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21 मई 2025

चाय की एक प्याली से बने रिश्ते की मिठास

1990 की बात है जबकि स्नातक की पढ़ाई हेतु ग्वालियर के साइंस कॉलेज में एडमिशन लिया और रहने के लिए आशियाना बनाया इसी कॉलेज के हॉस्टल को. प्रवेश की सारी औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद अगस्त महीने में स्वतंत्रता दिवस के एक-दो दिन पहले हॉस्टल में अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर आ गए. पहली मंजिल पर मिला कमरा नंबर 11. पिताजी के अभिन्न परिचित सदस्य के बेटे राजीव त्रिपाठी हमारे रूम-मेट थे. राजीव का उरई से ही होने के कारण किसी अनजाने मित्र के साथ कमरे में रहने का डर-भय समाप्त हो चुका था.

 

यहाँ तक एक परिचय हॉस्टल के आरम्भिक दिनों से. पोस्ट का असल विषय तो ये है कि हॉस्टल के दिनों में चाय के कारण एक ऐसा रिश्ता बन गया जो कभी सोचा नहीं था. आज इस पोस्ट को लिखने का कारण भी यही है कि आज 21 मई को अन्तर्राष्ट्रीय चाय दिवस है और ऐसे में मन में आया कि चाय की और कोई महत्ता हो या न हो मगर हमारे लिए एक महत्ता ये है कि एक रिश्ता चाय के कारण बना जो आज भी पूरी गरिमा और स्नेह के साथ चल रहा है.

 

हॉस्टल में रहते हुए करीब दो महीने हो गए थे. रैगिंग जैसी किसी डरावनी चीज से हॉस्टल का नाता नहीं था बल्कि हम सभी छात्रों में आपस में बड़े-छोटे का नाता था. यहाँ सर या किसी और औपचारिक सम्बोधन के स्थान पर अपने से बड़ों को भाईसाहब कहने का चलन था. हॉस्टल का माहौल भी पूरी तरह से पारिवारिक था. न तो किसी कमरे में कोई ताला लगाता था और न ही किसी सामान में ताला लगा मिलता था. ऐसा लगता था जैसे सभी सामान एक-दूसरे का है. सभी के बीच आपस में कोई औपचारिकता नहीं. मैस में खाना खाते समय एक-दूसरे के सामान का उपयोग करना हो अथवा अन्य किसी वस्तु का उपयोग, कहीं कोई संकोच नहीं हुआ करता था.

 

बाँए से - अक्षय भाईसाहब, हम, राकेश भाईसाहब (हॉस्टल के दिन-बलवंत भैया पहाड़ी पर-1991)

हॉस्टल के उन दिनों में कैसे अचानक से चाय पीने की आदत लग गई, पता नहीं. ऐसा इसलिए क्योंकि जितना याद आ रहा है, चाय पीने की आदत जैसी इंटरमीडिएट तक नहीं पड़ी थी उस समय तक सामान्य ढंग से जितनी चाय एक दिन में पीने को मिलती थी, उतनी ही पी जाती थी. इधर हॉस्टल में रहने के कारण चाय पीने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं रहा सो खूब चाय पी जाने लगी. उस समय हॉस्टल में कई लोग थे जो चाय पीते थे मगर एक-दो लोग ही थे जो हॉस्टल में चाय बनाने की व्यवस्था किये थे. ऐसे एक-दो लोगों में एक हम थे, जिनके पास चाय से सम्बंधित समस्त सामग्री चौबीस घंटे उपलब्ध रहती थी. हमारे कमरे की कभी-कभी की बैठकी में कुछ मित्र, कुछ भाईसाहब के चाय का शौक पूरा हो जाया करता था.

 

उन्हीं दिनों हॉस्टल में कुछ नए साथियों का आना हुआ. शायद इसे ही संयोग कहा जायेगा या फिर पूर्व-निर्धारित लिखित विधि का विधान कि कई-कई नए सदस्यों के आने के बीच में दो लोगों से अनायास ही आकर्षण वाला परिचय हुआ, जैसे स्वतः ही. एक अक्षय कटोच भाईसाहब से और दूसरा नवीन शर्मा से. अक्षय भाईसाहब हमसे एक क्लास आगे थे और नवीन हमारे ही साथ. दो-चार दिनों की सामान्य मुलाकातों के बाद एक दिन मैस से रात का खाना खाकर निकलने पर अक्षय भाईसाहब ने रोका और बोले क्यों चिंटू, सुना है तुम अपने कमरे पर चाय बनाते हो? एकबारगी लगा कि कहीं ये कोई अपराध तो नहीं जो हमारे सीनियर द्वारा ऐसा सवाल किया गया मगर अगले ही पल खुद को संयमित करते हुए संक्षिप्त सा जवाब दिया, जी. ठीक है, जब रात में बनाओ तो एक कप हमें भी पिला दिया करना, अक्षय भाईसाहब का स्नेहिल आदेश हम तक आया और अक्षय भाईसाहब ग्राउंड फ्लोर के अपने कमरा नंबर 29 की तरफ चल दिए.

 

उसी रात को चाय बनाकर एक गिलास में चाय 11 नंबर कमरे से 29 नंबर कमरे तक जाती. ये क्रम लगभग हफ्ते-दस दिन चला कि एक दिन अक्षय भाईसाहब ने कहा कि क्यों अपने कमरे में अकेले चाय के लिए परेशान होते हो. यहीं आ जाया करो, सब लोग इकट्ठे चाय पिया करेंगे. उनका इकट्ठे चाय पीने के बारे में उनका खुद के साथ-साथ नवीन और राकेश शर्मा भाईसाहब की तरफ इशारा करना था. उसी रात जब चाय के लिए अक्षय भाईसाहब के कमरे में जाना हुआ तो चाय के सारे सामान के साथ उनका रूम भी सुसज्जित हमारा इंतजार कर रहा था. समय के साथ चाय, खाना-पीना, पढ़ाई, कॉलेज, बाजार आदि जाना एकसाथ होने लगा.

 



अक्षय भाईसाहब द्वारा उन्हीं दिनों कुछ बातें बहुत ही स्पष्ट रूप से समझाई गईं, जैसे कोई बड़ा समझाता है उसका सुखद परिणाम ये है कि आज हॉस्टल छोड़े हुए अक्षय भाईसाहब को 33 वर्ष और हमें 32 वर्ष हो गए हैं मगर हमारे और उनके बीच एक चाय के साथ बना बड़े-छोटे भाई का रिश्ता आज तक पूरी ईमानदारी, पावनता के साथ चल रहा है. भाभी का स्नेह भी हमे उसी तरह से मिलता है जैसे किसी देवर को मिलता होगा. अक्षय भाईसाहब को लेकर हमारे और भाभी के बीच में खूब मजाक होता है. अक्सर सामने होने पर भाईसाहब बस ख़ामोशी से हँसते हुए इधर-उधर हो लेते हैं.

 

वाकई सोच में, मानसिकता में, व्यवहार में, बर्ताव में यदि ईमानदारी है, निष्ठा हो, स्नेह हो, आदर हो तो एक प्याली चाय के साथ बने संबंधों में, रिश्तों में मिठास सालों-साल बनी रहती है.


21 दिसंबर 2022

इक मुलाकात जरूरी है ज़िन्दगी के लिए

हम सभी के साथ अक्सर ऐसा होता होगा कि हम लोगों से मिलने का मन बनाये रहते हैं, बहुत से लोगों से बात करने का मन बनाये होते हैं मगर अपनी ओढ़ी हुई व्यस्तता के कारण न मिलने का समय निकाल पाते हैं और न ही फोन से बात कर पाते हैं. दिन में कई बार ऐसे विचार आने के बाद भी उसे आने वाले समय में कर लेने का सोच कर टाल जाते हैं. मिलने-जुलने, बातचीत करने का लगातार सोचते रहने के बाद भी कई-कई बार तो महीनों गुजर जाते हैं और अपने विचार को क्रियान्वित नहीं कर पाते हैं. मिलना-जुलना, मेल-मिलाप, बातचीत आदि एक सामाजिक क्रिया है और इससे संबंधों में प्रगाढ़ता तो आती ही है, आपसी समन्वय-सहयोग की भावना का विकास भी होता है. यह जानते-समझते हुए भी देखने में आ रहा है कि लोगों में मिलने-जुलने की भावना कम से कमतर होती जा रही है.


ये सदियों पहले की बात नहीं है जबकि समाज में मिलने-जुलने का भाव प्रमुख था. नब्बे के दशक में भी इस तरह की गतिविधियाँ सहज रूप से संपन्न हुआ करती थीं, जबकि लोग बड़े प्रेम, स्नेह के साथ एक-दूसरे के परिजनों के साथ मेल-मिलाप करते हुए अपना जीवन-यापन करते थे. हमें बहुत अच्छे से याद है कि शाम का समय यार-दोस्तों के साथ मिलकर गप्पबाजी करने में, घूमने-टहलने में बीता करता था. किसी दोस्त के दो-चार दिन न मिलने पर उसके घर पहुँचकर उसके हालचाल लिए जाते थे. दोस्तों के बीच ही सामंजस्य या मधुर सम्बन्ध नहीं हुआ करते थे बल्कि उनके परिजन भी आपस में मैत्रीभाव से जुड़े होते थे, एक-दूसरे के बारे में जानकारी रखते थे, उनका ध्यान रखते थे. अब ऐसा देखा जाना दुर्लभ हो गया है.




इस बारे में बीते दिनों हमारी अपने एक परिचित से मुलाकात हुई. अब घर जाकर मिलने में तमाम तरह की बाध्यताओं का पालन करने के कारण से बहुत से लोगों के घरों में जाना बंद कर दिया है. अब नियमित रूप से उन्हीं मित्रों, परिचितों के घर जाया जाता है जहाँ आज भी कोई औपचारिकता नहीं है, किसी तरह की कोई बाध्यता नहीं है. हाँ तो, एक शाम हमारे एक परिचित सड़क की चहलकदमी के दौरान मिले. इधर-उधर की बातचीत के दौरान मिलने-जुलने सम्बन्धी विषय पर चर्चा आकर टिक गई. उन्होंने अपना एक अनुभव हमारे साथ बाँटा तो एक पल को झटका सा लगा. उन्होंने बताया कि उनके रिश्ते के एक भाई ने एक बार उनके पारिवारिक आयोजन के दौरान एक सवाल सबके सामने रखा कि हम लोगों का अगले दस-पन्द्रह साल में आपस में कितनी बार मिलना संभव है?


देखने-सुनने में यह सवाल एकदम सामान्य सा, सीधा-साधा सा है. बावजूद इसके हमारे परिचित के परिजनों में आश्चर्य के साथ-साथ एक अनदेखे भय का भी संचार हुआ जबकि आपस में मिलने की संख्या बहुत अधिक नहीं हो सकी. उन सबके बीच सामान्य रूप से एक बात यह उभरी कि यदि परिवार में शादी-विवाह न हों, अन्य कोई पारिवारिक आयोजन न हो तो सबका आपस में बरसों-बरस तक मिलना नहीं होता है. यह स्थिति अकेले हमारे परिचित के परिवार की नहीं है कमोबेश सभी की है. एक पल को आप भी विचार करके देखिये कि अपने परिवार में जिन सदस्यों को आप अपना बहुत ख़ास कहते हैं, सार्वजानिक रूप से जिनके लिए आप जान तक देने का दम भरते हैं, उनके साथ मुलाकात की समयावधि क्या होती है? याद करके देखिएगा कि अपने किसी आत्मीय से, जो आपका परिजन नहीं है उसके साथ आपने अंतिम मुलाकात कर की थी?


ज़िन्दगी वाकई बहुत छोटी है. मिलना-जुलना, बातचीत करना बनाये रहना चाहिए. परिवार हो या मित्र, सभी से आत्मीय सम्बन्ध बने रहना एक बात है और उनसे मिलकर अपनी भावनाओं को प्रकट कर देना एक अलग बात है. मिलना-जुलना, आपस में बैठकर तमाम बातें करना बहुत सी परेशानियों को दूर भी करता है, बहुत सी समस्याओं का समाधान भी प्रस्तुत करता है. जिससे मन करे उससे मिल आना चाहिए. जिससे मन करे उससे बात कर लेना चाहिए. क्षणभंगुर जीवन में पता नहीं कब आप ही कहें कि काश! उससे मिल आये होते, फलां व्यक्ति बहुत भला था. इससे पहले संबंधों में, रिश्तों में, आत्मीयता में ‘है के स्थान पर ‘था लगे अपने कदम घर के बाहर निकालिए और अपने आत्मीय को अपनी बाँहों में भर लीजिये, उसे अपने गले लगा लीजिये.  





 

16 नवंबर 2022

एहसासों का दरिया....

भावनाओं का अतिरेक

उमड़ते देखा,

एहसासों का दरिया

इस आँख से उस आँख तक

मचलते देखा,

नजरें चुरा कर

आँखों की बारिश

थामने की कोशिश,

शब्द-शब्द पर लबों को

लरजते देखा।


उक्त पंक्तियाँ पोस्ट के लेखक की ही हैं. कई बार कुछ पंक्तियाँ ही समूची मनोदशा की परिचायक होती हैं. इन पंक्तियों में भी कुछ ऐसा ही है. भावनाओं, एहसासों, संबंधों आदि महज शब्द नहीं होते हैं, यदि इनको माना जाये, इनकी गहराई को समझा जाये तो ये बहुत अधिक आत्मीय और संवेदना से भरे शब्द होते हैं. दो-चार वर्णों से बने इन शब्दों में किसी भी व्यक्ति को बाँधे रखने की शक्ति होती है. कितना भी कठोर दिल इन्सान हो उसकी आँखों को नम कर देने की क्षमता भी इन शब्दों में होती है.


आज के दौर में जहाँ बहुतायत सम्बन्ध, रिश्ते स्वार्थपूर्ति के लिए बनाये जाने लगे हैं वैसे में भावनात्मकता से भरे संबंधों का अपना ही महत्त्व है. इस महत्ता को, इन संबंधों को वही समझ सकता है जो इनको उसी गंभीरता से निभाता हो. इस स्थिति से दो-चार होने पर एहसास हुआ कि कई बार शब्द कम पड़ जाते हैं, अपनी बात कहने के लिए. बात को कहने से ज्यादा शब्दों को रोकने की कोशिश करनी पड़ती है. शब्दों से ज्यादा आँखों की नमी सबकुछ कह देने को व्याकुल सी दिखती है. खुद को कमजोर न पड़ने देने के साथ-साथ सामने वाले को भी कमजोर न होने देने का प्रयास करना पड़ता है. समझ नहीं आता है कि शब्दों को प्रकट कर देना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है या फिर उनको रोके रखना? आँखों की नमी को छिपाना ज्यादा मुश्किल है या फिर नजरों का न मिलाना?


बहरहाल, ये हमारा व्यक्तिगत अनुभव रहा है कि बहुत से क्षणों में बात को न कहना, आँखों की नमी का छलकना, नज़रों का सामने वाले की नजर से बचाना ही सबकुछ कह देता है. इस सबकुछ कहे जाने को समझना ही महत्त्वपूर्ण है. 




11 नवंबर 2022

संबंधों में दिखावा

संबंधों के चलन में विगत लगभग दो दशक से बहुत ज्यादा दिखावा होने लगा है. संबंधों के निर्वहन में एक तरह की बनावट भी आ चुकी है. ऐसा नहीं है कि सभी तरह के संबंधों में अथवा सभी लोगों के संबंधों में ऐसा होता है किन्तु बहुतायत में ऐसा देखने को मिल रहा है. कुछ लोग लगभग प्रत्येक व्यक्ति जे जीवन में ऐसे होते हैं जो उनके बहुत ख़ास होते हैं. उनके अत्यंत निकट के होते हैं. ऐसे लोगों से किसी तरह का कोई औपचारिक सम्बन्ध नहीं होता है. उनके सामने भी उसी तरह का व्यवहार होता है, जैसा कि उनके पीछे. इसे उलट रूप में भी समझा जा सकता है कि उनके प्रति जैसी सोच और मानसिकता उनके पीछे होती है, ठीक वही उनके सामने भी होती है. इसमें किसी तरह का दिखावा नहीं होता है. 




इसके ठीक उलट ऐसे सम्बन्ध भी अस्तित्व में आ चुके हैं जहाँ जबरदस्त तरीके से बनावट है. सामने मिलने पर ऐसे मुलाक़ात की जाती है मानो इनसे बड़ा कोई ख़ास है ही नहीं. मिलने वाले जिगरी सम्बन्धी समझ आते हैं. एक-दूसरे के लिए जान देने वाला इनसे बड़ा और कोई नहीं संसार में, ऐसा दिखाई देता है. और जब यही लोग एक-दूसरे के पीठ पीछे होते हैं तो यही एक-दूसरे की काट करने वाले होते हैं. यही एक-दूसरे को नीचा दिखाने वाले, एक-दूसरे को हराने की मानसिकता रखने वाले होते हैं.


हो सकता है कि ऐसी मानसिकता वर्षों से समाज में अपना अस्तित्व बनाये हुए हो मगर जिस तरह से पिछले दो-ढाई दशकों में ऐसा होते दिखा है, वो आश्चर्यचकित करने वाला है. इधर संबंधों के बनाने में, उनके निर्वहन में स्वार्थ को प्रमुखता से अपनाया गया. जहाँ से भी लाभ मिलने की उम्मीद दिखी, वहीं संबंधों को प्रगाढ़ बनाने की कोशिश शुरू हो गई. संबंधों का ये निर्वहन उसी स्थिति तक गति पाता रहता है, जहाँ तक कि लाभ की स्थिति बनी रहती है. ऐसे सम्बन्ध अल्पकालिक रहते हैं किन्तु दिखावे के कारण बहुतेरे लोग संबंधों को खींचते रहते हैं. यही लोग वे होते हैं जो सामने आने पर आत्मीयता का चरम दिखाते हैं और पीठ पीछे यही लोग विश्वासघात करने का काम करते हैं. आज के समय ऐसे लोगों से बच कर रहने की आवश्यकता है. 






 

13 अक्टूबर 2022

खुद का आकलन खुद की नजरों में

इधर बहुत दिनों से खुद अपने व्यवहार का अध्ययन किया जा रहा है. अपने आपको अपनी ही नजर से विश्लेषित किया जा रहा है, खुद का आकलन किया जा रहा है. अभी निष्कर्ष रूप में बहुत कुछ तो नहीं कहा जा सकता है किन्तु बहुत कुछ ऐसा है जो अपने बारे में और भी स्पष्ट दिखाई देने लगा है. वैसे ऐसा नहीं है कि अपने कामों के बारे में, अपने स्वभाव के बारे में इधर ही कुछ दिन से आकलन करना शुरू किया है. इस तरह का काम बरसों से किया जा रहा है. यदि कहा जाये कि बचपन से तो कोई अतिश्योक्ति न होगी.


उन दिनों हम कक्षा सात या आठ में पढ़ते होंगे. उस समय अपने बाबा जी के साथ सुबह की सैर पर जाया करते थे. बाबा जी के साथ की सैर का लाभ तो मिला ही, उनके बहुत सारे अनुभवों से सीखने का भी अवसर मिला. अजनारी गाँव तक लगभग तीन किमी तक की सैर के दौरान बाबा जी से बहुत सारी सीख, शिक्षाएँ भी मिलती रहती थीं, जिनके द्वारा आज तक मार्गदर्शन मिलता रहता है. बाबा जी ने ही उसी समय सिखाया था कि कभी भी कितनी ही बड़ी समस्या क्यों न हो, उसका समाधान उसके छोटे रूप से सोचना शुरू करो, निकल आएगा. समस्या को बड़ा करके देखने पर समस्या ही बहुत बड़ी समझ आने लगती है तो समाधान खोजना मुश्किल हो जाता है.




ऐसी अनेक शिक्षाओं के साथ बाबा जी ने सिखाया था कि रोज रात को सोने के पहले कुछ न कुछ पढ़ना अच्छा रहता है. लिखने-पढ़ने की आदत उसी का सुखद परिणाम है. आज भी विगत कई वर्षों से नियम बना हुआ है कि रोज रात को सोने के पहले कुछ न कुछ पढ़ा अवश्य जाता है, भले ही वह पढ़ना कुछ पृष्ठ का ही हो. इसी तरह से बाबा जी ने एक बात और बताई थी कि दिन भर जो भी काम करो, उनके बारे में रात को सोने के ठीक पहले विचार किया करो. देखो कि कौन सा काम गलत किया, कौन सा काम सही किया. किसकी सहायता की, किसका नुकसान किया. इसके बाद अगले दिन के लिए संकल्प करो कि गलत काम जो आज हुआ, वो कल से नहीं होगा. जो नुकसान दूसरे का किया, वो फिर न होने पाए. ये आदत आज तक बनी हुई है. इसी के चलते कोशिश रहती है, खुद को सुधारने की, अपना स्वभाव सही करने की.


इसी आदत को विगत कुछ समय से विस्तार देने की कोशिश है. खुद को खुद की नजर से देखने, परखने की कोशिश है. ऐसा लगता है हमें खुद के बारे में जैसे संबंधों, रिश्तों, दोस्ती में कई बार सामने वाले पर हम अपनी इच्छा थोपने सी लगते हैं. सामने वाले पर अपना अधिकार सा मानते हुए उससे अपनी बात को मनवाने की चेष्टा करते हैं. यद्यपि ऐसा करवाने के पीछे किसी तरह की गलत मानसिकता नहीं होती है तथापि लगता है कि आखिर सामने वाले की भी अपनी सोच है, उसकी भी अपनी पसंद है. ऐसा होना आम बात है कि कोई काम, कोई बात हमें नापसंद हो, आवश्यक नहीं वही बात हमारे अभिन्न मित्र को भी नापसंद हो. बावजूद ये समझने के हम उसे अपनी पसंद के लिए मजबूर सा करते हैं. बात न मानने की स्थिति में कई बार गुस्सा आता है मगर सामने वाले पर नहीं, खुद पर. लगता है कि आखिर क्यों अपनी बात को अगले पर थोप रहे थे, आखिर उसका भी अपना अधिकार है, किसी बात को मानने या न मानने का, किसी काम को करने या न करने का.


हमारी जिद तरीके की ऐसी हरकत महज इसी भाव में हो जाती है कि हम अगले व्यक्ति पर अपना सम्पूर्ण अधिकार सा मान लेते हैं, समझ लेते हैं. लगातार कोशिश यही है कि अपनी ऐसी आदत पर नियंत्रण कर सकें. अपनी जिद जैसी इच्छा को अपने किसी ख़ास, विशेष पर जबरन न थोपा जाये. 




 

07 सितंबर 2022

दोस्ती, विश्वास, अधिकार का सह-सम्बन्ध

दोस्ती को किसी भी रिश्ते से अलग और सबसे ऊपर माना जाता है. हमारा भी व्यक्तिगत रूप से ऐसा मानना है कि दोस्ती का रिश्ता सबसे अलग होता है. विगत कुछ वर्षों के जो अनुभव रहे हैं, उनके आधार पर इसके साथ कुछ बातों का और भी अनुभव किया है. दोस्ती के साथ-साथ अन्य आयाम भी जुड़कर चलते हैं, जिनके बारे में अक्सर विचार किया नहीं जाता है. संभव है ऐसा करने के पीछे का कारण यही रहता हो कि दोस्ती को सबसे ऊपर माना जाता है. यदि बारीकी से देखा जाये तो दोस्ती के साथ-साथ अधिकार और विश्वास भी उतनी ही महती भूमिका में रहते हैं. इन दोनों को उसी नजरिये से एकसाथ नहीं देखा जा सकता है, जैसा कि दोस्ती को देखा जाता है. 


किसी भी व्यक्ति के साथ दोस्ती में गहराई या मजबूती उसी स्थिति में आती है जबकि उसके साथ विश्वास की मजबूती हो. जहाँ विश्वास में लेशमात्र भी संदेह, संशय रहेगा वहाँ दोस्ती जैसा कुछ भले हो मगर दोस्ती नहीं हो सकती. इसे जान-पहचान, परिचय, सम्बन्ध आदि कुछ भी कहा जा सकता है. असल में दो लोगों के बीच की मेल-मुलाकात, उनके बीच का परिचय, उनके मध्य की बातचीत को दोस्ती के दायरे में नहीं लाया जा सकता है. दोस्ती का अर्थ ही विस्तार लिए है, गहराई लिए है. दोस्ती महसूस करने की, स्वयं में जीने की स्थिति है न कि किसी रिश्ते का नामकरण. इसलिए दोस्ती में विश्वास का होना सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है.  




इसके अलावा दोस्ती के साथ जिस अन्य आयाम को हमने व्यक्तिगत रूप से महसूस किया है वह है अधिकार. अधिकार एक तरह की वह स्थिति है जो दो व्यक्तित्वों को एक-दूसरे में आपस में परिवर्तित कर देती है. ऐसा दोस्ती के सन्दर्भ में ही हमने महसूस किया है, अनुभव किया है. संभव है कि अन्य किसी स्थिति में अधिकार का मंतव्य कुछ और निकलता हो. दोस्ती और अधिकार के बीच के साहचर्य को, सह-सम्बन्ध को जब देखते हैं तो लगता है कि दोस्ती भले ही कितनी प्रगाढ़ हो, दोस्ती में कितनी ही गहराई क्यों न हो मगर अधिकार का दायरा अलग-अलग होता है. जिस व्यक्ति से दोस्ती अपने परम-पावन रूप में पूरी ईमानदारी के साथ हो, आवश्यक नहीं कि उसके ऊपर अधिकार भी उसी शिद्दत से हो. उसी एक व्यक्ति के विभिन्न स्वरूपों, कार्यों आदि में अधिकार की स्थिति बदलती रहती है.  


अक्सर देखने में आता है कि अधिकार को एकआयामी बिंदु मानकर उसे स्वीकार किया जाता है और ऐसी स्थिति में दोस्ती के सन्दर्भ में अक्सर ग़लतफ़हमी पैदा होने लगती है. यहाँ विश्वास और अधिकार की स्थिति में अंतर को भी समझना होगा. विश्वास का अर्थ सीधे-सीधे विश्वास से है. यहाँ कम या ज्यादा से उसका कोई सम्बन्ध नहीं होता है. विश्वास है तो है, नहीं है तो नहीं है. ऐसा किसी भी स्थिति में नहीं हो सकता है कि किसी एक कार्य के सन्दर्भ में अथवा किसी परिस्थिति के सम्बन्ध में विश्वास का स्वरूप बदल जाए. इसके उलट अधिकार के अनेकानेक पक्ष सामने आते हैं. इसको महज ऐसे समझा जा सकता है कि भले ही आपकी किसी व्यक्ति के साथ अत्यंत गहरी दोस्ती है मगर संभव है कि उसके परिवार के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार आपको नहीं हो. परिवार से इतर उसी व्यक्ति के सन्दर्भ में देखें तो भले ही उस दोस्त के क्रियाकलापों पर, उसके कार्यों पर आपका अधिकारपूर्ण हस्तक्षेप रहता हो मगर ऐसा भी संभव है कि उसके कार्यक्षेत्र के सम्बन्ध में किसी अन्य तरह का अधिकार आपको न हो. अधिकार के आयाम विभिन्न स्वरूपों में दोस्ती के साथ चलते रहते हैं. यहाँ अधिकार के अलग-अलग स्वरूपों के कारण दो व्यक्तियों की दोस्ती में अंतर के बाद भी दोस्ती का चरम स्वरूप, पावन रूप देखा जा सकता है.  


दोस्ती अत्यंत पवित्र रिश्ता है जो किसी भी रिश्ते के नामकरण का मोहताज नहीं. उसके लिए किसी तरह की कोई परिधि नहीं. उसके लिए कोई दायरा नहीं. इसके बाद भी व्यक्तिगत संबंधों, अनुभवों, एहसासों के आधार पर महसूस किया है कि दोस्ती के साथ अधिकार का सम्बन्ध वह नहीं है जो दोस्ती के सन्दर्भ में है. दोस्ती, विश्वास, अधिकार की आपसी संरचना को समझने की आवश्यकता है, उनके बीच के सह-सम्बन्ध को भी समझने की आवश्यकता है. अक्सर इन्हीं को समझने की चूक में दोस्ती जैसा रिश्ता पल भर में अपने अस्तित्व को खो देता है. अधिकारों के नाम पर व्यक्ति कई बार अपने दायरे से बाहर भी निकल जाता है. ऐसा करना एक तरह का अतिक्रमण ही होता है. अधिकारों के आयामों को न समझने के कारण, उनको उनकी परिस्थितियों के अनुसार स्वीकार न करने के कारण दोस्ती के स्वरूप को विकृत होते भी देखा गया है.  





 

28 मार्च 2022

आत्मीय रिश्ते की सुगन्धित महक

एक शिक्षक के रूप में किसी संस्थान में पढ़ाना कभी भी सोचा नहीं था और विडम्बना देखिये कि आज भी एक संस्थान में अध्यापक के रूप में नियुक्त होने के बाद भी खुद को इसके लायक नहीं समझते हैं. जीवन के किसी भी पल में शिक्षक बनने का ख्याल मन में नहीं आया. इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई के दौरान तो पढ़ना ही बहुत ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं लगता था. ये बात है नब्बे के दशक की, उस समय के बच्चों में बहुत कम बच्चे ही ऐसे होंगे जो अपने कैरियर के लिए गधे के जैसे लगे रहते होंगे. हम तमाम मित्र तो अपने पेपर वाले दिन भी ये प्लान बनाने में ज्यादा समय बिताया करते थे कि पेपर के बाद और शाम को कहाँ पर बैडमिंटन खेलना है, कहाँ पर क्रिकेट खेलना है.


आज के बच्चों को, उनके माता-पिता को देखते हैं तो लगता है कि जैसे हमारे दौर में न तो बच्चे हुआ करते थे, और न ही माता-पिता. सबके सब एकदम निर्द्वंद्व, स्वतंत्र से दिखाई देते थे, जिनके सामने एकमात्र उद्देश्य स्वस्थ जीवन बिताना हुआ करता था, बाकी की बातें द्वितीयक थीं. खैर, माता-पिता-गुरुजनों के आशीर्वाद से इतना पढ़ गए कि अपने से बहुत छोटे बच्चों को कुछ समझा सकते. इसी कड़ी में उरई के अपने ही अभिन्न पारिवारिक सदस्य के शैक्षिक संस्थान से स्नेहिल आदेश जैसा आया कुछ महीने हिन्दी विषय में अध्यापन कार्य का. चूँकि उस समय तक परास्नातक किये भी पाँच-छह वर्ष बीत चुके थे, सिविल सेवा की तैयारी भी ठीक-ठाक चल रही थी ऐसे में एक पल को लगा कि किसी संस्थान में पढ़ाने के लिए जाने पर भले ही कुछ आर्थिक सहायता हो जाये मगर हमारी खुद की तैयारी में नकारात्मक असर होगा. ऐसी ही सोच के चलते पहले तो वहाँ पढ़ाने से इंकार कर दिया मगर पारिवारिक रूप से जुड़े होने के कारण वहाँ पढ़ाने के लिए सहमति दे दी.


स्कूल में जाना हुआ तो बहुत से विद्यार्थियों से संपर्क हुआ. बहुत से विद्यार्थी पूर्व-परिचित निकले तो कुछ उसके बाद परिचित हो गए. स्कूल के कुछ विद्यार्थी पढ़ने के इच्छुक रहते थे तो कुछ के लिए स्कूल महज तफरी का माध्यम. हमने अपने स्तर पर जैसा बन पड़ता था वैसा किया. किसी भी विद्यार्थी के साथ किसी भी स्तर का भेदभाव नहीं किया. पढ़ाने के मामले में जो, जितना ज्ञान हमें था उतना सब अपने विद्यार्थियों के बीच बांटने की कोशिश की. इस कोशिश में बहुत विद्यार्थी अत्यंत निकट आ गए. उन सभी से ये निकटता न केवल उन तक रही बल्कि पारिवारिक हो गई. आज वे विद्यार्थी भले ही उच्च सेवाओं के चलते, वैदेशिक व्यवस्थाओं के चलते हमसे बहुत दूर हों मगर इंटरनेट के कारण से, सोशल मीडिया के कारण से उतने ही निकट हैं.




अपनी ऐसी ही एक विद्यार्थी, अर्चना से मुलाकात हुई. कई वर्षों के बाद हुई मुलाकात में बहुत सी पुरानी बातें सामने से गुजरीं, बहुत से घटनाक्रम ने फिर से उसी दौर में पहुँचा दिया. अर्चना से और उसके परिवार से सोशल मीडिया के माध्यम से मिलना होता रहता है, इस कारण से लगा नहीं कि बहुत दिन बाद मिल रहे हैं. बहुत सारी बातें हुईं और उन्हीं बातों में वो दौर भी याद आया और आज का समय भी सामने आया. आज भी हम एक शैक्षिक संस्था में अध्यापन कार्य कर रहे हैं. वहाँ भी हमारा वर्ष 2005 से अध्यापन कार्य में जुड़ना हो गया था. इसके बाद भी लगता है कि वे विद्यार्थी जो हमसे वर्ष 2000 में जुड़े थे, वे आज भी दिल से जुड़े हैं, ईमानदारी से जुड़े हैं.


बहरहाल, हमारे जो भी विद्यार्थी रहे हैं, आज हैं उन सबको आशीर्वाद कि वे उच्च पदों पर विराजमान हों मगर गुरु-शिष्य की पावन परम्परा को विस्मृत न करें. उस परम्परा का पूरी ईमानदारी, सकारात्मकता से पालन करते अर्चना को देखा, अन्य कई विद्यार्थियों को भी देखा है.


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20 नवंबर 2021

संबंधों-रिश्तों का सच क्या है?

ज़िन्दगी बहुत ही छोटी होती है, इसे समझने की आवश्यकता है. बहुतायत में देखने को मिलता है कि समाज में लोग आपस में संबंधों का, रिश्तों का ख्याल नहीं करते हैं. उनके लिए संबंधों, रिश्तों का अर्थ महज किसी आयोजन में, शादी-ब्याह में मुलाकात से होता है, यदि बहुत कुछ तो चंद रुपयों की मदद को ऐसे लोग संबंधों-रिश्तों के रूप में परिभाषित करने लगते हैं. किसी ने यदि कहा है कि ज़िन्दगी चार दिन की है तो इस बारे में खोज करनी चाहिए कि क्यों किसी ने कहा कि ज़िन्दगी महज चार दिन की है? ऐसे कौन से बिंदु-तत्त्व उसके द्वारा खोजे गए कि ज़िन्दगी को महज चार दिन का माना गया?


इन चार दिनों के पीछे क्या अवधारणा रहो होगी, इसकी व्याख्या यहाँ नहीं करनी है. यहाँ हमारा मंतव्य महज इतना है कि इतनी सी छोटी ज़िन्दगी में भी आपस में तनाव, वैमनष्यता आखिर किसलिए. किसके लिए? यदि सभी लोग आपस में शांति, प्यार, स्नेह से अपना समय व्यतीत करने लगे तो संभव है कि आपसी तनाव दूर हो जाये. आखिर आपस में तनाव का कारण क्या है, कभी किसी ने इस पर विचार करने की कोशिश की है? यदि हम देखें तो हमारे आपसी तनाव की मूल वजह अपेक्षाओं का होना और उनका पूरा होना, न होना है. आखिर हम अपेक्षा किसलिए और क्यों रखते हैं? क्या इसलिए कि सामने वाला व्यक्ति हमारा परिचित है? क्या इसलिए कि सामने वाले को हम अपना सम्बन्धी मानते-समझते हैं? क्या इसलिए कि सामने अले से हमारा कोई रिश्ता है?


यदि यही है तो फिर समाज एक भयंकर ग़लतफ़हमी का शिकार है. आखिर संबंधों का, रिश्तों का बनाया जाना किसलिए होता है? क्या इसलिए कि हमारे काम सहजता से होते रहें? सोचियेगा इस पर. शायद जवाब मिले.


13 अक्टूबर 2021

संबंधों के बीच एहसासों की डोर

संबंधों, रिश्तों का बनाया जाना जितना आसान है, जितना सहज है उनका निर्वहन करना या कहें कि उनका पूरी ईमानदारी से निर्वहन करना उतना ही कठिन है. किसी भी सम्बन्ध, रिश्ते में निर्वहन की समस्या उसी समय से आनी शुरू हो जाती है जिस समय से उनसे किसी तरह की अपेक्षा की जाने लगती है. यदि संबंधों को, रिश्तों को अपेक्षाओं से मुक्त रखा जाये तो वे निर्वहन के प्रति समस्या नहीं बनते हैं. संभवतः इसी कारण से कहा भी जाता है कि संबंधों को, रिश्तों को किसी भी तरह के बंधन में नहीं बांधना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि एक तो रिश्तोंसंबंधों की कोई परिभाषा निश्चित नहीं की जा सकतीदूसरे यदि संबंधों और रिश्तों को किसी तरह के बंधन में बाँध दिया जाये तो उसमें एक तरह की बोझिलता आने लगती है. किसी भी सम्बन्ध को, किसी भी रिश्ते को किसी भी तरह की परिभाषा से नहीं बल्कि उनको निभाने की गंभीरता से समझा जा सकता है. असल में सम्बन्ध अथवा रिश्ते किसी के भी जीवन का बहुत महत्त्वपूर्ण एहसास होता हैजिसे शब्दों में अभिव्यक्त करना अत्यंत कठिन होता है.


किसी भी व्यक्ति के जीवन में एहसासों से भरे रिश्ते एक तो मानवजनित होते हैं और दूसरी तरह के वे रिश्ते है जो स्वतः उसे मिलते हैं. एक रिश्ते उसके जन्म के साथ उससे जुड़ जाते हैं और कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो वह इन्सान स्वयं बनाता हैउनसे जुड़ता है. जन्मते ही मिलने वाले रिश्तों और स्वयं बनाये गए रिश्तों में मूलतः बहुत ज्यादा अंतर नहीं होता है क्योंकि सभी तरह के रिश्तों का आधार आपसी विश्वासआपसी एहसास होता है. किसी भी तरह के संबंधों में महत्त्वपूर्ण यह है कि हमें उसका निर्वहन कैसे करना है. संबंधों का बनाया जाना जितना सहजआसान होता है उससे कहीं ज्यादा कठिन कार्य होता है संबंधों का निर्वहन करना. दरअसल संबंधों की प्रकृति मखमली ओस की भांति होती है जो जरा सी धूप पाते ही समाप्त हो जाती है. शांतशीतलचाँदनी रात की तरह की एहसास भरी प्रकृति संबंधों में मासूमियत भरती है. इन संबंधों पर यदि किसी भी तरह से अविश्वासआपसी द्वेषकटुता आने लगती है तो फिर संबंधों की शीतलतामधुरता समाप्त हो जाती है. इसके बाद भी इन्सान उन संबंधों को भले ही बनाये रखे मगर वह एक तरह से उनको ढोता ही रहता हैउनका निर्वहन नहीं करता है. 




जो रिश्ते इन्सान को स्वाभाविक रूप से मिलते हैं उनका अपना ही अलग रंग-रूप है किन्तु जो रिश्ता वह खुद बनाता है उसके प्रति वह अपनी समझ-बूझअपने दिल की पसंदअपने दिमाग की सोच आदि की मदद लेता है. इसके बाद भी सत्य यही है कि संबंधों में औपचारिकता नहीं चल सकती है. ऐसा कोई भी सम्बन्ध जो औपचारिकता के चलते बनता हैकिसी स्वार्थ के चलते बनता है उसमें एकसासों की जबरदस्त कमी होती है. एहसासों की कमी के साथ बनतेपनपते सम्बन्ध न तो मधुरता प्रदान करते हैं और न ही उसमें ख़ुशी मिलती है. सत्यता यह है कि रिश्तेसम्बन्ध के बनने में भले ही इन्सान की अपनी पसंद हो मगर दो लोगों के बीच की कुछ ऐसी स्थिति भी होती है जो उनके बीच एक तरह की बॉन्डिंग का निर्माण करती है. दो लोगों के बीच की मानसिक स्थितिउनके दिल के सामंजस्य की स्थिति या कुछ ऐसी बॉन्डिंग स्वतः निर्मित होने लगती है कि एक इन्सान पहली मुलाकात में ही पसंद आने लगता है. यही कुछ ऐसा भी होता है कि कोई पहली मुलाकात में ही पसंद नहीं आता है. किसी भी इन्सान के शारीरिक हावभावसौन्दर्य भले ही एकबारगी प्रभाव डालते हों मगर बहुधा देखने में आता है कि किसी तरह का अप्रत्यक्ष एहसास सर्वोपरि होकर असरकारक भूमिका निभाता है. पसंद आने वाले उस इन्सान से दिल की बात कहने में भी ख़ुशी मिलती है. उस व्यक्ति से अपने सुख-दुःख बाँटने में भी किसी तरह का संकोच नहीं होता है. एहसासों से बंधे रिश्ते में आपस में किसी तरह की औपचारिकता नहीं रह जाती है. ऐसे लोगों से अपने दिल की बात बताने का मन करता हैउनके दिल की बात सुनने की इच्छा होती है.


संबंधों के बीच एहसासों की डोर का होना अत्यंत आवश्यक है. बिना एहसास रिश्तों का बहुत लम्बे समय तक चलना नामुमकिन है. यह एहसास आपसी विश्वासआपसी सहयोगआपसी समन्वय की भावना से ही निर्मित होता है. ऐसे में जबकि समाज में आपसी संबंधों मेंरिश्तों में लगातार गिरावट देखने को मिल रही हैहम सभी का दायित्व यही होना चाहिए कि किसी तरह की परिभाषा में बांधे बिना संबंधों कोरिश्तों को एहसासों के साथ जीना शुरू किया जाये. आपस में समन्वयस्नेहविश्वास बनाये रखा जाये.


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04 अक्टूबर 2021

मौज, मस्ती, अपनेपन से सजी यात्रा

इधर लगभग चार साल के लम्बे अन्तराल के बाद प्रयागराज जाना हुआ. जबसे प्रयागराज जाना शुरू किया है, इतना लम्बा अन्तराल कभी नहीं आया. प्रयागराज, तबके इलाहाबाद की पहली यात्रा वर्ष 1994 में हुई थी. उस समय एक प्रतियोगी परीक्षा को देने के लिए वहाँ जाना हुआ था. पहली बार देर रात पहुँचने का भी अपना जबरदस्त अनुभव रहा था. युवावस्था के जोश में उस समय दिमाग में नहीं आया कि देर रात दो बजे किसी मोहल्ले, कॉलोनी में कोई इस इंतजार में नहीं बैठा होगा कि हम वहाँ आयें और उससे अपने मित्र के कमरे का पता पूछें. रेलवे स्टेशन उतरने के बाद प्रयागराज के शिवकुटी इलाके के लिए रिक्शे से चल दिए. उरई से उस इलाके की सामान्य सी जानकारी लेकर चले थे और उसी जानकारी को रिक्शे वाले के सामने उड़ेलते हुए उसके सामने यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे जैसे कि हमें वहाँ के बारे में बहुत गहरी जानकारी हो. उस समय अँधेरे में तो रिक्शे वाले का चेहरा दिख नहीं रहा था मगर बाद में जब सोचते तो लगता कि वह निश्चित ही हम पर हँस रहा होगा या फिर हमें इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल के किसी विद्यार्थी का परिचित समझ कर घबराया हुआ होगा.


बहरहाल, रिक्शे वाले से बतियाते हुए, आसपास की जानकारी लेते हुए शिवकुटी पहुँचने की जल्दी में थे. उस जल्दी में भी, उस अँधियारे में भी एक बार भी ख्याल नहीं आया कि यदि अपने मित्र का कमरा न मिला तो इतनी रात वापसी कहाँ के लिए करेंगे? रुकने के लिए ठिकाना कहाँ लिया जायेगा? रिक्शा चलते-चलते इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल के पीछे आ गया. अभी तक के सन्नाटे भरे रास्ते के बाद अब चहल-पहल दिखाई दी. कुछ लड़कों के छोटे-छोटे से झुंड एक चाय के ढाले को अपने शोरगुल, मस्ती से गुलज़ार किये थे. उन्हीं से अपने मित्र का पता पूछा तो एक लड़के ने वहाँ का रास्ता बताया. काफी देर रिक्शे वाले सहित भटकने के बाद देर रात लगभग ढाई बजे गलियों में टहलते-धुआँबाजी करते कुछ लड़कों ने हमें हमारे मित्र के कमरे तक पहुँचाया.


उसके बाद प्रयागराज का चक्कर लगातार लगता रहा. हमारे एक अभिन्न मित्र या कहें कि किसी दूसरे नाम, रूप, आकार में हमारी ही छवि संदीप की नौकरी का आरम्भ प्रयागराज से हुआ. इफ्को की अपनी ट्रेनिंग से लेकर अभी तक प्रयागराज में ही जमा हुआ है और हमारा उसी ट्रेनिंग के समय से अभी तक लगातार उसके पास जाना होता रहता है. ट्रेनिंग के समय में बहुत-बहुत समय तक रुकना होता था उसके पास. उसके साथ उसके सहकर्मी भी रहा करते थे. सभी युवा, सभी अविवाहित, सभी मस्ताने सो बस ट्रेनिंग और उसके बाद प्रयागराज की घुमक्कड़ी. उस घुमक्कड़ी के साथ-साथ संदीप और उसके सहकर्मियों ने प्लांट भ्रमण करवा कर हमें बहुत सारे लोगों से परिचित करवा दिया.  


संदीप 


इस बार बहुत ही लम्बे अन्तराल बाद जब प्रयागराज जाना हुआ. एक शाम इफ्को के लिए निर्धारित की गई. हमारा अन्तराल भले ही बहुत लम्बा रहा हो मगर संदीप और अखिलेश ने हमारी उपस्थिति को अपने प्लांट में बनाये रखा. हमारी बातों, हमारी रचनाओं, हमारे लेखों ने हमारे नाम को उनके सहकर्मियों के बीच उपस्थित रखा. इसका एहसास उस शाम हुआ जबकि हमारा उन सभी लोगों से मिलना हुआ. एक शानदार पार्टी के बीच शेरो-शायरी की महफ़िल जमी रही, चुटकुलों की, ठहाकों की बारिश होती रही. मिलने वाले कुछ चेहरे परिचित रहे और बहुत सारे चेहरे अपरिचित थे, पहली बार मिल रहे थे मगर उस मुलाकात में आत्मीयता ऐसी जैसे कि बरसों से जानते हों. देखा जाये तो यह सही भी था. हम भले बहुत से लोगों को न जान रहे हो, पहचान रहे हों मगर संदीप और अखिलेश के कारण हमसे सभी परिचित थे.


अखिलेश


मौज-मस्ती-अपनापन आदि से सजी इस यात्रा ने लम्बे अन्तराल से उपजी बोझिलता को दूर किया. इसके साथ ही उरई के हमारे बहुत पुराने मित्र से भी मुलाकात करवा दी. यद्यपि मुलाकात अल्प समय की रही तथापि वादा किया जल्द ही दीर्घ मुलाकात की, कुछ रचनात्मकता भरी पहल के साथ. 


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10 जून 2021

रक्त-सम्बन्ध से ज्यादा गहरा रिश्ता - 2050वीं पोस्ट

कुछ घटनाएँ संयोग रूप में हमारे साथ जुड़ सी गई हैं. ऐसी तमाम घटनाओं में एक घटना रक्तदान करने की है. संभव है कि प्रत्येक व्यक्ति के साथ उसके द्वारा किये गए पहले रक्तदान की स्मृतियाँ गहरे से जुड़ी हों क्योंकि ये कार्य है ही ऐसा. हमारे साथ भी पहले रक्तदान की घटना आज भी गहरे से जुड़ी हुई है. इस गहराई से जुड़े होने के पीछे कोई विशेष घटना नहीं बल्कि पहली बार 1990-91 में नकली नाम से रक्तदान करना जुड़ा है. इस बारे में बहुत न लिखेंगे क्योंकि कई बार पहले भी लिख चुके, इस बारे में. इसे आप यहाँ से पढ़ सकते हैं.


रक्तदान करने से लेकर एक और घटना जुड़ी है जो स्मृति-पटल पर सदैव को अंकित हो गई है. आज श्वेता की स्मृति में पूर्व की भांति रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया था. श्वेता-अंकुर से पारिवारिक घनिष्टता होने के कारण स्वाभाविक था कि इस आयोजन में सक्रिय उपस्थिति रहनी ही थी. अब पता नहीं इसे संयोग कहा जाये कि दुर्योग कि श्वेता से हमारी अंतिम मुलाकात रक्तदान करने के दौरान ही हुई थी. किसी को आवश्यकता पड़ने पर उसे कॉल की गई होगी. चिकित्सक परिवार से सम्बन्ध रखने के कारण उसे रक्त की महत्ता ज्ञात थी. तत्काल उसकी उपस्थिति रक्तदान के लिए हुई. उस समय तक हम रक्तदान कर चुके थे. श्वेता के रक्तदान करने के बाद हमारी एक मित्र ने हमसे उसकी तरफ इशारा करते हुए उससे परिचित होने की बात पूछी. हमने श्वेता को चुप रहने का इशारा करते हुए उससे अपना परिचित न होना बताया. हमारी उसी मित्र ने जानकारी देते हुए बताया कि ये मुस्कान हॉस्पिटल वाले डॉ० अंकुर शुक्ला की पत्नी हैं. हमने अंकुर के नाम पर भी अनभिज्ञता दिखाई तो हमारी मित्र चौंकी क्योंकि उस समय तक अंकुर और मुस्कान हॉस्पिटल जनपद में ही नहीं वरन आसपास के क्षेत्रों में भी प्रसिद्द हो चुके थे. ऐसे में हमें इनके बारे में न मालूम होना आश्चर्य की, चौंकने की बात ही थी.


हमारी मित्र की शक्ल-सूरत देख हम दोनों ठहाका मार कर हँस दिए. ऐसा इसलिए क्योंकि अंकुर हमारे छोटे भाई के समान है और उस दिन के पहले भी कई बार हम लोगों की मुलाकात पारिवारिक माहौल में हो चुकी थी. तब श्वेता ने ही उन मित्र का संशय दूर करते हुए कहा, ये हमारे बड़े भाई हैं. तब अंदाजा भी नहीं था कि हँसने-खिलखिलाने वाली, सबकी सहायता को तत्पर रहने वाली श्वेता के साथ हमें अगला कोई पल किसी भी रिश्ते के रूप में बिताने को नहीं मिलेगा. 


फ़िलहाल, आज के आयोजन में हमेशा की तरह अपने दायित्व को पूरा किया. हमारे साथ हमारे छोटे भाई हर्षेन्द्र ने भी रक्तदान किया. पिछले कई सालों से प्रतिवर्ष चार बार रक्तदान करने का नियम बना रखा है. हर बार एक सवाल किया जाता है कि कितने बार रक्तदान कर चुके हैं? इसके जवाब में हम हर बार उनको अपनी मर्जी की संख्या भरने के लिए बोल देते हैं. हर बार खुद से एक सवाल करते हैं, कई बार चिकित्सा अधिकारियों से भी किया मगर उचित जवाब न मिला कि आखिर रक्तदान करने वाले से उसके द्वारा किये जाने वाले रक्तदान की संख्या क्यों पूछी जाती है? विगत वर्षों का जितना अनुभव हमें है ये स्थिति आपस में सिर्फ प्रतिद्वंद्विता बढ़ाती है, एक तरह के अहंकार को बढ़ाती है.




हर्षेन्द्र, अंकुर, श्वेता, हम 


(आज, 10 जून 2021 की कुछ फोटो)

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(यह हमारे इस ब्लॉग की 2050वीं पोस्ट है)

08 जनवरी 2021

दिल से दिल के जुड़ाव में मनोभावों की पावनता

समय का गुजरना सिर्फ गुजरना ही नहीं होता है बल्कि उसके साथ बहुत कुछ भी गुजर जाता है. गुजरता हुआ समय अपने गुजरने का एहसास कराता हुआ बहुत खालीपन छोड़ जाता है. इस खालीपन के साथ बहुत सारी बातें याद रह जाती हैं और बहुत सी बातें हमेशा को जुड़ी रह जाती हैं. इस समय ने ही संबंधों, रिश्तों की परिभाषा को अलग-अलग स्वरूप, अलग-अलग आयाम दिए हैं. गुजरते समय में रिश्ते भी जुड़े होते हैं, सम्बन्ध भी जुड़े होते हैं, इन्सान भी जुड़े होते हैं. रिश्तों, संबंधों की भावात्मकता के चलते न जाने कितने लोग अपने बनते हैं और न जाने कितने लोगों से अपनापन बनता है. इस अपनेपन में दो दिलों के बीच, दो विचारों के बीच, दो भावनाओं के बीच की आपसी सामंजस्य क्षमता, आपसी समन्वय आदि का बहुत बड़ा योगदान रहता है. संबंधों का ये अपनापन समाज में स्नेह, प्रेम की आधारशिला होता है. आवश्यक नहीं कि इस स्नेह में, इन संबंधों में आपस में किसी तरह की स्वार्थी मानसिकता छिपी हो. दिल से दिल का तालमेल विशुद्ध रूप से मनोभावों की शुद्धता का परिणाम है. दो दिलों के बीच की आपसी ईमानदारी का प्रतिफल है.




दो लोगों के बीच की आपसी भावात्मक ईमानदारी के चलते संबंधों में, रिश्तों में प्रगाड़ता बढ़ती है. रक्त-सम्बन्धी न होने के बाद भी अनेक रिश्ते रक्त-संबंधों से ज्यादा सशक्त और विश्वासपरक सिद्ध होते हैं. देखा जाये तो यह एक तरह की आपसी बॉन्डिंग होती है जो बिना कुछ कहे, बिना कुछ करे दो लोगों में स्वतः ही एक-दूसरे के प्रति आकर्षण का भाव जगाती है. यही भाव दो लोगों को करीब लाता है, उनमें रिश्तों की, संबंधों की उष्णता का प्रवाह करता है. विशुद्ध ईमानदारी, विश्वास पर आधारित इस तरह के रिश्तों, संबंधों की पावन इमारत सदियों तक दिल को धड़काती है. गुजरते दिनों की स्मृतियों को जीवंत रखती है. समय गुजरता रहता है और अपनेपन की, अपनों की यही स्मृतियाँ, यही यादें उनको हमारे बीच सदैव जीवित रखती हैं. व्यक्ति सामने है या नहीं, इससे अधिक मायने रखता है कि व्यक्ति दिल में है या नहीं. दिल में किसी के बसे होने के कारण ही वर्षों बीत जाने के बाद भी उसे भुलाया नहीं जाता है.


संबंधों, रिश्तों की प्रगाड़ता दो दिलों को जोड़ती है, दो लोगों के बीच कहे-अनकहे संसार का विस्तार करती है. यही प्रगाड़ता यदि संबंधों का, प्रेम का विस्तार करती है, चेहरे पर हँसी का प्रादुर्भाव करती है तो यही प्रगाड़ता आँखों में नीर भी भरती है. न जाने किस तरह की भावनात्मकता का संसार चारों तरफ रचा-बसा होता है जहाँ हँसी-ख़ुशी के साथ आँसुओं का प्रवाह होता है, अपनों के खोने का भय होता है, सबकुछ उजड़ जाने का डर होता है. किसी का एक पल में मिलकर जीवन भर के लिए जुड़ जाना और किसी का जीवन भर साथ रहकर भी एक पल में जुदा हो जाना, आश्चर्यबोध जैसा कुछ प्रतीत करवाता है. न कहने के बाद भी सबकुछ समझने का भाव, सबकुछ समझते हुए भी कुछ न कहने का बोध, जैसे अलौकिक दुनिया का निर्माण करता है. काश! संबंधों, भावनाओं, रिश्तों, संवेदना की मासूम सी आधारभूमि पर आँसुओं की, जुदा होने की, सबकुछ छूट जाने की कष्टप्रद खरोंच न बनने पाती.


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वंदेमातरम्

05 जनवरी 2021

सम्बन्धों-रिश्तों में बढ़ती नकारात्मकता

सामाजिकता का ताना-बाना वर्तमान में किस कदर उलझ गया है, इस बात की कल्पना कर पाना भी कई बार सम्भव सा नहीं लगता है. जीवन की आपाधापी में, मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने की जद्दोजहद में इंसान रिश्तों की कदर करना भूलता सा जा रहा है. रिश्तों का आपसी साहचर्य भी उसके लिए विमर्श का, विवाद का, द्वंद्व का विषय बनता जा रहा है. आये दिन कहीं न कहीं ऐसी घटनायें सामने आती हैं जो इस पूरे सामाजिक ढांचे पर विचार करने को विवश करती हैं. हमारी सामाजिक अवधारणा रिश्तों की जिस गरिमामयी डोर से पूरी सशक्तता के साथ कभी बँधी दिखाई देती थी, आज वही अवधारणा टूट-टूट कर बिखरती दिख रही है. अधिसंख्यक रूप में सम्बन्धों में मधुरता का अभाव, रिश्तों में कड़वाहट, आपसी गरमाहट में कमी देखने को मिलती है. इस तरह की स्थितियाँ जहाँ एक ओर बेचैन करती हैं वहीं दूसरी ओर सामाजिक शोधपरक अध्ययन को भी प्रेरित करती हैं.




अभी कुछ दिनों पूर्व एक परिवार का उदाहरण सामने आया जिसके बाद सामाजिक, पारिवारिक विसंगति को लेकर एक बहस शुरू होनी चाहिए थी मगर कहीं कुछ नहीं हुआ. मीडिया के द्वारा बस एक खबर सामने आई, एक फोटो सामने आई और पूरी बात वहीं समाप्त सी कर दी गई. एक समृद्ध परिवार की बुजुर्ग महिला सड़क किनारे एक छोटी सी जगह में मिली. मिली भी तब जबकि उसमें साँसें न रह गईं. आश्चर्य का विषय यह है कि उसके रक्त सम्बन्धी परिजन उच्च पदों पर भी आसीन हैं. इसके बाद भी उस बुजुर्ग महिला को बेसहारा जीवन गुजारने पर मजबूर होना पड़ा. यह एकमात्र घटना नहीं जिसने सामाजिक, पारिवारिक मर्यादाओं को, रिश्तों की गरिमा को लांछित किया है. पति द्वारा पत्नी की हत्या, पत्नी द्वारा प्रेमी संग मिलकर पति, बच्चों की हत्या, बेटे-बेटी द्वारा प्रेम की खातिर अपने परिजनों की हत्या, अपहरण जैसी घटनाएँ अब आये दिन पढ़ने-देखने को मिल जाती हैं.


इन घटनाओं के साथ-साथ लगभग जीवन-शैली की तरह हमारे आसपास पिता-पुत्र के बीच अनबन की, कभी भाई-भाई की रंजिश की, कभी अपनी ही बहिन-बेटी से कुकृत्य की, कभी अपनी ही गर्भस्थ-नवजात बेटियों को मौत देने की, कभी दहेज की खातिर बहुओं की मार डालने की, कभी जायदाद के लालच में हत्याओं के होने की, कभी प्रेम-विवाह के कारण वीभत्स कांड करने की दुर्दान्त खबरें चलती ही रहती हैं. ऐसे में हो सकता है कि उक्त घटना मन को विचलित न करे किन्तु एक मां के साथ उसके रक्त-सम्बन्धियों द्वारा, उसकी ही संतानों द्वारा इस तरह का अमानवीय व्यवहार करना विचारणीय है. विचार करना होगा कि समाज के पारम्परिक स्वरूप नष्ट होने से, उसकी सामाजिकता के नित विध्वंस होने से ऐसे गरिमामयी रिश्तों में भी टूटन, विचलन आयेंगे. इस टूटन का प्रभाव सिर्फ उसी एक परिवार पर, उन्हीं कुछ परिजनों पर नहीं पड़ता है बल्कि समग्र रूप में इसका प्रभाव समाज पर भी पड़ता है. हम सभी जानते-समझते हैं कि यह प्रभाव किसी रूप में सकारात्मक न होकर नकारात्मक ही होता है. परिवारों को, समाज को इस बढ़ती नकारात्मकता से बचाने के लिए सकारात्मक सोच वालों को आगे आना ही होगा.


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वंदेमातरम्

30 दिसंबर 2020

रिश्ते, सम्बन्ध मिट्टी का घरोंदा नहीं

आए दिन रिश्तों की बदलती परिभाषा देखने को मिलती है। अचानक से सम्बन्धों की प्रगाढ़ता में नकारात्मक परिवर्तन उत्पन्न हो जाते हैं। रिश्तों, सम्बन्धों की ऐसी प्रगाढ़ता के अचानक से समाप्त होने के पीछे की स्थिति का आकलन लोग करने के बजाय सम्बन्धों, रिश्तों को तोड़ने में ज्यादा विश्वास रखते हैं। यह अपने आपमें अबूझ पहेली नहीं है बल्कि एक सीधा सामान्य सा नियम है कि जिन सम्बन्धों में किसी न किसी तरह का व्यावसायिक दृष्टिकोण समाहित रहता है, वह सम्बन्ध उस व्यावसायिकता के समाप्त होते हो खत्म हो जाता है। ऐसे रिश्तों का अतीत भले ही कितना पुराना क्यों न हो, ऐसे रिश्तों का कालखंड कितना ही दीर्घ क्यों न हो पर यदि उनके किसी भी कोने में लाभ लेने की मानसिकता छिपी हो तो समय के प्रवाह में किसी दिन ऐसे सम्बन्ध छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। 




यह मानवीय दुर्बलता कही जाए या किसी व्यक्ति विशेष की अपनी चारित्रिक कमजोरी कि वर्षों के सम्बन्धों को अगला एक झटके में समाप्त कर लेता है। यहाँ समाप्ति ही नहीं होती सम्बन्धों की बल्कि इस तरह की स्थिति बना दी जाती है कि लगता है जैसे वे आपस में कभी परिचित ही न रहे थे। सम्बन्धों, रिश्तों को तोड़ने के प्रति इस प्रवृत्ति के लोगों को इसका भान नहीं होता है कि वे किसी एक व्यक्ति से सम्बन्ध समाप्त नहीं कर रहे हैं बल्कि सामाजिक वातावरण में एक प्रकार की शून्यता भी पैदा कर रहे हैं। 

अकसर सम्बन्धों के समाप्त होने को दो व्यक्तियों की आपसी स्थिति समझ लिया जाता है जबकि स्थिति इसके ठीक उलट है। किसी भी दो जनों के व्यवहार संग बहुत सारे लोगों का जुड़ाव होता है। रिश्तों की टूटन इन सभी जुड़ावों में दरार पैदा कर देती है। यह टूटन, यह चटकन पारिवारिकता को, सामाजिकता को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। आपसी स्नेह, विश्वास, भरोसे की कमी के पीछे बहुत हद तक इस तरह का व्यवहार जिम्मेवार होता है। समझना चाहिए कि रिश्ते, सम्बन्ध, विश्वास आदि कोई मिट्टी का घरोंदा नहीं जो खेलने के लिए बनाया और मन भर जाने पर बिखेर दिया। सम्बन्ध, रिश्ते प्राणवायु हैं, जिनके सहारे मानव का, मानवता का, समाज का, सामाजिकता का विकास होता है।


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वंदेमातरम्

28 दिसंबर 2020

हमारा दिल तो बच्चा है जी

दिल वाकई बच्चा ही होता है. यह किसी फिल्म का डायलाग मात्र नहीं कि दिल तो बच्चा है बल्कि इसे बहुत से लोगों ने अपने जीवन में इस फ़िल्मी डायलाग के पहले भी महसूस किया होगा, इस पंक्ति को कई बार बोला भी होगा. ये भी नहीं कह सकते कि ऐसा सबके साथ होता होगा क्योंकि बहुतेरे लोगों ने अंधी दौड़ में भागते हुए अपने दिल को ही नहीं मारा है बल्कि उसके बचपने को भी मार डाला है. यह आश्चर्य लगेगा आपको मगर यह सत्य है. असल में व्यक्ति की उम्र कितनी भी क्यों न हो जाए, उसके पास अनुभव कितना ही क्यों न हो जाए, वह किसी भी पद पर क्यों न पहुँच जाए मगर उसके अन्दर का बच्चा, उसके दिल का बचपना कभी बड़ा नहीं होता. गौर करिए, मौका मिलते ही, कोई ऐसा अवसर आने पर जबकि बच्चों के साथ घुलने-मिलने का समय हो तो कोई भी व्यक्ति अपना पद, प्रस्थिति, प्रतिष्ठा भुलाकर बच्चों के साथ आनंदित होने लगता है, उनके साथ खेलने लगता है.


दिल का यह बचपना, दिल का इस तरह बच्चा होना बहुत से लोग जीवित बनाये रखते हुए अपनी उम्र के साथ-साथ उसे साथ लिए रहते हैं. इसके उलट बहुत से लोग जीवन के एक मोड़ पर उस बच्चे को कहीं पीछे छोड़ देते हैं, उसकी हत्या कर देते हैं. आज बात दूसरों की नहीं बल्कि खुद अपनी. ज़िन्दगी का एक बहुत बड़ा हिस्सा गुजारने के बाद, उम्र का एक बहुत बड़ा भाग निकालने के बाद, सामाजिक जीवन से बहुत सुखद-दुखद अनुभव हासिल करने के बाद भी हम अपने दिल को अकेला नहीं छोड़ सके हैं. दिल आज भी बचपना करता है. आज भी हमारा मन करता है तो सड़क पर चीखते-चिल्लाते हैं, जैसे कि कभी कॉलेज, स्कूल के समय में करते थे. आज भी मन करता है तो किसी भी कार्यक्रम के पसंद न आने पर हूटिंग करते हैं, मुँह में उँगली डालकर सीटी मारते हैं. दिल की ऐसी हरकतों के साथ-साथ आज भी वे हरकतें भी हमारा दिल कर जाता है जो टीनएजर्स की हरकतें कही जाती हैं.




जी हाँ, हमारा दिल आज भी इश्क, मुहब्बत फरमाने से बाज़ नहीं आता है. फ्लर्ट करने जैसी स्थिति भले ही हम न बनने देते हैं मगर आज भी आये दिन पहली नजर का प्रेम हम कर बैठते हैं. इसके अलावा भी हमारा दिल मुहब्बत कर बैठता है. इस मुहब्बत का इजहार, इकरार करना या न करना उसकी नितांत व्यक्तिगत स्थिति है. हो सकता है कि इस पोस्ट को पढ़ने के साथ ही बहुत से लोगों को आपत्ति होने लगेगी. आपत्ति इसलिए क्योंकि जब कोई व्यक्ति सामाजिक रूप से अपना दायरा बना ले तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वो गधे की तरह सिर झुकाए खड़ा रहे, अपने को बौद्धिक बनाये रहे. कोई क्या कहता है, इससे हमें फर्क नहीं पड़ता है, हम आज भी वही करते हैं जो हमें अच्छा लगता है, हमारे दिल को पसंद आता है.


इसे पता नहीं हमारी स्वीकारोक्ति समझी जाए या फिर कुछ और मगर सच यही है कि यदि आप किसी को निस्वार्थ भाव से पसंद करते हैं, उसके प्रति गलत ख्याल नहीं रखते हैं तो किसी को प्रेम करना, उसे पसंद करना किसी भी रूप में गलत नहीं, ऐसा हमारा मानना है. कोई न कोई आये दिन अपनी किसी न किसी व्यक्तिगत चारित्रिक विशेषता के कारण, अपने गुणों के कारण, अपने कार्यों के कारण पसंद आता रहता है तो इसमें हमें कुछ भी बुरा नहीं समझ आता है. इन दिनों कुछ ऐसा हो भी रहा है. किसी के प्रति एक आकर्षण सा महसूस हो रहा है. ऐसा एहसास खुद में हो रहा है कि उसका साथ ख़ुशी भी देता है, दिल को संतुष्टि देता है. यह एक सामान्य सी स्थिति है और इसको लेकर किसी भी तरह की असामान्यता, असहजता नहीं है. यदि कहा जाता है कि दिल तो बच्चा है तो ये भी कहा जाता है कि ज़िन्दगी चार दिन की है. बस इन चार दिनों को याद रखते हुए उन्हें खुशनुमा तरीके से गुजारने की कोशिश करनी चाहिए.


ज़िन्दगी एक सफ़र की तरह है. जैसे सफ़र में दसियों लोग लोग मिलते, पसंद आते हैं इसके साथ-साथ वे बिछड़ते भी हैं, दूर भी होते हैं मगर ऐसी स्थिति के कारण हम उनके प्रति या खुद अपने प्रति किसी भी तरह का पूर्वाग्रह नहीं रखते हैं. कुछ ऐसा ही हमारे साथ है, दिल के मामले में. कोई पसंद आता है, किसी से प्यार होता है, कोई पसंद आ रहा है, किसी से प्यार हो रहा है तो महज इसलिए कि हमारा दिल तो आज भी बच्चा है जी.


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वंदेमातरम्

18 दिसंबर 2020

वर्तमान सुसज्जित करें भविष्य स्वतः ही बेहतर बनेगा

समय जिस तेजी से निकल रहा है उसे देखकर भविष्य की योजनायें बनाने से बेहतर है कि वर्तमान को इस तरह से सुसज्जित किया जाये कि भविष्य स्वतः ही बेहतर बन जाए. इस वर्ष के पहले तक लोगों में आपाधापी देखने को मिलती थी, भौतिक वस्तुओं के प्रति एक तरह की तृष्णा दिखाई पड़ती थी, संसाधनों के प्रति अजीब सा मोह देखने को मिलता था. इसी सबके बीच अचानक से कोरोना बीमारी ने आकर कुछ महीनों के लिए सबकुछ रोक सा दिया. न केवल नागरिक, न केवल बाजार बल्कि वे सार्वजनिक प्रतिष्ठान, वे संस्थाएँ, वे सेवाएँ जो किसी भी व्यक्ति ने कभी बंद नहीं देखीं थीं वे भी महीनों के हिसाब से बंद रहीं. इस बंदी के बीच जब लोगों को अपने परिजनों के बीच रहने का अवसर मिला और उनको भी जिन्हें परिजनों से दूर रहने का कष्ट समझ आया, सभी ने परिवार की, रिश्तों की, संबंधों की अहमियत को समझा. यहाँ एक बात, वे सभी लोग भले ही इसे गंभीरता से न ले रहे हों मगर उन्होंने इसकी गंभीरता को समझने की कोशिश अवश्य की.




ऐसी स्थिति देखने के बाद लगा कि शायद जब देश, यहाँ के नागरिक कोरोना के संकट से वापस आयेंगे तो शायद उस ज़िन्दगी को ज्यादा पसंद करेंगे जहाँ भौतिक संसाधन से ज्यादा मानवीयता पर जोर दिया जाये. शायद ऐसे लोग दिखावे की दुनिया से बाहर निकल कर अपनत्व की दुनिया को बसाने-सजाने का प्रयास करेंगे. यह लग रहा था कि लोग आपसी विद्वेष को भुलाते हुए आपसी समन्वय बनाये रखने की कोशिश करेंगे. अब जबकि अनलॉक हुए भी कई माह बीत गए हैं, लगता है कि कोरोनाकाल के समय हुए लॉकडाउन में इस तरह की समझ को विकसित करना या फिर ऐसी समझ विकसित होने का दिखावा करना इन्सान की मजबूरी थी. वह अभी भी इस समय से कुछ सीख नहीं सका है. आज जैसे ही उसे घर से बाहर आने का अवसर मिला, जैसे ही उसे लॉकडाउन के प्रतिबंधों से मुक्त होने का अवसर मिला उसने वही रंग दिखाने शुरू कर दिए जो कोरोनाकाल के पूर्व थे.


इससे तो यही लगता है कि इन्सान वर्तमान को देखते हुए भी सुधरने के, सुधार करने के मूड में नहीं है. वह आने वाले कल के लिए इस कदर परेशान है कि अपने आज को खराब कर रहा है. देखा जाये तो कोरोनाकाल का लॉकडाउन का समय ऐसा था जबकि इन्सान बहुत कुछ सीख सकता था. उसे समझ जाना चाहिए था कि भौतिक संसाधनों का उतना महत्त्व नहीं है जितना कि भावनात्मक संबंधों का. लॉकडाउन की घोषणा होने के बाद कोई टीवी, कार, लैपटॉप, मोबाइल, एसी, फ्रिज आदि लेने के लिए नहीं दौड़ा था बल्कि खाद्य-सामग्री जुटाने में निकल पड़ा था. उसने प्रशासन से पास बनवाने के लिए जद्दोजहद की तो अपने लोगों को घर वापस लाने के लिए न कि भौतिक संसाधन जुटाने के लिए. यदि इसके बाद भी इन्सान समझना नहीं चाहता है तो वह नितांत मूर्ख है और स्वयं ही उस रास्ते की तरफ बढ़ रहा है जहाँ का अंत विनाश है, एकाकीपन है.


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वंदेमातरम्

05 दिसंबर 2020

जिम्मेवारी का भाव और दायित्व

जिम्मेवारियाँ कभी समाप्त नहीं होतीं बल्कि अपना रूप बदल-बदल कर सामने आती ही रहती हैं. कई बार ऐसा सुनते थे लोगों को कहते कि फलां जिम्मेवारी से निपट जाएँ तो आराम मिले मगर हमें लगता है कि यदि व्यक्ति में वाकई जिम्मेवारी का भाव है तो वह कभी भी जिम्मेवारी से मुक्त नहीं हो सकता है. अपनी निभाई गई जिम्मेवारियों के प्रति भी कर्तव्य-निर्वहन के दायित्व के चलते वह व्यक्ति स्वयं को मुक्त नहीं कर पाता है. ऐसा उन व्यक्तियों के साथ विशेष रूप से होता है जो किसी न किसी रूप से खुद को गंभीरता के साथ अपने दायित्वों से जोड़े रखते हैं. किसी भी जिम्मेवारी से खुद को गंभीरता के साथ जोड़े रखने का भाव ही ऐसे व्यक्तियों को कभी भी जिम्मेवारी से मुक्त नहीं होने देता है.


जिम्मेवारी का यह भाव सुख भी देता है तो कष्ट भी प्रदान करता है. किसी दायित्व के निर्वहन का सफलता से संपन्न हो जाना और उसके बाद आने वाला समय भी उस दायित्व के सफल बने रहने का भाव पैदा करे तो चरम सुख की प्राप्ति होती है. इसके उलट यदि किसी दायित्व निर्वहन के सफल समापन के बाद भी उसके बाद का समय सफलता का बोध न जगाए, किसी रूप में जिम्मेवारी के आंशिक सफल-असफल होने का भाव पैदा करे तो वहाँ सुख की अनुभूति नहीं हो सकती है. आपस में जुड़े संबंधों, रिश्तों के चलते कई बार ऐसी स्थिति पैदा हो जाती है जबकि जिम्मेवारी उठाने वाले व्यक्ति में पश्चाताप का भाव पनपने लगता है. ऐसी स्थिति किसी भी जिम्मेवार व्यक्ति के लिए दुःख का कारण बनती है. यहाँ वे लोग ज्यादा कष्ट का अनुभव करते हैं जो जमीनी रूप से संबंधों, रिश्तों की अहमियत समझते हैं, उनसे जुड़े हैं.


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वंदेमातरम्

18 नवंबर 2020

मिलजुल कर महफ़िल सजाएँ

जब भी ये दिल उदास होता है, जाने कौन आसपास होता है या फिर अकेले हैं चले आओ, जहाँ हो आदि गीत की पंक्तियाँ दिल के उदास होने पर किसी अपने के अपने आसपास होने की गवाही दे रही हैं. दिल के उदास होने और उस उदासी में किसी अपने के पास होने की अभिलाषा करना इंसान को इंसान से जोड़े रखने की संकल्पना को पुष्ट करती है. यह एकजुटता, पारिवारिकता मानवीय आधार पर निर्मित अनेकानेक मान्यताओं, परम्पराओं का वैज्ञानिक आधार रही है. वसुधैव कुटुम्बकम महज एक विचार नहीं, चंद शब्द नहीं वरन अपने आपमें एक समृद्ध अवधारणा है, जिसके द्वारा इंसान को न केवल इंसान से बल्कि इंसान को प्रकृति के अंग-अंग से समन्विति बनाये रखने को बल मिलता है. आधुनिकता के वशीभूत हमने न केवल वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा को छिन्न-भिन्न किया वरन अपने आपको नितांत अकेलेपन का शिकार बना लिया. तकनीकी, ज्ञान, कार्य की असीमित व्यस्तता के बीच भी इंसान किस कदर अकेला पड़ गया है इसे महानगरों के साथ-साथ छोटे-छोटे नगरों, कस्बों में भी सहजता से देखा जा सकता है. किसी समय छोटे-छोटे नगरों, कस्बों, गाँवों आदि को प्रेम-स्नेह-सौहार्द्र के, आपसी सहयोग के, समर्पण के रूप में प्रस्तुत किया जाता था किन्तु आज इन सबको भी आधुनिकता की बयार में बदलते देखा जा सकता है.



आधुनिकता का आलम ये है कि इंसान के संगठित रूप में रहने को अब कबीलाई संस्कृति समझा जाने लगा है; खिलखिलाकर, ठहाका मारकर हँसने को अब ज़ाहिलाना हरकत करार दिया जाता है; अंतरंगता दिखाने को चापलूसी समझा जाने लगता है; गले मिलने, आत्मीयता जताने को अवैध संबंधों से जोड़कर देखा जाने लगता है, ऐसे में दिल का उदास होना, अकेला होना लाजिमी है. उत्सव, त्यौहार, आयोजन अब हर्ष-उल्लास का विषय नहीं वरन विवाद का विषय बनने लगे हैं, ऐसे में इंसान को भरे-पूरे होने का एहसास कैसे हो? दोस्तों की महफ़िल कहीं दूर हो गई है, सांझ ढलने से देर रात चलने वाली हँसी-मस्ती की आवारगी अब देखने को नहीं मिलती है. बच्चों के लिए खेल के मैदानों को बड़ी-बड़ी इमारतों ने निगल लिया है, अब वे मैदान में मस्ती करने के स्थान पर मोबाइल, टीवी, वीडियो गेम के सामने अकेले-अकेले अपनी सक्रियता प्रदर्शित करते हैं. बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सबको अकेलापन सालता भी है और विडम्बना देखिये कि यही अकेलापन उन्हें पसंद भी आता है, या कहें कि अकेलेपन से लगातार जूझते रहने के कारण ये अकेलापन उन्हें पसंद आने लगता है. अकेलेपन का ये रोग ऐसे लोगों के मन-मष्तिष्क में इस कदर हावी हो जाता है कि किसी का साथ, मित्रों की संगत, महफ़िलों की रौनक, हंसी-ठहाके ऐसे लोगों को अकेलेपन की तरफ और ज्यादा धकेलते से मालूम पड़ते हैं.

 

इससे पहले कि हमारे परिवार के बीच में अकेलेपन का भयावह साया किसी सदस्य को अपनी गिरफ्त में ले, किसी बच्चे को अवसाद की तरफ ले जाये, किसी युवा को अपराध की तरफ धकेले, हम सबको एकजुटता की आवश्यकता है. हम सभी को सहयोग की, अपनत्व की महफ़िल सजाकर अपने लोगों को अपने लोगों के बीच उपस्थित करना होगा. एक-दूसरे से करते हैं प्यार हम, एक-दूसरे के लिए बेक़रार हम या फिर साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जायेगा... आदि गीतों की पंक्तियाँ स्मृति में बसाकर सबको एकसाथ गाना-गुनगुनाना होगा.


14 नवंबर 2020

हँसते-गाते परिजनों संग गुजरें पर्व-त्यौहार

दीपावली, दीपावली करते-करते समय गुजर गया और दीपावली एकदम से ही गुजर गई. हर बार त्यौहार के जाते ही नए त्यौहार का इंतजार शुरू हो जाता. नया त्यौहार आते ही चला जाता और दे जाता आने वाले त्यौहार का इंतजार. यह साल अजीब तरह से गुजर रहा है. इसका आरम्भ एक ऐसी बीमारी से हुआ जो है भी और होते हुए भी न होने जैसी लग रही है. फिलहाल, इस बीमारी की बात नहीं. जिस तरह का वातावरण विगत कई महीनों से बना हुआ था, उसे देखते हुए लग रहा था कि दीपावली सहित अनेक त्यौहार फीके-फीके से गुजर जायेंगे. इसकी शंका तब और बढ़ी जबकि दीपावली से कुछ दिन पहले मनाये जाने वाला दशहरा पर्व एकदम ख़ामोशी से गुजर गया. लगा कि दीपावली भी बिना किसी शोर-शराबे के, ख़ामोशी से बीत जाएगी.


दीपावली का आना हुआ और इसके साथ आया दार्शनिक लोगों का प्रवचन देना. पर्यावरण, प्रदूषण की बातें करके अनेक जगहों पर आतिशबाजी को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया. कुछ जगहों के इस प्रतिबन्ध के बीच बहुत सारी जगहों पर खुलकर आतिशबाजी की गई. ख़ुशी का, प्रसन्नता का प्रस्फुटन देखने को मिला मगर इसके बाद भी बहुत कुछ खालीपन खुद में महसूस हुआ. इधर बहुत सालों से समस्त परिजनों का एकसाथ मिलकर त्योहारों का मनाया जाना नहीं हो पा रहा है. इस खालीपन को कोई आतिशबाजी नहीं भर सकती है. इसे विशुद्ध रूप से वही समझ सकता है, जिसने परिवार के साथ बहुत सारा समय हँसते हुए, मस्ती में गुजारा हो. फ़िलहाल तो इस बार की दीपावली कोरोना के डर को दरकिनार करते हुए बहुत सारे लोगों ने हँसते-हँसते मनाई. आशा है कि आगामी पर्व सभी लोग परिजनों के साथ एकजुट होकर ऐसे ही हँसते-गाते मनाएँगे.








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