29 मार्च 2026

समावेशी राष्ट्र हेतु समान नागरिक संहिता

गत माह गुजरात समान नागरिक संहिता को लागू करने वाला दूसरा राज्य बन गया. इससे पूर्व फरवरी 2024 में उत्तराखण्ड ने इसे लागू किया था. यह संहिता मुख्य रूप से विवाह, तलाक और विरासत जैसे व्यक्तिगत मामलों को सभी नागरिकों के लिए एकसमान रूप से प्रभावी करती है. यह किसी राजनैतिक दल विशेष की मानसिकता की उपज नहीं बल्कि देश की आज़ादी के तुरंत बाद ही व्यापक दृष्टिकोण से जन्मी अवधारणा है. नवम्बर 1948 में संविधान सभा की बैठक में समान नागरिक संहिता को लागू किये जाने पर लम्बी बहस चली. बहस में इस्लामिक चिन्तक मोहम्मद इस्माईल, जेड.एच. लारी, हुसैन इमाम, नजीरुद्दीन अहमद सहित अनेक मुस्लिम नेताओं ने अम्बेडकर का विरोध किया था. तब अम्बेडकर ने समान नागरिक संहिता का समर्थन करते हुए कहा था कि देश में एक आपराधिक विधि संहिता है, दंड विधान में एक विधि है, सम्पत्ति हस्तांतरण का एक विधान है. बहस के दौरान जबरदस्त विरोध के बीच मतदान करवाया गया, जिसमें अम्बेडकर के प्रस्ताव को स्वीकार किया गया. समान नागरिक संहिता का विरोध करने वाले मुस्लिम सदस्यों के पराजित होने के पश्चात् संविधान के अनुच्छेद 44 में बहुमत से समान नागरिक संहिता को लागू किये जाने सम्बन्धी विधान लाया गया. इस प्रस्ताव के लाये जाने के बाद भी समान नागरिक संहिता को लागू करने का विचार कुछ वर्षों के लिए इसलिए टाल दिया गया ताकि बँटवारे की त्रासदी झेल रहे मुसलमानों के प्रति सौहार्द्र दर्शाया जा सके. संविधान सभा द्वारा सौहार्द्र दर्शाने के बावजूद मुस्लिम कट्टरता बढ़ती गई, मुस्लिम तुष्टिकरण बढ़ता गया और समान नागरिक संहिता की राह संकीर्ण होती गई. इसी विरोध और कट्टरता के चलते 1972 में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का जन्म हुआ. तबसे यह समान नागरिक संहिता का विरोध करते हुए शरीयत को संविधान और कानून से ऊपर बताता-मानता है.

 



चूँकि समान नागरिक संहिता लागू किये जाने का बिन्दु भाजपा द्वारा उठाया जाता रहा है ऐसे में गैर-भाजपाई राजनैतिक दलों द्वारा इसे राजनैतिक रंग देकर विवादित बना दिया गया है. इन राजनैतिक दलों का आरोप है कि भाजपा द्वारा ध्रुवीकरण के लिए इस विषय को उठाया जाता है. ऐसे आरोपों के बीच यह समझना होगा कि आज़ादी के तुरंत बाद तो भाजपा नहीं थीउस समय हिंदुत्व साम्प्रदायिकता जैसी कोई स्थिति भी नहीं थी तब उस समय संविधान सभा द्वारा समान नागरिक संहिता को लागू करने का विधान क्यों बनाया गया? तब भी मुस्लिम सदस्यों द्वारा इस संहिता का विरोध क्यों किया गयाआखिर सभी नागरिकों के एकसमान अधिकार होने का विरोध क्योंशरीयत की बात करने वाला कट्टरपंथी मुसलमान क्या सभी कार्य शरीयत के अनुसार ही करता हैकिसी मुसलमान द्वारा अपराध किये जाने पर शरीयत के अनुसार उसको कोड़े मारनाहाथ काटनापत्थर मारनाफाँसी पर लटकाना आदि जैसी सजाएँ दी जाती हैंकुरान में बाल विवाह प्रतिबंधित है. उसके अनुसार विवाह केवल बालिग स्त्री-पुरुष के बीच हो सकता है जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार ख्याल-उल-बलूग अर्थात बाल विवाह का प्रावधान है. कुरान के अनुसार तलाक बिना अदालती हस्तक्षेप के सम्भव नहीं जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार मुस्लिम मर्द को अपनी मर्जी से तलाक लेने का अधिकार है. ऐसे एक-दो नहीं अनेक उदाहरण हैं जिनके आधार पर न ही शरीयत का सम्पूर्ण पालन होता दिखता है न ही कुरान और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में समन्वय दिखता है. ऐसे में आखिर शरीयत की दुहाई देते हुए समान नागरिक संहिता का विरोध क्यों किया जाता है

 

देखा जाये तो भारतीय लोकतंत्र के विकसित और सशक्त राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में समान नागरिक संहिता केवल राजनैतिक मुद्दा नहीं बल्कि सामाजिक न्याय की अनिवार्यता है. भारतीय संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 44 के माध्यम से जिस स्वप्न को नीति निदेशक तत्वों में संजोया था, उसे वर्तमान की कसौटी पर परखने का समय आ गया है. एक देश में नागरिक कानूनों की विविधता न केवल प्रशासनिक जटिलताएँ पैदा करती है, बल्कि यह उस संवैधानिक संकल्प के भी आड़े आती है जो हर नागरिक को कानून के समक्ष बराबरी का अधिकार देता है.

यहाँ समझना होगा की कानूनी समानता के लिए अस्तित्व में आने वाली समान नागरिक संहिता किसी धार्मिक आस्था पर चोट नहीं है, किसी भी व्यक्ति को उसके मजहबी आचरण से विलग करने की नीति नहीं है बल्कि इसके द्वारा मानवाधिकारों की सुरक्षा का, व्यक्तिगत पहचान को पुख्ता करने का कदम है. एक ऐसे देश में जहाँ धार्मिक स्वतंत्रता है, वैचारिक स्वतंत्रता है वहाँ एक संहिता के द्वारा किसी को कैसे प्रतिबंधित किया जा सकता है? समान नागरिक संहिता एक नागरिक के प्रति उसके अधिकार और उसे मिलने वाले न्याय की प्रक्रिया को सार्वभौमिक स्वरूप प्रदान करती है.

 

राष्ट्रीय एकता और अखंडता के दृष्टिकोण से भी कानूनों का यह सरलीकरण आवश्यक है. इससे न केवल नागरिकों के बीच एकसमान अवधारणा कार्य करेगी बल्कि न्यायपालिका के लिए भी वर्षों से लंबित पड़े पारिवारिक विवादों का निपटारा करने में सहजता होगी. बेशक, भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में सर्वसम्मति बनाना एक चुनौती है किन्तु यह समझना भी होगा कि सुधार कभी भी यथास्थितिवाद से नहीं आते. समान नागरिक संहिता वास्तव में आधुनिक और समतामूलक समाज की अवधारणा पुष्ट करती है. इसके लिए हमें संकीर्णता से ऊपर उठकर एक विधान के विचार को धरातल पर उतारना होगा ताकि आने वाली पीढ़ियाँ संगठित और न्यायप्रिय भारत का निर्माण कर सकें.

 

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