27 अक्टूबर 2026

रूस-यूक्रेन युद्ध से मिला क्या?

वैश्विक पटल से उभरकर आती खबरों के अनुसार रूस-यूक्रेन के मध्य युद्धविराम जैसी स्थिति बन रही है. दोनों देशों के मध्य अभी मानवीय सहायता पहुँचाने और नागरिकों को सुरक्षित निकालने के लिए सीमित युद्धविराम लागू हुआ है. रूस द्वारा डोनबास क्षेत्र पर नियंत्रण की माँग और यूक्रेन की ओर से सुरक्षा सम्बन्धी शर्तों पर विवाद होने के कारण फ़िलहाल इस सीमित युद्धविराम को रूस-यूक्रेन युद्ध की समाप्ति अथवा वर्तमान नियंत्रण रेखा को स्थायी सीमा मान लेने पर सहमति नहीं समझना चाहिए.

 

जिस तरह से इन दोनों देशों के मध्य युद्ध की स्थिति बनी रही, उसे केवल फरवरी 2022 में शुरू हुए आक्रमण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. मूलरूप से सोवियत संघ के विघटन, यूक्रेन की स्वतंत्र विदेश नीति की आकांक्षा, रूस की क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं आदि ने युद्ध जैसे हालात पैदा किये थे. 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद यूक्रेन का स्वतंत्र राष्ट्र बनना; काला सागर तक उसकी पहुँच होना, क्रीमिया में नौसैनिक उपस्थिति के चलते वह हमेशा से आर्थिक और सामरिक महत्त्व वाला भाग रहा है. पूर्वी यूरोप में प्रभाव बनाए रखने की रूस की रणनीतिक सोच ने तथा यूक्रेन द्वारा नाटो की सदस्यता प्राप्त करने की आकांक्षा ने युद्ध का आरम्भ करवा दिया. इस युद्ध से दोनों देशों की महत्त्वाकांक्षाओं को क्या प्रतिफल मिला, ये तो समय निर्धारित करेगा किन्तु युद्ध में दोनों देशों को व्यापक रूप से मानवीय और सैन्य क्षति उठानी पड़ी है.

 

एक स्वतंत्र शोध पर आधारित अनुमान के आधार पर सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के जुलाई 2026 में प्रकाशित खबर के अनुसार फरवरी 2022 से जून 2026 तक रूसी सेना के लगभग 14 लाख सैनिक हताहत हुए, जिनमें मृत, घायल और लापता शामिल हैं. इसी अवधि में यूक्रेन के लगभग 5.25 लाख से 6.25 लाख सैनिक हताहत हुए. सैनिकों के अतिरिक्त नागरिकों के हताहत होने; विस्थापन और बुनियादी सुविधाओं के विनाश होने की अपनी अलग स्थिति है. संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार निगरानी मिशन के अनुसार फरवरी 2022 से दिसम्बर 2025 तक यूक्रेन में लगभग 15000 नागरिकों की मृत्यु और 40000 से अधिक लोगों के घायल होने की पुष्टि हुई है.

 

आर्थिक दृष्टि से भी यूक्रेन को बुरी तरह नुकसान हुआ है. उसके आवास, परिवहन, ऊर्जा और औद्योगिक ढाँचे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है. विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ के संयुक्त आकलन के अनुसार दिसम्बर 2025 तक यूक्रेन में प्रत्यक्ष भौतिक क्षति लगभग 195.1 अरब डॉलर थी. आर्थिक गतिविधियों और आजीविका में उत्पन्न व्यवधान से होने वाला नुकसान लगभग 666.7 अरब डॉलर आँका गया है. इस स्थिति के अनुसार अगले दस वर्षों में पुनर्निर्माण और सुधार के लिए लगभग 587.7 अरब डॉलर की आवश्यकता बताई जा रही है. ऐसा नहीं है कि आर्थिक क्षति सिर्फ यूक्रेन को ही उठानी पड़ी है, रूस को भी सैन्य खर्च, सैनिकों की क्षति, पश्चिमी प्रतिबंधों, तकनीकी आयात पर पाबंदियों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बदलाव की भारी कीमत चुकानी पड़ी है. पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों के कारण रूसी अर्थव्यवस्था और उसके वैश्विक व्यापार को नकारात्मक रूप से क्षति उठानी पड़ी. यद्यपि रूस ने एशिया के अन्य देशों के साथ अपने व्यापारिक सम्बन्ध मजबूत करके बिगड़ी आर्थिक स्थिति को सँभालने का प्रयास किया तथापि उसके आधुनिक सैन्य संसाधन, आर्थिक मोर्चे भी नष्ट हुए. इसके साथ-साथ वैश्विक मंच पर रूस की रणनीतिक, कूटनीतिक, आर्थिक प्रतिष्ठा प्रभावित हुई. रूस की अर्थव्यवस्था ने भी आर्थिक दबावों का सामना किया किन्तु यूक्रेन जैसे छोटे देश के मुकाबले रूस के पास स्वयं को स्थिर बनाये रखने के अन्यान्य साधन भी उपलब्ध थे. देखा जाये तो रूस के लिए परिणाम मिश्रित रहे हैं. उसने कुछ यूक्रेनी क्षेत्रों पर वास्तविक सैन्य नियंत्रण बनाए रखा है और क्रीमिया पर अपना कब्जा कायम रखा है. इसके बाद भी वह पूरे यूक्रेन पर नियंत्रण स्थापित करने में सफल नहीं हुआ.

 

इस संघर्ष का प्रभाव केवल रूस और यूक्रेन तक सीमित नहीं रहा. अमेरिका सहित अनेक यूरोपीय देशों ने यूक्रेन को सैन्य सहायता प्रदान करने के साथ-साथ आर्थिक और मानवीय सहायता भी प्रदान की. उधर रूस ने पश्चिमी प्रतिबंधों के प्रभाव को कम करने के लिए अन्य देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध बनाए रखे. इसके चलते यूरोप में ऊर्जा सुरक्षा की प्राथमिकताएँ बदलीं; वैश्विक खाद्य तथा उर्वरक बाजारों पर भी दबाव पड़ा. भारत सहित अनेक विकासशील देशों के सामने ऊर्जा की कीमतों, खाद्य सुरक्षा, रक्षा सम्बन्धों, भू-राजनीतिक संतुलन की चुनौतियाँ उभरीं. भू-राजनीतिक विश्लेषक निश्चित ही इस पर अपना पक्ष रखेंगे कि यूक्रेन को इस युद्ध से क्या मिला किन्तु जिस तरह से यूक्रेन ने पश्चिमी देशों के समर्थन से अभूतपूर्व दृढ़ता दिखाई उससे वैश्विक स्तर पर उसकी छवि एक संघर्षशील राष्ट्र के रूप में उभरी. ये और बात है कि इस दृढ़ता के बदले में यूक्रेन को व्यापक विनाश के रूप में भारी कीमत चुकानी पड़ी है.

 

रूस-यूक्रेन युद्ध के सीमित युद्धविराम के स्थायी समाधान हेतु यूक्रेन पर कब्जे वाले क्षेत्रों की कानूनी स्थिति, भविष्य की सुरक्षा, विस्थापितों की वापसी, पुनर्निर्माण आदि मुद्दों पर भी दोनों देशों की सहमति आवश्यक होगी. वर्तमान नियंत्रण रेखा पर लड़ाई रोकने का समझौता निश्चित रूप से तत्काल ही जनहानि को कम कर सकता है. सीमित युद्धविराम और प्रस्तावित वार्ताओं को सम्भावित कूटनीतिक कदमों के रूप में देखना उचित है न कि युद्ध की समाप्ति के रूप में. यह युद्ध इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण समझा जाना चाहिए कि वर्तमान में युद्ध किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है. युद्ध के साए में समाधान नहीं बल्कि विनाश, विस्थापन, आर्थिक अस्थिरता, वैश्विक असंतुलन आदि का ही जन्म होता है. किसी समाधान की चाह में शुरू हुए युद्ध की कीमत वर्तमान समय तो चुकाता ही है, भविष्य में आने वाली पीढ़ियों को भी इसका भुगतान करना पड़ता है.


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