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29 जुलाई 2020

ज़िन्दगी सिर्फ वर्तमान का नाम नहीं


ज़िन्दगी कितनी भी आसानी से गुजर रही हो मगर उसमें एक लहर ही बहुत है हिलोर उठाने को. आखिर ज़िन्दगी की झील में शांति क्यों नहीं रहती है? कभी वर्तमान, कभी अतीत आकर कोई न कोई हलचल मचा जाता है. इस हलचल में ज़िन्दगी की शांत झील में उथलपुथल मच जाती है. बहुत बार ऐसा होता है जबकि सबकुछ ख़ामोशी से गुजर जाता है और कई बार ऐसा होता है कि सबकुछ आसानी से, ख़ामोशी से नहीं गुजरता है. यही स्थिति ज़िन्दगी में भी उथल पुथल मचा देती है.


ज़िन्दगी सिर्फ वर्तमान का नाम नहीं न ही सिर्फ भविष्य का रूप है बल्कि यह नितान्त अतीत के ऊपर निर्मित स्थिति है. ऐसे में अतीत का डांवाडोल होना न केवल वर्तमान को प्रभावित करता है बल्कि भविष्य की रूपरेखा को भी प्रभावित करता है. ज़िन्दगी के ऐसे उथल पुथल क्षणों को संयमित रूप से देखने की, गुजारने की आवश्यकता होती है. अतीत के इन्हीं पलों पर न केवल वर्तमान की बल्कि भविष्य की आधारशिला टिकी होती है. ऐसे में यह बहुत महत्त्वपूर्ण होता है कि अतीत का सामना वर्तमान में, भविष्य में किस तरह से किया जा सकता है. यही संवेदित होने की पहचान है, यही जागरूक होने की निशानी है.


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05 जुलाई 2020

अपनी ज़िन्दगी की उम्र खुद से पूछो

लोग कहते हैं कि ज़िन्दगी बहुत छोटी होती है और हम कहते हैं कि अपने साथ न हों तो ज़िन्दगी बहुत लम्बी हो जाती है. आखिर ज़िन्दगी के बड़े-छोटे होने का पैमाना क्या है? कैसे माना/नापा जायेगा कि किसी कि ज़िन्दगी छोटी है, किसी की ज़िन्दगी बड़ी है. लोगों की उम्र से, लोगों के जिंदा रहने से यदि ज़िन्दगी की उम्र का अंदाज़ा लगाया जाता है तो यह भ्रामक पैमाना है. यदि एक पल को इसी के सन्दर्भ में हम इतिहास पर नजर डालें तो रानी लक्ष्मीबाई, भगत सिंह, आज़ाद, अशफाक आदि वीरों की ज़िन्दगी बहुत छोटी कही जानी चाहिए. इन लोगों ने तो बहुत कम उम्र इस जहाँ में बिताई है. उम्र के अनुसार बहुत कम दिनों तक इस संसार में रहने के बाद भी आजतक इनके नाम का स्मरण करने वाले लोग मौजूद हैं. आज भी इनके प्रति श्रद्धा रखने वाले लोग हैं.



जहाँ तक हमारा अपना व्यक्तिगत रूप से मानना है कि किसी भी व्यक्ति को ज़िन्दगी देने के पीछे कोई न कोई मकसद काम करता है. उसके ज़िन्दगी जीने का कोई उद्देश्य ही उसे ज़िन्दगी जीने का लिए प्रोत्साहित करती है. किसी न किसी तरह का सपना उसे आगे बढ़ने के लिए विवश करता है. आज के दौर में बहुत से लोग अपने जीवन को सिर्फ अपने परिजनों तक ही केन्द्रित करके रख लेते हैं. आज भी बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके लिए ज़िन्दगी का अर्थ अपने परिवार का भरण-पोषण करना मात्र है. इसे संकुचित सोच कहा जा सकता है. संभव है कि बहुत से लोग इसे अपना दृष्टिकोण न स्वीकारते हों मगर हमारी ये व्यक्तिगत राय है कि यदि व्यक्ति का दायरा किसी भी तरह से सामाजिक नहीं है, यदि उसके आसपास दस-बारह ऐसे मित्रों का समूह नहीं जिनके सामने किसी तरह की लाभ-हानि का कोई अर्थ नहीं तो वह ज़िन्दगी नहीं है.

ज़िन्दगी का अर्थ मात्र साँस लेना नहीं. ज़िन्दगी का अर्थ महज दिल का धड़कना नहीं. ज़िन्दगी का अर्थ महज लम्बी उम्र पा लेना नहीं. इन सबके उलट ज़िन्दगी वह है जो किसी व्यक्ति को सदैव प्रसन्न रखे. उसके सामने किसी भी तरह की स्थिति हो वह उसे परेशान न होने दे. कैसा भी माहौल हो उसे अकेले न रहने दे. आज के व्यावसायिक दौर में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है. जिनके साथ ऐसी स्थिति है उन्हें आवारा, सड़कछाप, परिवार के प्रतिनकारात्मक दृष्टिकोण रखने वाला कहा जाने लगता है. आज जैसा माहौल बना हुआ है, एक बार उसका आकलन, उसके सन्दर्भ में अपने आसपास का आकलन करने की आवश्यकता है. क्या वाकई आज के दौर में महज अपने परिवार तक सीमित व्यक्ति खुश है? क्या महज अपने चार-छह लोगों के परिजनों तक सीमित व्यक्ति अपनी ज़िन्दगी से संतुष्ट/प्रसन्न है? सवाल तो बहुत हैं मगर प्रत्येक व्यक्ति आज खुद सवाल अपने आपसे पूछे, अपने आपसे जवाब दे.

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14 जून 2020

ज़िन्दगी जीना पड़ती है अन्यथा वह तो सिर्फ गुजरती है

युवा फ़िल्मी कलाकार सुशांत की आत्महत्या ने सोशल मीडिया पर विमर्श का दौर आरम्भ करवा दिया. यह विमर्श उस दौर में आरम्भ हुआ है जबकि हमारा देश प्रतिदिन सैकड़ों मौतों को कोरोना वायरस से होते देख रहा है. यह विमर्श उस देश में शुरू हुआ है जहाँ इस लॉकडाउन के पहले तक हजारों-लाखों की संख्या में एक दिन में दुर्घटना से मौतें हुआ करती थीं. हजारों की संख्या में आत्महत्या के मामले उस दौरान भी आया करते थे. सुशांत की आत्महत्या इसलिए भी विमर्श का आधार बनती है क्योंकि वह रुपहले परदे के कारण समाज में जाना-पहचाना चेहरा था. उस दुनिया से वह व्यक्ति आता था जहाँ पैसा है, प्रसिद्धि है, नाम है, ग्लैमर है और यह सब उस व्यक्ति के पास इस समय मौजूद भी था. ऐसे में उसकी आत्महत्या की खबर ने स्वयं विमर्श का रूप धारण कर लिया.


क्या, क्यों, कैसे में जाने के पहले हम सबको विचार करना पड़ेगा कि हम लोग आत्महत्या जैसे विषय पर विमर्श कर रहे हैं अथवा सिर्फ एक फ़िल्मी कलाकार की मौत पर विमर्श कर रहे हैं? हमें समझना होगा कि हमारे विमर्श के केन्द्र में कौन है? क्या हमारे विमर्श में वे बच्चे हैं जो किसी परीक्षा में कम अंक आने के कारण अथवा कम अंक आने के भय से आत्महत्या कर लेते हैं? क्या इस विमर्श में वे महिलाएँ हैं जो किसी न किसी तरह की हिंसा का शिकार होने के बाद आत्महत्या कर लेती हैं? क्या इस विमर्श में वे परिवार शामिल हैं जो गरीबी, भुखमरी अथवा किसी अन्य कारण से सामूहिक रूप से आत्महत्या कर लेते हैं?


यहाँ इन तमाम सवालों को उठाने का अर्थ किसी भी मौत पर सवाल उठाना नहीं है. हमारी संस्कृति में तो शत्रु तक की मौत पर श्रद्धांजलि दी जाती है, दुःख व्यक्त किया जाता है. यहाँ सवाल हम सबकी मानसिकता का है. हम सब भीड़ में होने के बाद भी अपने साथ वाले को अकेले छोड़ते जा रहे हैं. असलियत यह है कि हम खुद को अकेला बना रहे हैं. हम सभी स्वार्थ की उस मानसिकता में लिपटे हुए हैं जहाँ हमें अपने आसपास अपने अलावा कुछ भी नहीं दिखाई देता है. इसी के चलते व्यक्ति अपने समाज में नहीं बल्कि अपने परिवार में नितांत अकेला होता जा रहा है. इस अकेलेपन से सामान्यतौर पर सामान्य व्यक्ति निकल आता है, ऐसी स्थिति से निपट लेता है मगर समस्या उनको होती है जो तमाम चकाचौंध होने के बाद भी, तमाम शोहरत होने के बाद भी अकेले हैं.

दरअसल यह भी मानवीय स्वभाव में सुपीरियरिटी के साथ मिली-जुली इंफीरियरिटी की भावना होती है. इस भावना के वशीभूत कोई भी व्यक्ति अपने अकेलेपन को बाँटने के लिए सबके बीच में शामिल नहीं हो पाता है. यहाँ सबके साथ घुलने-मिलने में, सामान्य व्यक्ति की तरह धमाचौकड़ी करने में, मौज-मस्ती करने में उसकी सुपीरियरिटी बाधक बनती है. इसी से उपजा अकेलापन उसे अवसाद में ले जाता है, इंफीरियरिटी की तरफ ले जाता है. यह स्थिति व्यक्ति-व्यक्ति के अनुसार अलग भी हो सकती है.

इस युवा की मृत्यु से यदि विमर्श वाकई आत्महत्या जैसे बिंदु के लिए हुआ है तो उस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है. महज विमर्श करके, अपनी-अपनी पोस्ट पर लाइक, शेयर, कमेंट की संख्या की गिनती लगा लेने भर से कोई निष्कर्ष नहीं निकलना है. सबसे पहले तो हमें न केवल अपना अकेलापन दूर करना है बल्कि अपने साथ वालों को भी अकेलेपन से मुक्त करवाना है. हम सबको बिना वजह के अहंकार से मुक्त होने की आवश्यकता है. वर्तमान दौर में हमने एक-दूसरे से बातचीत करना लगभग बंद ही कर दिया है. एक अजब सा अहं हम सबके बीच स्थापित हो चुका है. खुद को दूसरे से श्रेष्ठ समझने की मानसिकता ने हमें भले ही अपने आपमें बहुत ऊपर बैठा रखा हो मगर वास्तविक रूप में ऐसे लोग खोखले हो चुके हैं. यही खोखलापन उनको एक दिन अवसाद की तरफ धकेल देता है.

लोगों से मिलने के लिए घर जाने की स्थिति अब दिखाई नहीं देती है. अपने मित्रों, पड़ोसियों के दुःख-सुख में शामिल होने जैसी मानसिकता अब गायब हो चुकी है. रिश्तों का सम्मान लगातार कम होता जा रहा है. हम तकनीकी रूप से आधुनिक होते जा रहे हैं मगर व्यावहारिक रूप से लगातार पिछड़ते चले जा रहे हैं. हम सबके बीच एक अनजानी सी, अनदेखी सी प्रतिद्वंद्विता चलने लगी है. जहाँ हम जीतना नहीं चाहते बल्कि सामने वाले को हराना चाहते हैं. इस तरह की अबूझ सी स्थिति अन्दर ही अन्दर वैमनष्यता का विकास करती है. इसमें व्यक्ति की जरा सी भी असफलता उसके अन्दर एक तरह का आक्रोश, एक तरह की हार को जन्म देती है. इसी से वह कुंठा, हताशा, निराशा के रास्ते चलता हुआ अवसाद में चला जाता है.

लोगों से अधिक से अधिक मिलिए. खुद को सामान्य ही समझिये. आप किसी भी पद, प्रस्थिति में हैं मगर उसके पहले आप इन्सान हैं. सार्वजनिक रूप से न सही कहीं तो आप खुलकर उसी तरह हँस सकते हैं जैसा कि कभी कॉलेज टाइम में हँसते थे. अपने दोस्तों के साथ कहीं अकेले में तो वही ठहाका लगा सकते हैं जैसा कि आप रोजगार की तलाश में भटकते हुए मित्रों के साथ सड़कों पर लगाते थे. पद, प्रस्थिति आपके कार्यालय के लिए है न कि आपके परिवार के लिए. अपने लोगों को समय देना शुरू करिए, सीखिए. अपने शौक को विकसित करिए. कोई शौक न हो तो किसी शौक को जन्म दीजिए और जुट जाइए. अनावश्यक तनाव से बचने की कोशिश करिए. करके देखिये, दो-चार दिन और महसूस कीजिये फर्क खुद में.

अंत में फिर वही बात कि इस नामचीन आत्महत्या के लिए नहीं वरन देश में होने वाली तमाम आत्महत्याओं के लिए विमर्श करिए. आने वाले दिनों में उनको रोकने के लिए विमर्श करिए. उनमें भी भविष्य की तमाम अपेक्षाएँ छिपी हुईं हैं.

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01 जून 2020

ज़िन्दगी के पॉज बटन को प्ले में बदल दिया

लॉकडाउन 4 का अंत हुआ या समापन, ये सभी लोग अपने हिसाब से तय कर लें. आज एक जून से अनलॉक किये जाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई. कुछ लोगों का ऐसा विचार बना हुआ था कि लॉकडाउन अभी बढ़ेगा. कुछ लोगों ने अब इस पर अपनी प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी कि अभी लॉकडाउन हटना नहीं चाहिए था. कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि अब जबकि संक्रमितों की संख्या बढ़नी शुरू हो गई है तो लॉकडाउन हटाना सही नहीं. ये वही लोग हैं जो घोड़े और बाप-बेटे वाली कहानी में थे. जिन्हें किसी भी स्थिति में चैन नहीं आ रहा था.


बहरहाल, अनलॉक किये जाने की प्रक्रिया शुरू करने के बाद नागरिकों की जिम्मेवारी है कि वे संयम से रहना सीखें. विगत दो महीने से अधिक समय में सरकारों ने यही सिखाया है कि कोरोना से कैसे लड़ना है. उन्हीं चरणों में सरकारों ने अपनी तैयारी भी कर ली है. अब यहाँ समझना यह होगा कि कोरोना कोई ऐसा शत्रु नहीं जो अपने आप उड़कर घर के अन्दर घुस जाए. इसके लिए हम ही वाहक बनेंगे, सामान वाहक बनेगा. बस यहीं ध्यान रखने की आवश्यकता है.


बात कहाँ से कहाँ पहुँच गई. लॉकडाउन में यही दिमाग ख़राब होने वाली स्थिति होती है. दो-तीन दिन पहले तय कर लिया था कि एक जून से अपनी ज़िन्दगी को फिर उसी तरह से शुरू किया जायेगा जिस तरह 24 मार्च तक रही. 25 मार्च को भले कैलेण्डर में, समय में खींच कर नहीं ला सकते मगर ज़िन्दगी के पलों को उसी रूप में जीना तो अपने हाथ में है. अब और तब में अंतर इतना हो गया कि तब सुरक्षा का बोध इस तरह नहीं रखना था, आपस में असुरक्षा का भाव जन्म नहीं लेता था. अब सावधानी रखनी है, लोगों से मिलने में, सामानों को छूने में, किसी जगह जाने में.


इन सारी बातों का ध्यान रखते हुए आज अपनी ज़िन्दगी को 24 मार्च के बाद से फिर से प्ले कर दिया. कोरोना ने एक पॉज लगा दिया था, उसे आज प्ले कर दिया गया. स्वाभाविक रूप में जिस तरह की सड़कछाप घुमक्कड़ी होती थी, वो की गई. दो-तीन पारिवारिक सदस्यों से मिलना हुआ. उनका आशीर्वाद लिया गया. रात की घुमक्कड़ी देर रात नहीं रही मगर इसे भी आजमा लिया गया. इन सबमें शारीरिक दूरी का ध्यान रखा गया. इधर-उधर किसी भी सामान को छूने से बचा गया.


सोचने वाली बात है कि ज़िन्दगी एक कमरे में नहीं काटी जा सकती. न आज, न आने वाले कल में. आज नहीं तो आने वाले कुछ महीनों में लोगों को घर से बाहर निकलना ही पड़ेगा. लोगों को अपनी दिनचर्या को पुराने ढंग पर लाना ही पड़ेगा. ऐसे में अच्छा है कि अचानक से अकबका कर सड़क पर उतरा जाए, सबकुछ अस्त-व्यस्त किया जाए, उसका अभ्यास धीरे-धीरे कर लिया जाये. बिना किसी परेशानी, तनाव के ज़िन्दगी को स्वच्छंद रूप से जीना सीखिए, ज़िन्दगी को बोझ नहीं बल्कि मनोरंजक पल समझकर बिताना शुरू कीजिये, एक-एक पल को हँसते-खिलखिलाते गुजारने की मानसिकता बनाइये फिर देखिये कोरोना जैसे तनाव, वायरस, बीमारियाँ स्वतः ही आपसे दूर रहने लगेंगी.


कर के देखिये, अच्छा लगेगा हाँ, दिमाग से अनावश्यक तनाव, अनावश्यक परेशानियाँ दूर करनी होंगीं. सकारात्मकता बनाये रखनी होगी, नकारात्मकता से कोसों दूर रहना होगा. आत्मविश्वास के चरम पर जाकर ज़िन्दगी को ज़िन्दगी बनाना होगा.  

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03 मार्च 2020

ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद

प्रकृति ने जितने रंग अपने में समाहित कर रखे हैं, वे सभी इस ज़िन्दगी में देखने को मिल जाते हैं. इन रंगों में हँसी के, ख़ुशी के, रोने के, ग़म के, याद रखने के, भूलने के, अपनों के, गैरों के, जीत के, हार के आदि-आदि समाहित रहते हैं. इन रंगों के साथ सह-सम्बन्ध बनाकर खुद को रंगीन बनाये रखने का नाम ही ज़िन्दगी है. ज़िन्दगी के इन तमाम रंगों को हमने बहुत करीब से देखा है, महसूस किया है, उनमें खुद को रंगे पाया है. 

जैसे व्यक्ति अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में किसी न किसी तरह के रंगों से आनंदित होता रहता है, उसी तरह उसे ज़िन्दगी के रंगों का भी स्वागत करना चाहिए. जैसे व्यक्ति अपने मनोनुकूल रंगों का चुनाव करता है, वैसे ही ज़िन्दगी भी व्यक्ति के मन को जांचने-परखने के लिए रंगों का चुनाव करके उसके पास भेजती है या कहें ज़िन्दगी खुद को उन्हीं रंगों में रंगने का प्रयास करती है.


ज़िन्दगी के इन्हीं तमाम अच्छे-बुरे रंगों को अपने बहुत निकट पाया है. इनके द्वारा ज़िन्दगी को रंगीन होते ही देखा है. न प्रकृति के रंगों को बेनूर माना है ठीक वैसे ही ज़िन्दगी से मिलते रंगों में भी जीवंतता भरने की कोशिश की है. ज़िन्दगी को पूरी जिंदादिली से जीने की कोशिश की है. सोचने वाली बात है कि यदि चार दिन की ज़िन्दगी मिली है तो उसे रोकर क्यों बिताया जाए. हँसते हुए ज़िन्दगी के साथ जिंदादिली से यात्रा की जानी चाहिए. आखिर ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद है, रहनी चाहिए.


ज़िन्दगी जिन्दाबाद के रूप में अपने जीवन के कुछ मिले-जुले रंगों से आपको रंगने जल्द ही आ रहे हैं. इस यात्रा में आप ऑनलाइन हमारे साथ रह सकते हैं. इस यात्रा के रंग अभी हाल-फिलहाल सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर बिखेरे जायेंगे. आप भी इस फुहार में, इस रिमझिम में शामिल होकर हमारे साथ बोलिए, ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद. 

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01 फ़रवरी 2020

ज़िन्दगी से प्रतिद्वंद्विता में दोस्ती


आज शाम एकाएक अपने स्वभाव को लेकर, हमारे साथ जुड़े हुए लोगों के स्वभाव को लेकर अपने में विमर्श शुरू हुआ. बहुत से जाने-पहचाने चेहरे नजर के सामने आकर धुँधले हो गए. ऐसे चेहरे भी अब साफ़ नहीं दिखाई दे रहे थे, जिनको कभी अपने से दूर देखना नहीं सोचा था. समझ नहीं आया कि ऐसा होने में हम कहाँ तक गलत हैं. खुद का गलत होना इसलिए क्योंकि यदि हम गलत न होते तो हमारे साथ जुड़ा रहने वाला हमसे अचानक दूर क्यों हो जाता. कई बार हम अपने स्वभाव को देखते हैं और विचार करते हैं कि हम चाह कर भी अपने स्वभाव में कभी गंभीरता नहीं ला सके. जो पल अभी है, वही ज़िन्दगी है का फलसफा अपनाते हुए अपनी जीवन-यात्रा पर आगे बढ़ते रहे.इसका अर्थ ये नहीं कि हमारे द्वारा किसी कार्य को करने में, जिम्मेवारी का निर्वहन करने में, अपने उद्देश्य को पूरा करने में किसी तरफ की कोताही दिखाई जाती है. यह सब पूरी लगन और निष्ठा के साथ किया जाता है, पर हँसी-माजक के साथ, माहौल को हल्का-फुल्का बनाते हुए. पता नहीं क्यों गंभीर मुद्रा, हाव-भाव का लबादा ओढ़े, चेहरे पर जानबूझकर कठोरता चढ़ाये, होंठों को इतनी बुरी तरह कसे कि मुस्कान धोखे से ही न फिसल जाये, ऐसे लोग कभी नहीं सुहाए. हमने ज़िन्दगी को जितना गंभीरतारहित होकर, अल्हड़ता से, मौज-मस्ती के अंदाज में जीना चाहा, ज़िन्दगी उतनी ही गंभीरता से हमारा परीक्षण करती रही.


ऊहापोह की इस अवस्था में हम खुद को खुद के लिए खड़ा करते रहे. दोस्तों का, दोस्ती का साथ लेकर आगे बढ़ने की बात करते रहे मगर उसी समय समय ने करवट ली. ज़िन्दगी दोस्त के बजाय हमारी ही प्रतिद्वंद्वी बनकर सामने आई. दो पैरों से स्वतंत्र रूप से चलती ज़िन्दगी कृत्रिम आधार के सहारे आगे बढ़ने लगी. भागदौड़ में अंकुश लग गया. कार्य की तीव्रता में अवरोध आ गया. जनपद और जनपद के बाहर की सीमाओं को नापते कदम ठहर से गए मगर आत्मविश्वास कम न हुआ, कार्य-क्षमता प्रभावित नहीं हुई, उद्देश्यों से डिगना नहीं हुआ. बदलाव बहुत बड़ा हुआ मगर हमारा स्वभाव न बदला. गंभीरता अभी भी न आई. हँसी-मजाक अभी भी अपनी उसी अवस्था में है. ज़िदगी का फलसफा अभी भी वही है. इस बीच बहुत से ऐसे मित्र जिनके बारे में कभी कल्पना भी नहीं की थी कि वे छोड़ कर चले जायेंगे, हमसे बहुत दूर हो गए. ऐसी दोस्ती जो हमें अपने आपमें इसके लिए गौरवान्वित करती थी वह भी अचानक से बिना किसी बात के न जाने कहाँ गुम गो गई. परिचित बहुत बनाये मगर जिनको अभिन्न कह सकें, जिनको अपना कह सकें ऐसे मित्र बहुत कम बनाये. खुद बनाये कि जगह पर कहें कि स्वतः ही बन गए तो गलत न होगा, ऐसे मित्रों ने भी हमसे किनारा कर लिया. कारण समझ न आया. संभव है कि उनके पक्ष में उठा हमारा कोई कदम उनको लाभान्वित न कर पाया हो मगर हमारे अन्दर से कतई ऐसी भावना नहीं रही कि उनके साथ गलत हो. बहरहाल, ऐसे अनेक मित्र जितनी लम्बी समयावधि से हमसे जुड़े थे, उसके अनुपात में बहुत कम समय में ही निर्णय लेकर हमसे दूर हो गए.

ऐसा लग रहा है जैसे यह भी ज़िन्दगी और हमारी अपनी जंग है, अपनी प्रतिद्वंद्विता है. ज़िन्दगी और हम आज भी, अभी भी एक-दूसरे को जाँचने में लगे हैं. एक-दूसरे से प्रतिद्वंद्विता करने में लगे हैं. इसके बाद  भी सुकून इसका है कि बहुत से ऐसे मित्र जो अब मित्र की परिभाषा से बहुत ऊपर हम ही बन गए हैं, उनके और अपने अस्तित्व में कहीं भी हम अंतर नहीं कर पाते हैं, वे हमारे साथ हैं. उनका साथ प्रसन्नता देता है, सुख देता है मगर साथ में डराता भी है. डर उसी ज़िन्दगी के रुख का जिसके साथ हमारी प्रतिद्वंद्विता चल रही है. पता नहीं हमारा ही अस्तित्व कब तक हमारा बना रहे क्योंकि ऐसा उन मित्रों के साथ भी था जो अब हमारे नहीं हैं. फिलहाल खुद में, खुद के साथ व्यस्त हैं. हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता चला गया की फिलोसोफी के साथ ज़िन्दगी को जी रहे हैं. आगे देखिये क्या होता है? जीत-हार का समीकरण क्या होता है?

24 दिसंबर 2019

दुःख और सुख की प्रतिद्वंद्विता है जीवन


पिछले साल इन्हीं दिनों एक बहुत बड़े से कार्यक्रम का हिस्सा बने हए थे. उसी समय एक बहुत ही बुरी खबर सुनने को मिली थी. कार्यक्रम में चेहरे पर मुस्कराहट लाकर लोगों से मिलने की विवशता और दिल में उस बुरी खबर के चलते उठती दुःख की लहर. दोनों के बीच संतुलन बैठाना और दोनों स्थितियों के बीच खुद को वर्तमान में लाने की कुशलता हमें खुद में दिखानी थी. दोनों स्थितियों का अपने में तारतम्य ऐसा था जिसमें हम खुद ही किसी न किसी रूप में शामिल थे. इसके बाद भी खुद को स्पष्ट रूप से उसी रूप में ज़ाहिर न कर पाना भी हमारी मजबूरी थी. बुरी खबर ऐसी थी कि एक पल को पैरों के नीचे की जमीन सरक गई. समझ नहीं आया कि ऐसा कैसे हो सकता है. क्यों हमारे साथ ही ऐसी बुरी ख़बरों का, घटनाओं का जुड़ना होता है? उस एक घटना के साथ अपना अतीत अचानक सामने आ गया. कैसे एक-एक घटना के साथ कई-कई घटनाओं का जुड़ना हो जाता है, यह सोचा भी नहीं जा सकता है. 

आज पूरे एक वर्ष बीत जाने के बाद भी उस एक फोन पर मिली खबर से खुद को अलग नहीं कर सके हैं. बहुत सी बातें ऐसी हैं जिन्हें कहने के बाद भी नहीं कह सके हैं. अतीत को याद करने का कोई लाभ नहीं मगर बीते दिनों को याद करते हैं तो हम खुद में समझ नहीं पाते हैं कि आखिर हमारे साथ ऐसा क्या था कि आज तक हमारे साथ हमारा सोचा गया काम हुआ नहीं. जो-जो सोचा वो तो कभी हुआ ही नहीं मगर जिसे-जिसे अपने करीब माना उसके साथ भी कहीं न कहीं बुरा ही होता रहा. आज तक समझ नहीं आया कि यदि कोई शक्ति है, परम सत्ता है तो हर बार परीक्षा के लिए हमें ही क्यों चुना जाता है? समझ नहीं सके कि बहुत थोड़ी सी ख़ुशी के बीच बहुत बड़ा दुःख हमारे हिस्से ही क्यों आता है? बहुत बार ऐसा आवश्यक नहीं कि दुख का, कष्ट का सीधे-सीधे सम्बन्ध उसी व्यक्ति से हो मगर उससे कहीं न कहीं व्यक्ति का जुड़ा होना उसे कष्ट देता है.

फिलहाल कष्ट के दिन बीत जाएँ. चेहरे की हँसी, मुस्कान कभी धूमिल न होने पाए. समय ने जिन जिम्मेवारियों से अगले को जोड़ दिया है, वे कभी अधूरी न रहने पायें. हम किस मोड़ पर, किस रूप में, कैसे सहायक, सहयोगी बन सकेंगे हमें खुद नहीं पता मगर हमारी एक-एक साँस, एक-एक पल साथ है. इसी विश्वास के साथ, बिना कुछ कहे, बहुत कुछ.

17 नवंबर 2019

यादों के सहारे बीते दिनों की सैर


बीते दिनों से छुटकारा पाना आसान नहीं होता है. उन दिनों की बातें, उनकी यादें किसी न किसी रूप में सामने आ ही जाती हैं. ये यादें कभी हँसाती हैं तो कभी रुलाती हैं. दिल-दिमाग खूब कोशिश करें कि पुरानी बातों को याद न किया जाये मगर कोई न कोई घटना ऐसी हो ही जाती है कि इन यादों से छुटकारा मिलना मुश्किल दिखाई देता है. जब अपनी विगत चालीस वर्ष की ज़िन्दगी के कुछ पलों को कुछ सच्ची कुछ झूठी में माध्यम से आप सबके सामने रखने बैठे थे तो उसके लेखन में सबसे बड़ी समस्या यही आ रही थी कि बीते दिनों में से क्या छोड़ दिया जाये, क्या लिख दिया जाये. किसी एक घटना के सन्दर्भ में लिखना शुरू करते तो उससे संदर्भित न जाने कितनी घटनाएँ सामने आ जातीं. कई बार इन यादों की आती-जाती लहरों में डूबते-उतराते हुए भी मुस्कुराते रहते और कई बार आंसुओं के सागर में डूब जाते. मुश्किल से किसी एक याद से पीछा छुड़ाकर आगे बढ़ने की कोशिश करते तो आगे किसी मोड़ पर कोई दूसरी याद रास्ता रोके खड़ी होती दिखती. बहरहाल, तमाम यादों को दरकिनार करते हुए, कई यादों के साथ हँसते-रोते अंततः कुछ सच्ची कुछ झूठी को अंतिम रूप प्रदान करवा दिया. 

यादें यहीं तक सीमित नहीं रहीं. दिन यहीं तक आकर नहीं समाप्त हुए. इनको आगे बढ़ना था, आगे बढ़कर आज भी हैरान-परेशान करने चले आते हैं. कभी अपने मित्रों से मुलाकात के दौरान, कभी घर-परिवार में सबके साथ गपशप के दौरान, कभी किसी सामान के खोजने के दौरान किसी पुरानी चीज के हाथ लग जाने पर, कभी पुराने खतों के हाथ में आ जाने के दौरान ऐसी स्थिति सामने आ ही जाती है. यादों का ये सिलसिला न कभी थमता है और कभी थमेगा भी नहीं. यादें ही वे क्षण हैं जो बिना किसी सूचना के जब चाहें चले आते हैं. इन यादों के साये में व्यक्ति भटकने का काम भी करता है, आगे बढ़ने का भी काम करता है. एकबार फिर इन्हीं यादों के साथ आगे बढ़ते हुए पुराने दिनों की सैर करने का मन है.

23 सितंबर 2019

मृत्यु में ही जीवन छिपा है


इधर कई महीनों से कुछ लिखने का मन नहीं हो रहा है. ब्लॉग पर किसी तरह की बंदिश नहीं है इसलिए कुछ न कुछ थोडा बहुत लिख देते हैं. इसी न लिखने की मानसिकता के चलते न तो समाचार-पत्रों में कोई आलेख भेजा है और न ही किसी पत्रिका में. इस दौरान लगातार पढ़ना हो रहा है. आदत भी ऐसी बन गई है कि कितनी भी व्यस्तता हो मगर सोने से पहले कुछ न कुछ अवश्य ही पढ़ते रहते हैं. पढ़ने की इसी आदत के क्रम में आजकल एक बार फिर ओशो की मैं मृत्यु सिखाता हूँ का पढ़ना हो रहा है. इस बार यह किताब तीसरी बार पढ़ी जा रही है. जितनी बार पढ़ो, उतनी बार नई सी समझ आती है. इस पुस्तक का जब शीर्षक देखा था तो अपने आपमें कौतूहल सा हुआ था कि ओशो मौत के बारे में कैसे सिखा सकते हैं. इस व्यक्ति ने हमेशा प्रेम के बारे में समझाया है, बताया है. इस पुस्तक को पढ़ना शुरू किया. जैसे-जैसे पढ़ना शुरू किया, आगे बढ़ना शुरू किया, समझना शुरू किया तो मालूम पड़ा कि ओशो किसी न किसी रूप में प्रेम की ही बात कर रहे हैं. असल में वे मौत को नहीं वरन जीवन को जीना सिखा रहे हैं. और वैसे भी ओशो अपने किसी और विषय के बारे में ज्यादा चर्चित रहे हैं बजाय प्रेम के या फिर मृत्यु के. इस कारण से भी बहुतेरे लोगों के लिए आज भी ओशो न पढ़ने वाले लोगों में शामिल हैं. 


इस पुस्तक को पढ़ने के बारे में उत्कंठा उस समय और जोरों से हुई जबकि हम खुद एक दुर्घटना में मौत से सीधे साक्षात्कार कर चुके थे. मन में ख्याल आया कि आखिर प्रेम सिखाने वाला व्यक्ति किस तरह मौत सिखाता होगा, इसे भी जानना चाहिए. इसे आधार बनाकर जब पुस्तक को पढ़ना शुरू किया तो लगा कि ओशो बहुत सो बातें वही कह रहे हैं, समझा रहे हैं जो हम अपने दोस्तों के बीच कहते हैं. हम भी मौत को लेकर, ज़िन्दगी को लेकर अपने दोस्तों के बीच बहुत ही अलग अंदाज़ में अपनी बात रखते रहते हैं. यहाँ ओशो के अंदाज और उदाहरणों में और हमारे उदाहरणों में नितान्त अंतर है मगर किसी न किसी रूप में उसका मूल लगभग एक जैसा ही है. सत्यता तो यही है कि मौत किसी भी तरह से डराने वाली बात नहीं है बल्कि उससे सीखने वाली बात है. असल में मौत ज़िन्दगी को सिखाने वाली एक स्थिति है.

बाकी इस बारे में किसी और दिन कहा जायेगा. अभी तो बस इतना ही कि मौत और ज़िन्दगी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, बिना एक के दूसरे को कोई न पूछेगा. एक के बिना जीवन का सिक्का ही खोटा है. बस याद रखना होगा कि मौत से डर कर ज़िन्दगी का आनंद उठाना बंद नहीं करना है. ज़िन्दगी का असल आनंद तभी है जबकि मौत को गले लगाने का ज़ज्बा अन्दर पैदा हो जाये.

21 सितंबर 2019

मौत से नहीं ज़िन्दगी से प्यार करना सीखो

"ज़िन्दगी और मौत तो ऊपर वाले के हाथ हैं जहाँपनाह" कुछ इसी तरह के संवाद हैं किसी फिल्म में. उसमें एक सीन में ही व्यक्ति को उसकी ज़िन्दगी और मौत के बारे में समझाने की कोशिश की गई है. ऐसे ही बहुत से सीन और गीत हैं जिनमें ज़िन्दगी और मौत को लेकर तमाम दार्शनिक बातें कही गईं हैं. ऐसा लगता है जैसे मौत कोई बहुत ही खूबसूरत चीज हो और जिसके लिए व्यक्ति जानबूझ कर ज़िन्दगी को छोड़ देता है. ऐसा वास्तविकता में नहीं होता और न ही ऐसा है. ज़िन्दगी हमेशा खूबसूरत रही है और रहेगी बस उसमें दार्शनिकता का पुट जोड़ते हुए उसे मौत के साथ संदर्भित करते हुए मौत को बेहतर बताया गया है, हसीन बताया गया है. 

07 जुलाई 2019

ज़िन्दगी और जीवन के बारीक अंतर को समझना होगा


ज़िन्दगी और जीवन भले ही देखने-सुनने में एक जैसे समझ आते हों मगर दोनों के स्वभाव में, प्रवृत्ति में बहुत बारीक सा अंतर है. इस बारे में दार्शनिक रूप में बहुत कुछ कहा जा सकता है, बहुत कुछ लिखा जा सकता है, बहुत कुछ बताया जा सकता है. इसके बाद भी असलियत बहुत बारीक सी रेखा के आसपास ही घूमती रहती है. इसे बहुत दार्शनिक शब्दों में न कहते हुए बहुत ही सरल शब्दों में ऐसे समझा जा सकता है कि जीवन वह है जो हमें मिला है और ज़िन्दगी वह है जो हम गुजारते हैं. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि इंसानों के अलावा जीवन वनस्पतियों में भी होता है, जानवरों में भी होता है, पक्षियों में भी होता है. इसके उलट ज़िन्दगी कितने लोग बिताते हैं? क्या आपको लगता है कि ज़िन्दगी एक पौधा बिताता है? क्या आप समझते हैं कि एक पेड़ ज़िन्दगी बिताता है? आपको क्या लगता है कि कोई जीव-जंतु, पशु-पक्षी ज़िन्दगी का आनंद उठाता है? बहुसंख्यक लोग इसका जवाब देने के पहले जीवन और ज़िन्दगी में ही भटकते नजर आयेंगे. 

असल में अभी हममें से बहुत से लोग ज़िन्दगी और जीवन में अंतर करना ही नहीं सीख सके हैं. उनके लिए दोनों शब्द एक अर्थ में प्रयुक्त होते हैं जबकि ऐसा नहीं है. जीवन वो है जो हमें जन्म देता है, हमें सांसे देता है और इसके उलट ज़िन्दगी वह है जो हम जन्म के बाद गुजारना शुरू करते हैं, हर एक साँस के सहारे आगे ले जाना शुरू करते हैं. ज़िन्दगी और जीवन का ये दर्शन जिसकी समझ में आ जाता है वही असल में अपने जीवन का भी आनंद लेता है, ज़िन्दगी का भी आनंद लेता है. ऐसे में बहुत से लोगों को जरा सी नाकामी पर अपनी ज़िन्दगी को दोष देते, उसे कोसते हुए देखा जाता है. क्या वाकई ज़िन्दगी के कारण ऐसा हुआ? बहुत से लोग जीवन-शैली के बाहरी आवरण को देखने के साथ ही उसे ज़िन्दगी से परिभाषित करते हैं और किसी भी व्यक्ति के जीवन को ज़िन्दगी से जोड़ते हुए उसे अच्छा या बुरा बनाते हैं. असल में ज़िन्दगी उस व्यक्ति के द्वारा खुद के आकलन का विषय है. एक गरीब से गरीब व्यक्ति भी अपने जीवन को भले ही अभावों में गुजार रहा हो मगर वह अपनी ज़िन्दगी से खुश रहता है. इसी तरह एक बहुत ही धन-संपन्न, सत्ता-संपन्न, अधिकार-संपन्न व्यक्ति अपने जीवन को बहुत ही प्रभावी ढंग से बिता रहा हो मगर आवश्यक नहीं कि वह अपनी ज़िन्दगी को भी उसी खुशनुमा तरीके से बिता रहा हो. ज़िन्दगी और जीवन का यही बारीक अंतर समाज में तमाम सारी बुराइयों, परेशानियों, समस्याओं का कारण बना हुआ है.

27 जून 2019

ज़िन्दगी का सत्य ही सत्य से परे है

ज़िन्दगी सत्यता से परे एक सत्य है. इसे समझने की आवश्यकता है. सत्य और असत्य के बीच झूलते हुए जिस सत्य को प्राप्त कर लिया जाता है, वही ज़िन्दगी कहलाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि किसी भी व्यक्ति के जीवन में ज़िन्दगी ही उसका आजीवन साथ देती है. मौत को हसीन बताने वाले कभी नहीं बताते कि यह क्षणिक स्थिति होती है, जिसके चलते आजीवन साथ चली आ रही ज़िन्दगी भी समाप्त हो जाती है. 

08 मई 2019

सवाल करती ज़िन्दगी का खुद सवाल बन जाना


छोटे में जब ये गीत सुना करते थे ‘तुझसे नाराज नहीं ज़िन्दगी, हैरान हूँ मैं, तेरे मासूम सवालों से परेशान हूँ मैं’ तो समझ नहीं पाते थे कि ऐसे कौन से सवाल ज़िन्दगी पूछती है. उस समय उम्र भले कम थी मगर ये समझ आता था कि ज़िन्दगी और मौत क्या है. उम्र बढ़ती गई और इस गीत के मायने भी समझ आते गए. गीत के मायने समझ आने के साथ समझ आये ज़िन्दगी के सवाल. वे सवाल जो ज़िन्दगी लगातार पूछती रहती है. इधर उसके पूछे एक सवाल का जवाब दिया नहीं कि उसने तुरंत दूसरा सवाल सामने रख दिया. ज़िन्दगी के द्वारा सवालों की श्रंखला समाप्त होती नहीं है, बल्कि समय के साथ सवालों में क्लिष्टता आती जाती है. ज़िन्दगी के सवालों की क्लिष्टता उस समय और बढ़ जाती है जबकि सबकुछ जानते-समझते होने के बाद भी व्यक्ति कुछ न कर पाने की स्थिति में होता है. ज़िन्दगी में सबसे कठिन समय यही होता है जबकि ज़िन्दगी के दिए गए सवालों का हल व्यक्ति के पास है मगर हालात उसे अवसर प्रदान नहीं करते कि वह उन सवालों का जवाब दे सके. 


ज़िन्दगी का सवाल करते जाना किसलिए होता है, ये कभी समझ नहीं आया. उस समय भी समझ नहीं आता था जबकि ज़िन्दगी के सवाल क्लिष्ट नहीं हुआ करते थे, आज भी समझ नहीं आया जबकि ज़िन्दगी खुद एक सवाल बन गई है. हर एक पल के बाद, हर एक स्थिति के बाद, हर एक सवाल के बाद खुद से ही कई सारे सवाल उपजते हैं क्यों, कैसे, किसलिए, कब तक?  ऐसे सवालों के बीच लगता है जैसे ज़िन्दगी ने सवाल करना छोड़ दिया है वरन अब वह खुद ही सवाल बन गई है. यदि यही ज़िन्दगी है तो फिर ज़िन्दगी के सवाल क्या हैं और यदि यही सवाल हैं तो फिर ज़िन्दगी कहाँ है? क्या ज़िन्दगी का अर्थ सिर्फ और सिर्फ सवालों के जवाब खोजते रहना है? क्या ज़िन्दगी का अर्थ सिर्फ और सिर्फ हालातों को नियंत्रित करते रहना है? क्या ज़िन्दगी का अर्थ सिर्फ और सिर्फ समायोजन खोजते रहना है. लगता है कि ऐसे हालातों के साथ चलते-चलते व्यक्ति नितांत अकेला रह जाता होगा. हालातों को नियंत्रित करते-करते कई बार वह खुद ही अनियंत्रित हो जाता होगा. कई बार समायोजित होने की लालसा में उसका खुद से सामंजस्य टूट जाता होगा. यदि वाकई ऐसा होता होगा तो फिर वह ज़िन्दगी कैसे? यदि वाकई ऐसा होता होगा तो ऐसा व्यक्ति ज़िन्दगी से हैरान भी रहता होगा, परेशान भी रहता होगा.

ज़िन्दगी के सवालों की दौड़ में जवाब खोजने का काम चलता रहता है. ज़िदगी आगे बढ़ती जाती है और व्यक्ति कहीं पीछे छूट जाता है. यही पीछे छूट जाना समाज की निगाह में किसी व्यक्ति की, किसी सपने की, किसी आकांक्षा की मृत्यु होती है. व्यक्ति इसे समझे बिना बस ज़िन्दगी के सवालों को हल करने की जद्दोजहद में लगा रहता है, बिना इस बात की परवाह किये कि कहीं ज़िन्दगी उसे छोड़कर आगे तो नहीं निकली जा रही. ज़िन्दगी के सवालों को खोजने के क्रम में व्यक्ति को ज़िन्दगी के साथ तालमेल बिठाते हुए आगे बढ़ना चाहिए. कोशिश करनी चाहिए कि ज़िन्दगी उसे छोड़कर आगे न निकले. यही स्थिति ऐसी होती है जबकि व्यक्ति ज़िन्दगी के सवालों को खोज लेता है और ज़िन्दगी को सवाल बनने से भी रोक लेता है.

29 अप्रैल 2019

ज़िन्दगी तू थक जाएगी इम्तिहान लेते-लेते - 1550वीं पोस्ट

ऐ ज़िन्दगी, कितनी बार इम्तिहान लेगी तू हमारा? हो सकता है कि कल को तू इम्तिहान लेती-लेती थक जाए मगर हम नहीं थकेंगे. तुम्हारा काम इन्तिहान लेना है, हमारा इम्तिहान देना. तुम थक जाओगी मगर हम नहीं. यहाँ तो एक उम्र बीत गई इसी में. ज़िन्दगी, तुमने अपने रंग-ढंग बदले मगर हम न बदले. तुम अपनी कोशिश करो, हम अपनी करते हैं. तुम जीत जाओ तो हमें ले जाना, हम जीतें तो बिना हमारी आज्ञा के न जाना. कहो, है मंजूर? ये कोई दर्शन नहीं, ये कोई फ़िल्मी डायलॉग नहीं वरन ज़िन्दगी के प्रति एक नजरिया होना चाहिए किसी भी आत्मविश्वास से भरे व्यक्ति है. हमारा तो यही विचार है. हमारा मानना है कि ज़िन्दगी जिस परमसत्ता द्वारा दी गई है, जिस प्रकृति द्वारा दी गई है, जिस विज्ञान द्वारा दी गई है वह महज उम्र काटने के लिए नहीं दी गई है. यदि उसका उद्देश्य किसी भी जीव को, विशेष रूप से इन्सान को ज़िन्दगी देना है तो उसके पीछे अनेक अर्थ छिपे हुए हैं. यदि उसे महज जीवन देना होता, मात्र जीवित रखना होता तो वह ज़िन्दगी के साथ अनिश्चितता नहीं जोड़ता. सबकुछ निर्धारित होने के बाद भी इन्सान उससे अनभिज्ञ है, ऐसा महज इसलिए कि वह ज़िन्दगी के प्रति सकारात्मकता अपनाता हुआ आगे बढ़ता रहे.


जैसा कि प्रकृति का सिद्धांत है कि यहाँ सब कुछ परिवर्तनीय है. एक पल में ही यहाँ सबकुछ उलट-पुलट हो जाता है. प्रकृति की गोद में एक दिन में ही जाने कितना परिवर्तन होता रहता है. पूरे चौबीस घंटों की समयावधि देखें तो पल-पल में ही परिवर्तन देखने को मिलते हैं. ऐसे में कैसे स्वीकार कर लिया जाये कि उसी प्रकृति की गोद में रहने वाले व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन नहीं होगा? कैसे मान लिया जाये कि जो पल आज है वह अगले पल बदलेगा नहीं? यह सत्य है कि जैसे दुःख आया है वैसे जाएगा भी उसी के साथ सुख भी आएगा और वह भी दुःख के जाने की तरह कुछ पल बाद चला जायेगा. इन्सान से अपने आपको इसी बदलाव के द्वारा, इस परिवर्तन के द्वारा आने वाली किसी भी घटना के लिए तैयार रहने के लिए, खुद में संतोष का भाव जागृत करने के लिए मान लिया है कि ऐसा करना ज़िन्दगी का लक्षण है. ऐसा होता है से ज्यादा वह इस पर विश्वास करता है कि ज़िन्दगी ऐसा करती है. इस विचारधारा से वे व्यक्ति सहज रूप में बाहर निकल आते हैं जो विश्वास के साथ किसी भी परिवर्तन का सामना करते हैं. इसके ठीक उलट वे लोग परेशान हो जाते हैं जो ज़िन्दगी के ऐसे परिवर्तनों के वशीभूत होकर अपना संतुलन खो देते हैं, अपने विश्वास को डगमगा देते हैं. 

ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति को अगले पल की जानकारी नहीं, सभी व्यक्तियों को चौबीस घंटे ही मिले हैं, हाँ बस संसाधनों का, माध्यमों का अंतर अवश्य हो सकता है. इस अंतर को कोई भी व्यक्ति अपने विश्वास के द्वारा भले न मिटा सके मगर कम तो कर ही सकता है. जैसे-जैसे कोई व्यक्ति अपने कार्यों से अपने सामने आने वाली विसंगतियों को दूर करता जाता है, अपने जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान करता जाता है वैसे-वैसे उस व्यक्ति के अन्दर विश्वास का लेवल बढ़ता चला जाता है. किसी भी व्यक्ति को यही विश्वास विजयी बनाता है, यही विश्वास आगे बढ़ाता है. ऐसे में ज़िन्दगी में मिलने वाली चुनौतियों को, ज़िन्दगी से मिलने वाली चुनौतियों को वह सिर्फ और सिर्फ अपने विश्वास से ही जीत सकता है. ऐसे में कोई भी व्यक्ति अपने विश्वास को बनाये रखे और ज़िन्दगी की चुनौतियों से जीतते हुए उसे ही चुनौती देता रहे.


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इस ब्लॉग की 1550वीं पोस्ट 

26 अप्रैल 2019

ज़िन्दगी की अनिश्चितता में ज़िन्दगी का आनंद है


हम सभी ज़िन्दगी की अनिश्चितता को लेकर बहुत सारी बातें करते हैं मगर इसकी असलियत के बारे में कभी गौर भी नहीं करते हैं. हो सकता है आप इसे न स्वीकारें मगर इससे इंकार नहीं कर सकते कि रोज ही घर से बाहर निकलते समय आप ज़िन्दगी की अनिश्चितता को लेकर विचार न करते हों. सबकुछ आपके हाथ में होने के बाद भी ज़िन्दगी आपके हाथ में नहीं होती. चाहे देश का सर्वोच्च पदधारी हो, सर्वोच्च शक्तिधारी हो या फिर निम्न से निम्नतर व्यक्ति, कोई ही दावे के साथ नहीं कह सकता कि वो अगले पल की ज़िन्दगी का आनंद लेगा ही. असल में ज़िन्दगी का आनंद उसी समय लिया जा सकता है जबकि आने वाले के बारे में कोई जानकारी न हो. मान लो, यदि किसी व्यक्ति को अपने आनंद के पलों में ज्ञात हो जाये कि अगले पल या फिर इस निश्चित समय पर उसके साथ दुर्घटना घटित होने वाली है, तब वो क्या उन आनंद भरे पलों का वास्तविक सुख ले पायेगा? नहीं न. यही ज़िन्दगी है, जो अनिश्चितता में प्रत्येक इन्सान को रखते हुए उसे उत्साहित करती है, ज़िन्दगी जीने का रास्ता दिखाती है. 


असल में देखा जाये तो ज़िन्दगी साँस लेने-छोड़ने का माध्यम मात्र है. आपने समाज के लिए क्या किया, समाज आपको किस रूप में जान रहा है, असल में ज़िन्दगी यही है. इस समाज में प्रत्येक जीव जिसको जीवन मिला है, वह किसी न किसी तरह अपने जीवन का निर्वाह करते हुए अंतिम अवस्था को प्राप्त हो जाता है. इसी चक्र में कतिपय विरले व्यक्ति ही ऐसे होते हैं जो अपने जीवन को अपने लिए नहीं वरन समाज के लिए व्यतीत करने का कार्य करते हैं. असल में जिंदगी का आनंद वही लोग लेते हैं. असल में ज़िन्दगी भी वही लोग जीते हैं. हम सबको ध्यान रखना चाहिए कि ज़िन्दगी की अनिश्चितता ही हम सबको जीवित रखे है, हम सबको सामान्य रखे है. यदि किसी भी व्यक्ति को अपने भविष्य के बारे में जानकारी हो जाये तो वह किसी भी स्थिति में सामान्य नहीं रह सकता है. ऐसी स्थिति में जबकि हमें अपना भविष्य ज्ञात नहीं, अपने वर्तमान को अंतिम सत्य मानते हुए व्यतीत करना चाहिए. इससे सभी ज़िन्दगी का असल आनंद उठा सकते हैं साथ ही ज़िन्दगी की अनिश्चितता के भय से मुक्त भी रह सकते हैं.

03 अप्रैल 2019

ज़िन्दगी का अर्थ सिर्फ जीवन बिताना नहीं


ज़िन्दगी का अर्थ क्या है, अक्सर ये विचार मन में कौंधता है पर इसका कोई समाधान नहीं निकल पाता है. न समाधान निकल पाता है और न ही मिलता है. हर बार की तरह, हर बार ये सवाल बिना जवाब पाए पहलू में सिमट जाता है. पहलू में सिमटने के बाद भी आये दिन ये सवाल सिर उठा कर सामने खड़ा हो जाता है कि ज़िदगी का अर्थ क्या है? क्या नौकरी करना भर ज़िन्दगी है? क्या शादी करके परिवार की संकल्पना पूरी कर देना ही ज़िन्दगी है? क्या परिवार के सदस्यों का भरण-पोषण करते रहना ही ज़िन्दगी है? क्या परिवार की सभी तरह की आवश्यकताओं को पूरा करते रहना ही ज़िन्दगी है? इन सबको भी यदि हाँ में मान लिया जाये, स्वीकार कर लिया जाये तो भी सवाल जहाँ का तहाँ रहता है कि आखिर ज़िन्दगी का अर्थ क्या है? ऐसा इसलिए क्योंकि समाज में बहुत से परिवार ऐसे हैं जो ऐसा नहीं कर रहे हैं मगर ज़िन्दगी जी रहे हैं. बहुत से ऐसे हैं जिनके ज़िन्दगी का अर्थ महज इतना नहीं है. ऐसे में यह तो साफ़ है कि ज़िदगी महज खाने-कमाने-पारिवारिक भरण-पोषण आदि से ही संदर्भित नहीं है. ज़िन्दगी इससे कहीं अधिक आगे है. इससे कहीं अलग है. फिर वही सवाल कि आखिर ज़िन्दगी है क्या? ज़िन्दगी का अर्थ क्या है?


इसी सवाल के आईने में उन लोगों को भी देखा है जिनके सामने परिवार का कोई मतलब नहीं, जिनके सामने पारिवारिक जिम्मेवारी जैसी कोई स्थिति नहीं इसके बाद भी उनको ज़िन्दगी बिताते नहीं देखा गया. नितांत अकेले में सिर्फ और सिर्फ अपनी जिम्मेवारी का निर्वहन करते लोगों के सामने भी ज़िन्दगी एक सवाल बनकर खड़ी होती है. ऐसे लोगों के सामने भी सवाल होता है कि आखिर ज़िन्दगी है क्या? वे अपने समय को, अपने कार्यों को जीवन से, ज़िन्दगी से सम्बद्ध कर ही नहीं पाते हैं. इसी के सापेक्ष उन लोगों को, जो ज़िन्दगी को विशुद्ध बेबाकी से बिताना चाहते हैं वे भी ज़िन्दगी को लेकर एकदम निश्चिन्त नहीं होते हैं. उनके लिए भी ज़िन्दगी का अर्थ खोजना मुश्किल काम होता है. ऐसा इसलिए क्योंकि समाज में ज़िन्दगी के सन्दर्भ, उसके भावार्थ किसी दूसरे अर्थों में प्रयुक्त किये जाते हैं. समाज में आम चलन में ज़िन्दगी का सीधा सा अर्थ आजीविका के साथ पारिवारिक भरण-पोषण करना भर है. इसके अलावा ज़िन्दगी का मतलब कुछ नहीं. इसके इतर जो भी कुछ है वो ज़िन्दगी नहीं वरन जीवन निर्वहन का एक तरीका मात्र है. 

कुछ इसी तरह की सोच के चलते भारतीय समाज में ज़िन्दगी अपने मूल रूप में आने के पहले ही समाप्त हो जाती है. यहाँ ज़िन्दगी का अर्थ बोझा ढोने से लगाया जाने लगता है. यहाँ ज़िन्दगी का अर्थ परिवार के लोगों के भरण-पोषण से माना जाता है. यहाँ ज़िन्दगी का अर्थ नितांत गंभीरता की स्थिति में सुबह से लेकर शाम तक गधे की तरह काम में लगे रहना समझा जाता है. यहाँ ज़िन्दगी का सम्बन्ध व्यक्ति की उम्र से जोड़ते हुए उसे वृद्ध बनाने से होता है. यहाँ ज़िन्दगी का अर्थ मजाक करना नहीं. यहाँ ज़िन्दगी का अर्थ मौज-मस्ती करना नहीं. यहाँ ज़िन्दगी का सम्बन्ध युवा होने से नहीं है. यहाँ ज़िन्दगी का मतलब व्यक्ति के खुल कर आनंद उठाने से नहीं है. ऐसे में जबकि ज़िन्दगी का अर्थ बोझ बना दिया गया ही वहाँ किसी व्यक्ति का असमय वृद्ध हो जाना कहाँ से असंगत महसूस होता है. यही कारण है कि भारतीय समाज में समय से पहले वृद्ध लोग सड़क किनारे टहलते दिखाई देने लगते हैं. यही कारण है कि बीमा कम्पनियाँ युवाओं को पेंशन प्लान समझाने लगती हैं. यही कारण है कि आज का युवा अपनी नौकरी में समय देने से ज्यादा समय पेंशन निर्धारण के धरनों-आन्दोलनों में देने लगा है. ध्यान रखना चाहिए, ज़िन्दगी महज उतनी है जो सुबह आँख खुलने से लेकर रात आँख बंद होने तक है. इतने पलों को सुखद रूप में, पूरी तन्मयता से, बिना किसी समस्या के बिता देना ही ज़िन्दगी है. बाकी जो भी हैं वे अपने हिस्से कि इतनी सी ही ज़िन्दगी लेकर आये हैं. ये और बात है कि कोई इसी हिस्से को हँस कर बिता रहा है, कोई इसी हिस्से को रोकर गुजार रहा है. आप विचार करिए कि आप क्या कर रहे हैं इस हिस्से का?

01 अप्रैल 2019

ज़िन्दगी सिर्फ जन्म और मृत्यु का नाम नहीं


‘कतरा-कतरा मिलती है, कतरा-कतरा जीने दो, ज़िन्दगी है...’ ये एक गाने की पंक्तियाँ हैं मगर जीवन के एकदम निकट हैं. सभी की ज़िन्दगी किस कदर बस कतरा-कतरा करके निकली जा रही है. ये और बात है कि आर्थिक स्थिति के चलते किसी को अपना कतरा मालूम चलता है, किसी को मालूम नहीं चल पाता है. क्या कभी इस पर विचार किया गया है कि ज़िन्दगी है कितनी? यहाँ सबसे पहले ज़िन्दगी का होना उम्र से जोड़ना किसी भी व्यक्ति की बेवकूफी होती है. ज़िन्दगी उम्र नहीं बल्कि वह है जो आप गुजार रहे हैं, व्यतीत कर रहे हैं. उम्र तो असल में एक तरह का नंबर सिस्टम है, जो किसी न किसी रूप में कैलेण्डर से जुड़ा हुआ है. कैलेण्डर का बदलना ही उम्र का पर्याय बनता है. इससे कहीं अलग, बहुत अलग है ज़िन्दगी. ये और बात है कि बहुसंख्यक लोग ज़िन्दगी का अर्थ समझे बिना उसे जिए चले जा रहे होते हैं. ऐसे लोगों के लिए ज़िन्दगी का अर्थ खुद का पैदा होना, शादी कर लेना, दो-चार बच्चे पैदा कर लेना और फिर उनकी शादी-उनके बच्चों की आस लगाये मर जाना होता है. इसी पैदा होने और जन्म लेने के बीच उनके द्वारा कुछ काम-धाम कर लिया जाता है जो उनके परिवार के भरण-पोषण के लिए आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य होता है. 


ज़िन्दगी इस जन्म-मृत्यु से, शादी-बच्चे पैदा करने, कमाने-खाने से बहुत अलग है. ज़िन्दगी का असल मतलब जो हमें समझ आया वो ये कि एक दिन में जितना समय एक व्यक्ति को मिला है, उसका सदुपयोग करना है. असल में किसी भी व्यक्ति की जिन्दगी आँख खुलने से आँख बंद होने तक अर्थात सुबह जागने से लेकर रात सोने तक ही है. इसमें भी हर एक पल में ज़िन्दगी है क्योंकि उसे नहीं मालूम कि अगले पल क्या होने वाला है. ऐसी स्थिति में जबकि किसी भी व्यक्ति को अपने अगले पल का भरोसा न हो, उसे नहीं जानकारी हो कि उसका अगला पल क्या, कैसा होने वाला है तब भी वह अपने जीवन को लेकर एकदम निश्चिन्त सा दिखाई देता है. किसी भी व्यक्ति की अपने जीवन के प्रति यही सबसे बड़ी भूल होती है. इसी के कारण वह अपने जीवन का सदुपयोग नहीं कर पाता है और न ही उसका आनंद ले पाता है. यदि वाकई ज़िन्दगी का, अपने जीवन का आनंद लेना है तो प्रत्येक पल को अंतिम पल मानते हुए उसका सर्वोत्तम और सार्थक उपयोग करना चाहिए. यदि कोई व्यक्ति ऐसा कर पाता है तो वह वास्तविक रूप में ज़िन्दगी का अर्थ समझ लेता है, ज़िन्दगी जीने के आयाम समझ लेता है.


04 मार्च 2019

धुँए और रफ़्तार में सिमटती ज़िन्दगी


हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता चला गया, एक गीत की ये पंक्ति आज के किशोरों को बड़ा उत्साहित करती है. इस एक पंक्ति के उत्साह में वे जगह-जगह, कहीं छिपे भाव में, कहीं खुलेआम उन्मुत रूप में सिगरेट फूँकते दिख जाते हैं. शहर की एक सड़क के किनारे खुले तमाम सारे कोचिंग सेंटर्स के आसपास झुण्ड के झुण्ड में दिखते किशोर और उन झुंडों पर तैरते धुंए के बादल. ये किसी एक शहर का दृश्य नहीं होता आजकल, लगभग सभी शहरों में ऐसी स्थिति दिख रही है. सिगरेट का धुआँ उड़ाते इन किशोरों को उस गीत की धुआँ उड़ाती पंक्ति तो उत्साहित कर जाती है मगर उसके ठीक पहले का हिस्सा याद नहीं रहता. वह हिस्सा जो साफ़-साफ़ कहता है कि मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया. इस हिस्से को ये युवा, किशोर कई तरीके से भुलाने का काम कर रहे हैं. बिना फ़िक्र के फ़िक्र को उड़ाने की कोशिश और उसी कोशिश में तेज रफ़्तार बाइक के द्वारा ज़िन्दगी को भी उड़ाते जा रहे हैं.


आपको आश्चर्य लगे मगर सच यही है. रुके हैं तो धुंए में खोए हैं और चल रहे है तो हवा से बातें कर रहे हैं. ये एक तरह की जीवन-शैली बनती जा रही है आज के बहुसंख्यक युवाओं की, किशोरों की. ज़िन्दगी को जीने की कोशिश में ज़िन्दगी से ही खिलवाड़ करते हुए इन बच्चों को आभास नहीं है कि वे क्या करने की कोशिश में अपने घर से बाहर निकलते हैं और क्या करने लग जाते हैं. भौतिकतावादी दौड़ में ऐसे बच्चों के माता-पिता भी शामिल दिखाई देते हैं. लाड़-प्यार के चलते बच्चों के लिए सभी अत्याधुनिक संसाधन सहज मुहैया करवा दिए जाते हैं. ऐसे में बच्चों को न तो धन की महत्ता समझ आती है, न समय की, न कैरियर की और न ही अपनी ज़िन्दगी की. माता-पिता के प्यार को, उनके द्वारा मेहनत से जुटाई जाने वाली सुविधाओं को, उनके द्वारा एक आवाज़ पर उपलब्ध करवाए जाने वाले संसाधनों को ये बच्चे अपना अधिकार सा समझते हैं. उनकी आवश्यकताओं की सहज पूर्ति हो जाने के कारण वे इसकी महत्ता तो समझते ही नहीं हैं, दूसरों को भी तिरस्कृत समझते हैं. 

अक्सर ऐसे बहुत सारे बच्चों को कॉलेज आते-जाते समय, शाम को नियमित घूमने की अपनी आदत के समय देखते हैं. कई बार मौका ऐसा आता है कि कोई न कोई आकर टकरा जाता है. कोई हमसे टकराता है, कोई कभी डिवाइडर से टकराता है, कभी किसी दूसरे वाहन से टकराता है. समझाने की स्थिति में उनके द्वारा ऐसा व्यवहार देखने को मिलता है जैसे लगता है कि बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो. उनके हाव-भाव ऐसे लगते हैं जैसे कई सारी जिंदगियां उनके माता-पिता ने पैसे के बल पर खरीद कर अपनी अलमारी में सुरक्षित कर रखी हैं. एक ये चली जाएगी तो दूसरी वाली से काम चला लेंगे. बहरहाल, ये बच्चे दूसरे के समझाने से क्या ही समझेंगे, जब कि वे अपने ही माता-पिता की बात नहीं समझ रहे हैं. कहना न होगा कि धुँए और रफ़्तार के सहारे ये युवा, किशोर ज़िन्दगी की खतरनाक यात्रा ही कर रहे हैं. इससे वे अभी भले ज़िन्दगी का साथ निभा पायें मगर भविष्य में ज़िन्दगी अवश्य ही उनका साथ देने में आनाकानी करने लगेगी.

06 फ़रवरी 2019

ज़िन्दगी जीने के लिए है बिताने के लिए नहीं


ज़िन्दगी जितनी आसान लगती है, उतनी आसान होती नहीं है. तमाम सारी जिम्मेवारियाँ, अनेक तरह की समस्याएँ, बहुत से काम, न जाने कितने दायित्व जिनको लेकर खुद ज़िन्दगी भी परेशान सी रहती है. ये और बात है कि अक्सर हम सामने वाले को दिखाने के लिए ऐसा बर्ताव करते हैं मानो जिंदगी हमारे लिए बहुत आसान सी बात हो. असल में ज़िन्दगी सिर्फ समय बिताने का नाम नहीं. ज़िन्दगी सिर्फ समय काटने का माध्यम नहीं. ज़िन्दगी सिर्फ उम्र बिता देने का नाम नहीं. ज़िन्दगी असल में जीने का नाम है. किसी भी व्यक्ति के जन्म से लेकर उसकी मृत्यु तक वह अपने निर्धारित समय को किस तरह से जी रहा है, वही ज़िन्दगी है. किसी भी इन्सान को यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि न तो जन्म उसके हाथ में है, न ही मृत्यु उसके द्वारा निर्धारित है. जिनको इस बारे में भ्रम हो वे एक बार जन्म-मरण के चक्र में उतर कर देख लें, सारा भ्रम दूर हो जायेगा. जो लोग आत्महत्या करने वालों का उदाहरण देते हैं, उनके लिए एक बात याद कर लेना चाहिए कि वह उनका निर्धारित समय था और उसी समय को पूरा करवाने का विधान पहले से निर्धारित कर दिया गया था. यह प्रकृति इस तरह की है जहाँ न तो जन्म अपने हाथ में है और न ही मृत्यु अपने हाथ में है. माना कि इन्सान आत्महत्या करने अपनी मृत्यु का समय निर्धारित कर लेता हो मगर अन्य जीवों, वनस्पतियों के बारे में क्या कहा जायेगा? वे भी किसी न किसी रूप में अपना स्वरूप का अंत करती हैं, मगर वह आत्महत्या नहीं होती.


यहीं आकर इंसानों को समझने की आवश्यकता है कि मृत्यु किसी समस्या का समाधान नहीं. जीवन ही उनकी समस्या का समाधान है. यदि जीवन है तो समस्या को हल करने के रास्ते सामने दिखाई पड़ते हैं. मौत के बाद तो फिर उसी जन्म-चक्र में फंसना होता है, जिससे छुटकारा लेने के लिए मौत का रास्ता चुना गया. यदि इन्सान इसी सत्य को समझ ले तो फिर किसी भी तरह की समस्या से परेशान न हो. यहाँ उसे समझना चाहिए कि किसी भी समस्या का जन्म तब हुआ है जबकि उसका समाधान प्रकृति द्वारा किया जा चुका है. ऐसा इसलिए क्योंकि प्रकृति सदैव से मातृ रूप में, पितृ रूप में हमारे आसपास रही है और कोई भी माता-पिता नहीं चाहते हैं कि उनकी संतति समस्या से ग्रसित रहे. ऐसे में प्रकृति द्वारा अपनी संतानों की जीवटता की परीक्षा लेने के लिए अनेक तरह की समस्याएं सामने लाई जाती हैं मगर उनका समाधान उनसे पहले दिया जाता है. यही वह बिंदु है जहाँ प्रकृति की एक-एक संतान अपनी समस्या के अनुसार अपना समाधान खोज ले. जो ऐसा कर पाते हैं वे जीवन का आनंद ले पाते हैं, उसके सुख का उपभोग कर पाते हैं. ऐसा न कर पाने वाले नितांत दुःख में अपना शेष जीवन बिताते रहते हैं. 

अब यदि हम अपने को इन्सान समझते हैं, खुद को दिमागदार मानते हैं तो किसी भी समस्या से निपटने की स्थिति हमें खुद ही विकसित करनी होगी. ध्यान रखना होगा कि ज़िन्दगी को, जीवन को जब हम आनंदरूप में व्यतीत कर रहे होते हैं तो वह विशुद्ध अपने लिए लिए होता है और जब ज़िन्दगी को जिया जाता है तो वह दूसरे के लिए होता है. इस दूसरे में हमारा परिवार होता है, हमारे माता-पिता होते हैं, हमारे भाई-बहिन होते हैं, हमारी पत्नी-बच्चे होते हैं. आनंद में सिर्फ हम ही हम होते हैं और जब सिर्फ हम ही हम होते हैं तो कोई जिम्मेवारी नहीं, कोई कर्तव्य नहीं, कोई भावना नहीं, कोई रिश्ता नहीं. यह सभी तब होता है जबकि हम अपने से ऊपर उठकर ज़िन्दगी को समाज के लिए जीना शुरू करते हैं. अपनी जिम्मेवारियों के लिए जीना शुरू करते हैं. अपने दायित्वों के लिए बिताना शुरू करते हैं. और देखा जाए तो असल ज़िदगी का आरम्भ भी इसी बिदु से होता है. तब तक तो बस सफ़र काटा जाता है. अब ये आपको तय करना है कि आप सफ़र काट रहे हैं  या फिर ज़िन्दगी जी रहे हैं.

29 दिसंबर 2018

जीवन की अनिश्चितता में क्रियाशीलता


हर नया दिन एक नए अनुभव के साथ गुजर जाता है. यह भले ही लगता हो कि सभी दिन एक जैसे, एक तरीके से गुजर रहे हैं मगर ऐसा होता नहीं है. एक सा लगने के बाद भी, एक जैसी क्रियाविधि होने के बाद भी सभी दिनों का अपना ही एक अलग अंदाज होता है. नित्यप्रति की दिनचर्या भले ही एक जैसी महसूस हो रही हो मगर उसके अनुभव अलग तरह से सीख देते हैं. कुछ भी निश्चित नहीं होता है, कुछ भी निश्चित सा समझ आता भी नहीं है. इसी अनिश्चय के बीच व्यक्ति निश्चित सा बना हुआ आगे बढ़ता रहता है.


कई बार लगता है कि यदि जीवन में यही अनिश्चितता न होती तो जीवन कितना नीरस हो जाता. सब कुछ पहले से निर्धारित. सबकुछ पहले से नियोजित. न कोई प्लान, न कोई योजना, न कोई प्रयास, बस सबकुछ तय तरीके से होता रहता, सामने आता रहता. जिंदगी की यही अनिश्चितता भले ही जिंदगी को नीरस नहीं होने देती मगर यही अनिश्चितता बहुत बार इंसानों को परेशान भी कर जाती है. कब क्या होगा, कैसे होगा, कौन करेगा, ऐसा हुआ तो क्यों हुआ, वैसा क्यों नहीं हुआ, ऐसा होता तो क्या हो जाता, वैसा न हुआ होता तो क्या होता आदि-आदि सवालों के साथ व्यक्ति अपने दिन को व्यतीत करता रहता है. इन्हीं सबके बीच वह अपने लिए रास्ता बनाता हुआ अपनी सोची हुई मंजिल को पाने के लिए लगातार प्रयासरत बना रहता है.

उसके प्रयासों से उसको मंजिल मिलती है या नहीं, ये एक अलग विषय हो सकता है किन्तु इसी बहाने से प्रत्येक व्यक्ति क्रियाशील बना रहता है. समाज भी इसी कारण गतिशील दिखाई देता है. इसी गतिशीलता ने सबको लक्ष्य के प्रति संवेदित होने की प्रेरणा दी है. व्यक्ति का लक्ष्य छोटा है या बड़ा, व्यक्ति के पास संसाधन सीमित हैं या असीमित, व्यक्ति के पास क्षमता है अथवा नहीं इसका कोई मोल नहीं होता है. गतिशीलता के चलते मोल इसका होता है कि कोई व्यक्ति कितनी ईमानदारी के साथ अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित भाव से लगा हुआ है. उसका यही समर्पण उसे आगे बढ़ाता है, उसे सफलता प्रदान करवाता है. स्पष्ट है कि बिना ईमानदारी के, बिना गतिशीलता के, बिना सार्थक प्रयास के किसी भी तरह से सफलता प्राप्त करना संभव नहीं. कदाचित कभी-कभी ऐसे लोग भी सफल होते दिखाई देने लगते हैं जो किसी न किसी तरह का कुचक्र रचकर ऐसा कर लेते हैं किन्तु ऐसा क्षणिक रूप में लाभकारी होता है. दीर्घकालिक लाभ के लिए व्यक्ति को ईमानदारी, सतत सार्थक प्रयासों की आवश्यकता है. जीवन की अनिश्चितता के साये में इसे छोड़ा नहीं जाना चाहिए.