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23 मई 2026

पारिवारिकता, संस्कार और संस्कृति की शिक्षा देतीं अम्मा

अम्मा! बचपन से इस शब्द को एक जीव के रूप में नहीं बल्कि एक जीवन के रूप में देखा है. बिना किसी लाग-लपेट के कहा जाये तो हम लोग बौद्धिक होने के बाद शब्दों से खेलना सीख जाते हैं और एक समय के बाद अपने ही अम्मा-पिताजी को शिक्षा देना शुरू कर देते हैं, उनके बारे में ऐसा आदर्शवाद बिखेरना शुरू कर देते हैं जो बहुतायत में उनके वास्तविक जीवन से बहुत दूर होता है.


बहरहाल, बचपन के बहुत ही शुरूआती दिनों की याद आज भी है. न केवल हम ही बल्कि अम्मा भी कई बार आश्चर्य करती हैं कि एकदम शुरूआती दिनों की बातें कैसे याद हैं हमें. उन यादों के सहारे आज तक की यात्रा करते हैं तो समझ ही नहीं आता है कि अम्मा के बारे में क्या लिखा जाये, क्या छोड़ा जाए. सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार में रहने के अस्सी-नब्बे के दशक के जो भी संस्कार थे उनके अनुपालन में पिताजी के साथ संवाद का माध्यम अम्मा ही बनती थीं. ये और लोगों के लिए आश्चर्य का विषय हो सकता है कि अम्मा की ये भूमिका न केवल हम तीनों भाइयों के लिए थी बल्कि पिताजी के तीनों छोटे भाइयों के लिए भी थी. हमारे तीनों चाचाओं का हम लोगों के साथ उनकी नौकरी, शादी होने तक रहना हुआ. चाचा लोगों का अपने बड़े भाई (हमारे पिताजी) के प्रति सम्मान के भाव ने सदैव अम्मा को ही हर बात के लिए आगे किया. होली-दीपावली पर तो निश्चित रूप से सभी चाचा लोगों का सपरिवार उरई आना होता था. पूरे परिवार के साथ समन्वित, संतुलन अम्मा की कार्य-प्रणाली में सहज भाव से देखने को मिलता.


हम तीनों भाइयों की अम्मा समय के साथ पूरे परिवार की अम्मा तो बनी हीं हमारे बाद की पीढ़ी के लिए भी अम्मा ही सम्बोधित हुईं. न केवल हम तीनों भाइयों की मित्र-मंडली में बल्कि मोहल्ले में भी वे अम्मा के रूप    में ही पहचान बनाये हुए हैं. उनके शब्दों से ज्यादा उनके कार्यों को देख-देखकर प्रेरणा मिली. वो समय आज भी याद  है जबकि हमारी अइया (दादी) गुल्ला टूट जाने के कारण कानपुर में एक हॉस्पिटल में भर्ती थीं. उनकी शारीरिक अवस्था के कारण ऑपरेशन सम्भव नहीं दिख रहा था. ऐसे में दस-बारह दिन की उनकी परेशानी देखकर एक दिन अम्मा ने वहाँ के डॉक्टर से स्पष्ट शब्दों में कहा कि कल हम लोगों को रिलीव करिए. हमने जैसे अपने बेटों की टट्टी-पेशाब साफ़ कर ली वैसे इनकी भी कर लेंगे. इस समय येहमारे लिए हमारी सास से ज्यादा एक छोटे बच्चे जैसी हैं.


उस समय की दृढ़ता के बाद अम्मा की जीवटता, उनका आत्मबल सामने लाने के लिए प्रकृति ने भी कम उत्पात न रखा. पिताजी का देहांत, अगले ही महीने हमारा ट्रेन दुर्घटना के चलते साल भर बिस्तर पर पड़े रहना, कालांतर में सबसे छोटे भाई की असमय मृत्यु ने परिवार में उथल-पुथल तो मचाई मगर ऐसे विषम समय में भी अम्मा के संयम, धैर्य, जीवटता के बारे में सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है. आज भी उन पलों में अम्मा की छवि का स्मरण हो जाता है तो आँखें नम हो जाती हैं.


परिवार को साथ लेकर चलने की कला, सबकी बातों को सुनकर भी एकजुटता के साथ आगे बढ़ने का संयम, तीन-चार पीढ़ियों के साथ सामंजस्य बनाकर चलने की कुशलता, सबकी सहायता के लिए आगे रहने की मानसिकता को अम्मा से सीखने को मिला. आज वे उम्र के 75 वर्ष पूरे करने के बाद भी पूरी सक्रियता, चैतन्यता के साथ हम लोगों को अपना आशीर्वाद दे रही हैं. यद्यपि उनकी अति-सक्रियता के चलते उत्पन्न होने वाली उम्र सम्बन्धी शारीरिक समस्याओं के चलते कई बार उनको रोका-टोका जाता है तथापि यह अवश्य ही सीखने को मिलता है कि जब तक साँस है तक तक जीवन में सक्रियता, सजीवता बनी रहनी चाहिए. ये बात आज भी अम्मा को सक्रिय देखकर सीखने को मिल रही है. 


22 दिसंबर 2025

अन्तरिक्ष तक दिव्यांगजन की उपस्थिति

बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में हुए अनेकानेक परिवर्तनों को देखते हुए ऐसा माना जाने लगा था कि ज्ञान, विज्ञान, आधुनिकता, तकनीकी, प्रौद्योगिकी, बौद्धिकता, स्वतंत्रता आदि के सन्दर्भ में इक्कीसवीं सदी क्रांतिकारी सदी होगी. ऐसा बहुत हद तक हुआ भी. समाज ने इस सदी में बहुत से बंधनों से स्वयं को मुक्त किया, विकास के अनेक नए मानकों को प्राप्त किया. बावजूद इसके बहुत से क्षेत्र ऐसे रहे जिनको लेकर समाज की सोच में बदलाव नगण्य रूप में देखने को मिला. दिव्यांगजनों के प्रति अभी भी समाज का दृष्टिकोण सहानुभूति, दया दर्शाने वाला बना हुआ है. सभी क्षेत्रों में अपनी सशक्त उपस्थिति को प्रदर्शित करने के बाद भी दिव्यांगजनों को कमजोर कड़ी के रूप में देखा जाता है. इसके बाद भी दिव्यांगजनों ने अपने कार्यों, अपनी क्षमताओं, अपने आत्मबल के द्वारा लगातार स्वयं को सिद्ध किया है. इस 20 दिसम्बर को जर्मनी की दिव्यांग इंजीनियर माइकला बेंथॉस ने इतिहास रचते हुए नवीन उपलब्धि हासिल की है. जर्मन एयरोस्पेस इंजीनियर माइकला रॉकेट पर उड़ान भरने वाली पैरालिसिस से ग्रस्त पहली इंसान बन गईं हैं.

 



दिव्यांग माइकला ने सबसे अलग हटते हुए अपना अलग रास्ता बनाया और खुद को अन्तरिक्ष तक पहुँचा दिया. उन्होंने अमेरिका के वेस्ट टेक्सास से ब्लू ओरिजिन के न्यू शेपर्ड रॉकेट से उड़ान भरी और अन्तरिक्ष में अपनी उपस्थिति के द्वारा दिव्यांगजनों की जिजीविषा और क्षमता की उपस्थिति दर्ज की. व्हीलचेयर का प्रयोग करने वाली वे पहली व्यक्ति बन गई हैं जिसने अन्तरिक्ष की उड़ान भरी. ब्लू ओरिजिन के एनएस-37 मिशन में 33 वर्षीया माइकला के साथ पाँच अन्य यात्री भी शामिल थे. उड़ान भरने के बाद रॉकेट ने कर्मन रेखा को पार किया. यह रेखा अन्तरिक्ष की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सीमा है, जो पृथ्वी की सतह से लगभग 100 किमी ऊपर है. इस रेखा का नामकरण वैमानिकी और अन्तरिक्ष विज्ञान में सक्रिय इंजीनियर थियोडोर वॉन कर्मन के नाम पर किया गया है. वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने इस ऊँचाई की गणना करते हुए बताया था कि इस ऊँचाई पर वायुमंडल इतना पतला हो जाता है कि वहाँ हवाई उड़ान सम्भव नहीं है.

 



आज से लगभग सात वर्ष पूर्व, 2018 में माइकला एक माउंटेन बाइक दुर्घटना में घायल हो गईं थीं. उस दुर्घटना में रीढ़ की हड्डी क्षतिग्रस्त होने के कारण वे कमर के नीचे लकवाग्रस्त हो गई थीं. जिसके बाद उन्होंने व्हीलचेयर का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था. इस दुर्घटना के बाद जब वे व्हीलचेयर का इस्तेमाल करने लगीं तो उनको लगा था कि उनका अन्तरिक्ष यात्री बनने का बचपन का सपना कभी पूरा नहीं हो पाएगा. व्हीलचेयर पर अपने सारे काम करने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में काम करती रहीं. अन्तरिक्ष यात्रा करने के बचपन के सपने को पूरा करने के लिए माइकला लगातार इसके लिए प्रयासरत भी रहीं और कार्य भी करती रहीं. इसके लिए उन्होंने पैराबोलिक ज़ीरो-ग्रेविटी फ़्लाइट्स में हिस्सा लिया, जो भारहीनता (जीरो-ग्रेविटी) की नकल करती है. इसके अलावा उन्होंने पोलैंड में व्हीलचेयर-एक्सेसिबल लूनारेस रिसर्च स्टेशन पर दो हफ़्ते के अनुरूप अन्तरिक्ष यात्री (एनालॉग एस्ट्रोनॉट) मिशन के दौरान मिशन कमांडर के तौर पर काम भी किया. उनके पास मानव अन्तरिक्ष उड़ान से जुड़ा काफी अनुभव भी है. वे एक जर्मन एयरोस्पेस और मेक्ट्रोनिक्स इंजीनियर हैं जो अभी यूरोपियन स्पेस एजेंसी के साथ यंग ग्रेजुएट ट्रेनी के तौर पर जुड़ी हुई हैं.

 

ब्लू ओरिजिन के न्यू शेपर्ड रॉकेट की यह यात्रा लगभग दस मिनट की रही. इस दौरान यात्रियों ने भारहीनता अर्थात ज़ीरो-ग्रेविटी का अनुभव किया और पृथ्वी का अद्भुत नज़ारा देखा. माइकला की इस स्वप्निल उड़ान के समय उनके साथ स्पेस एक्स के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी हैंस कोएनिग्समैन भी थे, जिन्होंने इस यात्रा को सम्भव बनाने में मदद की. इसके लिए रॉकेट में किसी तरह का व्यापक ढाँचागत परिवर्तन नहीं करना पड़ा था. एक विशेष ट्रांसफर बोर्ड और माइकला की स्थिति के अनुकूल कैप्सूल व्यवस्था के द्वारा उनको उड़ान के लिए तैयार किया गया. चूँकि माइकला व्हीलचेयर का उपयोग करती हैं, ऐसे में उनको रॉकेट में चढ़ने के लिए तथा वहाँ अपनी सीट तक पहुँचने के लिए एक विशेष ट्रांसफर बोर्ड का उपयोग किया गया. इस विशेष बोर्ड की सहायता से वे अपनी व्हीलचेयर को धरती पर छोड़ खिसककर सीट पर बैठ सकीं. अपनी शारीरिक स्थिति के बावजूद उन्होंने इस ऐतिहासिक उप-कक्षीय यात्रा में भाग लिया. उड़ान के दौरान उन्हें भारहीनता का अनुभव हुआ.

 



अन्तरिक्ष से लौटने के बाद माइकला ने कहा कि यह उनके जीवन का सबसे शानदार अनुभव था. कभी अपने सपनों को मत छोड़ो. दुनिया अभी भी दिव्यांगों के लिए पूरी तरह सुलभ नहीं है. अभी भी और अधिक बदलावों की जरूरत है. उन्होंने अपील की कि दिव्यांगजनों के लिए दुनिया को अधिक सुलभ  बनाया जाये ताकि भविष्य में उनके जैसे और लोग भी अन्तरिक्ष की यात्रा कर सकें. इस मिशन में उनका चयन इस बात का प्रमाण है कि शारीरिक अक्षमता सपनों के आड़े नहीं आ सकती. उनकी इस ऐतिहासिक उड़ान से दिव्यांगों के लिए अन्तरिक्ष यात्रा के द्वार खुलने की एक शुरुआत अवश्य हुई है. सम्भव है कि भविष्य में और भी दिव्यांग अन्तरिक्ष की यात्रा कर सकें. यह भी सम्भव है कि अब समाज दिव्यांगजनों के प्रति अपनी संकीर्ण सोच को त्यागकर उन्हें भी एक सामान्य इंसान की तरह से जानने-समझने का प्रयास करे.  


19 मार्च 2025

अन्तरिक्ष यात्री बने अनुकरणीय उदाहरण

अन्तरिक्ष में फँसने के बाद भारतीय मूल की अमेरिकी अन्तरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स की धरती पर सकुशल वापसी हो गई है. इनके साथ क्रू-9 के दो और अन्तरिक्ष यात्री अमेरिका के निक हेग और रूस के अलेक्सांद्र गोरबुनोव भी आये हैं. सुनीता विलियम्स और उनके सहयात्री बुच विल्मोर को अन्तरिक्ष से लाने वाला स्पेसएक्स का ड्रैगन अंतरिक्ष यान भारतीय समयानुसार 19 मार्च 2025 को प्रातः 3 बजकर 27 मिनट पर फ्लोरिडा तट पर उतरा. 5 जून 2024 को सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर ने नासा और बोइंग के आठ दिन के संयुक्त क्रू फ्लाइट टेस्ट मिशन के लिए बोइंग के अंतरिक्ष यान द्वारा अंतर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) के लिए उड़ान भरी थी. इसका उद्देश्य बोइंग के स्टारलाइनर स्पेसक्राफ्ट द्वारा किसी अन्तरिक्ष यात्री को अन्तरिक्ष में ले जाने और वापस लाने की क्षमता का परीक्षण करना था. अन्तरिक्ष स्टेशन पर मात्र आठ दिन के परीक्षण और खोज के लिए गए इन दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों को सम्बंधित यान के थ्रस्टर में आई गड़बड़ी के चलते नौ महीने से ज्यादा समय तक रुकना पड़ा.

 



सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में कुल 286 दिन बिता चुकी हैं. इसके साथ ही वह एक यात्रा में आईएसएस पर सबसे ज्यादा दिन बिताने वाली तीसरी महिला वैज्ञानिक बन गई. एक यात्रा में सबसे अधिक समय बिताने वाली महिला अन्तरिक्ष यात्री के रूप में पहले स्थान पर क्रिस्टीना कोच हैं, जिन्होंने 328 दिन बिताये हैं, वहीं पिग्गी वीटस्न 289 दिन व्यतीत करने के साथ दूसरे स्थान पर हैं. सुनीता विलियम्स अब तक नौ बार स्पेस वॉक कर चुकी है. इस दौरान उन्होंने 62 घंटे 6 मिनट स्पेसवॉक में बिताए हैं. इस मामले में वे पहले स्थान पर हैं. सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर के अन्तरिक्ष स्टेशन से उनको लाने के प्रयास किये गए. तकनीकी और अन्य कारणों से हर बार वापसी के कार्यक्रम को स्थगित करना पड़ा. ऐसी विषम स्थिति के बाद भी सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर ने खुद को सक्रिय बनाये रखा. उन्होंने अंतरिक्ष में नौ महीने से अधिक अवधि तक रहने के दौरान 150 से ज्यादा प्रयोग किए. उन्होंने स्पेस स्टेशन का रखरखाव करने के साथ-साथ स्पेसवॉक करते हुए अंतरिक्ष यान की मरम्मत भी की. अन्तरिक्ष स्टेशन के उपकरणों की मरम्मत करते हुए एनआईसीईआर एक्स-रे टेलीस्कोप पर लाइट फिल्टर लगाए और एक अंतरराष्ट्रीय डॉकिंग एडेप्टर पर एक रिफ्लेक्टर डिवाइस को भी बदला.

 

अब जबकि दोनों अन्तरिक्ष यात्री धरती पर वापस लौट आये हैं तब भी उनकी दिक्कतें दूर होने वाली नहीं हैं. लौटने के बाद उन दोनों को बेबी फीट समस्या का सामना करना पड़ेगा, जिस कारण चलने में परेशानी होगी. लम्बे समय तक अंतरिक्ष में रहने के कारण पैर की ऊपरी मोटी चमड़ी खत्म हो जाती है. इससे पैर छोटे बच्चों की तरह मुलायम और कमजोर हो जाते हैं. जीरो गुरुत्वाकर्षण के कारण पैर कमजोर होने लगते हैं, चलने-फिरने, संतुलन बनाने में परेशानी होती है. इसके अलावा मनोवैज्ञानिक समस्याओं, बेचैनी, अवसाद, बोलने में दिक्कत जैसी अनेक समस्याएँ सामने आती हैं. इसके चलते सामान्य जीवन स्थिति आने में काफी समय लग सकता है.

 



इस तरह की अनेकानेक समस्याओं का सामना करने में, उनसे उबरने में अब दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों को संभवतः उतनी मानसिक परेशानी नहीं होगी, जितनी कि अन्तरिक्ष में रहते हुए हुई होगी. यहाँ तो वे दोनों अब अपने परिजनों की देखभाल में, योग्य चिकित्सकों की निगरानी में, धरती के वातावरण में रहते हुए खुद को सामान्य बनाने का प्रयास करेंगे. विचार करिए अन्तरिक्ष की उस स्थिति का जहाँ न तो पृथ्वी जैसा वातावरण है, जहाँ जीरो गुरुत्वाकर्षण वाली असामान्य स्थिति है, नितान्त अकेलेपन के बीच सिर्फ मशीनों का साथ है. इन दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों से आज के उन युवाओं को, उन अनेकानेक लोगों को सीख लेने की आवश्यकता है जो जरा-जरा सी स्थिति में खुद को तनावग्रस्त कर लेते हैं. किसी भी छोटी सी समस्या को अपने जीवन से बड़ा मानते हुए अपने जीवन को समाप्त कर लेते हैं. किसी भी एक-दो असफलताओं के कारण हताशा-निराशा में, अवसाद में चले जाते हैं.

 

निश्चित ही इन दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों का मानसिक स्तर, उनकी मानसिक शक्ति अत्यंत प्रबल रही होगी क्योंकि अन्तरिक्ष स्टेशन के लिए उड़ान भरते समय दोनों के मन-मष्तिष्क में स्पष्ट रूप से सिर्फ आठ दिन रुकने का भाव रहा होगा जबकि उनको नौ महीने से अधिक समय तक रुकना पड़ गया. इस तरह की स्थिति निश्चित रूप से अवसाद पैदा करने वाली हो सकती थी मगर दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों ने खुद को अपने काम में लगा दिया. अन्तरिक्ष के अकेले वातावरण में खुद को किसी भी तरह की नकारात्मकता से दूर रखने के लिए उनका मिशन सम्बन्धी कामों में लगे रहना, अन्तरिक्ष सम्बन्धी भावी स्थितियों के लिए नए विकल्पों की तलाश करना उनकी जिजीविषा को दर्शाता है. शारीरिक और मानसिक रूप से खुद को स्वस्थ रखने के लिए उनके द्वारा खान-पान के साथ-साथ योग, व्यायाम पर भी ध्यान दिया गया. आज अवसरों की अनुपलब्धता, सकारात्मक वातावरण की कमी का होना, कार्य स्थितियों का अनुकूल न होना आदि समस्याओं की चर्चा करना आम बात है. ऐसे में इन दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों को अनुकरणीय उदाहरण के रूप में स्वीकार्य होना चाहिए. ये आवश्यक नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए समाज में अनुकूल वातावरण, सकारात्मक परिस्थितियाँ, सहयोगात्मक भूमिका आदि की उपस्थिति रहे. ऐसे में व्यक्ति को अपनी मानसिक स्थिति को, आत्मविश्वास को सकारात्मक रूप से सशक्त बनाये रखने की दिशा में काम करना चाहिए. परिस्थितियों का रोना रोने से बेहतर है कि उनको सुधारने  का प्रयास करना चाहिए. निस्संदेह दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों की सकुशल वापसी के वैज्ञानिक क्षेत्र में नासा का सफल अभियान है, इसी तरह सामाजिक क्षेत्र के लिए दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों की मानसिक शक्ति, जिजीविषा, आत्मविश्वास अनुकरणीय उदाहरण है.  


24 फ़रवरी 2025

डरना मना है

कुछ दिन पहले हमारे एक मित्र ने बातचीत के दौरान पूछा कि डर, भय क्या होता है? किसे कहते हैं? इससे कैसे निपटा जाये? ये सवाल देखने में बहुत ही सहज मालूम पड़ते हैं पर इनके जवाब उतने सहज नहीं हैं. उस समय सामान्य बातचीत के चलते सहज रूप में भय का अर्थ अलग-अलग घटनाओं, स्थितियों के सन्दर्भ में अलग-अलग ही समझ आया. यदि स्थिति आर्थिक है तो भय अलग तरह का होगा, स्थिति यदि सामाजिक है तो डर के पीछे का कारण दूसरा होगा. स्थितियों के अनुसार भय का होना अलग-अलग हो सकता है. ऐसे में इन स्थितियों के सन्दर्भ में उत्पन्न होने वाले भय पर यदि ध्यान दिया जाये तो सहज रूप में समझ आता है कि व्यक्ति के पास से कुछ भी खो देने की स्थिति, कुछ बुरा हो जाने की स्थिति भय को जन्म देती है. इन कारणों-कारकों के साथ-साथ देखा जाये तो भय एक तरह की मानसिक अवस्था है.

 



सम्भव है कि इसके भी अपने-अपने सन्दर्भ निकाले जाएँ, बताये जाएँ मगर जैसा कि व्यक्तिगत अनुभव से, सामाजिक अनुभव से जो देखने-सीखने को मिला उसके अनुसार खुद के पास से खो देने, गलत हो जाने की अवस्था ही भय का कारण है. आर्थिक स्थिति मजबूत होने पर भी बहुसंख्यक लोगों के मन-मष्तिष्क में एक तरह का भय बना ही रहता है. धन के चोरी हो जाने का, आर्थिक रूप से घाटा हो जाने का, किसी निवेश में हानि हो जाने का. इसी तरह से कोई भी क्षेत्र हो सभी में किसी न किसी रूप में भय व्याप्त रहता है. पारिवारिक रूप में भी भय किसी अपने को खो देने का, उसके साथ गलत हो जाने का लगा रहता है.

 

भय से निदान के बारे में भी मित्र द्वारा जानकारी माँगी गई. ऐसा संभवतः उका हमारे स्वभाव को देखते हुए ही रहा होगा. बहुत कम स्थितियाँ ऐसी होती हैं जहाँ कि हमें भय घेरता है. ऐसा नहीं है कि हमें डर नहीं लगता है अथवा भय व्याप्त नहीं होता मगर उसकी स्थितियाँ अलग हैं. किसी भी छोटी-बड़ी बात से घबरा जाना हमारा स्वभाव नहीं. ऐसी कोई स्थिति जो अभी तक सामने नहीं आई है, जिसका महज अंदेशा है या फिर जिसका अनुमान लगाया जा रहा है, ऐसी किसी भी स्थिति से हम नहीं घबराते हैं. इसके अलावा दैनिक जीवन के अनेकानेक उतार-चढाव से भी घबराहट नहीं होती, भय नहीं लगता. एक सीधा सा विचार है कि जिस स्थिति से निपटा जा सकता, उससे डरना कैसे और जिससे निपटा नहीं जा सकता, उससे डरना कैसा, उससे निपटने के प्रयास पर विचार करना चाहिए.

 

सामान्य रूप में जो हमें समझ आया कि यदि व्यक्ति आत्मविश्वास मजबूत बनाये रखे, खुद को हताश-निराश न होने दे तो वह बहुत हद तक अपने भय पर नियंत्रण पा सकता है. संयम रखने से, जल्दबाजी न करने से और मन को शांत रखने से भी भय पर नियंत्रण पाया जा सकता है. भय की स्थिति में होता यही है कि व्यक्ति अपने विश्वास को खो देता है, हड़बड़ी में गलत कदम उठाने लगता है, सोचने-विचारने की क्षमता खोने लगता है. इस कारण से भय उस व्यक्ति को अपने अधिकार में ले लेता है. इससे भी स्थिति सुधरने की बजाय बिगड़ने लगती है. बेहतर हो कि व्यक्ति स्थिति को पहचानते हुए उसका सामना करने के लिए खुद को तैयार करे. इससे भयग्रस्त होने वाली स्थिति से बचा जा सकता है.


11 अक्टूबर 2021

बेटियों को सक्षम और सबल बनायें

अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस पर सभी तरफ से बेटियों के सम्बन्ध में पोस्ट दिखाई दे रही हैं. इधर नवदुर्गा का आयोजन भी किया जा रहा है, इसमें भी बेटियों को देवी स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जा रही है. इस एक बालिका दिवस के बीत जाने के बाद और नवदुर्गा का आयोजन समाप्त हो जाने के बाद बहुत से लोग बेटियों को सशक्त बनाने के प्रति संवेदित नहीं दिखते. बेटियों के साथ होने वाली किसी भी दुर्घटना के बाद कहा जाता है कि बेटियों के बजाय बेटों को शिक्षा दें कि वे स्त्री को एक इन्सान समझें. सही है मगर क्या कभी इस दृष्टि से विचार किया गया कि हमने बेटियों का उस तरह से लालन-पालन किया है कि वे बिना घबराये, बिना डरे, पूरे विश्वास के साथ सामने वाले दुराचारी का, आपराधिक प्रवृत्ति के इंसान का मुकाबला कर सकें?

 

हम बराबर और बार-बार कहते हैं कि समाज में स्त्री-पुरुष का, लड़के-लड़की का, बेटे-बेटी का भेद करने से कभी कोई सुधार नहीं आने वाला. बेटों को किसी तरह की शिक्षा दें या न दें मगर सभी माता-पिता अपनी बेटियों को ये शिक्षा अवश्य दें कि

=>> वे जीरो फिगर की फालतू अवधारणा से बाहर निकलें.

=>> वे खुद को सभी काम करने में सक्षम समझें न कि अपने भाई, पिता आदि के भरोसे रहें.

=>> शारीरिक सौष्ठव किसी भी रूप में अपमानजनक नहीं है. खुद की देह को क्रीम, पाउडर, लिपस्टिक, परफ्यूम आदि की जकड़न से बाहर निकाल कसरती बनायें.

=>> घर की चाहरदीवारी में घुसे रहने की प्रवृत्ति त्याग कर खुद को मैदानी इन्सान बनाने के लिए आगे आयें. दौड़ने, भागने, कूदने आदि क्रियाओं में दक्षता हासिल करें.

=>> दिन भर मोबाइल के ऊटपटांग एप्प पर अपनी ऊर्जा को खर्च करने के बजाय अपनी ताकत को, दिमागी ऊर्जा को किसी न किसी आत्मरक्षा वाले गुण के विकास में खर्च करें.

=>> अपने घर की अन्य बुढ़िया टाइप औरतों के साथ बैठकर सास-बहू जैसे सीरियल्स में अपने दिमाग को खपाने के बजाय समाज में आसपास छिपे कुत्सित विचारों वाले जानवरों को समझने की क्षमता का विकास करें.

 

ध्यान रखें, बेटों को शिक्षा देने के विचार के बहाने आप अपनी बेटियों को घरों में कैद रखने की मानसिकता का त्याग करें. जानवर किसी के बेटे नहीं होते मगर इन्हीं जानवरों का शिकार होने वाली लड़कियाँ, स्त्रियाँ आपकी नहीं तो किसी न किसी की बेटी अवश्य ही होती है.




26 अप्रैल 2021

आत्मविश्वास और जिजीविषा से ज़िन्दगी को जीवन देना

ज़िन्दगी उतनी भी हसीन नहीं जितनी हम समझते हैं और मौत उतनी भी भयानक नहीं जितनी हमने मान रखा है. ऐसा अपने अनुभव के आधार पर ही कहा जा सकता है. ऐसा सिर्फ हम ही नहीं कह रहे, ऐसा कोई भी व्यक्ति जिसने जिन्दगी को करीब से जिया है, महसूस किया है वह समझ सकता है. असल में हममें से बहुत से लोग ज़िन्दगी जीना भूल चुके हैं या कहें कि ज़िदगी जीना ही नहीं जानते. आज भी बहुतायत लोग खाने-कमाने को ही ज़िन्दगी माने बैठे हैं. यही कारण है कि ऐसे लोगों की सोच के कारण न केवल इनकी ज़िन्दगी वरन सम्पूर्ण समाज का ढाँचा विकृत स्थिति में पहुँच गया है. इन लोगों के लिए सुबह उठने से लेकर रात सोने तक सिर्फ अपने परिवार के चंद लोगों की चिंता करना ही ज़िन्दगी है. ऐसे लोगों के लिए स्वार्थ में संकुचित रहना ही ज़िन्दगी है. यही लोग वे हैं जो ज़िन्दगी को एक निश्चित दायरे से बाहर जाने देना नहीं चाहते हैं. ऐसे लोगों के लिए ही ज़िन्दगी दिव्य और भव्य होती है. देखा जाये तो ज़िन्दगी इससे कहीं अधिक बड़ी है, विस्तृत है. ज़िन्दगी का तात्पर्य सिर्फ अपना परिवार नहीं. ज़िन्दगी का मतलब अपने परिजन नहीं. ज़िन्दगी का मतलब चंद लोग नहीं हैं.




अपने आपमें व्यापक अवधारणा और विस्तृत सन्दर्भ को अपने में संजोये रखती है ज़िन्दगी. उसके लिए किसी एक व्यक्ति, किसी एक परिवार का कोई मोल नहीं. असल में ज़िन्दगी एक व्यक्ति से आरम्भ होकर अपने में सम्पूर्ण का प्रसार करती है. वह आरम्भ तो होती है किसी एक व्यक्ति के द्वारा और फिर अपना विस्तार करते हुए उसे सन्दर्भ प्रदान करती है. ज़िन्दगी का विस्तार और संकुचन भले ही संदर्भित व्यक्ति को अलग-अलग रूपों में सुखद दिखाई देता हो मगर मूल रूप में वह अत्यंत कष्टप्रद होता है. जिसने ज़िन्दगी का सन्दर्भ व्यापकता में देखा हो उसे ज़िन्दगी कष्टप्रद ही नहीं भयावह नजर आती है. विगत कुछ दिनों में न केवल हमने बल्कि हम जैसे अनेक भाइयों ने ज़िन्दगी की भयावहता को बहुत नजदीक से देखा-महसूस किया है. ज़िन्दगी के आनंद के क्षणों को कहीं गायब होते देखा है. पल-पल ज़िन्दगी के रूप में मौत को पास आते देखा है. ऐसा हमने हर उस स्थिति में महसूस किया है जबकि हमने ज़िन्दगी को आपस में एक-दूसरे से जोड़ कर देखा है.


आज किसी भी फोन की घंटी पर सहम जाना, किसी भी मैसेज की आवाज़ पर सिहर जाना, बातचीत का सिरा पकड़ते हुए आवाज़ में कम्पन आना सब कुछ ऐसा होता जा रहा है जो बता रहा था कि हम सब एक हैं मगर कहीं न कहीं भीतर से डरे हुए हैं. इस एक होने के बाद भी हम सब ज़िन्दगी का संगठित रूप प्रस्तुत नहीं कर पा रहे थे. बहुत से लोग अपनी-अपनी ज़िन्दगी के अनमोल पलों में से बहुत सारा जीवन जरूरतमंद लोगों को देने को तैयार बैठे हैं मगर ज़िन्दगी के द्वारा ज़िन्दगी नहीं दी जा सकती है. यही कारण है कि सुखद होने के बाद भी ज़िन्दगी अत्यंत भयानक है. जहाँ एक व्यक्ति अपनी ज़िन्दगी का सुखद पल अपने साथ लिए बैठा होता है और उसी का अभिन्न भाई ज़िन्दगी में से ज़िन्दगी का एक-एक पल अपने लिए तलाश रहा होता है. ये तो विश्वास, संयम, हिम्मत रखने वाली बात है, ज़िन्दगी को ज़िन्दगी से अलग नहीं होने देने का जज्बा है कि बहुतेरे लोग आज भी अपने आत्मविश्वास, अपनी जिजीविषा के चलते ज़िन्दगी को सुरक्षित रख ले जा रहे हैं. विश्वास, स्नेह, आशीर्वाद की दम पर ज़िन्दगी को अपने बगल में बैठा लेने पर मजबूर कर देने वाले अपने सभी परिचितों, अपरिचितों, मित्रों, परिजनों, सहयोगियों के दीर्घायु होने की कामना.


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वंदेमातरम्

30 सितंबर 2020

बेटियों को सबल, सक्षम बनने को प्रेरित किया जाए

समाज की बेटियों के साथ किसी भी वारदात पर हम सभी शासन-प्रशासन को दोष देना शुरू कर देते हैं. अपने गिरेबान में झाँकिये और बताइये कि हम में से कितने लोग अपनी बेटियों को जूडो-कराटे की, मुक्केबाजी की, एथलेटिक्स की, बॉडी बिल्डिंग की ट्रेनिंग दिलवाते हैं? कितने हैं जिनकी बेटियाँ एकबार में दो-चार किलोमीटर दौड़ लें, बिना हाँफे, बिना पेट पकड़े? कितनी बेटियाँ हैं जो एक-दो पुरुष अपराधियों को देखकर आत्मविश्वास नहीं खोएँगी? कितनी बेटियाँ हैं जो चिल्लाएँ तो उनकी आवाज़ सौ-दो सौ मीटर तक जा सके?


अपनी बेटियों को सौन्दर्य प्रसाधन, जीरो फिगर, स्लिम फीचर, नाजुक मनोस्थिति से मुक्त करवाइए. उनमें प्रतिकार की शक्ति भरिये, विरोध की आवाज़ सशक्त करिए, आताताइयों पर हमला करने की ट्रेनिंग दीजिए. खुद को सशक्त भी बनाना जरूरी है क्योंकि बेटियाँ हमारी हैं. उन्हीं बेटियों की शादी के लिए आप सरकार के भरोसे नहीं बैठते तो उनकी सुरक्षा के लिए सरकार के भरोसे क्यों बैठते हैं?


जब भी बेटियों को सक्षम, सशक्त बनाने की बात करते हैं तो उसके पीछे यही विचार क्यों किया जाता है कि वे गैंगरेप जैसी वारदात का शिकार होंगी? क्यों मन में आता है चार-छह मनचले उसे घेरे हैं और बिटिया को सबसे लड़ना, मार पीट करना है? सामान्य रूप से देखिए और विचार करिए, आप ऐसे अनुभव से गुजरे होंगे---


बाजार में स्कूटी सेल्फ स्टार्ट न होने की दशा में बेटी दस-बारह किक मारकर हाँफ जाती है और फिर स्कूटी स्टार्ट करवाने के लिए किसी अंकल, किसी भैया को पुकारती है।


यात्रा करते समय दो भारी बैग लिए चल रही बिटिया चढ़ते, उतरते समय किसी मददगार हाथ की चाह रखती है।


किसी दुकान पर सामान लेने को खड़ी बेटी देर तक पीछे खड़ी रहती है क्योंकि वह अपने सामने खड़े लोगों को धकिया कर आगे निकलने की शक्ति नहीं रखती।


ऐसे बहुत से सामान्य उदाहरण रोज ही आपके सामने, हमारी बेटियों के सामने आते होंगे। क्या इनसे निपटने के लिए भी फाँसी जैसा कानून चाहिए? क्या इनके समाधान के लिए भी संस्कार पाठशाला चाहिए? क्यों बेटी का अर्थ छुईमुई से लगाया जाए? क्यों उसे कोमलांगी बनाए रखा जाए? क्रीम, पाउडर, काजल के साथ-साथ उसे दौड़ने, कूदने, शारीरिक अभ्यास करने की क्यों न दी जाए?


बेटियों की समस्या हर बार मनचलों से निपटने की नहीं, बहुत बार इन छोटी-छोटी बातों से निपटने की भी होती है। जिस दिन हमारी बेटियाँ अपनी सामान्य दिक्कतों से निपटना सीख जाएँगीं, उस दिन किसी लम्पट की हिम्मत नहीं उनकी तरफ आँख उठाकर देखने की। हमारी सजग, सशक्त, सक्षम बेटियाँ उन अपराधियों को धूल चटा देंगीं।


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03 जुलाई 2020

स्वच्छंद उड़ान के लिए तैयार करना चाहिए बच्चों को

बच्चों के लिए जुलाई का आना पिछले वर्ष तक उत्साह का समय होता था. इस वर्ष गर्मियों की छुट्टियाँ आईं भीं और चली भी गईं मगर छुट्टियों जैसा माहौल न बना सकीं. इन गर्मियों में सभी अपनी-अपनी जगह कैद होकर रहे. न कोई कहीं घूमने जा सका, न बच्चे लोग अपनी दादी-नानी के घर जा सके. इन दिनों में छुट्टियों जैसा माहौल भले ही रहा हो मगर मजा उन छुट्टियों जैसा नहीं आया जैसे कि पिछले साल तक आता रहा. इस बार बीच परीक्षाओं के समय से शैक्षणिक संस्थाओं के बंद होने ने बच्चों को घर की कैद में डाल दिया. इस कैद में वे अपने शौक को पूरा कर सकते थे, उनको विकसित कर सकते थे मगर भविष्य की अंधी दौड़ में दौड़ते अभिभावकों, संस्थाओं के कारण उन बच्चों को भारी-भरकम बोझ का सामना भी करना पड़ा. यह बोझ ऑनलाइन क्लासेज के माध्यम से, बेहिसाब होमवर्क के माध्यम से आता रहा. 

इस आपदा के दौर में जबकि अभी कुछ भी निश्चित नहीं हो पा रहा है, अभी सबकुछ जैसे धुँध में है, अभी हर तरफ अनिश्चितता का दौर बना हुआ है तब भी लोगों में भागमभाग मची दिखती है. अभी भी लोग एकतरफ अपनी जान बचाने की कोशिश में लगे हैं तो कुछ हैं जो इस माहौल में भी कैरियर की चिंता में लगे हैं. समझ से परे है कि ऐसे दौर में भी बच्चे हँसना-खेलना छोड़कर चिंताग्रस्त हैं. समझना होगा कि ये समय सबके लिए एकसमान है. सम्पूर्ण विश्व अभी एक जैसी स्थिति में खड़ा है. जो हाल इस देश के बच्चे की शिक्षा का हो रहा है कमोबेश वैसा ही हाल कहीं विदेश के बच्चों का भी है. सभी जब एक ही पायदान पर हैं तो फिर बजाय चिंता के बच्चों को, उनके अभिभावकों को उनको स्वच्छंद उड़ान के लिए तैयार करना चाहिए.


विगत तीन माह से अधिक के समय ने एक सबक सबको दिखाया ही है, सीखा किसने है ये बात और है कि इंसान के सोचने से कुछ नहीं होना, उसकी भविष्य की बनी योजनाओं का कोई मतलब नहीं, उसके द्वारा बनाये जा रहे तमाम आधारों का कोई आधार नहीं. ऐसे में भी यदि कोई सीख न ले तो वह उसकी बेवकूफी कही जाएगी. सोचिये एक पल को इतनी लम्बी छुट्टियाँ मिलने के बाद कोई कहीं नहीं जा सका. वे परिवार भी जो सप्ताह में दो-तीन दिन मॉल, फिल्म, और बाहर के भोजन में गुजारते थे, वे भी इन दिनों घर के अन्दर बंद रहे. जो ये कहते हुए बहुत ज्यादा गौरवान्वित होते थे कि उनके बच्चे जंक फ़ूड खाए बिना रह ही नहीं पाते, वे भी इस समय दाल-रोटी खाकर दिन बिता रहे हैं. वे जो गर्मियों में बजाय अपने घर के किसी हिल स्टेशन पर रहना पसंद करते थे, वे भी अब इसी गर्मी में अपनी दिनचर्या बिता रहे हैं.

अभिभावकों को समझना चाहिए कि जुलाई भले आ गई है मगर अभी संस्थान बंद हैं, यदि वे अभी इन तीन महीनों में अपने बच्चों को आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी, स्वाभिमानी, रचनात्मक, सहयोगी आदि न बना सके हैं, इस बारे में कुछ न सिखा सके हैं तो जुलाई से अपने घर को ही कोई शैक्षणिक संस्थान समझकर उनको यही सिखाने का काम करें. पाठ्यक्रम की पढ़ाई ज़िन्दगी भर होती रहेगी, वे ज़िन्दगी भर करते रहेंगे मगर ज़िन्दगी के लिए जो सीखना है वह इसी दौर में आसानी से समझाया जा सकता है, सिखाया जा सकता है. यही सबकुछ ज़िन्दगी भर काम आएगा, शेष तो समझिये कि नौकर बनाने के लिए, किसी की नौकरी करवाने के लिए ही है.


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05 जून 2020

कमजोर आत्मविश्वास से सच न हो सके बहुत से सपने

स्नातक स्तर तक की पढ़ाई पूरी न हो सकी थी कि पिताजी का आदेश मिला कि वापस घर आ जाओ, आगे नहीं पढ़ाना है. उस समय हम स्थिति समझ सकते थे. घर से पढ़ने के लिए ग्वालियर पहुँचे और वहाँ पढ़ने से ज्यादा नाम सामने आने लगा लड़ाई-झगडा करने में. कहते हैं न कि बद अच्छा, बदनाम बुरा. कुछ नाम वास्तविक रूप में हुआ तो कुछ में नाम काल्पनिकता का शिकार होकर सामने आया. चर्चा उसकी नहीं क्योंकि उन दिनों की अपनी ही एक अलग कहानी है जिस पर घंटों लिखा-बताया जा सकता है. जैसा कि पिताजी का आदेश था बिना किसी विरोध के घर आ गए. आगे की पढ़ाई के रूप में लॉ करने का विचार था या फिर सांख्यिकी से परास्नातक करने का. दोनों में कुछ सहमति सी न दिखी तो सिविल सर्विस की तैयारियों की तरफ ध्यान लगाने की कोशिश की. इसी बीच फ़िल्मी कीड़ा काटने लगा.


उरई जैसे शहर में आने के बाद इस कीड़े के काटने का कोई इलाज भी नहीं था. जिस तरह का माहौल यहाँ दिख रहा था उसमें कुछ नाटकों और कुछ नुक्कड़ नाटकों के द्वारा ही संतुष्टि का एहसास किया जा सकता था मगर आगे बढ़ने जैसा कुछ हिसाब समझ नहीं आ रहा था. कुछ महीनों की भागदौड़ के बाद यहाँ का सांस्कृतिक माहौल भी समझ आने लगा. ऊपरी तौर पर भले ही सब एक मंच पर दिखाई पड़ते हों मगर अंदरूनी रूप से, अपने बैनर के रूप में सभी अलग-अलग विचारधाराओं के पोषक थे. इनके साथ बहुत लम्बा समय नहीं बीत सकता था या कहें कि अपने काटे कीड़े का इलाज यहाँ नहीं समझ आ रहा था.


उन्हीं दिनों एक जगह विज्ञापन दिखाई दिया किसी विज्ञापन कंपनी का. मित्रों के सुझाव के साथ विचार किया गया कि यदि एक बार इस क्षेत्र में घुसना हो गया तो शायद आगे का रास्ता भी यहीं से मिल जाये. विज्ञापन की कुछ शर्तों को पूरा करने के लिए फोटो की आवश्यकता थी. अपने फोटोग्राफी के शौक और सेन्स को प्रयोग में लाने का विचार बनाया. एक दोस्त के कैमरे में रील डालकर खुद को निर्देशित करते हुए, खुद के लिए कैमरामैन बने. आनन-फानन पाँच-दस फोटो निकालकर उनको जल्द से जल्द बनवाया गया. जिस दिन सारी औपचारिकतायें पूरी करके फॉर्म को पोस्ट किया उस दिन से न जाने कितनी सफल फिल्मों के हीरो हम नजर आने लगे.

इतना सारा काम घर में बिना किसी की जानकारी में आये हुआ. उसके बाद का दौर किसी खतरनाक फिल्म की तरह से हमारे सामने आया. एक दिन पिताजी की अदालत में पुकार लगी. बिना किसी गवाह, सबूत के हमें उपस्थित होना पड़ा. उनके हाथ में एक लिफाफा चमक रहा था जो हमारे अपराध की गवाही खुद दे रहा था. उस लिफाफे के साथ-साथ जाने कितनी तरह की बातें हमारे हाथ में रख दी गईं. विज्ञान स्नातक की पढ़ाई का मंतव्य सिद्ध करने को कहा गया, सिविल सेवा की तैयारियों का मतलब बताने को कहा गया, नाचने-गाने को सामाजिकता की श्रेणी में शामिल करने के आधार को बताने को कहा गया.

एक हम चुपचाप सिर झुकाए अपने विज्ञान स्नातक होने का कथित अहंकारी गर्व लिए खड़े रहे. हमारे पास कोई तर्क नहीं थे, सिवाय आज्ञा पालन करने के. वो फॉर्म बरसों हमारे पास सुरक्षित रहा, इस सबूत के साथ कि पहली स्टेज में हम पास हो गए थे. आगे के लिए मुंबई जाना था, कुछ फोटोशूट और अन्य औपचारिकताओं को करना था. फिर एक दिन बहुत सारे फालतू कागजातों के साथ उस फॉर्म और उसके साथ आये पत्र को भी मकान के सामने बहती नाली में प्रवाहित कर दिया. वो पत्र मर गया, वो फॉर्म बह गया मगर आज तक वो कीड़ा न मरा, आज तक वो कीड़ा कहीं और नहीं गया.

बहुत सी बातें हैं जो आज तक समझ आती रहीं, नहीं भी समझ आती रहीं मगर एक बात ये समझ न पाए कि क्या हम डरपोक निकले? क्या हमारे अन्दर अपने सपनों को पूरा करने के लिए पारिवारिक निर्णयों के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत न थी? क्या हमारे अन्दर किसी विश्वास की कमी थी जो हम पिताजी के उस निर्णय का विरोध न कर सके? क्या हम अन्दर ही अन्दर कमजोर थे? ऐसा इसलिए क्योंकि यह उसी एक निर्णय पर नहीं हुआ वरन हमारे साथ एकाधिक मामलों में, बहुतायत विषयों पर ऐसा हुआ. अब लगता है कि उस जैसे अनेक पारिवारिक निर्णयों पर हमारी चुप्पी हमारे आज्ञाकारी होने का नहीं वरन हमारे कमजोर आत्मविश्वास की परिचायक है. ऐसी अनेक चुप्पियों का परिणाम आज भी हम ही भोग रहे हैं.

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10 जनवरी 2020

जीवट आत्मविश्वास के आगे बौनी बनी शारीरिक अक्षमता


उरई के इंदिरा स्टेडियम में बुन्देलखण्ड ओपन बैडमिंटन टूर्नामेंट का आयोजन का आज शुभारम्भ हुआ. पहले दी ही अनेक मैच हुए. उन मैचों सहित पूरे टूर्नामेंट की रिपोर्टिंग की जिम्मेवारी हमारे ऊपर थी. ऐसे में एक-एक मैच को देखा जा रहा था, उनके परिणामों पर, खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर नजर भी रखी जा रही थी. इसी निगरानी के बीच एक मैच सामने से गुजरा जो कहीं न कहीं हमारी दो-तीन साल पुरानी मांग को पूरा करता दिखा साथ ही आश्चर्य में भी डाल गया. जिला बैडमिंटन क्लब विगत कई वर्षों से टूर्नामेंट का आयोजन करता आ रहा है. अपने शौक और अपनी शारीरिक स्थिति के चलते हर बार आयोजकों से निवेदन किया जाता रहा है कि कम से कम एक मैच पैरा खिलाड़ियों के लिए करवा दिया करें. भले ही ये मैच प्रदर्शनी हो मगर ऐसा होना चाहिए. इससे एक तरफ पूरे समाज में सन्देश जाएगा कि जनपद जालौन का जिला बैडमिंटन क्लब पैरा स्पोर्ट्स के लिए सजग है, साथ ही जनपद में तथा जनपद के आसपास के पैरा खिलाड़ियों में भी उत्साह का संचार करेगा.


बहरहाल विगत कई वर्षों की मांग सिर्फ मांग बनकर ही रह गई. इसके पीछे यहाँ के लोगों का, खिलाड़ियों का आगे न आना भी रहा. आज जब बालिका जूनियर वर्ग में एक मैच चल रहा था. उस मैच को हम महज मीडिया की दृष्टि से देख रहे थे. तभी हमारी नजर में वो खिलाड़ी आई जिसकी चर्चा हमसे क्लब के पदाधिकारियों द्वारा पैरा मैच करवाने के सन्दर्भ में हो चुकी थी. वो खिलाड़ी बहुत ही आत्मविश्वास से अपने मैच का जैसे आनंद ले रही हो. जैसा कि उसके खेलने के ढंग से, उसके शॉट लगाने के हावभाव से लग रहा था कि वह पूरी तरह से अपनी जीत के प्रति आशान्वित है. मैच जैसा कि अपेषित था, उसी ने जीता. मैच के समाप्त होने के बाद तमाम तरह की औपचारिकताओं के करने के बाद, कतिपय मीडियाकर्मियों से बातचीत करने के बाद लगा कि वह फ्री है तो उससे बात करने का समय लिया. ऐसा इसलिए नहीं कि उससे महज बात करनी थी बल्कि इसलिए कि एक खिलाड़ी के रूप में उसका सम्मान बना रहे.


उससे अनुमति लेकर ही उसका वीडियो बनाया, जो फेसबुक पर लाइव भी किया, उसकी अनुमति लेकर. ऐसा इसलिए किया कि महज उसकी शारीरिक अवस्था के चलते उसे किसी तरह का विभेद न महसूस हो. आज के दिन वह एक खिलाड़ी थी और वह भी विजेता. ऐसे में उसके साथ व्यवहार भी एक विजेता की तरह किया जाना था. उसकी अनुमति के साथ ही औपचारिक, अनौपचारिक बातचीत के द्वारा उसके बारे में, उसके खेल के बारे में, उसकी इस खेल में आने की स्थिति के बारे में, उसके परिवार के बारे में जानने का प्रयास किया. स्वाति सिंह, जी हाँ, यही नाम है उस जीवट खिलाड़ी का, जिसका दायाँ हाथ जन्म से पूर्ण नहीं है. कोहनी के आगे का हाथ विकसित ही नहीं हो सका. बहरहाल, उसे किसी भी क्षण ये महसूस नहीं हुआ कि उसका एक हाथ पूर्ण नहीं है. अपनी आँखों से उसे मैच में जहाँ सर्विस लेते देखा वहीं अपने सामने बैठकर उसे जूतों के फीते बांधते देखा. 


स्वाति में जितना आत्मविश्वास अपने खेल के प्रति लगा उतना ही भोलापन उसके स्वभाव में नजर आया. कृषक पिता की सबसे बड़ी संतान के रूप में कबड्डी को तिलांजलि देकर वह पी०वी० सिंधु को अपना आदर्श मानकर बैडमिंटन में उतर आई. दसवीं की परीक्षा एक साल पहले उत्तीर्ण करने के बाद स्वाति वर्तमान में प्राविधिक शिक्षा ग्रहण कर रही है. दो छोटे भाई-बहिन गाँव में रहकर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं और स्वाति उरई में स्वावलंबी और खिलाड़ी बनने के लिए प्रयासरत है. सबसे बड़ी बात यह कि महज तीन महीने के अभ्यास के बाद उसमें बैडमिंटन के प्रति असीम प्रेम, स्नेह, समर्पण दिखाई देता है. अपने सभी वरिष्ठ साथियों के सहयोग के प्रति वह अभिभूत है. उसका कहना है कि स्टेडियम के सभी साथियों का इतना सहयोग ही है तभी वह आज इस टूर्नामेंट में भाग ले पा रही है. इन्हीं साथियों की बदौलत वह पूरे विश्वास के साथ अपनी तैयारी कर पाई है. ऐसा लगा भी क्योंकि अपने जीवन का पहला मैच, पहला टूर्नामेंट खेलने वाली स्वाति जबरदस्त आत्मविश्वास से भरी दिखाई दी. वर्तमान में पैरा से इतर खुद को सामान्य वर्ग में सबके सामने उतार कर स्वाति ने खुद को ही साबित किया है. कामना है कि जल्द ही वह अपनी प्रतिभा को समूचे देश के सामने प्रदर्शित करे.

10 दिसंबर 2019

प्रबल आत्मविश्वास ने ज़िन्दगी को जीना सिखलाया

किसी भी व्यक्ति के विकास में उसके आत्मविश्वास का बहुत बड़ा योगदान होता है. इस बात को न केवल कहा जाता रहा है बल्कि बहुत से व्यक्तियों ने इसे अमल में लाकर इसे सच भी साबित किया है. विश्वास से ओतप्रोत व्यक्ति के चेहरे की आभा, उसके बातचीत का तरीका, कार्य करने का ढंग सबसे अलग ही नजर आता है. उसका सबसे अलग अंदाज ही उसे सबका प्रिय भी बनाता है और जीवन में सतत सफलता की राह पर भी ले जाता है. विश्वास, आत्मविश्वास को बनाये रखना किसी और के हाथ में नहीं वरन उसी सम्बंधित व्यक्ति के हाथ में होता है. उसकी खुद की सोच, उसकी खुद की मनोदशा, उसकी खुद की प्रकृति निर्धारित करती है कि उसके विश्वास का बिंदु किस ऊँचाई तक जा सकता है.


अपने जीवन में अनेक व्यक्तियों से मिलना हुआ, जिनमें विश्वास का चरम देखने को मिला. बहुत से लोग ऐसे मिले जो सहज रूप में अपनी जीवन-शैली का निर्वहन करते आ रहे हैं. ऐसे लोगों के जीवन में भले ही सुविधाओं की अतिशयता न रही हो मगर उनके सामने समस्याओं का, मजबूरी का, किसी कमी का होना भी नहीं रहा है. ऐसे लोग बिना किसी परेशानी के, स्वयं ही अत्यंत सहजता से अपने विश्वास के द्वारा अपनी सफलता की राह निर्मित करते मिले. इसके साथ-साथ ऐसे लोगों से भी मिलना होता रहा जिनके जीवन में अभाव बुरी तरह से रहे. ऐसे लोगों से भी मिलना हुआ जिनके लिए किसी तरह की सशक्त, समृद्ध पारिवारिक पृष्ठभूमि उपलब्ध नहीं रही. बहुत से ऐसे लोग मिले जिन्होंने अपने जीवन का बहुत बड़ा समय समस्याओं को हल करने में, अपनी परेशानियों को हल करने में ही लगाया. बहुत से ऐसे व्यक्तियों से भी परिचय होता रहा जिनकी शारीरिक स्थिति सामान्य व्यक्तियों की तरह से नहीं रही. ऐसे सभी लोगों के पास भले ही संसाधनों का अभाव रहा हो, भले ही पारिवारिक समृद्धि उनके लिए रास्तों का निर्माण नहीं कर सकी हो, भले ही उनकी शारीरिक स्थिति ने उन्हें समाज में सामान्य व्यक्ति की तरह से अनेक क्रियाकलापों से दूर कर रखा हो मगर ऐसे लोगों ने अपने विश्वास के बलबूते, आत्मबल के सहारे खुद को अपने-अपने क्षेत्रों में स्थापित किया है.

आत्मविश्वास से लबरेज एक ऐसे व्यक्ति से आज लगभग दो दशक पुरानी दुर्घटना की याद के सहारे मिलना हुआ. उस समय अपने करीबी, बड़े भाई सरीखे अभिन्न मित्र के परिजन का एक ट्रेन दुर्घटना में अत्यंत गंभीर रूप से घायल होने का समाचार मिला. युवावस्था में कदम रखने के दौरान, जबकि आँखों में भावी जीवन के सपने बनने शुरू ही हुए होंगे, तकनीकी शिक्षा का आरम्भ अभी हुआ ही था लगा जैसे उसके सपने बिखर गए हैं. लगा जैसे कि जीवन आरम्भ होने के पहले ही किसी स्पीड ब्रेकर पर थमने सा लगा है. समय गुजरता रहा. उस होनहार युवक के बारे में लगातार जानकारियाँ मिलती रहीं. उसके द्वारा आत्मविश्वास के लगातार सहारे उन्नति के रास्ते पर बढ़ने के समाचार मिलते रहे. इन सबके बाद भी कभी मिलने का अवसर नहीं मिल सका. न मिलने के बाद भी महसूस होता रहा कि अपनी युवावस्था में दुर्घटना के द्वारा देह के स्तर से उपजी अक्षमता को उस होनहार, प्रसन्नचित्त, आत्मविश्वासी युवक ने जैसे हरा दिया है. अब जबकि उससे मिलना हुआ तो उसे वैसा ही पाया जैसा कि हम महसूस करते थे. आज पहली बार मिलना हुआ, उस युवक से. ढेर सारी बातें हुईं. पुरानी बातों को याद न करते हुए वर्तमान पर ही चर्चा हुई. हँसी-ख़ुशी के माहौल में उसका हँसमुख व्यवहार, विश्वास से दमकता चेहरा, मिलनसार व्यक्तित्व निश्चित रूप से उस निकटता को और बढ़ा गया, जो निकटता लगभग दो दशक पहले उसकी दुर्घटना की खबर सुनने के बाद बनी थी. निश्चित ही ऐसे युवक समाज में ऐसे लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं, जो सभी तरह से सक्षम होने के बाद भी अपनी असफलताओं का रोना रोते रहते हैं. खुद को समाज की मुख्यधारा से अपने कमजोर विश्वास के हाथों हाशिये पर लगाये रहते हैं.

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चित्र परिचय –
काले सूट में गीत, जो लगभग दो दशक पहले एक ट्रेन दुर्घटना में अपने दोनों पैर और बायाँ हाथ खो चुके हैं. उस समय वह इंजीनियरिंग के छात्र थे. अपनी शिक्षा को उसके बाद भी उन्होंने पूरा किया. इस स्थिति में भी अपने विश्वास को, आत्मबल को उन्होंने कमजोर न पड़ने दिया. शिक्षा पूरी करने के बाद वे वर्तमान में स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया लिमिटेड, SAIL में कार्यरत हैं.
आप जनपद जालौन के प्रसिद्द रंगकर्मी, फिल्मकार प्रभात तिवारी (कुरते में बैठे हुए) के भांजे हैं.

29 नवंबर 2019

बेटियों को सशक्त बनाएँ

बेटियों के साथ होने वाली किसी भी घटना के बाद एक आम पोस्ट आती है कि बेटियों के बजाय बेटों को शिक्षा दें कि वे स्त्री को एक इन्सान समझें.

हम बराबर और बार-बार कहते हैं कि समाज में स्त्री-पुरुष का, लड़के-लड़की का, बेटे-बेटी का भेद करने से कभी कोई सुधार नहीं आने वाला. बेटों को किसी तरह की शिक्षा दें या न दें मगर सभी माता-पिता अपनी बेटियों को ये शिक्षा अवश्य दें कि

=>> वे जीरो फिगर की फालतू अवधारणा से बाहर निकलें.

=>> वे खुद को सभी काम करने में सक्षम समझें न कि अपने भाई, पिता आदि के भरोसे रहें.

=>> शारीरिक सौष्ठव किसी भी रूप में अपमानजनक नहीं है. खुद की देह को क्रीम, पाउडर, लिपस्टिक, परफ्यूम आदि की जकड़न से बाहर निकाल कसरती बनायें.

=>> घर की चाहरदीवारी में घुसे रहने की प्रवृत्ति त्याग कर खुद को मैदानी इन्सान बनाने के लिए आगे आयें. दौड़ने, भागने, कूदने आदि क्रियाओं में दक्षता हासिल करें.

=>> दिन भर मोबाइल के ऊटपटांग एप्प पर अपनी ऊर्जा को खर्च करने के बजाय अपनी ताकत को, दिमागी ऊर्जा को किसी न किसी आत्मरक्षा वाले गुण के विकास में खर्च करें.

=>> अपने घर की अन्य बुढ़िया टाइप औरतों के साथ बैठकर सास-बहू जैसे सीरियल्स में अपने दिमाग को खपाने के बजाय समाज में आसपास छिपे कुत्सित विचारों वाले जानवरों को समझने की क्षमता का विकास करें.

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ध्यान रखें, बेटों को शिक्षा देने के विचार के बहाने आप अपनी बेटियों को घरों में कैद रखने की मानसिकता का त्याग करें. जानवर किसी के बेटे नहीं होते मगर इन्हीं जानवरों का शिकार होने वाली लड़कियाँ, स्त्रियाँ आपकी नहीं तो किसी न किसी की बेटी अवश्य ही होती है.

21 मई 2019

निगेटिव में डंडा घुसाकर उसे पॉजिटिव बनाएँ


चुनाव के दौर से देश निकल कर परिणामों की आस के दौर में चला गया है. बहुत से लोगों को अभी से दौरा पड़ने लगे हैं. अभी तक कुछ लोग ईवीएम का हैक किया जाना चिल्लाते दिखते थे,, वे अब उसके बदले जाने की बात करने लगे हैं. ऊहापोह के इस दौर में नकारात्मकता लगभग सभी पर हावी है. इस नकारात्मकता से वही निकल सकता है, जो डंडे का प्रयोग करना जानता हो. हँसिये नहीं, सही कह रहे हैं. न मानें तो हम बताए देते हैं कि कैसे डंडे का उपयोग करते हुए नकारात्मकता को दूर किया जा सकता है. अपने आपस छाई निगेटिव स्थिति को कैसे पॉजिटिव किया जा सकता है. गौर से पढ़िएगा.

जीवन में जब भी निगेटिव (-) महसूस हो तो
उसमें एक डंडा (।) घुसा कर उसे पॉज़िटिव (+) बना दो.
डंडा घुसाना ज़रूरी होता है, पॉज़िटिव होने के लिए. यहाँ तय आपको करना है कि आपकी नकारात्मकता को दूर करने में आपका कौन सा डंडा काम आएगा. घूमने, फोटोग्राफी करने, गीत-संगीत में डूब जाने, अपने अन्य शौक पूरा करने आदि के अपने पसंदीदा डंडे के साथ-साथ आपसी विश्वास, सद्भाव, मित्रता आदि का उपयोग करके आप निगेटिव को पॉजिटिव बना सकते हैं.

ध्यान रखियेगा, ये चुनाव देश का भविष्य तय करते हैं, नेताओं की स्थिति का निर्धारण करते हैं, सरकार चलाने वालों का निर्वाचन करते हैं न कि हम सबके आपसी रिश्तों, संबंधों, व्यवहार, बर्ताव का निर्धारण करते हैं, न ही निर्वाचन करते हैं. हमें अपने व्यवहार से, अपने कार्य से ही सकारात्मकता को बनाये रखना है.



29 अप्रैल 2019

ज़िन्दगी तू थक जाएगी इम्तिहान लेते-लेते - 1550वीं पोस्ट

ऐ ज़िन्दगी, कितनी बार इम्तिहान लेगी तू हमारा? हो सकता है कि कल को तू इम्तिहान लेती-लेती थक जाए मगर हम नहीं थकेंगे. तुम्हारा काम इन्तिहान लेना है, हमारा इम्तिहान देना. तुम थक जाओगी मगर हम नहीं. यहाँ तो एक उम्र बीत गई इसी में. ज़िन्दगी, तुमने अपने रंग-ढंग बदले मगर हम न बदले. तुम अपनी कोशिश करो, हम अपनी करते हैं. तुम जीत जाओ तो हमें ले जाना, हम जीतें तो बिना हमारी आज्ञा के न जाना. कहो, है मंजूर? ये कोई दर्शन नहीं, ये कोई फ़िल्मी डायलॉग नहीं वरन ज़िन्दगी के प्रति एक नजरिया होना चाहिए किसी भी आत्मविश्वास से भरे व्यक्ति है. हमारा तो यही विचार है. हमारा मानना है कि ज़िन्दगी जिस परमसत्ता द्वारा दी गई है, जिस प्रकृति द्वारा दी गई है, जिस विज्ञान द्वारा दी गई है वह महज उम्र काटने के लिए नहीं दी गई है. यदि उसका उद्देश्य किसी भी जीव को, विशेष रूप से इन्सान को ज़िन्दगी देना है तो उसके पीछे अनेक अर्थ छिपे हुए हैं. यदि उसे महज जीवन देना होता, मात्र जीवित रखना होता तो वह ज़िन्दगी के साथ अनिश्चितता नहीं जोड़ता. सबकुछ निर्धारित होने के बाद भी इन्सान उससे अनभिज्ञ है, ऐसा महज इसलिए कि वह ज़िन्दगी के प्रति सकारात्मकता अपनाता हुआ आगे बढ़ता रहे.


जैसा कि प्रकृति का सिद्धांत है कि यहाँ सब कुछ परिवर्तनीय है. एक पल में ही यहाँ सबकुछ उलट-पुलट हो जाता है. प्रकृति की गोद में एक दिन में ही जाने कितना परिवर्तन होता रहता है. पूरे चौबीस घंटों की समयावधि देखें तो पल-पल में ही परिवर्तन देखने को मिलते हैं. ऐसे में कैसे स्वीकार कर लिया जाये कि उसी प्रकृति की गोद में रहने वाले व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन नहीं होगा? कैसे मान लिया जाये कि जो पल आज है वह अगले पल बदलेगा नहीं? यह सत्य है कि जैसे दुःख आया है वैसे जाएगा भी उसी के साथ सुख भी आएगा और वह भी दुःख के जाने की तरह कुछ पल बाद चला जायेगा. इन्सान से अपने आपको इसी बदलाव के द्वारा, इस परिवर्तन के द्वारा आने वाली किसी भी घटना के लिए तैयार रहने के लिए, खुद में संतोष का भाव जागृत करने के लिए मान लिया है कि ऐसा करना ज़िन्दगी का लक्षण है. ऐसा होता है से ज्यादा वह इस पर विश्वास करता है कि ज़िन्दगी ऐसा करती है. इस विचारधारा से वे व्यक्ति सहज रूप में बाहर निकल आते हैं जो विश्वास के साथ किसी भी परिवर्तन का सामना करते हैं. इसके ठीक उलट वे लोग परेशान हो जाते हैं जो ज़िन्दगी के ऐसे परिवर्तनों के वशीभूत होकर अपना संतुलन खो देते हैं, अपने विश्वास को डगमगा देते हैं. 

ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति को अगले पल की जानकारी नहीं, सभी व्यक्तियों को चौबीस घंटे ही मिले हैं, हाँ बस संसाधनों का, माध्यमों का अंतर अवश्य हो सकता है. इस अंतर को कोई भी व्यक्ति अपने विश्वास के द्वारा भले न मिटा सके मगर कम तो कर ही सकता है. जैसे-जैसे कोई व्यक्ति अपने कार्यों से अपने सामने आने वाली विसंगतियों को दूर करता जाता है, अपने जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान करता जाता है वैसे-वैसे उस व्यक्ति के अन्दर विश्वास का लेवल बढ़ता चला जाता है. किसी भी व्यक्ति को यही विश्वास विजयी बनाता है, यही विश्वास आगे बढ़ाता है. ऐसे में ज़िन्दगी में मिलने वाली चुनौतियों को, ज़िन्दगी से मिलने वाली चुनौतियों को वह सिर्फ और सिर्फ अपने विश्वास से ही जीत सकता है. ऐसे में कोई भी व्यक्ति अपने विश्वास को बनाये रखे और ज़िन्दगी की चुनौतियों से जीतते हुए उसे ही चुनौती देता रहे.


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इस ब्लॉग की 1550वीं पोस्ट 

15 अप्रैल 2019

तेरा कष्ट मेरे कष्ट से बड़ा कैसे


समस्याएं सबसे साथ होती हैं पर हमें सिर्फ अपनी समस्या ही सबसे बड़ी क्यों लगती है? कष्ट किसी न किसी रूप में सबके साथ जुड़ा है पर हमें सिर्फ अपना ही कष्ट क्यों सबसे बड़ा दिखाई देता है? क्यों हमें किसी और के कष्ट, समस्या बड़ा समझ नहीं आता? क्यों अपने ही कष्ट को, अपनी समस्या को हम किसी दूसरे के कष्ट पर, दूसरे की समस्या पर आरोपित करना चाहते हैं. ऐसा संभव है कि उस स्थिति में होता हो जबकि हम अपने कष्ट में, अपनी समस्या में घिरे नितांत अकेले बैठे हों. जब हम किसी दूसरे के कष्ट में भागीदार नहीं बनेंगे, किसी दूसरे की समस्या के साथ खुद को जोड़ने का काम नहीं करेंगे तब तक किसी और के कष्टों, दुखों, समस्याओं को न ही समझ सकेंगे, न ही उनको बड़ा समझ सकेंगे. कष्ट, समस्या, दुःख किसी भी रूप में किसी व्यक्ति की प्रसिद्धि का कारक नहीं बनते. उनके होने पर किसी व्यक्ति को सुख की अनुभूति नहीं होती है. इसके बाद भी ऐसा देखने में आता है कि व्यक्ति अपने कष्टों, अपनी समस्याओं को लगभग पालने-पोसने का काम करते हैं. किसी न किसी तरह, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में समाज में अपने कष्ट, अपनी समस्या को प्रकट करने का अवकाश खोजते हैं.


व्यक्ति समाज का एक हिस्सा है, उसी के द्वारा समाज का निर्माण हुआ है. ऐसे में सभी व्यक्तियों का दायित्व बनता है कि वे एक-दूसरे के साथ तारतम्यता बनाये रखें, एक-दूसरे के साथ सामंजस्य बनाये रहें. यदि व्यक्ति ऐसा करने में सक्षम होता है तो वह एक-दूसरे के सुखों का आनंद भी उठा सकता है, एक-दूसरे के दुखों, कष्टों, समस्याओं को भी मिलकर सुलझा सकता है. मिलजुल कर रहने के कारण, सामूहिकता की भावना होने के कारण किसी भी व्यक्ति को अपना कष्ट किसी दूसरे के कष्ट के आगे बहुत बड़ा नहीं लगेगा. कष्ट की, समस्या की स्थिति में वह हमेशा दूसरे के कष्टों को, समस्याओं को दूर करने के लिए आगे ही आगे रहेगा. इससे व्यक्ति को समझ में आएगा कि समाज में एकमात्र वही नहीं है जिसके पास समस्याएं हैं, कष्ट हैं. उसके जैसे, उससे बुरी स्थिति में बहुत से लोग हैं जो कष्टों में, समस्याओं में रहने के बाद भी अपने जीवन को सहजता से संचालित कर रहे हैं. 

व्यक्ति को अपनी गंभीरता, अपने धैर्य, अपनी हिम्मत का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए. इनके द्वारा वह आत्मविश्वास में वृद्धि करता रहता है. इसी आत्मविश्वास के चलते वह सदैव कष्टों पर विजय पा सकता है, समस्याओं का समाधान खोज सकता है, दुखों से मुक्ति पा सकता है. बस उसे ध्यान रखना होगा कि उससे ज्यादा कष्ट वाले, समस्या वाले इस समाज में हैं. उसे ध्यान रखना होगा कि उसके पास आत्मविश्वास है जो उसे हारने नहीं देगा.

15 फ़रवरी 2019

सेना की कार्यवाही आपकी सोच से अधिक कठोर होगी, विश्वास रखिये

पुलवामा आतंकी हमले के बाद देशवासियों में आक्रोश उफान पर है. ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि एकसाथ चालीस से अधिक जवान शहीद हो गए हैं. यह बहुत बड़ा हमला है. सोशल मीडिया पर देशवासियों के द्वारा सिर्फ और सिर्फ युद्ध के द्वारा अंतिम समाधान चाहा जा रहा है. पाकिस्तान को नक़्शे से मिटाने की बात की जा रही है. एक पल को अपनी संवेदनात्मक व्यग्रता को एक किनारे रखकर विचार किया जाये तो क्या ऐसा संभव है? क्या इस हमले के तुरंत बाद बिना किसी रणनीति के ऐसा करना उचित कदम कहलायेगा? क्या किसी भी देश को नक़्शे से मिटा देना संभव है? ये सब इसलिए नहीं लिखा जा रहा कि युद्ध से समाधान नहीं निकल सकता. संभव है बातचीत की लम्बी और निरर्थक यात्रा के बाद एकमात्र विकल्प युद्ध ही बचा हो मगर इस आतंकी हमले के तुरंत बाद सिर्फ भावनात्मक उफान के चलते युद्ध खतरे को आमंत्रित करना ही होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि देश के दुश्मन सिर्फ देश से बाहर ही नहीं बैठे हैं, वे देश के अन्दर भी पूरी सक्रियता से छिपे हुए हैं. इसी हमले के तुरंत बाद वे किसी न किसी रूप में सक्रिय दिखाई देने लगे हैं. किसी ने चेतावनी सी दे दी है कि इस हमले के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक नहीं होनी चाहिए. किसी गले मिलने वाले का कहना है कि आतंकवाद का कोई देश नहीं होता है. किसी को यह राष्ट्रभक्ति का परिणाम समझ आ रहा है. कोई इस हमले के मूल में सर्जिकल स्ट्राइक का होना बता रहा है. स्पष्ट है कि ऐसे लोग ही इस समय में किसी भी तरह की कार्यवाही के समय देश के लिए ही घातक सिद्ध होंगे.



इसके अलावा याद कीजिये वह दौर जबकि मुंबई में आतंकियों ने होटल पर कब्ज़ा करके लगातार हमारे सुरक्षा बलों से मोर्चा लिया हुआ था. वे आतंकी बिना सोये, बिना खाए-पिए लगातार लगभग सत्तर घंटे तक सुरक्षा जवानों से लड़ते रहे. इसे याद दिलाने के पीछे महज इतना कहना है कि जब आतंकियों ने हमला किया है, जैश-ए-मोहम्मद नामक आतंकी संगठन ने इस हमले की जिम्मेवारी ली है तो वे संभव है कि हमारी सेना की जवाबी कार्यवाही के लिए तैयार बैठे हों. ये भी संभव है कि देश के भीतर उनके स्लीपर सेल के रूप में काम कर रहे उनके लोग भी इसी ताक में बैठे हों कि कब सेना आक्रोशित होकर जवाबी कार्यवाही करे और वे देश के भीतर उत्पात करना शुरू कर दें. सोचिये कि आज, अभी बिना किसी रणनीति के भावना में बहकर सेना जवाबी कार्यवाही कर दे और देश के अन्दर आतंकियों के स्लीपर सेल मुंबई हमले जैसी कार्यवाही देश के कई हिस्सों में कर दें तो सेना किस मोर्चे को संभालेगी? हमारे वीर सैनिक देश के बाहर के दुश्मनों से निपटेंगे या फिर देश के भीतर के दुश्मनों से? 

इसके साथ-साथ वह दिन भी याद करिए जबकि हमारे देश का विमान अपहरण करके कंधार ले जाया गया था. सैकड़ों सवारियों के बदले में एक आतंकी माँगा गया था. तब क्या किसी एक सवारी के परिजन ने सरकार से कहा था कि हमारे परिजन शहीद हो जाने दो मगर आतंकी रिहा नहीं होना चाहिए? इसके उलट परिजनों ने हंगामा काटना शुरू कर दिया था. सरकार पर दवाब बनाना शुरू कर दिया था. वे जल्द से जल्द आतंकी को रिहा करके अपने परिजनों की रिहाई चाह रहे थे. सोचिये, ऐसे ही नागरिक आज तुरंत युद्ध करने की, पाकिस्तान समाप्त करने की बात कर रहे हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि सेना में उनके घर का कोई नहीं है. सीमा पर उनको लड़ने नहीं जाना है. दुश्मन की गोलियाँ खाकर उनको शहीद नहीं होना है. यहाँ धैर्य की नहीं बल्कि रणनीति की आवश्यकता है. यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि जो सैनिक इस हमले में शहीद हुए हैं, उनके साथी भी उनके साथ सेना का हिस्सा हैं. उनके मन में हमसे कहीं अधिक आक्रोश, कहीं अधिक गुस्सा आतंकियों के लिए होगा. इसके बाद भी वे संयत हैं, धैर्य धारण किये हुए हैं क्योंकि वे स्थिति की वास्तविकता को समझते हैं. वे हम सामान्य नागरिकों से ज्यादा अनुशासित हैं. हम सामान्य नागरिकों से ज्यादा संयमित हैं. उनको एहसास है कि कब, किस स्थिति में, किस रणनीति के साथ दुश्मन पर हमला करना है. याद कीजिये उरी आतंकी हमले के बाद की सर्जिकल स्ट्राइक. 



अंत में उनके लिए कुछ पंक्तियाँ जो नोटबंदी को आतंकी हमले से जोड़कर बार-बार एक आरोप सा अपनी ही सरकार पर लगा रहे हैं. वे ध्यान रखें कि नोटबंदी हुए दो साल से अधिक हो चुके हैं. इस समयावधि में आतंकी संगठनों ने हमारे देश के भीतर पनप चुके उनके एजेंटों द्वारा, स्लीपर सेल द्वारा, विभिन्न सफेदपोशों द्वारा इतना धन तो जमा कर ही लिया होगा कि दो साल में एक हमला कर सके. नोटबंदी के बाद से अभी तक कितने आतंकी हमले हुए, इसका आकलन खुद करना चाहिए ऐसे लोगों को. याद रखना होगा कि जिस देश में सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगे जाते हों, जहाँ पड़ोसी दुश्मन देश से अपने देश की सरकार गिराने की मदद माँगी जाती हो वे कब आतंकियों के पक्ष में झुक जाएँ कहा नहीं जा सकता. देशवासी जितने आक्रोश में हैं, उससे कहीं अधिक आक्रोश में हमारी सेना है, हमारे वीर सैनिक हैं. हमें बस उनकी रणनीति का, उनके कदम का, उनकी कार्यवाही का इंतजार करना होगा ऐसे समय में. वह हमारी सोच से कहीं अधिक होगा, भले ही वह युद्ध के रूप में न हो मगर किसी युद्ध से कम न होगा.

22 दिसंबर 2018

लड़ने वाला ही जीतता है

संघर्षों से लड़कर आगे बढ़ने वाले ही विजयी होते हैं. उनको पता होता है कि कैसे किस तरह से परिस्थितियों से लड़ा जाए. ये बात हम सभी जानते-समझते हैं कि परिस्थितियों का निर्माण स्वतः भी होता है और मनुष्य भी करता है. ऐसे में जबकि कोई भी स्थिति, परिस्थिति जो मानव-जनित हो उसका समाधान, उससे लड़ने का तरीक़ा मानव के पास निकल ही आता है या कहें कि वो ऐसा करने में सक्षम होता है पर ऐसा प्रकृति-जन्य परिस्थितियों में नहीं कहा जा सकता. प्राकृतिक परिस्थितियाँ कब, किस तरह के रूप में सामने आएँ कहा नहीं जा सकता है. ऐसी अकस्मात् उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिए कोई भी व्यक्ति ख़ुद को तैयार तो रखता है पर बिना यह विचार किए कि ऐसी स्थिति से लड़ने के लिए ख़ुद में कितना सामर्थ्य, कितना विश्वास, कितनी शक्ति जुटाने की आवश्यकता है.

किसी भी स्थिति से लड़ने, उससे जीतने के लिए व्यक्ति का विश्वास, उसकी जिजीविषा, उसका आत्मबल सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है. समाज का कोई भी क्षेत्र हो सभी में प्रत्येक कालखंड में समस्याएँ रहीं हैं, मुश्किलें आईं हैं किंतु उनसे पार वही लोग पा सके हैं जिन्होंने अपने विश्वास, आत्मबल को बनाए रखा. ऐसा करना महज़ जीतने के लिए नहीं बल्कि अपने साथ के लोगों संग, अपने परिचितों के संग, समाज के अन्य लोगों संग विश्वास में वृद्धि के लिए भी अपेक्षित होता है. परिस्थितियों से, विषम स्थितियों से लड़ना, उन पर विजय पाना सम्बंधित व्यक्ति के विश्वास, उसके व्यक्तित्व को भी निखारने का काम करता है. इतिहास साक्षी है कि समाज में जो लोग भी दैदीप्यमान हैं वे संघर्षों से लड़कर ही आगे आए हैं. आज प्रत्येक क्षेत्र में चुनौतियाँ हैं, हर जगह किसी न किसी रूप में इम्तिहान हैं ऐसे में व्यक्ति को ख़ुद को निखारने की प्रक्रिया भी इनसे लड़ना है. ऐसे में बजाय घबराने के यह समझने की ज़रूरत है कि यदि ख़ुद को सक्षम बनाना है, अपने व्यक्तित्व को निखारना है, विजयी बनना है तो किसी भी समस्या से घबराना नहीं है, किसी भी परिस्थिति से हार नहीं माननी है. ध्यान रखना होगा कि संघर्ष करने वाला ही विजयी होता है.

03 दिसंबर 2018

दिव्यांगजनों के प्रति मानसिकता बदलने की आवश्यकता

वर्ष भर प्रतिदिन किसी न किसी दिवस के आयोजन के कारण जनमानस का ध्यान भी अब राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय दिवसों के आयोजनों से हटने लगा है. इसी दिसम्बर माह के आरम्भिक तीनों दिन किसी न किसी दिवस के आयोजन हेतु रहे. ये किस्सा पूरे साल बना रहता है. जनमानस समाचारों में, बैनरों में, होर्डिंग्स में इन दिवसों के बारे में जान-समझकर अपने आपको उसी क्षण उस दिवस से जोड़ता है और अगले ही पल उसे विस्मृत कर देता है. ऐसे में किसी गंभीर आयोजन का भी हाल सामान्य सा रह जाता है. उस दिन विशेष का आयोजन किस कारण किया जाना है, उसके आयोजन का उद्देश्य क्या है, उसका सुफल क्या प्राप्त हुआ इस पर फिर किसी का ध्यान नहीं रहता है. ऐसा ही कुछ उन दिवसों के बारे में देखने को मिल रहा है जिनके आयोजन की महती आवश्यकता है. समाज को उनके बारे में जागरूक करने की अत्यधिक आवश्यकता है. ऐसे ही महत्त्वपूर्ण दिवसों में एक दिवस अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांग दिवस भी शामिल है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयासों से देश में अब विकलांग के स्थान पर दिव्यांग शब्द प्रयोग होने लगा है किन्तु उनके साथ कार्य-व्यवहार में अभी भी स्थिति बदली नहीं है.


दिव्यांग शब्द अब सरकारी कार्यों में, आम बोलचाल में दिखाई देने लगा है किन्तु आम जनमानस में अभी भी एक तरह की सुसुप्तावस्था देखने को मिलती है. जनमानस को लगता है जैसे कि किसी दिव्यांग के प्रति एकमात्र सहानुभूति दर्शाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री की जा सकती है. मदद के नाम पर चंद सिक्के, दो शब्द ही दिखाई देते हैं. ऐसा इसलिए भी समझ आता है क्योंकि अभी भी समाज में आम धारणा बनी हुई है कि दिव्यांगों अथवा किसी अन्य जरूरतमंद के लिए कार्य करने जिम्मेवारी सिर्फ और सिर्फ सरकार की है. ऐसा इसलिए भी और है क्योंकि सरकारी कार्यक्रमों में जनमानस की भागीदारी उतनी तीव्रता से नहीं करवाई जाती है जितनी कि जनप्रतिनिधियों की होती है, सत्ताधारी दल के छोटे-बड़े पदाधिकारियों की होती है, समाज के प्रतिष्ठित लोगों की होती है. सरकारी आयोजनों में ऐसे लोग ही सम्मान हासिल करते देखे जाते हैं और भीड़-दर्शकों के नाम पर या तो लाभान्वित होते हैं या फिर सरकारी कार्यालयों के कर्मचारी. यहाँ आम नागरिक लगभग विलुप्त सा होता है. ऐसे में किसी दिवस के आयोजन को लेकर समाज में, आम नागरिकों में जागरूकता देखने को नहीं मिलती है. कमोबेश ऐसी स्थिति दिव्यांग दिवस को लेकर भी है. समाज के बहुसंख्यक लोगों को इसकी जानकारी ही नहीं कि तीन दिसम्बर को इस तरह का कोई दिवस आयोजित भी किया जाता है.


बाकी किसी और दिवस के आयोजन के बारे में तो नहीं कहा जा सकता किन्तु दिव्यांग दिवस के आयोजन में आम नागरिकों की सहभागिता अधिक से अधिक होनी चाहिए. इससे एक तो नागरिकों को भी ऐसे आयोजनों से जुड़ने का अनुभव होगा, दूसरे समाज के लोगों को अपने बीच के लोगों की समस्याओं के बारे माँ जानने-समझने का अवसर मिलेगा. दिव्यांगजनों की समस्या आर्थिक सशक्तिकरण की उतनी नहीं है जितनी कि सामाजिक स्वीकार्यता की है, उनके विश्वास को बनाये रखने की है, उनका हौसला बढ़ाये रखने की है. दिव्यांगजन अपनी मेहनत, अपनी जिजीविषा, अपने हौसले, अपने विश्वास से स्वयं को समाज में बनाये हुए हैं, उन्हें बस यही एहसास करवाए जाने की आवश्यकता है कि वे इसी समाज का अंग हैं, इसी समाज के नागरिक हैं, वे हाशिये पर नहीं हैं, वे दोयम दर्जे के नहीं हैं. ऐसा समझा-समझाया जाना तभी संभव है जबकि समाज का एक-एक व्यक्ति दिव्यांगों को नागरिक ही समझे. उसकी दिव्यांगता किसी कारणवश उत्पन्न हुई हो सकती है, उसकी दिव्यांगता जन्मजात हो सकती है मगर इस कारण से उसे नकारात्मकता से गुजरना पड़े, यह सुखद नहीं.

व्यक्तिगत अनुभव से एहसास हुआ है कि अभी भी समाज में दिव्यांगों के प्रति सहानुभूति का, दया का भाव बना हुआ है. शिक्षित, समर्थ, योग्य दिव्यांग व्यक्ति के लिए भी समाज इसी तरह की धारणा बनाये हुए है. छोटे से छोटे, बड़े से बड़े कार्य के लिए सामाजिक प्राणी उसके साथ ऐसे व्यवहार करता है जैसे वह दिव्यांग सम्बंधित कार्य को करने में अक्षम है. जबकि ऐसा नहीं है. वर्तमान में अनेकानेक वास्तविक कहानियाँ हमारे आसपास दिव्यांगजनों के हौसले को चित्रित करती दिखाई दे रही हैं. बहुतायत में ऐसे दिव्यांगजन ऐसे हैं जिन्होंने अपनी मेहनत, अपनी कर्मठता, अपनी जिजीविषा से असंभव को संभव कर दिया है. ऐसे में यदि सरकारी अथवा गैर-सरकारी आयोजनों को किया जाता है तो उसमें महज औपचारिकता का निर्वहन न किया जाये बल्कि उसको महत्ता देते हुए आम नागरिकों के बीच स्थापित किया जाये. अभी भी बराबर महसूस होता है कि दिव्यांगों के प्रति सामाजिक सोच में बदलाव आने में दशकों लगेंगे. 
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वैसे इस वर्ष 2018 की थीम विकलांग व्यक्तियों को सशक्त बनाओ तथा उनके समावेश और समानता को सुनिश्चित करो (इम्पावरिंग पर्सन विथ डिसएबिलिटीज एंड इनश्योरिंग इनक्लूजीवनेस एंड इक्वालिटी) है.

02 दिसंबर 2018

समय की परीक्षा और व्यक्ति का हौसला


समय कितनी-कितनी बार, किस-किस तरह से व्यक्ति की परीक्षा लेता है कहा नहीं जा सकता है. इसे शायद सम्बंधित व्यक्ति का हौसला बढ़ाना ही कहा जायेगा जबकि उसे समझाया, बताया जाता है कि समय उसी की परीक्षा लेता है जो इसके लायक होता है. ऐसा भी कहा जाता है कि समय या फिर कोई ईश्वरीय सत्ता जिसे इस लायक समझती है उसी का इम्तिहान लेती है. व्यावहारिक रूप से देखा जाये तो ऐसा महज दूसरे व्यक्ति का हौसला बढ़ाने के लिए ही कहा जाता है. ऐसा किसी भी रूप से अंतिम सत्य नहीं है कि जो व्यक्ति हिम्मती होता है, विश्वास से भरा होता है उसी को तमाम कष्टों से दो-चार होना पड़ता है. ऐसा भी नहीं है कि जिनके सामने कष्ट अथवा संकट नहीं आ रहे वे लोग आत्मविश्वास से भरे नहीं हैं. ऐसा भी नहीं है कि जो लोग कष्टों का कम या न के बराबर सामना कर रहे हैं, समय उनकी परीक्षा नहीं लेता है. वास्तविकता में लगभग सभी व्यक्तियों को कष्टों का, संकटों का सामना करना पड़ता है, यह और बात है कि उसका सामना करने की, उनसे निपटने की शक्ति सभी में अलग-अलग होती है.


इसी बिंदु पर आकर, जहाँ कि किसी भी तरह की परेशानी से जूझ रहे व्यक्ति अपने आपको उस संकट से बाहर निकालने में सफल हो जाते हैं या फिर किसी और को अपने कष्ट का आभास भी नहीं होने देते हैं, ऐसे लोगों के प्रति अन्य लोगों में एक अलग तरह की धारणा बनने लगती है. यहाँ समझना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति के जीवन में ऐसा नहीं है कि कष्ट आये ही नहीं और ऐसा भी नहीं कि एक बार कोई कष्ट आने के बाद भविष्य में कभी कोई दूसरी समस्या या कष्ट नहीं आएगा. भविष्य किसी ने नहीं जाना है और न ही किसी ने अपना समय जाना है. कब किसके साथ क्या हो उसे पता नहीं होता है. इसी कारण से जो व्यक्ति स्वयं को सशक्त, विश्वास से भरे रखते हैं वे सहज ही किसी भी कष्ट से पार पा लेते हैं. एकबारगी वे भले ही उनकी समस्या को निपटने में समय लग रहा हो मगर ऐसे लोग अपनी स्थिति को किसी और पर सहज ही प्रकट नहीं होने देते हैं. समय के साथ ऐसे लोग अपनी स्थितियों के निपटारे का प्रयास भी करते रहते हैं. ऐसे ही लोग जीवट के धनी माने जाते हैं. 

असल में कोई किसी दूसरे के दुःख में लगातार सहभागी तभी तक बना रहता है जबकि पीड़ित व्यक्ति अपने दुःख का रोना लगातार उसके सामने नहीं रोता है. यह अपने आपमें परम सत्य है कि सभी को अपने कष्टों से, अपनी समस्याओं से स्वयं ही जूझना होता है. दूसरा कोई भी व्यक्ति हौसला बढ़ाने के लिए, उसकी मदद करने के लिए साथ अवश्य आता है मगर ऐसा बहुत ही कम होता है जबकि कोई और आकर कष्टों का निवारण कर दे. ऐसे में पीड़ित व्यक्ति को ही अपनी समस्याओं से पार पाना होता है. साथ के लोग उसकी हिम्मत बनते हैं, उसका हौसला बढ़ाते हैं, वह व्यक्ति हार न मान बैठे इसी कारण तमाम तरह से उसके प्रति विश्वास प्रकट करते हैं. इसी विश्वास की दम पर व्यक्ति अपने कष्टों से मुक्ति पा लेता है. यहीं आकर कुछ लोग टूट जाते हैं और कुछ लोग सब कुछ पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ जाते हैं. ऐसे ही आगे बढ़ने वालों के प्रति समाज सकारात्मक धारणा बना लेता है. ऐसे लोगों के लिए उसके द्वारा कहना शुरू हो जाता है कि समय उसी की परीक्षा लेता है जो उसके काबिल होता है. अंततः यह भी समझने की आवश्यकता है कि एक व्यक्ति आखिर कब तक ऐसी परीक्षा से दो-चार होता हुआ अपने आपको साबित करता रहे?