कराघात (Impact of Tax) और करापात (Tax Incidence) के बारे में क्या आपने
पढ़-सुन रखा है? जिसने पढ़-सुन रखा है वह सहजता से यूपीआई
लेनदेन सम्बन्धी मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) के सच को समझ
सकता है. सरकार द्वारा एक अधिसूचना जारी करके यूपीआई लेनदेन पर कुछ शुल्क लगाये
जाने के बारे में जनता को बताया है. इसमें बताया गया है कि इसमें दो हजार रुपये तक
के लेनदेन को किसी भी तरह के शुल्क से मुक्त रखा गया है, साथ
ही इसके ऊपर के लेनदेन पर लगने वाले शुल्क को भी दुकानदारों से लिया जायेगा, न कि ग्राहकों से.
दो हजार रुपये से अधिक के लेनदेन पर तो शुल्क लगाया ही गया है, भले ही वह देखने में बहुत कम समझ आ
रहा हो; जारी अधिसूचना की भाषा में भले ही यह शुल्क उपभोक्ता को नहीं देना है
किन्तु सोचिए एक पल को कि क्या यह शुल्क दुकानदार देने को तैयार होगा? आज भी क्रेडिट कार्ड से भुगतान करने की स्थिति में दुकानदार लगने वाले
टैक्स को ग्राहक की तरफ मोड़ देता है. कुछ इसी तरह की स्थिति यहाँ भी बनेगी. शुल्क
चाहे दस रुपये आये या अधिकतम तीन सौ रुपये, उसे दुकानदार के
द्वारा ग्राहक पर ही आरोपित कर दिया जायेगा. उदाहरण के लिए आप कोई सामान लेते हैं
जो पच्चीस-पचास हजार रुपये का है. इस पर लगने वाला शुल्क सौ-दो सौ रुपये होगा और
यह अधिकतम तीन सौ रुपये निर्धारित कर दिया गया है. निश्चित समझिये कि यह अतिरिक्त
रुपये भी आपको ही चुकाने होंगे.
यूपीआई के कारण बैंकों पर, सरकार पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ की कहानी कहने से पहले देश में मुफ्त में
बँटने वाली रेवड़ियों की भी गिनती कर लेना, उससे पड़ने वाले
आर्थिक बोझ का भी वजन कर लेना. जनहित के नाम पर मुफ्त के राशन से लेकर लाड़ली-लाड़ला
किया जा सकता है; स्कूटी, मोबाइल,
टेबलेट किया जा सकता है, बैंक खातों को
समय-समय पर भरा जा सकता है, उसी तरह प्रत्येक यूपीआई लेनदेन
को भी जनहित में स्वीकारा जा सकता है.
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