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04 मार्च 2024

आवश्यक है निर्वाचन आयोग की सख्ती

देश इस समय चुनावी मोड में आ चुका है. वर्तमान लोकसभा के कार्यकाल को देखते हुए जल्द ही निर्वाचन आयोग द्वारा आदर्श आचार संहिता लागू कर दी जाएगी. आचार संहिता में अनेकानेक तरह के कार्यों पर प्रतिबन्ध लग जाता है. निर्वाचन आयोग अपनी तरफ से पूरी तरफ मुस्तैद रहता है कि आचार संहिता के दौरान और चुनावों के समय भी किसी तरह का ऐसा कार्य न हो सके जिससे लोगों में लोकतान्त्रिक व्यवस्था के प्रति गलत सन्देश प्रसारित हो. इस बार आयोग द्वारा आदर्श आचार संहिता लगने के पहले ही राजनैतिक दलों को स्पष्ट रूप से सचेत कर दिया गया है कि उनकी बेवजह, अनावश्यक बयानबाजी पर निगाह रखी जाएगी. आयोग द्वारा यह भी समझाया गया है कि ऐसा करने वालों पर कार्यवाई की जाएगी. निर्वाचन आयोग की सक्रियता की यह एक मिसाल है जबकि उसने आदर्श आचार संहिता लागू होने के पहले ही अपने मंतव्य को स्पष्ट कर दिया है.  

 



आयोग के सामने चुनाव को निष्पक्ष करवाने के साथ-साथ अनेक प्रकार की चुनौतियाँ रहती हैं. उसके सामने महज राजनैतिक व्यक्तियों की अनर्गल बयानबाजी को, भाषाई अशालीनता को रोकना ही प्रमुख कदम नहीं है वरन अनेकानेक अवैध तरीकों से चुनावों को प्रभावित करने को रोकना भी एक जबरदस्त चुनौती है. आयोग द्वारा इससे पहले भी चुनाव सुधारों सम्बन्धी पहल की जा चुकी है. एक व्यक्ति के दो जगह से चुनाव लड़ने को प्रतिबंधित करने, दो हजार रुपये से अधिक के गुप्त चंदे पर रोक लगने, उन्हीं राजनैतिक दलों को आयकर में छूट दिए जाने का प्रस्ताव जो लोकसभा-विधानसभा में जीतते हों आदि विचारों के द्वारा निर्वाचन आयोग ने अपनी स्वच्छ नीयत का सन्देश दिया है. किसी भी देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था की सफलता के लिए वहाँ की निर्वाचन प्रणाली का स्वच्छ, निष्पक्ष, कम खर्चीला होना आवश्यक है. किसी भी लोकतंत्र की सफलता इसमें निहित है कि वहाँ की निर्वाचन प्रणाली कैसी है? वहाँ के नागरिक सम्बंधित निर्वाचन को लेकर कितने आश्वस्त हैं? निर्वाचन प्रणाली, प्रक्रिया में कितनी सहजता, कितनी निष्पक्षता है?

 

भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विगत कुछ दशकों से निर्वाचन प्रक्रिया सहज भी रही है तो कठिनता के दौर से भी गुजरी है. निर्वाचन प्रक्रिया भयावहता के अपने चरम पर होकर वापस अपनी सहजता पर लौट आई है. अब पूरे देश के चुनावों में, किसी प्रदेश के चुनावों में एकाधिक जगहों (पश्चिम बंगाल को छोड़कर) से ही हिंसात्मक खबरों का आना होता है. एकाधिक जगहों से ही बूथ कैप्चरिंग किये जाने के प्रयासों की खबरें सामने आती हैं. निर्वाचन को भयावह दौर से वापस सुखद दौर तक लाने का श्रेय बहुत हद तक निर्वाचन आयोग की सख्ती को रहा है तो केंद्र सरकार द्वारा सुरक्षा बलों की उपलब्धता को भी जाता है. इस सहजता के बाद भी लगातार चुनाव सुधार की चर्चा होती रहती है. राजनैतिक परिदृश्य में सुधारों की बात होती रहती है. निर्वाचन की खर्चीली प्रक्रिया पर नियंत्रण लगाये जाने की कवायद होती रहती है. चुनावों में प्रयुक्त होने वाले कालेधन और अनावश्यक धन के उपयोग पर रोक लगाये जाने की नीति बनाये जाने पर जोर दिया जाता है.

 

प्रत्याशियों द्वारा अनेक तरह के अवैध स्रोतों से चुनाव में खर्चा किया जाता है. अपने चुनावी खर्चों को निर्वाचन आयोग की निर्धारित सीमा में दिखाकर परदे के पीछे से कहीं अधिक खर्च किया जाता है. विगत चुनावों में उत्तर प्रदेश के एक अंचल में ‘कच्ची दारू कच्चा वोट, पक्की दारू पक्का वोट, दारू मुर्गा वोट सपोर्ट’ जैसे नारे खुलेआम लगने का स्पष्ट संकेत था कि चुनावों में ऐसे खर्चों के द्वारा भी मतदाताओं को लुभाया जाता रहा है. मतदाताओं को धनबल से अपनी तरफ करने के साथ-साथ मीडिया के द्वारा भी चुनाव को, मतदाताओं को अपनी तरफ करने का प्रयास प्रत्याशियों द्वारा किया जाता है. बड़े पैमाने पर इस तरह के मामले सामने आये हैं जिनमें कि ‘पेड न्यूज़’ के रूप में खबरों का प्रकाशन-प्रसारण किया जाता है. बड़े-बड़े विज्ञापनों द्वारा प्रत्याशियों के पक्ष में माहौल बनाये जाने का काम मीडिया के द्वारा किया जाता है. धनबल से संपन्न प्रत्याशियों द्वारा अनेक तरह के आयोजनों के द्वारा, विभिन्न आयोजनों को धन उपलब्ध करवाने के द्वारा भी निर्वाचन प्रक्रिया को अपने पक्ष में करने के उपक्रम किये जाते हैं. बड़े-बड़े होर्डिंग्स, बैनर, बड़ी-बड़ी लग्जरी कारों के दौड़ने ने भी निर्वाचन प्रक्रिया को खर्चीला बनाया है.

 

ऐसा नहीं है कि निर्वाचन आयोग को ऐसी स्थितियों का भान नहीं है. आयोग द्वारा उठाये गए तमाम क़दमों का प्रभाव है कि सजायाफ्ता लोगों को निर्वाचन से रोका जा सका है. आयोग के प्रयासों का सुफल है कि आज हाशिये पर खड़े लोगों को मतदान का अधिकार मिल सका है, वे बिना किसी डर-भय के अपने मताधिकार का प्रयोग कर पा रहे हैं. इसके बाद भी अभी बहुत से प्रयास किये जाने अपेक्षित हैं. धन के अपव्यय को रोकने के लिए निर्वाचन आयोग को किसी भी तरह की प्रकाशित प्रचार सामग्री पर रोक लगानी होगी. मतदाताओं को सिर्फ अपने बैलट पेपर का नमूना प्रकाशित करके वितरित करने की अनुमति दी जानी चाहिए. इससे अनावश्यक तरीके से, अवैध तरीके से प्रचार सामग्री का छपवाया जाना रुक सकेगा. देखने में आता है कि प्रशासन की आँखों में धूल झोंककर स्वीकृत गाड़ियों की आड़ में कई-कई गाड़ियों को प्रचार के लिए लगा दिया जाता है. धनबल की यह स्थिति चुनावों की निष्पक्षता को प्रभावित करती है.

 

आयोग द्वारा प्रयास ये होना चाहिए कि चुनाव जैसी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया पर सिर्फ धनबलियों, बाहुबलियों का कब्ज़ा होकर न रह जाये. उसको ध्यान रखना होगा कि चुनाव खर्च की बढ़ती सीमा से कहीं कोई चुनाव प्रक्रिया से वंचित तो नहीं रह जा रहा है. आयोग का कार्य जहाँ निष्पक्ष चुनाव करवाना है वहीं उसका दायित्व ये भी देखना होना चाहिए कि चुनाव मैदान में उतरने का इच्छुक व्यक्ति किसी तरह से धनबलियों का शिकार न हो जाये. यद्यपि वर्तमान दौर अत्यंत विषमताओं से भरा हुआ है तथापि कुहासे से बाहर आने का रास्ता बनाना ही पड़ेगा.





 

28 अप्रैल 2019

ऐसे जागरूक मतदाताओं के सहारे जिंदा है हमारा लोकतंत्र


इस बार निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव को देश का महापर्व घोषित कर दिया गया है. शासन-प्रशासन अपने-अपने स्तर पर पूरा दम लगाकर अधिक से अधिक मतदान करवाने की कोशिश में लगा हुआ है. ऐसे में मतदान कितना होगा ये बाद की बात है मगर जैसा कि पहले भी कहा था कि मतदाता जागरूकता किसी के कहने से नहीं होती वरन यह स्व-स्फूर्त प्रक्रिया है जो अंतःकरण से उपजती है. जिसे भी जरा सा भी भान है अपनी जिम्मेवारी का, अपने कर्तव्य का, देश की लोकतान्त्रिक प्रणाली के प्रति विश्वास का, देश की सरकार के कार्यों के प्रति सकारात्मकता का वह अपने आपको मतदान के लिए प्रेरित कर ही लेता है. मतदान के लिए खुद को तैयार कर ही लेता है. उसे न तो प्रशासन की गोष्ठियों की आवश्यकता होती है, न रैलियों की, न नारे लिखी तख्तियों की, न आदर्श बूथ की. ऐसे लोग अपने आप मतदान के लिए सतर्क रहते हैं, जागरूक रहते हैं.


ऐसा उदाहरण आज विश्व के पहले अनाज बैंक के बुन्देलखण्ड स्थित क्षेत्रीय कार्यालय की उरई शाखा में देखने को मिला जबकि वहाँ की लाभार्थी खाताधारक महिलाएँ जनपद जालौन में 29 अप्रैल को होने वाले मतदान में हिस्सा लेने के प्रति उत्साहित दिखीं. अनाज बैंक उरई शाखा प्रतिमाह दो बार एक महिला को पांच किलो अनाज प्रदान करता है, इस उद्देश्य के साथ कि कोई भी भूखा न सोये. सभी महिलाएं ऐसी हैं जो अकेली हैं, वृद्ध हैं, अत्यंत गरीब हैं, मजबूर हैं, निराश्रित हैं. इनमें से ज्यादातर महिलाएं ऐसी हैं जो शिक्षित नहीं हैं. सामान्य अक्षर-ज्ञान से भी वंचित हैं, अपने नाम को लिखना भी नहीं जानती हैं. बहुत सी महिलाएं अत्यंत वृद्ध हैं. इसके बाद भी ख़ुशी की बात यह है कि दो-चार महिलाओं को छोड़कर सभी महिलाएं अभी तक मतदान करती रही हैं. अबकी बार कुछ महिलाओं के वोट कट गए हैं; कैसे, क्यों इसकी जानकारी उनको भी नहीं है और अनाज बैंक शाखा को भी समय से नहीं हो सकी.  

अप्रैल माह के दूसरे वितरण के दौरान आज सभी महिलाओं से मतदान करने सम्बन्धी चर्चा हुई. सभी महिलाओं ने पूर्व में अपने मतदान करने की बात कही. कुछ महिलाओं ने अपने वोट के इस बार कट जाने की समस्या बताई. उनकी बातों से लग रहा था, जैसे कि उनका वोट कट जाना गलत हुआ. उन्हीं महिलाओं में से अत्यंत वृद्ध महिला ने यहाँ तक कहा कि वह कल मतदान दिवस पर अपना आधार कार्ड लेकर अपने बूथ जाएगी. वहां किसी अधिकारी से बात करके वोट डलवाने के लिए कहेगी क्योंकि वह पहले वोट डालती रही है. सोचिये, जिस देश के नागरिकों में इस तरह का ज़ज्बा होगा, वहां का लोकतंत्र खतरे में कैसे आ सकता है? ये ऐसी महिलाएं हैं जिनको सीधे-सीधे अपने किसी जनप्रतिनिधि से काम नहीं पड़ना है. इनको किसी सरकार में बालू, शराब के ठेके नहीं चाहिए हैं. ये ऐसी महिलाएं हैं जिनके किसी परिजन को कोई सिफारिश भी नहीं करवानी है. ये सभी महिलाएं बस इतना समझ सकी हैं कि देश में सरकार के बनाने-गिराने में वोट का महत्त्व है. इसी कारण वे अपना वोट देना चाहती हैं. उनके ये जानने का प्रयास नहीं किया कि वे किसे अपना वोट देना चाहती हैं और न ही उन्होंने ये बताने-पूछने की चेष्टा की. 

सुखद ये लगा जानकर कि जहाँ आज के दौर में जनप्रतिनिधियों के क्रियाकलापों से रुष्ट होकर पढ़ा-लिखा मतदाता वोट डालने से विरक्त होने लगा है वहीं ऐसी महिलाएं अपने मतदान को लेकर सजग हैं. मतदान को छुट्टी का दिन मानकर पढ़ा-लिखा मतदाता कहीं सपरिवार पिकनिक पर निकल जाता है वहीं ये महिलाएं सबह-सुबह मतदान करने के प्रति जागरूक दिखीं. शिक्षित मतदाताओं के लिए शासन-प्रशासन द्वारा आये दिन तमाम तरह की नौटंकी करते हुए उनको जागरूक करने का प्रयास किया जा रहा है वहीं ये महिलाएं स्व-प्रेरण से मतदान के लिए जागरूक हैं. ऐसी महिलाओं, ऐसे मतदाताओं के कारण ही इस देश का लोकतंत्र जिन्दा है, इस देश की लोकतान्त्रिक प्रणाली सक्रिय है. नमन है ऐसी महिलाओं को, ऐसे जागरूक मतदाताओं को.  

27 अप्रैल 2019

एकमात्र काम बस मतदाता जागरूकता कार्यक्रम


चुनाव अपने चरम पर है और सभी जगह प्रशासन भी मुस्तैदी से जुटा हुआ है. चुनाव सम्बन्धी जो तैयारियाँ चल रही हैं, उनको लेकर जितना ध्यान प्रशासन स्तर पर रखा जा रहा है, उससे कहीं ज्यादा जोर इस बार मतदाता जागरूकता को लेकर दिख रहा है. दिन भर किसी न किसी रूप में मतदाताओं को जागरूक करने का काम किया जा रहा है. इस काम में प्रशासनिक मशीनरी जितना अधिक शामिल है, उससे कहीं ज्यादा उसने निजी मशीनरी को लगा रखा है. जागरूकता के नाम पर निजी संस्थानों को, सामाजिक कार्य करने वालों को लगा रखा गया है. कहीं-कहीं इनके द्वारा स्वेच्छा से काम किया जा रहा है और कहीं-कहीं प्रशासन द्वारा जबरिया तरीके से इनसे मतदाता जागरूकता के कार्य करवाए जा रहे हैं.


निश्चित ही चुनाव हमारे देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण भाग है और इसमें हर एक व्यक्ति को अपनी भागीदारी निभानी चाहिए. देखा जाये तो बहुत से भागों में ऐसा होता भी है. वे सरकारी लोग जिन पर सरकार का, प्रशासन का नियंत्रण है, चुनाव ड्यूटी में लगाये जाते हैं. यहाँ ऐसे लोगों की अपनी मजबूरी होती है और वे इस कार्य से खुद को सहजता से अलग भी नहीं कर पाते हैं. इस बार कई जगहों से प्रशासन द्वारा असंवेदनशील रवैया अपनाये जाने की खबरें भी मिली हैं. महिलाओं की निर्वाचन सम्बन्धी ड्यूटी लगाने में भी संवेदना का भाव नहीं दिखाया गया है. कई जगह बुजुर्ग कर्मियों के साथ भी भेदभावपूर्ण रवैया अपनाये जाने की बातें सामने आई हैं. इसके साथ-साथ चुनाव ड्यूटी से बचे लोगों को और चुनाव ड्यूटी में लगे लोगों को मतदाता जागरूकता के इतने काम सौंपे गए, लगा जैसे वर्तमान निर्वाचन में जागरूकता एक प्रमुख मुद्दा बनकर सामने आया हो. विद्यालयों के वे बच्चे भी इसमें शामिल किये गए जिन्हें अभी मतदान करने में समय है. कोचिंग सेंटर्स, विद्यालयों आदि को लगभग रोज ही किसी न किसी कार्यक्रम करने को, रैली निकालने को, गोष्टी आयोजित करने को मजबूर किया जाता रहा है. इस समय की भीषण गर्मी में बच्चों को धूप में रैली निकालने के लिए मजबूर करना किसी भी रूप में मानवीय तो समझ नहीं आया.

आज के दौर में मतदान करने वाला बहुत हद तक जागरूक है, इसके बाद भी यदि उसमें किसी तरह की सुसुप्तावस्था आई है तो वह जनप्रतिनिधियों के रवैये के चलते. उनके बेरुखे व्यवहार ने मतदाताओं को मतदान से दूर किया है. इसी तरह प्रशासन के तानाशाही भरे रवैये ने भी आम आदमी को प्रशासन से दूर किया है, उसके प्रति खौफ सा पैदा किया है. आज जिस तरह से शासन, प्रशासन, जनप्रतिनिधि अपने कार्य करने का तरीका बनाये हैं, उससे आमजनमानस में सिर्फ और सिर्फ भ्रष्ट तस्वीर बनी है. इसी के चलते प्रशासन के मतदाता जागरूकता कार्यक्रम आम जनता को सिर्फ धन कमाने के, सरकारी पैसे को खपाने का माध्यम मात्र नजर आता है. प्रशासन ज्यादा से ज्यादा मतदाता जागरूकता कार्यक्रम करवा कर, अधिक से अधिक मतदान करवा कर अपनी प्रोफाइल को बढ़िया कर लेने की कोशिश में रहते हैं. चुनाव संपन्न होने के बाद उनका रवैया भी जनप्रतिनिधियों जैसा हो जाता है. वे भी आम जनता की समस्याओं की तरफ से अपने आपको दूर ले जाते हैं. 


असल में आज जनप्रतिनिधियों ने, प्रशासन ने जनता के बीच से अपना विश्वास खो सा दिया है. आये दिन के कार्यों से इसकी झलक भी दिखाई देती है. यदि हालिया मतदाता जागरूकता कार्यक्रमों की चर्चा की जाये तो आये दिन निकलने वाली रैलियों से शहर की सड़कों पर जाम की स्थिति बनती है. चिलचिलाती धूप में राहगीर फँसे होते हैं, बच्चे फँसे होते हैं, मरीज तड़प रहे होते हैं मगर उस जाम को घंटों तक खुलवाने के लिए किसी तरह की प्रशासनिक मदद, सहयोग नहीं मिलता है. ऐसे भी जागरूकता से क्या फायदा जो अपने शहर के लोगों को ही कष्ट में खड़ा कर दे. असल में जागरूकता कहीं बाहर से ठेल-ठेल कर नहीं लाई जा सकती है. यह विशुद्ध अंतःप्रेरण का सुफल है. आज से दशकों पहले के चुनावों का दौर भी भली-भांति याद है जबकि लोग सुबह से ही मतदान करने के लिए हँसते-हँसते चल दिया करते थे. तब न तो आज की तरह रैलियाँ थीं, न गोष्ठियाँ, न नारेबाजी, न तख्तियाँ, न सेल्फी पॉइंट. तब लोग मतदान करना अपना कर्तव्य समझते थे और इसके लिए सजग रहते थे. जब तक एक-एक मतदाता चुनाव को, मतदान को अपनी जिम्मेवारी नहीं समझेगा,, अपना कर्तव्य नहीं मानेगा तब तक ऐसे ही मतदाता जागरूकता कार्यक्रम चलते रहेंगे. प्रशासन अपना काम करता रहेगा, मतदाता अपना काम करते रहेंगे, जनप्रतिनिधि अपना काम करते रहेंगे. इन सबके बीच देश का लोकतंत्र आगे बढ़ता ही रहेगा, लोकतान्त्रिक प्रणाली आगे बढ़ती रहेगी.

12 मार्च 2019

होली के दाग, रमजान का चुनाव और मुसलमानों की चुप्पी


इधर दो-तीन घटनाएँ क्रमबद्ध रूप से एक के बाद एक करके सामने आती रहीं और विवाद का विषय बनती रहीं. ये सभी घटनाएँ मुस्लिम समुदाय से जुड़ी होने के कारण भी एकदम से वायरल हो गईं. इन घटनाओं में सर्फ़ एक्सेल का विज्ञापन, निर्वाचन आयोग द्वारा घोषित चुनावी तारीखों का रमजान माह में पड़ना. उड़ती-उड़ती नज़रों से देखा जाये तो संभव है बहुत से लोगों को इसमें कोई विवाद दिखाई भी न दे. विज्ञापन वाले वीडियो में ऐसे लोगों को संभव है कि एक तरह का सौहार्द्र दिखाई दे. एक तरह का शांति-अमन का सन्देश दिया जाना दिखाई दे. शांति का सन्देश दिखना भी चाहिए मगर उसके लिए पूर्वाग्रह-रहित दृष्टिकोण चाहिए होगा. जिस तरह से होली के रंगों के बीच मजहबी रंग घोलने की कोशिश की गई उसे देखकर ऐसा लगता है जैसे नमाज को जाते बच्चे पर रंग डाल दिया जाना किसी तरह की साम्प्रदायिकता हो जाती. क्या वाकई ऐसा है? क्या इस देश में मुसलमान होली नहीं खेलते हैं? क्या यदि नमाज पढ़ने को जाते किसी मुसलमान पर रंग लग जाए तो इसमें भी हिंसा होने जैसी स्थिति बन जाएगी? ऐसे बहुत से सवाल उमड़ने-घुमड़ने के बाद बचपन में ले जाते हैं, जहाँ याद है कि हमारे मोहल्ले में तमाम हिन्दू परिवारों के बीच एक मुसलमान परिवार भी रहता था. उस परिवार के सदस्यों को किसी भी होली में बचते नहीं देखा. स्त्री हों या पुरुष, वृद्ध हों या बच्चे सभी मिलजुल कर होली खेलते दिखते थे. बाद में युवावस्था में परिचितों संग, मित्रों संग होली पर नगर भ्रमण जैसी स्थिति बनती, होली के हुरियारों की टोली गली-गली घूमती तो भी किसी मुस्लिम समुदाय के व्यक्ति को रंगों से परहेज करते नहीं देखा. हाँ, ये बात अवश्य थी कि जिसने इच्छा ज़ाहिर नहीं की, उसे रंग नहीं लगाया जाता था. ये एक तरह का अपनापन था, सौहार्द्र था जो कम से कम उस विज्ञापन वीडियो में नहीं दिखाई दिया.


दूसरा विवाद सामने आया रमजान माह में मतदान तिथियों के पड़ने का. निहायत बेवकूफी भरा विचार सामने आया कि रमजान माह होने के कारण निर्वाचन आयोग को मतदान की तिथियाँ नहीं रखनी चाहिए थी. क्या वाकई रमजान माह में अपने अल्लाह की इबादत के अलावा और कोई काम नहीं किया जाता क्या मुसलमानों द्वारा? क्या मतदान कार्य किसी तरह का अवैध कृत्य है, हिंसात्मक गतिविधि है या फिर गैर-इस्लामिक है जो रमजान माह में किया जाना पाप का भागी बनाएगा? ये महज एक चुनावी फितूर है जिसे राजनैतिक दलों द्वारा चुनावों के समय मुस्लिम समुदाय के वोटों का तुष्टिकरण करने के लिए छोड़ा जाता है. ये अवश्य माना जा सकता है कि मुसलमानों के लिए रमजान माह का विशेष महत्त्व है मगर ऐसा भी नहीं कि कुछ देर के मतदान का समय निकाल लेने पर उनकी किसी भी तरह की मजहबी गतिविधि पर अंकुश लग गया हो या फिर निर्वाचन आयोग द्वारा ही कोई अंकुश लगाया गया हो. जिस किसी ने भी इस तरह की राय व्यक्त की है वह मुस्लिम समुदाय का हितैषी नहीं वरन उसे वोट-बैंक समझने वाला व्यक्ति है. 


इन दोनों घटनाओं के सन्दर्भ में प्रतिक्रियाएं भी समाज में देखने को मिलीं. इनके बीच सबसे आश्चर्यजनक यह रहा कि खुद मुस्लिम समुदाय की तरफ से इन पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई. न तो किसी ने विज्ञापन वाले वीडियो का विरोध इस रूप में किया कि मुस्लिम भी होली खेलते हैं और न ही निर्वाचन आयोग के समर्थन में कोई मुसलमान दिखाई दिया. इससे क्या माना जाये कि देश का मुसलमान खुद को इस देश की स्थिति से, परम्पराओं से, संस्कृति से, त्योहारों से, लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से कहीं अलग रखने की कोशिश करता है? उसका होली खेलना, दीपावली पर पटाखे चलाना, मतदान करना आदि किसी मजबूरीवश किया जाता है? यही वे स्थितियाँ होती हैं जबकि किसी भी धर्म, मजहब के कट्टर लोग इनका लाभ अपने लिए उठाने की कोशिश करते हैं. उनका सन्दर्भ किसी भी व्यक्ति या वर्ग से नहीं होता है बल्कि वे ऐसे किसी भी कदम में अपना लाभ देखते-उठाते हैं. ये सामान्य सी बात है कि ऐसी किसी भी विवाद की स्थिति में, जो मुसलमानों से जुड़ा होता है, मुस्लिम समुदाय इसके विरोध में एकजुट होकर खड़ा नहीं होता है. उसकी तरफ से ऐसे विवादों पर किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं की जाती है. इससे भी सामान्य सा माहौल तनावग्रस्त बनते देर नहीं लगती है. देश के, समाज के हालात सामान्य रहें, हिन्दुओं-मुसलमानों के बीच माहौल सौहार्द्र का बना रहे इसके लिए आवश्यक है कि मुसलमान भी एक कदम आगे बढ़ाएं.

08 मार्च 2019

चुनाव सुधार के लिए सख्त होना होगा निर्वाचन आयोग को

देश इस समय चुनावी मोड में आ चुका है. वर्तमान लोकसभा के कार्यकाल को देखते हुए निकट समय में जल्द ही चुनाव आयोग चुनाव की तारीखें घोषित कर सकता है. इसके साथ ही आचार संहिता भी लागू हो जाएगी. आचार संहिता में अनेकानेक तरह के कार्यों पर प्रतिबन्ध लग जाता है. चुनाव आयोग भी अपनी तरफ से पूरी तरफ मुस्तैद रहता है कि आचार संहिता के दौरान और चुनावों के समय भी किसी तरह का ऐसा कार्य न हो सके जिससे लोगों में लोकतान्त्रिक व्यवस्था के प्रति गलत सन्देश प्रसारित हो. वर्तमान केंद्र सरकार ने देश में तमाम सारे परिवर्तनों, संशोधनों को लागो किया जिनको देखते हुए कहा जा सकता है कि हमारा देश इस समय एक नए दौर से गुजर रहा है. जैसे केंद्र सरकार ने जहाँ नोटबंदी के द्वारा कालेधन पर चोट करने का सन्देश दिया, भारतीय अर्थव्यवस्था को कैशलेस बनाने का रास्ता दिखाया, एयरस्ट्राइक के द्वारा आतंकवाद को खुली चुनौती दी, ठीक उसी तरह निर्वाचन आयोग ने भी चुनाव सुधारों सम्बन्धी पहल करने की मंशा ज़ाहिर की है. एक व्यक्ति के दो जगह से चुनाव लड़ने को प्रतिबंधित करने, दो हजार रुपये से अधिक के गुप्त चंदे पर रोक लगने, उन्हीं राजनैतिक दलों को आयकर में छूट दिए जाने का प्रस्ताव जो लोकसभा-विधानसभा में जीतते हों के द्वारा निर्वाचन आयोग ने अपनी स्वच्छ नीयत का सन्देश दिया है.


किसी भी देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था की सफलता के लिए वहाँ की निर्वाचन प्रणाली का स्वच्छ, निष्पक्ष, कम खर्चीला होना आवश्यक है. किसी भी लोकतंत्र की सफलता इसमें निहित है कि वहाँ की निर्वाचन प्रणाली कैसी है? वहाँ के नागरिक सम्बंधित निर्वाचन को लेकर कितने आश्वस्त हैं? निर्वाचन प्रणाली, प्रक्रिया में कितनी सहजता, कितनी निष्पक्षता है? भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विगत कुछ दशकों से निर्वाचन प्रक्रिया सहज भी रही है तो कठिनता के दौर से भी गुजरी है. निर्वाचन प्रक्रिया भयावहता के अपने चरम पर होकर वापस अपनी सहजता पर लौट आई है. अब पूरे देश के चुनावों में, किसी प्रदेश के चुनावों में एकाधिक जगहों से ही हिंसात्मक खबरों का आना होता है. एकाधिक जगहों से ही बूथ कैप्चरिंग किये जाने के प्रयासों की खबरें सामने आती हैं. निर्वाचन को भयावह दौर से वापस सुखद दौर तक लाने का श्रेय बहुत हद तक निर्वाचन आयोग की सख्ती को रहा है तो केंद्र सरकार द्वारा सुरक्षा बलों की उपलब्धता को भी जाता है. इस सहजता के बाद भी लगातार चुनाव सुधार की चर्चा होती रहती है. राजनैतिक परिदृश्य में सुधारों की बात होती रहती है. प्रत्याशियों की आचार-संहिता पर विमर्श होता रहता है. निर्वाचन की खर्चीली प्रक्रिया पर नियंत्रण लगाये जाने की कवायद होती रहती है. चुनावों में प्रयुक्त होने वाले कालेधन और अनावश्यक धन के उपयोग पर रोक लगाये जाने की नीति बनाये जाने पर जोर दिया जाता है.

प्रत्याशियों द्वारा अनेक तरह के अवैध स्रोतों से चुनाव में खर्चा किया जाता है. अपने चुनावी खर्चों को निर्वाचन आयोग की निर्धारित सीमा में दिखाकर परदे के पीछे से कहीं अधिक खर्च किया जाता है. विगत चुनावों में उत्तर प्रदेश के एक अंचल में कच्ची दारू कच्चा वोट, पक्की दारू पक्का वोट, दारू मुर्गा वोट सपोर्टजैसे नारे खुलेआम लगने का स्पष्ट संकेत था कि चुनावों में ऐसे खर्चों के द्वारा भी मतदाताओं को लुभाया जाता रहा है. मतदाताओं को धनबल से अपनी तरफ करने के साथ-साथ मीडिया के द्वारा भी चुनाव को, मतदाताओं को अपनी तरफ करने का प्रयास प्रत्याशियों द्वारा किया जाता है. बड़े पैमाने पर इस तरह के मामले सामने आये हैं जिनमें कि पेड न्यूज़के रूप में खबरों का प्रकाशन-प्रसारण किया जाता है. बड़े-बड़े विज्ञापनों द्वारा प्रत्याशियों के पक्ष में माहौल बनाये जाने का काम मीडिया के द्वारा किया जाता है. धनबल से संपन्न प्रत्याशियों द्वारा अनेक तरह के आयोजनों के द्वारा, विभिन्न आयोजनों को धन उपलब्ध करवाने के द्वारा भी निर्वाचन प्रक्रिया को अपने पक्ष में करने के उपक्रम किये जाते हैं. बड़े-बड़े होर्डिंग्स, बैनर, बड़ी-बड़ी लग्जरी कारों के दौड़ने ने भी निर्वाचन प्रक्रिया को खर्चीला बनाया है.

ऐसा नहीं है कि निर्वाचन आयोग को ऐसी स्थितियों का भान नहीं है. ऐसा भी नहीं कि उसके द्वारा ऐसी स्थितियों पर अंकुश लगाये जाने के सम्बन्ध में कोई कदम उठाया नहीं जा रहा है. निर्वाचन आयोग द्वारा उठाये गए तमाम क़दमों का प्रभाव है कि सजायाफ्ता लोगों को निर्वाचन से रोका जा सका है. निर्वाचन आयोग के कार्यों का सुखद परिणाम है कि चुनावों में होती आई धांधली को रोकने में मदद मिली. निर्वाचन आयोग के प्रयासों का सुफल है कि आज हाशिये पर खड़े लोगों को मतदान का अधिकार मिल सका है, वे बिना किसी डर-भय के अपने मताधिकार का प्रयोग कर पा रहे हैं. इसके बाद भी अभी बहुत से प्रयास किये जाने अपेक्षित हैं. निर्वाचन आयोग को अब इस दिशा में कार्य करना चाहिए कि किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में किसी व्यक्ति के बजाय वहाँ राजनैतिक दल ही चुनाव में उतरे. सम्बंधित क्षेत्र में जिस राजनैतिक दल की विजय हो वो अपना एक प्रतिनिधि सम्बंधित क्षेत्र के जनप्रतिनिधि के रूप में भेजे, जो अपने कार्यों के आधार पर ही निश्चित समयावधि तक कार्य करेगा. इससे एक तरफ मतदाताओं को उस व्यक्ति के कार्यों के आधार पर उसकी स्वीकार्यता-अस्वीकार्यता को निर्धारित करने का अधिकार मिल जायेगा. दूसरे उसकी असमय मृत्यु होने पर सम्बंधित क्षेत्र में उप-चुनाव जैसी व्यवस्था स्वतः समाप्त हो जाएगी. ऐसा होने से चुनाव सम्बन्धी खर्चों पर भी रोक लग सकेगी.

धन के अपव्यय को रोकने के लिए निर्वाचन आयोग को किसी भी तरह की प्रकाशित प्रचार सामग्री पर रोक लगानी होगी. बैनर, होर्डिंग्स, स्टिकर, पैम्पलेट आदि को भी प्रतिबंधित किया जाना चाहिए. ये सामग्री अनावश्यक खर्चों को बढ़ाकर चुनावों को खर्चीला बनाती हैं. मतदाताओं को सिर्फ अपने बैलट पेपर का नमूना प्रकाशित करके वितरित करने की अनुमति दी जानी चाहिए. इससे अनावश्यक तरीके से, अवैध तरीके से प्रचार सामग्री का छपवाया जाना रुक सकेगा. इसे साथ-साथ देखने में आता है कि प्रशासन की आँखों में धूल झोंककर स्वीकृत गाड़ियों की आड़ में कई-कई गाड़ियों को प्रचार के लिए लगा दिया जाता है. इसके साथ ही डमी प्रत्याशियों के दम पर अनेकानेक गाड़ियाँ प्रचार में घूमती पाई जाती हैं. ये धनबल की स्थिति चुनावों की निष्पक्षता को प्रभावित करती हैं. इसके लिए निर्वाचन आयोग को चार पहिया वाहनों से प्रचार पर पूर्णतः रोक लगानी चाहिए. सिर्फ उसी वाहन को अनुमति मिले जिसमें प्रत्याशी स्वयं बैठा हो, उसके अलावा किसी भी तरह के चौपहिया वहाँ से किया जा रहा प्रचार अवैध माना जाये, वाहन को अवैध मानकर प्रशासन द्वारा अपने कब्जे में लिया जाये. यहाँ निर्वाचन आयोग को समझना चाहिए कि जिस दौर में तकनीक आज के जैसी सक्षम नहीं थी तब भी बिना चौपहिया वाहनों के प्रचार हो जाया करते थे. आज प्रत्याशियों को तकनीक लाभ उठाने पर जोर दिया जाना चाहिए. चौपहिया वाहनों पर रोक लगने से जहाँ एक तरफ पेट्रोलियम पदार्थों की अनावश्यक बर्बादी को रोका जा सकेगा. साथ ही चुनाव के खर्चे पर भी अंकुश लग सकेगा. 

निर्वाचन आयोग द्वारा प्रयास ये होना चाहिए कि चुनाव जैसी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया पर सिर्फ धनबलियों, बाहुबलियों का कब्ज़ा होकर न रह जाये. निर्वाचन आयोग को ध्यान रखना होगा कि चुनाव खर्च की बढ़ती सीमा से कहीं कोई चुनाव प्रक्रिया से वंचित तो नहीं रह जा रहा है. निर्वाचन आयोग का कार्य जहाँ निष्पक्ष चुनाव करवाना है वहीं उसका दायित्व ये भी देखना होना चाहिए कि चुनाव मैदान में उतरने का इच्छुक व्यक्ति किसी तरह से धनबलियों का शिकार न हो जाये. यद्यपि वर्तमान दौर अत्यंत विषमताओं से भरा हुआ है तथापि कुहासे से बाहर आने का रास्ता बनाना ही पड़ेगा.

22 दिसंबर 2016

चुनाव सुधारों की पहल करे निर्वाचन आयोग

देश वर्तमान में परिवर्तनों, संशोधनों के दौर से गुजर रहा है. एक तरफ केंद्र सरकार ने जहाँ नोटबंदी के द्वारा कालेधन पर चोट करने का सन्देश दिया वहीं भारतीय अर्थव्यवस्था को कैशलेस बनने का रास्ता भी दिखाया है. केंद्र सरकार की साफ़ नीयत को देखकर अब निर्वाचन आयोग ने भी चुनाव सुधारों सम्बन्धी पहल करने की मंशा ज़ाहिर की है. एक व्यक्ति के दो जगह से चुनाव लड़ने को प्रतिबंधित करने, दो हजार रुपये से अधिक के गुप्त चंदे पर रोक लगने, उन्हीं राजनैतिक दलों को आयकर में छूट दिए जाने का प्रस्ताव जो लोकसभा-विधानसभा में जीतते हों के द्वारा निर्वाचन आयोग ने अपनी स्वच्छ नीयत का सन्देश दिया है.

लोकतान्त्रिक व्यवस्था में निर्वाचन प्रणाली का स्वच्छ, निष्पक्ष, कम खर्चीला होना आवश्यक है. किसी भी लोकतंत्र की सफलता इसमें निहित है कि वहाँ की निर्वाचन प्रणाली कैसी है? वहाँ के नागरिक सम्बंधित निर्वाचन को लेकर कितने आश्वस्त हैं? निर्वाचन प्रणाली, प्रक्रिया में कितनी सहजता, कितनी निष्पक्षता है? भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विगत कुछ दशकों से निर्वाचन प्रक्रिया सहज भी रही है तो कठिनता के दौर से भी गुजरी है. किसी दौर में निष्पक्ष चुनाव भी संपन्न हुए तो उसी के साथ घनघोर अव्यवस्था के साथ भी इनकी समाप्ति हुई. बूथ कैप्चरिंग, फर्जी मतदान, जबरिया मतदान, मतपेटियों की लूट, प्रत्याशियों की हत्या, मतदाताओं को डराना-धमकाना, पुनर्गणना के नाम पर मनमाफिक प्रत्याशी को विजयी घोषित करवा लेना आदि-आदि के साथ-साथ मारपीट, आगजनी, हिंसा आदि जैसी स्थितियों से भी भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था सामना करती रही है. निर्वाचन प्रक्रिया भयावहता के अपने चरम पर होकर वापस अपनी सहजता पर लौट आई है. अब पूरे देश के चुनावों में, किसी प्रदेश के चुनावों में एकाधिक जगहों से ही हिंसात्मक खबरों का आना होता है. एकाधिक जगहों से ही बूथ कैप्चरिंग किये जाने के प्रयासों की खबरें सामने आती हैं. निर्वाचन को भयावह दौर से वापस सुखद दौर तक लाने का श्रेय बहुत हद तक निर्वाचन आयोग की सख्ती को रहा है तो केंद्र सरकार द्वारा सुरक्षा बलों की उपलब्धता को भी जाता है. इस सहजता के बाद भी लगातार चुनाव सुधार की चर्चा होती रहती है. राजनैतिक परिदृश्य में सुधारों की बात होती रहती है. प्रत्याशियों की आचार-संहिता पर विमर्श होता रहता है. निर्वाचन की खर्चीली प्रक्रिया पर नियंत्रण लगाये जाने की कवायद होती रहती है. चुनावों में प्रयुक्त होने वाले कालेधन और अनावश्यक धन के उपयोग पर रोक लगाये जाने की नीति बनाये जाने पर जोर दिया जाता है.

प्रत्याशियों द्वारा अनेक तरह के अवैध स्रोतों से चुनाव में खर्चा किया जाता है. अपने चुनावी खर्चों को निर्वाचन आयोग की निर्धारित सीमा में दिखाकर परदे के पीछे से कहीं अधिक खर्च किया जाता है. विगत चुनावों में उत्तर प्रदेश के एक अंचल में कच्ची दारू कच्चा वोट, पक्की दारू पक्का वोट, दारू मुर्गा वोट सपोर्टजैसे नारे खुलेआम लगने का स्पष्ट संकेत था कि चुनावों में ऐसे खर्चों के द्वारा भी मतदाताओं को लुभाया जाता रहा है. मतदाताओं को धनबल से अपनी तरफ करने के साथ-साथ मीडिया के द्वारा भी चुनाव को, मतदाताओं को अपनी तरफ करने का प्रयास प्रत्याशियों द्वारा किया जाता है. बड़े पैमाने पर इस तरह के मामले सामने आये हैं जिनमें कि पेड न्यूज़के रूप में खबरों का प्रकाशन-प्रसारण किया जाता है. बड़े-बड़े विज्ञापनों द्वारा प्रत्याशियों के पक्ष में माहौल बनाये जाने का काम मीडिया के द्वारा किया जाता है. धनबल से संपन्न प्रत्याशियों द्वारा अनेक तरह के आयोजनों के द्वारा, विभिन्न आयोजनों को धन उपलब्ध करवाने के द्वारा भी निर्वाचन प्रक्रिया को अपने पक्ष में करने के उपक्रम किये जाते हैं. बड़े-बड़े होर्डिंग्स, बैनर, बड़ी-बड़ी लग्जरी कारों के दौड़ने ने भी निर्वाचन प्रक्रिया को खर्चीला बनाया है.

भले ही तमाम प्रत्याशी ऐसे खर्चों को निर्वाचन आयोग की निर्धारित सीमा से बाहर रखने में सफल हो जाते हों किन्तु वे कहीं न कहीं सम्पूर्ण निर्वाचन प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं. मतदाताओं पर, लोकतंत्र पर ये प्रभाव नकारात्मक रूप में ही होता है. धनबल की अधिकता बाहुबल में वृद्धि करती है, जिसका दुष्परिणाम ये हुआ कि राजनीति का अपराधीकरण होने लगा. ऐसे लोगों ने लोकतंत्र की वास्तविकता को कहीं हाशिये पर लगाकर राजनीति का अपनी तरह से उपयोग किया. राजनीति में आने का, जनप्रतिनिधि बनने का इनका उद्देश्य महज धन कमाना रह गया. इससे जहाँ मतदाताओं में चुनावों से मोहभंग हुआ है वहीं लोकतंत्र के प्रति, राजनीति के प्रति वितृष्णा सी जगी है. विगत कई वर्षों से मतदान का गिरता प्रतिशत इसी को सिद्ध करता भी है. इस गिरावट के चलते ही अत्यधिक कम प्रतिशतता पाने के बाद भी एकमुश्त वोट-बैंक रखने वाला प्रत्याशी विजयी हो जाता है. ऐसे लोग निर्वाचित होने के बाद सम्बंधित क्षेत्र की उपेक्षा करते भी देखे गए हैं. अपने क्षेत्र के मतदाताओं के प्रति ऐसे लोग असंवेदनशील बने देखे गए हैं. क्षेत्र के विकास से कहीं अधिक ये लोग अपने विकास को उन्मुख दिखाई देते हैं. लोकतान्त्रिक व्यवस्था की अपनी सीमाओं के चलते, निर्वाचन की अपनी व्यवस्थाओं के चलते एक बार विजयी हो गए प्रतिनिधि को निश्चित समयावधि तक सहना मतदाताओं की मजबूरी बन जाता है. मतदाताओं के पास मतदान के एक पल पश्चात् ऐसी कोई स्वतंत्रता नहीं होती कि वे नाकारा सिद्ध हो रहे जनप्रतिनिधि को वापस बुला सकें. उनके हाथ में ऐसी कोई ताकत नहीं होती कि वे आपराधिक प्रवृत्ति में लिप्त व्यक्तियों को जनप्रतिनिधि बनने के बाद वापस लौटा सकें.

ऐसा नहीं है कि निर्वाचन आयोग को ऐसी स्थितियों का भान नहीं है. ऐसा भी नहीं कि उसके द्वारा ऐसी स्थितियों पर अंकुश लगाये जाने के सम्बन्ध में कोई कदम उठाया नहीं जा रहा है. निर्वाचन आयोग द्वारा उठाये गए तमाम क़दमों का प्रभाव है कि सजायाफ्ता लोगों को निर्वाचन से रोका जा सका है. निर्वाचन आयोग के कार्यों का सुखद परिणाम है कि चुनावों में होती आई धांधली को रोकने में मदद मिली. निर्वाचन आयोग के प्रयासों का सुफल है कि आज हाशिये पर खड़े लोगों को मतदान का अधिकार मिल सका है, वे बिना किसी डर-भय के अपने मताधिकार का प्रयोग कर पा रहे हैं. इसके बाद भी अभी बहुत से प्रयास किये जाने अपेक्षित हैं. निर्वाचन आयोग को अब इस दिशा में कार्य करना चाहिए कि किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में किसी व्यक्ति के बजाय वहाँ राजनैतिक दल ही चुनाव में उतरे. सम्बंधित क्षेत्र में जिस राजनैतिक दल की विजय हो वो अपना एक प्रतिनिधि सम्बंधित क्षेत्र के जनप्रतिनिधि के रूप में भेजे, जो अपने कार्यों के आधार पर ही निश्चित समयावधि तक कार्य करेगा. इससे एक तरफ मतदाताओं को उस व्यक्ति के कार्यों के आधार पर उसकी स्वीकार्यता-अस्वीकार्यता को निर्धारित करने का अधिकार मिल जायेगा. दूसरे उसकी असमय मृत्यु होने पर सम्बंधित क्षेत्र में उप-चुनाव जैसी व्यवस्था स्वतः समाप्त हो जाएगी. ऐसा होने से चुनाव सम्बन्धी खर्चों पर भी रोक लग सकेगी.

धन के अपव्यय को रोकने के लिए निर्वाचन आयोग को किसी भी तरह की प्रकाशित प्रचार सामग्री पर रोक लगानी होगी. बैनर, होर्डिंग्स, स्टिकर, पैम्पलेट आदि को भी प्रतिबंधित किया जाना चाहिए. ये सामग्री अनावश्यक खर्चों को बढ़ाकर चुनावों को खर्चीला बनाती हैं. मतदाताओं को सिर्फ अपने बैलट पेपर का नमूना प्रकाशित करके वितरित करने की अनुमति दी जानी चाहिए. इससे अनावश्यक तरीके से, अवैध तरीके से प्रचार सामग्री का छपवाया जाना रुक सकेगा. इसे साथ-साथ देखने में आता है कि प्रशासन की आँखों में धुल झोंककर स्वीकृत गाड़ियों की आड़ में कई-कई गाड़ियों को प्रचार के लिए लगा दिया जाता है. इसके साथ ही डमी प्रत्याशियों के दम पर अनेकानेक गाड़ियाँ प्रचार में घूमती पाई जाती हैं. ये धनबल की स्थिति चुनावों की निष्पक्षता को प्रभावित करती हैं. इसके लिए निर्वाचन आयोग को चार पहिया वाहनों से प्रचार पर पूर्णतः रोक लगानी चाहिए. सिर्फ उसी वाहन को अनुमति मिले जिसमें प्रत्याशी स्वयं बैठा हो, उसके अलावा किसी भी तरह के चौपहिया वहाँ से किया जा रहा प्रचार अवैध माना जाये, वाहन को अवैध मानकर प्रशासन द्वारा अपने कब्जे में लिया जाये. यहाँ निर्वाचन आयोग को समझना चाहिए कि जिस दौर में तकनीक आज के जैसी सक्षम नहीं थी तब भी बिना चौपहिया वाहनों के प्रचार हो जाया करते थे. आज प्रत्याशियों को तकनीक लाभ उठाने पर जोर दिया जाना चाहिए. चौपहिया वाहनों पर रोक लगने से जहाँ एक तरफ पेट्रोलियम पदार्थों की अनावश्यक बर्बादी को रोका जा सकेगा. साथ ही चुनाव के खर्चे पर भी अंकुश लग सकेगा.


निर्वाचन आयोग द्वारा प्रयास ये होना चाहिए कि चुनाव जैसी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया पर सिर्फ धनबलियों, बाहुबलियों का कब्ज़ा होकर न रह जाये. निर्वाचन आयोग को ध्यान रखना होगा कि चुनाव खर्च की बढ़ती सीमा से कहीं कोई चुनाव प्रक्रिया से वंचित तो नहीं रह जा रहा है. निर्वाचन आयोग का कार्य जहाँ निष्पक्ष चुनाव करवाना है वहीं उसका दायित्व ये भी देखना होना चाहिए कि चुनाव मैदान में उतरने का इच्छुक व्यक्ति किसी तरह से धनबलियों का शिकार न हो जाये. यद्यपि वर्तमान दौर अत्यंत विषमताओं से भरा हुआ है तथापि कुहासे से बाहर आने का रास्ता बनाना ही पड़ेगा.