19 नवंबर 2025
Men's Day पर महिलाओं की बधाई, शुभकामना??
01 जुलाई 2025
30 अक्टूबर 2024
दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो
दीपमालिके तेरा
आना मंगलमय हो, यह वाक्य सुन्दर, सार्थक और मनोहारी प्रतीत होता है. चारों ओर दियों की जगमग, मोमबत्तियों-झालरों का सतरंगी प्रकाश, रंग-बिरंगी आतिशबाजी, रोशनियों के साथ फूटते पटाखे आदि अद्भुत छटा
का प्रदर्शन करते हैं. बच्चों, युवाओं, बुजुर्गों, पुरुषों-महिलाओं का स्वाभाविक रूप
हर्षोल्लासित होना दिखाई देता है. सभी अपनी-अपनी उमंग और मस्ती में दीपावली का
आनन्द उठाते नजर आते हैं. नये-नये परिधानों में सजे-संवरे लोग एकदूसरे से मिलजुल
कर समाज में समरसता का वातावरण स्थापित करते हैं. दीपावली का पर्व सभी के अन्दर एक
प्रकार की अद्भुत चेतना का संचार करता है. घरों की साफ-सफाई, लोगों से मिलना-जुलना, मिठाई-पकवान का बनना आदि-आदि घर-परिवार के
सभी सदस्यों को समवेत रूप से सहयोगात्मक कदम उठाने में मदद करता है.
भारतीय संस्कृति में
पर्वों, त्यौहारों का महत्व हमेशा
से रहा है. यहाँ की अनुपम वैविध्यपूर्ण संस्कृति में प्रकृति के अन्तर्गत मनमोहक ऋतुओं
की तरह से विविध पर्व-त्यौहार भी हैं. इन त्यौहारों की विशेषता यह है कि इन्हें धार्मिकता
के साथ-साथ सामाजिकता से भी परिपूर्ण बनाया गया है. ये पर्व धार्मिक संदेशों के मध्य
से सामाजिक सरोकारों की, सामाजिक
संदर्भों की, समरसता की,
सौहार्द्र की, भाईचारे की भी प्रतिस्थापना करते हैं. इसका उद्देश्य
यही है कि इनके द्वारा सामाजिकता का विकास हो, सामाजिक सरोकारों की भी स्थापना होती रहे. दीपावली के
संदर्भ में ही देखें तो इसके आने के कई-कई दिनों पूर्व से घर के कार्यों को आपसी सहयोग
से सम्पन्न करना, उत्सव के दिन
सभी से मिलने-जुलने का उपक्रम किसी भी रूप में असामाजिकता का संदेश देता नहीं दिखता
है.
वर्तमान में स्थितियों
में कुछ परिवर्तन हुआ है. सहजता और सरलता का प्रतीक पर्व अब चकाचौंध के वशीभूत होता
जा रहा है. भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण,
औद्योगीकरण जैसी भारी-भरकम वैश्विक शब्दावली
के बीच दीपावली का उद्देश्य सेल्युलाइड दुनिया के पीछे संकुचित, भयभीत खड़ा दिखाई देता है. इस आभासी दुनिया का
दुष्परिणाम है कि अब आकाश को छूने के लिए उड़ते रॉकेट को देखकर बच्चों की तालियाँ,
खिलखिलाती हँसी नहीं दिखती वरन् मोबाइल
के पीछे सेल्फी लेने वाले हाव-भाव दिखाई पड़ते हैं. कृत्रिम चकाचौंध और औपचारिकता में
हमारे रिश्ते-नाते, हमारे सामाजिक
सरोकार भी तिरोहित हुए हैं. मिठाई के पैकेट स्वयं को तुच्छ और गरिमाहीन सा महसूस करने
लगते हैं जब किसी ब्रांडेड कम्पनी की चाकलेट का डिब्बा खुलकर मुँह चिढ़ाने लगता है.
बच्चों के हाथों में झूमती रंगीन फुलझड़ी एकाएक मद्विम पड़ जाती है जैसे ही उसके सामने
कोई विदेशी आतिशबाजी अपने अस्तित्व का विस्तार करने लगती है. मँहगे से मँहगे संसाधनों
का उपयोग करके हम दीपावली नहीं मनाते हैं बल्कि अपने आसपास के वातावरण में अपनी सत्तात्मक
स्थिति को स्थापित करने का कार्य करते हैं. इस तरह की सोच के कारण समाज से समरसता और
भाईचारे जैसी स्थितियों का विलोपन होता जा रहा है. सौहार्द्र को भी बाजारीकरण का रंग
चढ़ जाता है; सद्भावना भी झिलमिलाती
पॉलीपैक में बिकने लगती है; भाईचारा
भी किसी यूज एण्ड थ्रो जैसी बोतल मे चमकदार पेय पदार्थ सा चमकने लगता है. ऐसे में हम
कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो?
नैराश्य के इस वातावरण
के बाद भी; कृत्रिम चकाचौंध के
बीच भी; दीपावली का एक ही दीपक
अंधियारे को मिटाने हेतु संकल्पित रहता है. हमें भी उसी दीपक की तरह से स्वयं को इन
विपरीत स्थितियों के बाद भी, सामाजिक
सरोकारों के विध्वंसपरक हालातों के बाद भी दीपमालिके का स्वागत तो करना ही है. बाजारीकरण
में गुम सी हो चुकी भारतीयता में भी प्रस्फुटन सा दिखता है जो हमें जागृत करता है कुछ
करने को; एक प्रकार के आवरण को
गिराने को; असामाजिकता को मिटाने
को; सामाजिक सरोकारों की स्थापना
को. इसके लिए हमें सर्वप्रथम स्वयं से ही आरम्भ करना होगा. भारीभरकम खर्चों के बीच,
मँहगी से मँहगी आतिशबाजी को उड़ाते समय
एकबारगी हम उन बच्चों के बारे में भी विचार कर लें जो कहीं दूर सिर्फ इनकी रोशनियाँ
देखकर ही अपनी दीपावली मना रहे होंगे. उन बच्चों के बारे में भी एक पल को सोचें जो
कहीं दूर किसी कचरे के ढेर से जूठन में अपना भोजन तलाशते हुए अपने पकवानों की आधारशिला
का निर्माण कर रहे होंगे. यह नहीं कि हम दीपावली पर अपने उत्साह को, अपनी उमंग को व्यर्थ गुजर जाने दें पर कम से
कम इतना तो कर ही सकते हैं कि कल को एकान्त में, तन्हा बैठने पर हमें स्वयं के कृत्यों से शर्मिन्दा न
होना पड़े; हमें अपने एक बहुत ही
छोटे से कदम से हमेशा प्रसन्नता का एहसास होता रहे; अपनी खुशी से दूसरे बच्चों में, और लोगों की खुशी में वृद्धि का भाव जागृत होता
रहे.
हमें दीपमालिके के
स्वागत में एक-एक दीप प्रज्ज्वलित करते समय इस बात को ध्यान में रखना होगा कि इसका
प्रकाश सिर्फ और सिर्फ हमारे घर-आँगन तक ही नहीं अपितु समाज के उस कोने-कोने को भी
आलोकित कर दे जिस कोने में अंधेरा वर्षों से अपना कब्जा कायम रखे है. उजाले की एक सकारात्मक
किरण ही भीषणतम अंधेरे को मिटाने की शक्ति से आड़ोलित रहती है, बस हम ही संकल्पित हों और पूरे उत्साह से,
उमंग से परिवर्तन का, समरसता का दीपक प्रज्ज्वलित करने का विश्वास
अपने में कर लें. आप स्वयं एहसास करेंगे कि आपका मन स्वतः स्फूर्त प्रेरणा से दीपमालिके
का स्वागत करने को तत्पर हो उठेगा.
26 अगस्त 2024
31 दिसंबर 2023
वर्ष का दुखद अंत... कष्टकारी आरम्भ
दिसम्बर का अंतिम दिन पूरी तरह से समाप्त भी नहीं हो पाता है कि लोगों के द्वारा
नए वर्ष के शुभकामना संदेशों का आना शुरू हो जाता है. इधर जबसे सोशल मीडिया मंचों
की बाढ़ आई है, उस पर
लोगों का अधिकाधिक समय गुजरना शुरू हुआ है तबसे फोन के द्वारा बधाई, शुभकामना देने का चलन कम से कमतर हो गया है. फोन आने भले कम हो गए हों
मगर संदेशों का सैलाब आकर मोबाइल के अन्दर तबाही सी मचा जाता है. फोन के द्वारा और
मैसेज के द्वारा बधाई संदेशों के आने में बहुत बड़ा अंतर होता है. इस अंतर का समझ
में आना उस समय और भी गहराई से महसूस होता है जबकि यहाँ भी औपचारिक और अनौपचारिक
संबंधों जैसी स्थिति बनी हो.
हर हाथ में मोबाइल की स्थिति में और सामाजिक क्षेत्र में सक्रियता की स्थिति
ने सभी को एक-दूसरे से जोड़ रखा है. ये और बात है कि इस जुड़ाव को कौन कितना शिद्दत
से महसूस कर रहा है.अक्सर ऐसे लोग, जिनसे कि बहुत आत्मीय सम्बन्ध भी नहीं होते हैं वे फोन के द्वारा बातचीत
करके खुद को आपका सबसे ख़ास बताने को आतुर रहते हैं. इसी तरह वे लोग जिनको ये एहसास
होता है कि आपके जीवन में उनका क्या महत्त्व है वे दो-चार शब्दों के साथ ही अपनी
बात को समाप्त करते हुए रिश्तों की गंभीरता को बनाये रखते हैं.
इसी गंभीरता और अगम्भीरता के दर्शन कुछ वर्ष पहले हुए थे जबकि नए साल का
स्वागत हम अपने परिजन को विदाई देते हुए कर रहे थे. यह अजब सी असामान्य सी स्थिति
थी. एक तरफ रिश्ते की मर्यादा, गंभीरता तो दूसरी तरफ सामाजिकता का निर्वहन. अजब सी असमंजस वाली स्थिति
थी. समझ में नहीं आ रहा था कि किस तरह से खुद में समन्वय बनाया जाये. असमय बारिश
भरे मौसम में अपने आँसुओं को बारिश की बूँदों के साथ मिलाते-बहते हुए एक तरफ
पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन किया जा रहा था, दूसरी तरफ
औपचारिकता में बंधे रिश्ते के कारण अगले ही पल सामाजिकता का भी निर्वहन करना पड़
रहा था. प्रयागराज की पावन धरती पर श्वसुर साहब की अंतिम यात्रा से लेकर उनके
अंतिम संस्कार तक खुद को संयमित रखते हुए परिवार को दिलासा देने का काम भी हो रहा
था वहीं दूसरी तरफ नए वर्ष की शुभकामनाओं, बधाइयों को भी
सहेजने का काम किया जा रहा था.
समय बहुत कुछ दिखाता है, सिखाता है बशर्ते हम लोग उससे सीखना चाहें. उस वर्ष के जाते हुए दिन ने
और आने वाले दिन ने एकसाथ बहुत कुछ सिखाया.
आदरणीय श्वसुर साहब को सादर श्रद्धांजलि..
25 अक्टूबर 2022
मिट जाएँ सबके अँधेरे
22 अक्टूबर 2022
दीपमालिके के स्वागत में एक दीप प्रज्ज्वलित करें
असतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतम् गमय यह वाक्य एक तरफ सत्य की तरफ जाने का सन्देश देता है
वहीं साथ में अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रेरणा देता है. चारों ओर दीपों की
कतार, मोमबत्तियों-झालरों
का सतरंगी प्रकाश, रंग-बिरंगी
आतिशबाजी, विविध
आवाजों-रोशनियों के साथ फूटते पटाखे, सभी अपने आप में अद्भुत छटा का प्रदर्शन करते हैं. बच्चों का, युवाओं का, बुजुर्गों का, पुरुषों-महिलाओं का हर्षोल्लासित होना स्वाभाविक सा
दिखाई देता है. सभी अपनी-अपनी उमंग और मस्ती में दीपावली का आनन्द उठाते नजर आते
हैं. नये-नये परिधानों में सजे-संवरे लोग एकदूसरे से मिलजुल कर समाज में समरसता का
वातावरण स्थापित करते हैं. दीपावली का पर्व सभी के अन्दर एक प्रकार की अद्भुत
चेतना का संचार करता है. घरों की साफ-सफाई, लोगों से मिलना-जुलना, मिठाई-पकवान का बनना आदि-आदि घर-परिवार के सभी
सदस्यों को समवेत रूप से सहयोगात्मक कदम उठाने में मदद करता है.
भारतीय परम्परा
में, संस्कृति में पर्वों, त्यौहारों का महत्व हमेशा से रहा है. यहां
जितनी अनुपम वैविध्यपूर्ण प्रकृति में मनमोहक ऋतुएं हैं, ठीक उसी तरह से विविधता धारण किये
पर्व-त्यौहार भी हैं. इन त्यौहारों की विशेष बात यह रही है कि इन्हें धार्मिकता से
जोड़ने के साथ-साथ सामाजिकता से भी परिपूर्ण बनाया गया है. ये पर्व धार्मिक संदेशों
के मध्य से सामाजिक सरोकारों की, सामाजिक संदर्भों की, समरसता की, सौहार्द्र
की, भाईचारे की भी
प्रतिस्थापना करते दिखाई देते हैं. होना भी यही चाहिए किसी भी पर्व का, किसी भी अनुष्ठान का उद्देश्य मात्र स्वयं
को प्रसन्न रखने की स्थिति में नहीं होना चाहिए. हमारा उद्देश्य सदैव यही हो कि
हमारे कदमों से सामाजिकता का विकास हो ही, सामाजिक सरोकारों की भी स्थापना होती रहे. दीपावली
के संदर्भ में ही देखें तो इसके आने के कई-कई दिनों पूर्व से घर के कार्यों को
आपसी सहयोग से सम्पन्न करना, उत्सव के दिन सभी से मिलने-जुलने का उपक्रम किसी भी रूप में असामाजिकता का
संदेश देता नहीं दिखता है.
इधर सामाजिक
स्थितियों में कुछ परिवर्तन सा महसूस होता है. सहजता और सरलता का प्रतीक पर्व अब
बाह्य आडम्बर और चकाचौंध भरी स्थितियों के वशीभूत होता समझ में आता है. यदि हम
अपने आसपास के परिदृश्य का अवलोकन करें तो तमाम सारी प्राकृतिक स्थितियों के
साथ-साथ कृत्रिमता का विकास होता भी समाज में दिखाई देता है. भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण, औद्योगीकरण जैसी भारी-भरकम वैश्विक शब्दावली ने
पर्वों-त्यौहारों की सहजता, सरलता को विखण्डित सा कर दिया है. कृत्रिम चकाचौंध और औपचारिकता की भेंट हमारे
पर्व ही नहीं चढ़े हैं वरन् हमारे रिश्ते-नाते, हमारे सामाजिक सरोकार भी तिरोहित हुए हैं. गरिमामयी
रिश्तों की गर्मजोशी अचानक ही हिम प्रशीतक की भांति लगने लगती है.
त्यौहार अब नितांत
औपचारिकताओं में सिमटाए जाने लगे हैं. संबंधों में, रिश्तों में पहले की तरह गर्माहट नहीं दिखाई देती है, बाज़ारों में अपनत्व कम कटुता ज्यादा देखने
को मिलने लगी है. विदेशी
सामानों के बीच आज भी कई-कई छोटे बच्चे-बच्चियाँ साँचे में ढले गणेश-लक्ष्मी, मिट्टी के दिए, रुई, मोमबत्तियाँ आदि बेचते दिखते हैं. मशीनों से निर्मित चमकते-दमकते गणेश-लक्ष्मी
की भव्य मूर्तियों के आगे स्टाइलिश दीयों के आगे, डिजाइनर मोमबत्तियों के सामने, अजब-गजब रूप से चमक बिखेरती झालरों के सामने
इनका अंधकार ज्यों का त्यों रहता है. हर एक पटाखे के फूटने के साथ, हर एक दिया रौशनी बिखेरने के साथ, हर बार और अकेले त्यौहार मनाने के साथ एहसास
होता है कि मंहगाई सामानों में ही नहीं आई है संबंधों में, रिश्तों में भी आई है. अंधकार सिर्फ अमावस
की रात को ही घना नहीं हुआ है बल्कि अपनत्व में, स्नेह में भी घनीभूत होकर छा गया है. काले आसमान में
रौशनी बिखेरती आतिशबाजी, घर की छत पर चमक बिखेर कर शांत हो जाते दिए, मकान की दीवारों से लिपटी विदेशी झालरें अपनी
क्षणभंगुर चमक से एक पल को तो अंधकार दूर कर देती हैं किन्तु समाज में लगातार बढ़ते
जाते अंधकार को दूर नहीं कर पा रही हैं.
नैराश्य के ऐसे
वातावरण के बाद भी; कृत्रिम
चकाचौंध के बीच भी; दीपावली
का एक ही दीपक अंधियारे को मिटाने हेतु संकल्पित रहता है. हमें भी उसी दीपक की तरह
से स्वयं को इन विपरीत स्थितियों के बाद भी, सामाजिक सरोकारों के विध्वंसपरक हालातों के बाद भी
दीपमालिके का स्वागत तो करना ही है. बाजारीकरण में गुम हो चुकी भारतीयता में भी
प्रस्फुटन सा दिखता है जो हमें जागृत करता है कुछ करने को; एक प्रकार के आवरण को गिराने को; असामाजिकता को मिटाने को; सामाजिक सरोकारों की स्थापना को. इसके लिए
हमें सर्वप्रथम स्वयं से ही आरम्भ करना होगा. भारीभरकम खर्चों के बीच, मंहगी से मंहगी आतिशबाजी को उड़ाते समय
एकबारगी हम उन बच्चों के बारे में भी विचार कर लें जो कहीं दूर सिर्फ इनकी
रोशनियां देखकर ही अपनी दीपावली मना रहे होंगे. उन बच्चों के बारे में भी एक पल को
सोचें जो कहीं दूर किसी कचरे के ढेर से जूठन में अपना भोजन तलाशते हुए अपने
पकवानों की आधारशिला का निर्माण कर रहे होंगे. यह नहीं कि हम दीपावली पर अपने
उत्साह को, अपनी उमंग को
व्यर्थ गुजर जाने दें पर कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि कल को एकान्त में, तन्हा बैठने पर हमें स्वयं के कृत्यों से
शर्मिन्दा न होना पड़े; हमें
अपने एक बहुत ही छोटे से कदम से हमेशा प्रसन्नता का एहसास होता रहे; अपनी खुशी से दूसरे बच्चों में, और लोगों की खुशी में वृद्धि का भाव जागृत
होता रहे. हमें दीपमालिके के स्वागत में एक-एक दीप प्रज्ज्वलित करते समय इस बात को
ध्यान में रखना होगा कि इसका प्रकाश सिर्फ और सिर्फ हमारे घर-आंगन तक नहीं अपितु
समाज के उस कोने-कोने को भी आलोकित कर दे जिस कोने में अंधेरा वर्षों से अपना
कब्जा कायम रखे है. उजाले की एक सकारात्मक किरण ही भीषणतम अंधेरे को मिटाने की
शक्ति से आड़ोलित रहती है, बस हम ही संकल्पित हों और पूरे उत्साह से, उमंग से परिवर्तन का, समरसता का दीपक प्रज्ज्वलित करने का विश्वास अपने
में कर लें. आप स्वयं एहसास करेंगे कि आपका मन स्वतः स्फूर्त प्रेरणा से दीपमालिके
का स्वागत करने को तत्पर हो उठेगा.
26 जनवरी 2021
31 दिसंबर 2020
सम्मान करना तो सीख लो
12 नवंबर 2020
शुभ हो धनतेरस
30 मई 2020
जुड़वाँ नजर आते थे हम कभी-कभी
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| इस फोटो की कहानी फिर कभी |
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#हिन्दी_ब्लॉगिंग
14 फ़रवरी 2020
एक-दूजे के हमसफ़र बने नेत्रहीन दिव्यांग
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| बाँए से - गणेश शंकर त्रिपाठी, नीता, रामसूरत (पति-पत्नी), कुमारेन्द्र |





























