से भी परिपूर्ण बनाया गया है. ये पर्व धार्मिक संदेशों के मध्य से सामाजिक सरोकारों कीसामाजिक संदर्भों कीसमरसता कीसौहार्द्र कीभाईचारे की भी प्रतिस्थापना करते दिखाई देते हैं. होना भी यही चाहिए किसी भी पर्व काकिसी भी अनुष्ठान का उद्देश्य मात्र स्वयं को प्रसन्न रखने की स्थिति में नहीं होना चाहिए. हमारा उद्देश्य सदैव यही हो कि हमारे कदमों से सामाजिकता का विकास हो हीसामाजिक सरोकारों की भी स्थापना होती रहे. दीपावली के संदर्भ में ही देखें तो इसके आने के कई-कई दिनों पूर्व से घर के कार्यों को आपसी सहयोग से सम्पन्न करनाउत्सव के दिन सभी से मिलने-जुलने का उपक्रम किसी भी रूप में असामाजिकता का संदेश देता नहीं दिखता है.




इधर सामाजिक स्थितियों में कुछ परिवर्तन सा महसूस होता है. सहजता और सरलता का प्रतीक पर्व अब बाह्य आडम्बर और चकाचौंध भरी स्थितियों के वशीभूत होता समझ में आता है. यदि हम अपने आसपास के परिदृश्य का अवलोकन करें तो तमाम सारी प्राकृतिक स्थितियों के साथ-साथ कृत्रिमता का विकास होता भी समाज में दिखाई देता है. भूमण्डलीकरणवैश्वीकरणऔद्योगीकरण जैसी भारी-भरकम वैश्विक शब्दावली ने पर्वों-त्यौहारों की सहजतासरलता को विखण्डित सा कर दिया है. कृत्रिम चकाचौंध और औपचारिकता की भेंट हमारे पर्व ही नहीं चढ़े हैं वरन् हमारे रिश्ते-नातेहमारे सामाजिक सरोकार भी तिरोहित हुए हैं. गरिमामयी रिश्तों की गर्मजोशी अचानक ही हिम प्रशीतक की भांति लगने लगती है.  


त्यौहार अब नितांत औपचारिकताओं में सिमटाए जाने लगे हैं. संबंधों मेंरिश्तों में पहले की तरह गर्माहट नहीं दिखाई देती हैबाज़ारों में अपनत्व कम कटुता ज्यादा देखने को मिलने लगी है विदेशी सामानों के बीच आज भी कई-कई छोटे बच्चे-बच्चियाँ साँचे में ढले गणेश-लक्ष्मीमिट्टी के दिएरुईमोमबत्तियाँ आदि बेचते दिखते हैं. मशीनों से निर्मित चमकते-दमकते गणेश-लक्ष्मी की भव्य मूर्तियों के आगे स्टाइलिश दीयों के आगेडिजाइनर मोमबत्तियों के सामनेअजब-गजब रूप से चमक बिखेरती झालरों के सामने इनका अंधकार ज्यों का त्यों रहता है. हर एक पटाखे के फूटने के साथहर एक दिया रौशनी बिखेरने के साथहर बार और अकेले त्यौहार मनाने के साथ एहसास होता है कि मंहगाई सामानों में ही नहीं आई है संबंधों मेंरिश्तों में भी आई है. अंधकार सिर्फ अमावस की रात को ही घना नहीं हुआ है बल्कि अपनत्व मेंस्नेह में भी घनीभूत होकर छा गया है. काले आसमान में रौशनी बिखेरती आतिशबाजीघर की छत पर चमक बिखेर कर शांत हो जाते दिएमकान की दीवारों से लिपटी विदेशी झालरें अपनी क्षणभंगुर चमक से एक पल को तो अंधकार दूर कर देती हैं किन्तु समाज में लगातार बढ़ते जाते अंधकार को दूर नहीं कर पा रही हैं.


नैराश्य के ऐसे वातावरण के बाद भीकृत्रिम चकाचौंध के बीच भीदीपावली का एक ही दीपक अंधियारे को मिटाने हेतु संकल्पित रहता है. हमें भी उसी दीपक की तरह से स्वयं को इन विपरीत स्थितियों के बाद भीसामाजिक सरोकारों के विध्वंसपरक हालातों के बाद भी दीपमालिके का स्वागत तो करना ही है. बाजारीकरण में गुम हो चुकी भारतीयता में भी प्रस्फुटन सा दिखता है जो हमें जागृत करता है कुछ करने कोएक प्रकार के आवरण को गिराने कोअसामाजिकता को मिटाने कोसामाजिक सरोकारों की स्थापना को. इसके लिए हमें सर्वप्रथम स्वयं से ही आरम्भ करना होगा. भारीभरकम खर्चों के बीचमंहगी से मंहगी आतिशबाजी को उड़ाते समय एकबारगी हम उन बच्चों के बारे में भी विचार कर लें जो कहीं दूर सिर्फ इनकी रोशनियां देखकर ही अपनी दीपावली मना रहे होंगे. उन बच्चों के बारे में भी एक पल को सोचें जो कहीं दूर किसी कचरे के ढेर से जूठन में अपना भोजन तलाशते हुए अपने पकवानों की आधारशिला का निर्माण कर रहे होंगे. यह नहीं कि हम दीपावली पर अपने उत्साह कोअपनी उमंग को व्यर्थ गुजर जाने दें पर कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि कल को एकान्त मेंतन्हा बैठने पर हमें स्वयं के कृत्यों से शर्मिन्दा न होना पड़ेहमें अपने एक बहुत ही छोटे से कदम से हमेशा प्रसन्नता का एहसास होता रहेअपनी खुशी से दूसरे बच्चों मेंऔर लोगों की खुशी में वृद्धि का भाव जागृत होता रहे. हमें दीपमालिके के स्वागत में एक-एक दीप प्रज्ज्वलित करते समय इस बात को ध्यान में रखना होगा कि इसका प्रकाश सिर्फ और सिर्फ हमारे घर-आंगन तक नहीं अपितु समाज के उस कोने-कोने को भी आलोकित कर दे जिस कोने में अंधेरा वर्षों से अपना कब्जा कायम रखे है. उजाले की एक सकारात्मक किरण ही भीषणतम अंधेरे को मिटाने की शक्ति से आड़ोलित रहती हैबस हम ही संकल्पित हों और पूरे उत्साह सेउमंग से परिवर्तन कासमरसता का दीपक प्रज्ज्वलित करने का विश्वास अपने में कर लें. आप स्वयं एहसास करेंगे कि आपका मन स्वतः स्फूर्त प्रेरणा से दीपमालिके का स्वागत करने को तत्पर हो उठेगा.

 





 

31 दिसंबर 2020

सम्मान करना तो सीख लो

किसी-किसी बात को लेकर, किसी-किसी बिन्दु को लेकर लोगों में एक तरह की भेड़चाल देखने को मिलती है। इधर नया साल आने को होता है वैसे ही ये दिखाई देने लगती है। सोशल मीडिया के बहुत से मंचों पर दिन भर इसी तरह की जुगाली होने लगती है। हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान को मानने, स्वीकारने की बात करते हुए अंग्रेजी नववर्ष को न मनाने की चर्चा चल पड़ती है। अंग्रेजी नववर्ष न मनाने एक बात है पर शुभकामनाओं का आदान-प्रदान भी न करना एक दूसरी बात है। 

नववर्ष आयोजन का तात्पर्य पार्टी, खाने-पीने, आतिशबाजी करने, रात भर कार्यक्रम करने से है और जरूरी नहीं कि सभी को यह करना ही हो। बहुत से लोग हैं जो इस तरह के आयोजन न तो करते हैं और न ही ऐसे किसी आयोजन का हिस्सा बनते हैं, इसके बाद भी ये लोग नववर्ष की शुभकामनाएँ लेने, देने में पीछे नहीं रहते हैं। इन लोगों में ऐसे लोग भी होते हैं जो हिन्दी नववर्ष का आयोजन पूरे उत्साह और जोश में करते हैं। 



अंग्रेजी नववर्ष का मनाना या न मनाना निजी मामला है। हिन्दी नववर्ष का मनाना, न मनाना निजी मसला होने के साथ-साथ संस्कार, संस्कृति का मामला है। ये अच्छी बात है कि आधुनिकता अपनाने के बाद भी अपनी संस्कृति, संस्कार को भुलाया न जाए। इसी बिन्दु पर आकर यही बात भी प्रभावी हो जाती है कि जिस स्थिति का, जिस कैलेंडर का सभी लोग साल भर उपयोग करते हों, दिन में बीसियों बार अंग्रेजी तिथि को बोलते, लिखते, उपयोग करते हों उस नववर्ष के आने पर शुभकामनाओं के आदान-प्रदान पर नकारात्मक नौटंकी क्यों?

ऐसे लोग गौर करें कि वे अपने काम करते समय किस तिथि का, किस कैलेंडर का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं? आज ही उन्होंने कौन सी तिथि लिखी, बोली होगी, पौष कृष्ण प्रतिपदा, विक्रम संवत् २०७७ या गुरुवार 31 दिसम्बर 2020? जब हर जगह इसी अंग्रेजी कैलेंडर का इस्तेमाल किया जाता है तो इसके बदलने पर, नया अंग्रेजी साल आने पर शुभकामनाओं के आदान-प्रदान से परहेज का नाटक अच्छी मानसिकता नहीं है। आप रात भर न जागें, आधी रात से विश करने न जुटें, रात भर पार्टी न करें, रात भर दारू-मुर्गा न करें पर जिससे दिन भर, साल भर काम चलाते हैं उस अंग्रेजी कैलेंडर का, उस अंग्रेजी साल का सम्मान अवश्य करें। 


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वंदेमातरम्

12 नवंबर 2020

शुभ हो धनतेरस

दीपमालिके पर्व का शुभारम्भ होते ही मन हर्षित, प्रफुल्लित हो उठता है। मूलतः आज धनतेरस तिथि से इसका आयोजन आरम्भ हो जाता है। 

आप सभी को धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएँ 

धनतेरस शुभ हो 

मंगलकामना कि आप सभी के जीवन में खुशियों की रोशनी चमके।

30 मई 2020

जुड़वाँ नजर आते थे हम कभी-कभी

आज हमारे जीजा जी-जिज्जी की वैवाहिक वर्षगाँठ है. 46 वर्ष हो गए इस शुभ अवसर को और देखिये हम भी इस संख्या से कोई आठ महीने आगे ही हैं. उम्र का इतना बड़ा अंतर होने के कारण जीजा जी से मजाकिया रिश्ता होने के बाद भी कभी मजाक जैसी स्थिति में नहीं आ सके. उनकी तरफ से जरूर अनेक अवसरों पर मजाक किया जाता रहा मगर हम बस हँसकर उस मजाक का जवाब दे लेते. उनसे बात करने की हिम्मत भी उस घटना के बाद हुई जो हमारे जीवन की सबसे बड़ी घटना है. उसके पहले तो हाँ-हूँ, जी-जी के साथ गिने-चुने शब्दों में बातचीत हो जाया करती थी. बड़ी बहिन की उम्र कितनी भी हो वह माँ समान स्थिति में ही रहती है. कितनी भी बड़ी हो फिर भी मित्रवत ही रहती है. कुछ ऐसा ही रिश्ता है जिज्जी के साथ हमारा भी. उनके साथ भी बातचीत भले ही बहुत ही मर्यादित रूप में होती हो किन्तु कहीं न कहीं वे माँ के रूप में हमारे जीवन में नजर आती हैं. उनके साथ गुजरे कुछ पल भी हमारे लिए बहुत अनमोल हैं. उनके पास जाने पर उनके द्वारा एक-एक पल में हमारा ध्यान रखना आज तक याद है. दुर्घटना के समय में और उसके बाद जिज्जी और जीजा जी का लगातार साथ खड़े रहना, हमारी हिम्मत बने रहना, हमारी सुविधा से जुड़ी सम्बंधित एक-एक स्थिति पर बारीकी से नजर रखना आज भी ज्यों का त्यों बना हुआ है.



बहरहाल, यदि जीजा जी और जिज्जी के हमारे प्रति व्यवहार पर लिखने बैठ गए तो कई-कई वर्ष कम पड़ेंगे इसलिए उस बात पर आते हैं, जिसके लिए यह पोस्ट लिखनी आरम्भ की है. जैसा कि इस पोस्ट का आरम्भ उनकी वैवाहिक वर्षगाँठ से किया था तो आपको फिर से बताते चलें कि उनका विवाह सन 1974 में हुआ, उस समय हम मात्र आठ माह के हुए थे. सितम्बर 1974 में हम एक साल के होते. स्पष्ट है कि आठ महीने वाला बालक कितना बड़ा होगा. लोगों की गोद हमारा खेल का मैदान हुआ करती थी. उस पर भी यदि ननिहाल की जमीन हो तो फिर क्या कहने. उस पर भी सोने में सुहागा ये कि हमारी अम्मा जी कई-कई भाइयों के बीच अकेली बहिन हुआ करती थीं और ऐसे में हम ही एकमात्र भांजे, एकमात्र नाती हुआ करते थे अपने मामाओं-मामियों के, नानाओं-नानियों के. उन दिनों बारात का रुकना कोई आज के जैसे कुछ घंटों के लिए तो होता नहीं था. जीजा जी भी बारात लेकर आये और बारात का रुकना तीन-चार दिन के लिए हुआ.

अब मामा-मामियों के लाड़ में हम दूबरे हुए जा रहे थे. सुबह से शाम तक हम कितने-कितने लोगों के लिए खिलौना बनते कहा नहीं जा सकता. जिसके हाथ में आते वह अपनी तरह से हमें सजाने-संवारने में लग जाता. राजशाही सा जलवा बना हुआ था. कोई एक कपडा दोबारा तो धारण करना ही नहीं होता था. ऐसे में कई बार हम लड़कों की पोशाक में नजर आते तो कई बार फ्रॉक में. एक बार देखने वाला तो जरूर धोखा खा जाये कि अभी लड़के को देखा था या लड़की को. ऐसे में जीजा जी का धोखा खा जाना भी स्वाभाविक है. उन्होंने तो हमें बस अपनी वैवाहिक परम्पराओं, संस्कारों का निर्वहन करते ही देखा था. विदाई पश्चात् जब वे गाँव पहुँचे तो उन्होंने जिज्जी से अपनी शंका का समाधान करना चाहा. उनके मन में हम अकेले नहीं वरन जुड़वाँ के रूप में विद्यमान थे, एक लड़का और एक लड़की के रूप में. जिज्जी ने भी उनको परेशान न करते हुए शीघ्र ही समस्या से बाहर निकाल लिया.

इस फोटो की कहानी फिर कभी 

ऐसा ही संशय, धोखा उस शादी में काम करते हुए हलवाइयों के बीच भी उपस्थित हो गया था. हमारे एक मामा जी उस समय होटल चलाया करते थे. उन्हीं के सारे कर्मचारी शादी में पकवान बनाने, खाना बनाने के काम में लगे हुए थे. उन्हीं में एक हलवाई हमें मनोज के नाम से पुकारा करते थे. वे हमें खूब खिलते भी थे. शादी के बाद भी वे हमसे मिलने घर आते रहे. शादी के किसी दिन किसी के प्यार-स्नेह के वशीभूत हम लड़कियों के कपड़ों में नजर आने लगे. हमारे रोने की आवाज़ सुनकर उन्हीं हलवाई ने अपने किसी कर्मी को आवाज़ देकर कहा कि मनोज के रोने की आवाज़ आ रही है, उठा लाओ. उनके अधीन काम करने वाला व्यक्ति जाए और खाली हाथ लौट आये. उसके लौटने का कारण इतना होता कि वहाँ मनोज नहीं कोई लड़की रो रही है. ऐसा जब दो-तीन बार हुआ तो वे हलवाई खुद उठकर आँगन तक आये. वे समझ गए कि उनका कर्मचारी क्यों नहीं पहचान पा रहा है हमें. उसके बाद उन्होंने सबसे कह दिया कि जब तक वे लोग वहाँ हैं कोई हमें फ्रॉक वगैरह न पहनाए.

अम्मा अक्सर ये यादें हम सबके बीच बाँटती रहती हैं. आज अपने भांजे की पोस्ट देखी तो ये सबकुछ फिर से आँखों के आगे घूम गया.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

14 फ़रवरी 2020

एक-दूजे के हमसफ़र बने नेत्रहीन दिव्यांग

14 फरवरी, समाज में बहुतायत लोगों के लिए वेलेंटाइन डे का परिचायक बना हुआ है. वेलेंटाइन के बारे में बिना जाने-समझे विपरीत-लिंगी एक-दूसरे को लुभाने में लगे हुए हैं. बहरहाल, समाज में सबकी अपनी स्वतंत्र सोच है, अपना स्वतंत्र अस्तित्व है जो कुछ भी मानने, मनाने के लिए मुक्त है. इसी दिन वर्ष 2019 में पुलवामा में आतंकी हमले में देश ने अपने अनमोल नगीने सदा-सदा को खो दिए थे. अनेक परिवारों के चिराग हमेशा-हमेशा को खामोश हो गए थे. आज का दिन बहुत से लोग उनको याद करते हुए मनाने में व्यस्त हैं. यह भी व्यक्ति की अपनी स्वतंत्रता, अपनी इच्छा के कारण ही है. वैसे भी हरेक दिन किसी न किसी के लिए बुरा होता है, किसी के लिए अच्छा. कोई दिन विशेष को सुख के लिए सदैव याद रखता है तो कोई उस दिन विशेष के दुःख में सदैव आंसू बहाता रहता है. आज जब लोग कहीं पुलवामा के शहीदों को याद करते हुए उनको नमन कर रहे थे, कहीं-कहीं लोग वेलेंटाइन के नाम पर प्रेम की तलाश में भटक रहे थे उसी समय उरई शहर के हुलकी माता मंदिर में दो इंसान दाम्पत्य जीवन में प्रवेश कर रहे थे, एक नई राह पर चलते हुए नवजीवन का आधार निर्मित कर रहे थे. 



दाम्पत्य जीवन में तो रोज ही अनेक लोग बँधते हैं, नित्य ही अनेक लोग नवजीवन का आरम्भ करते हैं मगर आज इस वैवाहिक आयोजन के अपने ही मायने थे. मंदिर प्रांगण की पावनता के बीच संपन्न होने वाले वैवाहिक आयोजन में स्वतः ही एक तरह की पावनता, मधुरता झलक रही थी. दाम्पत्य जीवन में प्रवेश करने वाले दोनों इंसान दुनिया को बजाय देखने के महसूस करते हैं, उसका एहसास करते हैं. जी हाँ, उरई शहर में संचालित होने वाले अंध-विद्यालय के नेत्रहीन शिक्षक तेजपाल आज विवाह के बंधन में बंधे. सुजाता उनकी जीवन-संगिनी बनी जो वर्तमान में तकनीकी शिक्षा में अध्ययनरत हैं. इसे संयोग कहा जाये या कुछ और कि सुजाता भी तेजपाल की तरह ही दुनिया को देखने के स्थान पर महसूस करती हैं. सुजाता का परिवार मध्य प्रदेश के जबलपुर में निवास करता है, जिनका मूल कार्य मजदूरी करना है. तकनीकी शिक्षा के अध्ययन के दौरान सुजाता की मित्रता अपनी ही तरह एक नेत्रहीन नीता से हुई जिसके द्वारा उनकी राह उरई में निवास कर रहे तेजपाल तक चली आई. असल में नीता का विवाह विगत वर्ष मई में नेत्रहीन शिक्षक रामसूरत के साथ हुआ. रामसूरत और तेजपाल एकसाथ अध्ययन करते रहे हैं और उरई ने अंध-विद्यालय में एकसाथ रहे भी हैं. मित्रता का ध्रुव बजाय एकपक्षीय रहने के द्विपक्षीय रहा. उधर सुजाता और नीता मित्र थीं इधर तेजपाल और रामसूरत मित्र थे. दोनों के प्रयासों से दोनों परिवार मिले और बात अंततः विवाह पर आकर संपन्न हुई.




उरई के हुलकी माता मंदिर के प्रांगण में दिन में गायत्री परिवार के रीति-रिवाजों के साथ तेजपाल और सुजाता का विवाह संपन्न हुआ. इस विवाह में न केवल दोनों के परिजन शामिल हुए वरन अंध-विद्यालय के बच्चे, शिक्षक, कर्मचारी सहित नगर के अनेक गणमान्य नागरिक और प्रशासनिक अधिकारियों में सर्वसुलभ और अत्यंत सहज-सरल अपर जिलाधिकारी भी शामिल हुए. एक विशेष बात यह भी रही कि वर्तमान में अमेठी में कार्यरत रामसूरत और उनकी पत्नी नीता भी अपने मित्रों के वैवाहिक समारोह में सम्मिलित होने अपने परिजनों संग उपस्थित हुए. तेजपाल और सुजाता की भावी राह सुखमय रहे यही कामना है.



बाँए से - गणेश शंकर त्रिपाठी, नीता, रामसूरत (पति-पत्नी), कुमारेन्द्र 

01 जनवरी 2020

नववर्ष की औपचारिकता


लोगों का उत्साह, लोगों की उमंग, लोगों की आकुलता देखकर लग रहा है जैसे उन सभी लोगों के लिए जाने वाला साल सकारात्मक रहा होगा या फिर उनके द्वारा अपने आपसे सोचे गए कार्य अधिकतम रूप में सफलता को प्राप्त किये होंगे. यदि ऐसा नहीं है तो फिर नए साल के स्वागत के लिए, उसके आने के लिए इतना उत्साह क्यों? आपस में शुभकामना संदेशों का इतना तीव्र आदान-प्रदान क्यों? सबसे पहले मैं की तर्ज़ पर 2019 के रहते-रहते नववर्ष शुभकामना संदेशों का आदान-प्रदान क्यों? नए साल का स्वागत करना एक परम्परा सी बन गया है. यह भी आज के दौर में एक तरह की औपचारिकता बन गई है. सोशल मीडिया के इस तकनीक भरे युग में यह भी जबरदस्त औपचारिकता हो गई है. पुराने वाले साल में ही शाम से ही मोबाइल-कम्यूटर पर बैठकर दुनिया भर को शुभकामना सन्देश भेज कर अपने आपको सामाजिकता की श्रेणी में सबसे आगे लाकर साल भर के लिए किसी भी व्यावहारिकता से मुक्त कर लेते हैं.

इस तरह की औपचारिकता के बीच हम आज तक यह नहीं समझ सके हैं कि आखिर नए साल की शुभकामनाओं के आदान-प्रदान करने के पीछे का मुख्य मकसद क्या होता है? क्या वाकई हम सभी दिल से एक-दूसरे को शुभकामनायें देते हैं या फिर इसे भी महज औपचारिकता में निपटा लेते हैं? क्या वाकई हमारी शुभकामनायें या दूसरे की शुभकामनायें हमारे लिए शुभ होती हैं? बिना यह जाने कि बीता हुआ साल या फिर तमाम बीते साल किस तरह और कितने शुभ निकले, कितनी खुशियों भरे निकले हम सभी औपचारिकता में लिपट कर बस शुभकामना देने-लेने में लगे हुए हैं. क्या इस बार भी हम सभी ऐसा कर चुके हैं? क्या इस बार भी हम सभी बिना सही-गलत सोचे महज औपचारिकता में बहे जा रहे हैं?

फिलहाल, आज नए साल के आगमन पर ऐसा कुछ भी कहना-सुनना किसी को पसंद नहीं आएगा. जैसी कि औपचारिकता है, उसी का पालन आपके लिए हम भी किये जाते हैं, अपने एक शुभकामना सन्देश के साथ--

सूर्य रश्मियाँ स्वर्णिम-मधुरिम,
आनंदित कर दें घर-आँगन.
सुख, समृद्धि, वैभव, खुशियों संग,
वर्ष नया रहे मनभावन.


06 अप्रैल 2019

मंगलमय ही नव संवत्सर 2076




आज भले ही सारे काम अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार किये जाते हों मगर इसके निर्माण के 57 वर्ष पूर्व राजा विक्रमादित्य के काल में भारतीय वैज्ञानिकों ने भारतीय कैलेंडर विकसित कर लिया था. इस भारतीय या कहें कि हिन्दू कैलेंडर का आरम्भ हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से माना जाता है. इसके अलावा बारह महीनों का एक वर्ष और सात दिनों का एक सप्ताह रखने का प्रचलन भी विक्रम संवत से ही शुरू हुआ था. इस कैलेण्डर में महीने का हिसाब सूर्य और चंद्रमा की गति पर आधारित है. विक्रम कैलेंडर की इसी धारणा को बाद में यूनानियों के माध्यम से अरब और अंग्रेजों ने अपनाया. इसी कैलेण्डर के आधार पर भारत के अन्य राज्यों ने भी अपने-अपने कैलेंडर का निर्माण किया. 

चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरम्भ होने वाले वर्ष को नव संवत्सर भी कहते हैं. संवत्सर के पाँच प्रकार- सौर, चंद्र, नक्षत्र, सावन और अधिमास हैं. विक्रम संवत में इन सभी का समावेश है. मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क आदि सौरवर्ष के माह हैं. यह वर्ष भी 365 दिनों का होता है. इसमें वर्ष का प्रारंभ सूर्य के मेष राशि में प्रवेश से माना जाता है. चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ आदि चंद्रवर्ष के माह हैं. चंद्र वर्ष 354 दिनों का होता है, जो चैत्र माह से शुरू होता है. सौरमास 365 दिन का और चंद्रमास 355 दिन का होने से प्रतिवर्ष 10 दिन का अंतर आ जाता है. इन दस दिनों को चंद्रमास ही माना जाता है.  समय के साथ ऐसे बढ़े हुए दिनों को मलमास या अधिमास कहते हैं. चंद्र वर्ष में चंद्र की कलाओं में वृद्धि होती है तो यह बारह के स्थान पर तेरह माह का हो जाता है. जब चंद्रमा शुक्ल प्रतिपदा के दिन से बढ़ना शुरू करता है तभी से हिंदू नववर्ष की शुरुआत मानी गई है.
आप सभी को नव संवत्सर की शुभकामनायें.

28 मार्च 2019

अन्तरिक्ष तक सर्जिकल स्ट्राइक संभव


कल, 27 मार्च को जब डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम आईलैंड लॉन्च कॉम्पलेक्स से रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन (DRDO) की एक मिसाइल ने बतौर परीक्षण एक सैटेलाइट को मार गिराया तो भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया जो अंतरिक्ष में सैटेलाइट को मार गिराने की क्षमता रखते हैं. भारत से पहले अभी तक यह क्षमता रूस, अमेरिका और चीन के पास थी. यह एक एंटी-सैटेलाइट मिसाइल परीक्षण था, जिसे मिशन शक्ति नाम दिया गया. इसके लिए DRDO के बैलेस्टिक मिसाइल डिफेंस इंटरसेप्टर का इस्तेमाल किया गया. यह मौजूदा बैलेस्टिक मिसाइल रक्षा कार्यक्रम का हिस्सा है. इस मिशन में जिस सैटेलाइट को निशाना बनाया गया, वह निचली कक्षा में घूम रहा था. यह परीक्षण इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारत ने इसके जरिये यह साबित किया है कि वह अपनी टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से बाहरी अंतरिक्ष में किसी सैटेलाइट को निशाना बना सकता है. चूँकि हमारा पड़ोसी देश चीन बहुत पहले यह क्षमता विकसित कर चुका है ऐसे में भारत पर काफी दबाव था. यह सत्य किसी से छिपा नहीं है कि आज की दुनिया में पारंपरिक हथियारों से शत्रु का मुकाबला नहीं किया जा सकता है और वह भी तब जबकि पड़ोसी देशों से आपके संबंध अच्छे नहीं हों. ऐसे में देश की तरफ से किया गया यह परीक्षण भारतीय रक्षा शक्ति को कई गुना मजबूत करता है. 


यह सफलता केवल उल्लेखनीय नहीं वरन गौरवपूर्ण है. इस सफल परीक्षण के द्वारा भारत जमीन, हवा, पानी के साथ-साथ अन्तरिक्ष में भी अपने दुश्मनों से निपटने में सक्षम हो गया है. ऐसी आशंका लम्बे अरसे से जताई जाती रही है कि आगामी युद्ध, यदि कभी हुआ तो, वह धरती, हवा या जल में लड़ने के बजाय बहुत हद तक संभावित है कि अन्तरिक्ष में हो. ऐसा नहीं कि युद्ध करने वाले देशों के द्वारा अन्तरिक्ष में सेना भेजकर वहाँ युद्ध किया जायेगा वरन जिस तरह से सम्पूर्ण विश्व आज तकनीक के हाथों से संचालित होने लगा है, आम आदमी से लेकर सरकारों तक के कार्यों में अन्तरिक्ष में तैर रहे सेटेलाईट मददगार बन रहे हैं उस स्थिति में किसी भी देश को सैकड़ों वर्ष पीछे भेजने के लिए उसके उपग्रह को नष्ट कर देना ही बहुत है. इस तरह की सम्भावना कपोल-कल्पना नहीं और न ही टीवी पर दिखाए जाने वाले स्टार वार्स जैसे कार्यक्रम हैं बल्कि वास्तविकता है. इस वास्तविकता को समझने की आवश्यकता है, जिसे भारत ने समय रहते समझने का प्रयास ही नहीं किया बल्कि उस पर अमल भी किया.

इस परीक्षण के बाद जैसी कि अपेक्षा थी, विपक्ष ने सरकार पर धावा सा बोल दिया. ऐसा दावा किया जाने लगा कि इस तरह का परीक्षण पिछली सरकार में किया जा चुका है, अब मोदी ऐसा बस चुनावों में लाभ लेने के लिए खोखला सन्देश दे रहे हैं. यहाँ समझने की आवश्यकता है कि पिछली सरकार में ऐसे किसी परीक्षण का सिद्धांत प्रस्तुत किया गया था. इसे खुद रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन के आला अधिकारियों द्वारा भी सामने लाया गया. बहरहाल, वर्तमान समय राजनीति के जाल में देश की इस उपलब्धि को फँसाना नहीं है वरन सभी वैज्ञानिकों को बधाई देने का है. वैश्विक स्तर पर आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए सभी देश किसी न किसी तरह के कदमों को उठाते रहते हैं, ऐसे में भारत द्वारा महाशक्ति बनने की राह में उठाया गया यह कदम निश्चित ही भारतीय सामरिक शक्ति को विश्वसनीय पहचान देगा.

15 मार्च 2019

आ गए हमारे भांजे श्री


हम सभी लोग हॉस्पिटल की पहली मंजिल पर बने बरामदे के बाहर बैठे हुए थे. हॉस्पिटल में बैठे होने के बाद भी किसी के चेहरे पर तनाव नहीं था. सभी को खुशखबरी का इंतजार था. वहाँ बैठे हम लोगों में कुछ देर बाद कोई पापा बनने वाला था, कोई नाना-नानी बनने वाला था और हम मामा बनने वाले थे. छोटी बहिन दीपू की पहली संतति संसार में आँखें खोलने का इंतजार कर रही थी. ऐसे खुशनुमा माहौल में हमारे बहनोई साहब थोड़ा व्याकुल से नजर आ रहे थे. उनकी व्याकुलता जहाँ ऑपरेशन को लेकर थी वहीं वे अपने पापा जी के वहां न दिखाई पड़ने से भी चिंतित दिख रहे थे. इसी बीच बहनोई साहब कुछ प्रसन्न सी मुद्रा में और भी ज्यादा आकुलता से अपने पापा को खोजने लगे. ऑपरेशन थियेटर की तरफ से प्रसव सुरक्षित होने का इशारा मिला तो हम सब ख़ुशी से झूम उठे. दरवाजे पर नर्सों की एक झलक पाकर उनसे होने वाले बच्चे के बारे में जानना चाहा, उसके स्वास्थ्य के बारे में जानना चाहा, बच्चा लड़का है या लड़की जानना चाहा पर वे मुस्कुराकर अन्दर चली गईं. संभवतः बहनोई साहब ने उनको न बताने के लिए कह रखा था. उसके पीछे का कारण ये भी समझ आया कि वे सबसे पहले इस खुशखबरी को अपने पापा को देना चाहते होंगे. उनसे भी जानने की कोशिश की तो वे हाथ उठाकर मुस्कुराते हुए पापा की खोज में नीचे उतर गए.


सब्र यहाँ किसी को नहीं था, आखिर हम भी मामा बन रहे थे. चाचा-चाची भी नाना-नानी बन रहे थे. बहनोई साहब के नीचे उतरते ही हम बरामदे से लगे बगल के कमरे में घुसे. इसी कमरे से ऑपरेशन थियेटर का रास्ता जाता था, जो नर्सिंग होम के स्टाफ द्वारा उपयोग किया जाता था. जिन नर्सों की झलक दिखाई पड़ी थी, उनमें से दो वहीं बैठी थीं. हमने थोड़ी तेज आवाज़ में कहा, कहाँ है बच्चा? भोपाल शहर की आबोहवा में बुन्देलखण्ड की तेज़ आवाज़ सुनकर वे शायद सहम सी गईं. ये जानते-समझते ही हमने उनसे कहा कि हम बच्चे के सबसे बड़े मामा हैं. उसमें से एक नर्स ने मुस्कुराकर रुकने का इशारा किया. अगले पल ही वो अपनी गोद में नन्हे से भांजे को लेकर प्रकट हो गई. उसके हाथ से हमने अपने हाथों में लेकर कोमल, मुलायम, मासूम से अपने भांजे को एक निगाह जी भर कर देखने के बाद उसे उसी नर्स के सुरक्षित हाथों में सौंप दिया. ख़ुशी जैसे रोम-रोम से प्रकट हो रही थी. पर्स से कुछ रुपये निकालकर नवजात शिशु की न्योछावर करके नर्स से कहा कि किसी कामवाली बाई को दे देना. एक नर्स ने हँसकर कहा कि क्या मामा जी, हमने भांजे के दर्शन करवाए, हमें कोई नजराना नहीं? बिना कुछ कहे, मुस्कुराकर उन तीनों को भी यथोचित नजराना देकर हम बाहर आ गए. 

इसी दौरान बहनोई साहब अपने पापा जी को लेकर मिठाई सहित आ गए. उनके पापा जी गहरी धार्मिक आस्था वाले सुकोमल, सहृदय व्यक्ति हैं. वे उसी समय से नर्सिंग होम के पास बने एक छोटे से मंदिर के सामने ध्यानमग्न होकर भगवान की साधना में बैठ गए थे जैसे ही दीपू को ऑपरेशन थियेटर ले जाया गया था. जिस समय हम अन्दर अपने भांजे को देख रहे थे, उसी समय बहनोई साहब ने आकर नवजात शिशु के लड़का होने की बात सबको बताई. हमें गायब देखकर हमारे बारे में वे पूछ ही रहे थे कि हमने अन्दर से आकर सबको आश्चर्य में डाल दिया कि हम सबसे पहले अपने भांजे से मिल आये. 

हमारे भांजे श्री आज भी हम सबके अत्यंत प्रिय हैं. यह संयोग ही कहा जायेगा कि उसके जन्म के कुछ समय बाद छोटी बहिन दीपू की ट्रेनिंग उरई रहकर ही पूरी हुई और फिर उसकी नियुक्ति भी उरई के नजदीक उन्नाव में हो गई. इससे भी नियमित रूप से भांजे श्री से हम सबका संपर्क बना रहा. बचपन के साथ-साथ अपना कैशौर्य भी ननिहाल वालों के साथ गुजारने के कारण भी वे हम सबके प्रिय बने हुए हैं. बुन्देलखण्ड में मामा-भांजे का जो रिश्ता है, उस रिश्ते के चलते वो सारे मामाओं की हँसी-मजाक का शिकार भी बनता है. इसका एक उदाहरण हमारे द्वारा किया गया उसका नामकरण भी है. सबके द्वारा बुलाये जाने वाले सनय सिंह अपने जन्म से ही हमारे द्वारा कल्लू सिंह पुकारे जा रहे हैं, अभी भी इसी नाम से पुकारे जाते हैं. आज हमारे भांजे श्री पूरे पंद्रह वर्ष के हो गए, उसको आशीर्वाद, शुभकामनायें.

25 जनवरी 2019

स्व-प्रचार बिना समाजसेवा


ऐसे बच्चों को जिनकी नाक बह रही हो, कपड़े मैले-कुचैले हों, खुद भी धूल से सने हों, उनकी अवस्था देखकर लगता हो कि कई दिन से नहाये नहीं हैं, हम भी, आप भी अपने किसी कार्यक्रम में आमंत्रित नहीं करते हैं.


ऐसे बच्चे कभी गलती से हम लोगों द्वारा आयोजित भोज में दिख जाते हैं तो हम उनके ऊपर एहसान सा करते हुए किसी नौकर के द्वारा भोजन पहुँचवा देते हैं. उन्हें अपने भोज में साथ बिठाकर भोजन नहीं करवाते हैं.


'सुभाष भवन' के उद्घाटन के अवसर पर आँखें खोलने वाला दृश्य आँखों के सामने गुजर रहा था. ऐसे बच्चे जिनको हम आमतौर पर देखना पसंद नहीं करते, उनसे बात करना पसंद नहीं करते. वे सभी साथ बैठकर भोज का आनंद ले रहे थे.


जो बच्चे अपनी अवस्था के कारण भोजन करने में असमर्थता व्यक्त कर रहे थे, उन्हें विशाल भारत संस्थान के बच्चे अपने हाथों से भोजन करवा रहे थे.


राजीव जी आप वाकई अनुकरणीय कार्य कर रहे हैं. आपके कार्यों को देखते हुए आज से हम अपने साथ 'सामाजिक कार्यकर्त्ता' जैसा विशेषण लगाना, लगवाना बंद करवाते हैं. हम सब कहीं न कहीं स्व-प्रचार का काम कर रहे हैं. आपको और आपके साथ जुड़े सभी लोगों को हार्दिक वंदन.

13 जनवरी 2019

देश के पहले अंतरिक्ष यात्री को जन्मदिन की शुभकामनायें


सन 1984 को जब देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पूछने पर कि अंतरिक्ष से भारत कैसा लगता है, तब सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा का जवाब देने वाले भारत के पहले अन्तरिक्ष यात्री राकेश शर्मा आज, 13 जनवरी को सत्तरवीं उड़ान की तरफ अग्रसर हैं. उनका जन्म 13 जनवरी 1949 को पंजाब के पटियाला में हुआ था. उन्होंने अपनी सैनिक शिक्षा हैदराबाद में ली थी. पायलट बनने की इच्छा रखने वाले राकेश शर्मा भारतीय वायुसेना द्वारा टेस्ट पायलट भी चुन लिए गए. 20 सितम्बर 1982 को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा तत्कालीन सोवियत संघ की अंतरिक्ष एजेंसी इंटरकॉस्मोस के अभियान के लिए चुना गया.


2 अप्रैल 1984 के रूप में वह ऐतिहासिक दिन आया जबकि सोवियत संघ के बैकानूर से सोयूज टी-11 अंतरिक्ष यान ने तीन अंतरिक्ष यात्रियों- राकेश शर्मा, अंतरिक्ष यान के कमांडर वाई०वी० मालिशेव और फ़्लाइट इंजीनियर जी० एम स्ट्रकोलॉफ़- के साथ उड़ान भरी. सोयूज टी-11 ने इन तीनों अंतरिक्ष यात्रियों को सोवियत रूस के ऑबिटल स्टेशन सेल्यूत-7 में पहुँचा दिया. राकेश शर्मा विश्व के 138वें अंतरिक्ष यात्री बने. उन्होंने सात दिन स्पेस स्टेशन पर बिताए. इन सात दिनों में उन्होंने 33 प्रयोग किए. सेल्यूत-7 में रहते हुए भारत की कई तस्वीरें उतारीं.  

अंतरिक्ष मिशन पूर्ण हो जाने के बाद भारत सरकार ने राकेश शर्मा और उनके दोनों अंतरिक्ष साथियों को अशोक चक्र से सम्मानित किया. इसके साथ-साथ उन्हें हीरो ऑफ़ सोवियत यूनियन सम्मान से भी विभूषित किया गया था. विंग कमाडर के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद राकेश शर्मा हिन्दुस्तान एरोनेट्किस लिमिटेड में टेस्ट पायलट के तौर पर कार्य करते रहे. सन 2006 में राकेश शर्मा को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की समिति में सदस्य के रूप में शामिल किया गया.

राकेश शर्मा जी के जन्मदिन पर उनको हार्दिक शुभकामनाएं.

02 जनवरी 2019

बाजार के हाथों में संवेदनाएँ


चलिए, कुछ देर बाद नए साल का नया दिन गुजरने वाला है. सभी ने खूब दम से एक-दूसरे को बधाई-शुभकामनायें दीं. ऐसा लगा जैसे इस बार सबकुछ अच्छा-अच्छा होने वाला है. एहसास सुखद प्रतीत होता है कि अब सबकुछ अच्छा, सुखद होने वाला है. इसके बाद भी जब आँख खुलती है तो समझ आता है कि ऐसा कुछ नहीं है. सब कुछ ज्यों का त्यों बना हुआ है, सबकुछ वैसा ही चल रहा है जैसा अभी तक चलता आ रहा था. इस सम्बन्ध में अपनी अइया यानि दादी की एक बात याद आती है. देश के आज़ाद होने के समय की बात बताते हुए वे अक्सर बताया करती थीं कि कुछ दिनों से घर में, पड़ोस में बराबर बातचीत होती कि देश आज़ाद होने वाला है. पंद्रह अगस्त की सुबह सभी जगह चहल-पहल मची हुई थी, गलियों में लोग उल्लासित से दिखाई दे रहे थे, एक शोर सा था कि देश आज़ाद हो गया. अइया बताती हैं कि उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि कुछ तो बदला नहीं फिर इस आज़ादी का क्या मतलब है. सब कुछ तो वैसा ही दिख रहा है जैसा कल रात को सोते समय दिखा था. यह सही भी है. देश आज़ाद हुआ था मगर न तो अंग्रेज एकदम से गायब हो गए थे और न ही कोई नई व्यवस्था एकदम से सामने दिखाई देने लगी थी. कुछ ऐसा ही नए साल के उल्लास में दिखाई देता है. 


न कुछ बदलता है, न बदलता दिखाई देता है सिवाय एक कैलेण्डर के, सिवाय एक तारीख के, सिवाय एक महीने. इसके बाद भी उल्लास ऐसा जैसे कोई अभूतपूर्व परिवर्तन हो गया हो. ऐसा उत्साह लोगों में जैसे कोई अनोखा बदलाव देखने को मिलने वाला हो. ऐसी उमंग लोगों में जैसे कोई अजब सा माहौल आने वाला हो. हल्ला-गुल्ला, हंगामा, बाइक रेस के बीच ऐसा कुछ नहीं दिखाई दिया जो कल नहीं था. इसके बाद भी अनोखा नशा देखने को मिलता है. ऐसा लगता है जैसे व्यक्तिगत रूप से कोई परिवर्तन आने वाला है. देखा जाये यही बाजार की शक्ति है जो अपने हाथों में इन्सान को संभाले है. अब सबकुछ बाजार के हाथों से संचालित होता है. इसी बाजार के हाथों में अब दिन-महीने-पर्व-आयोजन हैं. इसी का उदाहरण है ये नववर्ष और आने वाले महीनों में और भी दिन इसी का उदाहरण बनेंगे. तो आइये, बिना कुछ जाने-सोचे-समझे बाजार के हाथों की कठपुतली बनकर उमंग में डूब जाएँ, उल्लास में उतरायें. ये साल भी मनाएँ, आने वाला साल भी मनाएँ.

31 दिसंबर 2018

बीते साल के अधूरे काम पूरे करने हैं


कुछ पलों के बाद वर्ष 2018 हमसे दूर चला जायेगा और नया साल 2019 हमारे सामने आ जायेगा. हम सब बीते साल को भुलाते हुए नए साल के स्वागत में जुट जायेंगे. लोगों के द्वारा आतिशबाजी, पटाखे चलाया जाना शुरू होगा. एक-दूसरे को बधाई देने-लेने का, शुभकामनायें लेने-देने का काम चलता रहेगा. इस दौरान हम लोग एक पल को भी याद नहीं करते बीते साल को. जबकि हमें याद रखना चाहिए कि हम जिस पल का स्वागत कर रहे हैं वही पल अगले ही पल पुराना होने वाला है, बीत जाने वाला है. ऐसे में जबकि एक आने वाला पल अगले ही पल पुराना होने वाला हो, बीत जाने वाला हो तब हम सभी को खुशियों के बीच बीते साल में अपने गुजारे गए पलों को नहीं भूलना चाहिए. शेष लोग क्या करते हैं, क्या नहीं इसका अंदाजा तो कतई नहीं है पर हम व्यक्तिगत रूप से नित्य ही अपने पूरे दिन का आकलन रात को सोने के ठीक पहले करते हैं. एक-एक दिन का आकलन भले ही छोटा लगे मगर इसके द्वारा अपनी गलतियों, कमियों को सीखने-सुधारने का मौका मिलता है. इसके बाद भी हमारे लिए ही हम कह सकते हैं कि कई गलतियाँ, कई कमियां अभी भी हमारे भीतर हैं, बनी हुई हैं. 


एक-एक दिन के आकलन को जोड़-जोड़ कर साल भर का आकलन बताता है कि हमारे साथ अभी भी बहुत कुछ ऐसा है जो सुधारने की आवश्यकता है. अपने अन्दर की कमियों को बहुत हद तक दूर करने की कोशिश रहती है, बहुत हद तक इसमें सफल भी रहते हैं मगर फिर भी कुछ है जो अभी सुधारा नहीं जा सका है. नए बदलते कैलेण्डर के साथ बहुत से इरादे सामने होते हैं, कई सारे वादे खुद से किये जाते हैं, बहुत से संकल्प किये जाते हैं. इस जाने वाले साल में हमने अपने आपसे दो-चार वादे किये थे, दो-चार संकल्प किये थे. इनमें से पूरी तरह से सफलता तो किसी में नहीं मिली हाँ कुछ-कुछ काम अवश्य हुए हैं. ऐसे में इस नए साल में क्या संकल्प होगा, क्या वादा होगा पता नहीं. आने वाले साल में इसका भी ध्यान रखा जायेगा कि किसी की भावनाओं से खिलवाड़ न हो. जाने-अनजाने संभवतः ऐसा हो जाता है. दिल-दिमाग कभी नहीं चाहता है कि किसी का अहित किया जाये, किसी की भावना का अपमान किया जाये. इस साल अपने कुछ कार्यों से लगा कि ऐसा नहीं किया जाना था. यदि अपने आपमें अनुशासित रहते, अपने आपको संयमित रखते तो निश्चित ही बहुत कुछ नियंत्रित रखा जा सकता था. इसके बाद भी कहा जा सकता है कि किसी की भावनाओं से खिलवाड़ करना उद्देश्य कतई नहीं रहता है. आने वाले कुछ दिन अपने को विश्लेषित करने का समय है. कुछ नया करने, सोचने के पहले इस जाने वाले साल में जो अधूरा रह गया है उसे पूरा करने का काम किया जायेगा. 

ऐसा इसलिए क्योंकि यदि अपने स्तर पर इस साल का आकलन करें तो ऐसा कुछ भी नहीं पाया जिसे उपलब्धि कहा जा सके. ऐसा कुछ भी नहीं किया गया जिससे विश्वास में और वृद्धि की जा सके. ऐसा कुछ नहीं किया गया जिसके द्वारा अपने आपमें भी गर्व किया जा सके. बहुत कुछ मन में है, बहुत कुछ दिमाग में है उसे पूरा करने का हौसला जुटाना है. अपने प्रति बनती-बिगड़ती तमाम धारणाओं के बीच खुद को स्थापित करना है. विश्वास-अविश्वास के बीच की बारीक रेखा को मिटाते हुए विश्वास का माहौल खड़ा करना है. सफलता-असफलता के बीच भटकते हुए बस सफलता की मंजिल को प्राप्त करना है. हाँ, विगत अनेक वर्षों की तरह ही यह वर्ष भी जाते-जाते दुखी करके गया. ऐसा एक-दो सालों से नहीं हो रहा वरन पिछले न जाने कितने साल ऐसे बीते जिनमें साल जाते-जाते दुखी कर जाता है, कष्ट दे जाता है. इस बार भी हुआ मगर, ये जीवन है यहाँ इसी अनिश्चितता के बीच सबकुछ गुजारना होता है. यह साल तो गुजर जाने वाला है, आने वाला साल भी अपनी अवधि पूरी करके गुजर जायेगा. जाते साल में जो-जो उपलब्धियाँ आप सबको मिली उसके लिए शुभकामनायें. जो काम अधूरे रह गए, उनके आने वाले साल में पूरा होने की कामना.