यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाये जाने की अधिसूचना के बाद से दोनों तरफ से
तर्क-वितर्क मचा हुआ है. सरकार और उसके समर्थक अपना पक्ष रख रहे हैं, इस शुल्क के विरोधी अपनी बात कह रहे
हैं. यद्यपि इसको 15 अक्टूबर से अमल में आना है तथापि इस पर अभी से कुछ दुकानदारों
की नकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिलने लगी है. वैसे सरकार द्वारा लेनदेन पर
लगने वाले शुल्क के बारे में अपनी ही कहानी कही जा रही है मगर उस कहानी के पीछे
खुद के द्वारा मुफ्त वितरण के बोझ को नहीं देखा जा रहा है.
आइये, इसकी तुलना
कीजिए जरा,
एक के लिए वार्षिक खर्च लगभग बीस हज़ार करोड़ रुपए. दूसरे के लिए मासिक खर्च
लगभग सोलह हज़ार करोड़ रुपए. जी हाँ, सही से पढ़ा है आपने इस बहुत बड़े अंतर को.
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) पर केन्द्र सरकार हर महीने औसतन 16,000 करोड़ रुपए से 17,000 करोड़ रुपए खर्च करती है. इस
योजना के लिए सालाना करीब 2.03 लाख करोड़ रुपए से लेकर 2.13
लाख करोड़ रुपए का आवंटन किया जाता है. इसमें देश के पात्र राशन
कार्डधारकों को प्रति व्यक्ति 5 किलो मुफ्त राशन दिया जाता
है.
इसके उलट MDR (मर्चेंट
डिस्काउंट रेट) को पूरी तरह मुफ्त रखने या इसे चलाने पर सालाना करीब 20,000
करोड़ रुपए से लेकर 20,700 करोड़ रुपए का कुल
परिचालन खर्च आता है. इसके बाद भी शुल्क पहले वाले पर लगा दिया गया अर्थात यूपीआई
लेनदेन पर शुल्क लगाया गया है.
एक और आँकड़े पर यदि निगाह डाली जाये तो पता चलेगा कि अनुमानित रूप में देश की
जनसंख्या लगभग 147 करोड़
है और PMGKAY के अन्तर्गत मुफ्त राशन पाने वालों की संख्या
लगभग 81 करोड़ है. सोचिए, आधे से
ज़्यादा जनसंख्या (लगभग 55%) मुफ़्त का राशन ले रही है. विकास
की ओर मुफ़्त में अग्रसर हैं हम सब.
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