आज, 22 जून 2026 को लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर की आगजनी की घटना में एक
दर्जन से अधिक बच्चों की असमय मृत्यु हो गई. इस घटना से भले ही एकबारगी व्यवस्था का
लचर होना सामने आया हो मगर हम अभिभावकों का भी असंवेदित होना सामने आया है. ये सच
है और ऐसा सच है जो बहुत ही कड़वा है. असल में अब ऐसा माहौल बनता जा रहा है या कहें कि हम सबकी आदत हो गई है कि किसी
भी दुर्घटना के लिए सीधे-सीधे शासन-प्रशासन को जिम्मेदार बताकर हम स्वयं दोषी होने
के पाप से मुक्त होने की कोशिश करने लगते हैं.
यदि इसी आगजनी की बात
करें तो अभिभावकों ने अपने ही बच्चों को वहाँ प्रवेश दिलाया था. वे किसी दूसरे
ग्रह से आये बच्चों को लेकर वहाँ नहीं गए थे, ऐसे में क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि सम्बंधित संस्थान
की स्थिति का आकलन कर लेते? आज बच्चों के घर से बाहर निकलते ही हम अभिभावकों के मन में तमाम तरह की अनिश्चिन्ताओं,
आशंकाओं का बनना शुरू हो जाता है. आये
दिन कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप
में दुर्घटनाओं का होना देख भी रहे हैं. ऐसे में क्या अभिभावकों की कोई जिम्मेदारी
नहीं? कोचिंग सेंटर में,
किसी संस्था में प्रवेश करवा देना,
मोटी फीस जमा कर देना, बच्चों के आवागमन के लिए स्कूटी, गाड़ी आदि खरीदवा देना आदि से कर्तव्य की इतिश्री
नहीं हो जाती है.
बच्चे आपके ही हैं,
कहीं किसी पेड़ से तोड़कर नहीं लाये हैं,
कहीं किसी दूसरे ग्रह से नहीं उतरे हैं,
तब उनके प्रति, उनकी सुरक्षा के प्रति ऐसी लापरवाही क्यों? कुछ ऐसा ही बच्चों की किसी भी परीक्षा के लिए
देरी को लेकर भी है. यदि अभिभावकों को लगता है कि सम्बंधित परीक्षा उनके बच्चे के लिए
अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, उसके कैरियर
के लिए महत्त्वपूर्ण है तो समय का ध्यान करके निकलना चाहिए.
शासन-प्रशासन को,
व्यवस्था को, तंत्र को सुधरना नहीं है..... हम-आपके हाथ में नहीं है
कि उसे सुधार सकें तो कम से कम खुद ही सुधर जाएँ. अपनी हठधर्मिता में, शासन-व्यवस्था को दोषी ठहराने की मानसिकता में
कम से कम अपने बच्चों की ज़िन्दगी से, उनके भविष्य से आप लोग ही, अभिभावक लोग ही खिलवाड़ करना बंद कर दीजिये.

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